10. जुज़ - कुरान पढ़ें
8 · अल-अनफाल9 · अत-तौबा
وَاعْلَمُٓوا اَنَّمَا غَنِمْتُمْ مِنْ شَيْءٍ فَاَنَّ لِلّٰهِ خُمُسَهُ وَلِلرَّسُولِ وَلِذِي الْقُرْبٰى وَالْيَتَامٰى وَالْمَسَاك۪ينِ وَابْنِ السَّب۪يلِۙ اِنْ كُنْتُمْ اٰمَنْتُمْ بِاللّٰهِ وَمَٓا اَنْزَلْنَا عَلٰى عَبْدِنَا يَوْمَ الْفُرْقَانِ يَوْمَ الْتَقَى الْجَمْعَانِۜ وَاللّٰهُ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَد۪يرٌ41
और तुम्हें मालूम हो कि जो कुछ ग़नीमत के रूप में माल तुमने प्राप्त किया है, उसका पाँचवा भाग अल्लाग का, रसूल का, नातेदारों का, अनाथों का, मुहताजों और मुसाफ़िरों का है। यदि तुम अल्लाह पर और उस चीज़ पर ईमान रखते हो, जो हमने अपने बन्दे पर फ़ैसले के दिन उतारी, जिस दिन दोनों सेनाओं में मुठभेड़ हूई, और अल्लाह को हर चीज़ की पूर्ण सामर्थ्य प्राप्त है
اِذْ اَنْتُمْ بِالْعُدْوَةِ الدُّنْيَا وَهُمْ بِالْعُدْوَةِ الْقُصْوٰى وَالرَّكْبُ اَسْفَلَ مِنْكُمْۜ وَلَوْ تَوَاعَدْتُمْ لَاخْتَلَفْتُمْ فِي الْم۪يعَادِۙ وَلٰكِنْ لِيَقْضِيَ اللّٰهُ اَمْرًا كَانَ مَفْعُولًاۙ لِيَهْلِكَ مَنْ هَلَكَ عَنْ بَيِّنَةٍ وَيَحْيٰى مَنْ حَيَّ عَنْ بَيِّنَةٍۜ وَاِنَّ اللّٰهَ لَسَم۪يعٌ عَل۪يمٌۙ42
याद करो जब तुम घाटी के निकटवर्ती छोर पर थे और वे घाटी के दूरस्थ छोर पर थे और क़ाफ़िला तुमसे नीचे की ओर था। यदि तुम परस्पर समय निश्चित किए होते तो अनिवार्यतः तुम निश्चित समय पर न पहुँचते। किन्तु जो कुछ हुआ वह इसलिए कि अल्लाह उस बात का फ़ैसला कर दे, जिसका पूरा होना निश्चित था, ताकि जिसे विनष्ट होना हो, वह स्पष्ट प्रमाण देखकर ही विनष्ट हो और जिसे जीवित रहना हो वह स्पष्ट़ प्रमाण देखकर जीवित रहे। निस्संदेह अल्लाह भली-भाँति जानता, सुनता है
اِذْ يُر۪يكَهُمُ اللّٰهُ ف۪ي مَنَامِكَ قَل۪يلًاۜ وَلَوْ اَرٰيكَهُمْ كَث۪يرًا لَفَشِلْتُمْ وَلَتَنَازَعْتُمْ فِي الْاَمْرِ وَلٰكِنَّ اللّٰهَ سَلَّمَۜ اِنَّهُ عَل۪يمٌ بِذَاتِ الصُّدُورِ43
और याद करो जब अल्लाह उनको तुम्हारे स्वप्न में थोड़ा करके तुम्हें दिखा रहा था और यदि वह उन्हें ज़्यादा करके तुम्हें दिखा देता तो अवश्य ही तुम हिम्मत हार बैठते और असल मामले में झगड़ने लग जाते, किन्तु अल्लाह ने इससे बचा लिया। निश्चय ही वह तो जो कुछ दिलों में होता है उसे भी जानता है
وَاِذْ يُر۪يكُمُوهُمْ اِذِ الْتَقَيْتُمْ ف۪ٓي اَعْيُنِكُمْ قَل۪يلًا وَيُقَلِّلُكُمْ ف۪ٓي اَعْيُنِهِمْ لِيَقْضِيَ اللّٰهُ اَمْرًا كَانَ مَفْعُولًاۜ وَاِلَى اللّٰهِ تُرْجَعُ الْاُمُورُ۟44
याद करो जब तुम्हारी परस्पर मुठभेड़ हुई तो वह तुम्हारी निगाहों में उन्हें कम करके और तुम्हें उनकी निगाहों में कम करके दिखा रहा था, ताकि अल्लाह उस बात का फ़ैसला कर दे जिसका होना निश्चित था। और सारे मामले अल्लाह ही की ओर पलटते है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اِذَا لَق۪يتُمْ فِئَةً فَاثْبُتُوا وَاذْكُرُوا اللّٰهَ كَث۪يرًا لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَۚ45
ऐ ईमान लानेवालो! जब तुम्हारा किसी गिरोह से मुक़ाबला हो जाए तो जमे रहो और अल्लाह को ज़्यादा याद करो, ताकि तुम्हें सफलता प्राप्त हो
وَاَط۪يعُوا اللّٰهَ وَرَسُولَهُ وَلَا تَنَازَعُوا فَتَفْشَلُوا وَتَذْهَبَ ر۪يحُكُمْ وَاصْبِرُواۜ اِنَّ اللّٰهَ مَعَ الصَّابِر۪ينَۚ46
और अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानो और आपस में न झगड़ो, अन्यथा हिम्मत हार बैठोगे और तुम्हारी हवा उखड़ जाएगी। और धैर्य से काम लो। निश्चय ही, अल्लाह धैर्यवानों के साथ है
وَلَا تَكُونُوا كَالَّذ۪ينَ خَرَجُوا مِنْ دِيَارِهِمْ بَطَرًا وَرِئَٓاءَ النَّاسِ وَيَصُدُّونَ عَنْ سَب۪يلِ اللّٰهِۜ وَاللّٰهُ بِمَا يَعْمَلُونَ مُح۪يطٌ47
और उन लोगों की तरह न हो जाना जो अपने घरों से इतराते और लोगों को दिखाते निकले थे और वे अल्लाह के मार्ग से रोकते है, हालाँकि जो कुछ वे करते है, अल्लाह उसे अपने घेरे में लिए हुए है
وَاِذْ زَيَّنَ لَهُمُ الشَّيْطَانُ اَعْمَالَهُمْ وَقَالَ لَا غَالِبَ لَكُمُ الْيَوْمَ مِنَ النَّاسِ وَاِنّ۪ي جَارٌ لَكُمْۚ فَلَمَّا تَرَٓاءَتِ الْفِئَتَانِ نَكَصَ عَلٰى عَقِبَيْهِ وَقَالَ اِنّ۪ي بَر۪ٓيءٌ مِنْكُمْ اِنّ۪ٓي اَرٰى مَا لَا تَرَوْنَ اِنّ۪ٓي اَخَافُ اللّٰهَۜ وَاللّٰهُ شَد۪يدُ الْعِقَابِ۟48
और याद करो जब शैतान ने उनके कर्म उनके लिए सुन्दर बना दिए और कहा, "आज लोगों में से कोई भी तुमपर प्रभावी नहीं हो सकता। मैं तुम्हारे साथ हूँ।" किन्तु जब दोनों गिरोह आमने-सामने हुए तो वह उलटे पाँव फिर गया और कहने लगा, "मेरा तुमसे कोई सम्बन्ध नहीं। मैं वह कुछ देख रहा हूँ, जो तुम्हें नहीं दिखाई देता। मैं अल्लाह से डरता हूँ, और अल्लाह कठोर यातना देनेवाला है।"
اِذْ يَقُولُ الْمُنَافِقُونَ وَالَّذ۪ينَ ف۪ي قُلُوبِهِمْ مَرَضٌ غَرَّ هٰٓؤُ۬لَٓاءِ د۪ينُهُمْۜ وَمَنْ يَتَوَكَّلْ عَلَى اللّٰهِ فَاِنَّ اللّٰهَ عَز۪يزٌ حَك۪يمٌ49
याद करो जब कपटाचारी और वे लोग जिनके दिलों में रोग है, कह रहे थे, "इन लोगों को तो इनके धर्म ने धोखे में डाल रखा है।" हालाँकि जो अल्लाह पर भरोसा रखता है, तो निश्चय ही अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
وَلَوْ تَرٰٓى اِذْ يَتَوَفَّى الَّذ۪ينَ كَفَرُواۙ الْمَلٰٓئِكَةُ يَضْرِبُونَ وُجُوهَهُمْ وَاَدْبَارَهُمْۚ وَذُوقُوا عَذَابَ الْحَر۪يقِ50
क्या ही अच्छा होता कि तुम देखते जब फ़रिश्ते इनकार करनेवालों के प्राण ग्रस्त करते हैं! वे उनके चहरों और उनकी पीठों पर मारते जाते हैं कि "लो अब जलने की यातना मज़ा चखो।" (तो उनकी दुर्दशा का अन्दाजा कर सकते)
ذٰلِكَ بِمَا قَدَّمَتْ اَيْد۪يكُمْ وَاَنَّ اللّٰهَ لَيْسَ بِظَلَّامٍ لِلْعَب۪يدِۙ51
यह तो उसी का बदला है जो तुम्हारे हाथों ने आगे भेजा और यह कि अल्लाह अपने बन्दों पर तनिक भी अत्याचार नहीं करता
كَدَاْبِ اٰلِ فِرْعَوْنَۙ وَالَّذ۪ينَ مِنْ قَبْلِهِمْۜ كَفَرُوا بِاٰيَاتِ اللّٰهِ فَاَخَذَهُمُ اللّٰهُ بِذُنُوبِهِمْۜ اِنَّ اللّٰهَ قَوِيٌّ شَد۪يدُ الْعِقَابِ52
इनके साथ वैसा ही मामला पेश आया जैसा फ़िरऔन के लोगों और उनसे पहले के लोगों के साथ पेश आया। उन्होंने अल्लाह की आयतों का इनकार किया तो अल्लाह ने उनके गुनाहों के कारण उन्हें पकड़ लिया। निस्संदेह अल्लाह शक्तिशाली, कठोर यातना देनेवाला है
ذٰلِكَ بِاَنَّ اللّٰهَ لَمْ يَكُ مُغَيِّرًا نِعْمَةً اَنْعَمَهَا عَلٰى قَوْمٍ حَتّٰى يُغَيِّرُوا مَا بِاَنْفُسِهِمْۙ وَاَنَّ اللّٰهَ سَم۪يعٌ عَل۪يمٌۙ53
यह इसलिए हुआ कि अल्लाह उस उदार अनुग्रह (नेमत) को, जो उसने किसी क़ौम पर किया हो, बदलनेवाला नहीं हैं, जब तक कि लोग उस चीज़ को न बदल डालें, जिसका सम्बन्ध स्वयं उनसे है। और यह कि अल्लाह सब कुछ सुनता, जानता है
كَدَاْبِ اٰلِ فِرْعَوْنَۙ وَالَّذ۪ينَ مِنْ قَبْلِهِمْۜ كَذَّبُوا بِاٰيَاتِ رَبِّهِمْۚ فَاَهْلَكْنَاهُمْ بِذُنُوبِهِمْ وَاَغْرَقْنَٓا اٰلَ فِرْعَوْنَۚ وَكُلٌّ كَانُوا ظَالِم۪ينَ54
जैसे फ़िरऔनियों और उनसे पहले के लोगों का हाल हुआ। उन्होंने अपने रब की आयतों को झुठलाया तो हमने उन्हें उनके गुनाहों के बदले में विनष्ट कर दिया और फ़िरऔनियों को डूबो दिया। ये सभी अत्याचारी थे
اِنَّ شَرَّ الدَّوَٓابِّ عِنْدَ اللّٰهِ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا فَهُمْ لَا يُؤْمِنُونَۚ55
निश्चय ही, सबसे बुरे प्राणी अल्लाह की स्पष्ट में वे लोग है, जिन्होंने इनकार किया। फिर वे ईमान नहीं लाते
اَلَّذ۪ينَ عَاهَدْتَ مِنْهُمْ ثُمَّ يَنْقُضُونَ عَهْدَهُمْ ف۪ي كُلِّ مَرَّةٍ وَهُمْ لَا يَتَّقُونَ56
जिनसे तुमने वचन लिया वे फिर हर बार अपने वचन को भंग कर देते है और वे डर नहीं रखते
فَاِمَّا تَثْقَفَنَّهُمْ فِي الْحَرْبِ فَشَرِّدْ بِهِمْ مَنْ خَلْفَهُمْ لَعَلَّهُمْ يَذَّكَّرُونَ57
अतः यदि युद्ध में तुम उनपर क़ाबू पाओ, तो उनके साथ इस तरह पेश आओ कि उनके पीछेवाले भी भाग खड़े हों, ताकि वे शिक्षा ग्रहण करें
وَاِمَّا تَخَافَنَّ مِنْ قَوْمٍ خِيَانَةً فَانْبِذْ اِلَيْهِمْ عَلٰى سَوَٓاءٍۜ اِنَّ اللّٰهَ لَا يُحِبُّ الْخَٓائِن۪ينَ۟58
और यदि तुम्हें किसी क़ौम से विश्वासघात की आशंका हो, तो तुम भी उसी प्रकार ऐसे लोगों के साथ हुई संधि को खुल्लम-खुल्ला उनके आगे फेंक दो। निश्चय ही अल्लाह को विश्वासघात करनेवाले प्रिय नहीं
وَلَا يَحْسَبَنَّ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا سَبَقُواۜ اِنَّهُمْ لَا يُعْجِزُونَ59
इनकार करनेवाले यह न समझे कि वे आगे निकल गए। वे क़ाबू से बाहर नहीं जा सकते
وَاَعِدُّوا لَهُمْ مَا اسْتَطَعْتُمْ مِنْ قُوَّةٍ وَمِنْ رِبَاطِ الْخَيْلِ تُرْهِبُونَ بِه۪ عَدُوَّ اللّٰهِ وَعَدُوَّكُمْ وَاٰخَر۪ينَ مِنْ دُونِهِمْۚ لَا تَعْلَمُونَهُمْۚ اَللّٰهُ يَعْلَمُهُمْۜ وَمَا تُنْفِقُوا مِنْ شَيْءٍ ف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِ يُوَفَّ اِلَيْكُمْ وَاَنْتُمْ لَا تُظْلَمُونَ60
और जो भी तुमसे हो सके, उनके लिए बल और बँधे घोड़े तैयार रखो, ताकि इसके द्वारा अल्लाह के शत्रुओं और अपने शत्रुओं और इनके अतिरिक्त उन दूसरे लोगों को भी भयभीत कर दो जिन्हें तुम नहीं जानते। अल्लाह उनको जानता है और अल्लाह के मार्ग में तुम जो कुछ भी ख़र्च करोगे, वह तुम्हें पूरा-पूरा चुका दिया जाएगा और तुम्हारे साथ कदापि अन्याय न होगा
وَاِنْ جَنَحُوا لِلسَّلْمِ فَاجْنَحْ لَهَا وَتَوَكَّلْ عَلَى اللّٰهِۜ اِنَّهُ هُوَ السَّم۪يعُ الْعَل۪يمُ61
और यदि वे संधि और सलामती की ओर झुकें तो तुम भी इसके लिए झुक जाओ और अल्लाह पर भरोसा रखो। निस्संदेह, वह सब कुछ सुनता, जानता है
وَاِنْ يُر۪يدُٓوا اَنْ يَخْدَعُوكَ فَاِنَّ حَسْبَكَ اللّٰهُۜ هُوَ الَّذ۪ٓي اَيَّدَكَ بِنَصْرِه۪ وَبِالْمُؤْمِن۪ينَۙ62
और यदि वे यह चाहें कि तुम्हें धोखा दें तो तुम्हारे लिए अल्लाह काफ़ी है। वही तो है जिसने तुम्हें अपनी सहायता से और मोमिनों के द्वारा शक्ति प्रदान की
وَاَلَّفَ بَيْنَ قُلُوبِهِمْۜ لَوْ اَنْفَقْتَ مَا فِي الْاَرْضِ جَم۪يعًا مَٓا اَلَّفْتَ بَيْنَ قُلُوبِهِمْ وَلٰكِنَّ اللّٰهَ اَلَّفَ بَيْنَهُمْۜ اِنَّهُ عَز۪يزٌ حَك۪يمٌ63
और उनके दिल आपस में एक-दूसरे से जोड़ दिए। यदि तुम धरती में जो कुछ है, सब खर्च कर डालते तो भी उनके दिलों को परस्पर जोड़ न सकते, किन्तु अल्लाह ने उन्हें परस्पर जोड़ दिया। निश्चय ही वह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
يَٓا اَيُّهَا النَّبِيُّ حَسْبُكَ اللّٰهُ وَمَنِ اتَّبَعَكَ مِنَ الْمُؤْمِن۪ينَ۟64
ऐ नबी! तुम्हारे लिए अल्लाह और तुम्हारे ईमानवाले अनुयायी ही काफ़ी है
يَٓا اَيُّهَا النَّبِيُّ حَرِّضِ الْمُؤْمِن۪ينَ عَلَى الْقِتَالِۜ اِنْ يَكُنْ مِنْكُمْ عِشْرُونَ صَابِرُونَ يَغْلِبُوا مِائَتَيْنِۚ وَاِنْ يَكُنْ مِنْكُمْ مِائَةٌ يَغْلِبُٓوا اَلْفًا مِنَ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا بِاَنَّهُمْ قَوْمٌ لَا يَفْقَهُونَ65
ऐ नबी! मोमिनों को जिहाद पर उभारो। यदि तुम्हारे बीस आदमी जमे होंगे, तो वे दो सौ पर प्रभावी होंगे और यदि तुमसे से ऐसे सौ होंगे तो वे इनकार करनेवालों में से एक हज़ार पर प्रभावी होंगे, क्योंकि वे नासमझ लोग है
اَلْـٰٔنَ خَفَّفَ اللّٰهُ عَنْكُمْ وَعَلِمَ اَنَّ ف۪يكُمْ ضَعْفًاۜ فَاِنْ يَكُنْ مِنْكُمْ مِائَةٌ صَابِرَةٌ يَغْلِبُوا مِائَتَيْنِۚ وَاِنْ يَكُنْ مِنْكُمْ اَلْفٌ يَغْلِبُٓوا اَلْفَيْنِ بِاِذْنِ اللّٰهِۜ وَاللّٰهُ مَعَ الصَّابِر۪ينَ66
अब अल्लाह ने तुम्हारे बोझ हल्का कर दिया और उसे मालूम हुआ कि तुममें कुछ कमज़ोरी है। तो यदि तुम्हारे सौ आदमी जमे रहनेवाले होंगे, तो वे दो सौ पर प्रभावी रहेंगे और यदि तुममें से ऐसे हजार होंगे तो अल्लाह के हुक्म से वे दो हज़ार पर प्रभावी रहेंगे। अल्लाह तो उन्ही लोगों के साथ है जो जमे रहते है
مَا كَانَ لِنَبِيٍّ اَنْ يَكُونَ لَهُٓ اَسْرٰى حَتّٰى يُثْخِنَ فِي الْاَرْضِۜ تُر۪يدُونَ عَرَضَ الدُّنْيَاۗ وَاللّٰهُ يُر۪يدُ الْاٰخِرَةَۜ وَاللّٰهُ عَز۪يزٌ حَك۪يمٌ67
किसी नबी के लिए यह उचित नहीं कि उसके पास क़ैदी हो यहाँ तक की वह धरती में रक्तपात करे। तुम लोग संसार की सामग्री चाहते हो, जबकि अल्लाह आख़िरत चाहता है। अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
لَوْلَا كِتَابٌ مِنَ اللّٰهِ سَبَقَ لَمَسَّكُمْ ف۪يمَٓا اَخَذْتُمْ عَذَابٌ عَظ۪يمٌ68
यदि अल्लाह का लिखा पहले से मौजूद न होता, तो जो कुछ नीति तुमने अपनाई है उसपर तुम्हें कोई बड़ी यातना आ लेती
فَكُلُوا مِمَّا غَنِمْتُمْ حَلَالًا طَيِّبًاۘ وَاتَّقُوا اللّٰهَۜ اِنَّ اللّٰهَ غَفُورٌ رَح۪يمٌ۟69
अतः जो कुछ ग़नीमत का माल तुमने प्राप्त किया है, उसे वैध-पवित्र समझकर खाओ और अल्लाह का डर रखो। निश्चय ही अल्लाह बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
يَٓا اَيُّهَا النَّبِيُّ قُلْ لِمَنْ ف۪ٓي اَيْد۪يكُمْ مِنَ الْاَسْرٰٓىۙ اِنْ يَعْلَمِ اللّٰهُ ف۪ي قُلُوبِكُمْ خَيْرًا يُؤْتِكُمْ خَيْرًا مِمَّٓا اُخِذَ مِنْكُمْ وَيَغْفِرْ لَكُمْۜ وَاللّٰهُ غَفُورٌ رَح۪يمٌ70
ऐ नबी! जो क़ैदी तुम्हारे क़ब्जें में है, उनसे कह दो, "यदि अल्लाह ने यह जान लिया कि तुम्हारे दिलों में कुछ भलाई है तो वह तुम्हें उससे कहीं उत्तम प्रदान करेगा, जो तुम से छिन गया है और तुम्हें क्षमा कर देगा। और अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है।"
وَاِنْ يُر۪يدُوا خِيَانَتَكَ فَقَدْ خَانُوا اللّٰهَ مِنْ قَبْلُ فَاَمْكَنَ مِنْهُمْۜ وَاللّٰهُ عَل۪يمٌ حَك۪يمٌ71
किन्तुम यदि वे तुम्हारे साथ विश्वासघात करना चाहेंगे, तो इससे पहले वे अल्लाह के साथ विश्वासघात कर चुके है। तो उसने तुम्हें उनपर अधिकार दे दिया। अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, बड़ा तत्वदर्शी है
اِنَّ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَهَاجَرُوا وَجَاهَدُوا بِاَمْوَالِهِمْ وَاَنْفُسِهِمْ ف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِ وَالَّذ۪ينَ اٰوَوْا وَنَصَرُٓوا اُو۬لٰٓئِكَ بَعْضُهُمْ اَوْلِيَٓاءُ بَعْضٍۜ وَالَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَلَمْ يُهَاجِرُوا مَا لَكُمْ مِنْ وَلَايَتِهِمْ مِنْ شَيْءٍ حَتّٰى يُهَاجِرُواۚ وَاِنِ اسْتَنْصَرُوكُمْ فِي الدّ۪ينِ فَعَلَيْكُمُ النَّصْرُ اِلَّا عَلٰى قَوْمٍ بَيْنَكُمْ وَبَيْنَهُمْ م۪يثَاقٌۜ وَاللّٰهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَص۪يرٌ72
जो लोग ईमान लाए और उन्होंने हिजरत की और अल्लाह के मार्ग में अपने मालों और अपनी जानों के साथ जिहाद किया और जिन लोगों ने उन्हें शरण दी और सहायता की, वही लोग परस्पर एक-दूसरे के संरक्षक मित्र है। रहे वे लोग जो ईमान लाए, किन्तु उन्होंने हिजरत नहीं की, उनसे तुम्हारा संरक्षण और मित्रता का कोई सम्बन्ध नहीं है, जब तक कि वे हिजरत न करें, किन्तु यदि वे धर्म के मामले में तुमसे सहायता माँगे तो तुमपर अनिवार्य है कि सहायता करो, सिवाय इसके कि सहायता किसी ऐसी क़ौम के मुक़ाबले में हो जिससे तुम्हारी कोई संधि हो। तुम जो कुछ करते हो अल्लाह उसे देखता है
وَالَّذ۪ينَ كَفَرُوا بَعْضُهُمْ اَوْلِيَٓاءُ بَعْضٍۜ اِلَّا تَفْعَلُوهُ تَكُنْ فِتْنَةٌ فِي الْاَرْضِ وَفَسَادٌ كَب۪يرٌۜ73
जो इनकार करनेवाले लोग है, वे आपस में एक-दूसरे के मित्र और सहायक है। यदि तुम ऐसा नहीं करोगे तो धरती में फ़ितना और बड़ा फ़साद फैलेगा
وَالَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَهَاجَرُوا وَجَاهَدُوا ف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِ وَالَّذ۪ينَ اٰوَوْا وَنَصَرُٓوا اُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْمُؤْمِنُونَ حَقًّاۜ لَهُمْ مَغْفِرَةٌ وَرِزْقٌ كَر۪يمٌ74
और जो लोग ईमान लाए और उन्होंने हिजरत की और अल्लाह के मार्ग में जिहाद किया और जिन लोगों ने उन्हें शरण दी और सहायता की वही सच्चे मोमिन हैं। उनके क्षमा और सम्मानित - उत्तम आजीविका है
وَالَّذ۪ينَ اٰمَنُوا مِنْ بَعْدُ وَهَاجَرُوا وَجَاهَدُوا مَعَكُمْ فَاُو۬لٰٓئِكَ مِنْكُمْۜ وَاُو۬لُوا الْاَرْحَامِ بَعْضُهُمْ اَوْلٰى بِبَعْضٍ ف۪ي كِتَابِ اللّٰهِۜ اِنَّ اللّٰهَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَل۪يمٌ75
और जो लोग बाद में ईमान लाए और उन्होंने हिजरत की और तुम्हारे साथ मिलकर जिहाद किया तो ऐसे लोग भी तुम में ही से हैं। किन्तु अल्लाह की किताब मे ख़ून के रिश्तेदार एक-दूसरे के ज़्यादा हक़दार है। निश्चय ही अल्लाह को हर चीज़ का ज्ञान है
بَرَٓاءَةٌ مِنَ اللّٰهِ وَرَسُولِه۪ٓ اِلَى الَّذ۪ينَ عَاهَدْتُمْ مِنَ الْمُشْرِك۪ينَۜ1
मुशरिकों (बहुदेववादियों) से जिनसे तुमने संधि की थी, विरक्ति (की उद्घॊषणा) है अल्लाह और उसके रसूल की ओर से
فَس۪يحُوا فِي الْاَرْضِ اَرْبَعَةَ اَشْهُرٍ وَاعْلَمُٓوا اَنَّكُمْ غَيْرُ مُعْجِزِي اللّٰهِۙ وَاَنَّ اللّٰهَ مُخْزِي الْكَافِر۪ينَ2
"अतः इस धरती में चार महीने और चल-फिर लो और यह बात जान लो कि अल्लाह के क़ाबू से बाहर नहीं जा सकते और यह कि अल्लाह इनकार करनेवालों को अपमानित करता है।"
وَاَذَانٌ مِنَ اللّٰهِ وَرَسُولِه۪ٓ اِلَى النَّاسِ يَوْمَ الْحَجِّ الْاَكْبَرِ اَنَّ اللّٰهَ بَر۪ٓيءٌ مِنَ الْمُشْرِك۪ينَۙ وَرَسُولُهُۜ فَاِنْ تُبْتُمْ فَهُوَ خَيْرٌ لَكُمْۚ وَاِنْ تَوَلَّيْتُمْ فَاعْلَمُٓوا اَنَّكُمْ غَيْرُ مُعْجِزِي اللّٰهِۜ وَبَشِّرِ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا بِعَذَابٍ اَل۪يمٍۙ3
सार्वजनिक उद्घॊषणा है अल्लाह और उसके रसूल की ओर से, बड़े हज के दिन लोगों के लिए, कि "अल्लाह मुशरिकों के प्रति जिम्मेदार से बरी है और उसका रसूल भी। अब यदि तुम तौबा कर लो, तो यह तुम्हारे ही लिए अच्छा है, किन्तु यदि तुम मुह मोड़ते हो, तो जान लो कि तुम अल्लाह के क़ाबू से बाहर नहीं जा सकते।" और इनकार करनेवालों के लिए एक दुखद यातना की शुभ-सूचना दे दो
اِلَّا الَّذ۪ينَ عَاهَدْتُمْ مِنَ الْمُشْرِك۪ينَ ثُمَّ لَمْ يَنْقُصُوكُمْ شَيْـًٔا وَلَمْ يُظَاهِرُوا عَلَيْكُمْ اَحَدًا فَاَتِمُّٓوا اِلَيْهِمْ عَهْدَهُمْ اِلٰى مُدَّتِهِمْۜ اِنَّ اللّٰهَ يُحِبُّ الْمُتَّق۪ينَ4
सिवाय उन मुशरिकों के जिनसे तुमने संधि-समझौते किए, फिर उन्होंने तुम्हारे साथ अपने वचन को पूर्ण करने में कोई कमी नही की और न तुम्हारे विरुद्ध किसी की सहायता ही की, तो उनके साथ उनकी संधि को उन लोगों के निर्धारित समय तक पूरा करो। निश्चय ही अल्लाह को डर रखनेवाले प्रिय है
فَاِذَا انْسَلَخَ الْاَشْهُرُ الْحُرُمُ فَاقْتُلُوا الْمُشْرِك۪ينَ حَيْثُ وَجَدْتُمُوهُمْ وَخُذُوهُمْ وَاحْصُرُوهُمْ وَاقْعُدُوا لَهُمْ كُلَّ مَرْصَدٍۚ فَاِنْ تَابُوا وَاَقَامُوا الصَّلٰوةَ وَاٰتَوُا الزَّكٰوةَ فَخَلُّوا سَب۪يلَهُمْۜ اِنَّ اللّٰهَ غَفُورٌ رَح۪يمٌ5
फिर, जब हराम (प्रतिष्ठित) महीने बीत जाएँ तो मुशरिकों को जहाँ कहीं पाओ क़त्ल करो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो और हर घात की जगह उनकी ताक में बैठो। फिर यदि वे तौबा कर लें और नमाज़ क़ायम करें और ज़कात दें तो उनका मार्ग छोड़ दो, निश्चय ही अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है
وَاِنْ اَحَدٌ مِنَ الْمُشْرِك۪ينَ اسْتَجَارَكَ فَاَجِرْهُ حَتّٰى يَسْمَعَ كَلَامَ اللّٰهِ ثُمَّ اَبْلِغْهُ مَاْمَنَهُۜ ذٰلِكَ بِاَنَّهُمْ قَوْمٌ لَا يَعْلَمُونَ۟6
और यदि मुशरिकों में से कोई तुमसे शरण माँगे, तो तुम उसे शरण दे दो, यहाँ तक कि वह अल्लाह की वाणी सुन ले। फिर उसे उसके सुरक्षित स्थान पर पहुँचा दो, क्योंकि वे ऐसे लोग हैं, जिन्हें ज्ञान नहीं
كَيْفَ يَكُونُ لِلْمُشْرِك۪ينَ عَهْدٌ عِنْدَ اللّٰهِ وَعِنْدَ رَسُولِه۪ٓ اِلَّا الَّذ۪ينَ عَاهَدْتُمْ عِنْدَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِۚ فَمَا اسْتَقَامُوا لَكُمْ فَاسْتَق۪يمُوا لَهُمْۜ اِنَّ اللّٰهَ يُحِبُّ الْمُتَّق۪ينَ7
इन मुशरिकों को किसी संधि की कोई ज़िम्मेदारी अल्लाह और उसके रसूल पर कैसे बाक़ी रह सकती है? - उन लोगों का मामला इससे अलग है, जिनसे तुमने मस्जिदे हराम (काबा) के पास संधि की थी, तो जब तक वे तुम्हारे साथ सीधे रहें, तब तक तुम भी उनके साथ सीधे रहो। निश्चय ही अल्लाह को डर रखनेवाले प्रिय है। -
كَيْفَ وَاِنْ يَظْهَرُوا عَلَيْكُمْ لَا يَرْقُبُوا ف۪يكُمْ اِلًّا وَلَا ذِمَّةًۜ يُرْضُونَكُمْ بِاَفْوَاهِهِمْ وَتَاْبٰى قُلُوبُهُمْۚ وَاَكْثَرُهُمْ فَاسِقُونَۚ8
कैसे बाक़ी रह सकती है? जबकि उनका हाल यह है कि यदि वे तुम्हें दबा पाएँ तो वे न तुम्हारे विषय में किसी नाते-रिश्ते का ख़याल रखें औऱ न किसी अभिवचन का। वे अपने मुँह ही से तुम्हें राज़ी करते है, किन्तु उनके दिल इनकार करते रहते है और उनमें अधिकतर अवज्ञाकारी है
اِشْتَرَوْا بِاٰيَاتِ اللّٰهِ ثَمَنًا قَل۪يلًا فَصَدُّوا عَنْ سَب۪يلِه۪ۜ اِنَّهُمْ سَٓاءَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ9
उन्होंने अल्लाह की आयतों के बदले थोड़ा-सा मूल्य स्वीकार किया और इस प्रकार वे उसका मार्ग अपनाने से रूक गए। निश्चय ही बहुत बुरा है, जो कुछ वे कर रहे हैं
لَا يَرْقُبُونَ ف۪ي مُؤْمِنٍ اِلًّا وَلَا ذِمَّةًۜ وَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْمُعْتَدُونَ10
किसी मोमिन के बारे में न तो नाते-रिश्ते का ख़याल रखते है और न किसी अभिवचन का। वही लोग है जिन्होंने सीमा का उल्लंघन किया
فَاِنْ تَابُوا وَاَقَامُوا الصَّلٰوةَ وَاٰتَوُا الزَّكٰوةَ فَاِخْوَانُكُمْ فِي الدّ۪ينِۜ وَنُفَصِّلُ الْاٰيَاتِ لِقَوْمٍ يَعْلَمُونَ11
अतः यदि वे तौबा कर लें और नमाज़ क़ायम करें और ज़कात दें तो वे धर्म के भाई हैं। और हम उन लोगों के लिए आयतें खोल-खोलकर बयान करते हैं, जो जानना चाहें
وَاِنْ نَكَثُٓوا اَيْمَانَهُمْ مِنْ بَعْدِ عَهْدِهِمْ وَطَعَنُوا ف۪ي د۪ينِكُمْ فَقَاتِلُٓوا اَئِمَّةَ الْكُفْرِۙ اِنَّهُمْ لَٓا اَيْمَانَ لَهُمْ لَعَلَّهُمْ يَنْتَهُونَ12
और यदि अपने अभिवचन के पश्चात वे अपनी क़समॊं कॊ तॊड़ डालॆं और तुम्हारॆ दीन (धर्म) पर चॊटें करनॆ लगॆं, तॊ फिर कुफ़्र (अधर्म) कॆ सरदारों सॆ युद्ध करॊ, उनकी क़समॆं कुछ नहीं, ताकि वॆ बाज़ आ जाऐं।
اَلَا تُقَاتِلُونَ قَوْمًا نَكَثُٓوا اَيْمَانَهُمْ وَهَمُّوا بِاِخْرَاجِ الرَّسُولِ وَهُمْ بَدَؤُ۫كُمْ اَوَّلَ مَرَّةٍۜ اَتَخْشَوْنَهُمْۚ فَاللّٰهُ اَحَقُّ اَنْ تَخْشَوْهُ اِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِن۪ينَ13
क्या तुम ऐसॆ लॊगॊं सॆ नहीं लड़ॊगॆ जिन्हॊंनॆ अपनी क़समों को तोड़ डालीं और रसूल को निकाल देना चाहा और वही हैं जिन्होंने तुमसे छेड़ में पहल की? क्या तुम उनसे डरते हो? यदि तुम मोमिन हो तो इसका ज़्यादा हक़दार अल्लाह है कि तुम उससे डरो
قَاتِلُوهُمْ يُعَذِّبْهُمُ اللّٰهُ بِاَيْد۪يكُمْ وَيُخْزِهِمْ وَيَنْصُرْكُمْ عَلَيْهِمْ وَيَشْفِ صُدُورَ قَوْمٍ مُؤْمِن۪ينَۙ14
उनसे लड़ो। अल्लाह तुम्हारे हाथों से उन्हें यातना देगा और उन्हें अपमानित करेगा और उनके मुक़ाबले में वह तुम्हारी सहायता करेगा। और ईमानवाले लोगों के दिलों का दुखमोचन करेगा;
وَيُذْهِبْ غَيْظَ قُلُوبِهِمْۜ وَيَتُوبُ اللّٰهُ عَلٰى مَنْ يَشَٓاءُۜ وَاللّٰهُ عَل۪يمٌ حَك۪يمٌ15
उनके दिलों का क्रोध मिटाएगा, अल्लाह जिसे चाहेगा, उसपर दया-दृष्टि डालेगा। अल्लाह सर्वज्ञ, तत्वदर्शी है
اَمْ حَسِبْتُمْ اَنْ تُتْرَكُوا وَلَمَّا يَعْلَمِ اللّٰهُ الَّذ۪ينَ جَاهَدُوا مِنْكُمْ وَلَمْ يَتَّخِذُوا مِنْ دُونِ اللّٰهِ وَلَا رَسُولِه۪ وَلَا الْمُؤْمِن۪ينَ وَل۪يجَةًۜ وَاللّٰهُ خَب۪يرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ۟16
क्या तुमने यह समझ रखा है कि तुम ऐसे ही छोड़ दिए जाओगे, हालाँकि अल्लाह ने अभी उन लोगों को छाँटा ही नहीं, जिन्होंने तुममें से जिहाद किया और अल्लाह और उसके रसूल और मोमिनों को छोड़कर किसी को घनिष्ठ मित्र नहीं बनाया? तुम जो कुछ भी करते हो, अल्लाह उसकी ख़बर रखता है
مَا كَانَ لِلْمُشْرِك۪ينَ اَنْ يَعْمُرُوا مَسَاجِدَ اللّٰهِ شَاهِد۪ينَ عَلٰٓى اَنْفُسِهِمْ بِالْكُفْرِۜ اُو۬لٰٓئِكَ حَبِطَتْ اَعْمَالُهُمْۚ وَفِي النَّارِ هُمْ خَالِدُونَ17
यह मुशरिकों का काम नहीं कि वे अल्लाह की मस्जिदों को आबाद करें और उसके प्रबंधक हों, जबकि वे स्वयं अपने विरुद्ध कुफ़्र की गवाही दे रहे है। उन लोगों का सारा किया-धरा अकारथ गया और वे आग में सदैव रहेंगे
اِنَّمَا يَعْمُرُ مَسَاجِدَ اللّٰهِ مَنْ اٰمَنَ بِاللّٰهِ وَالْيَوْمِ الْاٰخِرِ وَاَقَامَ الصَّلٰوةَ وَاٰتَى الزَّكٰوةَ وَلَمْ يَخْشَ اِلَّا اللّٰهَ فَعَسٰٓى اُو۬لٰٓئِكَ اَنْ يَكُونُوا مِنَ الْمُهْتَد۪ينَ18
अल्लाह की मस्जिदों का प्रबंधक और उसे आबाद करनेवाला वही हो सकता है जो अल्लाह और अंतिम दिन पर ईमान लाया, नमाज़ क़ायम की और ज़कात दी और अल्लाह के सिवा किसी से न डरा। अतः ऐसे ही लोग, आशा है कि सीधा मार्ग पानेवाले होंगे
اَجَعَلْتُمْ سِقَايَةَ الْحَٓاجِّ وَعِمَارَةَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ كَمَنْ اٰمَنَ بِاللّٰهِ وَالْيَوْمِ الْاٰخِرِ وَجَاهَدَ ف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِۜ لَا يَسْتَوُ۫نَ عِنْدَ اللّٰهِۜ وَاللّٰهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الظَّالِم۪ينَۢ19
क्या तुमने हाजियों को पानी पिलाने और मस्जिदे हराम (काबा) के प्रबंध को उस क्यक्ति के काम के बराबर ठहरा लिया है, जो अल्लाह और अंतिम दिन पर ईमान लाया और उसने अल्लाह के मार्ग में संघर्ष किया?अल्लाह की दृष्टि में वे बराबर नहीं। और अल्लाह अत्याचारी लोगों को मार्ग नहीं दिखाता
اَلَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَهَاجَرُوا وَجَاهَدُوا ف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِ بِاَمْوَالِهِمْ وَاَنْفُسِهِمْۙ اَعْظَمُ دَرَجَةً عِنْدَ اللّٰهِۜ وَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْفَٓائِزُونَ20
जो लोग ईमान लाए और उन्होंने हिजरत की और अल्लाह के मार्ग में अपने मालों और अपनी जानों से जिहाद किया, अल्लाह के यहाँ दर्जे में वे बहुत बड़े है और वही सफल है
يُبَشِّرُهُمْ رَبُّهُمْ بِرَحْمَةٍ مِنْهُ وَرِضْوَانٍ وَجَنَّاتٍ لَهُمْ ف۪يهَا نَع۪يمٌ مُق۪يمٌۙ21
उन्हें उनका रब अपना दयालुता और प्रसन्नता और ऐसे बाग़ों की शुभ-सूचना देता है, जिनमें उनके लिए स्थायी सुख-सामग्री है
خَالِد۪ينَ ف۪يهَٓا اَبَدًاۜ اِنَّ اللّٰهَ عِنْدَهُٓ اَجْرٌ عَظ۪يمٌ22
उनमें वे सदैव रहेंगे। निस्संदेह अल्लाह के पास बड़ा बदला है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لَا تَتَّخِذُٓوا اٰبَٓاءَكُمْ وَاِخْوَانَكُمْ اَوْلِيَٓاءَ اِنِ اسْتَحَبُّوا الْكُفْرَ عَلَى الْا۪يمَانِۜ وَمَنْ يَتَوَلَّهُمْ مِنْكُمْ فَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ23
ऐ ईमान लानेवालो! अपने बाप और अपने भाइयों को अपने मित्र न बनाओ यदि ईमान के मुक़ाबले में कुफ़्र उन्हें प्रिय हो। तुममें से जो कोई उन्हें अपना मित्र बनाएगा, तो ऐसे ही लोग अत्याचारी होंगे
قُلْ اِنْ كَانَ اٰبَٓاؤُ۬كُمْ وَاَبْنَٓاؤُ۬كُمْ وَاِخْوَانُكُمْ وَاَزْوَاجُكُمْ وَعَش۪يرَتُكُمْ وَاَمْوَالٌۨ اقْتَرَفْتُمُوهَا وَتِجَارَةٌ تَخْشَوْنَ كَسَادَهَا وَمَسَاكِنُ تَرْضَوْنَهَٓا اَحَبَّ اِلَيْكُمْ مِنَ اللّٰهِ وَرَسُولِه۪ وَجِهَادٍ ف۪ي سَب۪يلِه۪ فَتَرَبَّصُوا حَتّٰى يَاْتِيَ اللّٰهُ بِاَمْرِه۪ۜ وَاللّٰهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْفَاسِق۪ينَ۟24
कह दो, "यदि तुम्हारे बाप, तुम्हारे बेटे, तुम्हारे भाई, तुम्हारी पत्नि यों और तुम्हारे रिश्ते-नातेवाले और माल, जो तुमने कमाए है और कारोबार जिसके मन्दा पड़ जाने का तुम्हें भय है और घर जिन्हें तुम पसन्द करते हो, तुम्हे अल्लाह और उसके रसूल और उसके मार्ग में जिहाद करने से अधिक प्रिय है तो प्रतीक्षा करो, यहाँ तक कि अल्लाह अपना फ़ैसला ले आए। औऱ अल्लाह अवज्ञाकारियों को मार्ग नहीं दिखाता।"
لَقَدْ نَصَرَكُمُ اللّٰهُ ف۪ي مَوَاطِنَ كَث۪يرَةٍۙ وَيَوْمَ حُنَيْنٍۙ اِذْ اَعْجَبَتْكُمْ كَثْرَتُكُمْ فَلَمْ تُغْنِ عَنْكُمْ شَيْـًٔا وَضَاقَتْ عَلَيْكُمُ الْاَرْضُ بِمَا رَحُبَتْ ثُمَّ وَلَّيْتُمْ مُدْبِر۪ينَۚ25
अल्लाह बहुत-से अवसरों पर तुम्हारी सहायता कर चुका है और हुनैन (की लड़ाई) के दिन भी, जब तुम अपनी अधिकता पर फूल गए, तो वह तुम्हारे कुछ काम न आई और धरती अपनी विशालता के बावजूद तुम पर तंग हो गई। फिर तुम पीठ फेरकर भाग खड़े हुए
ثُمَّ اَنْزَلَ اللّٰهُ سَك۪ينَتَهُ عَلٰى رَسُولِه۪ وَعَلَى الْمُؤْمِن۪ينَ وَاَنْزَلَ جُنُودًا لَمْ تَرَوْهَا وَعَذَّبَ الَّذ۪ينَ كَفَرُواۜ وَذٰلِكَ جَزَٓاءُ الْكَافِر۪ينَ26
अन्ततः अल्लाह ने अपने रसूल पर और मोमिनों पर अपनी सकीनत (प्रशान्ति) उतारी और ऐसी सेनाएँ उतारी जिनको तुमने नहीं देखा। और इनकार करनेवालों को यातना दी, और यही इनकार करनेवालों का बदला है
ثُمَّ يَتُوبُ اللّٰهُ مِنْ بَعْدِ ذٰلِكَ عَلٰى مَنْ يَشَٓاءُۜ وَاللّٰهُ غَفُورٌ رَح۪يمٌ27
फिर इसके बाद अल्लाह जिसको चाहता है उसे तौबा नसीब करता है। अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اِنَّمَا الْمُشْرِكُونَ نَجَسٌ فَلَا يَقْرَبُوا الْمَسْجِدَ الْحَرَامَ بَعْدَ عَامِهِمْ هٰذَاۚ وَاِنْ خِفْتُمْ عَيْلَةً فَسَوْفَ يُغْن۪يكُمُ اللّٰهُ مِنْ فَضْلِه۪ٓ اِنْ شَٓاءَۜ اِنَّ اللّٰهَ عَل۪يمٌ حَك۪يمٌ28
ऐ ईमान लानेवालो! मुशरिक तो बस अपवित्र ही है। अतः इस वर्ष के पश्चात वे मस्जिदे हराम के पास न आएँ। और यदि तुम्हें निर्धनता का भय हो तो आगे यदि अल्लाह चाहेगा तो तुम्हें अपने अनुग्रह से समृद्ध कर देगा। निश्चय ही अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, अत्यन्त तत्वदर्शी है
قَاتِلُوا الَّذ۪ينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِاللّٰهِ وَلَا بِالْيَوْمِ الْاٰخِرِ وَلَا يُحَرِّمُونَ مَا حَرَّمَ اللّٰهُ وَرَسُولُهُ وَلَا يَد۪ينُونَ د۪ينَ الْحَقِّ مِنَ الَّذ۪ينَ اُو۫تُوا الْكِتَابَ حَتّٰى يُعْطُوا الْجِزْيَةَ عَنْ يَدٍ وَهُمْ صَاغِرُونَ۟29
वे किताबवाले जो न अल्लाह पर ईमान रखते है और न अन्तिम दिन पर और न अल्लाह और उसके रसूल के हराम ठहराए हुए को हराम ठहराते है और न सत्यधर्म का अनुपालन करते है, उनसे लड़ो, यहाँ तक कि वे सत्ता से विलग होकर और छोटे (अधीनस्थ) बनकर जिज़्या देने लगे
وَقَالَتِ الْيَهُودُ عُزَيْرٌۨ ابْنُ اللّٰهِ وَقَالَتِ النَّصَارَى الْمَس۪يحُ ابْنُ اللّٰهِۜ ذٰلِكَ قَوْلُهُمْ بِاَفْوَاهِهِمْۚ يُضَاهِؤُ۫نَ قَوْلَ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا مِنْ قَبْلُۜ قَاتَلَهُمُ اللّٰهُۘ اَنّٰى يُؤْفَكُونَ30
यहूदी करते है, "उज़ैर अल्लाह का बेटा है।" और ईसाई कहते है, "मसीह अल्लाह का बेटा है।" ये उनकी अपने मुँह की बातें हैं। ये उन लोगों की-सी बातें कर रहे है जो इससे पहले इनकार कर चुके है। अल्लाह की मार इन पर! ये कहाँ से औधे हुए जा रहे हैं!
اِتَّخَذُٓوا اَحْبَارَهُمْ وَرُهْبَانَهُمْ اَرْبَابًا مِنْ دُونِ اللّٰهِ وَالْمَس۪يحَ ابْنَ مَرْيَمَۚ وَمَٓا اُمِرُٓوا اِلَّا لِيَعْبُدُٓوا اِلٰهًا وَاحِدًاۚ لَٓا اِلٰهَ اِلَّا هُوَۜ سُبْحَانَهُ عَمَّا يُشْرِكُونَ31
उन्होंने अल्लाह से हटकर अपने धर्मज्ञाताओं और संसार-त्यागी संतों और मरयम के बेटे ईसा को अपने रब बना लिए है - हालाँकि उन्हें इसके सिवा और कोई आदेश नहीं दिया गया था कि अकेले इष्टि-पूज्य की वे बन्दगी करें, जिसक सिवा कोई और पूज्य नहीं। उसकी महिमा के प्रतिकूल है वह शिर्क जो ये लोग करते है। -
يُر۪يدُونَ اَنْ يُطْفِؤُ۫ا نُورَ اللّٰهِ بِاَفْوَاهِهِمْ وَيَاْبَى اللّٰهُ اِلَّٓا اَنْ يُتِمَّ نُورَهُ وَلَوْ كَرِهَ الْكَافِرُونَ32
चाहते है कि अल्लाह के प्रकाश को अपने मुँह से बुझा दें, किन्तु अल्लाह अपने प्रकाश को पूर्ण किए बिना नहीं रहेगा, चाहे इनकार करनेवालों को अप्रिय ही लगे
هُوَ الَّذ۪ٓي اَرْسَلَ رَسُولَهُ بِالْهُدٰى وَد۪ينِ الْحَقِّ لِيُظْهِرَهُ عَلَى الدّ۪ينِ كُلِّه۪ۙ وَلَوْ كَرِهَ الْمُشْرِكُونَ33
वही है जिसने अपने रसूल को मार्गदर्शन और सत्यधर्म के साथ भेजा ताकि उसे तमाम दीन (धर्म) पर प्रभावी कर दे, चाहे मुशरिकों को बुरा लगे
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اِنَّ كَث۪يرًا مِنَ الْاَحْبَارِ وَالرُّهْبَانِ لَيَاْكُلُونَ اَمْوَالَ النَّاسِ بِالْبَاطِلِ وَيَصُدُّونَ عَنْ سَب۪يلِ اللّٰهِۜ وَالَّذ۪ينَ يَكْنِزُونَ الذَّهَبَ وَالْفِضَّةَ وَلَا يُنْفِقُونَهَا ف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِۙ فَبَشِّرْهُمْ بِعَذَابٍ اَل۪يمٍۙ34
ऐ ईमान लानेवालो! अवश्य ही बहुत-से धर्मज्ञाता और संसार-त्यागी संत ऐसे है जो लोगो को माल नाहक़ खाते है और अल्लाह के मार्ग से रोकते है, और जो लोग सोना और चाँदी एकत्र करके रखते है और उन्हें अल्लाह के मार्ग में ख़र्च नहीं करते, उन्हें दुखद यातना की शुभ-सूचना दे दो
يَوْمَ يُحْمٰى عَلَيْهَا ف۪ي نَارِ جَهَنَّمَ فَتُكْوٰى بِهَا جِبَاهُهُمْ وَجُنُوبُهُمْ وَظُهُورُهُمْۜ هٰذَا مَا كَنَزْتُمْ لِاَنْفُسِكُمْ فَذُوقُوا مَا كُنْتُمْ تَكْنِزُونَ35
जिस दिन उनको जहन्नम की आग में तपाया जाएगा फिर उससे उनके ललाटो और उनके पहलुओ और उनकी पीठों को दाग़ा जाएगा (और कहा जाएगा), "यहीं है जो तुमने अपने लिए संचय किया, तो जो कुछ तुम संचित करते रहे हो, उसका मज़ा चखो!"
اِنَّ عِدَّةَ الشُّهُورِ عِنْدَ اللّٰهِ اثْنَا عَشَرَ شَهْرًا ف۪ي كِتَابِ اللّٰهِ يَوْمَ خَلَقَ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضَ مِنْهَٓا اَرْبَعَةٌ حُرُمٌۜ ذٰلِكَ الدّ۪ينُ الْقَيِّمُ فَلَا تَظْلِمُوا ف۪يهِنَّ اَنْفُسَكُمْ وَقَاتِلُوا الْمُشْرِك۪ينَ كَٓافَّةً كَمَا يُقَاتِلُونَكُمْ كَٓافَّةًۜ وَاعْلَمُٓوا اَنَّ اللّٰهَ مَعَ الْمُتَّق۪ينَ36
निस्संदेह महीनों की संख्या - अल्लाह के अध्यादेश में उस दिन से जब उसने आकाशों और धरती को पैदा किया - अल्लाह की दृष्टि में बारह महीने है। उनमें चार आदर के है, यही सीधा दीन (धर्म) है। अतः तुम उन (महीनों) में अपने ऊपर अत्याचार न करो। और मुशरिकों से तुम सबके सब लड़ो, जिस प्रकार वे सब मिलकर तुमसे लड़ते है। और जान लो कि अल्लाह डर रखनेवालों के साथ है
اِنَّمَا النَّس۪ٓيءُ زِيَادَةٌ فِي الْكُفْرِ يُضَلُّ بِهِ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا يُحِلُّونَهُ عَامًا وَيُحَرِّمُونَهُ عَامًا لِيُوَاطِؤُ۫ا عِدَّةَ مَا حَرَّمَ اللّٰهُ فَيُحِلُّوا مَا حَرَّمَ اللّٰهُۜ زُيِّنَ لَهُمْ سُٓوءُ اَعْمَالِهِمْۜ وَاللّٰهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْكَافِر۪ينَ۟37
(आदर के महीनों का) हटाना तो बस कुफ़्र में एक बृद्धि है, जिससे इनकार करनेवाले गुमराही में पड़ते है। किसी वर्ष वे उसे हलाल (वैध) ठहरा लेते है और किसी वर्ष उसको हराम ठहरा लेते है, ताकि अल्लाह के आदृत (महीनों) की संख्या पूरी कर लें, और इस प्रकार अल्लाह के हराम किए हुए को वैध ठहरा ले। उनके अपने बुरे कर्म उनके लिए सुहाने हो गए है और अल्लाह इनकार करनेवाले लोगों को सीधा मार्ग नहीं दिखाता
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا مَا لَكُمْ اِذَا ق۪يلَ لَكُمُ انْفِرُوا ف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِ اثَّاقَلْتُمْ اِلَى الْاَرْضِۜ اَرَض۪يتُمْ بِالْحَيٰوةِ الدُّنْيَا مِنَ الْاٰخِرَةِۚ فَمَا مَتَاعُ الْحَيٰوةِ الدُّنْيَا فِي الْاٰخِرَةِ اِلَّا قَل۪يلٌ38
ऐ ईमान लानेवालो! तुम्हें क्या हो गया है कि जब तुमसे कहा जाता है, "अल्लाह के मार्ग में निकलो" तो तुम धरती पर ढहे जाते हो? क्या तुम आख़िरत की अपेक्षा सांसारिक जीवन पर राज़ी हो गए? सांसारिक जीवन की सुख-सामग्री तो आख़िरत के हिसाब में है कुछ थोड़ी ही!
اِلَّا تَنْفِرُوا يُعَذِّبْكُمْ عَذَابًا اَل۪يمًا وَيَسْتَبْدِلْ قَوْمًا غَيْرَكُمْ وَلَا تَضُرُّوهُ شَيْـًٔاۜ وَاللّٰهُ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَد۪يرٌ39
यदि तुम निकालोगे तो वह तुम्हें दुखद यातना देगा और वह तुम्हारी जगह दूसरे गिरोह को ले आएगा और तुम उसका कुछ न बिगाड़ सकोगे। और अल्लाह हर चीज़ की सामर्थ्य रखता है
اِلَّا تَنْصُرُوهُ فَقَدْ نَصَرَهُ اللّٰهُ اِذْ اَخْرَجَهُ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا ثَانِيَ اثْنَيْنِ اِذْ هُمَا فِي الْغَارِ اِذْ يَقُولُ لِصَاحِبِه۪ لَا تَحْزَنْ اِنَّ اللّٰهَ مَعَنَاۚ فَاَنْزَلَ اللّٰهُ سَك۪ينَتَهُ عَلَيْهِ وَاَيَّدَهُ بِجُنُودٍ لَمْ تَرَوْهَا وَجَعَلَ كَلِمَةَ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا السُّفْلٰىۜ وَكَلِمَةُ اللّٰهِ هِيَ الْعُلْيَاۜ وَاللّٰهُ عَز۪يزٌ حَك۪يمٌ40
यदि तुम उसकी सहायता न भी करो तो अल्लाह उसकी सहायता उस समय कर चुका है जब इनकार करनेवालों ने उसे इस स्थिति में निकाला कि वह केवल दो में का दूसरा था, जब वे दोनों गुफ़ा में थे। जबकि वह अपने साथी से कह रहा था, "शोकाकुल न हो। अवश्यमेव अल्लाह हमारे साथ है।" फिर अल्लाह ने उसपर अपनी ओर से सकीनत (प्रशान्ति) उतारी और उसकी सहायता ऐसी सेनाओं से की जिन्हें तुम देख न सके और इनकार करनेवालों का बोल नीचा कर दिया, बोल तो अल्लाह ही का ऊँचा रहता है। अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशील, तत्वदर्शी है
اِنْفِرُوا خِفَافًا وَثِقَالًا وَجَاهِدُوا بِاَمْوَالِكُمْ وَاَنْفُسِكُمْ ف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِۜ ذٰلِكُمْ خَيْرٌ لَكُمْ اِنْ كُنْتُمْ تَعْلَمُونَ41
हलके और बोझिल निकल पड़ो और अल्लाह के मार्ग में अपने मालों और अपनी जानों के साथ जिहाद करो! यही तुम्हारे लिए उत्तम है, यदि तुम जानो
لَوْ كَانَ عَرَضًا قَر۪يبًا وَسَفَرًا قَاصِدًا لَاتَّبَعُوكَ وَلٰكِنْ بَعُدَتْ عَلَيْهِمُ الشُّقَّةُۜ وَسَيَحْلِفُونَ بِاللّٰهِ لَوِ اسْتَطَعْنَا لَخَرَجْنَا مَعَكُمْۚ يُهْلِكُونَ اَنْفُسَهُمْۚ وَاللّٰهُ يَعْلَمُ اِنَّهُمْ لَكَاذِبُونَ۟42
यदि निकट (भविष्य में) ही कुछ मिलनेवाला होता और सफ़र भी हलका होता तो वे अवश्य तुम्हारे पीछे चल पड़ते, किन्तु मार्ग की दूरी उन्हें कठिन और बहुत दीर्घ प्रतीत हुई। अब वे अल्लाह की क़समें खाएँगे कि, "यदि हममें इसकी सामर्थ्य होती तो हम अवश्य तुम्हारे साथ निकलते।" वे अपने आपको तबाही में डाल रहे है और अल्लाह भली-भाँति जानता है कि निश्चय ही वे झूठे है
عَفَا اللّٰهُ عَنْكَۚ لِمَ اَذِنْتَ لَهُمْ حَتّٰى يَتَبَيَّنَ لَكَ الَّذ۪ينَ صَدَقُوا وَتَعْلَمَ الْكَاذِب۪ينَ43
अल्लाह ने तुम्हे क्षमा कर दिया! तुमने उन्हें क्यों अनुमति दे दी, यहाँ तक कि जो लोग सच्चे है वे तुम्हारे सामने प्रकट हो जाते और झूठों को भी तुम जान लेते?
لَا يَسْتَاْذِنُكَ الَّذ۪ينَ يُؤْمِنُونَ بِاللّٰهِ وَالْيَوْمِ الْاٰخِرِ اَنْ يُجَاهِدُوا بِاَمْوَالِهِمْ وَاَنْفُسِهِمْۜ وَاللّٰهُ عَل۪يمٌ بِالْمُتَّق۪ينَ44
जो लोग अल्लाह और अंतिम दिन पर ईमान रखते है, वे तुमसे कभी यह नहीं चाहेंगे कि उन्हें अपने मालों और अपनी जानों के साथ जिहाद करने से माफ़ रखा जाए। और अल्लाह डर रखनेवालों को भली-भाँति जानता है
اِنَّمَا يَسْتَاْذِنُكَ الَّذ۪ينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِاللّٰهِ وَالْيَوْمِ الْاٰخِرِ وَارْتَابَتْ قُلُوبُهُمْ فَهُمْ ف۪ي رَيْبِهِمْ يَتَرَدَّدُونَ45
तुमसे छुट्टी तो बस वही लोग माँगते है जो अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान नहीं रखते, और जिनके दिल सन्देह में पड़े है, तो वे अपने सन्देह ही में डाँवाडोल हो रहे है
وَلَوْ اَرَادُوا الْخُرُوجَ لَاَعَدُّوا لَهُ عُدَّةً وَلٰكِنْ كَرِهَ اللّٰهُ انْبِعَاثَهُمْ فَثَبَّطَهُمْ وَق۪يلَ اقْعُدُوا مَعَ الْقَاعِد۪ينَ46
यदि वे निकलने का इरादा करते तो इसके लिए कुछ सामग्री जुटाते, किन्तु अल्लाह ने उनके उठने को नापसन्द किया तो उसने उन्हें रोक दिया। उनके कह दिया गया, "बैठनेवालों के साथ बैठ रहो।"
لَوْ خَرَجُوا ف۪يكُمْ مَا زَادُوكُمْ اِلَّا خَبَالًا وَلَا۬اَوْضَعُوا خِلَالَكُمْ يَبْغُونَكُمُ الْفِتْنَةَۚ وَف۪يكُمْ سَمَّاعُونَ لَهُمْۜ وَاللّٰهُ عَل۪يمٌ بِالظَّالِم۪ينَ47
यदि वे तुम्हारे साथ निकलते भी तो तुम्हारे अन्दर ख़राबी के सिवा किसी और चीज़ की अभिवृद्धि नहीं करते। और वे तुम्हारे बीच उपद्रव मचाने के लिए दौड़-धूप करते और तुममें उनकी सुननेवाले है। और अल्लाह अत्याचारियों को भली-भाँति जानता है
لَقَدِ ابْتَغَوُا الْفِتْنَةَ مِنْ قَبْلُ وَقَلَّبُوا لَكَ الْاُمُورَ حَتّٰى جَٓاءَ الْحَقُّ وَظَهَرَ اَمْرُ اللّٰهِ وَهُمْ كَارِهُونَ48
उन्होंने तो इससे पहले भी उपद्रव मचाना चाहा था और वे तुम्हारे विरुद्ध घटनाओं और मामलों के उलटने-पलटने में लगे रहे, यहाँ तक कि हक़ आ गया और अल्लाह को आदेश प्रकट होकर रहा, यद्यपि उन्हें अप्रिय ही लगता रहा
وَمِنْهُمْ مَنْ يَقُولُ ائْذَنْ ل۪ي وَلَا تَفْتِنّ۪يۜ اَلَا فِي الْفِتْنَةِ سَقَطُواۜ وَاِنَّ جَهَنَّمَ لَمُح۪يطَةٌ بِالْكَافِر۪ينَ49
उनमें कोई है, जो कहता है, "मुझे इजाज़त दे दीजिए, मुझे फ़ितने में न डालिए।" जान लो कि वे फ़ितने में तो पड़ ही चुके है और निश्चय ही जहन्नम भी इनकार करनेवालों को घेर रही है
اِنْ تُصِبْكَ حَسَنَةٌ تَسُؤْهُمْۚ وَاِنْ تُصِبْكَ مُص۪يبَةٌ يَقُولُوا قَدْ اَخَذْنَٓا اَمْرَنَا مِنْ قَبْلُ وَيَتَوَلَّوْا وَهُمْ فَرِحُونَ50
यदि तुम्हें कोई अच्छी हालत पेश आती है, तो उन्हें बुरा लगता है औऱ यदि तुम पर कोई मुसीबत आ जाती है, तो वे कहते है, "हमने तो अपना काम पहले ही सँभाल लिया था।" और वे ख़ुश होते हुए पलटते है
قُلْ لَنْ يُص۪يبَنَٓا اِلَّا مَا كَتَبَ اللّٰهُ لَنَاۚ هُوَ مَوْلٰينَاۚ وَعَلَى اللّٰهِ فَلْيَتَوَكَّلِ الْمُؤْمِنُونَ51
कह दो, "हमें कुछ भी पेश नहीं आ सकता सिवाय उसके जो अल्लाह ने लिख दिया है। वही हमारा स्वामी है। और ईमानवालों को अल्लाह ही पर भरोसा करना चाहिए।"
قُلْ هَلْ تَرَبَّصُونَ بِنَٓا اِلَّٓا اِحْدَى الْحُسْنَيَيْنِۜ وَنَحْنُ نَتَرَبَّصُ بِكُمْ اَنْ يُص۪يبَكُمُ اللّٰهُ بِعَذَابٍ مِنْ عِنْدِه۪ٓ اَوْ بِاَيْد۪ينَاۘ فَتَرَبَّصُٓوا اِنَّا مَعَكُمْ مُتَرَبِّصُونَ52
कहो, "तुम हमारे लिए दो भलाईयों में से किसी एक भलाई के सिवा किसकी प्रतीक्षा कर सकते है? जबकि हमें तुम्हारे हक़ में इसी की प्रतिक्षा है कि अल्लाह अपनी ओर से तुम्हें कोई यातना देता है या हमारे हाथों दिलाता है। अच्छा तो तुम भी प्रतीक्षा करो, हम भी तुम्हारे साथ प्रतीक्षा कर रहे है।"
قُلْ اَنْفِقُوا طَوْعًا اَوْ كَرْهًا لَنْ يُتَقَبَّلَ مِنْكُمْۜ اِنَّكُمْ كُنْتُمْ قَوْمًا فَاسِق۪ينَ53
कह दो, "तुम चाहे स्वेच्छापूर्वक ख़र्च करो या अनिच्छापूर्वक, तुमसे कुछ भी स्वीकार न किया जाएगा। निस्संदेह तुम अवज्ञाकारी लोग हो।"
وَمَا مَنَعَهُمْ اَنْ تُقْبَلَ مِنْهُمْ نَفَقَاتُهُمْ اِلَّٓا اَنَّهُمْ كَفَرُوا بِاللّٰهِ وَبِرَسُولِه۪ وَلَا يَاْتُونَ الصَّلٰوةَ اِلَّا وَهُمْ كُسَالٰى وَلَا يُنْفِقُونَ اِلَّا وَهُمْ كَارِهُونَ54
उनके ख़र्च के स्वीकृत होने में इसके अतिरिक्त और कोई चीज़ बाधक नहीं कि उन्होंने अल्लाह औऱ उसके रसूल के साथ कुफ़्र किया। नमाज़ को आते है तो बस हारे जी आते है और ख़र्च करते है, तो अनिच्छापूर्वक ही
فَلَا تُعْجِبْكَ اَمْوَالُهُمْ وَلَٓا اَوْلَادُهُمْۜ اِنَّمَا يُر۪يدُ اللّٰهُ لِيُعَذِّبَهُمْ بِهَا فِي الْحَيٰوةِ الدُّنْيَا وَتَزْهَقَ اَنْفُسُهُمْ وَهُمْ كَافِرُونَ55
अतः उनके माल तुम्हें मोहित न करें और न उनकी सन्तान ही। अल्लाह तो बस यह चाहता है कि उनके द्वारा उन्हें सांसारिक जीवन में यातना दे और उनके प्राण इस दशा में निकलें कि वे इनकार करनेवाले ही रहे
وَيَحْلِفُونَ بِاللّٰهِ اِنَّهُمْ لَمِنْكُمْۜ وَمَا هُمْ مِنْكُمْ وَلٰكِنَّهُمْ قَوْمٌ يَفْرَقُونَ56
वे अल्लाह की क़समें खाते है कि वे तुम्हीं में से है, हालाँकि वे तुममें से नहीं है, बल्कि वे ऐसे लोग है जो त्रस्त रहते है
لَوْ يَجِدُونَ مَلْجَـًٔا اَوْ مَغَارَاتٍ اَوْ مُدَّخَلًا لَوَلَّوْا اِلَيْهِ وَهُمْ يَجْمَحُونَ57
यदि वे कोई शरण पा लें या कोई गुफा या घुस बैठने की जगह, तो अवश्य ही वे बगटुट उसकी ओर उल्टे भाग जाएँ
وَمِنْهُمْ مَنْ يَلْمِزُكَ فِي الصَّدَقَاتِۚ فَاِنْ اُعْطُوا مِنْهَا رَضُوا وَاِنْ لَمْ يُعْطَوْا مِنْهَٓا اِذَا هُمْ يَسْخَطُونَ58
और उनमें से कुछ लोग सदक़ो के विषय में तुम पर चोटे करते है। किन्तु यदि उन्हें उसमें से दे दिया जाए तो प्रसन्न हो जाएँ और यदि उन्हें उसमें से न दिया गया तो क्या देखोगे कि वे क्रोधित होने लगते है
وَلَوْ اَنَّهُمْ رَضُوا مَٓا اٰتٰيهُمُ اللّٰهُ وَرَسُولُهُ وَقَالُوا حَسْبُنَا اللّٰهُ سَيُؤْت۪ينَا اللّٰهُ مِنْ فَضْلِه۪ وَرَسُولُهُٓۙ اِنَّٓا اِلَى اللّٰهِ رَاغِبُونَ۟59
यदि अल्लाह और उसके रसूल ने जो कुछ उन्हें दिया था, उसपर वे राज़ी रहते औऱ कहते कि "हमारे लिए अल्लाह काफ़ी है। अल्लाह हमें जल्द ही अपने अनुग्रह से देगा और उसका रसूल भी। हम तो अल्लाह ही की ओऱ उन्मुख है।" (तो यह उनके लिए अच्छा होता)
اِنَّمَا الصَّدَقَاتُ لِلْفُقَرَٓاءِ وَالْمَسَاك۪ينِ وَالْعَامِل۪ينَ عَلَيْهَا وَالْمُؤَلَّفَةِ قُلُوبُهُمْ وَفِي الرِّقَابِ وَالْغَارِم۪ينَ وَف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِ وَابْنِ السَّب۪يلِۜ فَر۪يضَةً مِنَ اللّٰهِۜ وَاللّٰهُ عَل۪يمٌ حَك۪يمٌ60
सदक़े तो बस ग़रीबों, मुहताजों और उन लोगों के लिए है, जो काम पर नियुक्त हों और उनके लिए जिनके दिलों को आकृष्ट करना औऱ परचाना अभीष्ट हो और गर्दनों को छुड़ाने और क़र्ज़दारों और तावान भरनेवालों की सहायता करने में, अल्लाह के मार्ग में, मुसाफ़िरों की सहायता करने में लगाने के लिए है। यह अल्लाह की ओर से ठहराया हुआ हुक्म है। अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, अत्यन्त तत्वदर्शी है
وَمِنْهُمُ الَّذ۪ينَ يُؤْذُونَ النَّبِيَّ وَيَقُولُونَ هُوَ اُذُنٌۜ قُلْ اُذُنُ خَيْرٍ لَكُمْ يُؤْمِنُ بِاللّٰهِ وَيُؤْمِنُ لِلْمُؤْمِن۪ينَ وَرَحْمَةٌ لِلَّذ۪ينَ اٰمَنُوا مِنْكُمْۜ وَالَّذ۪ينَ يُؤْذُونَ رَسُولَ اللّٰهِ لَهُمْ عَذَابٌ اَل۪يمٌ61
और उनमें कुछ लोग ऐसे हैं, जो नबी को दुख देते है और कहते है, "वह तो निरा कान है!" कह दो, "वह सर्वथा कान तुम्हारी भलाई के लिए है। वह अल्लाह पर ईमान रखता है और ईमानवालों पर भी विश्वास करता है। और उन लोगों के लिए सर्वथा दयालुता है जो तुममें से ईमान लाए है। रहे वे लोग जो अल्लाह के रसूल को दुख देते है, उनके लिए दुखद यातना है।"
يَحْلِفُونَ بِاللّٰهِ لَكُمْ لِيُرْضُوكُمْۚ وَاللّٰهُ وَرَسُولُهُٓ اَحَقُّ اَنْ يُرْضُوهُ اِنْ كَانُوا مُؤْمِن۪ينَ62
वे तुम लोगों के सामने अल्लाह की क़समें खाते है, ताकि तुम्हें राज़ी कर लें, हालाँकि यदि वे मोमिन है तो अल्लाह और उसका रसूल इसके ज़्यादा हक़दार है कि उनको राज़ी करें
اَلَمْ يَعْلَمُٓوا اَنَّهُ مَنْ يُحَادِدِ اللّٰهَ وَرَسُولَهُ فَاَنَّ لَهُ نَارَ جَهَنَّمَ خَالِدًا ف۪يهَاۜ ذٰلِكَ الْخِزْيُ الْعَظ۪يمُ63
क्या उन्हें मालूम नहीं कि जो अल्लाह औऱ उसके रसूल का विरोध करता है, उसके लिए जहन्नम की आग है जिसमें वह सदैव रहेगा। यह बहुत बड़ी रुसवाई है
يَحْذَرُ الْمُنَافِقُونَ اَنْ تُنَزَّلَ عَلَيْهِمْ سُورَةٌ تُنَبِّئُهُمْ بِمَا ف۪ي قُلُوبِهِمْۜ قُلِ اسْتَهْزِؤُ۫اۚ اِنَّ اللّٰهَ مُخْرِجٌ مَا تَحْذَرُونَ64
मुनाफ़िक़ (कपटाचारी) डर रहे है कि कहीं उनके बारे में कोई ऐसी सूरा न अवतरित हो जाए जो वह सब कुछ उनपर खोल दे, जो उनके दिलों में है। कह दो, "मज़ाक़ उड़ा लो, अल्लाह तो उसे प्रकट करके रहेगा, जिसका तुम्हें डर है।"
وَلَئِنْ سَاَلْتَهُمْ لَيَقُولُنَّ اِنَّمَا كُنَّا نَخُوضُ وَنَلْعَبُۜ قُلْ اَبِاللّٰهِ وَاٰيَاتِه۪ وَرَسُولِه۪ كُنْتُمْ تَسْتَهْزِؤُ۫نَ65
और यदि उनसे पूछो तो कह देंगे, "हम तो केवल बातें और हँसी-खेल कर रहे थे।" कहो, "क्या अल्लाह, उसकी आयतों और उसके रसूल के साथ हँसी-मज़ाक़ करते थे?
لَا تَعْتَذِرُوا قَدْ كَفَرْتُمْ بَعْدَ ا۪يمَانِكُمْۜ اِنْ نَعْفُ عَنْ طَٓائِفَةٍ مِنْكُمْ نُعَذِّبْ طَٓائِفَةً بِاَنَّهُمْ كَانُوا مُجْرِم۪ينَ۟66
"बहाने न बनाओ, तुमने अपने ईमान के पश्चात इनकार किया। यदि हम तुम्हारे कुछ लोगों को क्षमा भी कर दें तो भी कुछ लोगों को यातना देकर ही रहेंगे, क्योंकि वे अपराधी हैं।"
اَلْمُنَافِقُونَ وَالْمُنَافِقَاتُ بَعْضُهُمْ مِنْ بَعْضٍۢ يَاْمُرُونَ بِالْمُنْكَرِ وَيَنْهَوْنَ عَنِ الْمَعْرُوفِ وَيَقْبِضُونَ اَيْدِيَهُمْۜ نَسُوا اللّٰهَ فَنَسِيَهُمْۜ اِنَّ الْمُنَافِق۪ينَ هُمُ الْفَاسِقُونَ67
मुनाफ़िक़ पुरुष और मुनाफ़िक़ स्त्रियाँ सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। वे बुराई का हुक्म देते है और भलाई से रोकते है और हाथों को बन्द किए रहते है। वे अल्लाह को भूल बैठे तो उसने भी उन्हें भुला दिया। निश्चय ही मुनाफ़िक़ अवज्ञाकारी हैं
وَعَدَ اللّٰهُ الْمُنَافِق۪ينَ وَالْمُنَافِقَاتِ وَالْكُفَّارَ نَارَ جَهَنَّمَ خَالِد۪ينَ ف۪يهَاۜ هِيَ حَسْبُهُمْۚ وَلَعَنَهُمُ اللّٰهُۚ وَلَهُمْ عَذَابٌ مُق۪يمٌۙ68
अल्लाह ने मुनाफ़िक़ पुरुषों और मुनाफ़िक़ स्त्रियों और इनकार करनेवालों से जहन्नम की आग का वादा किया है, जिसमें वे सदैव ही रहेंगे। वही उनके लिए काफ़ी है और अल्लाह ने उनपर लानत की, और उनके लिए स्थाई यातना है
كَالَّذ۪ينَ مِنْ قَبْلِكُمْ كَانُٓوا اَشَدَّ مِنْكُمْ قُوَّةً وَاَكْثَرَ اَمْوَالًا وَاَوْلَادًاۜ فَاسْتَمْتَعُوا بِخَلَاقِهِمْ فَاسْتَمْتَعْتُمْ بِخَلَاقِكُمْ كَمَا اسْتَمْتَعَ الَّذ۪ينَ مِنْ قَبْلِكُمْ بِخَلَاقِهِمْ وَخُضْتُمْ كَالَّذ۪ي خَاضُواۜ اُو۬لٰٓئِكَ حَبِطَتْ اَعْمَالُهُمْ فِي الدُّنْيَا وَالْاٰخِرَةِۚ وَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْخَاسِرُونَ69
उन लोगों की तरह, जो तुमसे पहले गुज़र चुके हैं, वे शक्ति में तुमसे बढ़-बढ़कर थे और माल और औलाद में भी बढ़े हुए थे। फिर उन्होंने अपने हिस्से का मज़ा उठाना चाहा और तुमने भी अपने हिस्से का मज़ा उठाना चाहा, जिस प्रकार कि तुमसे पहले के लोगों ने अपने हिस्से का मज़ा उठाना चाहा, और जिस वाद-विवाद में तुम पड़े थे तुम भी वाद-विवाद में पड़ गए। ये वही लोग है जिनका किया-धरा दुनिया और आख़िरत में अकारथ गया, और वही घाटे में है
اَلَمْ يَاْتِهِمْ نَبَاُ الَّذ۪ينَ مِنْ قَبْلِهِمْ قَوْمِ نُوحٍ وَعَادٍ وَثَمُودَ وَقَوْمِ اِبْرٰه۪يمَ وَاَصْحَابِ مَدْيَنَ وَالْمُؤْتَفِكَاتِۜ اَتَتْهُمْ رُسُلُهُمْ بِالْبَيِّنَاتِۚ فَمَا كَانَ اللّٰهُ لِيَظْلِمَهُمْ وَلٰكِنْ كَانُٓوا اَنْفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ70
क्या उन्हें उन लोगों का वृतान्त नहीं पहुँचा जो उनसे पहले गुज़रे - नूह के लोगो का, आद और समूद का, और इबराहीम की क़ौम का और मदयनवालों का और उन बस्तियों का जिन्हें उलट दिया गया? उसके रसूल उनके पास खुली निशानियाँ लेकर आए थे, फिर अल्लाह ऐसा न था कि वह उनपर अत्याचार करता, किन्तु वे स्वयं अपने-आप पर अत्याचार कर रहे थे
وَالْمُؤْمِنُونَ وَالْمُؤْمِنَاتُ بَعْضُهُمْ اَوْلِيَٓاءُ بَعْضٍۢ يَاْمُرُونَ بِالْمَعْرُوفِ وَيَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنْكَرِ وَيُق۪يمُونَ الصَّلٰوةَ وَيُؤْتُونَ الزَّكٰوةَ وَيُط۪يعُونَ اللّٰهَ وَرَسُولَهُۜ اُو۬لٰٓئِكَ سَيَرْحَمُهُمُ اللّٰهُۜ اِنَّ اللّٰهَ عَز۪يزٌ حَك۪يمٌ71
रहे मोमिन मर्द औऱ मोमिन औरतें, वे सब परस्पर एक-दूसरे के मित्र है। भलाई का हुक्म देते है और बुराई से रोकते है। नमाज़ क़ायम करते हैं, ज़कात देते है और अल्लाह और उसके रसूल का आज्ञापालन करते हैं। ये वे लोग है, जिनकर शीघ्र ही अल्लाह दया करेगा। निस्सन्देह प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
وَعَدَ اللّٰهُ الْمُؤْمِن۪ينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ جَنَّاتٍ تَجْر۪ي مِنْ تَحْتِهَا الْاَنْهَارُ خَالِد۪ينَ ف۪يهَا وَمَسَاكِنَ طَيِّبَةً ف۪ي جَنَّاتِ عَدْنٍۜ وَرِضْوَانٌ مِنَ اللّٰهِ اَكْبَرُۜ ذٰلِكَ هُوَ الْفَوْزُ الْعَظ۪يمُ۟72
मोमिन मर्दों और मोमिन औरतों से अल्लाह ने ऐसे बाग़ों का वादा किया है जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, जिनमें वे सदैव रहेंगे और सदाबहार बाग़ों में पवित्र निवास गृहों का (भी वादा है) और, अल्लाह की प्रसन्नता और रज़ामन्दी का; जो सबसे बढ़कर है। यही सबसे बड़ी सफलता है
يَٓا اَيُّهَا النَّبِيُّ جَاهِدِ الْكُفَّارَ وَالْمُنَافِق۪ينَ وَاغْلُظْ عَلَيْهِمْۜ وَمَاْوٰيهُمْ جَهَنَّمُۜ وَبِئْسَ الْمَص۪يرُ73
ऐ नबी! इनकार करनेवालों और मुनाफ़िक़ों से जिहाद करो और उनके साथ सख़्ती से पेश आओ। अन्ततः उनका ठिकाना जहन्नम है और वह जा पहुँचने की बहुत बुरी जगह है!
يَحْلِفُونَ بِاللّٰهِ مَا قَالُواۜ وَلَقَدْ قَالُوا كَلِمَةَ الْكُفْرِ وَكَفَرُوا بَعْدَ اِسْلَامِهِمْ وَهَمُّوا بِمَا لَمْ يَنَالُواۚ وَمَا نَقَمُٓوا اِلَّٓا اَنْ اَغْنٰيهُمُ اللّٰهُ وَرَسُولُهُ مِنْ فَضْلِه۪ۚ فَاِنْ يَتُوبُوا يَكُ خَيْرًا لَهُمْۚ وَاِنْ يَتَوَلَّوْا يُعَذِّبْهُمُ اللّٰهُ عَذَابًا اَل۪يمًا فِي الدُّنْيَا وَالْاٰخِرَةِۚ وَمَا لَهُمْ فِي الْاَرْضِ مِنْ وَلِيٍّ وَلَا نَص۪يرٍ74
वे अल्लाह की क़समें खाते है कि उन्होंने नहीं कहा, हालाँकि उन्होंने अवश्य ही कुफ़्र की बात कही है और अपने इस्लाम स्वीकार करने के पश्चात इनकार किया, और वह चाहा जो वे न पा सके। उनके प्रतिशोध का कारण तो यह है कि अल्लाह और उसके रसूल ने अपने अनुग्रह से उन्हें समृद्ध कर दिया। अब यदि वे तौबा कर लें तो उन्हीं के लिए अच्छा है और यदि उन्होंने मुँह मोड़ा तो अल्लाह उन्हें दुनिया और आख़िरत में दुखद यातना देगा और धरती में उनका न कोई मित्र होगा और न सहायक
وَمِنْهُمْ مَنْ عَاهَدَ اللّٰهَ لَئِنْ اٰتٰينَا مِنْ فَضْلِه۪ لَنَصَّدَّقَنَّ وَلَنَكُونَنَّ مِنَ الصَّالِح۪ينَ75
और उनमें से कुछ लोग ऐसे भी है जिन्होने अल्लाह को वचन दिया था कि "यदि उसने हमें अपने अनुग्रह से दिया तो हम अवश्य दान करेंगे और नेक होकर रहेंगे।"
فَلَمَّٓا اٰتٰيهُمْ مِنْ فَضْلِه۪ بَخِلُوا بِه۪ وَتَوَلَّوْا وَهُمْ مُعْرِضُونَ76
किन्तु जब अल्लाह ने उन्हें अपने अनुग्रह से दिया तो वे उसमें कंजूसी करने लगे और पहलू बचाकर फिर गए
فَاَعْقَبَهُمْ نِفَاقًا ف۪ي قُلُوبِهِمْ اِلٰى يَوْمِ يَلْقَوْنَهُ بِمَٓا اَخْلَفُوا اللّٰهَ مَا وَعَدُوهُ وَبِمَا كَانُوا يَكْذِبُونَ77
फिर परिणाम यह हुआ कि उसने उनके दिलों में उस दिन तक के लिए कपटाचार डाल दिया, जब वे उससे मिलेंगे, इसलिए कि उन्होंने अल्लाह से जो प्रतिज्ञा की थी उसे भंग कर दिया और इसलिए भी कि वे झूठ बोलते रहे
اَلَمْ يَعْلَمُٓوا اَنَّ اللّٰهَ يَعْلَمُ سِرَّهُمْ وَنَجْوٰيهُمْ وَاَنَّ اللّٰهَ عَلَّامُ الْغُيُوبِۚ78
क्या उन्हें खबर नहीं कि अल्लाह उनका भेद और उनकी कानाफुसियों को अच्छी तरह जानता है और यह कि अल्लाह परोक्ष की सारी बातों को भली-भाँति जानता है
اَلَّذ۪ينَ يَلْمِزُونَ الْمُطَّوِّع۪ينَ مِنَ الْمُؤْمِن۪ينَ فِي الصَّدَقَاتِ وَالَّذ۪ينَ لَا يَجِدُونَ اِلَّا جُهْدَهُمْ فَيَسْخَرُونَ مِنْهُمْۜ سَخِرَ اللّٰهُ مِنْهُمْۘ وَلَهُمْ عَذَابٌ اَل۪يمٌ79
जो लोग स्वेच्छापूर्वक देनेवाले मोमिनों पर उनके सदक़ो (दान) के विषय में चोटें करते है और उन लोगों का उपहास करते है, जिनके पास इसके सिवा कुछ नहीं जो वे मशक़्क़त उठाकर देते है, उन (उपहास करनेवालों) का उपहास अल्लाह ने किया और उनके लिए दुखद यातना है
اِسْتَغْفِرْ لَهُمْ اَوْ لَا تَسْتَغْفِرْ لَهُمْۜ اِنْ تَسْتَغْفِرْ لَهُمْ سَبْع۪ينَ مَرَّةً فَلَنْ يَغْفِرَ اللّٰهُ لَهُمْۜ ذٰلِكَ بِاَنَّهُمْ كَفَرُوا بِاللّٰهِ وَرَسُولِه۪ۜ وَاللّٰهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْفَاسِق۪ينَ۟80
तुम उनके लिए क्षमा की प्रार्थना करो या उनके लिए क्षमा की प्रार्थना न करो। यदि तुम उनके लिए सत्तर बार भी क्षमा की प्रार्थना करोगे, तो भी अल्लाह उन्हें क्षमा नहीं करेगा, यह इसलिए कि उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल के साथ कुफ़्र किया और अल्लाह अवज्ञाकारियों को सीधा मार्ग नहीं दिखाता
فَرِحَ الْمُخَلَّفُونَ بِمَقْعَدِهِمْ خِلَافَ رَسُولِ اللّٰهِ وَكَرِهُٓوا اَنْ يُجَاهِدُوا بِاَمْوَالِهِمْ وَاَنْفُسِهِمْ ف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِ وَقَالُوا لَا تَنْفِرُوا فِي الْحَرِّۜ قُلْ نَارُ جَهَنَّمَ اَشَدُّ حَرًّاۜ لَوْ كَانُوا يَفْقَهُونَ81
पीछे रह जानेवाले अल्लाह के रसूल के पीछे अपने बैठ रहने पर प्रसन्न हुए। उन्हें यह नापसन्द हुआ कि अल्लाह के मार्ग में अपने मालों और अपनी जानों के साथ जिहाद करें। और उन्होंने कहा, "इस गर्मी में न निकलो।" कह दो, "जहन्नम की आग इससे कहीं अधिक गर्म है," यदि वे समझ पाते (तो ऐसा न कहते)
فَلْيَضْحَكُوا قَل۪يلًا وَلْيَبْكُوا كَث۪يرًاۚ جَزَٓاءً بِمَا كَانُوا يَكْسِبُونَ82
अब चाहिए कि जो कुछ वे कमाते रहे है, उसके बदले में हँसे कम और रोएँ अधिक
فَاِنْ رَجَعَكَ اللّٰهُ اِلٰى طَٓائِفَةٍ مِنْهُمْ فَاسْتَاْذَنُوكَ لِلْخُرُوجِ فَقُلْ لَنْ تَخْرُجُوا مَعِيَ اَبَدًا وَلَنْ تُقَاتِلُوا مَعِيَ عَدُوًّاۜ اِنَّكُمْ رَض۪يتُمْ بِالْقُعُودِ اَوَّلَ مَرَّةٍ فَاقْعُدُوا مَعَ الْخَالِف۪ينَ83
अव यदि अल्लाह तुम्हें उनके किसी गिरोह की ओर रुजू कर दे और भविष्य में वे तुमसे साथ निकलने की अनुमति चाहें तो कह देना, "तुम मेरे साथ कभी भी नहीं निकल सकते और न मेरे साथ होकर किसी शत्रु से लड़ सकते हो। तुम पहली बार बैठ रहने पर ही राज़ी हुए, तो अब पीछे रहनेवालों के साथ बैठे रहो।"
وَلَا تُصَلِّ عَلٰٓى اَحَدٍ مِنْهُمْ مَاتَ اَبَدًا وَلَا تَقُمْ عَلٰى قَبْرِه۪ۜ اِنَّهُمْ كَفَرُوا بِاللّٰهِ وَرَسُولِه۪ وَمَاتُوا وَهُمْ فَاسِقُونَ84
औऱ उनमें से जिस किसी व्यक्ति की मृत्यु हो उसकी जनाज़े की नमाज़ कभी न पढ़ना और न कभी उसकी क़ब्र पर खड़े होना। उन्होंने तो अल्लाह और उसके रसूल के साथ कुफ़्र किया और मरे इस दशा में कि अवज्ञाकारी थे
وَلَا تُعْجِبْكَ اَمْوَالُهُمْ وَاَوْلَادُهُمْۜ اِنَّمَا يُر۪يدُ اللّٰهُ اَنْ يُعَذِّبَهُمْ بِهَا فِي الدُّنْيَا وَتَزْهَقَ اَنْفُسُهُمْ وَهُمْ كَافِرُونَ85
और उनके माल और उनकी औलाद तुम्हें मोहित न करें। अल्लाह तो बस यह चाहता है कि उनके द्वारा उन्हें संसार में यातना दे और उनके प्राण इस दशा में निकलें कि वे काफ़िर हों
وَاِذَٓا اُنْزِلَتْ سُورَةٌ اَنْ اٰمِنُوا بِاللّٰهِ وَجَاهِدُوا مَعَ رَسُولِهِ اسْتَاْذَنَكَ اُو۬لُوا الطَّوْلِ مِنْهُمْ وَقَالُوا ذَرْنَا نَكُنْ مَعَ الْقَاعِد۪ينَ86
और जब कोई सूरा उतरती है कि "अल्लाह पर ईमान लाओ और उसके रसूल के साथ होकर जिहाद करो।" तो उनके सामर्थ्यवान लोग तुमसे छुट्टी माँगने लगते है और कहते है कि "हमें छोड़ दो कि हम बैठनेवालों के साथ रह जाएँ।"
رَضُوا بِاَنْ يَكُونُوا مَعَ الْخَوَالِفِ وَطُبِعَ عَلٰى قُلُوبِهِمْ فَهُمْ لَا يَفْقَهُونَ87
वे इसी पर राज़ी हुए कि पीछे रह जानेवाली स्त्रियों के साथ रह जाएँ और उनके दिलों पर तो मुहर लग गई है, अतः वे समझते नहीं
لٰكِنِ الرَّسُولُ وَالَّذ۪ينَ اٰمَنُوا مَعَهُ جَاهَدُوا بِاَمْوَالِهِمْ وَاَنْفُسِهِمْۜ وَاُو۬لٰٓئِكَ لَهُمُ الْخَيْرَاتُۘ وَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ88
किन्तु, रसूल और उसके ईमानवाले साथियों ने अपने मालों और अपनी जानों के साथ जिहाद किया, और वही लोग है जिनके लिए भलाइयाँ है और वही लोग है जो सफल है
اَعَدَّ اللّٰهُ لَهُمْ جَنَّاتٍ تَجْر۪ي مِنْ تَحْتِهَا الْاَنْهَارُ خَالِد۪ينَ ف۪يهَاۜ ذٰلِكَ الْفَوْزُ الْعَظ۪يمُ۟89
अल्लाह ने उनके लिए ऐसे बाग़ तैयार कर रखे हैं, जिनके नीचे नहरें बह रह हैं, वे उनमें सदैव रहेंगे। यही बड़ी सफलता है
وَجَٓاءَ الْمُعَذِّرُونَ مِنَ الْاَعْرَابِ لِيُؤْذَنَ لَهُمْ وَقَعَدَ الَّذ۪ينَ كَذَبُوا اللّٰهَ وَرَسُولَهُۜ سَيُص۪يبُ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا مِنْهُمْ عَذَابٌ اَل۪يمٌ90
बहाने करनेवाले बद्दूल भी आए कि उन्हें (बैठे रहने की) छुट्टी मिल जाए। और जो अल्लाह और उसके रसूल से झूठ बोले वे भी बैठे रहे। उनमें से जिन्होंने इनकार किया उन्हें शीघ्र ही एक दुखद यातना पहुँचकर रहेगी
لَيْسَ عَلَى الضُّعَفَٓاءِ وَلَا عَلَى الْمَرْضٰى وَلَا عَلَى الَّذ۪ينَ لَا يَجِدُونَ مَا يُنْفِقُونَ حَرَجٌ اِذَا نَصَحُوا لِلّٰهِ وَرَسُولِه۪ۜ مَا عَلَى الْمُحْسِن۪ينَ مِنْ سَب۪يلٍۜ وَاللّٰهُ غَفُورٌ رَح۪يمٌۙ91
न तो कमज़ोरों के लिए कोई दोष की बात है और न बीमारों के लिए और न उन लोगों के लिए जिन्हें ख़र्च करने के लिए कुछ प्राप्त नहीं, जबकि वे अल्लाह और उसके रसूल के प्रति निष्ठावान हों। उत्तमकारों पर इलज़ाम की कोई गुंजाइश नहीं है। अल्लाह तो बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
وَلَا عَلَى الَّذ۪ينَ اِذَا مَٓا اَتَوْكَ لِتَحْمِلَهُمْ قُلْتَ لَٓا اَجِدُ مَٓا اَحْمِلُكُمْ عَلَيْهِۖ تَوَلَّوْا وَاَعْيُنُهُمْ تَف۪يضُ مِنَ الدَّمْعِ حَزَنًا اَلَّا يَجِدُوا مَا يُنْفِقُونَۜ92
और न उन लोगों पर आक्षेप करने की कोई गुंजाइश है जिनका हाल यह है कि जब वे तुम्हारे पास आते है, कि तुम उनके लिए सवारी का प्रबन्ध कर दो, तुम कहते हो, "मुझे ऐसा कुछ प्राप्त नहीं जिसपर तुम्हें सवार करूँ।" वे इस दशा में लौटते है कि इस ग़म में उनकी आँखे आँसू बहा रही होती है कि वे अपने पास ख़र्च करने को कुछ नहीं पाते