11. जुज़ - कुरान पढ़ें
9 · अत-तौबा10 · यूनुस11 · हूद
اِنَّمَا السَّب۪يلُ عَلَى الَّذ۪ينَ يَسْتَاْذِنُونَكَ وَهُمْ اَغْنِيَٓاءُۚ رَضُوا بِاَنْ يَكُونُوا مَعَ الْخَوَالِفِۙ وَطَبَعَ اللّٰهُ عَلٰى قُلُوبِهِمْ فَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ93
इल्ज़ाम तो बस उनपर है जो धनवान होते हुए तुमसे छुट्टी माँगते है। वे इसपर राज़ी हुए कि पीछे डाले गए लोगों के साथ रह जाएँ। अल्लाह ने तो उनके दिलों पर मुहर लगा दी है, इसलिए वे जानते नहीं
يَعْتَذِرُونَ اِلَيْكُمْ اِذَا رَجَعْتُمْ اِلَيْهِمْۜ قُلْ لَا تَعْتَذِرُوا لَنْ نُؤْمِنَ لَكُمْ قَدْ نَبَّاَنَا اللّٰهُ مِنْ اَخْبَارِكُمْۜ وَسَيَرَى اللّٰهُ عَمَلَكُمْ وَرَسُولُهُ ثُمَّ تُرَدُّونَ اِلٰى عَالِمِ الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ فَيُنَبِّئُكُمْ بِمَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ94
जब तुम पलटकर उनके पास पहुँचोगे तो वे तुम्हारे सामने बहाने करेंगे। तुम कह देना, "बहाने न बनाओ। हम तु्म्हारी बात कदापि नहीं मानेंगे। हमें अल्लाह ने तुम्हारे वृत्तांत बता दिए है। अभी अल्लाह और उसका रसूल तुम्हारे काम को देखेगा, फिर तुम उसकी ओर लौटोगे, जो छिपे और खुले का ज्ञान रखता है। फिर जो कुछ तुम करते रहे हो वह तुम्हे बता देगा।"
سَيَحْلِفُونَ بِاللّٰهِ لَكُمْ اِذَا انْقَلَبْتُمْ اِلَيْهِمْ لِتُعْرِضُوا عَنْهُمْۜ فَاَعْرِضُوا عَنْهُمْۜ اِنَّهُمْ رِجْسٌۘ وَمَاْوٰيهُمْ جَهَنَّمُۚ جَزَٓاءً بِمَا كَانُوا يَكْسِبُونَ95
जब तुम पलटकर उनके पास जाओगे तो वे तुम्हारे सामने अल्लाह की क़समें खाएँगे, ताकि तुम उन्हें उनकी हालत पर छोड़ दो। तो तुम उन्हें छोड़ ही दो। निश्चय ही वे गन्दगी है और उनका ठिकाना जहन्नम है। जो कुछ वे कमाते रहे है, यह उसी का बदला है
يَحْلِفُونَ لَكُمْ لِتَرْضَوْا عَنْهُمْۚ فَاِنْ تَرْضَوْا عَنْهُمْ فَاِنَّ اللّٰهَ لَا يَرْضٰى عَنِ الْقَوْمِ الْفَاسِق۪ينَ96
वे तुम्हारे सामने क़समें खाएँगे ताकि तुम उनसे राज़ी हो जाओ, किन्तु यदि तुम उनसे राज़ी भी हो गए तो अल्लाह ऐसे लोगो से कदापि राज़ी न होगा, जो अवज्ञाकारी है
اَلْاَعْرَابُ اَشَدُّ كُفْرًا وَنِفَاقًا وَاَجْدَرُ اَلَّا يَعْلَمُوا حُدُودَ مَٓا اَنْزَلَ اللّٰهُ عَلٰى رَسُولِه۪ۜ وَاللّٰهُ عَل۪يمٌ حَك۪يمٌ97
वे बद्दूग इनकार और कपटाचार में बहुत-ही बढ़े हुए है। और इसी के ज़्यादा योग्य है कि उनकी सीमाओं से अनभिज्ञ रहें, जिसे अल्लाह ने अपने रसूल पर अवतरित किया है। अल्लाह सर्वज्ञ, तत्वदर्शी है
وَمِنَ الْاَعْرَابِ مَنْ يَتَّخِذُ مَا يُنْفِقُ مَغْرَمًا وَيَتَرَبَّصُ بِكُمُ الدَّوَٓائِرَۜ عَلَيْهِمْ دَٓائِرَةُ السَّوْءِۜ وَاللّٰهُ سَم۪يعٌ عَل۪يمٌ98
और कुछ बद्दूज ऐसे है कि वे जो कुछ ख़र्च करते है, उसे तावान समझते है और तुम्हारे हक़ मं बुरी गर्दिशों (बुरे दिन) की प्रतीक्षा में हैं, बुरी गर्दिश में तो वही है। अल्लाह सब कुछ सुनता, जानता है
وَمِنَ الْاَعْرَابِ مَنْ يُؤْمِنُ بِاللّٰهِ وَالْيَوْمِ الْاٰخِرِ وَيَتَّخِذُ مَا يُنْفِقُ قُرُبَاتٍ عِنْدَ اللّٰهِ وَصَلَوَاتِ الرَّسُولِۜ اَلَٓا اِنَّهَا قُرْبَةٌ لَهُمْۜ سَيُدْخِلُهُمُ اللّٰهُ ف۪ي رَحْمَتِه۪ۜ اِنَّ اللّٰهَ غَفُورٌ رَح۪يمٌ۟99
और बद्दु,ओं में ऐसे भी लोग है जो अल्लाह और अन्तिम दिन को मानते है और जो कुछ ख़र्च करते है, उसे अल्लाह के यहाँ निकटताओं का और रसूल की दुआओं को प्राप्त करने का साधन बनाते है। हाँ! निस्संदेह वह उनके हक़ में निकटता ही है। अल्लाह उन्हें शीघ्र ही अपनी दयालुता में दाख़िल करेगा। निश्चय ही अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है
وَالسَّابِقُونَ الْاَوَّلُونَ مِنَ الْمُهَاجِر۪ينَ وَالْاَنْصَارِ وَالَّذ۪ينَ اتَّبَعُوهُمْ بِاِحْسَانٍۙ رَضِيَ اللّٰهُ عَنْهُمْ وَرَضُوا عَنْهُ وَاَعَدَّ لَهُمْ جَنَّاتٍ تَجْر۪ي تَحْتَهَا الْاَنْهَارُ خَالِد۪ينَ ف۪يهَٓا اَبَدًاۜ ذٰلِكَ الْفَوْزُ الْعَظ۪يمُ100
सबसे पहले आगे बढ़नेवाले मुहाजिर और अनसार और जिन्होंने भली प्रकार उनका अनुसरण किया, अल्लाह उनसे राज़ी हुआ और वे उससे राज़ी हुए। और उसने उनके लिए ऐसे बाग़ तैयार कर रखे है, जिनके नीचे नहरें बह रही है, वे उनमें सदैव रहेंगे। यही बड़ी सफलता है
وَمِمَّنْ حَوْلَكُمْ مِنَ الْاَعْرَابِ مُنَافِقُونَۜ وَمِنْ اَهْلِ الْمَد۪ينَةِ مَرَدُوا عَلَى النِّفَاقِ لَا تَعْلَمُهُمْۜ نَحْنُ نَعْلَمُهُمْۜ سَنُعَذِّبُهُمْ مَرَّتَيْنِ ثُمَّ يُرَدُّونَ اِلٰى عَذَابٍ عَظ۪يمٍۚ101
और तुम्हारे आस-पास के बद्दुनओं में और मदीनावालों में कुछ ऐसे कपटाचारी है जो कपट-नीति पर जमें हुए है। उनको तुम नहीं जानते, हम उन्हें भली-भाँति जानते है। शीघ्र ही हम उन्हें दो बार यातना देंगे। फिर वे एक बड़ी यातना की ओर लौटाए जाएँगे
وَاٰخَرُونَ اعْتَرَفُوا بِذُنُوبِهِمْ خَلَطُوا عَمَلًا صَالِحًا وَاٰخَرَ سَيِّئًاۜ عَسَى اللّٰهُ اَنْ يَتُوبَ عَلَيْهِمْۜ اِنَّ اللّٰهَ غَفُورٌ رَح۪يمٌ102
और दूसरे कुछ लोग है जिन्होंने अपने गुनाहों का इक़रार किया। उन्होंने मिले-जुले कर्म किए, कुछ अच्छे और कुछ बुरे। आशा है कि अल्लाह की कृपा-स्पष्ट उनपर हो। निस्संदेह अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है
خُذْ مِنْ اَمْوَالِهِمْ صَدَقَةً تُطَهِّرُهُمْ وَتُزَكّ۪يهِمْ بِهَا وَصَلِّ عَلَيْهِمْۜ اِنَّ صَلٰوتَكَ سَكَنٌ لَهُمْۜ وَاللّٰهُ سَم۪يعٌ عَل۪يمٌ103
तुम उनके माल में से दान लेकर उन्हें शुद्ध करो और उनके द्वारा उन (की आत्मा) को विकसित करो और उनके लिए दुआ करो। निस्संदेह तुम्हारी दुआ उनके लिए सर्वथा परितोष है। अल्लाह सब कुछ सुनता, जानता है
اَلَمْ يَعْلَمُٓوا اَنَّ اللّٰهَ هُوَ يَقْبَلُ التَّوْبَةَ عَنْ عِبَادِه۪ وَيَاْخُذُ الصَّدَقَاتِ وَاَنَّ اللّٰهَ هُوَ التَّوَّابُ الرَّح۪يمُ104
क्या वे जानते नहीं कि अल्लाह ही अपने बन्दों की तौबा क़बूल करता है और सदक़े लेता है और यह कि अल्लाह ही तौबा क़बूल करनेवाला, अत्यन्त दयावान है
وَقُلِ اعْمَلُوا فَسَيَرَى اللّٰهُ عَمَلَكُمْ وَرَسُولُهُ وَالْمُؤْمِنُونَۜ وَسَتُرَدُّونَ اِلٰى عَالِمِ الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ فَيُنَبِّئُكُمْ بِمَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَۚ105
कह दो, "कर्म किए जाओ। अभी अल्लाह और उसका रसूल और ईमानवाले तुम्हारे कर्म को देखेंगे। फिर तुम उसकी ओर पलटोगे, जो छिपे और खुले को जानता है। फिर जो कुछ तम करते रहे हो, वह सब तुम्हें बता देगा।"
وَاٰخَرُونَ مُرْجَوْنَ لِاَمْرِ اللّٰهِ اِمَّا يُعَذِّبُهُمْ وَاِمَّا يَتُوبُ عَلَيْهِمْۜ وَاللّٰهُ عَل۪يمٌ حَك۪يمٌ106
और कुछ दूसरे लोग भी है जिनका मामला अल्लाह का हुक्म आने तक स्थगित है, चाहे वह उन्हें यातना दे या उनकी तौबा क़बूल करे। अल्लाह सर्वज्ञ, तत्वदर्शी है
وَالَّذ۪ينَ اتَّخَذُوا مَسْجِدًا ضِرَارًا وَكُفْرًا وَتَفْر۪يقًا بَيْنَ الْمُؤْمِن۪ينَ وَاِرْصَادًا لِمَنْ حَارَبَ اللّٰهَ وَرَسُولَهُ مِنْ قَبْلُۜ وَلَيَحْلِفُنَّ اِنْ اَرَدْنَٓا اِلَّا الْحُسْنٰىۜ وَاللّٰهُ يَشْهَدُ اِنَّهُمْ لَكَاذِبُونَ107
और कुछ ऐसे लोग भी हैं , जिन्होंने मस्जिद बनाई इसलिए कि नुक़सान पहुँचाएँ और कुफ़्र करें और इसलिए कि ईमानवालों के बीच फूट डाले और उस व्यक्ति के घात लगाने का ठिकाना बनाएँ, जो इससे पहले अल्लाह और उसके रसूल से लड़ चुका है। वे निश्चय ही क़समें खाएँगे कि "हमने तो बस अच्छा ही चाहा था।" किन्तु अल्लाह गवाही देता है कि वे बिलकुल झूठे है
لَا تَقُمْ ف۪يهِ اَبَدًاۜ لَمَسْجِدٌ اُسِّسَ عَلَى التَّقْوٰى مِنْ اَوَّلِ يَوْمٍ اَحَقُّ اَنْ تَقُومَ ف۪يهِۜ ف۪يهِ رِجَالٌ يُحِبُّونَ اَنْ يَتَطَهَّرُواۜ وَاللّٰهُ يُحِبُّ الْمُطَّهِّر۪ينَ108
तुम कभी भी उसमें खड़े न होना। वह मस्जिद जिसकी आधारशिला पहले दिन ही से ईशपरायणता पर रखी गई है, वह इसकी ज़्यादा हक़दार है कि तुम उसमें खड़े हो। उसमें ऐसे लोग पाए जाते हैं, जो अच्छी तरह स्वच्छ रहना पसन्द करते है, और अल्लाह भी पाक-साफ़ रहनेवालों को पसन्द करता है
اَفَمَنْ اَسَّسَ بُنْيَانَهُ عَلٰى تَقْوٰى مِنَ اللّٰهِ وَرِضْوَانٍ خَيْرٌ اَمْ مَنْ اَسَّسَ بُنْيَانَهُ عَلٰى شَفَا جُرُفٍ هَارٍ فَانْهَارَ بِه۪ ف۪ي نَارِ جَهَنَّمَۜ وَاللّٰهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الظَّالِم۪ينَ109
फिर क्या वह अच्छा है जिसने अपने भवन की आधारशिला अल्लाह के भय और उसकी ख़ुशी पर रखी है या वह, जिसने अपने भवन की आधारशिला किसी खाई के खोखले कगार पर रखी, जो गिरने को है। फिर वह उसे लेकर जहन्नम की आग में जा गिरा? अल्लाह तो अत्याचारी लोगों को सीधा मार्ग नहीं दिखाता
لَا يَزَالُ بُنْيَانُهُمُ الَّذ۪ي بَنَوْا ر۪يبَةً ف۪ي قُلُوبِهِمْ اِلَّٓا اَنْ تَقَطَّعَ قُلُوبُهُمْۜ وَاللّٰهُ عَل۪يمٌ حَك۪يمٌ۟110
उनका यह भवन जो उन्होंने बनाया है, सदैव उनके दिलों में खटक बनकर रहेगा। हाँ, यदि उनके दिल ही टुकड़े-टुकड़े हो जाएँ तो दूसरी बात है। अल्लाह तो सब कुछ जाननेवाला, अत्यन्त तत्वदर्शी है
اِنَّ اللّٰهَ اشْتَرٰى مِنَ الْمُؤْمِن۪ينَ اَنْفُسَهُمْ وَاَمْوَالَهُمْ بِاَنَّ لَهُمُ الْجَنَّةَۜ يُقَاتِلُونَ ف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِ فَيَقْتُلُونَ وَيُقْتَلُونَ وَعْدًا عَلَيْهِ حَقًّا فِي التَّوْرٰيةِ وَالْاِنْج۪يلِ وَالْقُرْاٰنِۜ وَمَنْ اَوْفٰى بِعَهْدِه۪ مِنَ اللّٰهِ فَاسْتَبْشِرُوا بِبَيْعِكُمُ الَّذ۪ي بَايَعْتُمْ بِه۪ۜ وَذٰلِكَ هُوَ الْفَوْزُ الْعَظ۪يمُ111
निस्संदेह अल्लाह ने ईमानवालों से उनके प्राण और उनके माल इसके बदले में खरीद लिए है कि उनके लिए जन्नत है। वे अल्लाह के मार्ग में लड़ते है, तो वे मारते भी है और मारे भी जाते है। यह उनके ज़िम्मे तौरात, इनजील और क़ुरआन में (किया गया) एक पक्का वादा है। और अल्लाह से बढ़कर अपने वादे को पूरा करनेवाला हो भी कौन सकता है? अतः अपने उस सौदे पर खु़शियाँ मनाओ, जो सौदा तुमने उससे किया है। और यही सबसे बड़ी सफलता है
اَلتَّٓائِبُونَ الْعَابِدُونَ الْحَامِدُونَ السَّٓائِحُونَ الرَّاكِعُونَ السَّاجِدُونَ الْاٰمِرُونَ بِالْمَعْرُوفِ وَالنَّاهُونَ عَنِ الْمُنْكَرِ وَالْحَافِظُونَ لِحُدُودِ اللّٰهِۜ وَبَشِّرِ الْمُؤْمِن۪ينَ112
वे ऐसे हैं, जो तौबा करते हैं, बन्दगी करते है, स्तुति करते हैं, (अल्लाह के मार्ग में) भ्रमण करते हैं, (अल्लाह के आगे) झुकते है, सजदा करते है, भलाई का हुक्म देते है और बुराई से रोकते हैं और अल्लाह की निर्धारित सीमाओं की रक्षा करते हैं -और इन ईमानवालों को शुभ-सूचना दे दो
مَا كَانَ لِلنَّبِيِّ وَالَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اَنْ يَسْتَغْفِرُوا لِلْمُشْرِك۪ينَ وَلَوْ كَانُٓوا اُو۬ل۪ي قُرْبٰى مِنْ بَعْدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُمْ اَنَّهُمْ اَصْحَابُ الْجَح۪يمِ113
नबी और ईमान लानेवालों के लिए उचित नहीं कि वे बहुदेववादियों के लिए क्षमा की प्रार्थना करें, यद्यपि वे उसके नातेदार ही क्यों न हो, जबकि उनपर यह बात खुल चुकी है कि वे भड़कती आगवाले हैं
وَمَا كَانَ اسْتِغْفَارُ اِبْرٰه۪يمَ لِاَب۪يهِ اِلَّا عَنْ مَوْعِدَةٍ وَعَدَهَٓا اِيَّاهُۚ فَلَمَّا تَبَيَّنَ لَهُٓ اَنَّهُ عَدُوٌّ لِلّٰهِ تَبَرَّاَ مِنْهُۜ اِنَّ اِبْرٰه۪يمَ لَاَوَّاهٌ حَل۪يمٌ114
इबराहीम ने अपने बाप के लिए जो क्षमा की प्रार्थना की थी, वह तो केवल एक वादे के कारण की थी, जो वादा वह उससे कर चुका था। फिर जब उसपर यह बात खुल गई कि वह अल्लाह का शत्रु है तो वह उससे विरक्त हो गया। वास्तव में, इबराहीम बड़ा ही कोमल हृदय, अत्यन्त सहनशील था
وَمَا كَانَ اللّٰهُ لِيُضِلَّ قَوْمًا بَعْدَ اِذْ هَدٰيهُمْ حَتّٰى يُبَيِّنَ لَهُمْ مَا يَتَّقُونَۜ اِنَّ اللّٰهَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَل۪يمٌ115
अल्लाह ऐसा नहीं कि लोगों को पथभ्रष्ट ठहराए, जबकि वह उनको राह पर ला चुका हो, जब तक कि उन्हें साफ़-साफ़ वे बातें बता न दे, जिनसे उन्हें बचना है। निस्संदेह अल्लाह हर चीज़ को भली-भाँति जानता है
اِنَّ اللّٰهَ لَهُ مُلْكُ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ يُحْي۪ وَيُم۪يتُۜ وَمَا لَكُمْ مِنْ دُونِ اللّٰهِ مِنْ وَلِيٍّ وَلَا نَص۪يرٍ116
आकाशों और धरती का राज्य अल्लाह ही का है, वही जिलाता है और मारता है। अल्लाह से हटकर न तुम्हारा कोई मित्र है और न सहायक
لَقَدْ تَابَ اللّٰهُ عَلَى النَّبِيِّ وَالْمُهَاجِر۪ينَ وَالْاَنْصَارِ الَّذ۪ينَ اتَّبَعُوهُ ف۪ي سَاعَةِ الْعُسْرَةِ مِنْ بَعْدِ مَا كَادَ يَز۪يغُ قُلُوبُ فَر۪يقٍ مِنْهُمْ ثُمَّ تَابَ عَلَيْهِمْۜ اِنَّهُ بِهِمْ رَؤُ۫فٌ رَح۪يمٌۙ117
अल्लाह नबी पर मेहरबान हो गया और मुहाजिरों और अनसार पर भी, जिन्होंने तंगी की घड़ी में उसका साथ दिया, इसके पश्चात कि उनमें से एक गिरोह के दिल कुटिलता की ओर झुक गए थे। फिर उसने उनपर दया-दृष्टि दर्शाई। निस्संदेह, वह उनके लिए अत्यन्त करुणामय, दयावान है
وَعَلَى الثَّلٰثَةِ الَّذ۪ينَ خُلِّفُواۜ حَتّٰٓى اِذَا ضَاقَتْ عَلَيْهِمُ الْاَرْضُ بِمَا رَحُبَتْ وَضَاقَتْ عَلَيْهِمْ اَنْفُسُهُمْ وَظَنُّٓوا اَنْ لَا مَلْجَاَ مِنَ اللّٰهِ اِلَّٓا اِلَيْهِۜ ثُمَّ تَابَ عَلَيْهِمْ لِيَتُوبُواۜ اِنَّ اللّٰهَ هُوَ التَّوَّابُ الرَّح۪يمُ۟118
और उन तीनों पर भी जो पीछे छोड़ दिए गए थे, यहाँ तक कि जब धरती विशाल होते हुए भी उनपर तंग हो गई और उनके प्राण उनपर दुभर हो गए और उन्होंने समझा कि अल्लाह से बचने के लिए कोई शरण नहीं मिल सकती है तो उसी के यहाँ। फिर उसने उनपर कृपा-दृष्टि की ताकि वे पलट आएँ। निस्संदेह अल्लाह ही तौबा क़बूल करनेवाला, अत्यन्त दयावान है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا اتَّقُوا اللّٰهَ وَكُونُوا مَعَ الصَّادِق۪ينَ119
ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह का डर रखों और सच्चे लोगों के साथ हो जाओ
مَا كَانَ لِاَهْلِ الْمَد۪ينَةِ وَمَنْ حَوْلَهُمْ مِنَ الْاَعْرَابِ اَنْ يَتَخَلَّفُوا عَنْ رَسُولِ اللّٰهِ وَلَا يَرْغَبُوا بِاَنْفُسِهِمْ عَنْ نَفْسِه۪ۜ ذٰلِكَ بِاَنَّهُمْ لَا يُص۪يبُهُمْ ظَمَاٌ وَلَا نَصَبٌ وَلَا مَخْمَصَةٌ ف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِ وَلَا يَطَؤُ۫نَ مَوْطِئًا يَغ۪يظُ الْكُفَّارَ وَلَا يَنَالُونَ مِنْ عَدُوٍّ نَيْلًا اِلَّا كُتِبَ لَهُمْ بِه۪ عَمَلٌ صَالِحٌۜ اِنَّ اللّٰهَ لَا يُض۪يعُ اَجْرَ الْمُحْسِن۪ينَۙ120
मदीनावालों और उसके आसपास के बद्दूहओं को ऐसा नहीं चाहिए था कि अल्लाह के रसूल को छोड़कर पीछे रह जाएँ और न यह कि उसकी जान के मुक़ाबले में उन्हें अपनी जान अधिक प्रिय हो, क्योंकि वह अल्लाह के मार्ग में प्यास या थकान या भूख की कोई भी तकलीफ़ उठाएँ या किसी ऐसी जगह क़दम रखें, जिससे काफ़िरों का क्रोध भड़के या जो चरका भी वे शत्रु को लगाएँ, उसपर उनके हक में अनिवार्यतः एक सुकर्म लिख लिया जाता है। निस्संदेह अल्लाह उत्तमकार का कर्मफल अकारथ नहीं जाने देता
وَلَا يُنْفِقُونَ نَفَقَةً صَغ۪يرَةً وَلَا كَب۪يرَةً وَلَا يَقْطَعُونَ وَادِيًا اِلَّا كُتِبَ لَهُمْ لِيَجْزِيَهُمُ اللّٰهُ اَحْسَنَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ121
और वे थो़ड़ा या ज़्यादा जो कुछ भी ख़र्च करें या (अल्लाह के मार्ग में) कोई घाटी पार करें, उनके हक़ में अनिवार्यतः लिख लिया जाता है, ताकि अल्लाह उन्हें उनके अच्छे कर्मों का बदला प्रदान करे
وَمَا كَانَ الْمُؤْمِنُونَ لِيَنْفِرُوا كَٓافَّةًۜ فَلَوْلَا نَفَرَ مِنْ كُلِّ فِرْقَةٍ مِنْهُمْ طَٓائِفَةٌ لِيَتَفَقَّهُوا فِي الدّ۪ينِ وَلِيُنْذِرُوا قَوْمَهُمْ اِذَا رَجَعُٓوا اِلَيْهِمْ لَعَلَّهُمْ يَحْذَرُونَ۟122
यह तो नहीं कि ईमानवाले सब के सब निकल खड़े हों, फिर ऐसा क्यों नहीं हुआ कि उनके हर गिरोह में से कुछ लोग निकलते, ताकि वे धर्म में समझ प्राप्ति करते और ताकि वे अपने लोगों को सचेत करते, जब वे उनकी ओर लौटते, ताकि वे (बुरे कर्मों से) बचते?
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا قَاتِلُوا الَّذ۪ينَ يَلُونَكُمْ مِنَ الْكُفَّارِ وَلْيَجِدُوا ف۪يكُمْ غِلْظَةًۜ وَاعْلَمُٓوا اَنَّ اللّٰهَ مَعَ الْمُتَّق۪ينَ123
ऐ ईमान लानेवालो! उन इनकार करनेवालों से लड़ो जो तुम्हारे निकट है और चाहिए कि वे तुममें सख़्ती पाएँ, और जान रखो कि अल्लाह डर रखनेवालों के साथ है
وَاِذَا مَٓا اُنْزِلَتْ سُورَةٌ فَمِنْهُمْ مَنْ يَقُولُ اَيُّكُمْ زَادَتْهُ هٰذِه۪ٓ ا۪يمَانًاۚ فَاَمَّا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا فَزَادَتْهُمْ ا۪يمَانًا وَهُمْ يَسْتَبْشِرُونَ124
जब भी कोई सूरा अवतरित की गई, तो उनमें से कुछ लोग कहते है, "इसने तुममें से किसके ईमान को बढ़ाया?" हाँ, जो लोग ईमान लाए है इसने उनके ईमान को बढ़ाया है। और वे आनन्द मना रहे है
وَاَمَّا الَّذ۪ينَ فِي قُلُوبِهِمْ مَرَضٌ فَزَادَتْهُمْ رِجْسًا اِلٰى رِجْسِهِمْ وَمَاتُوا وَهُمْ كَافِرُونَ125
रहे वे लोग जिनके दिलों में रोग है, उनकी गन्दगी में अभिवृद्धि करते हुए उसने उन्हें उनकी अपनी गन्दगी में और आगे बढ़ा दिया। और वे मरे तो इनकार की दशा ही में
اَوَلَا يَرَوْنَ اَنَّهُمْ يُفْتَنُونَ ف۪ي كُلِّ عَامٍ مَرَّةً اَوْ مَرَّتَيْنِ ثُمَّ لَا يَتُوبُونَ وَلَا هُمْ يَذَّكَّرُونَ126
क्या वे देखते नहीं कि प्रत्येक वर्ष वॆ एक या दो बार आज़माईश में डाले जाते है ? फिर भी न तो वे तौबा करते हैं और न चेतते।
وَاِذَا مَٓا اُنْزِلَتْ سُورَةٌ نَظَرَ بَعْضُهُمْ اِلٰى بَعْضٍۜ هَلْ يَرٰيكُمْ مِنْ اَحَدٍ ثُمَّ انْصَرَفُواۜ صَرَفَ اللّٰهُ قُلُوبَهُمْ بِاَنَّهُمْ قَوْمٌ لَا يَفْقَهُونَ127
और जब कोई सूरा अवतरित होती है, तो वे परस्पर एक-दूसरे को देखने लगते है कि "तुम्हें कोई देख तो नहीं रहा है।" फिर पलट जाते है। अल्लाह ने उनके दिल फेर दिए, क्योंकि वे ऐसे लोग है जो समझते नहीं है
لَقَدْ جَٓاءَكُمْ رَسُولٌ مِنْ اَنْفُسِكُمْ عَز۪يزٌۘ عَلَيْهِ مَا عَنِتُّمْ حَر۪يصٌ عَلَيْكُمْ بِالْمُؤْمِن۪ينَ رَؤُ۫فٌ رَح۪يمٌ128
तुम्हारे पास तुम्हीं में से एक रसूल आ गया है। तुम्हारा मुश्किल में पड़ना उसके लिए असह्य है। वह तुम्हारे लिए लालयित है। वह मोमिनों के प्रति अत्यन्त करुणामय, दयावान है
فَاِنْ تَوَلَّوْا فَقُلْ حَسْبِيَ اللّٰهُۘ لَٓا اِلٰهَ اِلَّا هُوَۜ عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ وَهُوَ رَبُّ الْعَرْشِ الْعَظ۪يمِ129
अब यदि वे मुँह मोड़े तो कह दो, "मेरे लिए अल्लाह काफ़ी है, उसके अतिरिक्त कोई पूज्य-प्रभु नहीं! उसी पर मैंने भऱोसा किया और वही बड़े सिंहासन का प्रभु है।"
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
الٓرٰ۠ تِلْكَ اٰيَاتُ الْكِتَابِ الْحَك۪يمِ1
अलिफ़॰ लाम॰ रा॰। ये तत्वदर्शितायुक्त किताब की आयतें हैं
اَكَانَ لِلنَّاسِ عَجَبًا اَنْ اَوْحَيْنَٓا اِلٰى رَجُلٍ مِنْهُمْ اَنْ اَنْذِرِ النَّاسَ وَبَشِّرِ الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اَنَّ لَهُمْ قَدَمَ صِدْقٍ عِنْدَ رَبِّهِمْۜ قَالَ الْكَافِرُونَ اِنَّ هٰذَا لَسَاحِرٌ مُب۪ينٌ2
क्या लोगों को इस बात पर आश्चर्य हो रहा है कि हमने उन्ही में से एक आदमी की ओर प्रकाशना की कि लोगों को सचेत कर दो और जो लोग मान लें, उनको शुभ समाचार दे दो कि उनके लिए रब के पास शाश्वत सच्चा उन्नत स्थान है? इनकार करनेवाले कहने लगे, "निस्संदेह यह एक खुला जादूगर है।"
اِنَّ رَبَّكُمُ اللّٰهُ الَّذ۪ي خَلَقَ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضَ ف۪ي سِتَّةِ اَيَّامٍ ثُمَّ اسْتَوٰى عَلَى الْعَرْشِ يُدَبِّرُ الْاَمْرَۜ مَا مِنْ شَف۪يعٍ اِلَّا مِنْ بَعْدِ اِذْنِه۪ۜ ذٰلِكُمُ اللّٰهُ رَبُّكُمْ فَاعْبُدُوهُۜ اَفَلَا تَذَكَّرُونَ3
निस्संदेह तुम्हारा रब वही अल्लाह है, जिसने आकाशों और धरती को छः दिनों में पैदा किया, फिर सिंहासन पर विराजमान होकर व्यवस्था चला रहा है। उसकी अनुज्ञा के बिना कोई सिफ़ारिश करनेवाला भी नहीं है। वह अल्लाह है तुम्हारा रब। अतः उसी की बन्दगी करो। तो क्या तुम ध्यान न दोगे?
اِلَيْهِ مَرْجِعُكُمْ جَم۪يعًاۜ وَعْدَ اللّٰهِ حَقًّاۜ اِنَّهُ يَبْدَؤُا الْخَلْقَ ثُمَّ يُع۪يدُهُ لِيَجْزِيَ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ بِالْقِسْطِۜ وَالَّذ۪ينَ كَفَرُوا لَهُمْ شَرَابٌ مِنْ حَم۪يمٍ وَعَذَابٌ اَل۪يمٌ بِمَا كَانُوا يَكْفُرُونَ4
उसी की ओर तुम सबको लौटना है। यह अल्लाह का पक्का वादा है। निस्संदेह वही पहली बार पैदा करता है। फिर दोबारा पैदा करेगा, ताकि जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए उन्हें न्यायपूर्वक बदला दे। रहे वे लोग जिन्होंने इनकार किया उनके लिए खौलता पेय और दुखद यातना है, उस इनकार के बदले में जो वे करते रहे
هُوَ الَّذ۪ي جَعَلَ الشَّمْسَ ضِيَٓاءً وَالْقَمَرَ نُورًا وَقَدَّرَهُ مَنَازِلَ لِتَعْلَمُوا عَدَدَ السِّن۪ينَ وَالْحِسَابَۜ مَا خَلَقَ اللّٰهُ ذٰلِكَ اِلَّا بِالْحَقِّۜ يُفَصِّلُ الْاٰيَاتِ لِقَوْمٍ يَعْلَمُونَ5
वही है जिसने सूर्य को सर्वथा दीप्ति और चन्द्रमा का प्रकाश बनाया औऱ उनके लिए मंज़िलें निश्चित की, ताकि तुम वर्षों की गिनती और हिसाब मालूम कर लिया करो। अल्लाह ने यह सब कुछ सोद्देश्य ही पैदा किया है। वह अपनी निशानियों को उन लोगों के लिए खोल-खोलकर बयान करता है, जो जानना चाहें
اِنَّ فِي اخْتِلَافِ الَّيْلِ وَالنَّهَارِ وَمَا خَلَقَ اللّٰهُ فِي السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِ لَاٰيَاتٍ لِقَوْمٍ يَتَّقُونَ6
निस्संदेह रात और दिन के उलट-फेर में और जो कुछ अल्लाह ने आकाशों और धरती में पैदा किया उसमें डर रखनेवाले लोगों के लिए निशानियाँ है
اِنَّ الَّذ۪ينَ لَا يَرْجُونَ لِقَٓاءَنَا وَرَضُوا بِالْحَيٰوةِ الدُّنْيَا وَاطْمَاَنُّوا بِهَا وَالَّذ۪ينَ هُمْ عَنْ اٰيَاتِنَا غَافِلُونَۙ7
रहे वे लोग जो हमसे मिलने की आशा नहीं रखते और सांसारिक जीवन ही पर निहाल हो गए है और उसी पर संतुष्ट हो बैठे, और जो हमारी निशानियों की ओर से असावधान है;
اُو۬لٰٓئِكَ مَاْوٰيهُمُ النَّارُ بِمَا كَانُوا يَكْسِبُونَ8
ऐसे लोगों का ठिकाना आग है, उसके बदले में जो वे कमाते रहे
اِنَّ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ يَهْد۪يهِمْ رَبُّهُمْ بِا۪يمَانِهِمْۚ تَجْر۪ي مِنْ تَحْتِهِمُ الْاَنْهَارُ ف۪ي جَنَّاتِ النَّع۪يمِ9
रहे वे लोग जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए, उनका रब उनके ईमान के कारण उनका मार्गदर्शन करेगा। उनके नेमत भरी जन्नतों में नहरें बह रही होगी
دَعْوٰيهُمْ ف۪يهَا سُبْحَانَكَ اللّٰهُمَّ وَتَحِيَّتُهُمْ ف۪يهَا سَلَامٌۚ وَاٰخِرُ دَعْوٰيهُمْ اَنِ الْحَمْدُ لِلّٰهِ رَبِّ الْعَالَم۪ينَ۟10
वहाँ उनकी पुकार यह होगी कि "महिमा है तेरी, ऐ अल्लाह!" और उनका पारस्परिक अभिवादन "सलाम" होगा। और उनकी पुकार का अन्त इसपर होगा कि "प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है जो सारे संसार का रब है।"
وَلَوْ يُعَجِّلُ اللّٰهُ لِلنَّاسِ الشَّرَّ اسْتِعْجَالَهُمْ بِالْخَيْرِ لَقُضِيَ اِلَيْهِمْ اَجَلُهُمْۜ فَنَذَرُ الَّذ۪ينَ لَا يَرْجُونَ لِقَٓاءَنَا ف۪ي طُغْيَانِهِمْ يَعْمَهُونَ11
यदि अल्लाह लोगों के लिए उनके जल्दी मचाने के कारण भलाई की जगह बुराई को शीघ्र घटित कर दे तो उनकी ओर उनकी अवधि पूरी कर दी जाए, किन्तु हम उन लोगों को जो हमसे मिलने की आशा नहीं रखते उनकी अपनी सरकशी में भटकने के लिए छोड़ देते है
وَاِذَا مَسَّ الْاِنْسَانَ الضُّرُّ دَعَانَا لِجَنْبِه۪ٓ اَوْ قَاعِدًا اَوْ قَٓائِمًاۚ فَلَمَّا كَشَفْنَا عَنْهُ ضُرَّهُ مَرَّ كَاَنْ لَمْ يَدْعُنَٓا اِلٰى ضُرٍّ مَسَّهُۜ كَذٰلِكَ زُيِّنَ لِلْمُسْرِف۪ينَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ12
मनुष्य को जब कोई तकलीफ़ पहुँचती है, वह लेटे या बैठे या खड़े हमको पुकारने लग जाता है। किन्तु जब हम उसकी तकलीफ़ उससे दूर कर देते है तो वह इस तरह चल देता है मानो कभी कोई तकलीफ़ पहुँचने पर उसने हमें पुकारा ही न था। इसी प्रकार मर्यादाहीन लोगों के लिए जो कुछ वे कर रहे है सुहावना बना दिया गया है
وَلَقَدْ اَهْلَكْنَا الْقُرُونَ مِنْ قَبْلِكُمْ لَمَّا ظَلَمُواۙ وَجَٓاءَتْهُمْ رُسُلُهُمْ بِالْبَيِّنَاتِ وَمَا كَانُوا لِيُؤْمِنُواۜ كَذٰلِكَ نَجْزِي الْقَوْمَ الْمُجْرِم۪ينَ13
तुमसे पहले कितनी ही नस्लों को, जब उन्होंने अत्याचार किया, हम विनष्ट कर चुके है, हालाँकि उनके रसूल उनके पास खुली निशानियाँ लेकर आए थे। किन्तु वे ऐसे न थे कि उन्हें मानते। अपराधी लोगों को हम इसी प्रकार बदला दिया करते है
ثُمَّ جَعَلْنَاكُمْ خَلَٓائِفَ فِي الْاَرْضِ مِنْ بَعْدِهِمْ لِنَنْظُرَ كَيْفَ تَعْمَلُونَ14
फिर उनके पश्चात हमने धरती में उनकी जगह तुम्हें रखा, ताकि हम देखें कि तुम कैसे कर्म करते हो
وَاِذَا تُتْلٰى عَلَيْهِمْ اٰيَاتُنَا بَيِّنَاتٍۙ قَالَ الَّذ۪ينَ لَا يَرْجُونَ لِقَٓاءَنَا ائْتِ بِقُرْاٰنٍ غَيْرِ هٰذَٓا اَوْ بَدِّلْهُۜ قُلْ مَا يَكُونُ ل۪ٓي اَنْ اُبَدِّلَهُ مِنْ تِلْقَٓائِ۬ نَفْس۪يۚ اِنْ اَتَّبِعُ اِلَّا مَا يُوحٰٓى اِلَيَّۚ اِنّ۪ٓي اَخَافُ اِنْ عَصَيْتُ رَبّ۪ي عَذَابَ يَوْمٍ عَظ۪يمٍ15
और जब उनके सामने हमारी खुली हुई आयतें पढ़ी जाती है तो वे लोग, जो हमसे मिलने की आशा नहीं रखते, कहते है, "इसके सिवा कोई और क़ुरआन ले आओ या इसमें कुछ परिवर्तन करो।" कह दो, "मुझसे यह नहीं हो सकता कि मैं अपनी ओर से इसमें कोई परिवर्तन करूँ। मैं तो बस उसका अनुपालन करता हूँ, जो प्रकाशना मेरी ओर अवतरित की जाती है। यदि मैं अपने प्रभु की अवज्ञा करँस तो इसमें मुझे एक बड़े दिन की यातना का भय है।"
قُلْ لَوْ شَٓاءَ اللّٰهُ مَا تَلَوْتُهُ عَلَيْكُمْ وَلَٓا اَدْرٰيكُمْ بِه۪ۘ فَقَدْ لَبِثْتُ ف۪يكُمْ عُمُرًا مِنْ قَبْلِه۪ۜ اَفَلَا تَعْقِلُونَ16
कह दो, "यदि अल्लाह चाहता तो मैं तुम्हें यह पढ़कर न सुनाता और न वह तुम्हें इससे अवगत कराता। आख़िर इससे पहले मैं तुम्हारे बीच जीवन की पूरी अवधि व्यतीत कर चुका हूँ। फिर क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लेते?"
فَمَنْ اَظْلَمُ مِمَّنِ افْتَرٰى عَلَى اللّٰهِ كَذِبًا اَوْ كَذَّبَ بِاٰيَاتِه۪ۜ اِنَّهُ لَا يُفْلِحُ الْمُجْرِمُونَ17
फिर उस व्यक्ति से बढ़कर अत्याचारी कौन होगा जो अल्लाह पर थोपकर झूठ घड़े या उसकी आयतों को झुठलाए? निस्संदेह अपराधी कभी सफल नहीं होते
وَيَعْبُدُونَ مِنْ دُونِ اللّٰهِ مَا لَا يَضُرُّهُمْ وَلَا يَنْفَعُهُمْ وَيَقُولُونَ هٰٓؤُ۬لَٓاءِ شُفَعَٓاؤُ۬نَا عِنْدَ اللّٰهِۜ قُلْ اَتُنَبِّؤُ۫نَ اللّٰهَ بِمَا لَا يَعْلَمُ فِي السَّمٰوَاتِ وَلَا فِي الْاَرْضِۜ سُبْحَانَهُ وَتَعَالٰى عَمَّا يُشْرِكُونَ18
वे लोग अल्लाह से हटकर उनको पूजते हैं, जो न उनका कुछ बिगाड़ सकें और न उनका कुछ भला कर सकें। और वे कहते है, "ये अल्लाह के यहाँ हमारे सिफ़ारिशी है।" कह दो, "क्या तुम अल्लाह को उसकी ख़बर देनेवाले? हो, जिसका अस्तित्व न उसे आकाशों में ज्ञात है न धरती में" महिमावान है वह और उसकी उच्चता के प्रतिकूल है वह शिर्क, जो वे कर रहे है
وَمَا كَانَ النَّاسُ اِلَّٓا اُمَّةً وَاحِدَةً فَاخْتَلَفُواۜ وَلَوْلَا كَلِمَةٌ سَبَقَتْ مِنْ رَبِّكَ لَقُضِيَ بَيْنَهُمْ ف۪يمَا ف۪يهِ يَخْتَلِفُونَ19
सारे मनुष्य एक ही समुदाय थे। वे तो स्वयं अलग-अलग हो रहे। और यदि तेरे रब की ओर से पहले ही एक बात निश्चित न हो गई होती, तो उनके बीच का फ़ैसला कर दिया जाता जिसमें वे मतभेद कर रहे हैं
وَيَقُولُونَ لَوْلَٓا اُنْزِلَ عَلَيْهِ اٰيَةٌ مِنْ رَبِّه۪ۚ فَقُلْ اِنَّمَا الْغَيْبُ لِلّٰهِ فَانْتَظِرُواۚ اِنّ۪ي مَعَكُمْ مِنَ الْمُنْتَظِر۪ينَ۟20
वे कहते है, "उस पर उनके रब की ओर से कोई निशानी क्यों नहीं उतरी?" तो कह दो, "परोक्ष तो अल्लाह ही से सम्बन्ध रखता है। अच्छा, प्रतीक्षा करो, मैं भी तुम्हारे साथ प्रतीक्षा करता हूँ।"
وَاِذَٓا اَذَقْنَا النَّاسَ رَحْمَةً مِنْ بَعْدِ ضَرَّٓاءَ مَسَّتْهُمْ اِذَا لَهُمْ مَكْرٌ ف۪ٓي اٰيَاتِنَاۜ قُلِ اللّٰهُ اَسْرَعُ مَكْرًاۜ اِنَّ رُسُلَنَا يَكْتُبُونَ مَا تَمْكُرُونَ21
जब हम लोगों को उनके किसी तकलीफ़ में पड़ने के पश्चात दयालुता का रसास्वादन कराते है तो वे हमारी आयतों के विषय में चालबाज़ियाँ करने लग जाते है। कह दो, "अल्लाह की चाल ज़्यादा तेज़ है।" निस्संदेह, जो चालबाजियाँ तुम कर रहे हो, हमारे भेजे हुए (फ़रिश्ते) उनको लिखते जा रहे है
هُوَ الَّذ۪ي يُسَيِّرُكُمْ فِي الْبَرِّ وَالْبَحْرِۜ حَتّٰٓى اِذَا كُنْتُمْ فِي الْفُلْكِۚ وَجَرَيْنَ بِهِمْ بِر۪يحٍ طَيِّبَةٍ وَفَرِحُوا بِهَا جَٓاءَتْهَا ر۪يحٌ عَاصِفٌ وَجَٓاءَهُمُ الْمَوْجُ مِنْ كُلِّ مَكَانٍ وَظَنُّٓوا اَنَّهُمْ اُح۪يطَ بِهِمْۙ دَعَوُا اللّٰهَ مُخْلِص۪ينَ لَهُ الدّ۪ينَۚ لَئِنْ اَنْجَيْتَنَا مِنْ هٰذِه۪ لَنَكُونَنَّ مِنَ الشَّاكِر۪ينَ22
वही है जो तुम्हें थल और जल में चलाता है, यहाँ तक कि जब तुम नौका में होते हो और वह लोगो को लिए हुए अच्छी अनुकूल वायु के सहारे चलती है और वे उससे हर्षित होते है कि अकस्मात उनपर प्रचंड वायु का झोंका आता है, हर ओर से लहरें उनपर चली आती है और वे समझ लेते है कि बस अब वे घिर गए, उस समय वे अल्लाह ही को, निरी उसी पर आस्था रखकर पुकारने लगते है, "यदि तूने हमें इससे बचा लिया तो हम अवश्य आभारी होंगे।"
فَلَمَّٓا اَنْجٰيهُمْ اِذَا هُمْ يَبْغُونَ فِي الْاَرْضِ بِغَيْرِ الْحَقِّۜ يَٓا اَيُّهَا النَّاسُ اِنَّمَا بَغْيُكُمْ عَلٰٓى اَنْفُسِكُمْۙ مَتَاعَ الْحَيٰوةِ الدُّنْيَا ثُمَّ اِلَيْنَا مَرْجِعُكُمْ فَنُنَبِّئُكُمْ بِمَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ23
फिर जब वह उनको बचा लेता है, तो क्या देखते है कि वे नाहक़ धरती में सरकशी करने लग जाते है। ऐ लोगों! तुम्हारी सरकशी तुम्हारे अपने ही विरुद्ध है। सांसारिक जीवन का सुख ले लो। फिर तुम्हें हमारी ही ओर लौटकर आना है। फिर हम तुम्हें बता देंगे जो कुछ तुम करते रहे होगे
اِنَّمَا مَثَلُ الْحَيٰوةِ الدُّنْيَا كَمَٓاءٍ اَنْزَلْنَاهُ مِنَ السَّمَٓاءِ فَاخْتَلَطَ بِه۪ نَبَاتُ الْاَرْضِ مِمَّا يَاْكُلُ النَّاسُ وَالْاَنْعَامُۜ حَتّٰٓى اِذَٓا اَخَذَتِ الْاَرْضُ زُخْرُفَهَا وَازَّيَّنَتْ وَظَنَّ اَهْلُهَٓا اَنَّهُمْ قَادِرُونَ عَلَيْهَٓاۙ اَتٰيهَٓا اَمْرُنَا لَيْلًا اَوْ نَهَارًا فَجَعَلْنَاهَا حَص۪يدًا كَاَنْ لَمْ تَغْنَ بِالْاَمْسِۜ كَذٰلِكَ نُفَصِّلُ الْاٰيَاتِ لِقَوْمٍ يَتَفَكَّرُونَ24
सांसारिक जीवन की उपमा तो बस ऐसी है जैसे हमने आकाश से पानी बरसाया, तो उसके कारण धरती से उगनेवाली चीज़े, जिनको मनुष्य और चौपाये सभी खाते है, घनी हो गई, यहाँ तक कि धरती ने अपना शृंगार कर लिया और सँवर गई और उसके मालिक समझने लगे कि उन्हें उसपर पूरा अधिकार प्राप्त है कि रात या दिन में हमारा आदेश आ पहुँचा। फिर हमने उसे कटी फ़सल की तरह कर दिया, मानो कल वहाँ कोई आबादी ही न थी। इसी तरह हम उन लोगों के लिए खोल-खोलकर निशानियाँ बयान करते है, जो सोच-विचार से काम लेना चाहें
وَاللّٰهُ يَدْعُٓوا اِلٰى دَارِ السَّلَامِۜ وَيَهْد۪ي مَنْ يَشَٓاءُ اِلٰى صِرَاطٍ مُسْتَق۪يمٍ25
और अल्लाह तुम्हें सलामती के घर की ओर बुलाता है, और जिसे चाहता है सीधी राह चलाता है;
لِلَّذ۪ينَ اَحْسَنُوا الْحُسْنٰى وَزِيَادَةٌۜ وَلَا يَرْهَقُ وُجُوهَهُمْ قَتَرٌ وَلَا ذِلَّةٌۜ اُو۬لٰٓئِكَ اَصْحَابُ الْجَنَّةِۚ هُمْ ف۪يهَا خَالِدُونَ26
अच्छे से अच्छा कर्म करनेवालों के लिए अच्छा बदला है और इसके अतिरिक्त और भी। और उनके चहरों पर न तो कलौस छाएगी और न ज़िल्लत। वही जन्नतवाले है; वे उसमें सदैव रहेंगे
وَالَّذ۪ينَ كَسَبُوا السَّيِّـَٔاتِ جَزَٓاءُ سَيِّئَةٍ بِمِثْلِهَاۙ وَتَرْهَقُهُمْ ذِلَّةٌۜ مَا لَهُمْ مِنَ اللّٰهِ مِنْ عَاصِمٍۚ كَاَنَّمَٓا اُغْشِيَتْ وُجُوهُهُمْ قِطَعًا مِنَ الَّيْلِ مُظْلِمًاۜ اُو۬لٰٓئِكَ اَصْحَابُ النَّارِۚ هُمْ ف۪يهَا خَالِدُونَ27
रहे वे लोग जिन्होंने बुराइयाँ कमाई, तो एक बुराई का बदला भी उसी जैसा होगा; और ज़िल्लत उनपर छा रही होगी। उन्हें अल्लाह से बचानेवाला कोई न होगा। उनके चहरों पर मानो अँधेरी रात के टुकड़े ओढ़ा दिए गए हों। वही आगवाले हैं, उन्हें उसमें सदैव रहना है
وَيَوْمَ نَحْشُرُهُمْ جَم۪يعًا ثُمَّ نَقُولُ لِلَّذ۪ينَ اَشْرَكُوا مَكَانَكُمْ اَنْتُمْ وَشُرَكَٓاؤُ۬كُمْۚ فَزَيَّلْنَا بَيْنَهُمْ وَقَالَ شُرَكَٓاؤُ۬هُمْ مَا كُنْتُمْ اِيَّانَا تَعْبُدُونَ28
और जिस दिन हम उन सबको इकट्ठा करेंगे, फिर उन लोगों से, जिन्होंने शिर्क किया होगा, कहेंगे, "अपनी जगह ठहरे रहो तुम भी और तुम्हारे साझीदार भी।" फिर हम उनके बीच अलगाव पैदा कर देंगे, और उनके ठहराए हुए साझीदार कहेंगे, "तुम हमारी तो हमारी बन्दगी नहीं करते थे
فَكَفٰى بِاللّٰهِ شَه۪يدًا بَيْنَنَا وَبَيْنَكُمْ اِنْ كُنَّا عَنْ عِبَادَتِكُمْ لَغَافِل۪ينَ29
"हमारे और तुम्हारे बीच अल्लाह ही एक गवाह काफ़ी है। हमें तो तुम्हारी बन्दगी की ख़बर तक न थी।"
هُنَالِكَ تَبْلُوا كُلُّ نَفْسٍ مَٓا اَسْلَفَتْ وَرُدُّٓوا اِلَى اللّٰهِ مَوْلٰيهُمُ الْحَقِّ وَضَلَّ عَنْهُمْ مَا كَانُوا يَفْتَرُونَ۟30
वहाँ प्रत्येक व्यक्ति अपने पहले के किए हुए कर्मों को स्वयं जाँच लेगा और वह अल्लाह, अपने वास्तविक स्वामी की ओर फिरेंगे और जो कुछ झूठ वे घड़ते रहे थे, वह सब उनसे गुम होकर रह जाएगा
قُلْ مَنْ يَرْزُقُكُمْ مِنَ السَّمَٓاءِ وَالْاَرْضِ اَمَّنْ يَمْلِكُ السَّمْعَ وَالْاَبْصَارَ وَمَنْ يُخْرِجُ الْحَيَّ مِنَ الْمَيِّتِ وَيُخْرِجُ الْمَيِّتَ مِنَ الْحَيِّ وَمَنْ يُدَبِّرُ الْاَمْرَۜ فَسَيَقُولُونَ اللّٰهُۚ فَقُلْ اَفَلَا تَتَّقُونَ31
कहो, "तुम्हें आकाश और धरती से रोज़ी कौन देता है, या ये कान और आँखें किसके अधिकार में है और कौन जीवन्त को निर्जीव से निकालता है और निर्जीव को जीवन्त से निकालता है और कौन यह सारा इन्तिज़ाम चला रहा है?" इसपर वे बोल पड़ेगे, "अल्लाह!" तो कहो, "फिर आख़िर तुम क्यों नहीं डर रखते?"
فَذٰلِكُمُ اللّٰهُ رَبُّكُمُ الْحَقُّۚ فَمَاذَا بَعْدَ الْحَقِّ اِلَّا الضَّلَالُۚ فَاَنّٰى تُصْرَفُونَ32
फिर यही अल्लाह तो है तुम्हारा वास्तविक रब। फिर आख़िर सत्य के पश्चात पथभ्रष्टता के अतिरिक्त और क्या रह जाता है? फिर तुम कहाँ से फिरे जाते हो?
كَذٰلِكَ حَقَّتْ كَلِمَتُ رَبِّكَ عَلَى الَّذ۪ينَ فَسَقُٓوا اَنَّهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ33
इसी तरह अवज्ञाकारी लोगों के प्रति तुम्हारे रब की बात सच्ची होकर रही कि वे मानेंगे नहीं
قُلْ هَلْ مِنْ شُرَكَٓائِكُمْ مَنْ يَبْدَؤُا الْخَلْقَ ثُمَّ يُع۪يدُهُۜ قُلِ اللّٰهُ يَبْدَؤُا الْخَلْقَ ثُمَّ يُع۪يدُهُ فَاَنّٰى تُؤْفَكُونَ34
कहो, "क्या तुम्हारे ठहराए हुए साझीदारों में कोई है जो सृष्टि का आरम्भ भी करता हो, फिर उसकी पुनरावृत्ति भी करे?" कहो, "अल्लाह ही सृष्टि का आरम्भ करता है और वही उसकी पुनरावृति भी; आख़िर तुम कहाँ औधे हुए जाते हो?"
قُلْ هَلْ مِنْ شُرَكَٓائِكُمْ مَنْ يَهْد۪ٓي اِلَى الْحَقِّۜ قُلِ اللّٰهُ يَهْد۪ي لِلْحَقِّۜ اَفَمَنْ يَهْد۪ٓي اِلَى الْحَقِّ اَحَقُّ اَنْ يُتَّبَعَ اَمَّنْ لَا يَهِدّ۪ٓي اِلَّٓا اَنْ يُهْدٰىۚ فَمَا لَكُمْ۠ كَيْفَ تَحْكُمُونَ35
कहो, "क्या तुम्हारे ठहराए साझीदारों में कोई है जो सत्य की ओर मार्गदर्शन करे?" कहो, "अल्लाह ही सत्य के मार्ग पर चलाता है। फिर जो सत्य की ओर मार्गदर्शन करता हो, वह इसका ज़्यादा हक़दार है कि उसका अनुसरण किया जाए या वह जो स्वयं ही मार्ग न पाए जब तक कि उसे मार्ग न दिखाया जाए? फिर यह तुम्हें क्या हो गया है, तुम कैसे फ़ैसले कर रहे हो?"
وَمَا يَتَّبِعُ اَكْثَرُهُمْ اِلَّا ظَنًّاۜ اِنَّ الظَّنَّ لَا يُغْن۪ي مِنَ الْحَقِّ شَيْـًٔاۜ اِنَّ اللّٰهَ عَل۪يمٌ بِمَا يَفْعَلُونَ36
और उनमें से अधिकतर तो बस अटकल पर चलते है। निश्चय ही अटकल सत्य को कुछ भी दूर नहीं कर सकती। वे जो कुछ कर रहे हैं अल्लाह उसको भली-भाँति जानता है
وَمَا كَانَ هٰذَا الْقُرْاٰنُ اَنْ يُفْتَرٰى مِنْ دُونِ اللّٰهِ وَلٰكِنْ تَصْد۪يقَ الَّذ۪ي بَيْنَ يَدَيْهِ وَتَفْص۪يلَ الْكِتَابِ لَا رَيْبَ ف۪يهِ مِنْ رَبِّ الْعَالَم۪ينَ۠37
यह क़ुरआन ऐसा नहीं है कि अल्लाह से हटकर घड लिया जाए, बल्कि यह तो जिसके समझ है, उसकी पुष्टि में है और किताब का विस्तार है, जिसमें किसी संदेह की गुंजाइश नहीं। यह सारे संसार के रब की ओर से है
اَمْ يَقُولُونَ افْتَرٰيهُۜ قُلْ فَاْتُوا بِسُورَةٍ مِثْلِه۪ وَادْعُوا مَنِ اسْتَطَعْتُمْ مِنْ دُونِ اللّٰهِ اِنْ كُنْتُمْ صَادِق۪ينَ38
(क्या उन्हें कोई खटक है) या वे कहते है, "इस व्यक्ति (पैग़म्बर) ने उसे स्वयं ही घड़ लिया है?" कहो, "यदि तुम सच्चे हो, तो इस जैसी एक सुरा ले आओ और अल्लाह से हटकर उसे बुला लो, जिसपर तुम्हारा बस चले।"
بَلْ كَذَّبُوا بِمَا لَمْ يُح۪يطُوا بِعِلْمِه۪ وَلَمَّا يَاْتِهِمْ تَاْو۪يلُهُۜ كَذٰلِكَ كَذَّبَ الَّذ۪ينَ مِنْ قَبْلِهِمْ فَانْظُرْ كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الظَّالِم۪ينَ39
बल्कि बात यह है कि जिस चीज़ के ज्ञान पर वे हावी न हो सके, उसे उन्होंने झुठला दिया और अभी उसका परिणाम उनके सामने नहीं आया। इसी प्रकार उन लोगों ने भी झुठलाया था, जो इनसे पहले थे। फिर देख लो उन अत्याचारियों का कैसा परिणाम हुआ!
وَمِنْهُمْ مَنْ يُؤْمِنُ بِه۪ وَمِنْهُمْ مَنْ لَا يُؤْمِنُ بِه۪ۜ وَرَبُّكَ اَعْلَمُ بِالْمُفْسِد۪ينَ۟40
उनमें कुछ लोग उसपर ईमान रखनेवाले है और उनमें कुछ लोग उसपर ईमान लानेवाले नहीं है। और तुम्हारा रब बिगाड़ पैदा करनेवालों को भली-भाँति जानता है
وَاِنْ كَذَّبُوكَ فَقُلْ ل۪ي عَمَل۪ي وَلَكُمْ عَمَلُكُمْۚ اَنْتُمْ بَر۪ٓيؤُ۫نَ مِمَّٓا اَعْمَلُ وَاَنَا۬ بَر۪ٓيءٌ مِمَّا تَعْمَلُونَ41
और यदि वे तुझे झुठलाएँ तो कह दो, "मेरा कर्म मेरे लिए है और तुम्हारा कर्म तुम्हारे लिए। जो कुछ मैं करता हूँ उसकी ज़िम्मेदारी से तुम बरी हो और जो कुछ तुम करते हो उसकी ज़िम्मेदारी से मैं बरी हूँ।"
وَمِنْهُمْ مَنْ يَسْتَمِعُونَ اِلَيْكَۜ اَفَاَنْتَ تُسْمِعُ الصُّمَّ وَلَوْ كَانُوا لَا يَعْقِلُونَ42
और उनमें बहुत-से ऐसे लोग है जो तेरी ओर कान लगाते है। किन्तु क्या तू बहरों को सुनाएगा, चाहे वे समझ न रखते हों?
وَمِنْهُمْ مَنْ يَنْظُرُ اِلَيْكَۜ اَفَاَنْتَ تَهْدِي الْعُمْيَ وَلَوْ كَانُوا لَا يُبْصِرُونَ43
और कुछ उनमें ऐसे हैं, जो तेरी ओर ताकते हैं, किन्तु क्या तू अंधों का मार्ग दिखाएगा, चाहे उन्हें कुछ सूझता न हो?
اِنَّ اللّٰهَ لَا يَظْلِمُ النَّاسَ شَيْـًٔا وَلٰكِنَّ النَّاسَ اَنْفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ44
अल्लाह तो लोगों पर तनिक भी अत्याचार नहीं करता, किन्तु लोग स्वयं ही अपने ऊपर अत्याचार करते है
وَيَوْمَ يَحْشُرُهُمْ كَاَنْ لَمْ يَلْبَثُٓوا اِلَّا سَاعَةً مِنَ النَّهَارِ يَتَعَارَفُونَ بَيْنَهُمْۜ قَدْ خَسِرَ الَّذ۪ينَ كَذَّبُوا بِلِقَٓاءِ اللّٰهِ وَمَا كَانُوا مُهْتَد۪ينَ45
जिस दिन वह उनको इकट्ठा करेगा तो ऐसा जान पड़ेगा जैसे वे दिन की एक घड़ी भर ठहरे थे। वे परस्पर एक-दूसरे को पहचानेंगे। वे लोग घाटे में पड़ गए, जिन्होंने अल्लाह से मिलने को झुठलाया और वे मार्ग न पा सके
وَاِمَّا نُرِيَنَّكَ بَعْضَ الَّذ۪ي نَعِدُهُمْ اَوْ نَتَوَفَّيَنَّكَ فَاِلَيْنَا مَرْجِعُهُمْ ثُمَّ اللّٰهُ شَه۪يدٌ عَلٰى مَا يَفْعَلُونَ46
जिस चीज़ का हम उनसे वादा करते है उसमें से कुछ चाहे तुझे दिखा दें या हम तुझे (इससे पहले) उठा लें, उन्हें तो हमारी ओर लौटकर आना ही है। फिर जो कुछ वे कर रहे है उसपर अल्लाह गवाह है
وَلِكُلِّ اُمَّةٍ رَسُولٌۚ فَاِذَا جَٓاءَ رَسُولُهُمْ قُضِيَ بَيْنَهُمْ بِالْقِسْطِ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ47
प्रत्येक समुदाय के लिए एक रसूल है। फिर जब उनके पास उनका रसूल आ जाता है तो उनके बीच न्यायपूर्वक फ़ैसला कर दिया जाता है। उनपर कुछ भी अत्याचार नहीं किया जाता
وَيَقُولُونَ مَتٰى هٰذَا الْوَعْدُ اِنْ كُنْتُمْ صَادِق۪ينَ48
वे कहते है, "यदि तुम सच्चे हो तो यह वादा कब पूरा होगा?"
قُلْ لَٓا اَمْلِكُ لِنَفْس۪ي ضَرًّا وَلَا نَفْعًا اِلَّا مَا شَٓاءَ اللّٰهُۜ لِكُلِّ اُمَّةٍ اَجَلٌۜ اِذَا جَٓاءَ اَجَلُهُمْ فَلَا يَسْتَاْخِرُونَ سَاعَةً وَلَا يَسْتَقْدِمُونَ49
कहो, "मुझे अपने लिए न तो किसी हानि का अधिकार प्राप्त है और न लाभ का, बल्कि अल्लाह जो चाहता है वही होता है। हर समुदाय के लिए एक नियत समय है, जब उनका नियत समय आ जाता है तो वे न घड़ी भर पीछे हट सकते है और न आगे बढ़ सकते है।"
قُلْ اَرَاَيْتُمْ اِنْ اَتٰيكُمْ عَذَابُهُ بَيَاتًا اَوْ نَهَارًا مَاذَا يَسْتَعْجِلُ مِنْهُ الْمُجْرِمُونَ50
कहो, "क्या तुमने यह भी सोचा कि यदि तुमपर उसकी यातना रातों रात या दिन को आ जाए तो (क्या तुम उसे टाल सकोगे?) वह आख़िर कौन-सी चीज़ होगी जिसके लिए अपराधियों को जल्दी पड़ी हुई है?
اَثُمَّ اِذَا مَا وَقَعَ اٰمَنْتُمْ بِه۪ۜ آٰلْـٰٔنَ وَقَدْ كُنْتُمْ بِه۪ تَسْتَعْجِلُونَ51
क्या फिर जब वह घटित हो जाएगी तब तुम उसे मानोगे? - क्या अब! इसी के लिए तो तुम जल्दी मचा रहे थे!"
ثُمَّ ق۪يلَ لِلَّذ۪ينَ ظَلَمُوا ذُوقُوا عَذَابَ الْخُلْدِۚ هَلْ تُجْزَوْنَ اِلَّا بِمَا كُنْتُمْ تَكْسِبُونَ52
"फिर अत्याचारी लोगों से कहा जाएगा, "स्थायी यातना का मज़ा चख़ो! जो कुछ तुम कमाते रहे हो, उसके सिवा तुम्हें और क्या बदला दिया जा सकता है?"
وَيَسْتَنْبِؤُ۫نَكَ اَحَقٌّ هُوَۜ قُلْ ا۪ي وَرَبّ۪ٓي اِنَّهُ لَحَقٌّ وَمَٓا اَنْتُمْ بِمُعْجِز۪ينَ۟53
वे तुम से चाहते है कि उन्हें ख़बर दो कि "क्या वह वास्तव में सत्य है?" कह दो, "हाँ, मेरे रब की क़सम! वह बिल्कुल सत्य है और तुम क़ाबू से बाहर निकल जानेवाले नहीं हो।"
وَلَوْ اَنَّ لِكُلِّ نَفْسٍ ظَلَمَتْ مَا فِي الْاَرْضِ لَافْتَدَتْ بِه۪ۜ وَاَسَرُّوا النَّدَامَةَ لَمَّا رَاَوُا الْعَذَابَۚ وَقُضِيَ بَيْنَهُمْ بِالْقِسْطِ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ54
यदि प्रत्येक अत्याचारी व्यक्ति के पास वह सब कुछ हो जो धरती में है, तो वह अर्थदंड के रूप में उसे दे डाले। जब वे यातना को देखेंगे तो मन ही मन में पछताएँगे। उनके बीच न्यायपूर्वक फ़ैसला कर दिया जाएगा और उनपर कोई अत्याचार न होगा
اَلَٓا اِنَّ لِلّٰهِ مَا فِي السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ اَلَٓا اِنَّ وَعْدَ اللّٰهِ حَقٌّ وَلٰكِنَّ اَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ55
सुन लो, जो कुछ आकाशों और धरती में है, अल्लाह ही का है। जान लो, निस्संदेह अल्लाह का वादा सच्चा है, किन्तु उनमें अधिकतर लोग जानते नहीं
هُوَ يُحْي۪ وَيُم۪يتُ وَاِلَيْهِ تُرْجَعُونَ56
वही जिलाता है और मारता है और उसी की ओर तुम लौटाए जा रहे हो
يَٓا اَيُّهَا النَّاسُ قَدْ جَٓاءَتْكُمْ مَوْعِظَةٌ مِنْ رَبِّكُمْ وَشِفَٓاءٌ لِمَا فِي الصُّدُورِ وَهُدًى وَرَحْمَةٌ لِلْمُؤْمِن۪ينَ57
ऐ लोगो! तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से उपदेश औऱ जो कुछ सीनों में (रोग) है, उसके लिए रोगमुक्ति और मोमिनों के लिए मार्गदर्शन और दयालुता आ चुकी है
قُلْ بِفَضْلِ اللّٰهِ وَبِرَحْمَتِه۪ فَبِذٰلِكَ فَلْيَفْرَحُواۜ هُوَ خَيْرٌ مِمَّا يَجْمَعُونَ58
कह दो, "यह अल्लाह के अनुग्रह और उसकी दया से है, अतः इस पर प्रसन्न होना चाहिए। यह उन सब चीज़ों से उत्तम है, जिनको वे इकट्ठा करने में लगे हुए है।"
قُلْ اَرَاَيْتُمْ مَٓا اَنْزَلَ اللّٰهُ لَكُمْ مِنْ رِزْقٍ فَجَعَلْتُمْ مِنْهُ حَرَامًا وَحَلَالًاۜ قُلْ آٰللّٰهُ اَذِنَ لَكُمْ اَمْ عَلَى اللّٰهِ تَفْتَرُونَ59
कह दो, "क्या तुम लोगों ने यह भी देखा कि जो रोज़ी अल्लाह ने तुम्हारे लिए उतारी है उसमें से तुमने स्वयं ही कुछ को हराम और हलाल ठहरा लिया?" कहो, "क्या अल्लाह ने तुम्हें इसकी अनुमति दी है या तुम अल्लाह पर झूठ घड़कर थोप रहे हो?"
وَمَا ظَنُّ الَّذ۪ينَ يَفْتَرُونَ عَلَى اللّٰهِ الْكَذِبَ يَوْمَ الْقِيٰمَةِۜ اِنَّ اللّٰهَ لَذُو فَضْلٍ عَلَى النَّاسِ وَلٰكِنَّ اَكْثَرَهُمْ لَا يَشْكُرُونَ۟60
जो लोग झूठ घड़कर उसे अल्लाह पर थोंपते है, उन्होंने क़ियामत के दिन के विषय में क्या समझ रखा है? अल्लाह तो लोगों के लिए बड़ा अनुग्रहवाला है, किन्तु उनमें अधिकतर कृतज्ञता नहीं दिखलाते
وَمَا تَكُونُ ف۪ي شَاْنٍ وَمَا تَتْلُوا مِنْهُ مِنْ قُرْاٰنٍ وَلَا تَعْمَلُونَ مِنْ عَمَلٍ اِلَّا كُنَّا عَلَيْكُمْ شُهُودًا اِذْ تُف۪يضُونَ ف۪يهِۜ وَمَا يَعْزُبُ عَنْ رَبِّكَ مِنْ مِثْقَالِ ذَرَّةٍ فِي الْاَرْضِ وَلَا فِي السَّمَٓاءِ وَلَٓا اَصْغَرَ مِنْ ذٰلِكَ وَلَٓا اَكْبَرَ اِلَّا ف۪ي كِتَابٍ مُب۪ينٍ61
तुम जिस दशा में भी होते हो और क़ुरआन से जो कुछ भी पढ़ते हो और तुम लोग जो काम भी करते हो हम तुम्हें देख रहे होते है, जब तुम उसमें लगे होते हो। और तुम्हारे रब से कण भर भी कोई चीज़ छिपी नहीं है, न धरती में न आकाश में और न उससे छोटी और न बड़ी कोई त चीज़ ऐसी है जो एक स्पष्ट किताब में मौजूद न हो
اَلَٓا اِنَّ اَوْلِيَٓاءَ اللّٰهِ لَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَۚ62
सुन लो, अल्लाह के मित्रों को न तो कोई डर है और न वे शोकाकुल ही होंगे
اَلَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَكَانُوا يَتَّقُونَۜ63
ये वे लोग है जो ईमान लाए और डर कर रहे
لَهُمُ الْبُشْرٰى فِي الْحَيٰوةِ الدُّنْيَا وَفِي الْاٰخِرَةِۜ لَا تَبْد۪يلَ لِكَلِمَاتِ اللّٰهِۜ ذٰلِكَ هُوَ الْفَوْزُ الْعَظ۪يمُۜ64
उनके लिए सांसारिक जीवन में भी शुभ-सूचना है और आख़िरत में भी - अल्लाह के शब्द बदलते नहीं - यही बड़ी सफलता है
وَلَا يَحْزُنْكَ قَوْلُهُمْۢ اِنَّ الْعِزَّةَ لِلّٰهِ جَم۪يعًاۜ هُوَ السَّم۪يعُ الْعَل۪يمُ65
उनकी बात तुम्हें दुखी न करे, सारा प्रभुत्व अल्लाह ही के लिए है, वह सुनता, जानता है
اَلَٓا اِنَّ لِلّٰهِ مَنْ فِي السَّمٰوَاتِ وَمَنْ فِي الْاَرْضِۜ وَمَا يَتَّبِعُ الَّذ۪ينَ يَدْعُونَ مِنْ دُونِ اللّٰهِ شُرَكَٓاءَۜ اِنْ يَتَّبِعُونَ اِلَّا الظَّنَّ وَاِنْ هُمْ اِلَّا يَخْرُصُونَ66
जान रखो! जो कोई भी आकाशों में है और जो कोई धरती में है, अल्लाह ही का है। जो लोग अल्लाह को छोड़कर दूसरे साझीदारों को पुकारते है, वे आखिर किसका अनुसरण करते है? वे तो केवल अटकल पर चलते है और वे निरे अटकले दौड़ाते है
هُوَ الَّذ۪ي جَعَلَ لَكُمُ الَّيْلَ لِتَسْكُنُوا ف۪يهِ وَالنَّهَارَ مُبْصِرًاۜ اِنَّ ف۪ي ذٰلِكَ لَاٰيَاتٍ لِقَوْمٍ يَسْمَعُونَ67
वही है जिसने तुम्हारे लिए रात बनाई ताकि तुम उसमें चैन पाओ और दिन को प्रकाशमान बनाया (ताकि तुम उसमें दौड़-धूप कर सको); निस्संदेह इसमें उन लोगों के लिए निशानियाँ है, जो सुनते है
قَالُوا اتَّخَذَ اللّٰهُ وَلَدًا سُبْحَانَهُۜ هُوَ الْغَنِيُّۜ لَهُ مَا فِي السَّمٰوَاتِ وَمَا فِي الْاَرْضِۜ اِنْ عِنْدَكُمْ مِنْ سُلْطَانٍ بِهٰذَاۜ اَتَقُولُونَ عَلَى اللّٰهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ68
वे कहते है, "अल्लाह औलाद रखता है।" महान और उच्च है वह! वह निरपेक्ष है, आकाशों और धरती में जो कुछ है उसी का है। तुम्हारे पास इसका कोई प्रमाण नहीं। क्या तुम अल्लाह से जोड़कर वह बाते कहते हो, जिसका तुम्हे ज्ञान नही?
قُلْ اِنَّ الَّذ۪ينَ يَفْتَرُونَ عَلَى اللّٰهِ الْكَذِبَ لَا يُفْلِحُونَۜ69
कह दो, "जो लोग अल्लाह पर थोपकर झूठ घड़ते है, वे सफल नहीं होते।"
مَتَاعٌ فِي الدُّنْيَا ثُمَّ اِلَيْنَا مَرْجِعُهُمْ ثُمَّ نُذ۪يقُهُمُ الْعَذَابَ الشَّد۪يدَ بِمَا كَانُوا يَكْفُرُونَ۟70
यह तो सांसारिक सुख है। फिर हमारी ओर ही उन्हें लौटना है, फिर जो इनकार वे करते रहे होगे उसके बदले में हम उन्हें कठोर यातना का मज़ा चखाएँगे
وَاتْلُ عَلَيْهِمْ نَبَاَ نُوحٍۢ اِذْ قَالَ لِقَوْمِه۪ يَا قَوْمِ اِنْ كَانَ كَبُرَ عَلَيْكُمْ مَقَام۪ي وَتَذْك۪ير۪ي بِاٰيَاتِ اللّٰهِ فَعَلَى اللّٰهِ تَوَكَّلْتُ فَاَجْمِعُٓوا اَمْرَكُمْ وَشُرَكَٓاءَكُمْ ثُمَّ لَا يَكُنْ اَمْرُكُمْ عَلَيْكُمْ غُمَّةً ثُمَّ اقْضُٓوا اِلَيَّ وَلَا تُنْظِرُونِ71
उन्हें नूह का वृत्तान्त सुनाओ। जब उसने अपनी क़ौम से कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यदि मेरा खड़ा होना और अल्लाह की आयतों के द्वारा नसीहत करना तुम्हें भारी हो गया है तो मेरा भरोसा अल्लाह पर है। तु अपना मामला ठहरा लो और अपने ठहराए हुए साझीदारों को भी साथ ले लो, फिर तुम्हारा मामला तुम पर कुछ संदिग्ध न रहे; फिर मेरे साथ जो कुछ करना है, कर डालों और मुझे मुहलत न दो।"
فَاِنْ تَوَلَّيْتُمْ فَمَا سَاَلْتُكُمْ مِنْ اَجْرٍۜ اِنْ اَجْرِيَ اِلَّا عَلَى اللّٰهِۙ وَاُمِرْتُ اَنْ اَكُونَ مِنَ الْمُسْلِم۪ينَ72
फिर यदि तुम मुँह फेरोगे तो मैंने तुमसे कोई बदला नहीं माँगा। मेरा बदला (पारिश्रामिक) बस अल्लाह के ज़िम्मे है, और आदेश मुझे मुस्लिम (आज्ञाकारी) होने का हुआ है
فَكَذَّبُوهُ فَنَجَّيْنَاهُ وَمَنْ مَعَهُ فِي الْفُلْكِ وَجَعَلْنَاهُمْ خَلَٓائِفَ وَاَغْرَقْنَا الَّذ۪ينَ كَذَّبُوا بِاٰيَاتِنَاۚ فَانْظُرْ كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الْمُنْذَر۪ينَ73
किन्तु उन्होंने झूठला दिया, तो हमने उसे और उन लोगों को, जो उनके साथ नौका में थे, बचा लिया और उन्हें उतराधिकारी बनाया, और उन लोगो को डूबो दिया, जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया था। अतः देख लो, जिन्हें सचेत किया गया था उनका क्या परिणाम हुआ!
ثُمَّ بَعَثْنَا مِنْ بَعْدِه۪ رُسُلًا اِلٰى قَوْمِهِمْ فَجَٓاؤُ۫هُمْ بِالْبَيِّنَاتِ فَمَا كَانُوا لِيُؤْمِنُوا بِمَا كَذَّبُوا بِه۪ مِنْ قَبْلُۜ كَذٰلِكَ نَطْبَعُ عَلٰى قُلُوبِ الْمُعْتَد۪ينَ74
फिर उसके बाद कितने ही रसूल हमने उनकी क़ौम की ओर भेजे और वे उनके पास स्पष्ट निशानियां लेकर आए, किन्तु वे ऐसे न थे कि जिसको पहले झुठला चुके हॊं, उसे मानते। इसी तरह अतिक्रमणकारियों कॆ दिलों पर हम मुहर लगा देते हैं
ثُمَّ بَعَثْنَا مِنْ بَعْدِهِمْ مُوسٰى وَهٰرُونَ اِلٰى فِرْعَوْنَ وَمَلَا۬ئِه۪ بِاٰيَاتِنَا فَاسْتَكْبَرُوا وَكَانُوا قَوْمًا مُجْرِم۪ينَ75
फिर उनके बाद हमने मूसा और हारून को अपनी आयतों के साथ फ़िरऔन और उसके सरदारों के पास भेजा। किन्तु उन्होंने घमंड किया, वे थे ही अपराधी लोग
فَلَمَّا جَٓاءَهُمُ الْحَقُّ مِنْ عِنْدِنَا قَالُٓوا اِنَّ هٰذَا لَسِحْرٌ مُب۪ينٌ76
अतः जब हमारी ओर से सत्य उनके सामने आया तो वे कहने लगे, "यह तो खुला जादू है।"
قَالَ مُوسٰٓى اَتَقُولُونَ لِلْحَقِّ لَمَّا جَٓاءَكُمْۜ اَسِحْرٌ هٰذَاۜ وَلَا يُفْلِحُ السَّاحِرُونَ77
मूसा ने कहा, "क्या तुम सत्य के विषय में ऐसा कहते हो, जबकि यह तुम्हारे सामने आ गया है? क्या यह कोई जादू है? जादूगर तो सफल नहीं हुआ करते।"
قَالُٓوا اَجِئْتَنَا لِتَلْفِتَنَا عَمَّا وَجَدْنَا عَلَيْهِ اٰبَٓاءَنَا وَتَكُونَ لَكُمَا الْكِبْرِيَٓاءُ فِي الْاَرْضِۜ وَمَا نَحْنُ لَكُمَا بِمُؤْمِن۪ينَ78
उन्होंने कहा, "क्या तू हमारे पास इसलिए आया है कि हमें उस चीज़ से फेर दे जिसपर हमने अपना बाप-दादा का पाया है और धरती में तुम दोनों की बड़ाई स्थापित हो जाए? हम तो तुम्हें माननेवाले नहीं।"
وَقَالَ فِرْعَوْنُ ائْتُون۪ي بِكُلِّ سَاحِرٍ عَل۪يمٍ79
फ़िरऔन ने कहा, "हर कुशल जादूगर को मेरे पास लाओ।"
فَلَمَّا جَٓاءَ السَّحَرَةُ قَالَ لَهُمْ مُوسٰٓى اَلْقُوا مَٓا اَنْتُمْ مُلْقُونَ80
फिर जब जादूगर आ गए तो मूसा ने उनसे कहा, "जो कुछ तुम डालते हो, डालो।"
فَلَمَّٓا اَلْقَوْا قَالَ مُوسٰى مَا جِئْتُمْ بِهِ السِّحْرُۜ اِنَّ اللّٰهَ سَيُبْطِلُهُۜ اِنَّ اللّٰهَ لَا يُصْلِحُ عَمَلَ الْمُفْسِد۪ينَ81
फिर जब उन्होंने डाला तो मूसा ने कहा, "तुम जो कुछ लाए हो, जादू है। अल्लाह अभी उसे मटियामेट किए देता है। निस्संदेह अल्लाह बिगाड़ पैदा करनेवालों के कर्म को फलीभूत नहीं होने देता
وَيُحِقُّ اللّٰهُ الْحَقَّ بِكَلِمَاتِه۪ وَلَوْ كَرِهَ الْمُجْرِمُونَ۟82
"अल्लाह अपने शब्दों से सत्य को सत्य कर दिखाता है, चाहे अपराधी नापसन्द ही करें।"
فَمَٓا اٰمَنَ لِمُوسٰٓى اِلَّا ذُرِّيَّةٌ مِنْ قَوْمِه۪ عَلٰى خَوْفٍ مِنْ فِرْعَوْنَ وَمَلَا۬ئِهِمْ اَنْ يَفْتِنَهُمْۜ وَاِنَّ فِرْعَوْنَ لَعَالٍ فِي الْاَرْضِۚ وَاِنَّهُ لَمِنَ الْمُسْرِف۪ينَ83
फिर मूसा की बात उसकी क़ौम की संतति में से बस कुछ ही लोगों ने मानी; फ़िरऔन और उनके सरदारों के भय से कि कहीं उन्हें किसी फ़ितने में न डाल दें। फ़िरऔन था भी धरती में बहुत सिर उठाए हुए, औऱ निश्चय ही वह हद से आगे बढ़ गया था
وَقَالَ مُوسٰى يَا قَوْمِ اِنْ كُنْتُمْ اٰمَنْتُمْ بِاللّٰهِ فَعَلَيْهِ تَوَكَّلُٓوا اِنْ كُنْتُمْ مُسْلِم۪ينَ84
मूसा ने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यदि तुम अल्लाह पर ईमान रखते हो तो उसपर भरोसा करो, यदि तुम आज्ञाकारी हो।"
فَقَالُوا عَلَى اللّٰهِ تَوَكَّلْنَاۚ رَبَّنَا لَا تَجْعَلْنَا فِتْنَةً لِلْقَوْمِ الظَّالِم۪ينَۙ85
इसपर वे बोले, "हमने अल्लाह पर भरोसा किया। ऐ हमारे रब! तू हमें अत्याचारी लोगों के हाथों आज़माइश में न डाल
وَنَجِّنَا بِرَحْمَتِكَ مِنَ الْقَوْمِ الْكَافِر۪ينَ86
"और अपनी दयालुता से हमें इनकार करनेवालों से छुटकारा दिया।"
وَاَوْحَيْنَٓا اِلٰى مُوسٰى وَاَخ۪يهِ اَنْ تَبَوَّاٰ لِقَوْمِكُمَا بِمِصْرَ بُيُوتًا وَاجْعَلُوا بُيُوتَكُمْ قِبْلَةً وَاَق۪يمُوا الصَّلٰوةَۜ وَبَشِّرِ الْمُؤْمِن۪ينَ87
हमने मूसा और उसके भाई की ओर प्रकाशना की कि "तुम दोनों अपने लोगों के लिए मिस्र में कुछ घर निश्चित कर लो औऱ अपने घरों को क़िबला बना लो। और नमाज़ क़ायम करो और ईमानवालों को शुभसूचना दे दो।"
وَقَالَ مُوسٰى رَبَّنَٓا اِنَّكَ اٰتَيْتَ فِرْعَوْنَ وَمَلَاَهُ ز۪ينَةً وَاَمْوَالًا فِي الْحَيٰوةِ الدُّنْيَاۙ رَبَّنَا لِيُضِلُّوا عَنْ سَب۪يلِكَۚ رَبَّنَا اطْمِسْ عَلٰٓى اَمْوَالِهِمْ وَاشْدُدْ عَلٰى قُلُوبِهِمْ فَلَا يُؤْمِنُوا حَتّٰى يَرَوُا الْعَذَابَ الْاَل۪يمَ88
मूसा ने कहा, "हमारे रब! तूने फ़िरऔन और उसके सरदारों को सांसारिक जीवन में शोभा-सामग्री और धन दिए है, हमारे रब, इसलिए कि वे तेरे मार्ग से भटकाएँ! हमारे रब, उनके धन नष्ट कर दे और उनके हृदय कठोर कर दे कि वे ईमान न लाएँ, ताकि वे दुखद यातना देख लें।"
قَالَ قَدْ اُج۪يبَتْ دَعْوَتُكُمَا فَاسْتَق۪يمَا وَلَا تَتَّبِعَٓانِّ سَب۪يلَ الَّذ۪ينَ لَا يَعْلَمُونَ89
कहा, "तुम दोनों की प्रार्थना स्वीकृत हो चुकी। अतः तुम दोनों जमें रहो और उन लोगों के मार्ग पर कदापि न चलना, जो जानते नहीं।"
وَجَاوَزْنَا بِبَن۪ٓي إِسْرَٓاء۪يلَ الْبَحْرَ فَاَتْبَعَهُمْ فِرْعَوْنُ وَجُنُودُهُ بَغْيًا وَعَدْوًاۜ حَتّٰٓى اِذَٓا اَدْرَكَهُ الْغَرَقُۙ قَالَ اٰمَنْتُ اَنَّهُ لَٓا اِلٰهَ اِلَّا الَّذ۪ٓي اٰمَنَتْ بِه۪ بَنُٓوا اِسْرَٓاء۪يلَ وَاَنَا۬ مِنَ الْمُسْلِم۪ينَ90
और हमने इसराईलियों को समुद्र पार करा दिया। फिर फ़िरऔन और उसकी सेनाओं ने सरकशी और ज़्यादती के साथ उनका पीछा किया, यहाँ तक कि जब वह डूबने लगा तो पुकार उठा, "मैं ईमान ले आया कि उसके सिव कोई पूज्य-प्रभु नही, जिस पर इसराईल की सन्तान ईमान लाई। अब मैं आज्ञाकारी हूँ।"
آٰلْـٰٔنَ وَقَدْ عَصَيْتَ قَبْلُ وَكُنْتَ مِنَ الْمُفْسِد۪ينَ91
"क्या अब? हालाँकि इससे पहले तुने अवज्ञा की और बिगाड़ पैदा करनेवालों में से था
فَالْيَوْمَ نُنَجّ۪يكَ بِبَدَنِكَ لِتَكُونَ لِمَنْ خَلْفَكَ اٰيَةًۜ وَاِنَّ كَث۪يرًا مِنَ النَّاسِ عَنْ اٰيَاتِنَا لَغَافِلُونَ۟92
"अतः आज हम तेरे शरीर को बचा लेगें, ताकि तू अपने बादवालों के लिए एक निशानी हो जाए। निश्चय ही, बहुत-से लोग हमारी निशानियों के प्रति असावधान ही रहते है।"
وَلَقَدْ بَوَّاْنَا بَن۪ٓي اِسْرَٓاء۪يلَ مُبَوَّاَ صِدْقٍ وَرَزَقْنَاهُمْ مِنَ الطَّيِّبَاتِۚ فَمَا اخْتَلَفُوا حَتّٰى جَٓاءَهُمُ الْعِلْمُۜ اِنَّ رَبَّكَ يَقْض۪ي بَيْنَهُمْ يَوْمَ الْقِيٰمَةِ ف۪يمَا كَانُوا ف۪يهِ يَخْتَلِفُونَ93
और हमने इसराईल की सन्तान को अच्छा, सम्मानित ठिकाना दिया औ उन्हें अच्छी आजीविका प्रदान की। फिर उन्होंने उस समय विभेद किया, जबकि ज्ञान उनके पास आ चुका था। निश्चय ही तुम्हारा रब क़ियामत के दिन उनके बीच उस चीज़ का फ़ैसला कर देगा, जिसमें वे विभेद करते रहे है
فَاِنْ كُنْتَ ف۪ي شَكٍّ مِمَّٓا اَنْزَلْنَٓا اِلَيْكَ فَسْـَٔلِ الَّذ۪ينَ يَقْرَؤُ۫نَ الْكِتَابَ مِنْ قَبْلِكَۚ لَقَدْ جَٓاءَكَ الْحَقُّ مِنْ رَبِّكَ فَلَا تَكُونَنَّ مِنَ الْمُمْتَر۪ينَۙ94
अतः यदि तुम्हें उस चीज़ के बारे में कोई संदेह हो, जो हमने तुम्हारी ओर अवतरित की है, तो उनसे पूछ लो जो तुमसे पहले से किताब पढ़ रहे है। तुम्हारे पास तो तुम्हारे रब की ओर से सत्य आ चुका। अतः तुम कदापि सन्देह करनेवाले न हो
وَلَا تَكُونَنَّ مِنَ الَّذ۪ينَ كَذَّبُوا بِاٰيَاتِ اللّٰهِ فَتَكُونَ مِنَ الْخَاسِر۪ينَ95
और न उन लोगों में सम्मिलित होना जिन्होंन अल्लाह की आयतों को झुठलाया, अन्यथा तुम घाटे में पड़कर रहोगे
اِنَّ الَّذ۪ينَ حَقَّتْ عَلَيْهِمْ كَلِمَتُ رَبِّكَ لَا يُؤْمِنُونَۙ96
निस्संदेह जिन लोगों के विषय में तुम्हारे रब की बात सच्ची होकर रही वे ईमान नहीं लाएँगे,
وَلَوْ جَٓاءَتْهُمْ كُلُّ اٰيَةٍ حَتّٰى يَرَوُا الْعَذَابَ الْاَل۪يمَ97
जब तक के वे दुखद यातना न देख लें, चाहे प्रत्येक निशानी उनके पास आ जाए
فَلَوْلَا كَانَتْ قَرْيَةٌ اٰمَنَتْ فَنَفَعَهَٓا ا۪يمَانُهَٓا اِلَّا قَوْمَ يُونُسَۜ لَمَّٓا اٰمَنُوا كَشَفْنَا عَنْهُمْ عَذَابَ الْخِزْيِ فِي الْحَيٰوةِ الدُّنْيَا وَمَتَّعْنَاهُمْ اِلٰى ح۪ينٍ98
फिर ऐसी कोई बस्ती क्यों न हुई कि वह ईमान लाती और उसका ईमान उसके लिए लाभप्रद सिद्ध होता? हाँ, यूनुस की क़ौम के लोग इसके लिए अपवाद है। जब वे ईमान लाए तो हमने सांसारिक जीवन में अपमानजनक यातना को उनपर से टाल दिया और उन्हें एक अवधि तक सुखोपभोग का अवसर प्रदान किया
وَلَوْ شَٓاءَ رَبُّكَ لَاٰمَنَ مَنْ فِي الْاَرْضِ كُلُّهُمْ جَم۪يعًاۜ اَفَاَنْتَ تُكْرِهُ النَّاسَ حَتّٰى يَكُونُوا مُؤْمِن۪ينَ99
यदि तुम्हारा रब चाहता तो धरती में जितने लोग है वे सब के सब ईमान ले आते, फिर क्या तुम लोगों को विवश करोगे कि वे मोमिन हो जाएँ?
وَمَا كَانَ لِنَفْسٍ اَنْ تُؤْمِنَ اِلَّا بِاِذْنِ اللّٰهِۜ وَيَجْعَلُ الرِّجْسَ عَلَى الَّذ۪ينَ لَا يَعْقِلُونَ100
हालाँकि किसी व्यक्ति के लिए यह सम्भव नहीं कि अल्लाह की अनुज्ञा के बिना कोई क्यक्ति ईमान लाए। वह तो उन लोगों पर गन्दगी डाल देता है, जो बुद्धि से काम नहीं लेते
قُلِ انْظُرُوا مَاذَا فِي السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ وَمَا تُغْنِي الْاٰيَاتُ وَالنُّذُرُ عَنْ قَوْمٍ لَا يُؤْمِنُونَ101
कहो, "देख लो, आकाशों और धरती में क्या कुछ है!" किन्तु निशानियाँ और चेतावनियाँ उन लोगों के कुछ काम नहीं आती, जो ईमान न लाना चाहें
فَهَلْ يَنْتَظِرُونَ اِلَّا مِثْلَ اَيَّامِ الَّذ۪ينَ خَلَوْا مِنْ قَبْلِهِمْۜ قُلْ فَانْتَظِرُٓوا اِنّ۪ي مَعَكُمْ مِنَ الْمُنْتَظِر۪ينَ102
अतः वे तो उस तरह के दिन की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जिस तरह के दिन वे लोग देख चुके है जो उनसे पहले गुज़रे है। कह दो, "अच्छा, प्रतीक्षा करो, मैं भी तुम्हारे साथ प्रतीक्षा करता हूँ।"
ثُمَّ نُنَجّ۪ي رُسُلَنَا وَالَّذ۪ينَ اٰمَنُوا كَذٰلِكَۚ حَقًّا عَلَيْنَا نُنْجِ الْمُؤْمِن۪ينَ۟103
फिर हम अपने रसूलों और उन लोगों को बचा लेते रहे हैं, जो ईमान ले आए। ऐसी ही हमारी रीति है, हमपर यह हक़ है कि ईमानवालों को बचा लें
قُلْ يَٓا اَيُّهَا النَّاسُ اِنْ كُنْتُمْ ف۪ي شَكٍّ مِنْ د۪ين۪ي فَلَٓا اَعْبُدُ الَّذ۪ينَ تَعْبُدُونَ مِنْ دُونِ اللّٰهِ وَلٰكِنْ اَعْبُدُ اللّٰهَ الَّذ۪ي يَتَوَفّٰيكُمْۚ وَاُمِرْتُ اَنْ اَكُونَ مِنَ الْمُؤْمِن۪ينَۙ104
कह दो, "ऐ लोगों! यदि तुम मेरे धर्म के विषय में किसी सन्देह में हो तो मैं तो उनकी बन्दगी नहीं करता जिनकी तुम अल्लाह से हटकर बन्दगी करते हो, बल्कि मैं उस अल्लाह की बन्दगी करता हूँ जो तुम्हें मृत्यु देता है। और मुझे आदेश है कि मैं ईमानवालों में से होऊँ
وَاَنْ اَقِمْ وَجْهَكَ لِلدّ۪ينِ حَن۪يفًاۚ وَلَا تَكُونَنَّ مِنَ الْمُشْرِك۪ينَ105
और यह कि हर ओर से एकाग्र होकर अपना रुख़ इस धर्म की ओर कर लो और मुशरिक़ों में कदापि सम्मिलित न हो,
وَلَا تَدْعُ مِنْ دُونِ اللّٰهِ مَا لَا يَنْفَعُكَ وَلَا يَضُرُّكَۚ فَاِنْ فَعَلْتَ فَاِنَّكَ اِذًا مِنَ الظَّالِم۪ينَ106
और अल्लाह से हटकर उसे न पुकारो जो न तुम्हें लाभ पहुँचाए और न तुम्हें हानि पहुँचा सके और न तुम्हारा बुरा कर सके, क्योंकि यदि तुमने ऐसा किया तो उस समय तुम अत्याचारी होगे
وَاِنْ يَمْسَسْكَ اللّٰهُ بِضُرٍّ فَلَا كَاشِفَ لَهُٓ اِلَّا هُوَۚ وَاِنْ يُرِدْكَ بِخَيْرٍ فَلَا رَٓادَّ لِفَضْلِه۪ۜ يُص۪يبُ بِه۪ مَنْ يَشَٓاءُ مِنْ عِبَادِه۪ۜ وَهُوَ الْغَفُورُ الرَّح۪يمُ107
यदि अल्लाह तुम्हें किसी तकलीफ़ में डाल दे तो उसके सिवा कोई उसे दूर करनेवाला नहीं। और यदि वह तुम्हारे लिए किसी भलाई का इरादा कर ले तो कोई उसके अनुग्रह को फेरनेवाला भी नहीं। वह इसे अपने बन्दों में से जिस तक चाहता है, पहुँचाता है और वह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है।"
قُلْ يَٓا اَيُّهَا النَّاسُ قَدْ جَٓاءَكُمُ الْحَقُّ مِنْ رَبِّكُمْۚ فَمَنِ اهْتَدٰى فَاِنَّمَا يَهْتَد۪ي لِنَفْسِه۪ۚ وَمَنْ ضَلَّ فَاِنَّمَا يَضِلُّ عَلَيْهَاۚ وَمَٓا اَنَا۬ عَلَيْكُمْ بِوَك۪يلٍۜ108
कह दो, "ऐ लोगों! तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से सत्य आ चुका है। अब जो कोई मार्ग पर आएगा, तो वह अपने ही लिए मार्ग पर आएगा, और जो कोई पथभ्रष्ट होगा तो वह अपने ही बुरे के लिए पथभ्रष्टि होगा। मैं तुम्हारे ऊपर कोई हवालेदार तो हूँ नहीं।"
وَاتَّبِعْ مَا يُوحٰٓى اِلَيْكَ وَاصْبِرْ حَتّٰى يَحْكُمَ اللّٰهُۚ وَهُوَ خَيْرُ الْحَاكِم۪ينَ109
जो कुछ तुमपर प्रकाशना की जा रही है, उसका अनुसरण करो और धैर्य से काम लो, यहाँ तक कि अल्लाह फ़ैसला कर दे, और वह सबसे अच्छा फ़ैसला करनेवाला है
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
الٓرٰ۠ كِتَابٌ اُحْكِمَتْ اٰيَاتُهُ ثُمَّ فُصِّلَتْ مِنْ لَدُنْ حَك۪يمٍ خَب۪يرٍۙ1
अलिफ़॰ लाम॰ रा॰। यह एक किताब है जिसकी आयतें पक्की है, फिर सविस्तार बयान हुई हैं; उसकी ओर से जो अत्यन्त तत्वदर्शी, पूरी ख़बर रखनेवाला है
اَلَّا تَعْبُدُٓوا اِلَّا اللّٰهَۜ اِنَّن۪ي لَكُمْ مِنْهُ نَذ۪يرٌ وَبَش۪يرٌۙ2
कि "तुम अल्लाह के सिवा किसी की बन्दगी न करो। मैं तो उसकी ओर से तुम्हें सचेत करनेवाला और शुभ सूचना देनेवाला हूँ।"
وَاَنِ اسْتَغْفِرُوا رَبَّكُمْ ثُمَّ تُوبُٓوا اِلَيْهِ يُمَتِّعْكُمْ مَتَاعًا حَسَنًا اِلٰٓى اَجَلٍ مُسَمًّى وَيُؤْتِ كُلَّ ذ۪ي فَضْلٍ فَضْلَهُۜ وَاِنْ تَوَلَّوْا فَاِنّ۪ٓي اَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ كَب۪يرٍ3
और यह कि "अपने रब से क्षमा माँगो, फिर उसकी ओर पलट आओ। वह तुम्हें एक निश्चित अवधि तक सुखोपभोग की उत्तम सामग्री प्रदान करेगा। और बढ़-बढ़कर कर्म करनेवालों पर वह तदधिक अपना अनुग्रह करेगा, किन्तु यदि तुम मुँह फेरते हो तो निश्चय ही मुझे तुम्हारे विषय में एक बड़े दिन की यातना का भय है
اِلَى اللّٰهِ مَرْجِعُكُمْۚ وَهُوَ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَد۪يرٌ4
तुम्हें अल्लाह ही की ओर पलटना है, और उसे हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है।"
اَلَٓا اِنَّهُمْ يَثْنُونَ صُدُورَهُمْ لِيَسْتَخْفُوا مِنْهُۜ اَلَا ح۪ينَ يَسْتَغْشُونَ ثِيَابَهُمْۙ يَعْلَمُ مَا يُسِرُّونَ وَمَا يُعْلِنُونَۚ اِنَّهُ عَل۪يمٌ بِذَاتِ الصُّدُورِ5
देखो! ये अपने सीनों को मोड़ते है, चाहिए कि उससे छिपें। देखों! जब ये अपने कपड़ों से स्वयं को ढाँकते है, वह जानता है जो कुछ वे छिपाते है और जो कुछ वे प्रकट करते है। निस्संदेह वह सीनों तक की बात को जानता है