12. जुज़ - कुरान पढ़ें

12. जुज़
11 · हूद
وَمَا مِنْ دَٓابَّةٍ فِي الْاَرْضِ اِلَّا عَلَى اللّٰهِ رِزْقُهَا وَيَعْلَمُ مُسْتَقَرَّهَا وَمُسْتَوْدَعَهَاۜ كُلٌّ ف۪ي كِتَابٍ مُب۪ينٍ6
धरती में चलने-फिरनेवाला जो प्राणी भी है उसकी रोज़ी अल्लाह के ज़िम्मे है। वह जानता है जहाँ उसे ठहरना है और जहाँ उसे सौपा जाना है। सब कुछ एक स्पष्ट किताब में मौजूद है
وَهُوَ الَّذ۪ي خَلَقَ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضَ ف۪ي سِتَّةِ اَيَّامٍ وَكَانَ عَرْشُهُ عَلَى الْمَٓاءِ لِيَبْلُوَكُمْ اَيُّكُمْ اَحْسَنُ عَمَلًاۜ وَلَئِنْ قُلْتَ اِنَّكُمْ مَبْعُوثُونَ مِنْ بَعْدِ الْمَوْتِ لَيَقُولَنَّ الَّذ۪ينَ كَفَرُٓوا اِنْ هٰذَٓا اِلَّا سِحْرٌ مُب۪ينٌ7
वही है जिसने आकाशों और धरती को छः दिनों में पैदा किया - उसका सिंहासन पानी पर था - ताकि वह तुम्हारी परीक्षा ले कि तुममें कर्म की स्पष्ट से कौन सबसे अच्छा है। और यदि तुम कहो कि "मरने के पश्चात तुम अवश्य उठोगे।" तो जिन्हें इनकार है, वे कहने लगेंगे, "यह तो खुला जादू है।"
وَلَئِنْ اَخَّرْنَا عَنْهُمُ الْعَذَابَ اِلٰٓى اُمَّةٍ مَعْدُودَةٍ لَيَقُولُنَّ مَا يَحْبِسُهُۜ اَلَا يَوْمَ يَاْت۪يهِمْ لَيْسَ مَصْرُوفًا عَنْهُمْ وَحَاقَ بِهِمْ مَا كَانُوا بِه۪ يَسْتَهْزِؤُ۫نَ۟8
यदि हम एक निश्चित अवधि तक के लिए उनसे यातना को टाले रखें, तो वे कहने लगेंगे, "आख़िर किस चीज़ ने उसे रोक रखा है?" सुन लो! जिन दिन वह उनपर आ जाएगी तो फिर वह उनपर से टाली नहीं जाएगी। और वही चीज़ उन्हें घेर लेगी जिसका वे उपहास करते है
وَلَئِنْ اَذَقْنَا الْاِنْسَانَ مِنَّا رَحْمَةً ثُمَّ نَزَعْنَاهَا مِنْهُۚ اِنَّهُ لَيَؤُ۫سٌ كَفُورٌ9
यदि हम मनुष्य को अपनी दयालुता का रसास्वादन कराकर फिर उसको छीन लॆं, तॊ (वह दयालुता कॆ लिए याचना नहीं करता) निश्चय ही वह निराशावादी, कृतघ्न है
وَلَئِنْ اَذَقْنَاهُ نَعْمَٓاءَ بَعْدَ ضَرَّٓاءَ مَسَّتْهُ لَيَقُولَنَّ ذَهَبَ السَّيِّـَٔاتُ عَنّ۪يۜ اِنَّهُ لَفَرِحٌ فَخُورٌۙ10
और यदि हम इसके पश्चात कि उसे तकलीफ़ पहुँची हो, उसे नेमत का रसास्वादन कराते है तो वह कहने लगता है, "मेरे तो सारे दुख दूर हो गए।" वह तो फूला नहीं समाता, डींगे मारने लगता है
اِلَّا الَّذ۪ينَ صَبَرُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِۜ اُو۬لٰٓئِكَ لَهُمْ مَغْفِرَةٌ وَاَجْرٌ كَب۪يرٌ11
उनकी बात दूसरी है जिन्होंने धैर्य से काम लिया और सत्कर्म किए। वही है जिनके लिए क्षमा और बड़ा प्रतिदान है
فَلَعَلَّكَ تَارِكٌ بَعْضَ مَا يُوحٰٓى اِلَيْكَ وَضَٓائِقٌ بِه۪ صَدْرُكَ اَنْ يَقُولُوا لَوْلَٓا اُنْزِلَ عَلَيْهِ كَنْزٌ اَوْ جَٓاءَ مَعَهُ مَلَكٌۜ اِنَّمَٓا اَنْتَ نَذ۪يرٌۜ وَاللّٰهُ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ وَك۪يلٌۜ12
तो शायद तुम उसमें से कुछ छोड़ बैठोगे, जो तुम्हारी ओर प्रकाशना रूप में भेजी जा रही है। और तुम इस बात पर तंगदिल हो रहे हो कि वे कहते है, "उसपर कोई ख़ज़ाना क्यों नहीं उतरा या उसके साथ कोई फ़रिश्ता क्यों नहीं आया?" तुम तो केवल सचेत करनेवाले हो। हर चीज़ अल्लाह ही के हवाले है
اَمْ يَقُولُونَ افْتَرٰيهُۜ قُلْ فَاْتُوا بِعَشْرِ سُوَرٍ مِثْلِه۪ مُفْتَرَيَاتٍ وَادْعُوا مَنِ اسْتَطَعْتُمْ مِنْ دُونِ اللّٰهِ اِنْ كُنْتُمْ صَادِق۪ينَ13
(उन्हें कोई शंका है) या वे कहते है कि "उसने इसे स्वयं घड़ लिया है?" कह दो, "अच्छा, यदि तुम सच्चे हो तो इस जैसी घड़ी हुई दस सूरतें ले आओ और अल्लाह से हटकर जिस किसी को बुला सकते हो बुला लो।"
فَاِلَّمْ يَسْتَج۪يبُوا لَكُمْ فَاعْلَمُٓوا اَنَّمَٓا اُنْزِلَ بِعِلْمِ اللّٰهِ وَاَنْ لَٓا اِلٰهَ اِلَّا هُوَۚ فَهَلْ اَنْتُمْ مُسْلِمُونَ14
फिर यदि वे तुम्हारी बातें न मानें तो जान लो, यह अल्लाह के ज्ञान ही के साथ अवतरित हुआ है। और यह कि उसके सिवा कोई पूज्य-प्रभु नहीं। तो अब क्या तुम मुस्लिम (आज्ञाकारी) होते हो?
مَنْ كَانَ يُر۪يدُ الْحَيٰوةَ الدُّنْيَا وَز۪ينَتَهَا نُوَفِّ اِلَيْهِمْ اَعْمَالَهُمْ ف۪يهَا وَهُمْ ف۪يهَا لَا يُبْخَسُونَ15
जो व्यक्ति सांसारिक जीवन और उसकी शोभा का इच्छुक हो तो ऐसे लोगों को उनके कर्मों का पूरा-पूरा बदला हम यहीं दे देते है और इसमें उनका कोई हक़ नहीं मारा जाता
اُو۬لٰٓئِكَ الَّذ۪ينَ لَيْسَ لَهُمْ فِي الْاٰخِرَةِ اِلَّا النَّارُۘ وَحَبِطَ مَا صَنَعُوا ف۪يهَا وَبَاطِلٌ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ16
यही वे लोग है जिनके लिए आख़िरत में आग के सिवा और कुछ भी नहीं। उन्होंने जो कुछ बनाया, वह सब वहाँ उनकी जान को लागू हुआ और उनका सारा किया-धरा मिथ्या होकर रहा
اَفَمَنْ كَانَ عَلٰى بَيِّنَةٍ مِنْ رَبِّه۪ وَيَتْلُوهُ شَاهِدٌ مِنْهُ وَمِنْ قَبْلِه۪ كِتَابُ مُوسٰٓى اِمَامًا وَرَحْمَةًۜ اُو۬لٰٓئِكَ يُؤْمِنُونَ بِه۪ۜ وَمَنْ يَكْفُرْ بِه۪ مِنَ الْاَحْزَابِ فَالنَّارُ مَوْعِدُهُۚ فَلَا تَكُ ف۪ي مِرْيَةٍ مِنْهُ اِنَّهُ الْحَقُّ مِنْ رَبِّكَ وَلٰكِنَّ اَكْثَرَ النَّاسِ لَا يُؤْمِنُونَ17
फिर क्या वह व्यक्ति जो अपने रब के एक स्पष्ट प्रमाण पर है और स्वयं उसके रूप में भी एक गवाह उसके साथ-साथ रहता है - और इससे पहले मूसा की किताब भी एक मार्गदर्शक और दयालुता के रूप में उपस्थित रही है- (और वह जो प्रकाश एवं मार्गदर्शन से वंचित है, दोनों बराबर हो सकते है) ऐसे ही लोग उसपर ईमान लाते है, किन्तु इन गिरोहों में से जो उसका इनकार करेगा तो उसके लिए जिस जगह का वादा है, वह तो आग है। अतः तुम्हें इसके विषय में कोई सन्देह न हो। यह तुम्हारे रब की ओर से सत्य है, किन्तु अधिकतर लोग मानते नहीं
وَمَنْ اَظْلَمُ مِمَّنِ افْتَرٰى عَلَى اللّٰهِ كَذِبًاۜ اُو۬لٰٓئِكَ يُعْرَضُونَ عَلٰى رَبِّهِمْ وَيَقُولُ الْاَشْهَادُ هٰٓؤُ۬لَٓاءِ الَّذ۪ينَ كَذَبُوا عَلٰى رَبِّهِمْۚ اَلَا لَعْنَةُ اللّٰهِ عَلَى الظَّالِم۪ينَۙ18
उस व्यक्ति से बढ़कर अत्याचारी कौन होगा जो अल्लाह पर थोपकर झूठ घड़े। ऐसे लोग अपने रब के सामने पेश होंगे और गवाही देनेवाले कहेंगे, "यही लोग है जिन्होंने अपने रब पर झूठ घड़ा।" सुन लो! ऐसे अत्याचारियों पर अल्लाह की लानत है
اَلَّذ۪ينَ يَصُدُّونَ عَنْ سَب۪يلِ اللّٰهِ وَيَبْغُونَهَا عِوَجًاۜ وَهُمْ بِالْاٰخِرَةِ هُمْ كَافِرُونَ19
जो अल्लाह के मार्ग से रोकते है और उसमें टेढ़ पैदा करना चाहते है; और वही आख़िरत का इनकार करते है
اُو۬لٰٓئِكَ لَمْ يَكُونُوا مُعْجِز۪ينَ فِي الْاَرْضِ وَمَا كَانَ لَهُمْ مِنْ دُونِ اللّٰهِ مِنْ اَوْلِيَٓاءَۢ يُضَاعَفُ لَهُمُ الْعَذَابُۜ مَا كَانُوا يَسْتَط۪يعُونَ السَّمْعَ وَمَا كَانُوا يُبْصِرُونَ20
वे धरती में क़ाबू से बाहर नहीं जा सकते और न अल्लाह से हटकर उनका कोई समर्थक ही है। उन्हें दोहरी यातना दी जाएगी। वे न सुन ही सकते थे और न देख ही सकते थे
اُو۬لٰٓئِكَ الَّذ۪ينَ خَسِرُٓوا اَنْفُسَهُمْ وَضَلَّ عَنْهُمْ مَا كَانُوا يَفْتَرُونَ21
ये वही लोग है जिन्होंने अपने आपको घाटे में डाला और जो कुछ वे घड़ा करते थे, वह सब उनमें गुम होकर रह गया
لَا جَرَمَ اَنَّهُمْ فِي الْاٰخِرَةِ هُمُ الْاَخْسَرُونَ22
निश्चय ही वही आख़िरत में सबसे बढ़कर घाटे में रहेंगे
اِنَّ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ وَاَخْبَتُٓوا اِلٰى رَبِّهِمْۙ اُو۬لٰٓئِكَ اَصْحَابُ الْجَنَّةِۚ هُمْ ف۪يهَا خَالِدُونَ23
रहे वे लोग जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए और अपने रब की ओर झूक पड़े वही जन्नतवाले है, उसमें वे सदैव रहेंगे
مَثَلُ الْفَر۪يقَيْنِ كَالْاَعْمٰى وَالْاَصَمِّ وَالْبَص۪يرِ وَالسَّم۪يعِۜ هَلْ يَسْتَوِيَانِ مَثَلًاۜ اَفَلَا تَذَكَّرُونَ۟24
दोनों पक्षों की उपमा ऐसी है जैसे एक अन्धा और बहरा हो और एक देखने और सुननेवाला। क्या इन दोनों की दशा समान हो सकती है? तो क्या तुम होश से काम नहीं लेते?
وَلَقَدْ اَرْسَلْنَا نُوحًا اِلٰى قَوْمِه۪ۘ اِنّ۪ي لَكُمْ نَذ۪يرٌ مُب۪ينٌۙ25
हमने नूह को उसकी क़ौम की ओर भेजा। (उसने कहा,) "मैं तुम्हें साफ़-साफ़ चेतावनी देता हूँ
اَنْ لَا تَعْبُدُٓوا اِلَّا اللّٰهَۜ اِنّ۪ٓي اَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ اَل۪يمٍ26
यह कि तुम अल्लाह के सिवा किसी की बन्दगी न करो। मुझे तुम्हारे विषय में एक दुखद दिन की यातना का भय है।"
فَقَالَ الْمَلَاُ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا مِنْ قَوْمِه۪ مَا نَرٰيكَ اِلَّا بَشَرًا مِثْلَنَا وَمَا نَرٰيكَ اتَّبَعَكَ اِلَّا الَّذ۪ينَ هُمْ اَرَاذِلُنَا بَادِيَ الرَّاْيِۚ وَمَا نَرٰى لَكُمْ عَلَيْنَا مِنْ فَضْلٍ بَلْ نَظُنُّكُمْ كَاذِب۪ينَ27
इसपर उसकी क़ौम के सरदार, जिन्होंने इनकार किया था, कहने लगे, "हमारी दृष्टि में तो तुम हमारे ही जैसे आदमी हो और हम देखते है कि बस कुछ ऐसे लोग ही तुम्हारे अनुयायी है जो पहली स्पष्ट में हमारे यहाँ के नीच है। हम अपने मुक़ाबले में तुममें कोई बड़ाई नहीं देखते, बल्कि हम तो तुम्हें झूठा समझते है।"
قَالَ يَا قَوْمِ اَرَاَيْتُمْ اِنْ كُنْتُ عَلٰى بَيِّنَةٍ مِنْ رَبّ۪ي وَاٰتٰين۪ي رَحْمَةً مِنْ عِنْدِه۪ فَعُمِّيَتْ عَلَيْكُمْۜ اَنُلْزِمُكُمُوهَا وَاَنْتُمْ لَهَا كَارِهُونَ28
उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! तुम्हारा क्या विचार है? यदि मैं अपने रब के एक स्पष्ट प्रमाण पर हूँ और उसने मुझे अपने पास से दयालुता भी प्रदान की है, फिर वह तुम्हें न सूझे तो क्या हम हठात उसे तुमपर चिपका दें, जबकि वह तुम्हें अप्रिय है?
وَيَا قَوْمِ لَٓا اَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ مَالًاۜ اِنْ اَجْرِيَ اِلَّا عَلَى اللّٰهِ وَمَٓا اَنَا۬ بِطَارِدِ الَّذ۪ينَ اٰمَنُواۜ اِنَّهُمْ مُلَاقُوا رَبِّهِمْ وَلٰكِنّ۪ٓي اَرٰيكُمْ قَوْمًا تَجْهَلُونَ29
और ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मैं इस काम पर कोई धन नहीं माँगता। मेरा पारिश्रमिक तो बस अल्लाह के ज़िम्मे है। मैं ईमान लानेवालो को दूर करनेवाला भी नहीं। उन्हें तो अपने रब से मिलना ही है, किन्तु मैं तुम्हें देख रहा हूँ कि तुम अज्ञानी लोग हो
وَيَا قَوْمِ مَنْ يَنْصُرُن۪ي مِنَ اللّٰهِ اِنْ طَرَدْتُهُمْۜ اَفَلَا تَذَكَّرُونَ30
और ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यदि मैं उन्हें धुत्कार दूँ तो अल्लाह के मुक़ाबले में कौन मेरी सहायता कर सकता है? फिर क्या तुम होश से काम नहीं लेते?
وَلَٓا اَقُولُ لَكُمْ عِنْد۪ي خَزَٓائِنُ اللّٰهِ وَلَٓا اَعْلَمُ الْغَيْبَ وَلَٓا اَقُولُ اِنّ۪ي مَلَكٌ وَلَٓا اَقُولُ لِلَّذ۪ينَ تَزْدَر۪ٓي اَعْيُنُكُمْ لَنْ يُؤْتِيَهُمُ اللّٰهُ خَيْرًاۜ اَللّٰهُ اَعْلَمُ بِمَا ف۪ٓي اَنْفُسِهِمْۚ اِنّ۪ٓي اِذًا لَمِنَ الظَّالِم۪ينَ31
और मैं तुमसे यह नहीं कहता कि मेरे पास अल्लाह के ख़जाने है और न मुझे परोक्ष का ज्ञान है और न मैं यह कहता हूँ कि मैं कोई फ़रिश्ता हूँ और न उन लोगों के विषय में, जो तुम्हारी दृष्टि में तुच्छ है, मैं यह कहता हूँ कि अल्लाह उन्हें कोई भलाई न देगा। जो कुछ उनके जी में है, अल्लाह उसे भली-भाँति जानता है। (यदि मैं ऐसा कहूँ) तब तो मैं अवश्य ही ज़ालिमों में से हूँगा।"
قَالُوا يَا نُوحُ قَدْ جَادَلْتَنَا فَاَكْثَرْتَ جِدَالَنَا فَاْتِنَا بِمَا تَعِدُنَٓا اِنْ كُنْتَ مِنَ الصَّادِق۪ينَ32
उन्होंने कहा, "ऐ नूह! तुम हमसे झगड़ चुके और बहुत झगड़ चुके। यदि तुम सच्चे हो तो जिसकी तुम हमें धमकी देते हो, अब उसे हम पर ले ही आओ।"
قَالَ اِنَّمَا يَاْت۪يكُمْ بِهِ اللّٰهُ اِنْ شَٓاءَ وَمَٓا اَنْتُمْ بِمُعْجِز۪ينَ33
उसने कहा, "वह तो अल्लाह ही यदि चाहेगा तो तुमपर लाएगा और तुम क़ाबू से बाहर नहीं जा सकते
وَلَا يَنْفَعُكُمْ نُصْح۪ٓي اِنْ اَرَدْتُ اَنْ اَنْصَحَ لَكُمْ اِنْ كَانَ اللّٰهُ يُر۪يدُ اَنْ يُغْوِيَكُمْۜ هُوَ رَبُّكُمْ وَاِلَيْهِ تُرْجَعُونَۜ34
अब जबकि अल्लाह ही ने तुम्हें विनष्ट करने का निश्चय कर लिया हो, तो यदि मैं तुम्हारा भला भी चाहूँ, तो मेरा भला चाहना तुम्हें कुछ भी लाभ नहीं पहुँचा सकता। वही तुम्हारा रब है और उसी की ओर तुम्हें पलटना भी है।"
اَمْ يَقُولُونَ افْتَرٰيهُۜ قُلْ اِنِ افْتَرَيْتُهُ فَعَلَيَّ اِجْرَام۪ي وَاَنَا۬ بَر۪ٓيءٌ مِمَّا تُجْرِمُونَ۟35
(क्या उन्हें कोई खटक है) या वे कहते है, "उसने स्वयं इसे घड़ लिया है?" कह दो, "यदि मैंने इसे घड़ लिया है तो मेरे अपराध का दायित्व मुझपर ही है। और जो अपराध तुम कर रहे हो मैं उसके दायित्व से मुक्त हूँ।"
وَاُو۫حِيَ اِلٰى نُوحٍ اَنَّهُ لَنْ يُؤْمِنَ مِنْ قَوْمِكَ اِلَّا مَنْ قَدْ اٰمَنَ فَلَا تَبْتَئِسْ بِمَا كَانُوا يَفْعَلُونَۚ36
नूह की ओर प्रकाशना की गई कि "जो लोग ईमान ला चुके है, उनके सिवा अब तुम्हारी क़ौम में कोई ईमान लानेवाला नहीं। अतः जो कुछ वे कर रहे है उसपर तुम दुखी न हो
وَاصْنَعِ الْفُلْكَ بِاَعْيُنِنَا وَوَحْيِنَا وَلَا تُخَاطِبْن۪ي فِي الَّذ۪ينَ ظَلَمُواۚ اِنَّهُمْ مُغْرَقُونَ37
तुम हमारे समक्ष और हमारी प्रकाशना के अनुसार नाव बनाओ और अत्याचारियों के विषय में मुझसे बात न करो। निश्चय ही वे डूबकर रहेंगे।"
وَيَصْنَعُ الْفُلْكَ وَكُلَّمَا مَرَّ عَلَيْهِ مَلَاٌ مِنْ قَوْمِه۪ سَخِرُوا مِنْهُۜ قَالَ اِنْ تَسْخَرُوا مِنَّا فَاِنَّا نَسْخَرُ مِنْكُمْ كَمَا تَسْخَرُونَۜ38
जब नाव बनाने लगता है। उसकी क़ौम के सरदार जब भी उसके पास से गुज़रते तो उसका उपहास करते। उसने कहा, "यदि तुम हमारा उपहास करते हो तो हम भी तुम्हारा उपहास करेंगे, जैसे तुम हमारा उपहास करते हो
فَسَوْفَ تَعْلَمُونَۙ مَنْ يَاْت۪يهِ عَذَابٌ يُخْز۪يهِ وَيَحِلُّ عَلَيْهِ عَذَابٌ مُق۪يمٌ39
अब शीघ्र ही तुम जान लोगे कि कौन है जिसपर ऐसी यातना आती है, जो उसे अपमानित कर देगी और जिसपर ऐसी स्थाई यातना टूट पड़ती है
حَتّٰٓى اِذَا جَٓاءَ اَمْرُنَا وَفَارَ التَّنُّورُۙ قُلْنَا احْمِلْ ف۪يهَا مِنْ كُلٍّ زَوْجَيْنِ اثْنَيْنِ وَاَهْلَكَ اِلَّا مَنْ سَبَقَ عَلَيْهِ الْقَوْلُ وَمَنْ اٰمَنَۜ وَمَٓا اٰمَنَ مَعَهُٓ اِلَّا قَل۪يلٌ40
यहाँ तक कि जब हमारा आदेश आ गया और तंदूर उबल पड़ा तो हमने कहा, "हर जाति में से दो-दो के जोड़े चढ़ा लो और अपने घरवालों को भी - सिवाय ऐसे व्यक्ति के जिसके बारे में बात तय पा चुकी है - और जो ईमान लाया हो उसे भी।" किन्तु उसके साथ जो ईमान लाए थे वे थोड़े ही थे
وَقَالَ ارْكَبُوا ف۪يهَا بِسْمِ اللّٰهِ مَجْرٰۭۙيهَا وَمُرْسٰيهَاۜ اِنَّ رَبّ۪ي لَغَفُورٌ رَح۪يمٌ41
उसने कहा, "उसमें सवार हो जाओ। अल्लाह के नाम से इसका चलना भी है और इसका ठहरना भी। निस्संदेह मेरा रब अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है।"
وَهِيَ تَجْر۪ي بِهِمْ ف۪ي مَوْجٍ كَالْجِبَالِ وَنَادٰى نُوحٌۨ ابْنَهُ وَكَانَ ف۪ي مَعْزِلٍ يَا بُنَيَّ ارْكَبْۭۗ مَعَنَا وَلَا تَكُنْ مَعَ الْكَافِر۪ينَ42
और वह (नाव) उन्हें लिए हुए पहाड़ों जैसी ऊँची लहर के बीच चल रही थी। नूह ने अपने बेटे को, जो उससे अलग था, पुकारा, "ऐ मेरे बेटे! हमारे साथ सवार हो जा। तू इनकार करनेवालों के साथ न रह।"
قَالَ سَاٰو۪ٓي اِلٰى جَبَلٍ يَعْصِمُن۪ي مِنَ الْمَٓاءِۜ قَالَ لَا عَاصِمَ الْيَوْمَ مِنْ اَمْرِ اللّٰهِ اِلَّا مَنْ رَحِمَۚ وَحَالَ بَيْنَهُمَا الْمَوْجُ فَكَانَ مِنَ الْمُغْرَق۪ينَ43
उसने कहा, "मैं किसी पहाड़ से जा लगूँगा, जो मुझे पानी से बचा लेगा।" कहा, "आज अल्लाह के आदेश (फ़ैसले) से कोई बचानेवाला नहीं है सिवाय उसके जिसपर वह दया करे।" इतने में दोनों के बीच लहर आ पड़ी और डूबनेवालों के साथ वह भी डूब गया
وَق۪يلَ يَٓا اَرْضُ ابْلَع۪ي مَٓاءَكِ وَيَا سَمَٓاءُ اَقْلِع۪ي وَغ۪يضَ الْمَٓاءُ وَقُضِيَ الْاَمْرُ وَاسْتَوَتْ عَلَى الْجُودِيِّ وَق۪يلَ بُعْدًا لِلْقَوْمِ الظَّالِم۪ينَ44
और कहा गया, "ऐ धरती! अपना पानी निगल जा और ऐ आकाश! तू थम जा।" अतएव पानी तह में बैठ गया और फ़ैसला चुका दिया गया और वह (नाव) जूदी पर्वत पर टिक गई औऱ कह दिया गया, "फिटकार हो अत्याचारी लोगों पर!"
وَنَادٰى نُوحٌ رَبَّهُ فَقَالَ رَبِّ اِنَّ ابْن۪ي مِنْ اَهْل۪ي وَاِنَّ وَعْدَكَ الْحَقُّ وَاَنْتَ اَحْكَمُ الْحَاكِم۪ينَ45
नूह ने अपने रब को पुकारा और कहा, "मेरे रब! मेरा बेटा मेरे घरवालों में से है और निस्संदेह तेरा वादा सच्चा है और तू सबसे बड़ा हाकिम भी है।"
قَالَ يَا نُوحُ اِنَّهُ لَيْسَ مِنْ اَهْلِكَۚ اِنَّهُ عَمَلٌ غَيْرُ صَالِحٍۘ فَلَا تَسْـَٔلْنِ مَا لَيْسَ لَكَ بِه۪ عِلْمٌۜ اِنّ۪ٓي اَعِظُكَ اَنْ تَكُونَ مِنَ الْجَاهِل۪ينَ46
कहा, "ऐ नूह! वह तेरे घरवालों में से नहीं, वह तो सर्वथा एक बिगड़ा काम है। अतः जिसका तुझे ज्ञान नहीं, उसके विषय में मुझसे न पूछ, तेरे नादान हो जाने की आशंका से मैं तुझे नसीहत करता हूँ।"
قَالَ رَبِّ اِنّ۪ٓي اَعُوذُ بِكَ اَنْ اَسْـَٔلَكَ مَا لَيْسَ ل۪ي بِه۪ عِلْمٌۜ وَاِلَّا تَغْفِرْ ل۪ي وَتَرْحَمْن۪ٓي اَكُنْ مِنَ الْخَاسِر۪ينَ47
उसने कहा, "मेरे रब! मैं इससे तेरी पनाह माँगता हूँ कि तुझसे उस चीज़ का सवाल करूँ जिसका मुझे कोई ज्ञान न हो। अब यदि तूने मुझे क्षमा न किया और मुझपर दया न की, तो मैं घाटे में पड़कर रहूँगा।"
ق۪يلَ يَا نُوحُ اهْبِطْ بِسَلَامٍ مِنَّا وَبَرَكَاتٍ عَلَيْكَ وَعَلٰٓى اُمَمٍ مِمَّنْ مَعَكَۜ وَاُمَمٌ سَنُمَتِّعُهُمْ ثُمَّ يَمَسُّهُمْ مِنَّا عَذَابٌ اَل۪يمٌ48
कहा गया, "ऐ नूह! हमारी ओर से सलामती और उन बरकतों के साथ उतर, जो तुझपर और उन गिरोहों पर होगी, जो तेरे साथवालों में से होंगे। कुछ गिरोह ऐसे भी होंगे जिन्हें हम थोड़े दिनों का सुखोपभोग कराएँगे। फिर उन्हें हमारी ओर से दुखद यातना आ पहुँचेगी।"
تِلْكَ مِنْ اَنْبَٓاءِ الْغَيْبِ نُوح۪يهَٓا اِلَيْكَۚ مَا كُنْتَ تَعْلَمُهَٓا اَنْتَ وَلَا قَوْمُكَ مِنْ قَبْلِ هٰذَاۜۛ فَاصْبِرْۜۛ اِنَّ الْعَاقِبَةَ لِلْمُتَّق۪ينَ۟49
ये परोक्ष की ख़बरें हैं जिनकी हम तुम्हारी ओर प्रकाशना कर रहे है। इससे पहले तो न तुम्हें इनकी ख़बर थी और न तुम्हारी क़ौम को। अतः धैर्य से काम लो। निस्संदेह अन्तिम परिणाम डर रखनेवालो के पक्ष में है
وَاِلٰى عَادٍ اَخَاهُمْ هُودًاۜ قَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللّٰهَ مَا لَكُمْ مِنْ اِلٰهٍ غَيْرُهُۜ اِنْ اَنْتُمْ اِلَّا مُفْتَرُونَ50
और 'आद' की ओर उनके भाई 'हूद' को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो। उसके सिवा तुम्हारा कोई पूज्य प्रभु नहीं। तुमने तो बस झूठ घड़ रखा हैं
يَا قَوْمِ لَٓا اَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ اَجْرًاۜ اِنْ اَجْرِيَ اِلَّا عَلَى الَّذ۪ي فَطَرَن۪يۜ اَفَلَا تَعْقِلُونَ51
ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मैं इसपर तुमसे कोई पारिश्रमिक नहीं माँगता। मेरा पारिश्रमिक तो बस उसके ज़िम्मे है जिसने मुझे पैदा किया। फिर क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लेते?
وَيَا قَوْمِ اسْتَغْفِرُوا رَبَّكُمْ ثُمَّ تُوبُٓوا اِلَيْهِ يُرْسِلِ السَّمَٓاءَ عَلَيْكُمْ مِدْرَارًا وَيَزِدْكُمْ قُوَّةً اِلٰى قُوَّتِكُمْ وَلَا تَتَوَلَّوْا مُجْرِم۪ينَ52
ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अपने रब से क्षमा याचना करो, फिर उसकी ओर पलट आओ। वह तुमपर आकाश को ख़ूब बरसता छोड़ेगा और तुममें शक्ति पर शक्ति की अभिवृद्धि करेगा। तुम अपराधी बनकर मुँह न फेरो।"
قَالُوا يَا هُودُ مَا جِئْتَنَا بِبَيِّنَةٍ وَمَا نَحْنُ بِتَارِك۪ٓي اٰلِهَتِنَا عَنْ قَوْلِكَ وَمَا نَحْنُ لَكَ بِمُؤْمِن۪ينَ53
उन्होंने कहा, "ऐ हूद! तू हमारे पास कोई स्पष्ट प्रमाण लेकर नहीं आया है। तेरे कहने से हम अपने इष्ट -पूज्यों को नहीं छोड़ सकते और न हम तुझपर ईमान लानेवाले है
اِنْ نَقُولُ اِلَّا اعْتَرٰيكَ بَعْضُ اٰلِهَتِنَا بِسُٓوءٍۜ قَالَ اِنّ۪ٓي اُشْهِدُ اللّٰهَ وَاشْهَدُٓوا اَنّ۪ي بَر۪ٓيءٌ مِمَّا تُشْرِكُونَۙ54
हम तो केवल यही कहते है कि हमारे इष्ट-पूज्यों में से किसी की तुझपर मार पड़ गई है।" उसने कहा, "मैं तो अल्लाह को गवाह बनाता हूँ और तुम भी गवाह रहो कि उनसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं,
مِنْ دُونِه۪ فَك۪يدُون۪ي جَم۪يعًا ثُمَّ لَا تُنْظِرُونِ55
जिनको तुम साझी ठहराकर उसके सिवा पूज्य मानते हो। अतः तुम सब मिलकर मेरे साथ दाँव-घात लगाकर देखो और मुझे मुहलत न दो
اِنّ۪ي تَوَكَّلْتُ عَلَى اللّٰهِ رَبّ۪ي وَرَبِّكُمْۜ مَا مِنْ دَٓابَّةٍ اِلَّا هُوَ اٰخِذٌ بِنَاصِيَتِهَاۜ اِنَّ رَبّ۪ي عَلٰى صِرَاطٍ مُسْتَق۪يمٍ56
मेरा भरोसा तो अल्लाह, अपने रब और तुम्हारे रब, पर है। चलने-फिरनेवाला जो प्राणी भी है, उसकी चोटी तो उसी के हाथ में है। निस्संदेह मेरा रब सीधे मार्ग पर है
فَاِنْ تَوَلَّوْا فَقَدْ اَبْلَغْتُكُمْ مَٓا اُرْسِلْتُ بِه۪ٓ اِلَيْكُمْۜ وَيَسْتَخْلِفُ رَبّ۪ي قَوْمًا غَيْرَكُمْۚ وَلَا تَضُرُّونَهُ شَيْـًٔاۜ اِنَّ رَبّ۪ي عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ حَف۪يظٌ57
किन्तु यदि तुम मुँह मोड़ते हो तो जो कुछ देकर मुझे तुम्हारी ओर भेजा गया था, वह तो मैं तुम्हें पहुँचा ही चुका। मेरा रब तुम्हारे स्थान पर दूसरी किसी क़ौम को लाएगा और तुम उसका कुछ न बिगाड़ सकोगे। निस्संदेह मेरा रब हर चीज़ की देख-भाल कर रहा है।"
وَلَمَّا جَٓاءَ اَمْرُنَا نَجَّيْنَا هُودًا وَالَّذ۪ينَ اٰمَنُوا مَعَهُ بِرَحْمَةٍ مِنَّاۚ وَنَجَّيْنَاهُمْ مِنْ عَذَابٍ غَل۪يظٍ58
और जब हमारा आदेश आ पहुँचा तो हमने हूद और उसके साथ के ईमान लानेवालों को अपनी दयालुता से बचा लिया। और एक कठोर यातना से हमने उन्हें छुटकारा दिया
وَتِلْكَ عَادٌ جَحَدُوا بِاٰيَاتِ رَبِّهِمْ وَعَصَوْا رُسُلَهُ وَاتَّبَعُٓوا اَمْرَ كُلِّ جَبَّارٍ عَن۪يدٍ59
ये आद है, जिन्होंने अपने रब की आयतों का इनकार किया; उसके रसूलों की अवज्ञा की और हर सरकश विरोधी के पीछे चलते रहे
وَاُتْبِعُوا ف۪ي هٰذِهِ الدُّنْيَا لَعْنَةً وَيَوْمَ الْقِيٰمَةِۜ اَلَٓا اِنَّ عَادًا كَفَرُوا رَبَّهُمْۜ اَلَا بُعْدًا لِعَادٍ قَوْمِ هُودٍ۟60
इस संसार में भी लानत ने उनका पीछा किया और क़ियामत के दिन भी, "सुन लो! निस्संदेह आद ने अपने रब के साथ कुफ़्र किया। सुनो! विनष्ट हो आद, हूद की क़ौम।"
وَاِلٰى ثَمُودَ اَخَاهُمْ صَالِحًاۢ قَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللّٰهَ مَا لَكُمْ مِنْ اِلٰهٍ غَيْرُهُۜ هُوَ اَنْشَاَكُمْ مِنَ الْاَرْضِ وَاسْتَعْمَرَكُمْ ف۪يهَا فَاسْتَغْفِرُوهُ ثُمَّ تُوبُٓوا اِلَيْهِۜ اِنَّ رَبّ۪ي قَر۪يبٌ مُج۪يبٌ61
समूद को और उसके भाई सालेह को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़़ौम के लोगों! अल्लाह की बन्दगी करो। उसके सिवा तुम्हारा कोई अन्य पूज्य-प्रभु नहीं। उसी ने तुम्हें धरती से पैदा किया और उसमें तुम्हें बसायाय़ अतः उससे क्षमा माँगो; फिर उसकी ओर पलट आओ। निस्संदेह मेरा रब निकट है, प्रार्थनाओं को स्वीकार करनेवाला भी।"
قَالُوا يَا صَالِحُ قَدْ كُنْتَ ف۪ينَا مَرْجُوًّا قَبْلَ هٰذَٓا اَتَنْهٰينَٓا اَنْ نَعْبُدَ مَا يَعْبُدُ اٰبَٓاؤُ۬نَا وَاِنَّنَا لَف۪ي شَكٍّ مِمَّا تَدْعُونَٓا اِلَيْهِ مُر۪يبٍ62
उन्होंने कहा, "ऐ सालेह! इससे पहले तू हमारे बीच ऐसा व्यक्ति था जिससे बड़ी आशाएँ थीं। क्या तू हमें उनको पूजने से रोकता है जिनकी पूजा हमारे बाप-दादा करते रहे है? जिनकी ओर तू हमें बुला रहा है उसके विषय में तो हमें संदेह है जो हमें दुविधा में डाले हुए है।"
قَالَ يَا قَوْمِ اَرَاَيْتُمْ اِنْ كُنْتُ عَلٰى بَيِّنَةٍ مِنْ رَبّ۪ي وَاٰتٰين۪ي مِنْهُ رَحْمَةً فَمَنْ يَنْصُرُن۪ي مِنَ اللّٰهِ اِنْ عَصَيْتُهُ فَمَا تَز۪يدُونَن۪ي غَيْرَ تَخْس۪يرٍ63
उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगों! क्या तुमने सोचा? यदि मैं अपने रब के एक स्पष्ट प्रमाण पर हूँ और उसने मुझे अपनी ओर से दयालुता प्रदान की है, तो यदि मैं उसकी अवज्ञा करूँ तो अल्लाह के मुक़ाबले में कौन मेरी सहायता करेगा? तुम तो और अधिक घाटे में डाल देने के अतिरिक्त मेरे हक़ में और कोई अभिवृद्धि नहीं करोगे
وَيَا قَوْمِ هٰذِه۪ نَاقَةُ اللّٰهِ لَكُمْ اٰيَةً فَذَرُوهَا تَاْكُلْ ف۪ٓي اَرْضِ اللّٰهِ وَلَا تَمَسُّوهَا بِسُٓوءٍ فَيَاْخُذَكُمْ عَذَابٌ قَر۪يبٌ64
ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यह अल्लाह की ऊँटनी तुम्हारे लिए एक निशानी है। इसे छोड़ दो कि अल्लाह की धरती में खाए और इसे तकलीफ़ देने के लिए हाथ न लगाना अन्यथा समीपस्थ यातना तुम्हें आ लेगी।"
فَعَقَرُوهَا فَقَالَ تَمَتَّعُوا ف۪ي دَارِكُمْ ثَلٰثَةَ اَيَّامٍۜ ذٰلِكَ وَعْدٌ غَيْرُ مَكْذُوبٍ65
किन्तु उन्होंने उसकी कूंचे काट डाली। इसपर उसने कहा, "अपने घरों में तीन दिन और मज़े ले लो। यह ऐसा वादा है, जो झूठा सिद्ध न होगा।"
فَلَمَّا جَٓاءَ اَمْرُنَا نَجَّيْنَا صَالِحًا وَالَّذ۪ينَ اٰمَنُوا مَعَهُ بِرَحْمَةٍ مِنَّا وَمِنْ خِزْيِ يَوْمِئِذٍۜ اِنَّ رَبَّكَ هُوَ الْقَوِيُّ الْعَز۪يزُ66
फिर जब हमारा आदेश आ पहुँचा, तो हमने अपनी दयालुता से सालेह को और उसके साथ के ईमान लानेवालों को बचा लिया, और उस दिन के अपमान से उन्हें सुरक्षित रखा। वास्तव में, तुम्हारा रब बड़ा शक्तिवान, प्रभुत्वशाली है
وَاَخَذَ الَّذ۪ينَ ظَلَمُوا الصَّيْحَةُ فَاَصْبَحُوا ف۪ي دِيَارِهِمْ جَاثِم۪ينَۙ67
और अत्याचार करनेवालों को एक भयंकर चिंघार ने आ लिया और वे अपने घरों में औंधे पड़े रह गए,
كَاَنْ لَمْ يَغْنَوْا ف۪يهَاۜ اَلَٓا اِنَّ ثَمُودَا۬ كَفَرُوا رَبَّهُمْۜ اَلَا بُعْدًا لِثَمُودَ۟68
मानो वे वहाँ कभी बसे ही न थे। "सुनो! समूद ने अपने रब के साथ कुफ़्र किया। सुन लो! फिटकार हो समूद पर!"
وَلَقَدْ جَٓاءَتْ رُسُلُنَٓا اِبْرٰه۪يمَ بِالْبُشْرٰى قَالُوا سَلَامًاۜ قَالَ سَلَامٌۚ فَمَا لَبِثَ اَنْ جَٓاءَ بِعِجْلٍ حَن۪يذٍ69
और हमारे भेजे हुए (फ़रिश्ते) इबराहीम के पास शुभ सूचना लेकर पहुँचे। उन्होंने कहा, "सलाम हो!" उसने भी कहा, "सलाम हो।" फिर उसने कुछ विलम्भ न किया, एक भुना हुआ बछड़ा ले आया
فَلَمَّا رَآٰ اَيْدِيَهُمْ لَا تَصِلُ اِلَيْهِ نَكِرَهُمْ وَاَوْجَسَ مِنْهُمْ خ۪يفَةًۜ قَالُوا لَا تَخَفْ اِنَّٓا اُرْسِلْنَٓا اِلٰى قَوْمِ لُوطٍۜ70
किन्तु जब देखा कि उनके हाथ उसकी ओर नहीं बढ़ रहे है तो उसने उन्हें अजनबी समझा और दिल में उनसे डरा। वे बोले, "डरो नहीं, हम तो लूत की क़ौम की ओर से भेजे गए है।"
وَامْرَاَتُهُ قَٓائِمَةٌ فَضَحِكَتْ فَبَشَّرْنَاهَا بِاِسْحٰقَۙ وَمِنْ وَرَٓاءِ اِسْحٰقَ يَعْقُوبَ71
उसकी स्त्री भी खड़ी थी। वह इसपर हँस पड़ी। फिर हमने उसको इसहाक़ और इसहाक़ के बाद याक़ूब की शुभ सूचना दी
قَالَتْ يَا وَيْلَتٰٓى ءَاَلِدُ وَاَنَا۬ عَجُوزٌ وَهٰذَا بَعْل۪ي شَيْخًاۜ اِنَّ هٰذَا لَشَيْءٌ عَج۪يبٌ72
वह बोली, "हाय मेरा हतभाग्य! क्या मैं बच्चे को जन्म दूँगी, जबकि मैं वृद्धा और ये मेरे पति है बूढें? यह तो बड़ी ही अद्भुपत बात है!"
قَالُٓوا اَتَعْجَب۪ينَ مِنْ اَمْرِ اللّٰهِ رَحْمَةُ اللّٰهِ وَبَرَكَاتُهُ عَلَيْكُمْ اَهْلَ الْبَيْتِۜ اِنَّهُ حَم۪يدٌ مَج۪يدٌ73
वे बोले, "क्या अल्लाह के आदेश पर तुम आश्चर्य करती हो? घरवालो! तुम लोगों पर तो अल्लाह की दयालुता और उसकी बरकतें है। वह निश्चय ही प्रशंसनीय, गौरववाला है।"
فَلَمَّا ذَهَبَ عَنْ اِبْرٰه۪يمَ الرَّوْعُ وَجَٓاءَتْهُ الْبُشْرٰى يُجَادِلُنَا ف۪ي قَوْمِ لُوطٍۜ74
फिर जब इबराहीम की घबराहट दूर हो गई और उसे शुभ सूचना भी मिली तो वह लूत की क़ौम के विषय में हम से झगड़ने लगा
اِنَّ اِبْرٰه۪يمَ لَحَل۪يمٌ اَوَّاهٌ مُن۪يبٌ75
निस्संदेह इबराहीम बड़ा ही सहनशील, कोमल हृदय, हमारी ओर रुजू (प्रवृत्त) होनेवाला था
يَٓا اِبْرٰه۪يمُ اَعْرِضْ عَنْ هٰذَاۚ اِنَّهُ قَدْ جَٓاءَ اَمْرُ رَبِّكَۚ وَاِنَّهُمْ اٰت۪يهِمْ عَذَابٌ غَيْرُ مَرْدُودٍ76
"ऐ ईबराहीम! इसे छोड़ दो। तुम्हारे रब का आदेश आ चुका है और निश्चय ही उनपर न टलनेवाली यातना आनेवाली है।"
وَلَمَّا جَٓاءَتْ رُسُلُنَا لُوطًا س۪ٓيءَ بِهِمْ وَضَاقَ بِهِمْ ذَرْعًا وَقَالَ هٰذَا يَوْمٌ عَص۪يبٌ77
और जब हमारे दूत लूत के पास पहुँचे तो वह उनके कारण अप्रसन्न हुआ और उनके मामले में दिल तंग पाया। कहने लगा, "यह तो बड़ा ही कठिन दिन है।"
وَجَٓاءَهُ قَوْمُهُ يُهْرَعُونَ اِلَيْهِ وَمِنْ قَبْلُ كَانُوا يَعْمَلُونَ السَّيِّـَٔاتِۜ قَالَ يَا قَوْمِ هٰٓؤُ۬لَٓاءِ بَنَات۪ي هُنَّ اَطْهَرُ لَكُمْ فَاتَّقُوا اللّٰهَ وَلَا تُخْزُونِ ف۪ي ضَيْف۪يۜ اَلَيْسَ مِنْكُمْ رَجُلٌ رَش۪يدٌ78
उसकी क़ौम के लोग दौड़ते हुए उसके पास आ पहुँचे। वे पहले से ही दुष्कर्म किया करते थे। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! ये मेरी (क़ौम की) बेटियाँ (विधिवत विवाह के लिए) मौजूड है। ये तुम्हारे लिए अधिक पवित्र है। अतः अल्लाह का डर रखो और मेरे अतिथियों के विषय में मुझे अपमानित न करो। क्या तुममें एक भी अच्छी समझ का आदमी नहीं?"
قَالُوا لَقَدْ عَلِمْتَ مَا لَنَا ف۪ي بَنَاتِكَ مِنْ حَقٍّۚ وَاِنَّكَ لَتَعْلَمُ مَا نُر۪يدُ79
उन्होंने कहा, "तुझे तो मालूम है कि तेरी बेटियों से हमें कोई मतलब नहीं। और हम जो चाहते है, उसे तू भली-भाँति जानता है।"
قَالَ لَوْ اَنَّ ل۪ي بِكُمْ قُوَّةً اَوْ اٰو۪ٓي اِلٰى رُكْنٍ شَد۪يدٍ80
उसने कहा, "क्या ही अच्छा होता मुझमें तुमसे मुक़ाबले की शक्ति होती या मैं किसी सुदृढ़ आश्रय की शरण ही ले सकता।"
قَالُوا يَا لُوطُ اِنَّا رُسُلُ رَبِّكَ لَنْ يَصِلُٓوا اِلَيْكَ فَاَسْرِ بِاَهْلِكَ بِقِطْعٍ مِنَ الَّيْلِ وَلَا يَلْتَفِتْ مِنْكُمْ اَحَدٌ اِلَّا امْرَاَتَكَۜ اِنَّهُ مُص۪يبُهَا مَٓا اَصَابَهُمْۜ اِنَّ مَوْعِدَهُمُ الصُّبْحُۜ اَلَيْسَ الصُّبْحُ بِقَر۪يبٍ81
उन्होंने कहा, "ऐ लूत! हम तुम्हारे रब के भेजे हुए है। वे तुम तक कदापि नहीं पहुँच सकते। अतः तुम रात के किसी हिस्सेमें अपने घरवालों को लेकर निकल जाओ और तुममें से कोई पीछे पलटकर न देखे। हाँ, तुम्हारी स्त्री का मामला और है। उनपर भी वही कुछ बीतनेवाला है, जो उनपर बीतेगा। निर्धारित समय उनके लिए प्रातःकाल का है। तो क्या प्रातःकाल निकट नहीं?"
فَلَمَّا جَٓاءَ اَمْرُنَا جَعَلْنَا عَالِيَهَا سَافِلَهَا وَاَمْطَرْنَا عَلَيْهَا حِجَارَةً مِنْ سِجّ۪يلٍۙ مَنْضُودٍۙ82
फिर जब हमारा आदेश आ पहुँचा तो हमने उसको तलपट कर दिया और उसपर ककरीले पत्थर ताबड़-तोड़ बरसाए,
مُسَوَّمَةً عِنْدَ رَبِّكَۜ وَمَا هِيَ مِنَ الظَّالِم۪ينَ بِبَع۪يدٍ۟83
जो तुम्हारे रब के यहाँ चिन्हित थे। और वे अत्याचारियों से कुछ दूर भी नहीं
وَاِلٰى مَدْيَنَ اَخَاهُمْ شُعَيْبًاۜ قَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللّٰهَ مَا لَكُمْ مِنْ اِلٰهٍ غَيْرُهُۜ وَلَا تَنْقُصُوا الْمِكْيَالَ وَالْم۪يزَانَ اِنّ۪ٓي اَرٰيكُمْ بِخَيْرٍ وَاِنّ۪ٓي اَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ مُح۪يطٍ84
मदयन की ओर उनके भाई शुऐब को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दही करो, उनके सिवा तुम्हारा कोई पूज्य-प्रभु नहीं। और नाप और तौल में कमी न करो। मैं तो तुम्हें अच्छी दशा में देख रहा हूँ, किन्तु मुझे तुम्हारे विषय में एक घेर लेनेवाले दिन की यातना का भय है
وَيَا قَوْمِ اَوْفُوا الْمِكْيَالَ وَالْم۪يزَانَ بِالْقِسْطِ وَلَا تَبْخَسُوا النَّاسَ اَشْيَٓاءَهُمْ وَلَا تَعْثَوْا فِي الْاَرْضِ مُفْسِد۪ينَ85
ऐ मेरी क़ौम के लोगो! इनसाफ़ के साथ नाप और तौल को पूरा रखो। और लोगों को उनकी चीज़ों में घाटा न दो और धरती में बिगाड़ पैदा करनेवाले बनकर अपने मुँह को कुलषित न करो
بَقِيَّتُ اللّٰهِ خَيْرٌ لَكُمْ اِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِن۪ينَۚ وَمَٓا اَنَا۬ عَلَيْكُمْ بِحَف۪يظٍ86
यदि तुम मोमिन हो तो जो अल्लाह के पास शेष रहता है वही तुम्हारे लिए उत्तम है। मैं तुम्हारे ऊपर कोई नियुक्त रखवाला नहीं हूँ।"
قَالُوا يَا شُعَيْبُ اَصَلٰوتُكَ تَاْمُرُكَ اَنْ نَتْرُكَ مَا يَعْبُدُ اٰبَٓاؤُ۬نَٓا اَوْ اَنْ نَفْعَلَ ف۪ٓي اَمْوَالِنَا مَا نَشٰٓؤُ۬اۜ اِنَّكَ لَاَنْتَ الْحَل۪يمُ الرَّش۪يدُ87
वे बोले, "ऐ शुऐब! क्या तेरी नमाज़ तुझे यही सिखाती है कि उन्हें हम छोड़ दें जिन्हें हमारे बाप-दादा पूजते आए है या यह कि हम अपने माल का उपभोग अपनी इच्छानुसार न करें? बस एक तू ही तो बड़ा सहनशील, समझदार रह गया है!"
قَالَ يَا قَوْمِ اَرَاَيْتُمْ اِنْ كُنْتُ عَلٰى بَيِّنَةٍ مِنْ رَبّ۪ي وَرَزَقَن۪ي مِنْهُ رِزْقًا حَسَنًاۜ وَمَٓا اُر۪يدُ اَنْ اُخَالِفَكُمْ اِلٰى مَٓا اَنْهٰيكُمْ عَنْهُۜ اِنْ اُر۪يدُ اِلَّا الْاِصْلَاحَ مَا اسْتَطَعْتُۜ وَمَا تَوْف۪يق۪ٓي اِلَّا بِاللّٰهِۜ عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ وَاِلَيْهِ اُن۪يبُ88
उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! तुम्हारा क्या विचार है? यदि मैं अपने रब के एक स्पष्ट प्रमाण पर हूँ और उसने मुझे अपनी ओर से अच्छी आजीविका भी प्रदान की (तो झुठलाना मेरे लिए कितना हानिकारक होगा!) और मैं नहीं चाहता कि जिन बातों से मैं तुम्हें रोकता हूँ स्वयं स्वयं तुम्हारे विपरीत उनको करने लगूँ। मैं तो अपने बस भर केवल सुधार चाहता हूँ। मेरा काम बनना तो अल्लाह ही की सहायता से सम्भव है। उसी पर मेरा भरोसा है और उसी की ओर मैं रुजू करता हूँ
وَيَا قَوْمِ لَا يَجْرِمَنَّكُمْ شِقَاق۪ٓي اَنْ يُص۪يبَكُمْ مِثْلُ مَٓا اَصَابَ قَوْمَ نُوحٍ اَوْ قَوْمَ هُودٍ اَوْ قَوْمَ صَالِحٍۜ وَمَا قَوْمُ لُوطٍ مِنْكُمْ بِبَع۪يدٍ89
ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मेरे प्रति तुम्हारा विरोध कहीं तुम्हें उस अपराध पर न उभारे कि तुमपर वही बीते जो नूह की क़ौम या हूद की क़ौम या सालेह की क़ौम पर बीत चुका है, और लूत की क़ौम तो तुमसे कुछ दूर भी नहीं।
وَاسْتَغْفِرُوا رَبَّكُمْ ثُمَّ تُوبُٓوا اِلَيْهِۜ اِنَّ رَبّ۪ي رَح۪يمٌ وَدُودٌ90
अपने रब से क्षमा माँगो और फिर उसकी ओर पलट आओ। मेरा रब तो बड़ा दयावन्त, बहुत प्रेम करनेवाला हैं।"
قَالُوا يَا شُعَيْبُ مَا نَفْقَهُ۬ كَث۪يرًا مِمَّا تَقُولُ وَاِنَّا لَنَرٰيكَ ف۪ينَا ضَع۪يفًاۚ وَلَوْلَا رَهْطُكَ لَرَجَمْنَاكَۘ وَمَٓا اَنْتَ عَلَيْنَا بِعَز۪يزٍ91
उन्होंने कहा, "ऐ शुऐब! तेरी बहुत-सी बातों को समझने में तो हम असमर्थ है। और हम तो तुझे देखते है कि तू हमारे मध्य अत्यन्त निर्बल है। यदि तेरे भाई-बन्धु न होते तो हम पत्थर मार-मारकर कभी का तुझे समाप्त कर चुके होते। तू इतने बल-बूतेवाला तो नहीं कि हमपर भारी हो।"
قَالَ يَا قَوْمِ اَرَهْط۪ٓي اَعَزُّ عَلَيْكُمْ مِنَ اللّٰهِۜ وَاتَّخَذْتُمُوهُ وَرَٓاءَكُمْ ظِهْرِيًّاۜ اِنَّ رَبّ۪ي بِمَا تَعْمَلُونَ مُح۪يطٌ92
उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! क्या मेरे भाई-बन्धु तुमपर अल्लाह से भी ज़्यादा भारी है कि तुमने उसे अपने पीछे डाल दिया? तुम जो कुछ भी करते हो निश्चय ही मेरे रब ने उसे अपने घेरे में ले रखा है
وَيَا قَوْمِ اعْمَلُوا عَلٰى مَكَانَتِكُمْ اِنّ۪ي عَامِلٌۜ سَوْفَ تَعْلَمُونَۙ مَنْ يَاْت۪يهِ عَذَابٌ يُخْز۪يهِ وَمَنْ هُوَ كَاذِبٌۜ وَارْتَقِبُٓوا اِنّ۪ي مَعَكُمْ رَق۪يبٌ93
ऐ मेरी क़ौम के लोगो! तुम अपनी जगह कर्म करते रहो, मैं भी कर रहा हूँ। शीघ्र ही तुमको ज्ञात हो जाएगा कि किसपर वह यातना आती है, जो उसे अपमानित करके रहेगी, और कौन है जो झूठा है! प्रतीक्षा करो, मैं भी तुम्हारे साथ प्रतीक्षा कर रहा हूँ।"
وَلَمَّا جَٓاءَ اَمْرُنَا نَجَّيْنَا شُعَيْبًا وَالَّذ۪ينَ اٰمَنُوا مَعَهُ بِرَحْمَةٍ مِنَّا وَاَخَذَتِ الَّذ۪ينَ ظَلَمُوا الصَّيْحَةُ فَاَصْبَحُوا ف۪ي دِيَارِهِمْ جَاثِم۪ينَۙ94
अन्ततः जब हमारा आदेश आ पहुँचा तो हमने अपनी दयालुता से शुऐब और उसके साथ के ईमान लानेवालों को बचा लिया। और अत्याचार करनेवालों को एक प्रचंड चिंघार ने आ लिया और वे अपने घरों में औंधे पड़े रह गए,
كَاَنْ لَمْ يَغْنَوْا ف۪يهَاۜ اَلَا بُعْدًا لِمَدْيَنَ كَمَا بَعِدَتْ ثَمُودُ۟95
मानो वे वहाँ कभी बसे ही न थे। "सुन लो! फिटकार है मदयनवालों पर, जैसे समूद पर फिटकार हुई!"
وَلَقَدْ اَرْسَلْنَا مُوسٰى بِاٰيَاتِنَا وَسُلْطَانٍ مُب۪ينٍۙ96
और हमने मूसा को अपनी निशानियाँ और स्पष्ट प्रमाण के साथ
اِلٰى فِرْعَوْنَ وَمَلَا۬ئِه۪ فَاتَّبَعُٓوا اَمْرَ فِرْعَوْنَۚ وَمَٓا اَمْرُ فِرْعَوْنَ بِرَش۪يدٍ97
फ़िरऔन और उसके सरदारों के पास भेजा, किन्तु वे फ़िरऔन ही के कहने पर चले, हालाँकि फ़िरऔन की बात कोई ठीक बात न थी।
يَقْدُمُ قَوْمَهُ يَوْمَ الْقِيٰمَةِ فَاَوْرَدَهُمُ النَّارَۜ وَبِئْسَ الْوِرْدُ الْمَوْرُودُ98
क़ियामत के दिन वह अपनी क़ौम के लोगों के आगे होगा - और उसने उन्हें आग में जा उतारा, और बहुत ही बुरा घाट है वह उतरने का!
وَاُتْبِعُوا ف۪ي هٰذِه۪ لَعْنَةً وَيَوْمَ الْقِيٰمَةِۜ بِئْسَ الرِّفْدُ الْمَرْفُودُ99
यहाँ भी लानत ने उनका पीछा किया और क़ियामत के दिन भी - बहुत ही बुरा पुरस्कार है यह जो किसी को दिया जाए!
ذٰلِكَ مِنْ اَنْبَٓاءِ الْقُرٰى نَقُصُّهُ عَلَيْكَ مِنْهَا قَٓائِمٌ وَحَص۪يدٌ100
ये बस्तियों के कुछ वृत्तान्त हैं, जो हम तुम्हें सुना रहे है। इनमें कुछ तो खड़ी है और कुछ की फ़सल कट चुकी है
وَمَا ظَلَمْنَاهُمْ وَلٰكِنْ ظَلَمُٓوا اَنْفُسَهُمْ فَمَٓا اَغْنَتْ عَنْهُمْ اٰلِهَتُهُمُ الَّت۪ي يَدْعُونَ مِنْ دُونِ اللّٰهِ مِنْ شَيْءٍ لَمَّا جَٓاءَ اَمْرُ رَبِّكَۜ وَمَا زَادُوهُمْ غَيْرَ تَتْب۪يبٍ101
हमने उनपर अत्याचार नहीं किया, बल्कि उन्होंने स्वयं अपने आप पर अत्याचार किया। फिर जब तेरे रब का आदेश आ गया तो उसके वे पूज्य, जिन्हें वे अल्लाह से हटकर पुकारा करते थे, उनके कुछ भी काम न आ सके। उन्होंने विनाश के अतिरिक्त उनके लिए किसी और चीज़ में अभिवृद्धि नहीं की
وَكَذٰلِكَ اَخْذُ رَبِّكَ اِذَٓا اَخَذَ الْقُرٰى وَهِيَ ظَالِمَةٌۜ اِنَّ اَخْذَهُٓ اَل۪يمٌ شَد۪يدٌ102
तेरे रब की पकड़ ऐसी ही होती है, जब वह किसी ज़ालिम बस्ती को पकड़ता है। निस्संदेह उसकी पकड़ बड़ी दुखद, अत्यन्त कठोर होती है
اِنَّ ف۪ي ذٰلِكَ لَاٰيَةً لِمَنْ خَافَ عَذَابَ الْاٰخِرَةِۜ ذٰلِكَ يَوْمٌ مَجْمُوعٌۙ لَهُ النَّاسُ وَذٰلِكَ يَوْمٌ مَشْهُودٌ103
निश्चय ही इसमें उस व्यक्ति के लिए एक निशानी है जो आख़िरत की यातना से डरता हो। वह एक ऐसा दिन होगा, जिसमें सारे ही लोग एकत्र किए जाएँगे और वह एक ऐसा दिन होगा, जिसमें सब कुछ आँखों के सामने होगा,
وَمَا نُؤَخِّرُهُٓ اِلَّا لِاَجَلٍ مَعْدُودٍۜ104
हम उसे केवल थोड़ी अवधि के लिए ही लग रहे है;
يَوْمَ يَاْتِ لَا تَكَلَّمُ نَفْسٌ اِلَّا بِاِذْنِه۪ۚ فَمِنْهُمْ شَقِيٌّ وَسَع۪يدٌ105
जिस दिन वह आएगा, तो उसकी अनुमति के बिना कोई व्यक्ति बात तक न कर सकेगा। फिर (मानवों में) कोई तो उनमें अभागा होगा और कोई भाग्यशाली
فَاَمَّا الَّذ۪ينَ شَقُوا فَفِي النَّارِ لَهُمْ ف۪يهَا زَف۪يرٌ وَشَه۪يقٌۙ106
तो जो अभागे होंगे, वे आग में होंगे; जहाँ उन्हें आर्तनाद करना और फुँकार मारना है
خَالِد۪ينَ ف۪يهَا مَا دَامَتِ السَّمٰوَاتُ وَالْاَرْضُ اِلَّا مَا شَٓاءَ رَبُّكَۜ اِنَّ رَبَّكَ فَعَّالٌ لِمَا يُر۪يدُ107
वहाँ वे सदैव रहेंगे, जब तक आकाश और धरती स्थिर रहें, बात यह है कि तुम्हारे रब की इच्छा ही चलेगी। तुम्हारा रब जो चाहे करे
وَاَمَّا الَّذ۪ينَ سُعِدُوا فَفِي الْجَنَّةِ خَالِد۪ينَ ف۪يهَا مَا دَامَتِ السَّمٰوَاتُ وَالْاَرْضُ اِلَّا مَا شَٓاءَ رَبُّكَۜ عَطَٓاءً غَيْرَ مَجْذُوذٍ108
रहे वे जो भाग्यशाली होंगे तो वे जन्नत में होंगे, जहाँ वे सदैव रहेंगे जब तक आकाश और धरती स्थिर रहें। बात यह है कि तुम्हारे रब की इच्छा ही चलेगी। यह एक ऐसा उपहार है, जिसका सिलसिला कभी न टूटेगा
فَلَا تَكُ ف۪ي مِرْيَةٍ مِمَّا يَعْبُدُ هٰٓؤُ۬لَٓاءِۜ مَا يَعْبُدُونَ اِلَّا كَمَا يَعْبُدُ اٰبَٓاؤُ۬هُمْ مِنْ قَبْلُۜ وَاِنَّا لَمُوَفُّوهُمْ نَص۪يبَهُمْ غَيْرَ مَنْقُوصٍ۟109
अतः जिनको ये पूज रहे है, उनके विषय में तुझे कोई संदेह न हो। ये तो बस उसी तरह पूजा किए जा रहे है, जिस तरह इससे पहले इनके बाप-दादा पूजा करते रहे हैं। हम तो इन्हें इनका हिस्सा बिना किसी कमी के पूरा-पूरा देनेवाले हैं
وَلَقَدْ اٰتَيْنَا مُوسَى الْكِتَابَ فَاخْتُلِفَ ف۪يهِۜ وَلَوْلَا كَلِمَةٌ سَبَقَتْ مِنْ رَبِّكَ لَقُضِيَ بَيْنَهُمْۜ وَاِنَّهُمْ لَف۪ي شَكٍّ مِنْهُ مُر۪يبٍ110
हम मूसा को भी किताब दे चुके है। फिर उसमें भी विभेद किया गया था। यदि तुम्हारे रब की ओर से एक बात पहले ही निश्चित न कर दी गई होती तो उनके बीच कभी का फ़ैसला कर दिया गया होता। ये उसकी ओर से असमंजस में डाल देनेवाले संदेह में पड़े हुए है
وَاِنَّ كُلًّا لَمَّا لَيُوَفِّيَنَّهُمْ رَبُّكَ اَعْمَالَهُمْۜ اِنَّهُ بِمَا يَعْمَلُونَ خَب۪يرٌ111
निश्चय ही समय आने पर एक-एक को, जितने भी है उनको तुम्हारा रब उनका किया पूरा-पूरा देकर रहेगा। वे जो कुछ कर रहे हैं, निस्संदेह उसे उसकी पूरी ख़बर है
فَاسْتَقِمْ كَمَٓا اُمِرْتَ وَمَنْ تَابَ مَعَكَ وَلَا تَطْغَوْاۜ اِنَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَص۪يرٌ112
अतः जैसा तुम्हें आदेश हुआ है, जमें रहो और तुम्हारे साथ के तौबा करनेवाले भी जमें रहें, और सीमोल्लंघन न करना। जो कुछ भी तुम करते हो, निश्चय ही वह उसे देख रहा है
وَلَا تَرْكَنُٓوا اِلَى الَّذ۪ينَ ظَلَمُوا فَتَمَسَّكُمُ النَّارُۙ وَمَا لَكُمْ مِنْ دُونِ اللّٰهِ مِنْ اَوْلِيَٓاءَ ثُمَّ لَا تُنْصَرُونَ113
उन लोगों की ओर तनिक भी न झुकना, जिन्होंने अत्याचार की नीति अपनाई हैं, अन्यथा आग तुम्हें आ लिपटेगी - और अल्लाह से हटकर तुम्हारा कोई संरक्षक मित्र नहीं - फिर तुम्हें कोई सहायता भी न मिलेगी
وَاَقِمِ الصَّلٰوةَ طَرَفَيِ النَّهَارِ وَزُلَفًا مِنَ الَّيْلِۜ اِنَّ الْحَسَنَاتِ يُذْهِبْنَ السَّيِّـَٔاتِۜ ذٰلِكَ ذِكْرٰى لِلذَّاكِر۪ينَۚ114
और नमाज़ क़ायम करो दिन के दोनों सिरों पर और रात के कुछ हिस्से में। निस्संदेह नेकियाँ बुराइयों को दूर कर देती है। यह याद रखनेवालों के लिए एक अनुस्मरण है
وَاصْبِرْ فَاِنَّ اللّٰهَ لَا يُض۪يعُ اَجْرَ الْمُحْسِن۪ينَ115
और धैर्य से काम लो, इसलिए कि अल्लाह सुकर्मियों को बदला अकारथ नहीं करता;
فَلَوْلَا كَانَ مِنَ الْقُرُونِ مِنْ قَبْلِكُمْ اُو۬لُوا بَقِيَّةٍ يَنْهَوْنَ عَنِ الْفَسَادِ فِي الْاَرْضِ اِلَّا قَل۪يلًا مِمَّنْ اَنْجَيْنَا مِنْهُمْۚ وَاتَّبَعَ الَّذ۪ينَ ظَلَمُوا مَٓا اُتْرِفُوا ف۪يهِ وَكَانُوا مُجْرِم۪ينَ116
फिर तुमसे पहले जो नस्लें गुज़र चुकी है उनमें ऐसे भले-समझदार क्यों न हुए जो धरती में बिगाड़ से रोकते, उन थोड़े-से लोगों के सिवा जिनको उनमें से हमने बचा लिया। अत्याचारी लोग तो उसी सुख-सामग्री के पीछे पड़े रहे, जिसमें वे रखे गए थे। वे तो थे ही अपराधी
وَمَا كَانَ رَبُّكَ لِيُهْلِكَ الْقُرٰى بِظُلْمٍ وَاَهْلُهَا مُصْلِحُونَ117
तुम्हारा रब तो ऐसा नहीं है कि बस्तियों को अकारण विनष्ट कर दे, जबकि वहाँ के निवासी बनाव और सुधार में लगे हों
وَلَوْ شَٓاءَ رَبُّكَ لَجَعَلَ النَّاسَ اُمَّةً وَاحِدَةً وَلَا يَزَالُونَ مُخْتَلِف۪ينَۙ118
और यदि तुम्हारा रब चाहता तो वह सारे मनुष्यों को एक समुदाय बना देता, किन्तु अब तो वे सदैव विभेद करते ही रहेंगे,
اِلَّا مَنْ رَحِمَ رَبُّكَۜ وَلِذٰلِكَ خَلَقَهُمْۜ وَتَمَّتْ كَلِمَةُ رَبِّكَ لَاَمْلَـَٔنَّ جَهَنَّمَ مِنَ الْجِنَّةِ وَالنَّاسِ اَجْمَع۪ينَ119
सिवाय उनके जिनपर तुम्हारा रब दया करे और इसी के लिए उसने उन्हें पैदा किया है, और तुम्हारे रब की यह बात पूरी होकर रही कि "मैं जहन्नम को अपराधी जिन्नों और मनुष्यों सबसे भरकर रहूँगा।"
وَكُلًّا نَقُصُّ عَلَيْكَ مِنْ اَنْبَٓاءِ الرُّسُلِ مَا نُثَبِّتُ بِه۪ فُؤَادَكَۚ وَجَٓاءَكَ ف۪ي هٰذِهِ الْحَقُّ وَمَوْعِظَةٌ وَذِكْرٰى لِلْمُؤْمِن۪ينَ120
रसूलों के वृत्तान्तों में से हर वह कथा जो हम तुम्हें सुनाते है उसके द्वारा हम तुम्हारे हृदय को सुदृढ़ करते हैं। और इसमें तुम्हारे पास सत्य आ गया है और मोमिनों के लिए उपदेश और अनुस्मरण भी
وَقُلْ لِلَّذ۪ينَ لَا يُؤْمِنُونَ اعْمَلُوا عَلٰى مَكَانَتِكُمْۜ اِنَّا عَامِلُونَۙ121
जो लोग ईमान नहीं ला रहे हैं उनसे कह दो, "तुम अपनी जगह कर्म किए जाओ, हम भी कर्म कर रहे है
وَانْتَظِرُواۚ اِنَّا مُنْتَظِرُونَ122
तुम भी प्रतीक्षा करो, हम भी प्रतीक्षा कर रहे है।"
وَلِلّٰهِ غَيْبُ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِ وَاِلَيْهِ يُرْجَعُ الْاَمْرُ كُلُّهُ فَاعْبُدْهُ وَتَوَكَّلْ عَلَيْهِۜ وَمَا رَبُّكَ بِغَافِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ123
अल्लाह ही का है जो कुछ आकाशों और धरती में छिपा है, और हर मामला उसी की ओर पलटता है। अतः उसी की बन्दगी करो और उसी पर भरोसा रखो। जो कुछ तुम करते हो, उससे तुम्हारा रब बेख़बर नहीं है
12 · यूसुफ़
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
الٓرٰ۠ تِلْكَ اٰيَاتُ الْكِتَابِ الْمُب۪ينِ۠1
अलिफ़॰ लाम॰ रा॰। ये स्पष्ट किताब की आयतें हैं
اِنَّٓا اَنْزَلْنَاهُ قُرْءٰنًا عَرَبِيًّا لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ2
हमने इसे अरबी क़ुरआन के रूप में उतारा है, ताकि तुम समझो
نَحْنُ نَقُصُّ عَلَيْكَ اَحْسَنَ الْقَصَصِ بِمَٓا اَوْحَيْنَٓا اِلَيْكَ هٰذَا الْقُرْاٰنَۗ وَاِنْ كُنْتَ مِنْ قَبْلِه۪ لَمِنَ الْغَافِل۪ينَ3
इस क़ुरआन की तुम्हारी ओर प्रकाशना करके इसके द्वारा हम तुम्हें एक बहुत ही अच्छा बयान सुनाते है, यद्यपि इससे पहले तुम बेख़बर थे
اِذْ قَالَ يُوسُفُ لِاَب۪يهِ يَٓا اَبَتِ اِنّ۪ي رَاَيْتُ اَحَدَ عَشَرَ كَوْكَبًا وَالشَّمْسَ وَالْقَمَرَ رَاَيْتُهُمْ ل۪ي سَاجِد۪ينَ4
जब यूसुफ़ ने अपने बाप से कहा, "ऐ मेरे बाप! मैंने स्वप्न में ग्यारह सितारे देखे और सूर्य और चाँद। मैंने उन्हें देखा कि वे मुझे सजदा कर रहे है।"
قَالَ يَا بُنَيَّ لَا تَقْصُصْ رُءْيَاكَ عَلٰٓى اِخْوَتِكَ فَيَك۪يدُوا لَكَ كَيْدًاۜ اِنَّ الشَّيْطَانَ لِلْاِنْسَانِ عَدُوٌّ مُب۪ينٌ5
उसने कहा, "ऐ मेरे बेटे! अपना स्वप्न अपने भाइयों को मत बताना, अन्यथा वे तेरे विरुद्ध कोई चाल चलेंगे। शैतान तो मनुष्य का खुला हुआ शत्रु है
وَكَذٰلِكَ يَجْتَب۪يكَ رَبُّكَ وَيُعَلِّمُكَ مِنْ تَاْو۪يلِ الْاَحَاد۪يثِ وَيُتِمُّ نِعْمَتَهُ عَلَيْكَ وَعَلٰٓى اٰلِ يَعْقُوبَ كَمَٓا اَتَمَّهَا عَلٰٓى اَبَوَيْكَ مِنْ قَبْلُ اِبْرٰه۪يمَ وَاِسْحٰقَۜ اِنَّ رَبَّكَ عَل۪يمٌ حَك۪يمٌ۟6
और ऐसा ही होगा, तेरा रब तुझे चुन लेगा और तुझे बातों की तथ्य तक पहुँचना सिखाएगा और अपना अनुग्रह तुझपर और याकूब के घरवालों पर उसी प्रकार पूरा करेगा, जिस प्रकार इससे पहले वह तेरे पूर्वज इबराहीम और इसहाक़ पर पूरा कर चुका है। निस्संदेह तेरा रब सर्वज्ञ, तत्वदर्शी है।"
لَقَدْ كَانَ ف۪ي يُوسُفَ وَاِخْوَتِه۪ٓ اٰيَاتٌ لِلسَّٓائِل۪ينَ7
निश्चय ही यूसुफ़ और उनके भाइयों में सवाल करनेवालों के लिए निशानियाँ है
اِذْ قَالُوا لَيُوسُفُ وَاَخُوهُ اَحَبُّ اِلٰٓى اَب۪ينَا مِنَّا وَنَحْنُ عُصْبَةٌۜ اِنَّ اَبَانَا لَف۪ي ضَلَالٍ مُب۪ينٍۚ8
जबकि उन्होंने कहा, "यूसुफ़ और उसका भाई हमारे बाप को हमसे अधिक प्रिय है, हालाँकि हम एक पूरा जत्था है। वासत्व में हमारे बाप स्पष्ट तः बहक गए है
اُقْتُلُوا يُوسُفَ اَوِ اطْرَحُوهُ اَرْضًا يَخْلُ لَكُمْ وَجْهُ اَب۪يكُمْ وَتَكُونُوا مِنْ بَعْدِه۪ قَوْمًا صَالِح۪ينَ9
यूसुफ़ को मार डालो या उसे किसी भूभाग में फेंक आओ, ताकि तुम्हारे बाप का ध्यान केवल तुम्हारी ही ओर हो जाए। इसके पश्चात तुम फिर नेक बन जाना।"
قَالَ قَٓائِلٌ مِنْهُمْ لَا تَقْتُلُوا يُوسُفَ وَاَلْقُوهُ ف۪ي غَيَابَتِ الْجُبِّ يَلْتَقِطْهُ بَعْضُ السَّيَّارَةِ اِنْ كُنْتُمْ فَاعِل۪ينَ10
उनमें से एक बोलनेवाला बोल पड़ा, "यूसुफ़ की हत्या न करो, यदि तुम्हें कुछ करना ही है तो उसे किसी कुएँ की तह में डाल दो। कोई राहगीर उसे उठा लेगा।"
قَالُوا يَٓا اَبَانَا مَا لَكَ لَا تَاْمَنَّۭۖا عَلٰى يُوسُفَ وَاِنَّا لَهُ لَنَاصِحُونَ11
उन्होंने कहा, "ऐ हमारे बाप! आपको क्या हो गया है कि यूसुफ़ के मामले में आप हमपर भरोसा नहीं करते, हालाँकि हम तो उसके हितैषी है?
اَرْسِلْهُ مَعَنَا غَدًا يَرْتَعْ وَيَلْعَبْ وَاِنَّا لَهُ لَحَافِظُونَ12
हमारे साथ कल उसे भेज दीजिए कि वह कुछ चर-चुग और खेल ले। उसकी रक्षा के लिए तो हम हैं ही।"
قَالَ اِنّ۪ي لَيَحْزُنُن۪ٓي اَنْ تَذْهَبُوا بِه۪ وَاَخَافُ اَنْ يَاْكُلَهُ الذِّئْبُ وَاَنْتُمْ عَنْهُ غَافِلُونَ13
उसने कहा, यह बात कि तुम उसे ले जाओ, मुझे दुखी कर देती है। कहीं ऐसा न हो कि तुम उसका ध्यान न रख सको और भेड़िया उसे खा जाए।"
قَالُوا لَئِنْ اَكَلَهُ الذِّئْبُ وَنَحْنُ عُصْبَةٌ اِنَّٓا اِذًا لَخَاسِرُونَ14
वे बोले, "हमारे एक जत्थे के होते हुए भी यदि उसे भेड़िए ने खा लिया, तब तो निश्चय ही हम सब कुछ गँवा बैठे।"
فَلَمَّا ذَهَبُوا بِه۪ وَاَجْمَعُٓوا اَنْ يَجْعَلُوهُ ف۪ي غَيَابَتِ الْجُبِّۚ وَاَوْحَيْنَٓا اِلَيْهِ لَتُنَبِّئَنَّهُمْ بِاَمْرِهِمْ هٰذَا وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ15
फिर जब वे उसे ले गए और सभी इस बात पर सहमत हो गए कि उसे एक कुएँ की गहराई में डाल दें (तो उन्होंने वह किया जो करना चाहते थे), और हमने उसकी ओर प्रकाशना का, "तू उन्हें उनके इस कर्म से अवगत कराएगा और वे जानते न होंगे।"
وَجَٓاؤُٓ۫ اَبَاهُمْ عِشَٓاءً يَبْكُونَۜ16
कुछ रात बीते वे रोते हुए अपने बाप के पास आए
قَالُوا يَٓا اَبَانَٓا اِنَّا ذَهَبْنَا نَسْتَبِقُ وَتَرَكْنَا يُوسُفَ عِنْدَ مَتَاعِنَا فَاَكَلَهُ الذِّئْبُۚ وَمَٓا اَنْتَ بِمُؤْمِنٍ لَنَا وَلَوْ كُنَّا صَادِق۪ينَ17
कहने लगे, "ऐ मेरे बाप! हम परस्पर दौड़ में मुक़ाबला करते हुए दूर चले गए और यूसफ़ को हमने अपने सामान के साथ छोड़ दिया था कि इतने में भेड़िया उसे खा गया। आप तो हमपर विश्वास करेंगे नहीं, यद्यपि हम सच्चे है।"
وَجَٓاؤُ۫ عَلٰى قَم۪يصِه۪ بِدَمٍ كَذِبٍۜ قَالَ بَلْ سَوَّلَتْ لَكُمْ اَنْفُسُكُمْ اَمْرًاۜ فَصَبْرٌ جَم۪يلٌۜ وَاللّٰهُ الْمُسْتَعَانُ عَلٰى مَا تَصِفُونَ18
वे उसके कुर्ते पर झूठमूठ का ख़ून लगा लाए थे। उसने कहा, "नहीं, बल्कि तुम्हारे जी ने बहकाकर तुम्हारे लिए एक बात बना दी है। अब धैर्य से काम लेना ही उत्तम है! जो बात तुम बता रहे हो उसमें अल्लाह ही सहायक हो सकता है।"
وَجَٓاءَتْ سَيَّارَةٌ فَاَرْسَلُوا وَارِدَهُمْ فَاَدْلٰى دَلْوَهُۜ قَالَ يَا بُشْرٰى هٰذَا غُلَامٌۜ وَاَسَرُّوهُ بِضَاعَةًۜ وَاللّٰهُ عَل۪يمٌ بِمَا يَعْمَلُونَ19
एक क़ाफ़िला आया। फिर उसने पनिहारा को भेजा। उसने अपना डोल ज्यों ही डाला तो पुकार उठा, "अरे! कितनी ख़ुशी की बात है। यह तो एक लड़का है।" उन्होंने उसे व्यापार का माल समझकर छुपा लिया। किन्तु जो कुछ वे कर रहे थे, अल्लाह तो उसे जानता ही था
وَشَرَوْهُ بِثَمَنٍ بَخْسٍ دَرَاهِمَ مَعْدُودَةٍۚ وَكَانُوا ف۪يهِ مِنَ الزَّاهِد۪ينَ۟20
उन्होंने उसे सस्ते दाम, गिनती के कुछ दिरहमों में बेच दिया, क्योंकि वे उसके मामलें में बेपरवाह थे
وَقَالَ الَّذِي اشْتَرٰيهُ مِنْ مِصْرَ لِامْرَاَتِه۪ٓ اَكْرِم۪ي مَثْوٰيهُ عَسٰٓى اَنْ يَنْفَعَنَٓا اَوْ نَتَّخِذَهُ وَلَدًاۜ وَكَذٰلِكَ مَكَّنَّا لِيُوسُفَ فِي الْاَرْضِۘ وَلِنُعَلِّمَهُ مِنْ تَاْو۪يلِ الْاَحَاد۪يثِۜ وَاللّٰهُ غَالِبٌ عَلٰٓى اَمْرِه۪ وَلٰكِنَّ اَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ21
मिस्र के जिस व्यक्ति ने उसे ख़रीदा, उसने अपनी स्त्री से कहा, "इसको अच्छी तरह रखना। बहुत सम्भव है कि यह हमारे काम आए या हम इसे बेटा बना लें।" इस प्रकार हमने उस भूभाग में यूसुफ़ के क़दम जमाने की राह निकाली (ताकि उसे प्रतिष्ठा प्रदान करें) और ताकि मामलों और बातों के परिणाम से हम उसे अवगत कराएँ। अल्लाह तो अपना काम करके रहता है, किन्तु अधिकतर लोग जानते नहीं
وَلَمَّا بَلَغَ اَشُدَّهُٓ اٰتَيْنَاهُ حُكْمًا وَعِلْمًاۜ وَكَذٰلِكَ نَجْزِي الْمُحْسِن۪ينَ22
और जब वह अपनी जवानी को पहुँचा तो हमने उसे निर्णय-शक्ति और ज्ञान प्रदान किया। उत्तमकार लोगों को हम इसी प्रकार बदला देते है
وَرَاوَدَتْهُ الَّت۪ي هُوَ ف۪ي بَيْتِهَا عَنْ نَفْسِه۪ وَغَلَّقَتِ الْاَبْوَابَ وَقَالَتْ هَيْتَ لَكَۜ قَالَ مَعَاذَ اللّٰهِ اِنَّهُ رَبّ۪ٓي اَحْسَنَ مَثْوَايَۜ اِنَّهُ لَا يُفْلِحُ الظَّالِمُونَ23
जिस स्त्री के घर में वह रहता था, वह उस पर डोरे डालने लगी। उसने दरवाज़े बन्द कर दिए और कहने लगी, "लो, आ जाओ!" उसने कहा, "अल्लाह की पनाह! मेरे रब ने मुझे अच्छा स्थान दिया है। अत्याचारी कभी सफल नहीं होते।"
وَلَقَدْ هَمَّتْ بِه۪ۗ وَهَمَّ بِهَاۚ لَوْلَٓا اَنْ رَاٰ بُرْهَانَ رَبِّه۪ۜ كَذٰلِكَ لِنَصْرِفَ عَنْهُ السُّٓوءَ وَالْفَحْشَٓاءَۜ اِنَّهُ مِنْ عِبَادِنَا الْمُخْلَص۪ينَ24
उसने उसका इरादा कर लिया था। यदि वह अपने रब का स्पष्ट॥ प्रमाण न देख लेता तो वह भी उसका इरादा कर लेता। ऐसा इसलिए हुआ ताकि हम बुराई और अश्लीलता को उससे दूर रखें। निस्संदेह वह हमारे चुने हुए बन्दों में से था
وَاسْتَبَقَا الْبَابَ وَقَدَّتْ قَم۪يصَهُ مِنْ دُبُرٍ وَاَلْفَيَا سَيِّدَهَا لَدَا الْبَابِۜ قَالَتْ مَا جَزَٓاءُ مَنْ اَرَادَ بِاَهْلِكَ سُٓوءًا اِلَّٓا اَنْ يُسْجَنَ اَوْ عَذَابٌ اَل۪يمٌ25
वे दोनों दरवाज़े की ओर झपटे और उस स्त्री ने उसका कुर्ता पीछे से फाड़ डाला। दरवाज़े पर दोनों ने उस स्त्री के पति को उपस्थित पाया। वह बोली, "जो कोई तुम्हारी घरवाली के साथ बुरा इरादा करे, उसका बदला इसके सिवा और क्या होगा कि उसे बन्दी बनाया जाए या फिर कोई दुखद यातना दी जाए?"
قَالَ هِيَ رَاوَدَتْن۪ي عَنْ نَفْس۪ي وَشَهِدَ شَاهِدٌ مِنْ اَهْلِهَاۚ اِنْ كَانَ قَم۪يصُهُ قُدَّ مِنْ قُبُلٍ فَصَدَقَتْ وَهُوَ مِنَ الْكَاذِب۪ينَ26
उसने कहा, "यही मुझपर डोरे डाल रही थी।" उस स्त्री के लोगों में से एक गवाह ने गवाही दी, "यदि इसका कुर्ता आगे से फटा है तो यह सच्ची है और यह झूठा है,
وَاِنْ كَانَ قَم۪يصُهُ قُدَّ مِنْ دُبُرٍ فَكَذَبَتْ وَهُوَ مِنَ الصَّادِق۪ينَ27
और यदि उसका कुर्ता पीछे से फटा है तो यह झूठी है और यह सच्चा है।"
فَلَمَّا رَاٰ قَم۪يصَهُ قُدَّ مِنْ دُبُرٍ قَالَ اِنَّهُ مِنْ كَيْدِكُنَّۜ اِنَّ كَيْدَكُنَّ عَظ۪يمٌ28
फिर जब देखा कि उसका कुर्ता पीछे से फटा है तो उसने कहा, "यह तुम स्त्रियों की चाल है। निश्चय ही तुम्हारी चाल बड़े ग़ज़ब की होती है
يُوسُفُ اَعْرِضْ عَنْ هٰذَا وَاسْتَغْفِر۪ي لِذَنْبِكِۚ اِنَّكِ كُنْتِ مِنَ الْخَاطِـ۪ٔينَ۟29
यूसुफ़! इस मामले को जाने दे और स्त्री तू अपने गुनाह की माफ़ी माँग। निस्संदेह ख़ता तेरी ही है।"
وَقَالَ نِسْوَةٌ فِي الْمَد۪ينَةِ امْرَاَتُ الْعَز۪يزِ تُرَاوِدُ فَتٰيهَا عَنْ نَفْسِه۪ۚ قَدْ شَغَفَهَا حُبًّاۜ اِنَّا لَنَرٰيهَا ف۪ي ضَلَالٍ مُب۪ينٍ30
नगर की स्त्रियाँ कहने लगी, "अज़ीज़ की पत्नी अपने नवयुवक ग़ुलाम पर डोरे डालना चाहती है। वह प्रेम-प्रेरणा से उसके मन में घर कर गया है। हम तो उसे देख रहे हैं कि वह खुली ग़लती में पड़ गई है।"
فَلَمَّا سَمِعَتْ بِمَكْرِهِنَّ اَرْسَلَتْ اِلَيْهِنَّ وَاَعْتَدَتْ لَهُنَّ مُتَّكَـًٔا وَاٰتَتْ كُلَّ وَاحِدَةٍ مِنْهُنَّ سِكّ۪ينًا وَقَالَتِ اخْرُجْ عَلَيْهِنَّۚ فَلَمَّا رَاَيْنَهُٓ اَكْبَرْنَهُ وَقَطَّعْنَ اَيْدِيَهُنَّ وَقُلْنَ حَاشَ لِلّٰهِ مَا هٰذَا بَشَرًاۜ اِنْ هٰذَٓا اِلَّا مَلَكٌ كَر۪يمٌ31
उसने जब उनकी मक्करी की बातें सुनी तो उन्हें बुला भेजा और उनमें से हरेक के लिए आसन सुसज्जित किया और उनमें से हरेक को एक छुरी दी। उसने (यूसुफ़ से) कहा, "इनके सामने आ जाओ।" फिर जब स्त्रियों ने देखा तो वे उसकी बड़ाई से दंग रह गई। उन्होंने अपने हाथ घायल कर लिए और कहने लगी, "अल्लाह की पनाह! यह कोई मनुष्य नहीं। यह तो कोई प्रतिष्ठित फ़रिश्ता है।‍"
قَالَتْ فَذٰلِكُنَّ الَّذ۪ي لُمْتُنَّن۪ي ف۪يهِۜ وَلَقَدْ رَاوَدْتُهُ عَنْ نَفْسِه۪ فَاسْتَعْصَمَۜ وَلَئِنْ لَمْ يَفْعَلْ مَٓا اٰمُرُهُ لَيُسْجَنَنَّ وَلَيَكُونًا مِنَ الصَّاغِر۪ينَ32
वह बोली, "यह वही है जिसके विषय में तुम मुझे मलामत कर रही थीं। हाँ, मैंने इसे रिझाना चाहा था, किन्तु यह बचा रहा। और यदि इसने न किया जो मैं इससे कहती तो यह अवश्य क़ैद किया जाएगा और अपमानित होगा।"
قَالَ رَبِّ السِّجْنُ اَحَبُّ اِلَيَّ مِمَّا يَدْعُونَن۪ٓي اِلَيْهِۚ وَاِلَّا تَصْرِفْ عَنّ۪ي كَيْدَهُنَّ اَصْبُ اِلَيْهِنَّ وَاَكُنْ مِنَ الْجَاهِل۪ينَ33
उसने कहा, "ऐ मेरे रब! जिसकी ओर ये सब मुझे बुला रही हैं, उससे अधिक तो मुझे क़ैद ही पसन्द है यदि तूने उनके दाँव-घात को मुझसे न टाला तो मैं उनकी और झुक जाऊँगा और निरे आवेग के वशीभूत हो जाऊँगा।"
فَاسْتَجَابَ لَهُ رَبُّهُ فَصَرَفَ عَنْهُ كَيْدَهُنَّۜ اِنَّهُ هُوَ السَّم۪يعُ الْعَل۪يمُ34
अतः उसने रब ने उसकी सुन ली और उसकी ओर से उन स्त्रियों के दाँव-घात को टाल दिया। निस्संदेह वह सब कुछ सुनता, जानता है
ثُمَّ بَدَا لَهُمْ مِنْ بَعْدِ مَا رَاَوُا الْاٰيَاتِ لَيَسْجُنُنَّهُ حَتّٰى ح۪ينٍ۟35
फिर उन्हें, इसके पश्चात कि वे निशानियाँ देख चुके थे, यह सूझा कि उसे एक अवधि के लिए क़ैद कर दें
وَدَخَلَ مَعَهُ السِّجْنَ فَتَيَانِۜ قَالَ اَحَدُهُمَٓا اِنّ۪ٓي اَرٰين۪ٓي اَعْصِرُ خَمْرًاۚ وَقَالَ الْاٰخَرُ اِنّ۪ٓي اَرٰين۪ٓي اَحْمِلُ فَوْقَ رَاْس۪ي خُبْزًا تَاْكُلُ الطَّيْرُ مِنْهُۜ نَبِّئْنَا بِتَاْو۪يلِه۪ۚ اِنَّا نَرٰيكَ مِنَ الْمُحْسِن۪ينَ36
कारागार में दो नव युवकों ने भी उसके साथ प्रवेश किया। उनमें से एक ने कहा, "मैंने स्वप्न देखा है कि मैं शराब निचोड़ रहा हूँ।" दूसरे ने कहा, "मैंने देखा कि मैं अपने सिर पर रोटियाँ उठाए हुए हूँ, जिनको पक्षी खा रहे है। हमें इसका अर्थ बता दीजिए। हमें तो आप बहुत ही नेक नज़र आते है।"
قَالَ لَا يَاْت۪يكُمَا طَعَامٌ تُرْزَقَانِه۪ٓ اِلَّا نَبَّاْتُكُمَا بِتَاْو۪يلِه۪ قَبْلَ اَنْ يَاْتِيَكُمَاۜ ذٰلِكُمَا مِمَّا عَلَّمَن۪ي رَبّ۪يۜ اِنّ۪ي تَرَكْتُ مِلَّةَ قَوْمٍ لَا يُؤْمِنُونَ بِاللّٰهِ وَهُمْ بِالْاٰخِرَةِ هُمْ كَافِرُونَۙ37
उसने कहा, "जो भोजन तुम्हें मिला करता है वह तुम्हारे पास नहीं आ पाएगा, उसके तुम्हारे पास आने से पहले ही मैं तुम्हें इसका अर्थ बता दूँगा। यह उन बातों में से है, जो मेरे रब ने मुझे सिखाई है। मैं तो उन लोगों का तरीक़ा छोड़कर, जो अल्लाह को नहीं मानते और जो आख़िरत (परलोक) का इनकार करते हैं,
وَاتَّبَعْتُ مِلَّةَ اٰبَٓاء۪ٓي اِبْرٰه۪يمَ وَاِسْحٰقَ وَيَعْقُوبَۜ مَا كَانَ لَنَٓا اَنْ نُشْرِكَ بِاللّٰهِ مِنْ شَيْءٍۜ ذٰلِكَ مِنْ فَضْلِ اللّٰهِ عَلَيْنَا وَعَلَى النَّاسِ وَلٰكِنَّ اَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَشْكُرُونَ38
अपने पूर्वज इबराहीम, इसहाक़ और याक़ूब का तरीक़ा अपनाया है। इमसे यह नहीं हो सकता कि हम अल्लाह के साथ किसी चीज़ को साझी ठहराएँ। यह हमपर और लोगों पर अल्लाह का अनुग्रह है। किन्तु अधिकतर लोग आभार नहीं प्रकट करते
يَا صَاحِبَيِ السِّجْنِ ءَاَرْبَابٌ مُتَفَرِّقُونَ خَيْرٌ اَمِ اللّٰهُ الْوَاحِدُ الْقَهَّارُۜ39
ऐ कारागर के मेरे साथियों! क्या अलग-अलग बहुत-से रह अच्छे है या अकेला अल्लाह जिसका प्रभुत्व सबपर है?
مَا تَعْبُدُونَ مِنْ دُونِه۪ٓ اِلَّٓا اَسْمَٓاءً سَمَّيْتُمُوهَٓا اَنْتُمْ وَاٰبَٓاؤُ۬كُمْ مَٓا اَنْزَلَ اللّٰهُ بِهَا مِنْ سُلْطَانٍۜ اِنِ الْحُكْمُ اِلَّا لِلّٰهِۜ اَمَرَ اَلَّا تَعْبُدُٓوا اِلَّٓا اِيَّاهُۜ ذٰلِكَ الدّ۪ينُ الْقَيِّمُ وَلٰكِنَّ اَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ40
तुम उसके सिवा जिनकी भी बन्दगी करते हो वे तो बस निरे नाम हैं जो तुमने रख छोड़े है और तुम्हारे बाप-दादा ने। उनके लिए अल्लाह ने कोई प्रमाण नहीं उतारा। सत्ता और अधिकार तो बस अल्लाह का है। उसने आदेश दिया है कि उसके सिवा किसी की बन्दगी न करो। यही सीधा, सच्चा दीन (धर्म) हैं, किन्तु अधिकतर लोग नहीं जानते
يَا صَاحِبَيِ السِّجْنِ اَمَّٓا اَحَدُكُمَا فَيَسْق۪ي رَبَّهُ خَمْرًاۚ وَاَمَّا الْاٰخَرُ فَيُصْلَبُ فَتَاْكُلُ الطَّيْرُ مِنْ رَاْسِه۪ۜ قُضِيَ الْاَمْرُ الَّذ۪ي ف۪يهِ تَسْتَفْتِيَانِۜ41
ऐ कारागार के मेरे दोनों साथियों! तुममें से एक तो अपने स्वामी को मद्यपान कराएगा; रहा दूसरा तो उसे सूली पर चढ़ाया जाएगा और पक्षी उसका सिर खाएँगे। फ़ैसला हो चुका उस बात का जिसके विषय में तुम मुझसे पूछ रहे हो।"
وَقَالَ لِلَّذ۪ي ظَنَّ اَنَّهُ نَاجٍ مِنْهُمَا اذْكُرْن۪ي عِنْدَ رَبِّكَۘ فَاَنْسٰيهُ الشَّيْطَانُ ذِكْرَ رَبِّه۪ فَلَبِثَ فِي السِّجْنِ بِضْعَ سِن۪ينَۜ۟42
उन दोनों में से जिसके विषय में उसने समझा था कि वह रिहा हो जाएगा, उससे कहा, "अपने स्वामी से मेरी चर्चा करना।" किन्तु शैतान ने अपने स्वामी से उसकी चर्चा करना भुलवा दिया। अतः वह (यूसुफ़) कई वर्ष तक कारागार ही में रहा
وَقَالَ الْمَلِكُ اِنّ۪ٓي اَرٰى سَبْعَ بَقَرَاتٍ سِمَانٍ يَاْكُلُهُنَّ سَبْعٌ عِجَافٌ وَسَبْعَ سُنْبُلَاتٍ خُضْرٍ وَاُخَرَ يَابِسَاتٍۜ يَٓا اَيُّهَا الْمَلَاُ اَفْتُون۪ي ف۪ي رُءْيَايَ اِنْ كُنْتُمْ لِلرُّءْيَا تَعْبُرُونَ43
फिर ऐसा हुआ कि सम्राट ने कहा, "मैं एक स्वप्न देखा कि सात मोटी गायों को सात दुबली गायें खा रही है और सात बालें हरी है और दूसरी (सात सूखी) । ऐ सरदारों! यदि तुम स्वप्न का अर्थ बताते हो, तो मुझे मेरे इस स्वप्न के सम्बन्ध में बताओ।"
قَالُٓوا اَضْغَاثُ اَحْلَامٍۚ وَمَا نَحْنُ بِتَاْو۪يلِ الْاَحْلَامِ بِعَالِم۪ينَ44
उन्होंने कहा, "ये तो सम्भ्रमित स्वप्न है। हम ऐसे स्वप्न का अर्थ नहीं जानते।"
وَقَالَ الَّذ۪ي نَجَا مِنْهُمَا وَادَّكَرَ بَعْدَ اُمَّةٍ اَنَا۬ اُنَبِّئُكُمْ بِتَاْو۪يلِه۪ فَاَرْسِلُونِ45
इतने में दोनों में सो जो रिहा हो गया था और एक अर्से के बाद उसे याद आया तो वह बोला, "मैं इसका अर्थ तुम्हें बताता हूँ। ज़रा मुझे (यूसुफ़ के पास) भेज दीजिए।"
يُوسُفُ اَيُّهَا الصِّدّ۪يقُ اَفْتِنَا ف۪ي سَبْعِ بَقَرَاتٍ سِمَانٍ يَاْكُلُهُنَّ سَبْعٌ عِجَافٌ وَسَبْعِ سُنْبُلَاتٍ خُضْرٍ وَاُخَرَ يَابِسَاتٍۙ لَعَلّ۪ٓي اَرْجِعُ اِلَى النَّاسِ لَعَلَّهُمْ يَعْلَمُونَ46
"यूसुफ़, ऐ सत्यवान! हमें इसका अर्थ बता कि सात मोटी गायें है, जिन्हें सात दुबली गायें खा रही है और सात हरी बालें है और दूसरी (सात) सूखी, ताकि मैं लोगों के पास लौटकर जाऊँ कि वे जान लें।"
قَالَ تَزْرَعُونَ سَبْعَ سِن۪ينَ دَاَبًاۚ فَمَا حَصَدْتُمْ فَذَرُوهُ ف۪ي سُنْبُلِه۪ٓ اِلَّا قَل۪يلًا مِمَّا تَاْكُلُونَ47
उसने कहा, "सात वर्ष तक तुम व्यवहारतः खेती करते रहोगे। फिर तुम जो फ़सल काटो तो थोड़े हिस्से के सिवा जो तुम्हारे खाने के काम आए शेष को उसकी बाली में रहने देना
ثُمَّ يَاْت۪ي مِنْ بَعْدِ ذٰلِكَ سَبْعٌ شِدَادٌ يَاْكُلْنَ مَا قَدَّمْتُمْ لَهُنَّ اِلَّا قَل۪يلًا مِمَّا تُحْصِنُونَ48
फिर उसके पश्चात सात कठिन वर्ष आएँगे जो वे सब खा जाएँगे जो तुमने उनके लिए पहले से इकट्ठा कर रखा होगा, सिवाय उस थोड़े-से हिस्से के जो तुम सुरक्षित कर लोगे
ثُمَّ يَاْت۪ي مِنْ بَعْدِ ذٰلِكَ عَامٌ ف۪يهِ يُغَاثُ النَّاسُ وَف۪يهِ يَعْصِرُونَ۟49
फिर उसके पश्चात एक वर्ष ऐसा आएगा, जिसमें वर्षा द्वारा लोगों की फ़रियाद सुन ली जाएगी और उसमें वे रस निचोड़ेगे।"
وَقَالَ الْمَلِكُ ائْتُون۪ي بِه۪ۚ فَلَمَّا جَٓاءَهُ الرَّسُولُ قَالَ ارْجِعْ اِلٰى رَبِّكَ فَسْـَٔلْهُ مَا بَالُ النِّسْوَةِ الّٰت۪ي قَطَّعْنَ اَيْدِيَهُنَّۜ اِنَّ رَبّ۪ي بِكَيْدِهِنَّ عَل۪يمٌ50
सम्राट ने कहा, "उसे मेरे पास ले आओ।" किन्तु जब दूत उसके पास पहुँचा तो उसने कहा, "अपने स्वामी के पास वापस जाओ और उससे पूछो कि उन स्त्रियों का क्या मामला है, जिन्होंने अपने हाथ घायल कर लिए थे। निस्संदेह मेरा रब उनकी मक्कारी को भली-भाँति जानता है।"
قَالَ مَا خَطْبُكُنَّ اِذْ رَاوَدْتُنَّ يُوسُفَ عَنْ نَفْسِه۪ۜ قُلْنَ حَاشَ لِلّٰهِ مَا عَلِمْنَا عَلَيْهِ مِنْ سُٓوءٍۜ قَالَتِ امْرَاَتُ الْعَز۪يزِ الْـٰٔنَ حَصْحَصَ الْحَقُّۘ اَنَا۬ رَاوَدْتُهُ عَنْ نَفْسِه۪ وَاِنَّهُ لَمِنَ الصَّادِق۪ينَ51
उसने कहा, "तुम स्त्रियों का क्या हाल था, जब तुमने यूसुफ़ को रिझाने की चेष्टा की थी?" उन्होंने कहा, "पाक है अल्लाह! हम उसमें कोई बुराई नहीं जानते है।" अज़ीज़ की स्त्री बोल उठी, "अब तो सत्य प्रकट हो गया है। मैंने ही उसे रिझाना चाहा था। वह तो बिलकुल सच्चा है।"
ذٰلِكَ لِيَعْلَمَ اَنّ۪ي لَمْ اَخُنْهُ بِالْغَيْبِ وَاَنَّ اللّٰهَ لَا يَهْد۪ي كَيْدَ الْخَٓائِن۪ينَ52
"यह इसलिए कि वह जान ले कि मैंने गुप्त॥ रूप से उसके साथ विश्वासघात नहीं किया और यह कि अल्लाह विश्वासघातियों का चाल को चलने नहीं देता