13. जुज़ - कुरान पढ़ें

13. जुज़
12 · यूसुफ़
وَمَٓا اُبَرِّئُ نَفْس۪يۚ اِنَّ النَّفْسَ لَاَمَّارَةٌ بِالسُّٓوءِ اِلَّا مَا رَحِمَ رَبّ۪يۜ اِنَّ رَبّ۪ي غَفُورٌ رَح۪يمٌ53
मैं यह नहीं कहता कि मैं बुरी हूँ - जी तो बुराई पर उभारता ही है - यदि मेरा रब ही दया करे तो बात और है। निश्चय ही मेरा रब बहुत क्षमाशील, दयावान है।"
وَقَالَ الْمَلِكُ ائْتُون۪ي بِه۪ٓ اَسْتَخْلِصْهُ لِنَفْس۪يۚ فَلَمَّا كَلَّمَهُ قَالَ اِنَّكَ الْيَوْمَ لَدَيْنَا مَك۪ينٌ اَم۪ينٌ54
सम्राट ने कहा, "उसे मेरे पास ले आओ! मैं उसे अपने लिए ख़ास कर लूँगा।" जब उसने उससे बात-चीक करी तो उसने कहा, "निस्संदेह आज तुम हमारे यहाँ विश्व सनीय अधिकार प्राप्त व्यक्ति हो।"
قَالَ اجْعَلْن۪ي عَلٰى خَزَٓائِنِ الْاَرْضِۚ اِنّ۪ي حَف۪يظٌ عَل۪يمٌ55
उसने कहा, "इस भू-भाग के ख़जानों पर मुझे नियुक्त कर दीजिए। निश्चय ही मैं रक्षक और ज्ञानवान हूँ।"
وَكَذٰلِكَ مَكَّنَّا لِيُوسُفَ فِي الْاَرْضِۚ يَتَبَوَّاُ مِنْهَا حَيْثُ يَشَٓاءُۜ نُص۪يبُ بِرَحْمَتِنَا مَنْ نَشَٓاءُ وَلَا نُض۪يعُ اَجْرَ الْمُحْسِن۪ينَ56
इस प्रकार हमने यूसुफ़ को उस भू-भाग में अधिकार प्रदान किया कि वह उसमें जहाँ चाहे अपनी जगह बनाए। हम जिसे चाहते हैं उसे अपनी दया का पात्र बनाते है। उत्तमकारों का बदला हम अकारथ नहीं जाने देते
وَلَاَجْرُ الْاٰخِرَةِ خَيْرٌ لِلَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَكَانُوا يَتَّقُونَ۟57
और ईमान लानेवालों और डर रखनेवालों के लिए आख़िरत का बदला इससे कहीं उत्तम है
وَجَٓاءَ اِخْوَةُ يُوسُفَ فَدَخَلُوا عَلَيْهِ فَعَرَفَهُمْ وَهُمْ لَهُ مُنْكِرُونَ58
फिर ऐसा हुआ कि यूसुफ़ के भाई आए और उसके सामने उपस्थित हुए, उसने तो उन्हें पहचान लिया, किन्तु वे उससे अपरिचित रहे
وَلَمَّا جَهَّزَهُمْ بِجَهَازِهِمْ قَالَ ائْتُون۪ي بِاَخٍ لَكُمْ مِنْ اَب۪يكُمْۚ اَلَا تَرَوْنَ اَنّ۪ٓي اُو۫فِي الْكَيْلَ وَاَنَا۬ خَيْرُ الْمُنْزِل۪ينَ59
जब उसने उनके लिए उनका सामान तैयार करा दिया तो कहा, "बाप की ओर सो तुम्हारा भाई है, उसे मेरे पास लाना। क्या देखते नहीं कि मैं पूरी माप से देता हूँ और मैं अच्छा आतिशेय भी हूँ?"
فَاِنْ لَمْ تَاْتُون۪ي بِه۪ فَلَا كَيْلَ لَكُمْ عِنْد۪ي وَلَا تَقْرَبُونِ60
किन्तु यदि तुम उसे मेरे पास न लाए तो फिर तुम्हारे लिए मेरे यहाँ कोई माप (ग़ल्ला) नहीं और तुम मेरे पास आना भी मत।"
قَالُوا سَنُرَاوِدُ عَنْهُ اَبَاهُ وَاِنَّا لَفَاعِلُونَ61
वे बोले, "हम उसके लिए उसके बाप को राज़ी करने की कोशिश करेंगे और हम यह काम अवश्य करेंगे।"
وَقَالَ لِفِتْيَانِهِ اجْعَلُوا بِضَاعَتَهُمْ ف۪ي رِحَالِهِمْ لَعَلَّهُمْ يَعْرِفُونَهَٓا اِذَا انْقَلَبُٓوا اِلٰٓى اَهْلِهِمْ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ62
उसने अपने सेवकों से कहा, "इनका दिया हुआ माल इनके सामान में रख दो कि जब ये अपने घरवालों की ओर लौटें तो इसे पहचान लें, ताकि ये फिर लौटकर आएँ।"
فَلَمَّا رَجَعُٓوا اِلٰٓى اَب۪يهِمْ قَالُوا يَٓا اَبَانَا مُنِعَ مِنَّا الْكَيْلُ فَاَرْسِلْ مَعَنَٓا اَخَانَا نَكْتَلْ وَاِنَّا لَهُ لَحَافِظُونَ63
फिर जब वे अपने बाप के पास लौटकर गए तो कहा, "ऐ मेरे बाप! (अनाज की) माप हमसे रोक दी गई है। अतः हमारे भाई को हमारे साथ भेज दीजिए, ताकि हम माप भर लाएँ; और हम उसकी रक्षा के लिए तो मौजूद ही हैं।"
قَالَ هَلْ اٰمَنُكُمْ عَلَيْهِ اِلَّا كَمَٓا اَمِنْتُكُمْ عَلٰٓى اَخ۪يهِ مِنْ قَبْلُۜ فَاللّٰهُ خَيْرٌ حَافِظًاۖ وَهُوَ اَرْحَمُ الرَّاحِم۪ينَ64
उसने कहा, "क्या मैं उसके मामले में तुमपर वैसा ही भरोसा करूँ जैसा इससे पहले उसके भाई के मामले में तुमपर भरोसा कर चुका हूँ? हाँ, अल्लाह ही सबसे अच्छ रक्षक है और वह सबसे बढ़कर दयावान है।"
وَلَمَّا فَتَحُوا مَتَاعَهُمْ وَجَدُوا بِضَاعَتَهُمْ رُدَّتْ اِلَيْهِمْۜ قَالُوا يَٓا اَبَانَا مَا نَبْغ۪يۜ هٰذِه۪ بِضَاعَتُنَا رُدَّتْ اِلَيْنَاۚ وَنَم۪يرُ اَهْلَنَا وَنَحْفَظُ اَخَانَا وَنَزْدَادُ كَيْلَ بَع۪يرٍۜ ذٰلِكَ كَيْلٌ يَس۪يرٌ65
जब उन्होंने अपना सामान खोला, तो उन्होंने अपने माल अपनी ओर वापस किया हुआ पाया। वे बोले, "ऐ मेरे बाप, हमें और क्या चाहिए! यह हमारा माल भी तो हमें लौटा दिया गया है। अब हम अपने घरवालों के लिए खाद्य-सामग्री लाएँगे और अपने भाई की रक्षा भी करेंगे। और एक ऊँट के बोझभर और अधिक लेंगे। इतना माप (ग़ल्ला) मिल जाना तो बिलकुल आसान है।"
قَالَ لَنْ اُرْسِلَهُ مَعَكُمْ حَتّٰى تُؤْتُونِ مَوْثِقًا مِنَ اللّٰهِ لَتَاْتُنَّن۪ي بِه۪ٓ اِلَّٓا اَنْ يُحَاطَ بِكُمْۚ فَلَمَّٓا اٰتَوْهُ مَوْثِقَهُمْ قَالَ اللّٰهُ عَلٰى مَا نَقُولُ وَك۪يلٌ66
उसने कहा, "मैं उसे तुम्हारे साथ कदापि नहीं भेज सकता। जब तक कि तुम अल्लाह को गवाह बनाकर मुझे पक्का वचन न दो कि तुम उसे मेरे पास अवश्य लाओगे, यह और बात है कि तुम घिर जाओ।" फिर जब उन्होंने उसे अपना वचन दे दिया तो उसने कहा, "हम जो कुछ कर रहे है वह अल्लाह के हवाले है।"
وَقَالَ يَا بَنِيَّ لَا تَدْخُلُوا مِنْ بَابٍ وَاحِدٍ وَادْخُلُوا مِنْ اَبْوَابٍ مُتَفَرِّقَةٍۜ وَمَٓا اُغْن۪ي عَنْكُمْ مِنَ اللّٰهِ مِنْ شَيْءٍۜ اِنِ الْحُكْمُ اِلَّا لِلّٰهِۜ عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُۚ وَعَلَيْهِ فَلْيَتَوَكَّلِ الْمُتَوَكِّلُونَ67
उसने यह भी कहा, "ऐ मेरे बेटो! एक द्वार से प्रवेश न करना, बल्कि विभिन्न द्वारों से प्रवेश करना यद्यपि मैं अल्लाह के मुक़ाबले में तुम्हारे काम नहीं आ सकता आदेश तो बस अल्लाह ही का चलता है। उसी पर मैंने भरोसा किया और भरोसा करनेवालों को उसी पर भरोसा करना चाहिए।"
وَلَمَّا دَخَلُوا مِنْ حَيْثُ اَمَرَهُمْ اَبُوهُمْۜ مَا كَانَ يُغْن۪ي عَنْهُمْ مِنَ اللّٰهِ مِنْ شَيْءٍ اِلَّا حَاجَةً ف۪ي نَفْسِ يَعْقُوبَ قَضٰيهَاۜ وَاِنَّهُ لَذُو عِلْمٍ لِمَا عَلَّمْنَاهُ وَلٰكِنَّ اَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ۟68
और जब उन्होंने प्रवेश किया जिस तरह से उनके बाप ने उन्हें आदेश दिया था - अल्लाह की ओर से होनेवाली किसी चीज़ को वह उनसे हटा नहीं सकता था। बस याक़ूब के जी की एक इच्छा थी, जो उसने पूरी कर ली। और निस्संदेह वह ज्ञानवान था, क्योंकि हमने उसे ज्ञान प्रदान किया था; किन्तु अधिकतर लोग जानते नहीं -
وَلَمَّا دَخَلُوا عَلٰى يُوسُفَ اٰوٰٓى اِلَيْهِ اَخَاهُ قَالَ اِنّ۪ٓي اَنَا۬ اَخُوكَ فَلَا تَبْتَئِسْ بِمَا كَانُوا يَعْمَلُونَ69
और जब उन्होंने यूसुफ़ के यहाँ प्रवेश किया तो उसने अपने भाई को अपने पास जगह दी और कहा, "मैं तेरा भाई हूँ। जो कुछ ये करते रहे हैं, अब तू उसपर दुखी न हो।"
فَلَمَّا جَهَّزَهُمْ بِجَهَازِهِمْ جَعَلَ السِّقَايَةَ ف۪ي رَحْلِ اَخ۪يهِ ثُمَّ اَذَّنَ مُؤَذِّنٌ اَيَّتُهَا الْع۪يرُ اِنَّكُمْ لَسَارِقُونَ70
फिर जब उनका सामान तैयार कर दिया तो अपने भाई के सामान में पानी पीने का प्याला रख दिया। फिर एक पुकारनेवाले ने पुकारकर कहा, "ऐ क़ाफ़िलेवालो! निश्चय ही तुम चोर हो।"
قَالُٓوا وَاَقْبَلُوا عَلَيْهِمْ مَاذَا تَفْقِدُونَ71
वे उनकी ओर रुख़ करते हुए बोले, "तुम्हारी क्या चीज़ खो गई है?"
قَالُوا نَفْقِدُ صُوَاعَ الْمَلِكِ وَلِمَنْ جَٓاءَ بِه۪ حِمْلُ بَع۪يرٍ وَاَنَا۬ بِه۪ زَع۪يمٌ72
उन्होंने कहा, "शाही पैमाना हमें नहीं मिल रहा है। जो व्यक्ति उसे ला दे उसको एक ऊँट का बोझभर ग़ल्ला इनाम मिलेगा। मैं इसकी ज़िम्मेदारी लेता हूँ।"
قَالُوا تَاللّٰهِ لَقَدْ عَلِمْتُمْ مَا جِئْنَا لِنُفْسِدَ فِي الْاَرْضِ وَمَا كُنَّا سَارِق۪ينَ73
वे कहने लगे, "अल्लाह की क़सम! तुम लोग जानते ही हो कि हम इस भू-भाग में बिगाड़ पैदा करने नहीं आए है और न हम चोर है।"
قَالُوا فَمَا جَزَٓاؤُ۬هُٓ اِنْ كُنْتُمْ كَاذِب۪ينَ74
उन्होंने कहा, "यदि तुम झूठे सिद्ध हुए तो फिर उसका दंड क्या है?"
قَالُوا جَزَٓاؤُ۬هُ مَنْ وُجِدَ ف۪ي رَحْلِه۪ فَهُوَ جَزَٓاؤُ۬هُۜ كَذٰلِكَ نَجْزِي الظَّالِم۪ينَ75
वे बोले, "उसका दंड यह है कि जिसके सामान में वह मिले वही उसका बदला ठहराया जाए। हम अत्याचारियों को ऐसा ही दंड देते है।"
فَبَدَاَ بِاَوْعِيَتِهِمْ قَبْلَ وِعَٓاءِ اَخ۪يهِ ثُمَّ اسْتَخْرَجَهَا مِنْ وِعَٓاءِ اَخ۪يهِۜ كَذٰلِكَ كِدْنَا لِيُوسُفَۜ مَا كَانَ لِيَاْخُذَ اَخَاهُ ف۪ي د۪ينِ الْمَلِكِ اِلَّٓا اَنْ يَشَٓاءَ اللّٰهُۜ نَرْفَعُ دَرَجَاتٍ مَنْ نَشَٓاءُۜ وَفَوْقَ كُلِّ ذ۪ي عِلْمٍ عَل۪يمٌ76
फिर उसके भाई की खुरजी से पहले उनकी ख़ुरजियाँ देखनी शुरू की; फिर उसके भाई की ख़ुरजी से उसे बरामद कर लिया। इस प्रकार हमने यूसुफ़ का उपाय किया। वह शाही क़ानून के अनुसार अपने भाई को प्राप्त नहीं कर सकता था। बल्कि अल्लाह ही की इच्छा लागू है। हम जिसको चाहे उसके दर्जे ऊँचे कर दें। और प्रत्येक ज्ञानवान से ऊपर एक ज्ञानवान मौजूद है
قَالُٓوا اِنْ يَسْرِقْ فَقَدْ سَرَقَ اَخٌ لَهُ مِنْ قَبْلُۚ فَاَسَرَّهَا يُوسُفُ ف۪ي نَفْسِه۪ وَلَمْ يُبْدِهَا لَهُمْ قَالَ اَنْتُمْ شَرٌّ مَكَانًاۚ وَاللّٰهُ اَعْلَمُ بِمَا تَصِفُونَ77
उन्होंने कहा, "यदि यह चोरी करता है तो चोरी तो इससे पहले इसका एक भाई भी कर चुका है।" किन्तु यूसुफ़ ने इसे अपने जी ही में रखा और उनपर प्रकट नहीं किया। उसने कहा, "मक़ाम की दृष्टि से तुम अत्यन्त बुरे हो। जो कुछ तुम बताते हो, अल्लाह को उसका पूरा ज्ञान है।"
قَالُوا يَٓا اَيُّهَا الْعَز۪يزُ اِنَّ لَهُٓ اَبًا شَيْخًا كَب۪يرًا فَخُذْ اَحَدَنَا مَكَانَهُۚ اِنَّا نَرٰيكَ مِنَ الْمُحْسِن۪ينَ78
उन्होंने कहा, "ऐ अज़ीज़! इसका बाप बहुत ही बूढ़ा है। इसलिए इसके स्थान पर हममें से किसी को रख लीजिए। हमारी स्पष्ट में तो आप बड़े ही सुकर्मी है।"
قَالَ مَعَاذَ اللّٰهِ اَنْ نَاْخُذَ اِلَّا مَنْ وَجَدْنَا مَتَاعَنَا عِنْدَهُٓۙ اِنَّٓا اِذًا لَظَالِمُونَ۟79
उसने कहा, "इस बात से अल्लाह पनाह में रखे कि जिसके पास हमने अपना माल पाया है, उसे छोड़कर हम किसी दूसरे को रखें। फिर तो हम अत्याचारी ठहगेंगे।"
فَلَمَّا اسْتَيْـَٔسُوا مِنْهُ خَلَصُوا نَجِيًّاۜ قَالَ كَب۪يرُهُمْ اَلَمْ تَعْلَمُٓوا اَنَّ اَبَاكُمْ قَدْ اَخَذَ عَلَيْكُمْ مَوْثِقًا مِنَ اللّٰهِ وَمِنْ قَبْلُ مَا فَرَّطْتُمْ ف۪ي يُوسُفَۚ فَلَنْ اَبْرَحَ الْاَرْضَ حَتّٰى يَاْذَنَ ل۪ٓي اَب۪ٓي اَوْ يَحْكُمَ اللّٰهُ ل۪يۚ وَهُوَ خَيْرُ الْحَاكِم۪ينَ80
तो जब से वे उससे निराश हो गए तो परामर्श करने के लिए अलग जा बैठे। उनमें जो बड़ा था, वह कहने लगा, "क्या तुम जानते नहीं कि तुम्हारा बाप अल्लाह के नाम पर तुमसे वचन ले चुका है और उसको जो इससे पहले यूसुफ़ के मामले में तुमसे क़सूर हो चुका है? मैं तो इस भू-भाग से कदापि टलने का नहीं जब तक कि मेरे बाप मुझे अनुमति न दें या अल्लाह ही मेरे हक़ में कोई फ़ैसला कर दे। और वही सबसे अच्छा फ़ैसला करनेवाला है
اِرْجِعُٓوا اِلٰٓى اَب۪يكُمْ فَقُولُوا يَٓا اَبَانَٓا اِنَّ ابْنَكَ سَرَقَۚ وَمَا شَهِدْنَٓا اِلَّا بِمَا عَلِمْنَا وَمَا كُنَّا لِلْغَيْبِ حَافِظ۪ينَ81
तुम अपने बाप के पास लौटकर जाओ और कहो, "ऐ हमारे बाप! आपके बेटे ने चोरी की है। हमने तो वही कहा जो हमें मालूम हो सका, परोक्ष तो हमारी दृष्टि में था नहीं
وَسْـَٔلِ الْقَرْيَةَ الَّت۪ي كُنَّا ف۪يهَا وَالْع۪يرَ الَّت۪ٓي اَقْبَلْنَا ف۪يهَاۜ وَاِنَّا لَصَادِقُونَ82
आप उस बस्ती से पूछ लीजिए जहाँ हम थे और उस क़ाफ़िलें से भी जिसके साथ होकर हम आए। निस्संदेह हम बिलकुल सच्चे है।"
قَالَ بَلْ سَوَّلَتْ لَكُمْ اَنْفُسُكُمْ اَمْرًاۜ فَصَبْرٌ جَم۪يلٌۜ عَسَى اللّٰهُ اَنْ يَاْتِيَن۪ي بِهِمْ جَم۪يعًاۜ اِنَّهُ هُوَ الْعَل۪يمُ الْحَك۪يمُ83
उसने कहा, "नहीं, बल्कि तुम्हारे जी ही ने तुम्हे पट्टी पढ़ाकर एक बात बना दी है। अब धैर्य से काम लेना ही उत्तम है! बहुत सम्भव है कि अल्लाह उन सबको मेरे पास ले आए। वह तो सर्वज्ञ, अत्यन्त तत्वदर्शी है।"
وَتَوَلّٰى عَنْهُمْ وَقَالَ يَٓا اَسَفٰى عَلٰى يُوسُفَ وَابْيَضَّتْ عَيْنَاهُ مِنَ الْحُزْنِ فَهُوَ كَظ۪يمٌ84
उसने उनकी ओर से मुख फेर लिया और कहने लगा, "हाय अफ़सोस, यूसुफ़ की जुदाई पर!" और ग़म के मारे उसकी आँखें सफ़ेद पड़ गई और वह घुटा जा रहा था
قَالُوا تَاللّٰهِ تَفْتَؤُ۬ا تَذْكُرُ يُوسُفَ حَتّٰى تَكُونَ حَرَضًا اَوْ تَكُونَ مِنَ الْهَالِك۪ينَ85
उन्होंने कहा, "अल्लाह की क़सम! आप तो यूसुफ़ ही की याद में लगे रहेंगे, यहाँ तक कि घुलकर रहेंगे या प्राण ही त्याग देंगे।"
قَالَ اِنَّمَٓا اَشْكُوا بَثّ۪ي وَحُزْن۪ٓي اِلَى اللّٰهِ وَاَعْلَمُ مِنَ اللّٰهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ86
उसने कहा, "मैं तो अपनी परेशानी और अपने ग़म की शिकायत अल्लाह ही से करता हूँ और अल्लाह की ओर से जो मैं जानता हूँ, तुम नही जानते
يَا بَنِيَّ اذْهَبُوا فَتَحَسَّسُوا مِنْ يُوسُفَ وَاَخ۪يهِ وَلَا تَا۬يْـَٔسُوا مِنْ رَوْحِ اللّٰهِۜ اِنَّهُ لَا يَا۬يْـَٔسُ مِنْ رَوْحِ اللّٰهِ اِلَّا الْقَوْمُ الْكَافِرُونَ87
ऐ मेरे बेटों! जाओ और यूसुफ़ और उसके भाई की टोह लगाओ और अल्लाह की सदयता से निराश न हो। अल्लाह की सदयता से तो केवल कुफ़्र करनेवाले ही निराश होते है।"
فَلَمَّا دَخَلُوا عَلَيْهِ قَالُوا يَٓا اَيُّهَا الْعَز۪يزُ مَسَّنَا وَاَهْلَنَا الضُّرُّ وَجِئْنَا بِبِضَاعَةٍ مُزْجٰيةٍ فَاَوْفِ لَنَا الْكَيْلَ وَتَصَدَّقْ عَلَيْنَاۜ اِنَّ اللّٰهَ يَجْزِي الْمُتَصَدِّق۪ينَ88
फिर जब वे उसके पास उपस्थित हुए तो कहा, "ऐ अज़ीज़! हमें और हमारे घरवालों को बहुत तकलीफ़ पहुँची हैं और हम कुछ तुच्छ-सी पूँजी लेकर आए है, किन्तु आप हमें पूरी-पूरी माप प्रदान करें। और हमें दान दें। निश्चय ही दान करनेवालों को बदला अल्लाह देता है।"
قَالَ هَلْ عَلِمْتُمْ مَا فَعَلْتُمْ بِيُوسُفَ وَاَخ۪يهِ اِذْ اَنْتُمْ جَاهِلُونَ89
उसने कहा, "क्या तुम्हें यह भी मालूम है कि जब तुम आवेग के वशीभूत थे तो यूसुफ़ और उसके भाई के साथ तुमने क्या किया था?"
قَالُٓوا ءَاِنَّكَ لَاَنْتَ يُوسُفُۜ قَالَ اَنَا۬ يُوسُفُ وَهٰذَٓا اَخ۪يۘ قَدْ مَنَّ اللّٰهُ عَلَيْنَاۜ اِنَّهُ مَنْ يَتَّقِ وَيَصْبِرْ فَاِنَّ اللّٰهَ لَا يُض۪يعُ اَجْرَ الْمُحْسِن۪ينَ90
वे बोल पड़े, "क्या यूसुफ़ आप ही है?" उसने कहा, "मैं ही यूसुफ़ हूँ और यह मेरा भाई है। अल्लाह ने हमपर उपकार किया है। सच तो यह है कि जो कोई डर रखे और धैर्य से काम ले तो अल्लाह भी उत्तमकारों का बदला अकारथ नहीं करता।"
قَالُوا تَاللّٰهِ لَقَدْ اٰثَرَكَ اللّٰهُ عَلَيْنَا وَاِنْ كُنَّا لَخَاطِـ۪ٔينَ91
उन्होंने कहा, "अल्लाह की क़सम! आपको अल्लाह ने हमारे मुक़ाबले में पसन्द किया और निश्चय ही चूक तो हमसे हुई।"
قَالَ لَا تَثْر۪يبَ عَلَيْكُمُ الْيَوْمَۜ يَغْفِرُ اللّٰهُ لَكُمْۘ وَهُوَ اَرْحَمُ الرَّاحِم۪ينَ92
उसने कहा, "आज तुमपर कोई आरोप नहीं। अल्लाह तुम्हें क्षमा करे। वह सबसे बढ़कर दयावान है।
اِذْهَبُوا بِقَم۪يص۪ي هٰذَا فَاَلْقُوهُ عَلٰى وَجْهِ اَب۪ي يَاْتِ بَص۪يرًاۚ وَاْتُون۪ي بِاَهْلِكُمْ اَجْمَع۪ينَ۟93
मेरा यह कुर्ता ले जाओ और इसे मेरे बाप के मुख पर डाल दो। उनकी नेत्र-ज्योति लौट आएगी, फिर अपने सब घरवालों को मेरे यहाँ ले आओ।"
وَلَمَّا فَصَلَتِ الْع۪يرُ قَالَ اَبُوهُمْ اِنّ۪ي لَاَجِدُ ر۪يحَ يُوسُفَ لَوْلَٓا اَنْ تُفَنِّدُونِ94
इधर जब क़ाफ़िला चला तो उनके बाप ने कहा, "यदि तुम मुझे बहकी बातें करनेवाला न समझो तो मुझे तो यूसुफ़ की महक आ रही है।"
قَالُوا تَاللّٰهِ اِنَّكَ لَف۪ي ضَلَالِكَ الْقَد۪يمِ95
वे बोले, "अल्लाह की क़सम! आप तो अभी तक अपनी उसी पुरानी भ्रांति में पड़े हुए है।"
فَلَمَّٓا اَنْ جَٓاءَ الْبَش۪يرُ اَلْقٰيهُ عَلٰى وَجْهِه۪ فَارْتَدَّ بَص۪يرًاۚ قَالَ اَلَمْ اَقُلْ لَكُمْ اِنّ۪ٓي اَعْلَمُ مِنَ اللّٰهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ96
फिर जब शुभ सूचना देनेवाला आया तो उसने उस (कुर्ते) को उसके मुँह पर डाल दिया और तत्क्षण उसकी नेत्र-ज्योति लौट आई। उसने कहा, "क्या मैंने तुमसे कहा नहीं था कि अल्लाह की ओर से जो मैं जानता हूँ, तुम नहीं जानते।"
قَالُوا يَٓا اَبَانَا اسْتَغْفِرْ لَنَا ذُنُوبَنَٓا اِنَّا كُنَّا خَاطِـ۪ٔينَ97
वे बोले, "ऐ मेरे बाप! आप हमारे गुनाहों की क्षमा के लिए प्रार्थना करें। वास्तव में चूक हमसे ही हुई।"
قَالَ سَوْفَ اَسْتَغْفِرُ لَكُمْ رَبّ۪يۜ اِنَّهُ هُوَ الْغَفُورُ الرَّح۪يمُ98
उसने कहा, "मैं अपने रब से तुम्हारे लिए प्रार्थना करूँगा। वह बहुत क्षमाशील, दयावान है।"
فَلَمَّا دَخَلُوا عَلٰى يُوسُفَ اٰوٰٓى اِلَيْهِ اَبَوَيْهِ وَقَالَ ادْخُلُوا مِصْرَ اِنْ شَٓاءَ اللّٰهُ اٰمِن۪ينَۜ99
फिर जब वे यूसुफ़ के पास पहुँचे तो उसने अपने माँ-बाप को ख़ास अपने पास जगह दी औऱ कहा, "तुम सब नगर में प्रवेश करो। अल्लाह ने चाहा तो यह प्रवेश निश्चिन्तता के साथ होगा।"
وَرَفَعَ اَبَوَيْهِ عَلَى الْعَرْشِ وَخَرُّوا لَهُ سُجَّدًاۚ وَقَالَ يَٓا اَبَتِ هٰذَا تَاْو۪يلُ رُءْيَايَ مِنْ قَبْلُۘ قَدْ جَعَلَهَا رَبّ۪ي حَقًّاۜ وَقَدْ اَحْسَنَ ب۪ٓي اِذْ اَخْرَجَن۪ي مِنَ السِّجْنِ وَجَٓاءَ بِكُمْ مِنَ الْبَدْوِ مِنْ بَعْدِ اَنْ نَزَغَ الشَّيْطَانُ بَيْن۪ي وَبَيْنَ اِخْوَت۪يۜ اِنَّ رَبّ۪ي لَط۪يفٌ لِمَا يَشَٓاءُۜ اِنَّهُ هُوَ الْعَل۪يمُ الْحَك۪يمُ100
उसने अपने माँ-बाप को ऊँची जगह सिंहासन पर बिठाया और सब उसके आगे सजदे मे गिर पड़े। इस अवसर पर उसने कहा, "ऐ मेरे बाप! यह मेरे विगत स्वप्न का साकार रूप है। इसे मेरे रब ने सच बना दिया। और उसने मुझपर उपकार किया जब मुझे क़ैदख़ाने से निकाला और आप भाइयों के बीच फ़साद डलवा दिया था। निस्संदेह मेरा रब जो चाहता है उसके लिए सूक्ष्म उपाय करता है। वास्तव में वही सर्वज्ञ, अत्यन्त तत्वदर्शी है
رَبِّ قَدْ اٰتَيْتَن۪ي مِنَ الْمُلْكِ وَعَلَّمْتَن۪ي مِنْ تَاْو۪يلِ الْاَحَاد۪يثِۚ فَاطِرَ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِ اَنْتَ وَلِيّ۪ فِي الدُّنْيَا وَالْاٰخِرَةِۚ تَوَفَّن۪ي مُسْلِمًا وَاَلْحِقْن۪ي بِالصَّالِح۪ينَ101
मेरे रब! तुने मुझे राज्य प्रदान किया और मुझे घटनाओं और बातों के निष्कर्ष तक पहुँचना सिखाया। आकाश और धरती के पैदा करनेवाले! दुनिया और आख़िरत में तू ही मेरा संरक्षक मित्र है। तू मुझे इस दशा से उठा कि मैं मुस्लिम (आज्ञाकारी) हूँ और मुझे अच्छे लोगों के साथ मिला।"
ذٰلِكَ مِنْ اَنْبَٓاءِ الْغَيْبِ نُوح۪يهِ اِلَيْكَۚ وَمَا كُنْتَ لَدَيْهِمْ اِذْ اَجْمَعُٓوا اَمْرَهُمْ وَهُمْ يَمْكُرُونَ102
ये परोक्ष की ख़बरे हैं जिनकी हम तुम्हारी ओर प्रकाशना कर रहे है। तुम तो उनके पास नहीं थे, जब उन्होंने अपने मामले को पक्का करके षड्यंत्र किया था
وَمَٓا اَكْثَرُ النَّاسِ وَلَوْ حَرَصْتَ بِمُؤْمِن۪ينَ103
किन्तु चाहे तुम कितना ही चाहो, अधिकतर लोग तो मानेंगे नहीं
وَمَا تَسْـَٔلُهُمْ عَلَيْهِ مِنْ اَجْرٍۜ اِنْ هُوَ اِلَّا ذِكْرٌ لِلْعَالَم۪ينَ۟104
तुम उनसे इसका कोई बदला भी नहीं माँगते। यह तो सारे संसार के लिए बस एक अनुस्मरण है
وَكَاَيِّنْ مِنْ اٰيَةٍ فِي السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِ يَمُرُّونَ عَلَيْهَا وَهُمْ عَنْهَا مُعْرِضُونَ105
आकाशों और धरती में कितनी ही निशानियाँ हैं, जिनपर से वे इस तरह गुज़र जाते है कि उनकी ओर वे ध्यान ही नहीं देते
وَمَا يُؤْمِنُ اَكْثَرُهُمْ بِاللّٰهِ اِلَّا وَهُمْ مُشْرِكُونَ106
इनमें अधिकतर लोग अल्लाह को मानते भी है तो इस तरह कि वे साझी भी ठहराते है
اَفَاَمِنُٓوا اَنْ تَاْتِيَهُمْ غَاشِيَةٌ مِنْ عَذَابِ اللّٰهِ اَوْ تَاْتِيَهُمُ السَّاعَةُ بَغْتَةً وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ107
क्या वे इस बात से निश्चिन्त है कि अल्लाह की कोई यातना उन्हें ढँक ले या सहसा वह घड़ी ही उनपर आ जाए, जबकि वे बिलकुल बेख़बर हों?
قُلْ هٰذِه۪ سَب۪يل۪ٓي اَدْعُٓوا اِلَى اللّٰهِ عَلٰى بَص۪يرَةٍ اَنَا۬ وَمَنِ اتَّبَعَن۪يۜ وَسُبْحَانَ اللّٰهِ وَمَٓا اَنَا۬ مِنَ الْمُشْرِك۪ينَ108
कह दो, "यही मेरा मार्ग है। मैं अल्लाह की ओर बुलाता हूँ। मैं स्वयं भी पूर्ण प्रकाश में हूँ और मेरे अनुयायी भी - महिमावान है अल्लाह! ृृ- और मैं कदापि बहुदेववादी नहीं।"
وَمَٓا اَرْسَلْنَا مِنْ قَبْلِكَ اِلَّا رِجَالًا نُوح۪ٓي اِلَيْهِمْ مِنْ اَهْلِ الْقُرٰىۜ اَفَلَمْ يَس۪يرُوا فِي الْاَرْضِ فَيَنْظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الَّذ۪ينَ مِنْ قَبْلِهِمْۜ وَلَدَارُ الْاٰخِرَةِ خَيْرٌ لِلَّذ۪ينَ اتَّقَوْاۜ اَفَلَا تَعْقِلُونَ109
तुमसे पहले भी हमने जिनको रसूल बनाकर भेजा, वे सब बस्तियों के रहनेवाले पुरुष ही थे। हम उनकी ओर प्रकाशना करते रहे - फिर क्या वे धरती में चले-फिरे नहीं कि देखते कि उनका कैसा परिणाम हुआ, जो उनसे पहले गुज़रे है? निश्चय ही आख़िरत का घर ही डर रखनेवालों के लिए सर्वोत्तम है। तो क्या तुम समझते नहीं? -
حَتّٰٓى اِذَا اسْتَيْـَٔسَ الرُّسُلُ وَظَنُّٓوا اَنَّهُمْ قَدْ كُذِبُوا جَٓاءَهُمْ نَصْرُنَاۙ فَنُجِّيَ مَنْ نَشَٓاءُۜ وَلَا يُرَدُّ بَاْسُنَا عَنِ الْقَوْمِ الْمُجْرِم۪ينَ110
यहाँ तक कि जब वे रसूल निराश होने लगे और वे समझने लगे कि उनसे झूठ कहा गया था कि सहसा उन्हें हमारी सहायता पहुँच गई। फिर हमने जिसे चाहा बचा लिया। किन्तु अपराधी लोगों पर से तो हमारी यातना टलती ही नहीं
لَقَدْ كَانَ ف۪ي قَصَصِهِمْ عِبْرَةٌ لِاُو۬لِي الْاَلْبَابِۜ مَا كَانَ حَد۪يثًا يُفْتَرٰى وَلٰكِنْ تَصْد۪يقَ الَّذ۪ي بَيْنَ يَدَيْهِ وَتَفْص۪يلَ كُلِّ شَيْءٍ وَهُدًى وَرَحْمَةً لِقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ111
निश्चय ही उनकी कथाओं में बुद्धि और समझ रखनेवालों के लिए एक शिक्षाप्रद सामग्री है। यह कोई घड़ी हुई बात नहीं है, बल्कि यह अपने से पूर्व की पुष्टि में है, और हर चीज़ का विस्तार और ईमान लानेवाले लोगों के लिए मार्ग-दर्शन और दयालुता है
13 · अर-रअद
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
الٓمٓرٰ۠ تِلْكَ اٰيَاتُ الْكِتَابِۜ وَالَّذ۪ٓي اُنْزِلَ اِلَيْكَ مِنْ رَبِّكَ الْحَقُّ وَلٰكِنَّ اَكْثَرَ النَّاسِ لَا يُؤْمِنُونَ1
अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰ रा॰। ये किताब की आयतें है औऱ जो कुछ तुम्हारे रब की ओर से तुम्हारी ओर अवतरित हुआ है, वह सत्य है, किन्तु अधिकतर लोग मान नहीं रहे है
اَللّٰهُ الَّذ۪ي رَفَعَ السَّمٰوَاتِ بِغَيْرِ عَمَدٍ تَرَوْنَهَا ثُمَّ اسْتَوٰى عَلَى الْعَرْشِ وَسَخَّرَ الشَّمْسَ وَالْقَمَرَۜ كُلٌّ يَجْر۪ي لِاَجَلٍ مُسَمًّىۜ يُدَبِّرُ الْاَمْرَ يُفَصِّلُ الْاٰيَاتِ لَعَلَّكُمْ بِلِقَٓاءِ رَبِّكُمْ تُوقِنُونَ2
अल्लाह वह है जिसने आकाशों को बिना सहारे के ऊँचा बनाया जैसा कि तुम उन्हें देखते हो। फिर वह सिंहासन पर आसीन हुआ। उसने सूर्य और चन्द्रमा को काम पर लगाया। हरेक एक नियत समय तक के लिए चला जा रहा है। वह सारे काम का विधान कर रहा है; वह निशानियाँ खोल-खोलकर बयान करता है, ताकि तुम्हें अपने रब से मिलने का विश्वास हो
وَهُوَ الَّذ۪ي مَدَّ الْاَرْضَ وَجَعَلَ ف۪يهَا رَوَاسِيَ وَاَنْهَارًاۜ وَمِنْ كُلِّ الثَّمَرَاتِ جَعَلَ ف۪يهَا زَوْجَيْنِ اثْنَيْنِ يُغْشِي الَّيْلَ النَّهَارَۜ اِنَّ ف۪ي ذٰلِكَ لَاٰيَاتٍ لِقَوْمٍ يَتَفَكَّرُونَ3
और वही है जिसने धरती को फैलाया और उसमें जमे हुए पर्वत और नदियाँ बनाई और हरेक पैदावार की दो-दो क़िस्में बनाई। वही रात से दिन को छिपा देता है। निश्चय ही इसमें उन लोगों के लिए निशानियाँ है जो सोच-विचार से काम लेते है
وَفِي الْاَرْضِ قِطَعٌ مُتَجَاوِرَاتٌ وَجَنَّاتٌ مِنْ اَعْنَابٍ وَزَرْعٌ وَنَخ۪يلٌ صِنْوَانٌ وَغَيْرُ صِنْوَانٍ يُسْقٰى بِمَٓاءٍ وَاحِدٍ۠ وَنُفَضِّلُ بَعْضَهَا عَلٰى بَعْضٍ فِي الْاُكُلِۜ اِنَّ ف۪ي ذٰلِكَ لَاٰيَاتٍ لِقَوْمٍ يَعْقِلُونَ4
और धरती में पास-पास भूभाग पाए जाते है जो परस्पर मिले हुए है, और अंगूरों के बाग़ है और खेतियाँ है औऱ खजूर के पेड़ है, इकहरे भी और दोहरे भी। सबको एक ही पानी से सिंचित करता है, फिर भी हम पैदावार और स्वाद में किसी को किसी के मुक़ाबले में बढ़ा देते है। निश्चय ही इसमें उन लोगों के लिए निशानियाँ हैं, जो बुद्धि से काम लेते है
وَاِنْ تَعْجَبْ فَعَجَبٌ قَوْلُهُمْ ءَاِذَا كُنَّا تُرَابًا ءَاِنَّا لَف۪ي خَلْقٍ جَد۪يدٍۜ اُو۬لٰٓئِكَ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا بِرَبِّهِمْۚ وَاُو۬لٰٓئِكَ الْاَغْلَالُ ف۪ٓي اَعْنَاقِهِمْۚ وَاُو۬لٰٓئِكَ اَصْحَابُ النَّارِۚ هُمْ ف۪يهَا خَالِدُونَ5
अब यदि तुम्हें आश्चर्य ही करना है तो आश्चर्य की बात तो उनका यह कहना है कि ,"क्या जब हम मिट्टी हो जाएँगे तो क्या हम नए सिरे से पैदा भी होंगे?" वही हैं जिन्होंने अपने रब के साथ इनकार की नीति अपनाई और वही है, जिनकी गर्दनों मे तौक़ पड़े हुए है और वही आग (में पड़ने) वाले है जिसमें उन्हें सदैव रहना है
وَيَسْتَعْجِلُونَكَ بِالسَّيِّئَةِ قَبْلَ الْحَسَنَةِ وَقَدْ خَلَتْ مِنْ قَبْلِهِمُ الْمَثُلَاتُۜ وَاِنَّ رَبَّكَ لَذُو مَغْفِرَةٍ لِلنَّاسِ عَلٰى ظُلْمِهِمْۚ وَاِنَّ رَبَّكَ لَشَد۪يدُ الْعِقَابِ6
वे भलाई से पहले बुराई के लिए तुमसे जल्दी मचा रहे हैं, हालाँकि उनसे पहले कितनी ही शिक्षाप्रद मिसालें गुज़र चुकी है। किन्तु तुम्हारा रब लोगों को उनके अत्याचार के बावजूद क्षमा कर देता है और वास्तव में तुम्हारा रब दंड देने में भी बहुत कठोर है
وَيَقُولُ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا لَوْلَٓا اُنْزِلَ عَلَيْهِ اٰيَةٌ مِنْ رَبِّه۪ۜ اِنَّمَٓا اَنْتَ مُنْذِرٌ وَلِكُلِّ قَوْمٍ هَادٍ۟7
जिन्होंने इनकार किया, वे कहते हैं, "उसपर उसके रब की ओर से कोई निशानी क्यों नहीं अवतरित हुई?" तुम तो बस एक चेतावनी देनेवाले हो और हर क़ौम के लिए एक मार्गदर्शक हुआ है
اَللّٰهُ يَعْلَمُ مَا تَحْمِلُ كُلُّ اُنْثٰى وَمَا تَغ۪يضُ الْاَرْحَامُ وَمَا تَزْدَادُۜ وَكُلُّ شَيْءٍ عِنْدَهُ بِمِقْدَارٍ8
किसी भी स्त्री-जाति को जो भी गर्भ रहता है अल्लाह उसे जान रहा होता है और उसे भी जो गर्भाशय में कमी-बेशी होती है। और उसके यहाँ हरेक चीज़ का एक निश्चित अन्दाज़ा है
عَالِمُ الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ الْكَب۪يرُ الْمُتَعَالِ9
वह परोक्ष और प्रत्यक्ष का ज्ञाता है, महान है, अत्यन्त उच्च है
سَوَٓاءٌ مِنْكُمْ مَنْ اَسَرَّ الْقَوْلَ وَمَنْ جَهَرَ بِه۪ وَمَنْ هُوَ مُسْتَخْفٍ بِالَّيْلِ وَسَارِبٌ بِالنَّهَارِ10
तुममें से कोई चुपके से बात करे और जो कोई ज़ोर से और जो कोई रात में छिपता हो और जो दिन में चलता-फिरता दीख पड़ता हो उसके लिए सब बराबर है
لَهُ مُعَقِّبَاتٌ مِنْ بَيْنِ يَدَيْهِ وَمِنْ خَلْفِه۪ يَحْفَظُونَهُ مِنْ اَمْرِ اللّٰهِۜ اِنَّ اللّٰهَ لَا يُغَيِّرُ مَا بِقَوْمٍ حَتّٰى يُغَيِّرُوا مَا بِاَنْفُسِهِمْۜ وَاِذَٓا اَرَادَ اللّٰهُ بِقَوْمٍ سُٓوءًا فَلَا مَرَدَّ لَهُۚ وَمَا لَهُمْ مِنْ دُونِه۪ مِنْ وَالٍ11
उसके रक्षक (पहरेदार) उसके अपने आगे और पीछे लगे होते हैं जो अल्लाह के आदेश से उसकी रक्षा करते है। किसी क़ौम के लोगों को जो कुछ प्राप्त होता है अल्लाह उसे बदलता नहीं, जब तक कि वे स्वयं अपने आपको न बदल डालें। और जब अल्लाह किसी क़ौम का अनिष्ट चाहता है तो फिर वह उससे टल नहीं सकता, और उससे हटकर उनका कोई समर्थक और संरक्षक भी नहीं
هُوَ الَّذ۪ي يُر۪يكُمُ الْبَرْقَ خَوْفًا وَطَمَعًا وَيُنْشِئُ السَّحَابَ الثِّقَالَۚ12
वही है जो भय और आशा के निमित्त तुम्हें बिजली की चमक दिखाता है और बोझिल बादलों को उठाता है
وَيُسَبِّحُ الرَّعْدُ بِحَمْدِه۪ وَالْمَلٰٓئِكَةُ مِنْ خ۪يفَتِه۪ۚ وَيُرْسِلُ الصَّوَاعِقَ فَيُص۪يبُ بِهَا مَنْ يَشَٓاءُ وَهُمْ يُجَادِلُونَ فِي اللّٰهِۚ وَهُوَ شَد۪يدُ الْمِحَالِۜ13
बादल की गरज उसका गुणगान करती है और उसके भय से काँपते हुए फ़रिश्ते भी। वही कड़कती बिजलियाँ भेजता है, फिर जिसपर चाहता है उन्हें गिरा देता है, जबकि वे अल्लाह के विषय में झगड़ रहे होते है। निश्चय ही उसकी चाल बड़ी सख़्त है
لَهُ دَعْوَةُ الْحَقِّۜ وَالَّذ۪ينَ يَدْعُونَ مِنْ دُونِه۪ لَا يَسْتَج۪يبُونَ لَهُمْ بِشَيْءٍ اِلَّا كَبَاسِطِ كَفَّيْهِ اِلَى الْمَٓاءِ لِيَبْلُغَ فَاهُ وَمَا هُوَ بِبَالِغِه۪ۜ وَمَا دُعَٓاءُ الْكَافِر۪ينَ اِلَّا ف۪ي ضَلَالٍ14
उसी के लिए सच्ची पुकार है। उससे हटकर जिनको वे पुकारते है, वे उनकी पुकार का कुछ भी उत्तर नहीं देते। बस यह ऐसा ही होता है जैसे कोई अपने दोनों हाथ पानी की ओर इसलिए फैलाए कि वह उसके मुँह में पहुँच जाए, हालाँकि वह उसतक पहुँचनेवाला नहीं। कुफ़्र करनेवालों की पुकार तो बस भटकने ही के लिए होती है
وَلِلّٰهِ يَسْجُدُ مَنْ فِي السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِ طَوْعًا وَكَرْهًا وَظِلَالُهُمْ بِالْغُدُوِّ وَالْاٰصَالِ15
आकाशों और धरती में जो भी है स्वेच्छापूर्वक या विवशतापूर्वक अल्लाह ही को सजदा कर रहे है और उनकी परछाइयाँ भी प्रातः और संध्या समय
قُلْ مَنْ رَبُّ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ قُلِ اللّٰهُۜ قُلْ اَفَاتَّخَذْتُمْ مِنْ دُونِه۪ٓ اَوْلِيَٓاءَ لَا يَمْلِكُونَ لِاَنْفُسِهِمْ نَفْعًا وَلَا ضَرًّاۜ قُلْ هَلْ يَسْتَوِي الْاَعْمٰى وَالْبَص۪يرُۙ اَمْ هَلْ تَسْتَوِي الظُّلُمَاتُ وَالنُّورُۚ اَمْ جَعَلُوا لِلّٰهِ شُرَكَٓاءَ خَلَقُوا كَخَلْقِه۪ فَتَشَابَهَ الْخَلْقُ عَلَيْهِمْۜ قُلِ اللّٰهُ خَالِقُ كُلِّ شَيْءٍ وَهُوَ الْوَاحِدُ الْقَهَّارُ16
कहो, "आकाशों और धरती का रब कौन है?" कहो, "अल्लाह" कह दो, "फिर क्या तुमने उससे हटकर दूसरों को अपना संरक्षक बना रखा है, जिन्हें स्वयं अपने भी किसी लाभ का न अधिकार प्राप्त है और न किसी हानि का?" कहो, "क्या अंधा और आँखोंवाला दोनों बराबर होते है? या बराबर होते हो अँधरे और प्रकाश? या जिनको अल्लाह का सहभागी ठहराया है, उन्होंने भी कुछ पैदा किया है, जैसा कि उसने पैदा किया है, जिसके कारण सृष्टि का मामला इनके लिए गडुमडु हो गया है?" कहो, "हर चीज़ को पैदा करनेवाला अल्लाह है और वह अकेला है, सब पर प्रभावी!"
اَنْزَلَ مِنَ السَّمَٓاءِ مَٓاءً فَسَالَتْ اَوْدِيَةٌ بِقَدَرِهَا فَاحْتَمَلَ السَّيْلُ زَبَدًا رَابِيًاۜ وَمِمَّا يُوقِدُونَ عَلَيْهِ فِي النَّارِ ابْتِغَٓاءَ حِلْيَةٍ اَوْ مَتَاعٍ زَبَدٌ مِثْلُهُۜ كَذٰلِكَ يَضْرِبُ اللّٰهُ الْحَقَّ وَالْبَاطِلَۜ فَاَمَّا الزَّبَدُ فَيَذْهَبُ جُفَٓاءًۚ وَاَمَّا مَا يَنْفَعُ النَّاسَ فَيَمْكُثُ فِي الْاَرْضِۜ كَذٰلِكَ يَضْرِبُ اللّٰهُ الْاَمْثَالَۜ17
उसने आकाश से पानी उतारा तो नदी-नाले अपनी-अपनी समाई के अनुसार बह निकले। फिर पानी के बहाव ने उभरे हुए झाग को उठा लिया और उसमें से भी, जिसे वे ज़ेवर या दूसरे सामान बनाने के लिए आग में तपाते हैं, ऐसा ही झाग उठता है। इस प्रकार अल्लाह सत्य और असत्य की मिसाल बयान करता है। फिर जो झाग है वह तो सूखकर नष्ट हो जाता है और जो कुछ लोगों को लाभ पहुँचानेवाला होता है, वह धरती में ठहर जाता है। इसी प्रकार अल्लाह दृष्टांत प्रस्तुत करता है
لِلَّذ۪ينَ اسْتَجَابُوا لِرَبِّهِمُ الْحُسْنٰىۜ وَالَّذ۪ينَ لَمْ يَسْتَج۪يبُوا لَهُ لَوْ اَنَّ لَهُمْ مَا فِي الْاَرْضِ جَم۪يعًا وَمِثْلَهُ مَعَهُ لَافْتَدَوْا بِه۪ۜ اُو۬لٰٓئِكَ لَهُمْ سُٓوءُ الْحِسَابِۙ وَمَاْوٰيهُمْ جَهَنَّمُۜ وَبِئْسَ الْمِهَادُ۟18
जिन लोगों ने अपने रब का आमंत्रण स्वीकार कर लिया, उनके लिए अच्छा पुरस्कार है। रहे वे लोग जिन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया यदि उनके पास वह सब कुछ हो जो धरती में हैं, बल्कि उसके साथ उतना और भी हो तो अपनी मुक्ति के लिए वे सब दे डालें। वही हैं, जिनका बुरा हिसाब होगा। उनका ठिकाना जहन्नम है और वह अत्यन्त बुरा विश्राम-स्थल है
اَفَمَنْ يَعْلَمُ اَنَّمَٓا اُنْزِلَ اِلَيْكَ مِنْ رَبِّكَ الْحَقُّ كَمَنْ هُوَ اَعْمٰىۜ اِنَّمَا يَتَذَكَّرُ اُو۬لُوا الْاَلْبَابِۙ19
भला वह व्यक्ति जो जानता है कि जो कुछ तुम पर उतरा है तुम्हारे रब की ओर से सत्य है, कभी उस जैसा हो सकता है जो अंधा है? परन्तु समझते तो वही है जो बुद्धि और समझ रखते है,
اَلَّذ۪ينَ يُوفُونَ بِعَهْدِ اللّٰهِ وَلَا يَنْقُضُونَ الْم۪يثَاقَۙ20
जो अल्लाह के साथ की हुई प्रतिज्ञा को पूरा करते है औऱ अभिवचन को तोड़ते नहीं,
وَالَّذ۪ينَ يَصِلُونَ مَٓا اَمَرَ اللّٰهُ بِه۪ٓ اَنْ يُوصَلَ وَيَخْشَوْنَ رَبَّهُمْ وَيَخَافُونَ سُٓوءَ الْحِسَابِۜ21
और जो ऐसे हैं कि अल्लाह नॆ जिसे जोड़ने का आदेश दिया है उसे जोड़ते हैं और अपनॆ रब से डरते रहते हैं और बुरॆ हिसाब का उन्हॆं डर लगा रहता है
وَالَّذ۪ينَ صَبَرُوا ابْتِغَٓاءَ وَجْهِ رَبِّهِمْ وَاَقَامُوا الصَّلٰوةَ وَاَنْفَقُوا مِمَّا رَزَقْنَاهُمْ سِرًّا وَعَلَانِيَةً وَيَدْرَؤُ۫نَ بِالْحَسَنَةِ السَّيِّئَةَ اُو۬لٰٓئِكَ لَهُمْ عُقْبَى الدَّارِۙ22
और जिन लोगों ने अपने रब की प्रसन्नता की चाह में धैर्य से काम लिया और नमाज़ क़ायम की और जो कुछ हमने उन्हें दिया है, उसमें से खुले और छिपे ख़र्च किया, और भलाई के द्वारा बुराई को दूर करते है। वही लोग है जिनके लिए आख़िरत के घर का अच्छा परिणाम है,
جَنَّاتُ عَدْنٍ يَدْخُلُونَهَا وَمَنْ صَلَحَ مِنْ اٰبَٓائِهِمْ وَاَزْوَاجِهِمْ وَذُرِّيَّاتِهِمْ وَالْمَلٰٓئِكَةُ يَدْخُلُونَ عَلَيْهِمْ مِنْ كُلِّ بَابٍۚ23
अर्थात सदैव रहने के बाग़ है जिनमें वे प्रवेश करेंगे और उनके बाप-दादा और उनकी पत्नियों और उनकी सन्तानों में से जो नेक होंगे वे भी और हर दरवाज़े से फ़रिश्ते उनके पास पहुँचेंगे
سَلَامٌ عَلَيْكُمْ بِمَا صَبَرْتُمْ فَنِعْمَ عُقْبَى الدَّارِۜ24
(वे कहेंगे) "तुमपर सलाम है उसके बदले में जो तुमने धैर्य से काम लिया।" अतः क्या ही अच्छा परिणाम है आख़िरत के घर का!
وَالَّذ۪ينَ يَنْقُضُونَ عَهْدَ اللّٰهِ مِنْ بَعْدِ م۪يثَاقِه۪ وَيَقْطَعُونَ مَٓا اَمَرَ اللّٰهُ بِه۪ٓ اَنْ يُوصَلَ وَيُفْسِدُونَ فِي الْاَرْضِۙ اُو۬لٰٓئِكَ لَهُمُ اللَّعْنَةُ وَلَهُمْ سُٓوءُ الدَّارِ25
रहे वे लोग जो अल्लाह की प्रतिज्ञा को उसे दृढ़ करने के पश्चात तोड़ डालते है और अल्लाह ने जिसे जोड़ने का आदेश दिया है, उसे काटते है और धरती में बिगाड़ पैदा करते है। वहीं है जिनके लिए फिटकार है और जिनके लिए आख़िरत का बुरा घर है
اَللّٰهُ يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَنْ يَشَٓاءُ وَيَقْدِرُۜ وَفَرِحُوا بِالْحَيٰوةِ الدُّنْيَاۜ وَمَا الْحَيٰوةُ الدُّنْيَا فِي الْاٰخِرَةِ اِلَّا مَتَاعٌ۟26
अल्लाह जिसको चाहता है प्रचुर फैली हुई रोज़ी प्रदान करता है औऱ इसी प्रकार नपी-तुली भी। और वे सांसारिक जीवन में मग्न हैं, हालाँकि सांसारिक जीवन आख़िरत के मुक़ाबले में तो बस अल्प सुख-सामग्री है
وَيَقُولُ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا لَوْلَٓا اُنْزِلَ عَلَيْهِ اٰيَةٌ مِنْ رَبِّه۪ۜ قُلْ اِنَّ اللّٰهَ يُضِلُّ مَنْ يَشَٓاءُ وَيَهْد۪ٓي اِلَيْهِ مَنْ اَنَابَۚ27
जिन लोगों ने इनकार किया वे कहते है, "उसपर उसके रब की ओर से कोई निशानी क्यों नहीं उतरी?" कहो, "अल्लाह जिसे चाहता है पथभ्रष्ट कर देता है। अपनी ओर से वह मार्गदर्शन उसी का करता है जो रुजू होता है।"
اَلَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَتَطْمَئِنُّ قُلُوبُهُمْ بِذِكْرِ اللّٰهِۜ اَلَا بِذِكْرِ اللّٰهِ تَطْمَئِنُّ الْقُلُوبُۜ28
ऐसे ही लोग है जो ईमान लाए और जिनके दिलों को अल्लाह के स्मरण से आराम और चैन मिलता है। सुन लो, अल्लाह के स्मरण से ही दिलों को संतोष प्राप्त हुआ करता है
اَلَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ طُوبٰى لَهُمْ وَحُسْنُ مَاٰبٍ29
जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए उनके लिए सुख-सौभाग्य है और लौटने का अच्छा ठिकाना है
كَذٰلِكَ اَرْسَلْنَاكَ ف۪ٓي اُمَّةٍ قَدْ خَلَتْ مِنْ قَبْلِهَٓا اُمَمٌ لِتَتْلُوَ۬ا عَلَيْهِمُ الَّذ۪ٓي اَوْحَيْنَٓا اِلَيْكَ وَهُمْ يَكْفُرُونَ بِالرَّحْمٰنِۜ قُلْ هُوَ رَبّ۪ي لَٓا اِلٰهَ اِلَّا هُوَۚ عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ وَاِلَيْهِ مَتَابِ30
अतएव हमने तुम्हें एक ऐसे समुदाय में भेजा है जिससे पहले कितने ही समुदाय गुज़र चुके है, ताकि हमने तुम्हारी ओर जो प्रकाशना की है, उसे उनको सुना दो, यद्यपि वे रहमान के साथ इनकार की नीति अपनाए हुए है। कह दो, "वही मेरा रब है। उसके सिवा कोई पूज्य-प्रभु नहीं। उसी पर मेरा भरोसा है और उसी की ओर मुझे पलटकर जाना है।"
وَلَوْ اَنَّ قُرْاٰنًا سُيِّرَتْ بِهِ الْجِبَالُ اَوْ قُطِّعَتْ بِهِ الْاَرْضُ اَوْ كُلِّمَ بِهِ الْمَوْتٰىۜ بَلْ لِلّٰهِ الْاَمْرُ جَم۪يعًاۜ اَفَلَمْ يَا۬يْـَٔسِ الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اَنْ لَوْ يَشَٓاءُ اللّٰهُ لَهَدَى النَّاسَ جَم۪يعًاۜ وَلَا يَزَالُ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا تُص۪يبُهُمْ بِمَا صَنَعُوا قَارِعَةٌ اَوْ تَحُلُّ قَر۪يبًا مِنْ دَارِهِمْ حَتّٰى يَاْتِيَ وَعْدُ اللّٰهِۜ اِنَّ اللّٰهَ لَا يُخْلِفُ الْم۪يعَادَ۟31
और यदि कोई ऐसा क़ुरआन होता जिसके द्वारा पहाड़ चलने लगते या उससे धरती खंड-खंड हो जाती या उसके द्वारा मुर्दे बोलने लगते (तब भी वे लोग ईमान न लाते) । नहीं, बल्कि बात यह है कि सारे काम अल्लाह ही के अधिकार में है। फिर क्या जो लोग ईमान लाए है वे यह जानकर निराश नहीं हुए कि यदि अल्लाह चाहता तो सारे ही मनुष्यों को सीधे मार्ग पर लगा देता? और इनकार करनेवालों पर तो उनकी करतूतों के बदले में कोई न कोई आपदा निरंतर आती ही रहेगी, या उनके घर के निकट ही कहीं उतरती रहेगी, यहाँ तक कि अल्लाह का वादा आ पूरा होगा। निस्संदेह अल्लाह अपने वादे के विरुद्ध नहीं जाता।"
وَلَقَدِ اسْتُهْزِئَ بِرُسُلٍ مِنْ قَبْلِكَ فَاَمْلَيْتُ لِلَّذ۪ينَ كَفَرُوا ثُمَّ اَخَذْتُهُمْ۠ فَكَيْفَ كَانَ عِقَابِ32
तुमसे पहले भी कितने ही रसूलों का उपहास किया जा चुका है, किन्तु मैंने इनकार करनेवालों को मुहलत दी। फिर अंततः मैंने उन्हें पकड़ लिया, फिर कैसी रही मेरी सज़ा?
اَفَمَنْ هُوَ قَٓائِمٌ عَلٰى كُلِّ نَفْسٍ بِمَا كَسَبَتْۚ وَجَعَلُوا لِلّٰهِ شُرَكَٓاءَۜ قُلْ سَمُّوهُمْۜ اَمْ تُنَبِّؤُ۫نَهُ بِمَا لَا يَعْلَمُ فِي الْاَرْضِ اَمْ بِظَاهِرٍ مِنَ الْقَوْلِۜ بَلْ زُيِّنَ لِلَّذ۪ينَ كَفَرُوا مَكْرُهُمْ وَصُدُّوا عَنِ السَّب۪يلِۜ وَمَنْ يُضْلِلِ اللّٰهُ فَمَا لَهُ مِنْ هَادٍ33
भला वह (अल्लाह) जो प्रत्येक व्यक्ति के सिर पर, उसकी कमाई पर निगाह रखते हुए खड़ा है (उसके समान कोई दूसरा हो सकता है)? फिर भी लोगों ने अल्लाह के सहभागी-ठहरा रखे है। कहो, "तनिक उनके नाम तो लो! (क्या तुम्हारे पास उनके पक्ष में कोई प्रमाण है?) या ऐसा है कि तुम उसे ऐसी बात की ख़बर दे रहे हो, जिसके अस्तित्व की उसे धरती भर में ख़बर नहीं? या यूँ ही यह एक ऊपरी बात ही बात है?" नहीं, बल्कि इनकार करनेवालों को उनकी मक्कारी ही सुहावनी लगती है और वे मार्ग से रुक गए है। जिसे अल्लाह ही गुमराही में छोड़ दे, उसे कोई मार्ग पर लानेवाला नहीं
لَهُمْ عَذَابٌ فِي الْحَيٰوةِ الدُّنْيَا وَلَعَذَابُ الْاٰخِرَةِ اَشَقُّۚ وَمَا لَهُمْ مِنَ اللّٰهِ مِنْ وَاقٍ34
उनके लिए सांसारिक जीवन में भी यातना, तो वह अत्यन्त कठोर है। औऱ कोई भी तो नहीं जो उन्हें अल्लाह से बचानेवाला हो
مَثَلُ الْجَنَّةِ الَّت۪ي وُعِدَ الْمُتَّقُونَۜ تَجْر۪ي مِنْ تَحْتِهَا الْاَنْهَارُۜ اُكُلُهَا دَٓائِمٌ وَظِلُّهَاۜ تِلْكَ عُقْبَى الَّذ۪ينَ اتَّقَوْاۗ وَعُقْبَى الْكَافِر۪ينَ النَّارُ35
डर रखनेवालों के लिए जिस जन्नत का वादा है उसकी शान यह है कि उसके नीचे नहरें बह रही है, उसके फल शाश्वत है और इसी प्रकार उसकी छाया भी। यह परिणाम है उनका जो डर रखते है, जबकि इनकार करनेवालों का परिणाम आग है
وَالَّذ۪ينَ اٰتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ يَفْرَحُونَ بِمَٓا اُنْزِلَ اِلَيْكَ وَمِنَ الْاَحْزَابِ مَنْ يُنْكِرُ بَعْضَهُۜ قُلْ اِنَّمَٓا اُمِرْتُ اَنْ اَعْبُدَ اللّٰهَ وَلَٓا اُشْرِكَ بِه۪ۜ اِلَيْهِ اَدْعُوا وَاِلَيْهِ مَاٰبِ36
जिन लोगों को हमने किताब प्रदान की है वे उससे, जो तुम्हारी ओर उतारा है, हर्षित होते है और विभिन्न गिरोहों के कुछ लोग ऐसे भी है जो उसकी कुछ बातों का इनकार करते है। कह दो, "मुझे पर बस यह आदेश हुआ है कि मैं अल्लाह की बन्दगी करूँ और उसका सहभागी न ठहराऊँ। मैं उसी की ओर बुलाता हूँ और उसी की ओर मुझे लौटकर जाना है।"
وَكَذٰلِكَ اَنْزَلْنَاهُ حُكْمًا عَرَبِيًّاۜ وَلَئِنِ اتَّبَعْتَ اَهْوَٓاءَهُمْ بَعْدَ مَا جَٓاءَكَ مِنَ الْعِلْمِۙ مَا لَكَ مِنَ اللّٰهِ مِنْ وَلِيٍّ وَلَا وَاقٍ۟37
और इसी प्रकार हमने इस (क़ुरआन) को एक अरबी फ़रमान के रूप में उतारा है। अब यदि तुम उस ज्ञान के पश्चात भी, जो तुम्हारे पास आ चुका है, उनकी इच्छाओं के पीछे चले तो अल्लाह के मुक़ाबले में न तो तुम्हारा कोई सहायक मित्र होगा और न कोई बचानेवाला
وَلَقَدْ اَرْسَلْنَا رُسُلًا مِنْ قَبْلِكَ وَجَعَلْنَا لَهُمْ اَزْوَاجًا وَذُرِّيَّةًۜ وَمَا كَانَ لِرَسُولٍ اَنْ يَاْتِيَ بِاٰيَةٍ اِلَّا بِاِذْنِ اللّٰهِۜ لِكُلِّ اَجَلٍ كِتَابٌ38
तुमसे पहले भी हम, कितने ही रसूल भेज चुके है और हमने उन्हें पत्नियों और बच्चे भी दिए थे, और किसी रसूल को यह अधिकार नहीं था कि वह अल्लाह की अनुमति के बिना कोई निशानी स्वयं ला लेता। हर चीज़ के एक समय जो अटल लिखित है
يَمْحُوا اللّٰهُ مَا يَشَٓاءُ وَيُثْبِتُۚ وَعِنْدَهُٓ اُمُّ الْكِتَابِ39
अल्लाह जो कुछ चाहता है मिटा देता है। इसी तरह वह क़ायम भी रखता है। मूल किताब तो स्वयं उसी के पास है
وَاِنْ مَا نُرِيَنَّكَ بَعْضَ الَّذ۪ي نَعِدُهُمْ اَوْ نَتَوَفَّيَنَّكَ فَاِنَّمَا عَلَيْكَ الْبَلَاغُ وَعَلَيْنَا الْحِسَابُ40
हम जो वादा उनसे कर रहे है चाहे उसमें से कुछ हम तुम्हें दिखा दें, या तुम्हें उठा लें। तुम्हारा दायित्व तो बस सन्देश का पहुँचा देना ही है, हिसाब लेना तो हमारे ज़िम्मे है
اَوَلَمْ يَرَوْا اَنَّا نَاْتِي الْاَرْضَ نَنْقُصُهَا مِنْ اَطْرَافِهَاۜ وَاللّٰهُ يَحْكُمُ لَا مُعَقِّبَ لِحُكْمِه۪ۜ وَهُوَ سَر۪يعُ الْحِسَابِ41
क्या उन्होंने देखा नहीं कि हम धरती पर चले आ रहे है, उसे उसके किनारों से घटाते हुए? अल्लाह ही फ़ैसला करता है। कोई नहीं जो उसके फ़ैसले को पीछे डाल सके। वह हिसाब भी जल्द लेता है
وَقَدْ مَكَرَ الَّذ۪ينَ مِنْ قَبْلِهِمْ فَلِلّٰهِ الْمَكْرُ جَم۪يعًاۜ يَعْلَمُ مَا تَكْسِبُ كُلُّ نَفْسٍۜ وَسَيَعْلَمُ الْكُفَّارُ لِمَنْ عُقْبَى الدَّارِ42
उनसे पहले जो लोग गुज़रे है, वे भी चालें चल चुके है, किन्तु वास्तविक चाल तो पूरी की पूरी अल्लाह ही के हाथ में है। प्रत्येक व्यक्ति जो कमाई कर रहा है उसे वह जानता है। इनकार करनेवालों को शीघ्र ही ज्ञात हो जाएगा कि परलोक-गृह के शुभ परिणाम के अधिकारी कौन है
وَيَقُولُ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا لَسْتَ مُرْسَلًاۜ قُلْ كَفٰى بِاللّٰهِ شَه۪يدًا بَيْن۪ي وَبَيْنَكُمْۙ وَمَنْ عِنْدَهُ عِلْمُ الْكِتَابِ43
जिन लोगों ने इनकार की नीति अपनाई, वे कहते है, "तुम कोई रसूल नहीं हो।" कह दो, "मेरे और तुम्हारे बीच अल्लाह की और जिस किसी के पास किताब का ज्ञान है उसकी, गवाही काफ़ी है।"
14 · इब्राहीम
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
الٓرٰ۠ كِتَابٌ اَنْزَلْنَاهُ اِلَيْكَ لِتُخْرِجَ النَّاسَ مِنَ الظُّلُمَاتِ اِلَى النُّورِ بِاِذْنِ رَبِّهِمْ اِلٰى صِرَاطِ الْعَز۪يزِ الْحَم۪يدِۙ1
अलिफ़॰ लाम॰ रा॰। यह एक किताब है जिसे हमने तुम्हारी ओर अवतरित की है, ताकि तुम मनुष्यों को अँधेरों से निकालकर प्रकाश की ओर ले आओ, उनके रब की अनुमति से प्रभुत्वशाली, प्रशंस्य सत्ता, उस अल्लाह के मार्ग की ओर
اَللّٰهِ الَّذ۪ي لَهُ مَا فِي السَّمٰوَاتِ وَمَا فِي الْاَرْضِۜ وَوَيْلٌ لِلْكَافِر۪ينَ مِنْ عَذَابٍ شَد۪يدٍۙ2
जिसका वह सब है जो कुछ आकाशों में है और जो कुछ धरती में है। इनकार करनेवालों के लिए तो एक कठोर यातना के कारण बड़ी तबाही है
اَلَّذ۪ينَ يَسْتَحِبُّونَ الْحَيٰوةَ الدُّنْيَا عَلَى الْاٰخِرَةِ وَيَصُدُّونَ عَنْ سَب۪يلِ اللّٰهِ وَيَبْغُونَهَا عِوَجًاۜ اُو۬لٰٓئِكَ ف۪ي ضَلَالٍ بَع۪يدٍ3
जो आख़िरत की अपेक्षा सांसारिक जीवन को प्राथमिकता देते है और अल्लाह के मार्ग से रोकते है और उसमें टेढ़ पैदा करना चाहते है, वही परले दरजे की गुमराही में पड़े है
وَمَٓا اَرْسَلْنَا مِنْ رَسُولٍ اِلَّا بِلِسَانِ قَوْمِه۪ لِيُبَيِّنَ لَهُمْۜ فَيُضِلُّ اللّٰهُ مَنْ يَشَٓاءُ وَيَهْد۪ي مَنْ يَشَٓاءُۜ وَهُوَ الْعَز۪يزُ الْحَك۪يمُ4
हमने जो रसूल भी भेजा, उसकी अपनी क़ौम की भाषा के साथ ही भेजा, ताकि वह उनके लिए अच्छी तरह खोलकर बयान कर दे। फिर अल्लाह जिसे चाहता है पथभ्रष्ट रहने देता है और जिसे चाहता है सीधे मार्ग पर लगा देता है। वह है भी प्रभुत्वशाली, अत्यन्त तत्वदर्शी
وَلَقَدْ اَرْسَلْنَا مُوسٰى بِاٰيَاتِنَٓا اَنْ اَخْرِجْ قَوْمَكَ مِنَ الظُّلُمَاتِ اِلَى النُّورِ وَذَكِّرْهُمْ بِاَيَّامِ اللّٰهِۜ اِنَّ ف۪ي ذٰلِكَ لَاٰيَاتٍ لِكُلِّ صَبَّارٍ شَكُورٍ5
हमने मूसा को अपनी निशानियों के साथ भेजा था कि "अपनी क़ौम के लोगों को अँधेरों से प्रकाश की ओर निकाल ला और उन्हें अल्लाह के दिवस याद दिला।" निश्चय ही इसमें प्रत्येक धैर्यवान, कृतज्ञ व्यक्ति के लिए कितनी ही निशानियाँ है
وَاِذْ قَالَ مُوسٰى لِقَوْمِهِ اذْكُرُوا نِعْمَةَ اللّٰهِ عَلَيْكُمْ اِذْ اَنْجٰيكُمْ مِنْ اٰلِ فِرْعَوْنَ يَسُومُونَكُمْ سُٓوءَ الْعَذَابِ وَيُذَبِّحُونَ اَبْنَٓاءَكُمْ وَيَسْتَحْيُونَ نِسَٓاءَكُمْۜ وَف۪ي ذٰلِكُمْ بَلَٓاءٌ مِنْ رَبِّكُمْ عَظ۪يمٌ۟6
जब मूसा ने अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "अल्लाह ही उस कृपादृष्टि को याद करो, जो तुमपर हुई। जब उसने तुम्हें फ़िरऔनियों से छुटकारा दिलाया जो तुम्हें बुरी यातना दे रहे थे, तुम्हारे बेटों का वध कर डालते थे और तुम्हारी औरतों को जीवित रखते थे, किन्तु इसमें तुम्हारे रब की ओर से बड़ी कृपा हुई।"
وَاِذْ تَاَذَّنَ رَبُّكُمْ لَئِنْ شَكَرْتُمْ لَاَز۪يدَنَّكُمْ وَلَئِنْ كَفَرْتُمْ اِنَّ عَذَاب۪ي لَشَد۪يدٌ7
जब तुम्हारे रब ने सचेत कर दिया था कि 'यदि तुम कृतज्ञ हुए तो मैं तुम्हें और अधिक दूँगा, परन्तु यदि तुम अकृतज्ञ सिद्ध हुए तो निश्चय ही मेरी यातना भी अत्यन्त कठोर है।'
وَقَالَ مُوسٰٓى اِنْ تَكْفُرُٓوا اَنْتُمْ وَمَنْ فِي الْاَرْضِ جَم۪يعًاۙ فَاِنَّ اللّٰهَ لَغَنِيٌّ حَم۪يدٌ8
और मूसा ने भी कहा था, "यदि तुम और वे जो भी धरती में हैं सब के सब अकृतज्ञ हो जाओ तो अल्लाह तो बड़ा निरपेक्ष, प्रशंस्य है।"
اَلَمْ يَاْتِكُمْ نَبَؤُ۬ا الَّذ۪ينَ مِنْ قَبْلِكُمْ قَوْمِ نُوحٍ وَعَادٍ وَثَمُودَۜۛ وَالَّذ۪ينَ مِنْ بَعْدِهِمْۜۛ لَا يَعْلَمُهُمْ اِلَّا اللّٰهُۜ جَٓاءَتْهُمْ رُسُلُهُمْ بِالْبَيِّنَاتِ فَرَدُّٓوا اَيْدِيَهُمْ ف۪ٓي اَفْوَاهِهِمْ وَقَالُٓوا اِنَّا كَفَرْنَا بِمَٓا اُرْسِلْتُمْ بِه۪ وَاِنَّا لَف۪ي شَكٍّ مِمَّا تَدْعُونَنَٓا اِلَيْهِ مُر۪يبٍ9
क्या तुम्हें उन लोगों की खबर नहीं पहुँची जो तुमसे पहले गुज़रे हैं, नूह की क़ौम और आद और समूद और वे लोग जो उनके पश्चात हुए जिनको अल्लाह के अतिरिक्त कोई नहीं जानता? उनके पास उनके रसूल स्पष्टि प्रमाण लेकर आए थे, किन्तु उन्होंने उनके मुँह पर अपने हाथ रख दिए और कहने लगे, "जो कुछ देकर तुम्हें भेजा गया है, हम उसका इनकार करते है और जिसकी ओर तुम हमें बुला रहे हो, उसके विषय में तो हम अत्यन्त दुविधाजनक संदेह में ग्रस्त है।"
قَالَتْ رُسُلُهُمْ اَفِي اللّٰهِ شَكٌّ فَاطِرِ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ يَدْعُوكُمْ لِيَغْفِرَ لَكُمْ مِنْ ذُنُوبِكُمْ وَيُؤَخِّرَكُمْ اِلٰٓى اَجَلٍ مُسَمًّىۜ قَالُٓوا اِنْ اَنْتُمْ اِلَّا بَشَرٌ مِثْلُنَاۜ تُر۪يدُونَ اَنْ تَصُدُّونَا عَمَّا كَانَ يَعْبُدُ اٰبَٓاؤُ۬نَا فَاْتُونَا بِسُلْطَانٍ مُب۪ينٍ10
उनके रसूलों ने कहो, "क्या अल्लाह के विषय में संदेह है, जो आकाशों और धरती का रचयिता है? वह तो तुम्हें इसलिए बुला रहा है, ताकि तुम्हारे गुनाहों को क्षमा कर दे और तुम्हें एक नियत समय तक मुहल्ल दे।" उन्होंने कहा, "तुम तो बस हमारे ही जैसे एक मनुष्य हो, चाहते हो कि हमें उनसे रोक दो जिनकी पूजा हमारे बाप-दादा करते आए है। अच्छा, तो अब हमारे सामने कोई स्पष्ट प्रमाण ले आओ।"
قَالَتْ لَهُمْ رُسُلُهُمْ اِنْ نَحْنُ اِلَّا بَشَرٌ مِثْلُكُمْ وَلٰكِنَّ اللّٰهَ يَمُنُّ عَلٰى مَنْ يَشَٓاءُ مِنْ عِبَادِه۪ۜ وَمَا كَانَ لَنَٓا اَنْ نَاْتِيَكُمْ بِسُلْطَانٍ اِلَّا بِاِذْنِ اللّٰهِۜ وَعَلَى اللّٰهِ فَلْيَتَوَكَّلِ الْمُؤْمِنُونَ11
उनके रसूलों ने उनसे कहा, "हम तो वास्तव में बस तुम्हारे ही जैसे मनुष्य है, किन्तु अल्लाह अपने बन्दों में से जिनपर चाहता है एहसान करता है और यह हमारा काम नहीं कि तुम्हारे सामने कोई प्रमाण ले आएँ। यह तो बस अल्लाह के आदेश के पश्चात ही सम्भव है; और अल्लाह ही पर ईमानवालों को भरोसा करना चाहिए
وَمَا لَنَٓا اَلَّا نَتَوَكَّلَ عَلَى اللّٰهِ وَقَدْ هَدٰينَا سُبُلَنَاۜ وَلَنَصْبِرَنَّ عَلٰى مَٓا اٰذَيْتُمُونَاۜ وَعَلَى اللّٰهِ فَلْيَتَوَكَّلِ الْمُتَوَكِّلُونَ۟12
आख़िर हमें क्या हुआ है कि हम अल्लाह पर भरोसा न करें, जबकि उसने हमें हमारे मार्ग दिखाए है? तुम हमें जो तकलीफ़ पहुँचा रहे हो उसके मुक़ाबले में हम धैर्य से काम लेंगे। भरोसा करनेवालों को तो अल्लाह ही पर भरोसा करना चाहिए।"
وَقَالَ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا لِرُسُلِهِمْ لَنُخْرِجَنَّكُمْ مِنْ اَرْضِنَٓا اَوْ لَتَعُودُنَّ ف۪ي مِلَّتِنَاۜ فَاَوْحٰٓى اِلَيْهِمْ رَبُّهُمْ لَنُهْلِكَنَّ الظَّالِم۪ينَۙ13
अन्ततः इनकार करनेवालों ने अपने रसूलों से कहा, "हम तुम्हें अपने भू-भाग से निकालकर रहेंगे, या तो तुम्हें हमारे पंथ में लौट आना होगा।" तब उनके रब ने उनकी ओर प्रकाशना की, "हम अत्याचारियों को विनष्ट करके रहेंगे
وَلَنُسْكِنَنَّكُمُ الْاَرْضَ مِنْ بَعْدِهِمْۜ ذٰلِكَ لِمَنْ خَافَ مَقَام۪ي وَخَافَ وَع۪يدِ14
और उनके पश्चात तुम्हें इस धरती में बसाएँगे। यह उसके लिए है, जिसे मेरे समक्ष खड़े होने का भय हो और जो मेरी चेतावनी से डरे।"
وَاسْتَفْتَحُوا وَخَابَ كُلُّ جَبَّارٍ عَن۪يدٍۙ15
उन्होंने फ़ैसला चाहा और प्रत्येक सरकश-दुराग्रही असफल होकर रहा
مِنْ وَرَٓائِه۪ جَهَنَّمُ وَيُسْقٰى مِنْ مَٓاءٍ صَد۪يدٍۙ16
वह जहन्नम से घिरा है और पीने को उसे कचलोहू का पानी दिया जाएगा,
يَتَجَرَّعُهُ وَلَا يَكَادُ يُس۪يغُهُ وَيَاْت۪يهِ الْمَوْتُ مِنْ كُلِّ مَكَانٍ وَمَا هُوَ بِمَيِّتٍۜ وَمِنْ وَرَٓائِه۪ عَذَابٌ غَل۪يظٌ17
जिसे वह कठिनाई से घूँट-घूँट करके पिएगा और ऐसा नहीं लगेगा कि वह आसानी से उसे उतार सकता है, और मृत्यु उसपर हर ओर से चली आती होगी, फिर भी वह मरेगा नहीं। और उसके सामने कठोर यातना होगी
مَثَلُ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا بِرَبِّهِمْ اَعْمَالُهُمْ كَرَمَادٍۨ اشْتَدَّتْ بِهِ الرّ۪يحُ ف۪ي يَوْمٍ عَاصِفٍۜ لَا يَقْدِرُونَ مِمَّا كَسَبُوا عَلٰى شَيْءٍۜ ذٰلِكَ هُوَ الضَّلَالُ الْبَع۪يدُ18
जिन लोगों ने अपने रब का इनकार किया उनकी मिसाल यह है कि उनके कर्म जैसे राख हों जिसपर आँधी के दिन प्रचंड हवा का झोंका चले। कुछ भी उन्हें अपनी कमाई में से हाथ न आ सकेगा। यही परले दर्जे की तबाही और गुमराही है
اَلَمْ تَرَ اَنَّ اللّٰهَ خَلَقَ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضَ بِالْحَقِّۜ اِنْ يَشَاْ يُذْهِبْكُمْ وَيَاْتِ بِخَلْقٍ جَد۪يدٍۙ19
क्या तुमने देखा नहीं कि अल्लाह ने आकाशों और धरती को सोद्देश्य पैदा किया? यदि वह चाहे तो तुम सबको ले जाए और एक नवीन सृष्टा जनसमूह ले आए
وَمَا ذٰلِكَ عَلَى اللّٰهِ بِعَز۪يزٍ20
और यह अल्लाह के लिए कुछ भी कठिन नहीं है
وَبَرَزُوا لِلّٰهِ جَم۪يعًا فَقَالَ الضُّعَفٰٓؤُ۬ا لِلَّذ۪ينَ اسْتَكْبَرُٓوا اِنَّا كُنَّا لَكُمْ تَبَعًا فَهَلْ اَنْتُمْ مُغْنُونَ عَنَّا مِنْ عَذَابِ اللّٰهِ مِنْ شَيْءٍۜ قَالُوا لَوْ هَدٰينَا اللّٰهُ لَهَدَيْنَاكُمْۜ سَوَٓاءٌ عَلَيْنَٓا اَجَزِعْنَٓا اَمْ صَبَرْنَا مَا لَنَا مِنْ مَح۪يصٍ۟21
सबके सब अल्लाह के सामने खुलकर आ जाएँगे तो कमज़ोर लोग, उन लोगों से जो बड़े बने हुए थे, कहेंगे, "हम तो तुम्हारे पीछे चलते थे। तो क्या तुम अल्लाह की यातना में से कुछ हमपर टाल सकते हो? वे कहेंगे, "यदि अल्लाह हमें मार्ग दिखाता तो हम तुम्हें भी दिखाते। अब यदि हम व्याकुल हों या धैर्य से काम लें, हमारे लिए बराबर है। हमारे लिए बचने का कोई उपाय नहीं।"
وَقَالَ الشَّيْطَانُ لَمَّا قُضِيَ الْاَمْرُ اِنَّ اللّٰهَ وَعَدَكُمْ وَعْدَ الْحَقِّ وَوَعَدْتُكُمْ فَاَخْلَفْتُكُمْۜ وَمَا كَانَ لِيَ عَلَيْكُمْ مِنْ سُلْطَانٍ اِلَّٓا اَنْ دَعَوْتُكُمْ فَاسْتَجَبْتُمْ ل۪يۚ فَلَا تَلُومُون۪ي وَلُومُٓوا اَنْفُسَكُمْۜ مَٓا اَنَا۬ بِمُصْرِخِكُمْ وَمَٓا اَنْتُمْ بِمُصْرِخِيَّۜ اِنّ۪ي كَفَرْتُ بِمَٓا اَشْرَكْتُمُونِ مِنْ قَبْلُۜ اِنَّ الظَّالِم۪ينَ لَهُمْ عَذَابٌ اَل۪يمٌ22
जब मामले का फ़ैसला हो चुकेगा तब शैतान कहेगा, "अल्लाह ने तो तुमसे सच्चा वादा किया था और मैंने भी तुमसे वादा किया था, फिर मैंने तो तुमसे सत्य के प्रतिकूल कहा था। और मेरा तो तुमपर कोई अधिकार नहीं था, सिवाय इसके कि मैंने मान ली; बल्कि अपने आप ही को मलामत करो, न मैं तुम्हारी फ़रियाद सुन सकता हूँ और न तुम मेरी फ़रियाद सुन सकते हो। पहले जो तुमने सहभागी ठहराया था, मैं उससे विरक्त हूँ।" निश्चय ही अत्याचारियों के लिए दुखदायिनी यातना है
وَاُدْخِلَ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ جَنَّاتٍ تَجْر۪ي مِنْ تَحْتِهَا الْاَنْهَارُ خَالِد۪ينَ ف۪يهَا بِاِذْنِ رَبِّهِمْۜ تَحِيَّتُهُمْ ف۪يهَا سَلَامٌ23
इसके विपरीत जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए वे ऐसे बाग़ों में प्रवेश करेंगे जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी। उनमें वे अपने रब की अनुमति से सदैव रहेंगे। वहाँ उनका अभिवादन 'सलाम' से होगा
اَلَمْ تَرَ كَيْفَ ضَرَبَ اللّٰهُ مَثَلًا كَلِمَةً طَيِّبَةً كَشَجَرَةٍ طَيِّبَةٍ اَصْلُهَا ثَابِتٌ وَفَرْعُهَا فِي السَّمَٓاءِۙ24
क्या तुमने देखा नहीं कि अल्लाह ने कैसी मिसाल पेश की? अच्छी उत्तम बात एक अच्छे शुभ वृक्ष के सदृश है, जिसकी जड़ गहरी जमी हुई हो और उसकी शाखाएँ आकाश में पहुँची हुई हों;
تُؤْت۪ٓي اُكُلَهَا كُلَّ ح۪ينٍ بِاِذْنِ رَبِّهَاۜ وَيَضْرِبُ اللّٰهُ الْاَمْثَالَ لِلنَّاسِ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ25
अपने रब की अनुमति से वह हर समय अपना फल दे रहा हो। अल्लाह तो लोगों के लिए मिशालें पेश करता है, ताकि वे जाग्रत हों
وَمَثَلُ كَلِمَةٍ خَب۪يثَةٍ كَشَجَرَةٍ خَب۪يثَةٍۨ اجْتُثَّتْ مِنْ فَوْقِ الْاَرْضِ مَا لَهَا مِنْ قَرَارٍ26
और अशुभ एंव अशुद्ध बात की मिसाल एक अशुभ वृक्ष के सदृश है, जिसे धरती के ऊपर ही से उखाड़ लिया जाए और उसे कुछ भी स्थिरता प्राप्त न हो
يُثَبِّتُ اللّٰهُ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا بِالْقَوْلِ الثَّابِتِ فِي الْحَيٰوةِ الدُّنْيَا وَفِي الْاٰخِرَةِۚ وَيُضِلُّ اللّٰهُ الظَّالِم۪ينَ وَيَفْعَلُ اللّٰهُ مَا يَشَٓاءُ۟27
ईमान लानेवालों को अल्लाह सुदृढ़ बात के द्वारा सांसारिक जीवन में भी परलोक में भी सुदृढ़ता प्रदान करता है और अत्याचारियों को अल्लाह विचलित कर देता है। और अल्लाह जो चाहता है, करता है
اَلَمْ تَرَ اِلَى الَّذ۪ينَ بَدَّلُوا نِعْمَتَ اللّٰهِ كُفْرًا وَاَحَلُّوا قَوْمَهُمْ دَارَ الْبَوَارِۙ28
क्या तुमने उन लोगों को नहीं देखा जिन्होंने अल्लाह की नेमत को कुफ़्र से बदल डाला औऱ अपनी क़ौम को विनाश-गृह में उतार दिया;
جَهَنَّمَۚ يَصْلَوْنَهَاۜ وَبِئْسَ الْقَرَارُ29
जहन्नम में, जिसमें वे झोंके जाएँगे और वह अत्यन्त बुरा ठिकाना है!
وَجَعَلُوا لِلّٰهِ اَنْدَادًا لِيُضِلُّوا عَنْ سَب۪يلِه۪ۜ قُلْ تَمَتَّعُوا فَاِنَّ مَص۪يرَكُمْ اِلَى النَّارِ30
और उन्होंने अल्लाह के प्रतिद्वन्दी बना दिए, ताकि परिणामस्वरूप वे उन्हें उसके मार्ग से भटका दें। कह दो, "थोड़े दिन मज़े ले लो। अन्ततः तुम्हें आग ही की ओर जाना है।"
قُلْ لِعِبَادِيَ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا يُق۪يمُوا الصَّلٰوةَ وَيُنْفِقُوا مِمَّا رَزَقْنَاهُمْ سِرًّا وَعَلَانِيَةً مِنْ قَبْلِ اَنْ يَاْتِيَ يَوْمٌ لَا بَيْعٌ ف۪يهِ وَلَا خِلَالٌ31
मेरे जो बन्दे ईमान लाए है उनसे कह दो कि वे नमाज़ की पाबन्दी करें और हमने उन्हें जो कुछ दिया है उसमें से छुपे और खुले ख़र्च करें, इससे पहले कि वह दिन आ जाए जिनमें न कोई क्रय-विक्रय होगा और न मैत्री
اَللّٰهُ الَّذ۪ي خَلَقَ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضَ وَاَنْزَلَ مِنَ السَّمَٓاءِ مَٓاءً فَاَخْرَجَ بِه۪ مِنَ الثَّمَرَاتِ رِزْقًا لَكُمْۚ وَسَخَّرَ لَكُمُ الْفُلْكَ لِتَجْرِيَ فِي الْبَحْرِ بِاَمْرِه۪ۚ وَسَخَّرَ لَكُمُ الْاَنْهَارَۚ32
वह अल्लाह ही है जिसने आकाशों और धरती की सृष्टि की और आकाश से पानी उतारा, फिर वह उसके द्वारा कितने ही पैदावार और फल तुम्हारी आजीविका के रूप में सामने लाया। और नौका को तुम्हारे काम में लगाया, ताकि समुद्र में उसके आदेश से चले और नदियों को भी तुम्हें लाभ पहुँचाने में लगाया
وَسَخَّرَ لَكُمُ الشَّمْسَ وَالْقَمَرَ دَٓائِبَيْنِۚ وَسَخَّرَ لَكُمُ الَّيْلَ وَالنَّهَارَۚ33
और सूर्य और चन्द्रमा को तुम्हारे लिए कार्यरत किया और एक नियत विधान के अधीन निरंतर गतिशील है। और रात औऱ दिन को भी तुम्हें लाभ पहुँचाने में लगा रखा है
وَاٰتٰيكُمْ مِنْ كُلِّ مَا سَاَلْتُمُوهُۜ وَاِنْ تَعُدُّوا نِعْمَتَ اللّٰهِ لَا تُحْصُوهَاۜ اِنَّ الْاِنْسَانَ لَظَلُومٌ كَفَّارٌ۟34
और हर उस चीज़ में से तुम्हें दिया जो तुमने उससे माँगा यदि तुम अल्लाह की नेमतों की गणना नहीं कर सकते। वास्तव में मनुष्य ही बड़ा ही अन्यायी, कृतघ्न है
وَاِذْ قَالَ اِبْرٰه۪يمُ رَبِّ اجْعَلْ هٰذَا الْبَلَدَ اٰمِنًا وَاجْنُبْن۪ي وَبَنِيَّ اَنْ نَعْبُدَ الْاَصْنَامَۜ35
याद करो जब इबराहीम ने कहा था, "मेरे रब! इस भूभाग (मक्का) को शान्तिमय बना दे और मुझे और मेरी सन्तान को इससे बचा कि हम मूर्तियों को पूजने लग जाए
رَبِّ اِنَّهُنَّ اَضْلَلْنَ كَث۪يرًا مِنَ النَّاسِۚ فَمَنْ تَبِعَن۪ي فَاِنَّهُ مِنّ۪يۚ وَمَنْ عَصَان۪ي فَاِنَّكَ غَفُورٌ رَح۪يمٌ36
मेरे रब! इन्होंने (इन मूर्तियों नॆ) बहुत से लोगों को पथभ्रष्ट किया है। अतः जिस किसी ने मॆरा अनुसरण किया वह मेरा है और जिस ने मेरी अवज्ञा की तो निश्चय ही तू बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
رَبَّنَٓا اِنّ۪ٓي اَسْكَنْتُ مِنْ ذُرِّيَّت۪ي بِوَادٍ غَيْرِ ذ۪ي زَرْعٍ عِنْدَ بَيْتِكَ الْمُحَرَّمِۙ رَبَّنَا لِيُق۪يمُوا الصَّلٰوةَ فَاجْعَلْ اَفْـِٔدَةً مِنَ النَّاسِ تَهْو۪ٓي اِلَيْهِمْ وَارْزُقْهُمْ مِنَ الثَّمَرَاتِ لَعَلَّهُمْ يَشْكُرُونَ37
मेरे रब! मैंने एक ऐसी घाटी में जहाँ कृषि-योग्य भूमि नहीं अपनी सन्तान के एक हिस्से को तेरे प्रतिष्ठित घर (काबा) के निकट बसा दिया है। हमारे रब! ताकि वे नमाज़ क़ायम करें। अतः तू लोगों के दिलों को उनकी ओर झुका दे और उन्हें फलों और पैदावार की आजीविका प्रदान कर, ताकि वे कृतज्ञ बने
رَبَّنَٓا اِنَّكَ تَعْلَمُ مَا نُخْف۪ي وَمَا نُعْلِنُۜ وَمَا يَخْفٰى عَلَى اللّٰهِ مِنْ شَيْءٍ فِي الْاَرْضِ وَلَا فِي السَّمَٓاءِ38
हमारे रब! तू जानता ही है जो कुछ हम छिपाते है और जो कुछ प्रकट करते है। अल्लाह से तो कोई चीज़ न धरती में छिपी है और न आकाश में
اَلْحَمْدُ لِلّٰهِ الَّذ۪ي وَهَبَ ل۪ي عَلَى الْكِبَرِ اِسْمٰع۪يلَ وَاِسْحٰقَۜ اِنَّ رَبّ۪ي لَسَم۪يعُ الدُّعَٓاءِ39
सारी प्रशंसा है उस अल्लाह की जिसने बुढ़ापे के होते हुए भी मुझे इसमाईल और इसहाक़ दिए। निस्संदेह मेरा रब प्रार्थना अवश्य सुनता है
رَبِّ اجْعَلْن۪ي مُق۪يمَ الصَّلٰوةِ وَمِنْ ذُرِّيَّت۪يۗ رَبَّنَا وَتَقَبَّلْ دُعَٓاءِ40
मेरे रब! मुझे और मेरी सन्तान को नमाज़ क़ायम करनेवाला बना। हमारे रब! और हमारी प्रार्थना स्वीकार कर
رَبَّنَا اغْفِرْ ل۪ي وَلِوَالِدَيَّ وَلِلْمُؤْمِن۪ينَ يَوْمَ يَقُومُ الْحِسَابُ۟41
हमारे रब! मुझे और मेरे माँ-बाप को और मोमिनों को उस दिन क्षमाकर देना, जिस दिन हिसाब का मामला पेश आएगा।"
وَلَا تَحْسَبَنَّ اللّٰهَ غَافِلًا عَمَّا يَعْمَلُ الظَّالِمُونَۜ اِنَّمَا يُؤَخِّرُهُمْ لِيَوْمٍ تَشْخَصُ ف۪يهِ الْاَبْصَارُۙ42
अब ये अत्याचारी जो कुछ कर रहे है, उससे अल्लाह को असावधान न समझो। वह तो इन्हें बस उस दिन तक के लिए टाल रहा है जबकि आँखे फटी की फटी रह जाएँगी,
مُهْطِع۪ينَ مُقْنِع۪ي رُؤُ۫سِهِمْ لَا يَرْتَدُّ اِلَيْهِمْ طَرْفُهُمْۚ وَاَفْـِٔدَتُهُمْ هَوَٓاءٌۜ43
अपने सिर उठाए भागे चले जा रहे होंगे; उनकी निगाह स्वयं उनकी अपनी ओर भी न फिरेगी और उनके दिल उड़े जा रहे होंगे
وَاَنْذِرِ النَّاسَ يَوْمَ يَاْت۪يهِمُ الْعَذَابُۙ فَيَقُولُ الَّذ۪ينَ ظَلَمُوا رَبَّنَٓا اَخِّرْنَٓا اِلٰٓى اَجَلٍ قَر۪يبٍۙ نُجِبْ دَعْوَتَكَ وَنَتَّبِعِ الرُّسُلَۜ اَوَلَمْ تَكُونُٓوا اَقْسَمْتُمْ مِنْ قَبْلُ مَا لَكُمْ مِنْ زَوَالٍۙ44
लोगों को उस दिन से डराओ, जब यातना उन्हें आ लेगी। उस समय अत्याचारी लोग कहेंगे, "हमारे रब! हमें थोड़ी-सी मुहलत दे दे। हम तेरे आमंत्रण को स्वीकार करेंगे और रसूलों का अनुसरण करेंगे।" कहा जाएगा, "क्या तुम इससे पहले क़समें नहीं खाया करते थे कि हमारा तो पतन ही न होगा?"
وَسَكَنْتُمْ ف۪ي مَسَاكِنِ الَّذ۪ينَ ظَلَمُٓوا اَنْفُسَهُمْ وَتَبَيَّنَ لَكُمْ كَيْفَ فَعَلْنَا بِهِمْ وَضَرَبْنَا لَكُمُ الْاَمْثَالَ45
तुम लोगों की बस्तियों में रह-बस चुके थे, जिन्होंने अपने ऊपर अत्याचार किया था और तुमपर अच्छी तरह स्पष्ट हो चुका था कि उनके साथ हमने कैसा मामला किया और हमने तुम्हारे लिए कितनी ही मिशालें बयान की थी।"
وَقَدْ مَكَرُوا مَكْرَهُمْ وَعِنْدَ اللّٰهِ مَكْرُهُمْۜ وَاِنْ كَانَ مَكْرُهُمْ لِتَزُولَ مِنْهُ الْجِبَالُ46
वे अपनी चाल चल चुक हैं। अल्लाह के पास भी उनके लिए चाल मौजूद थी, यद्यपि उनकी चाल ऐसी ही क्यों न रही हो जिससे पर्वत भी अपने स्थान से टल जाएँ
فَلَا تَحْسَبَنَّ اللّٰهَ مُخْلِفَ وَعْدِه۪ رُسُلَهُۜ اِنَّ اللّٰهَ عَز۪يزٌ ذُو انْتِقَامٍۜ47
अतः यह न समझना कि अल्लाह अपने रसूलों से किए हुए अपने वादे के विरुद्ध जाएगा। अल्लाह तो अपार शक्तिवाला, प्रतिशोधक है
يَوْمَ تُبَدَّلُ الْاَرْضُ غَيْرَ الْاَرْضِ وَالسَّمٰوَاتُ وَبَرَزُوا لِلّٰهِ الْوَاحِدِ الْقَهَّارِ48
जिस दिन यह धरती दूसरी धरती से बदल दी जाएगी और आकाश भी। और वे सब के सब अल्लाह के सामने खुलकर आ जाएँगे, जो अकेला है, सबपर जिसका आधिपत्य है
وَتَرَى الْمُجْرِم۪ينَ يَوْمَئِذٍ مُقَرَّن۪ينَ فِي الْاَصْفَادِۚ49
और उस दिन तुम अपराधियों को देखोगे कि ज़ंजीरों में जकड़े हुए है
سَرَاب۪يلُهُمْ مِنْ قَطِرَانٍ وَتَغْشٰى وُجُوهَهُمُ النَّارُۙ50
उनके परिधान तारकोल के होंगे और आग उनके चहरों पर छा रही होगी,
لِيَجْزِيَ اللّٰهُ كُلَّ نَفْسٍ مَا كَسَبَتْۜ اِنَّ اللّٰهَ سَر۪يعُ الْحِسَابِ51
ताकि अल्लाह प्रत्येक जीव को उसकी कमाई का बदला दे। निश्चय ही अल्लाह जल्द हिसाब लेनेवाला है
هٰذَا بَلَاغٌ لِلنَّاسِ وَلِيُنْذَرُوا بِه۪ وَلِيَعْلَمُٓوا اَنَّمَا هُوَ اِلٰهٌ وَاحِدٌ وَلِيَذَّكَّرَ اُو۬لُوا الْاَلْبَابِ52
यह लोगों को सन्देश पहुँचा देना है (ताकि वे इसे ध्यानपूर्वक सुनें) और ताकि उन्हें इसके द्वारा सावधान कर दिया जाए और ताकि वे जान लें कि वही अकेला पूज्य है और ताकि वे सचेत हो जाएँ, तो बुद्धि और समझ रखते है