18. जुज़ - कुरान पढ़ें
23 · अल-मोमिनून24 · अन-नूर25 · अल-फुरकान
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
قَدْ اَفْلَحَ الْمُؤْمِنُونَۙ1
सफल हो गए ईमानवाले,
اَلَّذ۪ينَ هُمْ ف۪ي صَلَاتِهِمْ خَاشِعُونَۙ2
जो अपनी नमाज़ों में विनम्रता अपनाते है;
وَالَّذ۪ينَ هُمْ عَنِ اللَّغْوِ مُعْرِضُونَۙ3
और जो व्यर्थ बातों से पहलू बचाते है;
وَالَّذ۪ينَ هُمْ لِلزَّكٰوةِ فَاعِلُونَۙ4
और जो ज़कात अदा करते है;
وَالَّذ۪ينَ هُمْ لِفُرُوجِهِمْ حَافِظُونَۙ5
और जो अपने गुप्तांगों की रक्षा करते है-
اِلَّا عَلٰٓى اَزْوَاجِهِمْ اَوْ مَا مَلَكَتْ اَيْمَانُهُمْ فَاِنَّهُمْ غَيْرُ مَلُوم۪ينَۚ6
सिवाय इस सूरत के कि अपनी पत्नि यों या लौंडियों के पास जाएँ कि इसपर वे निन्दनीय नहीं है
فَمَنِ ابْتَغٰى وَرَٓاءَ ذٰلِكَ فَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْعَادُونَۚ7
परन्तु जो कोई इसके अतिरिक्त कुछ और चाहे तो ऐसे ही लोग सीमा उल्लंघन करनेवाले है।-
وَالَّذ۪ينَ هُمْ لِاَمَانَاتِهِمْ وَعَهْدِهِمْ رَاعُونَۙ8
और जो अपनी अमानतों और अपनी प्रतिज्ञा का ध्यान रखते है;
وَالَّذ۪ينَ هُمْ عَلٰى صَلَوَاتِهِمْ يُحَافِظُونَۢ9
और जो अपनी नमाज़ों की रक्षा करते हैं;
اُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْوَارِثُونَۙ10
वही वारिस होने वाले है
اَلَّذ۪ينَ يَرِثُونَ الْفِرْدَوْسَۜ هُمْ ف۪يهَا خَالِدُونَ11
जो फ़िरदौस की विरासत पाएँगे। वे उसमें सदैव रहेंगे
وَلَقَدْ خَلَقْنَا الْاِنْسَانَ مِنْ سُلَالَةٍ مِنْ ط۪ينٍۚ12
हमने मनुष्य को मिट्टी के सत से बनाया
ثُمَّ جَعَلْنَاهُ نُطْفَةً ف۪ي قَرَارٍ مَك۪ينٍۖ13
फिर हमने उसे एक सुरक्षित ठहरने की जगह टपकी हुई बूँद बनाकर रखा
ثُمَّ خَلَقْنَا النُّطْفَةَ عَلَقَةً فَخَلَقْنَا الْعَلَقَةَ مُضْغَةً فَخَلَقْنَا الْمُضْغَةَ عِظَامًا فَكَسَوْنَا الْعِظَامَ لَحْمًاۗ ثُمَّ اَنْشَاْنَاهُ خَلْقًا اٰخَرَۜ فَتَبَارَكَ اللّٰهُ اَحْسَنُ الْخَالِق۪ينَۜ14
फिर हमने उस बूँद को लोथड़े का रूप दिया; फिर हमने उस लोथड़े को बोटी का रूप दिया; फिर हमने उन हड्डियों पर मांस चढाया; फिर हमने उसे एक दूसरा ही सर्जन रूप देकर खड़ा किया। अतः बहुत ही बरकतवाला है अल्लाह, सबसे उत्तम स्रष्टा!
ثُمَّ اِنَّكُمْ بَعْدَ ذٰلِكَ لَمَيِّتُونَۜ15
फिर तुम अवश्य मरनेवाले हो
ثُمَّ اِنَّكُمْ يَوْمَ الْقِيٰمَةِ تُبْعَثُونَ16
फिर क़ियामत के दिन तुम निश्चय ही उठाए जाओगे
وَلَقَدْ خَلَقْنَا فَوْقَكُمْ سَبْعَ طَرَٓائِقَۗ وَمَا كُنَّا عَنِ الْخَلْقِ غَافِل۪ينَ17
और हमने तुम्हारे ऊपर सात रास्ते बनाए है। और हम सृष्टि-कार्य से ग़ाफ़िल नहीं
وَاَنْزَلْنَا مِنَ السَّمَٓاءِ مَٓاءً بِقَدَرٍ فَاَسْكَنَّاهُ فِي الْاَرْضِۗ وَاِنَّا عَلٰى ذَهَابٍ بِه۪ لَقَادِرُونَۚ18
और हमने आकाश से एक अंदाज़े के साथ पानी उतारा। फिर हमने उसे धरती में ठहरा दिया, और उसे विलुप्त करने की सामर्थ्य भी हमें प्राप्त है
فَاَنْشَاْنَا لَكُمْ بِه۪ جَنَّاتٍ مِنْ نَخ۪يلٍ وَاَعْنَابٍۢ لَكُمْ ف۪يهَا فَوَاكِهُ كَث۪يرَةٌ وَمِنْهَا تَاْكُلُونَۙ19
फिर हमने उसके द्वारा तुम्हारे लिए खजूरो और अंगूरों के बाग़ पैदा किए। तुम्हारे लिए उनमें बहुत-से फल है (जिनमें तुम्हारे लिए कितने ही लाभ है) और उनमें से तुम खाते हो
وَشَجَرَةً تَخْرُجُ مِنْ طُورِ سَيْنَٓاءَ تَنْبُتُ بِالدُّهْنِ وَصِبْغٍ لِلْاٰكِل۪ينَ20
और वह वृक्ष भी जो सैना पर्वत से निकलता है, जो तेल और खानेवालों के लिए सालन लिए हुए उगता है
وَاِنَّ لَكُمْ فِي الْاَنْعَامِ لَعِبْرَةًۜ نُسْق۪يكُمْ مِمَّا ف۪ي بُطُونِهَا وَلَكُمْ ف۪يهَا مَنَافِعُ كَث۪يرَةٌ وَمِنْهَا تَاْكُلُونَۙ21
और निश्चय ही तुम्हारे लिए चौपायों में भी एक शिक्षा है। उनके पेटों में जो कुछ है उसमें से हम तुम्हें पिलाते है। औऱ तुम्हारे लिए उनमें बहुत-से फ़ायदे है और उन्हें तुम खाते भी हो
وَعَلَيْهَا وَعَلَى الْفُلْكِ تُحْمَلُونَ۟22
और उनपर और नौकाओं पर तुम सवार होते हो
وَلَقَدْ اَرْسَلْنَا نُوحًا اِلٰى قَوْمِه۪ فَقَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللّٰهَ مَا لَكُمْ مِنْ اِلٰهٍ غَيْرُهُۜ اَفَلَا تَتَّقُونَ23
हमने नूह को उसकी क़ौम की ओर भेजा तो उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो। उसके सिवा तुम्हारा और कोई इष्ट-पूज्य नहीं है तो क्या तुम डर नहीं रखते?"
فَقَالَ الْمَلَؤُ۬ا الَّذ۪ينَ كَفَرُوا مِنْ قَوْمِه۪ مَا هٰذَٓا اِلَّا بَشَرٌ مِثْلُكُمْۙ يُر۪يدُ اَنْ يَتَفَضَّلَ عَلَيْكُمْۜ وَلَوْ شَٓاءَ اللّٰهُ لَاَنْزَلَ مَلٰٓئِكَةًۚ مَا سَمِعْنَا بِهٰذَا ف۪ٓي اٰبَٓائِنَا الْاَوَّل۪ينَۚ24
इसपर उनकी क़ौम के सरदार, जिन्होंने इनकार किया था, कहने लगे, "यह तो बस तुम्हीं जैसा एक मनुष्य है। चाहता है कि तुमपर श्रेष्ठता प्राप्त करे।""अल्लाह यदि चाहता तो फ़रिश्ते उतार देता। यह बात तो हमने अपने अगले बाप-दादा के समयों से सुनी ही नहीं
اِنْ هُوَ اِلَّا رَجُلٌ بِه۪ جِنَّةٌ فَتَرَبَّصُوا بِه۪ حَتّٰى ح۪ينٍ25
यह तो बस एक उन्मादग्रस्त व्यक्ति है। अतः एक समय तक इसकी प्रतीक्षा कर लो।"
قَالَ رَبِّ انْصُرْن۪ي بِمَا كَذَّبُونِ26
उसने कहा, "ऐ मेरे रब! इन्होंने मुझे जो झुठलाया है, इसपर तू मेरी सहायता कर।"
فَاَوْحَيْنَٓا اِلَيْهِ اَنِ اصْنَعِ الْفُلْكَ بِاَعْيُنِنَا وَوَحْيِنَا فَاِذَا جَٓاءَ اَمْرُنَا وَفَارَ التَّنُّورُۙ فَاسْلُكْ ف۪يهَا مِنْ كُلٍّ زَوْجَيْنِ اثْنَيْنِ وَاَهْلَكَ اِلَّا مَنْ سَبَقَ عَلَيْهِ الْقَوْلُ مِنْهُمْۚ وَلَا تُخَاطِبْن۪ي فِي الَّذ۪ينَ ظَلَمُواۚ اِنَّهُمْ مُغْرَقُونَ27
तब हमने उसकी ओर प्रकाशना की कि "हमारी आँखों के सामने और हमारी प्रकाशना के अनुसार नौका बना और फिर जब हमारा आदेश आ जाए और तूफ़ान उमड़ पड़े तो प्रत्येक प्रजाति में से एक-एक जोड़ा उसमें रख ले और अपने लोगों को भी, सिवाय उनके जिनके विरुद्ध पहले फ़ैसला हो चुका है। और अत्याचारियों के विषय में मुझसे बात न करना। वे तो डूबकर रहेंगे
فَاِذَا اسْتَوَيْتَ اَنْتَ وَمَنْ مَعَكَ عَلَى الْفُلْكِ فَقُلِ الْحَمْدُ لِلّٰهِ الَّذ۪ي نَجّٰينَا مِنَ الْقَوْمِ الظَّالِم۪ينَ28
फिर जब तू नौका पर सवार हो जाए और तेरे साथी भी तो कह, प्रशंसा है अल्लाह की, जिसने हमें ज़ालिम लोगों से छुटकारा दिया
وَقُلْ رَبِّ اَنْزِلْن۪ي مُنْزَلًا مُبَارَكًا وَاَنْتَ خَيْرُ الْمُنْزِل۪ينَ29
और कह, ऐ मेरे रब! मुझे बरकतवाली जगह उतार। और तू सबसे अच्छा मेज़बान है।"
اِنَّ ف۪ي ذٰلِكَ لَاٰيَاتٍ وَاِنْ كُنَّا لَمُبْتَل۪ينَ30
निस्संदेह इसमें कितनी ही निशानियाँ हैं और परीक्षा तो हम करते ही है
ثُمَّ اَنْشَاْنَا مِنْ بَعْدِهِمْ قَرْنًا اٰخَر۪ينَۚ31
फिर उनके पश्चात हमने एक दूसरी नस्ल को उठाया;
فَاَرْسَلْنَا ف۪يهِمْ رَسُولًا مِنْهُمْ اَنِ اعْبُدُوا اللّٰهَ مَا لَكُمْ مِنْ اِلٰهٍ غَيْرُهُۜ اَفَلَا تَتَّقُونَ۟32
और उनमें हमने स्वयं उन्हीं में से एक रसूल भेजा कि "अल्लाह की बन्दगी करो। उसके सिवा तुम्हारा कोई इष्ट-पूज्य नहीं। तो क्या तुम डर नहीं रखते?"
وَقَالَ الْمَلَاُ مِنْ قَوْمِهِ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا وَكَذَّبُوا بِلِقَٓاءِ الْاٰخِرَةِ وَاَتْرَفْنَاهُمْ فِي الْحَيٰوةِ الدُّنْيَاۙ مَا هٰذَٓا اِلَّا بَشَرٌ مِثْلُكُمْۙ يَاْكُلُ مِمَّا تَاْكُلُونَ مِنْهُ وَيَشْرَبُ مِمَّا تَشْرَبُونَ33
उसकी क़ौम के सरदार, जिन्होंने इनकार किया और आख़िरत के मिलन को झूठलाया और जिन्हें हमने सांसारिक जीवन में सुख प्रदान किया था, कहने लगे, "यह तो बस तुम्हीं जैसा एक मनुष्य है। जो कुछ तुम खाते हो, वही यह भी खाता है और जो कुछ तुम पीते हो, वही यह भी पीता है
وَلَئِنْ اَطَعْتُمْ بَشَرًا مِثْلَكُمْ اِنَّكُمْ اِذًا لَخَاسِرُونَ34
यदि तुम अपने ही जैसे एक मनुष्य के आज्ञाकारी हुए तो निश्चय ही तुम घाटे में पड़ गए
اَيَعِدُكُمْ اَنَّكُمْ اِذَا مِتُّمْ وَكُنْتُمْ تُرَابًا وَعِظَامًا اَنَّكُمْ مُخْرَجُونَۖ35
क्या यह तुमसे वादा करता है कि जब तुम मरकर मिट्टी और हड़्डियाँ होकर रह जाओगे तो तुम निकाले जाओगे?
هَيْهَاتَ هَيْهَاتَ لِمَا تُوعَدُونَۖ36
दूर की बात है, बहुत दूर की, जिसका तुमसे वादा किया जा रहा है!
اِنْ هِيَ اِلَّا حَيَاتُنَا الدُّنْيَا نَمُوتُ وَنَحْيَا وَمَا نَحْنُ بِمَبْعُوث۪ينَۖ37
वह तो बस हमारा सांसारिक जीवन ही है। (यहीं) हम मरते और जीते है। हम कोई दोबारा उठाए जानेवाले नहीं है
اِنْ هُوَ اِلَّا رَجُلٌۨ افْتَرٰى عَلَى اللّٰهِ كَذِبًا وَمَا نَحْنُ لَهُ بِمُؤْمِن۪ينَ38
वह तो बस एक ऐसा व्यक्ति है जिसने अल्लाह पर झूठ घड़ा है। हम उसे कदापि माननेवाले नहीं।"
قَالَ رَبِّ انْصُرْن۪ي بِمَا كَذَّبُونِ39
उसने कहा, "ऐ मेरे रब! उन्होंने जो मुझे झुठलाया, उसपर तू मेरी सहायता कर।"
قَالَ عَمَّا قَل۪يلٍ لَيُصْبِحُنَّ نَادِم۪ينَۚ40
कहा, "शीघ्र ही वे पछताकर रहेंगे।"
فَاَخَذَتْهُمُ الصَّيْحَةُ بِالْحَقِّ فَجَعَلْنَاهُمْ غُثَٓاءًۚ فَبُعْدًا لِلْقَوْمِ الظَّالِم۪ينَ41
फिर घटित होनेवाली बात के अनुसार उन्हें एक प्रचंड आवाज़ ने आ लिया और हमने उन्हें कूड़ा-कर्कट बनाकर रख दिया। अतः फिटकार है, ऐसे अत्याचारी लोगों पर!
ثُمَّ اَنْشَاْنَا مِنْ بَعْدِهِمْ قُرُونًا اٰخَر۪ينَۜ42
फिर हमने उनके पश्चात दूसरी नस्लों को उठाया
مَا تَسْبِقُ مِنْ اُمَّةٍ اَجَلَهَا وَمَا يَسْتَاْخِرُونَۜ43
कोई समुदाय न तो अपने निर्धारित समय से आगे बढ़ सकता है और न पीछे रह सकता है
ثُمَّ اَرْسَلْنَا رُسُلَنَا تَتْرَاۜ كُلَّمَا جَٓاءَ اُمَّةً رَسُولُهَا كَذَّبُوهُ فَاَتْبَعْنَا بَعْضَهُمْ بَعْضًا وَجَعَلْنَاهُمْ اَحَاد۪يثَۚ فَبُعْدًا لِقَوْمٍ لَا يُؤْمِنُونَ44
फिर हमने निरन्तर अपने रसूल भेजे। जब भी किसी समुदाय के पास उसका रसूल आया, तो उसके लोगों ने उसे झुठला दिया। अतः हम एक दूसरे के पीछे (विनाश के लिए) लगाते चले गए और हमने उन्हें ऐसा कर दिया कि वे कहानियाँ होकर रह गए। फिटकार हो उन लोगों पर जो ईमान न लाएँ
ثُمَّ اَرْسَلْنَا مُوسٰى وَاَخَاهُ هٰرُونَ بِاٰيَاتِنَا وَسُلْطَانٍ مُب۪ينٍۙ45
फिर हमने मूसा और उसके भाई हारून को अपनी निशानियों और खुले प्रमाण के साथ फ़िरऔन और उसके सरदारों की ओर भेजा।
اِلٰى فِرْعَوْنَ وَمَلَا۬ئِه۪ فَاسْتَكْبَرُوا وَكَانُوا قَوْمًا عَال۪ينَۚ46
किन्तु उन्होंने अहंकार किया। वे थे ही सरकश लोग
فَقَالُٓوا اَنُؤْمِنُ لِبَشَرَيْنِ مِثْلِنَا وَقَوْمُهُمَا لَنَا عَابِدُونَۚ47
तो व कहने लगे, "क्या हम अपने ही जैसे दो मनुष्यों की बात मान लें, जबकि उनकी क़ौम हमारी ग़ुलाम भी है?"
فَكَذَّبُوهُمَا فَكَانُوا مِنَ الْمُهْلَك۪ينَ48
अतः उन्होंने उन दोनों को झुठला दिया और विनष्ट होनेवालों में सम्मिलित होकर रहे
وَلَقَدْ اٰتَيْنَا مُوسَى الْكِتَابَ لَعَلَّهُمْ يَهْتَدُونَ49
और हमने मूसा को किताब प्रदान की, ताकि वे लोग मार्ग पा सकें
وَجَعَلْنَا ابْنَ مَرْيَمَ وَاُمَّهُٓ اٰيَةً وَاٰوَيْنَاهُمَٓا اِلٰى رَبْوَةٍ ذَاتِ قَرَارٍ وَمَع۪ينٍ۟50
और मरयम के बेटे और उसकी माँ को हमने एक निशानी बनाया। और हमने उन्हें रहने योग्य स्रोतबाली ऊँची जगह शरण दी,
يَٓا اَيُّهَا الرُّسُلُ كُلُوا مِنَ الطَّيِّبَاتِ وَاعْمَلُوا صَالِحًاۜ اِنّ۪ي بِمَا تَعْمَلُونَ عَل۪يمٌۜ51
"ऐ पैग़म्बरो! अच्छी पाक चीज़े खाओ और अच्छा कर्म करो। जो कुछ तुम करते हो उसे मैं जानता हूँ
وَاِنَّ هٰذِه۪ٓ اُمَّتُكُمْ اُمَّةً وَاحِدَةً وَاَنَا۬ رَبُّكُمْ فَاتَّقُونِ52
और निश्चय ही यह तुम्हारा समुदाय, एक ही समुदाय है और मैं तुम्हारा रब हूँ। अतः मेरा डर रखो।"
فَتَقَطَّعُٓوا اَمْرَهُمْ بَيْنَهُمْ زُبُرًاۜ كُلُّ حِزْبٍ بِمَا لَدَيْهِمْ فَرِحُونَ53
किन्तु उन्होंने स्वयं अपने मामले (धर्म) को परस्पर टुकड़े-टुकड़े कर डाला। हर गिरोह उसी पर खुश है, जो कुछ उसके पास है
فَذَرْهُمْ ف۪ي غَمْرَتِهِمْ حَتّٰى ح۪ينٍ54
अच्छा तो उन्हें उनकी अपनी बेहोशी में डूबे हुए ही एक समय तक छोड़ दो
اَيَحْسَبُونَ اَنَّمَا نُمِدُّهُمْ بِه۪ مِنْ مَالٍ وَبَن۪ينَۙ55
क्या वे समझते है कि हम जो उनकी धन और सन्तान से सहायता किए जा रहे है,
نُسَارِعُ لَهُمْ فِي الْخَيْرَاتِۜ بَلْ لَا يَشْعُرُونَ56
तो यह उनके भलाइयों में कोई जल्दी कर रहे है?
اِنَّ الَّذ۪ينَ هُمْ مِنْ خَشْيَةِ رَبِّهِمْ مُشْفِقُونَۙ57
नहीं, बल्कि उन्हें इसका एहसास नहीं है। निश्चय ही जो लोग अपने रब के भय से काँपते रहते हैं;
وَالَّذ۪ينَ هُمْ بِاٰيَاتِ رَبِّهِمْ يُؤْمِنُونَۙ58
और जो लोग अपने रब की आयतों पर ईमान लाते है;
وَالَّذ۪ينَ هُمْ بِرَبِّهِمْ لَا يُشْرِكُونَۙ59
और जो लोग अपने रब के साथ किसी को साझी नहीं ठहराते;
وَالَّذ۪ينَ يُؤْتُونَ مَٓا اٰتَوْا وَقُلُوبُهُمْ وَجِلَةٌ اَنَّهُمْ اِلٰى رَبِّهِمْ رَاجِعُونَۙ60
और जो लोग देते है, जो कुछ देते है और हाल यह होता है कि दिल उनके काँप रहे होते है, इसलिए कि उन्हें अपने रब की ओर पलटना है;
اُو۬لٰٓئِكَ يُسَارِعُونَ فِي الْخَيْرَاتِ وَهُمْ لَهَا سَابِقُونَ61
यही वे लोग है, जो भलाइयों में जल्दी करते है और यही उनके लिए अग्रसर रहनेवाले है।
وَلَا نُكَلِّفُ نَفْسًا اِلَّا وُسْعَهَا وَلَدَيْنَا كِتَابٌ يَنْطِقُ بِالْحَقِّ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ62
हम किसी व्यक्ति पर उसकी समाई (क्षमता) से बढ़कर ज़िम्मेदारी का बोझ नहीं डालते और हमारे पास एक किताब है, जो ठीक-ठीक बोलती है, और उनपर ज़ुल्म नहीं किया जाएगा
بَلْ قُلُوبُهُمْ ف۪ي غَمْرَةٍ مِنْ هٰذَا وَلَهُمْ اَعْمَالٌ مِنْ دُونِ ذٰلِكَ هُمْ لَهَا عَامِلُونَ63
बल्कि उनके दिल इसकी (सत्य धर्म की) ओर से हटकर (वसवसों और गफ़लतों आदि के) भँवर में पडे हुए है और उससे (ईमानवालों की नीति से) हटकर उनके कुछ और ही काम है। वे उन्हीं को करते रहेंगे;
حَتّٰٓى اِذَٓا اَخَذْنَا مُتْرَف۪يهِمْ بِالْعَذَابِ اِذَا هُمْ يَجْـَٔرُونَۜ64
यहाँ तक कि जब हम उनके खुशहाल लोगों को यातना में पकड़ेगे तो क्या देखते है कि वे विलाप और फ़रियाद कर रहे है
لَا تَجْـَٔرُوا الْيَوْمَ اِنَّكُمْ مِنَّا لَا تُنْصَرُونَ65
(कहा जाएगा,) "आज चिल्लाओ मत, तुम्हें हमारी ओर से कोई सहायता मिलनेवाली नहीं
قَدْ كَانَتْ اٰيَات۪ي تُتْلٰى عَلَيْكُمْ فَكُنْتُمْ عَلٰٓى اَعْقَابِكُمْ تَنْكِصُونَۙ66
तुम्हें मेरी आयतें सुनाई जाती थीं, तो तुम अपनी एड़ियों के बल फिर जाते थे।
مُسْتَكْبِر۪ينَ بِه۪ۗ سَامِرًا تَهْجُرُونَ67
हाल यह था कि इसके कारण स्वयं को बड़ा समझते थे, उसे एक कहानी कहनेवाला ठहराकर छोड़ चलते थे
اَفَلَمْ يَدَّبَّرُوا الْقَوْلَ اَمْ جَٓاءَهُمْ مَا لَمْ يَاْتِ اٰبَٓاءَهُمُ الْاَوَّل۪ينَۘ68
क्या उन्होंने इस वाणी पर विचार नहीं किया या उनके पास वह चीज़ आ गई जो उनके पहले बाप-दादा के पास न आई थी?
اَمْ لَمْ يَعْرِفُوا رَسُولَهُمْ فَهُمْ لَهُ مُنْكِرُونَۘ69
या उन्होंने अपने रसूल को पहचाना नहीं, इसलिए उसका इनकार कर रहे है?
اَمْ يَقُولُونَ بِه۪ جِنَّةٌۜ بَلْ جَٓاءَهُمْ بِالْحَقِّ وَاَكْثَرُهُمْ لِلْحَقِّ كَارِهُونَ70
या वे कहते है, "उसे उन्माद हो गया है।" नहीं, बल्कि वह उनके पास सत्य लेकर आया है। किन्तु उनमें अधिकांश को सत्य अप्रिय है
وَلَوِ اتَّبَعَ الْحَقُّ اَهْوَٓاءَهُمْ لَفَسَدَتِ السَّمٰوَاتُ وَالْاَرْضُ وَمَنْ ف۪يهِنَّۜ بَلْ اَتَيْنَاهُمْ بِذِكْرِهِمْ فَهُمْ عَنْ ذِكْرِهِمْ مُعْرِضُونَۜ71
और यदि सत्य कहीं उनकी इच्छाओं के पीछे चलता तो समस्त आकाश और धरती और जो भी उनमें है, सबमें बिगाड़ पैदा हो जाता। नहीं, बल्कि हम उनके पास उनके हिस्से की अनुस्मृति लाए है। किन्तु वे अपनी अनुस्मृति से कतरा रहे है
اَمْ تَسْـَٔلُهُمْ خَرْجًا فَخَرَاجُ رَبِّكَ خَيْرٌۗ وَهُوَ خَيْرُ الرَّازِق۪ينَ72
या तुम उनसे कुथ शुल्क माँग रहे हो? तुम्हारे रब का दिया ही उत्तम है। और वह सबसे अच्छी रोज़ी देनेवाला है
وَاِنَّكَ لَتَدْعُوهُمْ اِلٰى صِرَاطٍ مُسْتَق۪يمٍ73
और वास्तव में तुम उन्हें सीधे मार्ग की ओर बुला रहे हो
وَاِنَّ الَّذ۪ينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِالْاٰخِرَةِ عَنِ الصِّرَاطِ لَنَاكِبُونَ74
किन्तु जो लोग आख़िरत पर ईमान नहीं रखते वे इस मार्ग से हटकर चलना चाहते है
وَلَوْ رَحِمْنَاهُمْ وَكَشَفْنَا مَا بِهِمْ مِنْ ضُرٍّ لَلَجُّوا ف۪ي طُغْيَانِهِمْ يَعْمَهُونَ75
यदि हम (किसी आज़माइश में डालने के पश्चात) उनपर दया करते और जिस तकलीफ़ में वे होते उसे दूर कर देते तो भी वे अपनी सरकशी में हठात बहकते रहते
وَلَقَدْ اَخَذْنَاهُمْ بِالْعَذَابِ فَمَا اسْتَكَانُوا لِرَبِّهِمْ وَمَا يَتَضَرَّعُونَ76
यद्यपि हमने उन्हें यातना में पकड़ा, फिर भी वे अपने रब के आगे न तो झुके और न वे गिड़गिड़ाते ही थे
حَتّٰٓى اِذَا فَتَحْنَا عَلَيْهِمْ بَابًا ذَا عَذَابٍ شَد۪يدٍ اِذَا هُمْ ف۪يهِ مُبْلِسُونَ۟77
यहाँ तक कि जब हम उनपर कठोर यातना का द्वार खोल दें तो क्या देखेंगे कि वे उसमें निराश होकर रह गए है
وَهُوَ الَّذ۪ٓي اَنْشَاَ لَكُمُ السَّمْعَ وَالْاَبْصَارَ وَالْاَفْـِٔدَةَۜ قَل۪يلًا مَا تَشْكُرُونَ78
और वही है जिसने तुम्हारे लिए कान और आँखे और दिल बनाए। तुम कृतज्ञता थोड़े ही दिखाते हो!
وَهُوَ الَّذ۪ي ذَرَاَكُمْ فِي الْاَرْضِ وَاِلَيْهِ تُحْشَرُونَ79
वही है जिसने तुम्हें धरती में पैदा करके फैलाया और उसी की ओर तुम इकट्ठे होकर जाओगे
وَهُوَ الَّذ۪ي يُحْي۪ وَيُم۪يتُ وَلَهُ اخْتِلَافُ الَّيْلِ وَالنَّهَارِۜ اَفَلَا تَعْقِلُونَ80
और वही है जो जीवन प्रदान करता और मृत्यु देता है और रात और दिन का उलट-फेर उसी के अधिकार में है। फिर क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लेते?
بَلْ قَالُوا مِثْلَ مَا قَالَ الْاَوَّلُونَ81
नहीं, बल्कि वे लोग वहीं कुछ करते है जो उनके पहले के लोग कह चुके है
قَالُٓوا ءَاِذَا مِتْنَا وَكُنَّا تُرَابًا وَعِظَامًا ءَاِنَّا لَمَبْعُوثُونَ82
उन्होंने कहा, "क्या जब हम मरकर मिट्टी और हड्डियाँ होकर रह जाएँगे , तो क्या हमें दोबारा जीवित करके उठाया जाएगा?
لَقَدْ وُعِدْنَا نَحْنُ وَاٰبَٓاؤُ۬نَا هٰذَا مِنْ قَبْلُ اِنْ هٰذَٓا اِلَّٓا اَسَاط۪يرُ الْاَوَّل۪ينَ83
यह वादा तो हमसे और इससे पहले हमारे बाप-दादा से होता आ रहा है। कुछ नहीं, यह तो बस अगलों की कहानियाँ है।"
قُلْ لِمَنِ الْاَرْضُ وَمَنْ ف۪يهَٓا اِنْ كُنْتُمْ تَعْلَمُونَ84
कहो, "यह धरती और जो भी इसमें आबाद है, वे किसके है, बताओ यदि तुम जानते हो?"
سَيَقُولُونَ لِلّٰهِۜ قُلْ اَفَلَا تَذَكَّرُونَ85
वे बोल पड़ेगे, "अल्लाह के!" कहो, "फिर तुम होश में क्यों नहीं आते?"
قُلْ مَنْ رَبُّ السَّمٰوَاتِ السَّبْعِ وَرَبُّ الْعَرْشِ الْعَظ۪يمِ86
कहो, "सातों आकाशों का मालिक और महान राजासन का स्वामीकौन है?"
سَيَقُولُونَ لِلّٰهِۜ قُلْ اَفَلَا تَتَّقُونَ87
वे कहेंगे, "सब अल्लाह के है।" कहो, "फिर डर क्यों नहीं रखते?"
قُلْ مَنْ بِيَدِه۪ مَلَكُوتُ كُلِّ شَيْءٍ وَهُوَ يُج۪يرُ وَلَا يُجَارُ عَلَيْهِ اِنْ كُنْتُمْ تَعْلَمُونَ88
कहो, "हर चीज़ की बादशाही किसके हाथ में है, वह जो शरण देता है औऱ जिसके मुक़ाबले में कोई शरण नहीं मिल सकती, बताओ यजि तुम जानते हो?"
سَيَقُولُونَ لِلّٰهِۜ قُلْ فَاَنّٰى تُسْحَرُونَ89
वे बोल पड़ेगे, "अल्लाह की।" कहो, "फिर कहाँ से तुमपर जादू चल जाता है?"
بَلْ اَتَيْنَاهُمْ بِالْحَقِّ وَاِنَّهُمْ لَكَاذِبُونَ90
नहीं, बल्कि हम उनके पास सत्य लेकर आए है और निश्चय ही वे झूठे है
مَا اتَّخَذَ اللّٰهُ مِنْ وَلَدٍ وَمَا كَانَ مَعَهُ مِنْ اِلٰهٍ اِذًا لَذَهَبَ كُلُّ اِلٰهٍ بِمَا خَلَقَ وَلَعَلَا بَعْضُهُمْ عَلٰى بَعْضٍۜ سُبْحَانَ اللّٰهِ عَمَّا يَصِفُونَۙ91
अल्लाह ने अपना कोई बेटा नहीं बनाया और न उसके साथ कोई अन्य पूज्य-प्रभु है। ऐसा होता तो प्रत्येक पूज्य-प्रभु अपनी सृष्टि को लेकर अलग हो जाता और उनमें से एक-दूसरे पर चढ़ाई कर देता। महान और उच्च है अल्लाह उन बातों से, जो वे बयान करते है;
عَالِمِ الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ فَتَعَالٰى عَمَّا يُشْرِكُونَ۟92
जाननेवाला है छुपे और खुले का। सो वह उच्चतर है वह शिर्क से जो वे करते है!
قُلْ رَبِّ اِمَّا تُرِيَنّ۪ي مَا يُوعَدُونَۙ93
कहो, "ऐ मेरे रब! जिस चीज़ का वादा उनसे किया जा रहा है, वह यदि तू मुझे दिखाए
رَبِّ فَلَا تَجْعَلْن۪ي فِي الْقَوْمِ الظَّالِم۪ينَ94
तो मेरे रब! मुझे उन अत्याचारी लोगों में सम्मिलित न करना।"
وَاِنَّا عَلٰٓى اَنْ نُرِيَكَ مَا نَعِدُهُمْ لَقَادِرُونَ95
निश्चय ही हमें इसकी सामर्थ्य प्राप्त है कि हम उनसे जो वादा कर रहे है, वह तुम्हें दिखा दें।
اِدْفَعْ بِالَّت۪ي هِيَ اَحْسَنُ السَّيِّئَةَۜ نَحْنُ اَعْلَمُ بِمَا يَصِفُونَ96
बुराई को उस ढंग से दूर करो, जो सबसे उत्तम हो। हम भली-भाँति जानते है जो कुछ बातें वे बनाते है
وَقُلْ رَبِّ اَعُوذُ بِكَ مِنْ هَمَزَاتِ الشَّيَاط۪ينِۙ97
और कहो, "ऐ मेरे रब! मैं शैतान की उकसाहटों से तेरी शरण चाहता हूँ
وَاَعُوذُ بِكَ رَبِّ اَنْ يَحْضُرُونِ98
और मेरे रब! मैं इससे भी तेरी शरण चाहता हूँ कि वे मेरे पास आएँ।" -
حَتّٰٓى اِذَا جَٓاءَ اَحَدَهُمُ الْمَوْتُ قَالَ رَبِّ ارْجِعُونِۙ99
यहाँ तक कि जब उनमें से किसी की मृत्यु आ गई तो वह कहेगा, "ऐ मेरे रब! मुझे लौटा दे। - ताकि जिस (संसार) को मैं छोड़ आया हूँ
لَعَلّ۪ٓي اَعْمَلُ صَالِحًا ف۪يمَا تَرَكْتُ كَلَّاۜ اِنَّهَا كَلِمَةٌ هُوَ قَٓائِلُهَاۜ وَمِنْ وَرَٓائِهِمْ بَرْزَخٌ اِلٰى يَوْمِ يُبْعَثُونَ100
उसमें अच्छा कर्म करूँ।" कुछ नहीं, यह तो बस एक (व्यर्थ) बात है जो वह कहेगा और उनके पीछे से लेकर उस दिन तक एक रोक लगी हुई है, जब वे दोबारा उठाए जाएँगे
فَاِذَا نُفِخَ فِي الصُّورِ فَلَٓا اَنْسَابَ بَيْنَهُمْ يَوْمَئِذٍ وَلَا يَتَسَٓاءَلُونَ101
फिर जब सूर (नरसिंघा) में फूँक मारी जाएगी तो उस दिन उनके बीच रिश्ते-नाते शेष न रहेंगे, और न वे एक-दूसरे को पूछेंगे
فَمَنْ ثَقُلَتْ مَوَاز۪ينُهُ فَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ102
फिर जिनके पलड़े भारी हुए तॊ वही हैं जो सफल।
وَمَنْ خَفَّتْ مَوَاز۪ينُهُ فَاُو۬لٰٓئِكَ الَّذ۪ينَ خَسِرُٓوا اَنْفُسَهُمْ ف۪ي جَهَنَّمَ خَالِدُونَۚ103
रहे वे लोग जिनके पलड़े हल्के हुए, तो वही है जिन्होंने अपने आपको घाटे में डाला। वे सदैव जहन्नम में रहेंगे
تَلْفَحُ وُجُوهَهُمُ النَّارُ وَهُمْ ف۪يهَا كَالِحُونَ104
आग उनके चेहरों को झुलसा देगी और उसमें उनके मुँह विकृत हो रहे होंगे
اَلَمْ تَكُنْ اٰيَات۪ي تُتْلٰى عَلَيْكُمْ فَكُنْتُمْ بِهَا تُكَذِّبُونَ105
(कहा जाएगा,) "क्या तुम्हें मेरी आयातें सुनाई नहीं जाती थी, तो तुम उन्हें झुठलाते थे?"
قَالُوا رَبَّنَا غَلَبَتْ عَلَيْنَا شِقْوَتُنَا وَكُنَّا قَوْمًا ضَٓالّ۪ينَ106
वे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! हमारा दुर्भाग्य हमपर प्रभावी हुआ और हम भटके हुए लोग थे
رَبَّنَٓا اَخْرِجْنَا مِنْهَا فَاِنْ عُدْنَا فَاِنَّا ظَالِمُونَ107
हमारे रब! हमें यहाँ से निकाल दे! फिर हम दोबारा ऐसा करें तो निश्चय ही हम अत्याचारी होंगे।"
قَالَ اخْسَؤُ۫ا ف۪يهَا وَلَا تُكَلِّمُونِ108
वह कहेगा, "फिटकारे हुए तिरस्कृत, इसी में पड़े रहो और मुझसे बात न करो
اِنَّهُ كَانَ فَر۪يقٌ مِنْ عِبَاد۪ي يَقُولُونَ رَبَّنَٓا اٰمَنَّا فَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَا وَاَنْتَ خَيْرُ الرَّاحِم۪ينَۚ109
मेरे बन्दों में कुछ लोग थे, जो कहते थे, हमारे रब! हम ईमान ले आए। अतः तू हमें क्षमा कर दे और हमपर दया कर। तू सबसे अच्छा दया करनेवाला है
فَاتَّخَذْتُمُوهُمْ سِخْرِيًّا حَتّٰٓى اَنْسَوْكُمْ ذِكْر۪ي وَكُنْتُمْ مِنْهُمْ تَضْحَكُونَ110
तो तुमने उनका उपहास किया, यहाँ तक कि उनके कारण तुम मेरी याद को भुला बैठे और तुम उनपर हँसते रहे
اِنّ۪ي جَزَيْتُهُمُ الْيَوْمَ بِمَا صَبَرُٓواۙ اَنَّهُمْ هُمُ الْفَٓائِزُونَ111
आज मैंने उनके धैर्य का यह बदला प्रदान किया कि वही है जो सफलता को प्राप्त हुए।"
قَالَ كَمْ لَبِثْتُمْ فِي الْاَرْضِ عَدَدَ سِن۪ينَ112
वह कहेगाः “तुम धरती में कितने वर्ष रहे”?
قَالُوا لَبِثْنَا يَوْمًا اَوْ بَعْضَ يَوْمٍ فَسْـَٔلِ الْعَٓادّ۪ينَ113
वॆ कहेंगेः , "एक दिन या एक दिन का कुछ भाग। गणना करनेवालों से पूछ लीजिए।?"
قَالَ اِنْ لَبِثْتُمْ اِلَّا قَل۪يلًا لَوْ اَنَّكُمْ كُنْتُمْ تَعْلَمُونَ114
वह कहेगा, "तुम ठहरे थोड़े ही, क्या अच्छा होता तुम जानते होते!
اَفَحَسِبْتُمْ اَنَّمَا خَلَقْنَاكُمْ عَبَثًا وَاَنَّكُمْ اِلَيْنَا لَا تُرْجَعُونَ115
तो क्या तुमने यह समझा था कि हमने तुम्हें व्यर्थ पैदा किया है और यह कि तुम्हें हमारी और लौटना नहीं है?"
فَتَعَالَى اللّٰهُ الْمَلِكُ الْحَقُّۚ لَٓا اِلٰهَ اِلَّا هُوَۚ رَبُّ الْعَرْشِ الْكَر۪يمِ116
तो सर्वोच्च है अल्लाह, सच्चा सम्राट! उसके सिवा कोई पूज्य-प्रभु नहीं, स्वामी है महिमाशाली सिंहासन का
وَمَنْ يَدْعُ مَعَ اللّٰهِ اِلٰهًا اٰخَرَۙ لَا بُرْهَانَ لَهُ بِه۪ۙ فَاِنَّمَا حِسَابُهُ عِنْدَ رَبِّه۪ۜ اِنَّهُ لَا يُفْلِحُ الْكَافِرُونَ117
और जो कोई अल्लाह के साथ किसी दूसरे पूज्य को पुकारे, जिसके लिए उसके पास कोई प्रमाम नहीं, तो बस उसका हिसाब उसके रब के पास है। निश्चय ही इनकार करनेवाले कभी सफल नहीं होगे
وَقُلْ رَبِّ اغْفِرْ وَارْحَمْ وَاَنْتَ خَيْرُ الرَّاحِم۪ينَ118
और कहो, "मेरे रब! मुझे क्षमा कर दे और दया कर। तू तो सबसे अच्छा दया करनेवाला है।"
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
سُورَةٌ اَنْزَلْنَاهَا وَفَرَضْنَاهَا وَاَنْزَلْنَا ف۪يهَٓا اٰيَاتٍ بَيِّنَاتٍ لَعَلَّكُمْ تَذَكَّرُونَ1
यह एक (महत्वपूर्ण) सूरा है, जिसे हमने उतारा है। और इसे हमने अनिवार्य किया है, और इसमें हमने स्पष्ट आयतें (आदेश) अवतरित की है। कदाचित तुम शिक्षा ग्रहण करो
اَلزَّانِيَةُ وَالزَّان۪ي فَاجْلِدُوا كُلَّ وَاحِدٍ مِنْهُمَا مِائَةَ جَلْدَةٍۖ وَلَا تَاْخُذْكُمْ بِهِمَا رَاْفَةٌ ف۪ي د۪ينِ اللّٰهِ اِنْ كُنْتُمْ تُؤْمِنُونَ بِاللّٰهِ وَالْيَوْمِ الْاٰخِرِۚ وَلْيَشْهَدْ عَذَابَهُمَا طَٓائِفَةٌ مِنَ الْمُؤْمِن۪ينَ2
व्यभिचारिणी और व्यभिचारी - इन दोनों में से प्रत्येक को सौ कोड़े मारो और अल्लाह के धर्म (क़ानून) के विषय में तुम्हें उनपर तरस न आए, यदि तुम अल्लाह औऱ अन्तिम दिन को मानते हो। और उन्हें दंड देते समय मोमिनों में से कुछ लोगों को उपस्थित रहना चाहिए
اَلزَّان۪ي لَا يَنْكِحُ اِلَّا زَانِيَةً اَوْ مُشْرِكَةًۘ وَالزَّانِيَةُ لَا يَنْكِحُهَٓا اِلَّا زَانٍ اَوْ مُشْرِكٌۚ وَحُرِّمَ ذٰلِكَ عَلَى الْمُؤْمِن۪ينَ3
व्यभिचारी किसी व्यभिचारिणी या बहुदेववादी स्त्री से ही निकाह करता है। और (इसी प्रकार) व्यभिचारिणी, किसी व्यभिचारी या बहुदेववादी से ही निकाह करते है। और यह मोमिनों पर हराम है
وَالَّذ۪ينَ يَرْمُونَ الْمُحْصَنَاتِ ثُمَّ لَمْ يَاْتُوا بِاَرْبَعَةِ شُهَدَٓاءَ فَاجْلِدُوهُمْ ثَمَان۪ينَ جَلْدَةً وَلَا تَقْبَلُوا لَهُمْ شَهَادَةً اَبَدًاۚ وَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْفَاسِقُونَۙ4
और जो लोग शरीफ़ और पाकदामन स्त्री पर तोहमत लगाएँ, फिर चार गवाह न लाएँ, उन्हें अस्सी कोड़े मारो और उनकी गवाही कभी भी स्वीकार न करो - वही है जो अवज्ञाकारी है। -
اِلَّا الَّذ۪ينَ تَابُوا مِنْ بَعْدِ ذٰلِكَ وَاَصْلَحُواۚ فَاِنَّ اللّٰهَ غَفُورٌ رَح۪يمٌ5
सिवाय उन लोगों के जो इसके पश्चात तौबा कर लें और सुधार कर लें। तो निश्चय ही अल्लाह बहुत क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
وَالَّذ۪ينَ يَرْمُونَ اَزْوَاجَهُمْ وَلَمْ يَكُنْ لَهُمْ شُهَدَٓاءُ اِلَّٓا اَنْفُسُهُمْ فَشَهَادَةُ اَحَدِهِمْ اَرْبَعُ شَهَادَاتٍ بِاللّٰهِۙ اِنَّهُ لَمِنَ الصَّادِق۪ينَ6
औऱ जो लोग अपनी पत्नियों पर दोषारोपण करें औऱ उनके पास स्वयं के सिवा गवाह मौजूद न हों, तो उनमें से एक (अर्थात पति) चार बार अल्लाह की क़सम खाकर यह गवाही दे कि वह बिलकुल सच्चा है
وَالْخَامِسَةُ اَنَّ لَعْنَتَ اللّٰهِ عَلَيْهِ اِنْ كَانَ مِنَ الْكَاذِب۪ينَ7
और पाँचवी बार यह गवाही दे कि यदि वह झूठा हो तो उसपर अल्लाह की फिटकार हो
وَيَدْرَؤُ۬ا عَنْهَا الْعَذَابَ اَنْ تَشْهَدَ اَرْبَعَ شَهَادَاتٍ بِاللّٰهِۙ اِنَّهُ لَمِنَ الْكَاذِب۪ينَۙ8
पत्ऩी से भी सज़ा को यह बात टाल सकती है कि वह चार बार अल्लाह की क़सम खाकर गवाही दे कि वह बिलकुल झूठा है
وَالْخَامِسَةَ اَنَّ غَضَبَ اللّٰهِ عَلَيْهَٓا اِنْ كَانَ مِنَ الصَّادِق۪ينَ9
और पाँचवी बार यह कहें कि उसपर (उस स्त्री पर) अल्लाह का प्रकोप हो, यदि वह सच्चा हो
وَلَوْلَا فَضْلُ اللّٰهِ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَتُهُ وَاَنَّ اللّٰهَ تَوَّابٌ حَك۪يمٌ۟10
यदि तुम अल्लाह की उदार कृपा और उसकी दया न होती (तो तुम संकट में पड़े जाते), और यह कि अल्लाह बड़ा तौबा क़बूल करनेवाला,अत्यन्त तत्वदर्शी है
اِنَّ الَّذ۪ينَ جَٓاؤُ۫ بِالْاِفْكِ عُصْبَةٌ مِنْكُمْۜ لَا تَحْسَبُوهُ شَرًّا لَكُمْۜ بَلْ هُوَ خَيْرٌ لَكُمْۜ لِكُلِّ امْرِئٍ مِنْهُمْ مَا اكْتَسَبَ مِنَ الْاِثْمِۚ وَالَّذ۪ي تَوَلّٰى كِبْرَهُ مِنْهُمْ لَهُ عَذَابٌ عَظ۪يمٌ11
जो लोग तोहमत घड़ लाए है वे तुम्हारे ही भीतर की एक टोली है। तुम उसे अपने लिए बुरा मत समझो, बल्कि वह भी तुम्हारे लिए अच्छा ही है। उनमें से प्रत्येक व्यक्ति के लिए उतना ही हिस्सा है जितना गुनाह उसने कमाया, और उनमें से जिस व्यक्ति ने उसकी ज़िम्मेदारी का एक बड़ा हिस्सा अपने सिर लिया उसके लिए बड़ा यातना है
لَوْلَٓا اِذْ سَمِعْتُمُوهُ ظَنَّ الْمُؤْمِنُونَ وَالْمُؤْمِنَاتُ بِاَنْفُسِهِمْ خَيْرًاۙ وَقَالُوا هٰذَٓا اِفْكٌ مُب۪ينٌ12
ऐसा क्यों न हुआ कि जब तुम लोगों ने उसे सुना था, तब मोमिन पुरुष और मोमिन स्त्रियाँ अपने आपसे अच्छा गुमान करते और कहते कि "यह तो खुली तोहमत है?"
لَوْلَا جَٓاؤُ۫ عَلَيْهِ بِاَرْبَعَةِ شُهَدَٓاءَۚ فَاِذْ لَمْ يَاْتُوا بِالشُّهَدَٓاءِ فَاُو۬لٰٓئِكَ عِنْدَ اللّٰهِ هُمُ الْكَاذِبُونَ13
आख़िर वे इसपर चार गवाह क्यों न लाए? अब जबकि वे गवाह नहीं लाए, तो अल्लाह की स्पष्ट में वही झूठे है
وَلَوْلَا فَضْلُ اللّٰهِ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَتُهُ فِي الدُّنْيَا وَالْاٰخِرَةِ لَمَسَّكُمْ ف۪ي مَٓا اَفَضْتُمْ ف۪يهِ عَذَابٌ عَظ۪يمٌۚ14
यदि तुमपर दुनिया और आख़िरत में अल्लाह की उदार कृपा और उसकी दयालुता न होती तो जिस बात में तुम पड़ गए उसके कारण तुम्हें एक बड़ी यातना आ लेती
اِذْ تَلَقَّوْنَهُ بِاَلْسِنَتِكُمْ وَتَقُولُونَ بِاَفْوَاهِكُمْ مَا لَيْسَ لَكُمْ بِه۪ عِلْمٌ وَتَحْسَبُونَهُ هَيِّنًاۗ وَهُوَ عِنْدَ اللّٰهِ عَظ۪يمٌ15
सोचो, जब तुम एक-दूसरे से उस (झूठ) को अपनी ज़बानों पर लेते जा रहे थे और तुम अपने मुँह से वह कुछ कहे जो रहे थे, जिसके विषय में तुम्हें कोई ज्ञान न था और तुम उसे एक साधारण बात समझ रहे थे; हालाँकि अल्लाह के निकट वह एक भारी बात थी
وَلَوْلَٓا اِذْ سَمِعْتُمُوهُ قُلْتُمْ مَا يَكُونُ لَنَٓا اَنْ نَتَكَلَّمَ بِهٰذَاۗ سُبْحَانَكَ هٰذَا بُهْتَانٌ عَظ۪يمٌ16
और ऐसा क्यों न हुआ कि जब तुमने उसे सुना था तो कह देते, "हमारे लिए उचित नहीं कि हम ऐसी बात ज़बान पर लाएँ। महान और उच्च है तू (अल्लाह)! यह तो एक बड़ी तोहमत है?"
يَعِظُكُمُ اللّٰهُ اَنْ تَعُودُوا لِمِثْلِه۪ٓ اَبَدًا اِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِن۪ينَۚ17
अल्लाह तुम्हें नसीहत करता है कि फिर कभी ऐसा न करना, यदि तुम मोमिन हो
وَيُبَيِّنُ اللّٰهُ لَكُمُ الْاٰيَاتِۜ وَاللّٰهُ عَل۪يمٌ حَك۪يمٌ18
अल्लाह तो आयतों को तुम्हारे लिए खोल-खोलकर बयान करता है। अल्लाह तो सर्वज्ञ, तत्वदर्शी है
اِنَّ الَّذ۪ينَ يُحِبُّونَ اَنْ تَش۪يعَ الْفَاحِشَةُ فِي الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لَهُمْ عَذَابٌ اَل۪يمٌۙ فِي الدُّنْيَا وَالْاٰخِرَةِۜ وَاللّٰهُ يَعْلَمُ وَاَنْتُمْ لَا تَعْلَمُونَ19
जो लोग चाहते है कि उन लोगों में जो ईमान लाए है, अश्लीहलता फैले, उनके लिए दुनिया और आख़िरत (लोक-परलोक) में दुखद यातना है। और अल्लाह बड़ा करुणामय, अत्यन्त दयावान है
وَلَوْلَا فَضْلُ اللّٰهِ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَتُهُ وَاَنَّ اللّٰهَ رَؤُ۫فٌ رَح۪يمٌ۟20
और यदि तुमपर अल्लाह का उदार अनुग्रह और उसकी दयालुता न होती (तॊ अवश्य ही तुमपर यातना आ जाती) और यह कि अल्लाह बड़ा करुणामय, अत्यन्त दयावान है।
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لَا تَتَّبِعُوا خُطُوَاتِ الشَّيْطَانِۜ وَمَنْ يَتَّبِعْ خُطُوَاتِ الشَّيْطَانِ فَاِنَّهُ يَاْمُرُ بِالْفَحْشَٓاءِ وَالْمُنْكَرِۜ وَلَوْلَا فَضْلُ اللّٰهِ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَتُهُ مَا زَكٰى مِنْكُمْ مِنْ اَحَدٍ اَبَدًاۙ وَلٰكِنَّ اللّٰهَ يُزَكّ۪ي مَنْ يَشَٓاءُۜ وَاللّٰهُ سَم۪يعٌ عَل۪يمٌ21
ऐ ईमान लानेवालो! शैतान के पद-चिन्हों पर न चलो। जो कोई शैतान के पद-चिन्हों पर चलेगा तो वह तो उसे अश्लीलता औऱ बुराई का आदेश देगा। और यदि अल्लाह का उदार अनुग्रह और उसकी दयालुता तुमपर न होती तो तुममें से कोई भी आत्म-विश्वास को प्राप्त न कर सकता। किन्तु अल्लाह जिसे चाहता है, सँवारता-निखारता है। अल्लाह तो सब कुछ सुनता, जानता है
وَلَا يَاْتَلِ اُو۬لُوا الْفَضْلِ مِنْكُمْ وَالسَّعَةِ اَنْ يُؤْتُٓوا اُو۬لِي الْقُرْبٰى وَالْمَسَاك۪ينَ وَالْمُهَاجِر۪ينَ ف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِۖ وَلْيَعْفُوا وَلْيَصْفَحُواۜ اَلَا تُحِبُّونَ اَنْ يَغْفِرَ اللّٰهُ لَكُمْۜ وَاللّٰهُ غَفُورٌ رَح۪يمٌ22
तुममें जो बड़ाईवाले और सामर्थ्यवान है, वे नातेदारों, मुहताजों और अल्लाह की राह में घरबार छोड़नेवालों को देने से बाज़ रहने की क़सम न खा बैठें। उन्हें चाहिए कि क्षमा कर दें और उनसे दरगुज़र करें। क्या तुम यह नहीं चाहते कि अल्लाह तुम्हें क्षमा करें? अल्लाह बहुत क्षमाशील,अत्यन्त दयावान है
اِنَّ الَّذ۪ينَ يَرْمُونَ الْمُحْصَنَاتِ الْغَافِلَاتِ الْمُؤْمِنَاتِ لُعِنُوا فِي الدُّنْيَا وَالْاٰخِرَةِۖ وَلَهُمْ عَذَابٌ عَظ۪يمٌۙ23
निस्संदेह जो लोग शरीफ़, पाकदामन, भोली-भाली बेख़बर ईमानवाली स्त्रियों पर तोहमत लगाते है उनपर दुनिया और आख़िरत में फिटकार है। और उनके लिए एक बड़ी यातना है
يَوْمَ تَشْهَدُ عَلَيْهِمْ اَلْسِنَتُهُمْ وَاَيْد۪يهِمْ وَاَرْجُلُهُمْ بِمَا كَانُوا يَعْمَلُونَ24
जिस दिन कि उनकी ज़बानें और उनके हाथ और उनके पाँव उनके विरुद्ध उसकी गवाही देंगे, जो कुछ वे करते रहे थे,
يَوْمَئِذٍ يُوَفّ۪يهِمُ اللّٰهُ د۪ينَهُمُ الْحَقَّ وَيَعْلَمُونَ اَنَّ اللّٰهَ هُوَ الْحَقُّ الْمُب۪ينُ25
उस दिन अल्लाह उन्हें उनका ठीक बदला पूरी तरह दे देगा जिसके वे पात्र है। और वे जान लेंगे कि निस्संदेह अल्लाह ही सत्य है खुला हुआ, प्रकट कर देनेवाला
اَلْخَب۪يثَاتُ لِلْخَب۪يث۪ينَ وَالْخَب۪يثُونَ لِلْخَب۪يثَاتِۚ وَالطَّيِّبَاتُ لِلطَّيِّب۪ينَ وَالطَّيِّبُونَ لِلطَّيِّبَاتِۚ اُو۬لٰٓئِكَ مُبَرَّؤُ۫نَ مِمَّا يَقُولُونَۜ لَهُمْ مَغْفِرَةٌ وَرِزْقٌ كَر۪يمٌ۟26
गन्दी चीज़े गन्दें लोगों के लिए है और गन्दे लोग गन्दी चीज़ों के लिए, और अच्छी चीज़ें अच्छे लोगों के लिए है और अच्छे लोग अच्छी चीज़ों के लिए। वे लोग उन बातों से बरी है, जो वे कह रहे है। उनके लिए क्षमा और सम्मानित आजीविका है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لَا تَدْخُلُوا بُيُوتًا غَيْرَ بُيُوتِكُمْ حَتّٰى تَسْتَاْنِسُوا وَتُسَلِّمُوا عَلٰٓى اَهْلِهَاۜ ذٰلِكُمْ خَيْرٌ لَكُمْ لَعَلَّكُمْ تَذَكَّرُونَ27
ऐ ईमान लानेवालो! अपने घरों के सिवा दूसरे घऱों में प्रवेश करो, जब तक कि रज़ामन्दी हासिल न कर लो और उन घरवालों को सलाम न कर लो। यही तुम्हारे लिए उत्तम है, कदाचित तुम ध्यान रखो
فَاِنْ لَمْ تَجِدُوا ف۪يهَٓا اَحَدًا فَلَا تَدْخُلُوهَا حَتّٰى يُؤْذَنَ لَكُمْۚ وَاِنْ ق۪يلَ لَكُمُ ارْجِعُوا فَارْجِعُوا هُوَ اَزْكٰى لَكُمْۜ وَاللّٰهُ بِمَا تَعْمَلُونَ عَل۪يمٌ28
फिर यदि उनमें किसी को न पाओ, तो उनमें प्रवेश न करो जब तक कि तुम्हें अनुमति प्राप्त न हो। और यदि तुमसे कहा जाए कि वापस हो जाओ तो वापस हो जाओ, यही तुम्हारे लिए अधिक अच्छी बात है। अल्लाह भली-भाँति जानता है जो कुछ तुम करते हो
لَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ اَنْ تَدْخُلُوا بُيُوتًا غَيْرَ مَسْكُونَةٍ ف۪يهَا مَتَاعٌ لَكُمْۜ وَاللّٰهُ يَعْلَمُ مَا تُبْدُونَ وَمَا تَكْتُمُونَ29
इसमें तुम्हारे लिए कोई दोष नहीं है कि तुम ऐसे घरों में प्रवेश करो जिनमें कोई न रहता हो, जिनमें तुम्हारे फ़ायदे की कोई चीज़ हो। और अल्लाह जानता है जो कुछ तुम प्रकट करते हो और जो कुछ छिपाते हो
قُلْ لِلْمُؤْمِن۪ينَ يَغُضُّوا مِنْ اَبْصَارِهِمْ وَيَحْفَظُوا فُرُوجَهُمْۜ ذٰلِكَ اَزْكٰى لَهُمْۜ اِنَّ اللّٰهَ خَب۪يرٌ بِمَا يَصْنَعُونَ30
ईमानवाले पुरुषों से कह दो कि अपनी निगाहें बचाकर रखें और अपने गुप्तांगों की रक्षा करें। यही उनके लिए अधिक अच्छी बात है। अल्लाह को उसकी पूरी ख़बर रहती है, जो कुछ वे किया करते है
وَقُلْ لِلْمُؤْمِنَاتِ يَغْضُضْنَ مِنْ اَبْصَارِهِنَّ وَيَحْفَظْنَ فُرُوجَهُنَّ وَلَا يُبْد۪ينَ ز۪ينَتَهُنَّ اِلَّا مَا ظَهَرَ مِنْهَا وَلْيَضْرِبْنَ بِخُمُرِهِنَّ عَلٰى جُيُوبِهِنَّۖ وَلَا يُبْد۪ينَ ز۪ينَتَهُنَّ اِلَّا لِبُعُولَتِهِنَّ اَوْ اٰبَٓائِهِنَّ اَوْ اٰبَٓاءِ بُعُولَتِهِنَّ اَوْ اَبْنَٓائِهِنَّ اَوْ اَبْنَٓاءِ بُعُولَتِهِنَّ اَوْ اِخْوَانِهِنَّ اَوْ بَن۪ٓي اِخْوَانِهِنَّ اَوْ بَن۪ٓي اَخَوَاتِهِنَّ اَوْ نِسَٓائِهِنَّ اَوْ مَا مَلَكَتْ اَيْمَانُهُنَّ اَوِ التَّابِع۪ينَ غَيْرِ اُو۬لِي الْاِرْبَةِ مِنَ الرِّجَالِ اَوِ الطِّفْلِ الَّذ۪ينَ لَمْ يَظْهَرُوا عَلٰى عَوْرَاتِ النِّسَٓاءِۖ وَلَا يَضْرِبْنَ بِاَرْجُلِهِنَّ لِيُعْلَمَ مَا يُخْف۪ينَ مِنْ ز۪ينَتِهِنَّۜ وَتُوبُٓوا اِلَى اللّٰهِ جَم۪يعًا اَيُّهَ الْمُؤْمِنُونَ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ31
और ईमानवाली स्त्रियों से कह दो कि वे भी अपनी निगाहें बचाकर रखें और अपने गुप्तांगों की रक्षा करें। और अपने शृंगार प्रकट न करें, सिवाय उसके जो उनमें खुला रहता है। और अपने सीनों (वक्षस्थल) पर अपने दुपट्टे डाल रहें और अपना शृंगार किसी पर ज़ाहिर न करें सिवाय अपने पतियों के या अपने बापों के या अपने पतियों के बापों के या अपने बेटों के या अपने पतियों के बेटों के या अपने भाइयों के या अपने भतीजों के या अपने भांजों के या मेल-जोल की स्त्रियों के या जो उनकी अपनी मिल्कियत में हो उनके, या उन अधीनस्थ पुरुषों के जो उस अवस्था को पार कर चुके हों जिससें स्त्री की ज़रूरत होती है, या उन बच्चों के जो स्त्रियों के परदे की बातों से परिचित न हों। और स्त्रियाँ अपने पाँव धरती पर मारकर न चलें कि अपना जो शृंगार छिपा रखा हो, वह मालूम हो जाए। ऐ ईमानवालो! तुम सब मिलकर अल्लाह से तौबा करो, ताकि तुम्हें सफलता प्राप्त हो
وَاَنْكِحُوا الْاَيَامٰى مِنْكُمْ وَالصَّالِح۪ينَ مِنْ عِبَادِكُمْ وَاِمَٓائِكُمْۜ اِنْ يَكُونُوا فُقَرَٓاءَ يُغْنِهِمُ اللّٰهُ مِنْ فَضْلِه۪ۜ وَاللّٰهُ وَاسِعٌ عَل۪يمٌ32
तुममें जो बेजोड़े के हों और तुम्हारे ग़ुलामों और तुम्हारी लौंडियों मे जो नेक और योग्य हों, उनका विवाह कर दो। यदि वे ग़रीब होंगे तो अल्लाह अपने उदार अनुग्रह से उन्हें समृद्ध कर देगा। अल्लाह बड़ी समाईवाला, सर्वज्ञ है
وَلْيَسْتَعْفِفِ الَّذ۪ينَ لَا يَجِدُونَ نِكَاحًا حَتّٰى يُغْنِيَهُمُ اللّٰهُ مِنْ فَضْلِه۪ۜ وَالَّذ۪ينَ يَبْتَغُونَ الْكِتَابَ مِمَّا مَلَكَتْ اَيْمَانُكُمْ فَكَاتِبُوهُمْ اِنْ عَلِمْتُمْ ف۪يهِمْ خَيْرًاۗ وَاٰتُوهُمْ مِنْ مَالِ اللّٰهِ الَّذ۪ٓي اٰتٰيكُمْۜ وَلَا تُكْرِهُوا فَتَيَاتِكُمْ عَلَى الْبِغَٓاءِ اِنْ اَرَدْنَ تَحَصُّنًا لِتَبْتَغُوا عَرَضَ الْحَيٰوةِ الدُّنْيَاۜ وَمَنْ يُكْرِهْهُنَّ فَاِنَّ اللّٰهَ مِنْ بَعْدِ اِكْرَاهِهِنَّ غَفُورٌ رَح۪يمٌ33
और जो विवाह का अवसर न पा रहे हो उन्हें चाहिए कि पाकदामनी अपनाए रहें, यहाँ तक कि अल्लाह अपने उदार अनुग्रह से उन्हें समृद्ध कर दे। और जिन लोगों पर तुम्हें स्वामित्व का अधिकार प्राप्त हो उनमें से जो लोग लिखा-पढ़ी के इच्छुक हो उनसे लिखा-पढ़ी कर लो, यदि तुम्हें मालूम हो कि उनमें भलाई है। और उन्हें अल्लाह के माल में से दो, जो उसने तुम्हें प्रदान किया है। और अपनी लौंडियों को सांसारिक जीवन-सामग्री की चाह में व्यविचार के लिए बाध्य न करो, जबकि वे पाकदामन रहना भी चाहती हों। औऱ इसके लिए जो कोई उन्हें बाध्य करेगा, तो निश्चय ही अल्लाह उनके बाध्य किए जाने के पश्चात अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है
وَلَقَدْ اَنْزَلْنَٓا اِلَيْكُمْ اٰيَاتٍ مُبَيِّنَاتٍ وَمَثَلًا مِنَ الَّذ۪ينَ خَلَوْا مِنْ قَبْلِكُمْ وَمَوْعِظَةً لِلْمُتَّق۪ينَ۟34
हमने तुम्हारी ओर खुली हुई आयतें उतार दी है और उन लोगों की मिशालें भी पेश कर दी हैं, जो तुमसे पहले गुज़रे है, और डर रखनेवालों के लिए नसीहत भी
اَللّٰهُ نُورُ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ مَثَلُ نُورِه۪ كَمِشْكٰوةٍ ف۪يهَا مِصْبَاحٌۜ اَلْمِصْبَاحُ ف۪ي زُجَاجَةٍۜ اَلزُّجَاجَةُ كَاَنَّهَا كَوْكَبٌ دُرِّيٌّ يُوقَدُ مِنْ شَجَرَةٍ مُبَارَكَةٍ زَيْتُونَةٍ لَا شَرْقِيَّةٍ وَلَا غَرْبِيَّةٍۙ يَكَادُ زَيْتُهَا يُض۪ٓيءُ وَلَوْ لَمْ تَمْسَسْهُ نَارٌۜ نُورٌ عَلٰى نُورٍۜ يَهْدِي اللّٰهُ لِنُورِه۪ مَنْ يَشَٓاءُۜ وَيَضْرِبُ اللّٰهُ الْاَمْثَالَ لِلنَّاسِۜ وَاللّٰهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَل۪يمٌۙ35
अल्लाह आकाशों और धरती का प्रकाश है। (मोमिनों के दिल में) उसके प्रकाश की मिसाल ऐसी है जैसे एक ताक़ है, जिसमें एक चिराग़ है - वह चिराग़ एक फ़ानूस में है। वह फ़ानूस ऐसा है मानो चमकता हुआ कोई तारा है। - वह चिराग़ ज़ैतून के एक बरकतवाले वृक्ष के तेल से जलाया जाता है, जो न पूर्वी है न पश्चिमी। उसका तेल आप है आप भड़का पड़ता है, यद्यपि आग उसे न भी छुए। प्रकाश पर प्रकाश! - अल्लाह जिसे चाहता है अपने प्रकाश के प्राप्त होने का मार्ग दिखा देता है। अल्लाह लोगों के लिए मिशालें प्रस्तुत करता है। अल्लाह तो हर चीज़ जानता है।
ف۪ي بُيُوتٍ اَذِنَ اللّٰهُ اَنْ تُرْفَعَ وَيُذْكَرَ ف۪يهَا اسْمُهُۙ يُسَبِّحُ لَهُ ف۪يهَا بِالْغُدُوِّ وَالْاٰصَالِۙ36
उन घरों में जिनको ऊँचा करने और जिनमें अपने नाम के याद करने का अल्लाह ने हुक्म दिया है,
رِجَالٌۙ لَا تُلْه۪يهِمْ تِجَارَةٌ وَلَا بَيْعٌ عَنْ ذِكْرِ اللّٰهِ وَاِقَامِ الصَّلٰوةِ وَا۪يتَٓاءِ الزَّكٰوةِۙ يَخَافُونَ يَوْمًا تَتَقَلَّبُ ف۪يهِ الْقُلُوبُ وَالْاَبْصَارُۙ37
उनमें ऐसे लोग प्रभात काल और संध्या समय उसकी तसबीह करते है जिन्हें अल्लाह की याद और नमाज क़ायम करने और ज़कात देने से न तो व्यापार ग़ाफ़िल करता है और न क्रय-विक्रय। वे उस दिन से डरते रहते है जिसमें दिल और आँखें विकल हो जाएँगी
لِيَجْزِيَهُمُ اللّٰهُ اَحْسَنَ مَا عَمِلُوا وَيَز۪يدَهُمْ مِنْ فَضْلِه۪ۜ وَاللّٰهُ يَرْزُقُ مَنْ يَشَٓاءُ بِغَيْرِ حِسَابٍ38
ताकि अल्लाह उन्हें बदला प्रदान करे। उनके अच्छे से अच्छे कामों का, और अपने उदार अनुग्रह से उन्हें और अधिक प्रदान करें। अल्लाह जिसे चाहता है बेहिसाब देता है
وَالَّذ۪ينَ كَفَرُٓوا اَعْمَالُهُمْ كَسَرَابٍ بِق۪يعَةٍ يَحْسَبُهُ الظَّمْاٰنُ مَٓاءًۜ حَتّٰٓى اِذَا جَٓاءَهُ لَمْ يَجِدْهُ شَيْـًٔا وَوَجَدَ اللّٰهَ عِنْدَهُ فَوَفّٰيهُ حِسَابَهُۜ وَاللّٰهُ سَر۪يعُ الْحِسَابِۙ39
रहे वे लोग जिन्होंने इनकार किया उनके कर्म चटियल मैदान में मरीचिका की तरह है कि प्यासा उसे पानी समझता है, यहाँ तक कि जब वह उसके पास पहुँचा तो उसे कुछ भी न पाया। अलबत्ता अल्लाह ही को उसके पास पाया, जिसने उसका हिसाब पूरा-पूरा चुका दिया। और अल्लाह बहुत जल्द हिसाब करता है
اَوْ كَظُلُمَاتٍ ف۪ي بَحْرٍ لُجِّيٍّ يَغْشٰيهُ مَوْجٌ مِنْ فَوْقِه۪ مَوْجٌ مِنْ فَوْقِه۪ سَحَابٌۜ ظُلُمَاتٌ بَعْضُهَا فَوْقَ بَعْضٍۜ اِذَٓا اَخْرَجَ يَدَهُ لَمْ يَكَدْ يَرٰيهَاۜ وَمَنْ لَمْ يَجْعَلِ اللّٰهُ لَهُ نُورًا فَمَا لَهُ مِنْ نُورٍ۟40
या फिर जैसे एक गहरे समुद्र में अँधेरे, लहर के ऊपर लहर छा रही हैं; उसके ऊपर बादल है, अँधेरे है एक पर एक। जब वह अपना हाथ निकाले तो उसे वह सुझाई देता प्रतीत न हो। जिसे अल्लाह ही प्रकाश न दे फिर उसके लिए कोई प्रकाश नहीं
اَلَمْ تَرَ اَنَّ اللّٰهَ يُسَبِّحُ لَهُ مَنْ فِي السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِ وَالطَّيْرُ صَٓافَّاتٍۜ كُلٌّ قَدْ عَلِمَ صَلَاتَهُ وَتَسْب۪يحَهُۜ وَاللّٰهُ عَل۪يمٌ بِمَا يَفْعَلُونَ41
क्या तुमने नहीं देखा कि जो कोई भी आकाशों और धरती में है, अल्लाह की तसबीह (गुणगान) कर रहा है और पंख पसारे हुए पक्षी भी? हर एक अपनी नमाज़ और तसबीह से परिचित है। अल्लाह भली-भाँति जाना है जो कुछ वे करते है
وَلِلّٰهِ مُلْكُ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۚ وَاِلَى اللّٰهِ الْمَص۪يرُ42
अल्लाह ही के लिए है आकाशों और धरती का राज्य। और अल्लाह ही की ओर लौटकर जाना है
اَلَمْ تَرَ اَنَّ اللّٰهَ يُزْج۪ي سَحَابًا ثُمَّ يُؤَلِّفُ بَيْنَهُ ثُمَّ يَجْعَلُهُ رُكَامًا فَتَرَى الْوَدْقَ يَخْرُجُ مِنْ خِلَالِه۪ۚ وَيُنَزِّلُ مِنَ السَّمَٓاءِ مِنْ جِبَالٍ ف۪يهَا مِنْ بَرَدٍ فَيُص۪يبُ بِه۪ مَنْ يَشَٓاءُ وَيَصْرِفُهُ عَنْ مَنْ يَشَٓاءُۜ يَكَادُ سَنَا بَرْقِه۪ يَذْهَبُ بِالْاَبْصَارِۜ43
क्या तुमने देखा नहीं कि अल्लाह बादल को चलाता है। फिर उनको परस्पर मिलाता है। फिर उसे तह पर तह कर देता है। फिर तुम देखते हो कि उसके बीच से मेह बरसता है? और आकाश से- उसमें जो पहाड़ है (बादल जो पहाड़ जैसे प्रतीत होते है उनसे) - ओले बरसाता है। फिर जिस पर चाहता है, उसे हटा देता है। ऐसा प्रतीत होता है कि बिजली की चमक निगाहों को उचक ले जाएगी
يُقَلِّبُ اللّٰهُ الَّيْلَ وَالنَّهَارَۜ اِنَّ ف۪ي ذٰلِكَ لَعِبْرَةً لِاُو۬لِي الْاَبْصَارِ44
अल्लाह ही रात और दिन का उलट-फेर करता है। निश्चय ही आँखें रखनेवालों के लिए इसमें एक शिक्षा है
وَاللّٰهُ خَلَقَ كُلَّ دَٓابَّةٍ مِنْ مَٓاءٍۚ فَمِنْهُمْ مَنْ يَمْش۪ي عَلٰى بَطْنِه۪ۚ وَمِنْهُمْ مَنْ يَمْش۪ي عَلٰى رِجْلَيْنِۚ وَمِنْهُمْ مَنْ يَمْش۪ي عَلٰٓى اَرْبَعٍۜ يَخْلُقُ اللّٰهُ مَا يَشَٓاءُۜ اِنَّ اللّٰهَ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَد۪يرٌ45
अल्लाह ने हर जीवधारी को पानी से पैदा किया, तो उनमें से कोई अपने पेट के बल चलता है और कोई उनमें दो टाँगों पर चलता है और कोई चार (टाँगों) पर चलता है। अल्लाह जो चाहता है, पैदा करता है। निस्संदेह अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है
لَقَدْ اَنْزَلْنَٓا اٰيَاتٍ مُبَيِّنَاتٍۜ وَاللّٰهُ يَهْد۪ي مَنْ يَشَٓاءُ اِلٰى صِرَاطٍ مُسْتَق۪يمٍ46
हमने सत्य को प्रकट कर देनेवाली आयतें उतार दी है। आगे अल्लाह जिसे चाहता है सीधे मार्ग की ओर लगा देता है
وَيَقُولُونَ اٰمَنَّا بِاللّٰهِ وَبِالرَّسُولِ وَاَطَعْنَا ثُمَّ يَتَوَلّٰى فَر۪يقٌ مِنْهُمْ مِنْ بَعْدِ ذٰلِكَۜ وَمَٓا اُو۬لٰٓئِكَ بِالْمُؤْمِن۪ينَ47
वे मुनाफ़िक लोग कहते है कि "हम अल्लाह और रसूल पर ईमान लाए और हमने आज्ञापालन स्वीकार किया।" फिर इसके पश्चात उनमें से एक गिरोह मुँह मोड़ जाता है। ऐसे लोग मोमिन नहीं है
وَاِذَا دُعُٓوا اِلَى اللّٰهِ وَرَسُولِه۪ لِيَحْكُمَ بَيْنَهُمْ اِذَا فَر۪يقٌ مِنْهُمْ مُعْرِضُونَ48
जब उन्हें अल्लाह और उसके रसूल की ओर बुलाया जाता है, ताकि वह उनके बीच फ़ैसला करें तो क्या देखते है कि उनमें से एक गिरोह कतरा जाता है;
وَاِنْ يَكُنْ لَهُمُ الْحَقُّ يَاْتُٓوا اِلَيْهِ مُذْعِن۪ينَۜ49
किन्तु यदि हक़ उन्हें मिलनेवाला हो तो उसकी ओर बड़े आज्ञाकारी बनकर चले आएँ
اَف۪ي قُلُوبِهِمْ مَرَضٌ اَمِ ارْتَابُٓوا اَمْ يَخَافُونَ اَنْ يَح۪يفَ اللّٰهُ عَلَيْهِمْ وَرَسُولُهُۜ بَلْ اُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ۟50
क्या उनके दिलों में रोग है या वे सन्देह में पड़े हुए है या उनको यह डर है कि अल्लाह औऱ उसका रसूल उनके साथ अन्याय करेंगे? नहीं, बल्कि बात यह है कि वही लोग अत्याचारी हैं
اِنَّمَا كَانَ قَوْلَ الْمُؤْمِن۪ينَ اِذَا دُعُٓوا اِلَى اللّٰهِ وَرَسُولِه۪ لِيَحْكُمَ بَيْنَهُمْ اَنْ يَقُولُوا سَمِعْنَا وَاَطَعْنَاۜ وَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ51
मोमिनों की बात तो बस यह होती है कि जब अल्लाह और उसके रसूल की ओर बुलाए जाएँ, ताकि वह उनके बीच फ़ैसला करे, तो वे कहें, "हमने सुना और आज्ञापालन किया।" और वही सफलता प्राप्त करनेवाले हैं
وَمَنْ يُطِعِ اللّٰهَ وَرَسُولَهُ وَيَخْشَ اللّٰهَ وَيَتَّقْهِ فَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْفَٓائِزُونَ52
और जो कोई अल्लाह और उसके रसूल का आज्ञा का पालन करे और अल्लाह से डरे और उसकी सीमाओं का ख़याल रखे, तो ऐसे ही लोग सफल है
وَاَقْسَمُوا بِاللّٰهِ جَهْدَ اَيْمَانِهِمْ لَئِنْ اَمَرْتَهُمْ لَيَخْرُجُنَّۜ قُلْ لَا تُقْسِمُواۚ طَاعَةٌ مَعْرُوفَةٌۜ اِنَّ اللّٰهَ خَب۪يرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ53
वे अल्लाह की कड़ी-कड़ी क़समें खाते है कि यदि तुम उन्हें हुक्म दो तो वे अवश्य निकल खड़े होंगे। कह दो, "क़समें न खाओ। सामान्य नियम के अनुसार आज्ञापालन ही वास्तकिव चीज़ है। तुम जो कुछ करते हो अल्लाह उसकी ख़बर रखता है।"
قُلْ اَط۪يعُوا اللّٰهَ وَاَط۪يعُوا الرَّسُولَۚ فَاِنْ تَوَلَّوْا فَاِنَّمَا عَلَيْهِ مَا حُمِّلَ وَعَلَيْكُمْ مَا حُمِّلْتُمْۜ وَاِنْ تُط۪يعُوهُ تَهْتَدُواۜ وَمَا عَلَى الرَّسُولِ اِلَّا الْبَلَاغُ الْمُب۪ينُ54
कहो, "अल्लाह का आज्ञापालन करो और उसके रसूल का कहा मानो। परन्तु यदि तुम मुँह मोड़ते हो तो उसपर तो बस वही ज़िम्मेदारी है जिसका बोझ उसपर डाला गया है, और तुम उसके ज़िम्मेदार हो जिसका बोझ तुमपर डाला गया है। और यदि तुम आज्ञा का पालन करोगे तो मार्ग पा लोगे। और रसूल पर तो बस साफ़-साफ़ (संदेश) पहुँचा देने ही की ज़िम्मेदारी है
وَعَدَ اللّٰهُ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا مِنْكُمْ وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَيَسْتَخْلِفَنَّهُمْ فِي الْاَرْضِ كَمَا اسْتَخْلَفَ الَّذ۪ينَ مِنْ قَبْلِهِمْۖ وَلَيُمَكِّنَنَّ لَهُمْ د۪ينَهُمُ الَّذِي ارْتَضٰى لَهُمْ وَلَيُبَدِّلَنَّهُمْ مِنْ بَعْدِ خَوْفِهِمْ اَمْنًاۜ يَعْبُدُونَن۪ي لَا يُشْرِكُونَ ب۪ي شَيْـًٔاۜ وَمَنْ كَفَرَ بَعْدَ ذٰلِكَ فَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْفَاسِقُونَ55
अल्लाह ने उन लोगों से जो तुममें से ईमान लाए और उन्होने अच्छे कर्म किए, वादा किया है कि वह उन्हें धरती में अवश्य सत्ताधिकार प्रदान करेगा, जैसे उसने उनसे पहले के लोगों को सत्ताधिकार प्रदान किया था। औऱ उनके लिए अवश्य उनके उस धर्म को जमाव प्रदान करेगा जिसे उसने उनके लिए पसन्द किया है। और निश्चय ही उनके वर्तमान भय के पश्चात उसे उनके लिए शान्ति और निश्चिन्तता में बदल देगा। वे मेरी बन्दगी करते है, मेरे साथ किसी चीज़ को साझी नहीं बनाते। और जो कोई इसके पश्चात इनकार करे, तो ऐसे ही लोग अवज्ञाकारी है
وَاَق۪يمُوا الصَّلٰوةَ وَاٰتُوا الزَّكٰوةَ وَاَط۪يعُوا الرَّسُولَ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ56
नमाज़ का आयोजन करो और ज़कात दो और रसूल की आज्ञा का पालन करो, ताकि तुमपर दया की जाए
لَا تَحْسَبَنَّ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا مُعْجِز۪ينَ فِي الْاَرْضِۚ وَمَاْوٰيهُمُ النَّارُۜ وَلَبِئْسَ الْمَص۪يرُ۟57
यह कदापि न समझो कि इनकार की नीति अपनानेवाले धरती में क़ाबू से बाहर निकल जानेवाले है। उनका ठिकाना आग है, और वह बहुत ही बुरा ठिकाना है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لِيَسْتَاْذِنْكُمُ الَّذ۪ينَ مَلَكَتْ اَيْمَانُكُمْ وَالَّذ۪ينَ لَمْ يَبْلُغُوا الْحُلُمَ مِنْكُمْ ثَلٰثَ مَرَّاتٍۜ مِنْ قَبْلِ صَلٰوةِ الْفَجْرِ وَح۪ينَ تَضَعُونَ ثِيَابَكُمْ مِنَ الظَّه۪يرَةِ وَمِنْ بَعْدِ صَلٰوةِ الْعِشَٓاءِ۠ ثَلٰثُ عَوْرَاتٍ لَكُمْۜ لَيْسَ عَلَيْكُمْ وَلَا عَلَيْهِمْ جُنَاحٌ بَعْدَهُنَّۜ طَوَّافُونَ عَلَيْكُمْ بَعْضُكُمْ عَلٰى بَعْضٍۜ كَذٰلِكَ يُبَيِّنُ اللّٰهُ لَكُمُ الْاٰيَاتِۜ وَاللّٰهُ عَل۪يمٌ حَك۪يمٌ58
ऐ ईमान लानेवालो! जो तुम्हारी मिल्कियत में हो और तुममें जो अभी युवावस्था को नहीं पहुँचे है, उनको चाहिए कि तीन समयों में तुमसे अनुमति लेकर तुम्हारे पास आएँ: प्रभात काल की नमाज़ से पहले और जब दोपहर को तुम (आराम के लिए) अपने कपड़े उतार रखते हो और रात्रि की नमाज़ के पश्चात - ये तीन समय तुम्हारे लिए परदे के हैं। इनके पश्चात न तो तुमपर कोई गुनाह है और न उनपर। वे तुम्हारे पास अधिक चक्कर लगाते है। तुम्हारे ही कुछ अंश परस्पर कुछ अंश के पास आकर मिलते है। इस प्रकार अल्लाह तुम्हारे लिए अपनी आयतों को स्पष्टप करता है। अल्लाह भली-भाँति जाननेवाला है, तत्वदर्शी है
وَاِذَا بَلَغَ الْاَطْفَالُ مِنْكُمُ الْحُلُمَ فَلْيَسْتَاْذِنُوا كَمَا اسْتَاْذَنَ الَّذ۪ينَ مِنْ قَبْلِهِمْۜ كَذٰلِكَ يُبَيِّنُ اللّٰهُ لَكُمْ اٰيَاتِه۪ۜ وَاللّٰهُ عَل۪يمٌ حَك۪يمٌ59
और जब तुममें से बच्चे युवावस्था को पहुँच जाएँ तो उन्हें चाहिए कि अनुमति ले लिया करें जैसे उनसे पहले लोग अनुमति लेते रहे है। इस प्रकार अल्लाह तुम्हारे लिए अपनी आयतों को स्पष्ट करता है। अल्लाह भली-भाँति जाननेवाला, तत्वदर्शी है
وَالْقَوَاعِدُ مِنَ النِّسَٓاءِ الّٰت۪ي لَا يَرْجُونَ نِكَاحًا فَلَيْسَ عَلَيْهِنَّ جُنَاحٌ اَنْ يَضَعْنَ ثِيَابَهُنَّ غَيْرَ مُتَبَرِّجَاتٍ بِز۪ينَةٍۜ وَاَنْ يَسْتَعْفِفْنَ خَيْرٌ لَهُنَّۜ وَاللّٰهُ سَم۪يعٌ عَل۪يمٌ60
जो स्त्रियाँ युवावस्था से गुज़रकर बैठ चुकी हों, जिन्हें विवाह की आशा न रह गई हो, उनपर कोई दोष नहीं कि वे अपने कपड़े (चादरें) उतारकर रख दें जबकि वे शृंगार का प्रदर्शन करनेवाली न हों। फिर भी वे इससे बचें तो उनके लिए अधिक अच्छा है। अल्लाह भली-भाँति सुनता, जानता है
لَيْسَ عَلَى الْاَعْمٰى حَرَجٌ وَلَا عَلَى الْاَعْرَجِ حَرَجٌ وَلَا عَلَى الْمَر۪يضِ حَرَجٌ وَلَا عَلٰٓى اَنْفُسِكُمْ اَنْ تَاْكُلُوا مِنْ بُيُوتِكُمْ اَوْ بُيُوتِ اٰبَٓائِكُمْ اَوْ بُيُوتِ اُمَّهَاتِكُمْ اَوْ بُيُوتِ اِخْوَانِكُمْ اَوْ بُيُوتِ اَخَوَاتِكُمْ اَوْ بُيُوتِ اَعْمَامِكُمْ اَوْ بُيُوتِ عَمَّاتِكُمْ اَوْ بُيُوتِ اَخْوَالِكُمْ اَوْ بُيُوتِ خَالَاتِكُمْ اَوْ مَا مَلَكْتُمْ مَفَاتِحَهُٓ اَوْ صَد۪يقِكُمْۜ لَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ اَنْ تَاْكُلُوا جَم۪يعًا اَوْ اَشْتَاتًاۜ فَاِذَا دَخَلْتُمْ بُيُوتًا فَسَلِّمُوا عَلٰٓى اَنْفُسِكُمْ تَحِيَّةً مِنْ عِنْدِ اللّٰهِ مُبَارَكَةً طَيِّبَةًۜ كَذٰلِكَ يُبَيِّنُ اللّٰهُ لَكُمُ الْاٰيَاتِ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ۟61
न अंधे के लिए कोई हरज है, न लँगड़े के लिए कोई हरज है और न रोगी के लिए कोई हरज है और न तुम्हारे अपने लिए इस बात में कि तुम अपने घरों में खाओ या अपने बापों के घरों से या अपनी माँओ के घरों से या अपने भाइयों के घरों से या अपनी बहनों के घरों से या अपने चाचाओं के घरों से या अपनी फूफियों (बुआओं) के घरों से या अपनी ख़ालाओं के घरों से या जिसकी कुंजियों के मालिक हुए हो या अपने मित्र के यहाँ। इसमें तुम्हारे लिए कोई हरज नहीं कि तुम मिलकर खाओ या अलग-अलग। हाँ, अलबत्ता जब घरों में जाया करो तो अपने लोगों को सलाम किया करो, अभिवादन अल्लाह की ओर से नियत किया हुए, बरकतवाला और अत्याधिक पाक। इस प्रकार अल्लाह तुम्हारे लिए अपनी आयतों को स्पष्ट करता है, ताकि तुम बुद्धि से काम लो
اِنَّمَا الْمُؤْمِنُونَ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا بِاللّٰهِ وَرَسُولِه۪ وَاِذَا كَانُوا مَعَهُ عَلٰٓى اَمْرٍ جَامِعٍ لَمْ يَذْهَبُوا حَتّٰى يَسْتَاْذِنُوهُۜ اِنَّ الَّذ۪ينَ يَسْتَاْذِنُونَكَ اُو۬لٰٓئِكَ الَّذ۪ينَ يُؤْمِنُونَ بِاللّٰهِ وَرَسُولِه۪ۚ فَاِذَا اسْتَاْذَنُوكَ لِبَعْضِ شَاْنِهِمْ فَاْذَنْ لِمَنْ شِئْتَ مِنْهُمْ وَاسْتَغْفِرْ لَهُمُ اللّٰهَۜ اِنَّ اللّٰهَ غَفُورٌ رَح۪يمٌ62
मोमिन तो बस वही है जो अल्लाह और उसके रसूल पर पक्का ईमान रखते है। और जब किसी सामूहिक मामले के लिए उसके साथ हो तो चले न जाएँ जब तक कि उससे अनुमति न प्राप्त कर लें। (ऐ नबी!) जो लोग (आवश्यकता पड़ने पर) तुमसे अनुमति ले लेते है, वही लोग अल्लाह और रसूल पर ईमान रखते है, तो जब वे किसी काम के लिए अनुमति चाहें तो उनमें से जिसको चाहो अनुमति दे दिया करो, और उन लोगों के लिए अल्लाह से क्षमा की प्रार्थना किया करो। निस्संदेह अल्लाह बहुत क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
لَا تَجْعَلُوا دُعَٓاءَ الرَّسُولِ بَيْنَكُمْ كَدُعَٓاءِ بَعْضِكُمْ بَعْضًاۜ قَدْ يَعْلَمُ اللّٰهُ الَّذ۪ينَ يَتَسَلَّلُونَ مِنْكُمْ لِوَاذًاۚ فَلْيَحْذَرِ الَّذ۪ينَ يُخَالِفُونَ عَنْ اَمْرِه۪ٓ اَنْ تُص۪يبَهُمْ فِتْنَةٌ اَوْ يُص۪يبَهُمْ عَذَابٌ اَل۪يمٌ63
अपने बीच रसूल के बुलाने को तुम आपस में एक-दूसरे जैसा बुलाना न समझना। अल्लाह उन लोगों को भली-भाँति जानता है जो तुममें से ऐसे है कि (एक-दूसरे की) आड़ लेकर चुपके से खिसक जाते है। अतः उनको, जो उसके आदेश की अवहेलना करते है, डरना चाहिए कि कही ऐसा न हो कि उनपर कोई आज़माइश आ पड़े या उनपर कोई दुखद यातना आ जाए
اَلَٓا اِنَّ لِلّٰهِ مَا فِي السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ قَدْ يَعْلَمُ مَٓا اَنْتُمْ عَلَيْهِۜ وَيَوْمَ يُرْجَعُونَ اِلَيْهِ فَيُنَبِّئُهُمْ بِمَا عَمِلُواۜ وَاللّٰهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَل۪يمٌ64
सुन लो! आकाशों और धरती में जो कुछ भी है, अल्लाह का है। वह जानता है तुम जिस (नीति) पर हो। और जिस दिन वे उसकी ओर पलटेंगे, तो जो कुछ उन्होंने किया होगा, वह उन्हें बता देगा। अल्लाह तो हर चीज़ को जानता है
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
تَبَارَكَ الَّذ۪ي نَزَّلَ الْفُرْقَانَ عَلٰى عَبْدِه۪ لِيَكُونَ لِلْعَالَم۪ينَ نَذ۪يرًاۙ1
बड़ी बरकतवाला है वह जिसने यह फ़ुरक़ान अपने बन्दे पर अवतरित किया, ताकि वह सारे संसार के लिए सावधान करनेवाला हो
اَلَّذ۪ي لَهُ مُلْكُ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِ وَلَمْ يَتَّخِذْ وَلَدًا وَلَمْ يَكُنْ لَهُ شَر۪يكٌ فِي الْمُلْكِ وَخَلَقَ كُلَّ شَيْءٍ فَقَدَّرَهُ تَقْد۪يرًا2
वह जिसका राज्य है आकाशों और धरती पर, और उसने न तो किसी को अपना बेटा बनाया और न राज्य में उसका कोई साझी है। उसने हर चीज़ को पैदा किया; फिर उसे ठीक अन्दाजें पर रखा
وَاتَّخَذُوا مِنْ دُونِه۪ٓ اٰلِهَةً لَا يَخْلُقُونَ شَيْـًٔا وَهُمْ يُخْلَقُونَ وَلَا يَمْلِكُونَ لِاَنْفُسِهِمْ ضَرًّا وَلَا نَفْعًا وَلَا يَمْلِكُونَ مَوْتًا وَلَا حَيٰوةً وَلَا نُشُورًا3
फिर भी उन्होंने उससे हटकर ऐसे इष्ट -पूज्य बना लिए जो किसी चीज़ को पैदा नहीं करते, बल्कि वे स्वयं पैदा किए जाते है। उन्हें न तो अपनी हानि का अधिकार प्राप्त है और न लाभ का। और न उन्हें मृत्यु का अधिकार प्राप्त है और न जीवन का और न दोबारा जीवित होकर उठने का
وَقَالَ الَّذ۪ينَ كَفَرُٓوا اِنْ هٰذَٓا اِلَّٓا اِفْكٌۨ افْتَرٰيهُ وَاَعَانَهُ عَلَيْهِ قَوْمٌ اٰخَرُونَۚۛ فَقَدْ جَٓاؤُ۫ ظُلْمًا وَزُورًاۚۛ4
जिन लोगों ने इनकार किया उनका कहना है, "यह तो बस मनघड़ंत है जो उसने स्वयं ही घड़ लिया है। और कुछ दूसरे लोगों ने इस काम में उसकी सहायता की है।" वे तो ज़ुल्म और झूठ ही के ध्येय से आए
وَقَالُٓوا اَسَاط۪يرُ الْاَوَّل۪ينَ اكْتَتَبَهَا فَهِيَ تُمْلٰى عَلَيْهِ بُكْرَةً وَاَص۪يلًا5
कहते है, "ये अगलों की कहानियाँ है, जिनको उसने लिख लिया है तो वही उसके पास प्रभात काल और सन्ध्या समय लिखाई जाती है।"
قُلْ اَنْزَلَهُ الَّذ۪ي يَعْلَمُ السِّرَّ فِي السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ اِنَّهُ كَانَ غَفُورًا رَح۪يمًا6
कहो, "उसे अवतरित किया है उसने, जो आकाशों और धरती के रहस्य जानता है। निश्चय ही वह बहुत क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है।"
وَقَالُوا مَا لِهٰذَا الرَّسُولِ يَاْكُلُ الطَّعَامَ وَيَمْش۪ي فِي الْاَسْوَاقِۜ لَوْلَٓا اُنْزِلَ اِلَيْهِ مَلَكٌ فَيَكُونَ مَعَهُ نَذ۪يرًاۙ7
उनका यह भी कहना है, "इस रसूल को क्या हुआ कि यह खाना खाता है और बाज़ारों में चलता-फिरता है? क्यों न इसकी ओर कोई फ़रिश्ता उतरा कि वह इसके साथ रहकर सावधान करता?
اَوْ يُلْقٰٓى اِلَيْهِ كَنْزٌ اَوْ تَكُونُ لَهُ جَنَّةٌ يَاْكُلُ مِنْهَاۜ وَقَالَ الظَّالِمُونَ اِنْ تَتَّبِعُونَ اِلَّا رَجُلًا مَسْحُورًا8
या इसकी ओर कोई ख़ज़ाना ही डाल दिया जाता या इसके पास कोई बाग़ होता, जिससे यह खाता।" और इन ज़ालिमों का कहना है, "तुम लोग तो बस एक ऐसे व्यक्ति के पीछे चल रहे हो जो जादू का मारा हुआ है!"
اُنْظُرْ كَيْفَ ضَرَبُوا لَكَ الْاَمْثَالَ فَضَلُّوا فَلَا يَسْتَط۪يعُونَ سَب۪يلًا۟9
देखों, उन्होंने तुमपर कैसी-कैसी फब्तियाँ कसीं। तो वे बहक गए है। अब उनमें इसकी सामर्थ्य नहीं कि कोई मार्ग पा सकें!
تَبَارَكَ الَّذ۪ٓي اِنْ شَٓاءَ جَعَلَ لَكَ خَيْرًا مِنْ ذٰلِكَ جَنَّاتٍ تَجْر۪ي مِنْ تَحْتِهَا الْاَنْهَارُۙ وَيَجْعَلْ لَكَ قُصُورًا10
बरकतवाला है वह जो यदि चाहे तो तुम्हारे लिए इससे भी उत्तम प्रदान करे, बहत-से बाग़ जिनके नीचे नहरें बह रही हों, और तुम्हारे लिए बहुत-से महल तैया कर दे
بَلْ كَذَّبُوا بِالسَّاعَةِ وَاَعْتَدْنَا لِمَنْ كَذَّبَ بِالسَّاعَةِ سَع۪يرًاۚ11
नहीं, बल्कि बात यह है कि वे लोग क़ियामत की घड़ी को झुठला चुके है। और जो उस घड़ी को झुठला दे, उसके लिए दहकती आग तैयार कर रखी है
اِذَا رَاَتْهُمْ مِنْ مَكَانٍ بَع۪يدٍ سَمِعُوا لَهَا تَغَيُّظًا وَزَف۪يرًا12
जब वह उनको दूर से देखेगी तो वे उसके बिफरने और साँस खींचने की आवाज़ें सुनेंगे
وَاِذَٓا اُلْقُوا مِنْهَا مَكَانًا ضَيِّقًا مُقَرَّن۪ينَ دَعَوْا هُنَالِكَ ثُبُورًاۜ13
और जब वे उसकी किसी तंग जगह जकड़े हुए डाले जाएँगे, तो वहाँ विनाश को पुकारने लगेंगे
لَا تَدْعُوا الْيَوْمَ ثُبُورًا وَاحِدًا وَادْعُوا ثُبُورًا كَث۪يرًا14
(कहा जाएगा,) "आज एक विनाश को मत पुकारो, बल्कि बहुत-से विनाशों को पुकारो!"
قُلْ اَذٰلِكَ خَيْرٌ اَمْ جَنَّةُ الْخُلْدِ الَّت۪ي وُعِدَ الْمُتَّقُونَۜ كَانَتْ لَهُمْ جَزَٓاءً وَمَص۪يرًا15
कहो, "यह अच्छा है या वह शाश्वत जन्नत, जिसका वादा डर रखनेवालों से किया गया है? यह उनका बदला और अन्तिम मंज़िल होगी।"
لَهُمْ ف۪يهَا مَا يَشَٓاؤُ۫نَ خَالِد۪ينَۜ كَانَ عَلٰى رَبِّكَ وَعْدًا مَسْؤُ۫لًا16
उनके लिए उसमें वह सबकुछ होगा, जो वे चाहेंगे। उसमें वे सदैव रहेंगे। यह तुम्हारे रब के ज़िम्मे एक ऐसा वादा है जो प्रार्थनीय है
وَيَوْمَ يَحْشُرُهُمْ وَمَا يَعْبُدُونَ مِنْ دُونِ اللّٰهِ فَيَقُولُ ءَاَنْتُمْ اَضْلَلْتُمْ عِبَاد۪ي هٰٓؤُ۬لَٓاءِ اَمْ هُمْ ضَلُّوا السَّب۪يلَۜ17
और जिस दिन उन्हें इकट्ठा किया जाएगा और उनको भी जिन्हें वे अल्लाह को छोड़कर पूजते है, फिर वह कहेगा, "क्या मेरे बन्दों को तुमने पथभ्रष्ट किया था या वे स्वयं मार्ग छोड़ बैठे थे?"
قَالُوا سُبْحَانَكَ مَا كَانَ يَنْبَغ۪ي لَنَٓا اَنْ نَتَّخِذَ مِنْ دُونِكَ مِنْ اَوْلِيَٓاءَ وَلٰكِنْ مَتَّعْتَهُمْ وَاٰبَٓاءَهُمْ حَتّٰى نَسُوا الذِّكْرَۚ وَكَانُوا قَوْمًا بُورًا18
वे कहेंगे, "महान और उच्च है तू! यह हमसे नहीं हो सकता था कि तुझे छोड़कर दूसरे संरक्षक बनाएँ। किन्तु हुआ यह कि तूने उन्हें औऱ उनके बाप-दादा को अत्यधिक सुख-सामग्री दी, यहाँ तक कि वे अनुस्मृति को भुला बैठे और विनष्ट होनेवाले लोग होकर रहे।"
فَقَدْ كَذَّبُوكُمْ بِمَا تَقُولُونَۙ فَمَا تَسْتَط۪يعُونَ صَرْفًا وَلَا نَصْرًاۚ وَمَنْ يَظْلِمْ مِنْكُمْ نُذِقْهُ عَذَابًا كَب۪يرًا19
अतः इस प्रकार वे तुम्हें उस बात में, जो तुम कहते हो झूठा ठहराए हुए है। अब न तो तुम यातना को फेर सकते हो और न कोई सहायता ही पा सकते हो। जो कोई तुममें से ज़ुल्म करे उसे हम बड़ी यातना का मज़ा चखाएँगे
وَمَٓا اَرْسَلْنَا قَبْلَكَ مِنَ الْمُرْسَل۪ينَ اِلَّٓا اِنَّهُمْ لَيَاْكُلُونَ الطَّعَامَ وَيَمْشُونَ فِي الْاَسْوَاقِۜ وَجَعَلْنَا بَعْضَكُمْ لِبَعْضٍ فِتْنَةًۜ اَتَصْبِرُونَۚ وَكَانَ رَبُّكَ بَص۪يرًا۟20
और तुमसे पहले हमने जितने रसूल भी भेजे हैं, वे सब खाना खाते और बाज़ारों में चलते-फिरते थे। हमने तो तुम्हें परस्पर एक को दूसरे के लिए आज़माइश बना दिया है, "क्या तुम धैर्य दिखाते हो?" तुम्हारा रब तो सब कुछ देखता है