21. जुज़ - कुरान पढ़ें
29 · अल-अंकबूत30 · अर-रूम31 · लुक़मान32 · अस-सजदा33 · अल-अहज़ाब
وَلَا تُجَادِلُٓوا اَهْلَ الْكِتَابِ اِلَّا بِالَّت۪ي هِيَ اَحْسَنُۗ اِلَّا الَّذ۪ينَ ظَلَمُوا مِنْهُمْ وَقُولُٓوا اٰمَنَّا بِالَّذ۪ٓي اُنْزِلَ اِلَيْنَا وَاُنْزِلَ اِلَيْكُمْ وَاِلٰهُنَا وَاِلٰهُكُمْ وَاحِدٌ وَنَحْنُ لَهُ مُسْلِمُونَ46
और किताबवालों से बस उत्तम रीति ही से वाद-विवाद करो - रहे वे लोग जो उनमें ज़ालिम हैं, उनकी बात दूसरी है - और कहो - "हम ईमान लाए उस चीज़ पर जो अवतरित हुई और तुम्हारी ओर भी अवतरित हुई। और हमारा पूज्य और तुम्हारा पूज्य अकेला ही है और हम उसी के आज्ञाकारी है।"
وَكَذٰلِكَ اَنْزَلْنَٓا اِلَيْكَ الْكِتَابَۜ فَالَّذ۪ينَ اٰتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ يُؤْمِنُونَ بِه۪ۚ وَمِنْ هٰٓؤُ۬لَٓاءِ مَنْ يُؤْمِنُ بِه۪ۜ وَمَا يَجْحَدُ بِاٰيَاتِنَٓا اِلَّا الْكَافِرُونَ47
इसी प्रकार हमने तुम्हारी ओर किताब अवतरित की है, तो जिन्हें हमने किताब प्रदान की है वे उसपर ईमान लाएँगे। उनमें से कुछ उसपर ईमान ला भी रहे है। हमारी आयतों का इनकार तो केवल न माननेवाले ही करते है
وَمَا كُنْتَ تَتْلُوا مِنْ قَبْلِه۪ مِنْ كِتَابٍ وَلَا تَخُطُّهُ بِيَم۪ينِكَ اِذًا لَارْتَابَ الْمُبْطِلُونَ48
इससे पहले तुम न कोई किताब पढ़ते थे और न उसे अपने हाथ से लिखते ही थे। ऐसा होता तो ये मिथ्यावादी सन्देह में पड़ सकते थे
بَلْ هُوَ اٰيَاتٌ بَيِّنَاتٌ ف۪ي صُدُورِ الَّذ۪ينَ اُو۫تُوا الْعِلْمَۜ وَمَا يَجْحَدُ بِاٰيَاتِنَٓا اِلَّا الظَّالِمُونَ49
नहीं, बल्कि वे तो उन लोगों के सीनों में विद्यमान खुली निशानियाँ है, जिन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ है। हमारी आयतों का इनकार तो केवल ज़ालिम ही करते है
وَقَالُوا لَوْلَٓا اُنْزِلَ عَلَيْهِ اٰيَاتٌ مِنْ رَبِّه۪ۜ قُلْ اِنَّمَا الْاٰيَاتُ عِنْدَ اللّٰهِۜ وَاِنَّمَٓا اَنَا۬ نَذ۪يرٌ مُب۪ينٌ50
उनका कहना है कि "उसपर उसके रब की ओर से निशानियाँ क्यों नहीं अवतरित हुई?" कह दो, "निशानियाँ तो अल्लाह ही के पास है। मैं तो केवल स्पष्ट रूप से सचेत करनेवाला हूँ।"
اَوَلَمْ يَكْفِهِمْ اَنَّٓا اَنْزَلْنَا عَلَيْكَ الْكِتَابَ يُتْلٰى عَلَيْهِمْۜ اِنَّ ف۪ي ذٰلِكَ لَرَحْمَةً وَذِكْرٰى لِقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ۟51
क्या उनके लिए यह पर्याप्त नहीं कि हमने तुमपर किताब अवतरित की, जो उन्हें पढ़कर सुनाई जाती है? निस्संदेह उसमें उन लोगों के लिए दयालुता है और अनुस्मृति है जो ईमान लाएँ
قُلْ كَفٰى بِاللّٰهِ بَيْن۪ي وَبَيْنَكُمْ شَه۪يدًاۚ يَعْلَمُ مَا فِي السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ وَالَّذ۪ينَ اٰمَنُوا بِالْبَاطِلِ وَكَفَرُوا بِاللّٰهِۙ اُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْخَاسِرُونَ52
कह दो, "मेरे और तुम्हारे बीच अल्लाह गवाह के रूप में काफ़ी है।" वह जानता है जो कुछ आकाशों और धरती में है। जो लोग असत्य पर ईमान लाए और अल्लाह का इनकार किया वही है जो घाटे में है
وَيَسْتَعْجِلُونَكَ بِالْعَذَابِۜ وَلَوْلَٓا اَجَلٌ مُسَمًّى لَجَٓاءَهُمُ الْعَذَابُۜ وَلَيَاْتِيَنَّهُمْ بَغْتَةً وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ53
वे तुमसे यातना के लिए जल्दी मचा रहे है। यदि इसका एक नियत समय न होता तो उनपर अवश्य ही यातना आ जाती। वह तो अचानक उनपर आकर रहेगी कि उन्हें ख़बर भी न होगी
يَسْتَعْجِلُونَكَ بِالْعَذَابِۜ وَاِنَّ جَهَنَّمَ لَمُح۪يطَةٌ بِالْكَافِر۪ينَۙ54
वे तुमसे यातना के लिए जल्दी मचा रहे है, हालाँकि जहन्नम इनकार करनेवालों को अपने घेरे में लिए हुए है
يَوْمَ يَغْشٰيهُمُ الْعَذَابُ مِنْ فَوْقِهِمْ وَمِنْ تَحْتِ اَرْجُلِهِمْ وَيَقُولُ ذُوقُوا مَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ55
जिस दिन यातना उन्हें उनके ऊपर से ढाँक लेगी और उनके पाँव के नीचे से भी, और वह कहेगा, "चखो उसका मज़ा जो कुछ तुम करते रहे हो!"
يَا عِبَادِيَ الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اِنَّ اَرْض۪ي وَاسِعَةٌ فَاِيَّايَ فَاعْبُدُونِ56
ऐ मेरे बन्दों, जो ईमान लाए हो! निस्संदेह मेरी धरती विशाल है। अतः तुम मेरी ही बन्दगी करो
كُلُّ نَفْسٍ ذَٓائِقَةُ الْمَوْتِ ثُمَّ اِلَيْنَا تُرْجَعُونَ57
प्रत्येक जीव को मृत्यु का स्वाद चखना है। फिर तुम हमारी ओर वापस लौटोगे
وَالَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَنُبَوِّئَنَّهُمْ مِنَ الْجَنَّةِ غُرَفًا تَجْر۪ي مِنْ تَحْتِهَا الْاَنْهَارُ خَالِد۪ينَ ف۪يهَاۜ نِعْمَ اَجْرُ الْعَامِل۪ينَۗ58
जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए उन्हें हम जन्नत की ऊपरी मंज़िल के कक्षों में जगह देंगे, जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी। वे उसमें सदैव रहेंगे। क्या ही अच्छा प्रतिदान है कर्म करनेवालों का!
اَلَّذ۪ينَ صَبَرُوا وَعَلٰى رَبِّهِمْ يَتَوَكَّلُونَ59
जिन्होंने धैर्य से काम लिया और जो अपने रब पर भरोसा रखते है
وَكَاَيِّنْ مِنْ دَٓابَّةٍ لَا تَحْمِلُ رِزْقَهَاۗ اَللّٰهُ يَرْزُقُهَا وَاِيَّاكُمْۘ وَهُوَ السَّم۪يعُ الْعَل۪يمُ60
कितने ही चलनेवाले जीवधारी है, जो अपनी रोज़ी उठाए नहीं फिरते। अल्लाह ही उन्हें रोज़ी देता है और तुम्हें भी! वह सब कुछ सुनता, जानता है
وَلَئِنْ سَاَلْتَهُمْ مَنْ خَلَقَ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضَ وَسَخَّرَ الشَّمْسَ وَالْقَمَرَ لَيَقُولُنَّ اللّٰهُۚ فَاَنّٰى يُؤْفَكُونَ61
और यदि तुम उनसे पूछो कि "किसने आकाशों और धरती को पैदा किया और सूर्य और चन्द्रमा को काम में लगाया?" तो वे बोल पड़ेगे, "अल्लाह ने!" फिर वे किधर उलटे फिरे जाते है?
اَللّٰهُ يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَنْ يَشَٓاءُ مِنْ عِبَادِه۪ وَيَقْدِرُ لَهُۜ اِنَّ اللّٰهَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَل۪يمٌ62
अल्लाह अपने बन्दों में से जिसके लिए चाहता है आजीविका विस्तीर्ण कर देता है और जिसके लिए चाहता है नपी-तुली कर देता है। निस्संदेह अल्लाह हरेक चीज़ को भली-भाँति जानता है
وَلَئِنْ سَاَلْتَهُمْ مَنْ نَزَّلَ مِنَ السَّمَٓاءِ مَٓاءً فَاَحْيَا بِهِ الْاَرْضَ مِنْ بَعْدِ مَوْتِهَا لَيَقُولُنَّ اللّٰهُۜ قُلِ الْحَمْدُ لِلّٰهِۜ بَلْ اَكْثَرُهُمْ لَا يَعْقِلُونَ۟63
और यदि तुम उनसे पूछो कि "किसने आकाश से पानी बरसाया; फिर उसके द्वारा धरती को उसके मुर्दा हो जाने के पश्चात जीवित किया?" तो वे बोल पड़ेंगे, "अल्लाह ने!" कहो, "सारी प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है।" किन्तु उनमें से अधिकतर बुद्धि से काम नहीं लेते
وَمَا هٰذِهِ الْحَيٰوةُ الدُّنْيَٓا اِلَّا لَهْوٌ وَلَعِبٌۜ وَاِنَّ الدَّارَ الْاٰخِرَةَ لَهِيَ الْحَيَوَانُۢ لَوْ كَانُوا يَعْلَمُونَ64
और यह सांसारिक जीवन तो केवल दिल का बहलावा और खेल है। निस्संदेह पश्चात्वर्ती घर (का जीवन) ही वास्तविक जीवन है। क्या ही अच्छा होता कि वे जानते!
فَاِذَا رَكِبُوا فِي الْفُلْكِ دَعَوُا اللّٰهَ مُخْلِص۪ينَ لَهُ الدّ۪ينَۚ فَلَمَّا نَجّٰيهُمْ اِلَى الْبَرِّ اِذَا هُمْ يُشْرِكُونَۙ65
जब वे नौका में सवार होते है तो वे अल्लाह को उसके दीन (आज्ञापालन) के लिए निष्ठा वान होकर पुकारते है। किन्तु जब वह उन्हें बचाकर शु्ष्क भूमि तक ले आता है तो क्या देखते है कि वे लगे (अल्लाह का साथ) साझी ठहराने
لِيَكْفُرُوا بِمَٓا اٰتَيْنَاهُمْۙ وَلِيَتَمَتَّعُوا۠ فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ66
ताकि जो कुछ हमने उन्हें दिया है उसके प्रति वे इस तरह कृतघ्नता दिखाएँ, और ताकि इस तरह से मज़े उड़ा ले। अच्छा तो वे शीघ्र ही जान लेंगे
اَوَلَمْ يَرَوْا اَنَّا جَعَلْنَا حَرَمًا اٰمِنًا وَيُتَخَطَّفُ النَّاسُ مِنْ حَوْلِهِمْۜ اَفَبِالْبَاطِلِ يُؤْمِنُونَ وَبِنِعْمَةِ اللّٰهِ يَكْفُرُونَ67
क्या उन्होंने देखा नही कि हमने एक शान्तिमय हरम बनाया, हालाँकि उनके आसपास से लोग उचक लिए जाते है, तो क्या फिर भी वे असत्य पर ईमान रखते है और अल्लाह की अनुकम्पा के प्रति कृतघ्नता दिखलाते है?
وَمَنْ اَظْلَمُ مِمَّنِ افْتَرٰى عَلَى اللّٰهِ كَذِبًا اَوْ كَذَّبَ بِالْحَقِّ لَمَّا جَٓاءَهُۜ اَلَيْسَ ف۪ي جَهَنَّمَ مَثْوًى لِلْكَافِر۪ينَ68
उस व्यक्ति से बढ़कर ज़ालिम कौन होगा जो अल्लाह पर थोपकर झूठ घड़े या सत्य को झुठलाए, जबकि वह उसके पास आ चुका हो? क्या इनकार करनेवालों का ठौर-ठिकाना जहन्नम नें नहीं होगा?
وَالَّذ۪ينَ جَاهَدُوا ف۪ينَا لَنَهْدِيَنَّهُمْ سُبُلَنَاۜ وَاِنَّ اللّٰهَ لَمَعَ الْمُحْسِن۪ينَ69
रहे वे लोग जिन्होंने हमारे मार्ग में मिलकर प्रयास किया, हम उन्हें अवश्य अपने मार्ग दिखाएँगे। निस्संदेह अल्लाह सुकर्मियों के साथ है
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
الٓمٓ۠1
अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰
غُلِبَتِ الرُّومُۙ2
रूमी निकटवर्ती क्षेत्र में पराभूत हो गए हैं।
ف۪ٓي اَدْنَى الْاَرْضِ وَهُمْ مِنْ بَعْدِ غَلَبِهِمْ سَيَغْلِبُونَۙ3
और वे अपने पराभव के पश्चात शीघ्र ही कुछ वर्षों में प्रभावी हो जाएँगे।
ف۪ي بِضْعِ سِن۪ينَۜ لِلّٰهِ الْاَمْرُ مِنْ قَبْلُ وَمِنْ بَعْدُۜ وَيَوْمَئِذٍ يَفْرَحُ الْمُؤْمِنُونَۙ4
हुक्म तो अल्लाह ही का है पहले भी और उसके बाद भी। और उस दिन ईमानवाले अल्लाह की सहायता से प्रसन्न होंगे।
بِنَصْرِ اللّٰهِۜ يَنْصُرُ مَنْ يَشَٓاءُۜ وَهُوَ الْعَز۪يزُ الرَّح۪يمُ5
वह जिसकी चाहता है, सहायता करता है। वह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, दयावान है
وَعْدَ اللّٰهِۜ لَا يُخْلِفُ اللّٰهُ وَعْدَهُ وَلٰكِنَّ اَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ6
यह अल्लाह का वादा है! अल्लाह अपने वादे का उल्लंघन नहीं करता। किन्तु अधिकतर लोग जानते नहीं
يَعْلَمُونَ ظَاهِرًا مِنَ الْحَيٰوةِ الدُّنْيَاۚ وَهُمْ عَنِ الْاٰخِرَةِ هُمْ غَافِلُونَ7
वे सांसारिक जीवन के केवल वाह्य रूप को जानते है। किन्तु आख़िरत की ओर से वे बिलकुल असावधान है
اَوَلَمْ يَتَفَكَّرُوا ف۪ٓي اَنْفُسِهِمْ۠ مَا خَلَقَ اللّٰهُ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَٓا اِلَّا بِالْحَقِّ وَاَجَلٍ مُسَمًّىۜ وَاِنَّ كَث۪يرًا مِنَ النَّاسِ بِلِقَٓائِ۬ رَبِّهِمْ لَكَافِرُونَ8
क्या उन्होंने अपने आप में सोच-विचार नहीं किया? अल्लाह ने आकाशों और धरती को और जो कुछ उनके बीच है सत्य के साथ और एक नियत अवधि ही के लिए पैदा किया है। किन्तु बहुत-से लोग अपने प्रभु के मिलन का इनकार करते है
اَوَلَمْ يَس۪يرُوا فِي الْاَرْضِ فَيَنْظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الَّذ۪ينَ مِنْ قَبْلِهِمْۜ كَانُٓوا اَشَدَّ مِنْهُمْ قُوَّةً وَاَثَارُوا الْاَرْضَ وَعَمَرُوهَٓا اَكْثَرَ مِمَّا عَمَرُوهَا وَجَٓاءَتْهُمْ رُسُلُهُمْ بِالْبَيِّنَاتِۜ فَمَا كَانَ اللّٰهُ لِيَظْلِمَهُمْ وَلٰكِنْ كَانُٓوا اَنْفُسَهُمْ يَظْلِمُونَۜ9
क्या वे धरती में चले-फिरे नहीं कि देखते कि उन लोगों का कैसा परिणाम हुआ जो उनसे पहले थे? वे शक्ति में उनसे अधिक बलवान थे और उन्होंने धरती को उपजाया और उससे कहीं अधिक उसे आबाद किया जितना उन्होंने आबाद किया था। और उनके पास उनके रसूल प्रत्यक्ष प्रमाण लेकर आए। फिर अल्लाह ऐसा न था कि उनपर ज़ुल्म करता। किन्तु वे स्वयं ही अपने आप पर ज़ुल्म करते थे
ثُمَّ كَانَ عَاقِبَةَ الَّذ۪ينَ اَسَٓاؤُا السُّٓوآٰى اَنْ كَذَّبُوا بِاٰيَاتِ اللّٰهِ وَكَانُوا بِهَا يَسْتَهْزِؤُ۫نَ۟10
फिर जिन लोगों ने बुरा किया था उनका परिणाम बुरा हुआ, क्योंकि उन्होंने अल्लाह की आयतों को झुठलाया और उनका उपहास करते रहे
اَللّٰهُ يَبْدَؤُا الْخَلْقَ ثُمَّ يُع۪يدُهُ ثُمَّ اِلَيْهِ تُرْجَعُونَ11
अल्लाह की सृष्टि का आरम्भ करता है। फिर वही उसकी पुनरावृति करता है। फिर उसी की ओर तुम पलटोगे
وَيَوْمَ تَقُومُ السَّاعَةُ يُبْلِسُ الْمُجْرِمُونَ12
जिस दिन वह घड़ी आ खड़ी होगी, उस दिन अपराधी एकदम निराश होकर रह जाएँगे
وَلَمْ يَكُنْ لَهُمْ مِنْ شُرَكَٓائِهِمْ شُفَعٰٓؤُ۬ا وَكَانُوا بِشُرَكَٓائِهِمْ كَافِر۪ينَ13
उनके ठहराए हुए साझीदारों में से कोई उनका सिफ़ारिश करनेवाला न होगा और वे स्वयं भी अपने साझीदारों का इनकार करेंगे
وَيَوْمَ تَقُومُ السَّاعَةُ يَوْمَئِذٍ يَتَفَرَّقُونَ14
और जिस दिन वह घड़ी आ खड़ी होगी, उस दिन वे सब अलग-अलग हो जाएँगे
فَاَمَّا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ فَهُمْ ف۪ي رَوْضَةٍ يُحْبَرُونَ15
अतः जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए, वे एक बाग़ में प्रसन्नतापूर्वक रखे जाएँगे
وَاَمَّا الَّذ۪ينَ كَفَرُوا وَكَذَّبُوا بِاٰيَاتِنَا وَلِقَٓائِ الْاٰخِرَةِ فَاُو۬لٰٓئِكَ فِي الْعَذَابِ مُحْضَرُونَ16
किन्तु जिन लोगों ने इनकार किया और हमारी आयतों और आख़िरत की मुलाक़ात को झुठलाया, वे लाकर यातनाग्रस्त किए जाएँगे
فَسُبْحَانَ اللّٰهِ ح۪ينَ تُمْسُونَ وَح۪ينَ تُصْبِحُونَ17
अतः अब अल्लाह की तसबीह करो, जबकि तुम शाम करो और जब सुबह करो।
وَلَهُ الْحَمْدُ فِي السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِ وَعَشِيًّا وَح۪ينَ تُظْهِرُونَ18
- और उसी के लिए प्रशंसा है आकाशों और धरती में - और पिछले पहर और जब तुमपर दोपहर हो
يُخْرِجُ الْحَيَّ مِنَ الْمَيِّتِ وَيُخْرِجُ الْمَيِّتَ مِنَ الْحَيِّ وَيُحْيِ الْاَرْضَ بَعْدَ مَوْتِهَاۜ وَكَذٰلِكَ تُخْرَجُونَ۟19
वह जीवित को मृत से निकालता है और मृत को जीवित से, और धरती को उसकी मृत्यु के पश्चात जीवन प्रदान करता है। इसी प्रकार तुम भी निकाले जाओगे
وَمِنْ اٰيَاتِه۪ٓ اَنْ خَلَقَكُمْ مِنْ تُرَابٍ ثُمَّ اِذَٓا اَنْتُمْ بَشَرٌ تَنْتَشِرُونَ20
और यह उसकी निशानियों में से है कि उसने तुम्हें मिट्टी से पैदा किया। फिर क्या देखते है कि तुम मानव हो, फैलते जा रहे हो
وَمِنْ اٰيَاتِه۪ٓ اَنْ خَلَقَ لَكُمْ مِنْ اَنْفُسِكُمْ اَزْوَاجًا لِتَسْكُنُٓوا اِلَيْهَا وَجَعَلَ بَيْنَكُمْ مَوَدَّةً وَرَحْمَةًۜ اِنَّ ف۪ي ذٰلِكَ لَاٰيَاتٍ لِقَوْمٍ يَتَفَكَّرُونَ21
और यह भी उसकी निशानियों में से है कि उसने तुम्हारी ही सहजाति से तुम्हारे लिए जोड़े पैदा किए, ताकि तुम उसके पास शान्ति प्राप्त करो। और उसने तुम्हारे बीच प्रेंम और दयालुता पैदा की। और निश्चय ही इसमें बहुत-सी निशानियाँ है उन लोगों के लिए जो सोच-विचार करते है
وَمِنْ اٰيَاتِه۪ خَلْقُ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِ وَاخْتِلَافُ اَلْسِنَتِكُمْ وَاَلْوَانِكُمْۜ اِنَّ ف۪ي ذٰلِكَ لَاٰيَاتٍ لِلْعَالِم۪ينَ22
और उसकी निशानियों में से आकाशों और धरती का सृजन और तुम्हारी भाषाओं और तुम्हारे रंगों की विविधता भी है। निस्संदेह इसमें ज्ञानवानों के लिए बहुत-सी निशानियाँ है
وَمِنْ اٰيَاتِه۪ مَنَامُكُمْ بِالَّيْلِ وَالنَّهَارِ وَابْتِغَٓاؤُ۬كُمْ مِنْ فَضْلِه۪ۜ اِنَّ ف۪ي ذٰلِكَ لَاٰيَاتٍ لِقَوْمٍ يَسْمَعُونَ23
और उसकी निशानियों में से तुम्हारा रात और दिन का सोना और तुम्हारा उसके अनुग्रह की तलाश करना भी है। निश्चय ही इसमें निशानियाँ है उन लोगों के लिए जो सुनते है
وَمِنْ اٰيَاتِه۪ يُر۪يكُمُ الْبَرْقَ خَوْفًا وَطَمَعًا وَيُنَزِّلُ مِنَ السَّمَٓاءِ مَٓاءً فَيُحْي۪ بِهِ الْاَرْضَ بَعْدَ مَوْتِهَاۜ اِنَّ ف۪ي ذٰلِكَ لَاٰيَاتٍ لِقَوْمٍ يَعْقِلُونَ24
और उसकी निशानियों में से यह भी है कि वह तुम्हें बिजली की चमक भय और आशा उत्पन्न करने के लिए दिखाता है। और वह आकाश से पानी बरसाता है। फिर उसके द्वारा धरती को उसके निर्जीव हो जाने के पश्चात जीवन प्रदान करता है। निस्संदेह इसमें बहुत-सी निशानियाँ है उन लोगों के लिए जो बुद्धि से काम लेते है
وَمِنْ اٰيَاتِه۪ٓ اَنْ تَقُومَ السَّمَٓاءُ وَالْاَرْضُ بِاَمْرِه۪ۜ ثُمَّ اِذَا دَعَاكُمْ دَعْوَةً مِنَ الْاَرْضِ اِذَٓا اَنْتُمْ تَخْرُجُونَ25
और उसकी निशानियों में से यह भी है कि आकाश और धरती उसके आदेश से क़ायम है। फिर जब वह तुम्हे एक बार पुकारकर धरती में से बुलाएगा, तो क्या देखेंगे कि सहसा तुम निकल पड़े
وَلَهُ مَنْ فِي السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ كُلٌّ لَهُ قَانِتُونَ26
आकाशों और धरती में जो कोई भी उसी का है। प्रत्येक उसी के निष्ठावान आज्ञाकारी है
وَهُوَ الَّذ۪ي يَبْدَؤُا الْخَلْقَ ثُمَّ يُع۪يدُهُ وَهُوَ اَهْوَنُ عَلَيْهِۜ وَلَهُ الْمَثَلُ الْاَعْلٰى فِي السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۚ وَهُوَ الْعَز۪يزُ الْحَك۪يمُ۟27
वही है जो सृष्टि का आरम्भ करता है। फिर वही उसकी पुनरावृत्ति करेगा। और यह उसके लिए अधिक सरल है। आकाशों और धरती में उसी मिसाल (गुण) सर्वोच्च है। और वह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी हैं
ضَرَبَ لَكُمْ مَثَلًا مِنْ اَنْفُسِكُمْۜ هَلْ لَكُمْ مِنْ مَا مَلَكَتْ اَيْمَانُكُمْ مِنْ شُرَكَٓاءَ ف۪ي مَا رَزَقْنَاكُمْ فَاَنْتُمْ ف۪يهِ سَوَٓاءٌ تَخَافُونَهُمْ كَخ۪يفَتِكُمْ اَنْفُسَكُمْۜ كَذٰلِكَ نُفَصِّلُ الْاٰيَاتِ لِقَوْمٍ يَعْقِلُونَ28
उसने तुम्हारे लिए स्वयं तुम्हीं में से एक मिसाल पेश की है। क्या जो रोज़ी हमने तुम्हें दी है, उसमें तुम्हारे अधीनस्थों में से, कुछ तुम्हारे साझीदार है कि तुम सब उसमें बराबर के हो, तुम उनका ऐसा डर रखते हो जैसा अपने लोगों का डर रखते हो? - इसप्रकार हम उन लोगों के लिए आयतें खोल-खोलकर प्रस्तुत करते है जो बुद्धि से काम लेते है। -
بَلِ اتَّبَعَ الَّذ۪ينَ ظَلَمُٓوا اَهْوَٓاءَهُمْ بِغَيْرِ عِلْمٍۚ فَمَنْ يَهْد۪ي مَنْ اَضَلَّ اللّٰهُۜ وَمَا لَهُمْ مِنْ نَاصِر۪ينَ29
नहीं, बल्कि ये ज़ालिम तो बिना ज्ञान के अपनी इच्छाओं के पीछे चल पड़े। तो अब कौन उसे मार्ग दिखाएगा जिसे अल्लाह ने भटका दिया हो? ऐसे लोगो का तो कोई सहायक नहीं
فَاَقِمْ وَجْهَكَ لِلدّ۪ينِ حَن۪يفًاۜ فِطْرَةَ اللّٰهِ الَّت۪ي فَطَرَ النَّاسَ عَلَيْهَاۜ لَا تَبْد۪يلَ لِخَلْقِ اللّٰهِۜ ذٰلِكَ الدّ۪ينُ الْقَيِّمُۗ وَلٰكِنَّ اَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَۗ30
अतः एक ओर का होकर अपने रुख़ को 'दीन' (धर्म) की ओर जमा दो, अल्लाह की उस प्रकृति का अनुसरण करो जिसपर उसने लोगों को पैदा किया। अल्लाह की बनाई हुई संरचना बदली नहीं जा सकती। यही सीधा और ठीक धर्म है, किन्तु अधिकतर लोग जानते नहीं।
مُن۪يب۪ينَ اِلَيْهِ وَاتَّقُوهُ وَاَق۪يمُوا الصَّلٰوةَ وَلَا تَكُونُوا مِنَ الْمُشْرِك۪ينَۙ31
उसकी ओर रुजू करनेवाले (प्रवृत्त होनेवाले) रहो। और उसका डर रखो और नमाज़ का आयोजन करो और (अल्लाह का) साझी ठहरानेवालों में से न होना,
مِنَ الَّذ۪ينَ فَرَّقُوا د۪ينَهُمْ وَكَانُوا شِيَعًاۜ كُلُّ حِزْبٍ بِمَا لَدَيْهِمْ فَرِحُونَ32
उन लोगों में से जिन्होंने अपनी दीन (धर्म) को टुकड़े-टुकड़े कर डाला और गिरोहों में बँट गए। हर गिरोह के पास जो कुछ है, उसी में मग्न है
وَاِذَا مَسَّ النَّاسَ ضُرٌّ دَعَوْا رَبَّهُمْ مُن۪يب۪ينَ اِلَيْهِ ثُمَّ اِذَٓا اَذَاقَهُمْ مِنْهُ رَحْمَةً اِذَا فَر۪يقٌ مِنْهُمْ بِرَبِّهِمْ يُشْرِكُونَۙ33
और जब लोगों को कोई तकलीफ़ पहुँचती है तो वे अपने रब को, उसकी ओर रुजू (प्रवृत) होकर पुकारते है। फिर जब वह उन्हें अपनी दयालुता का रसास्वादन करा देता है, तो क्या देखते है कि उनमें से कुछ लोग अपने रब का साझी ठहराने लगे;
لِيَكْفُرُوا بِمَٓا اٰتَيْنَاهُمْۜ فَتَمَتَّعُوا۠ فَسَوْفَ تَعْلَمُونَ34
ताकि इस प्रकार वे उसके प्रति अकृतज्ञता दिखलाएँ जो कुछ हमने उन्हें दिया है। "अच्छा तो मज़े उड़ा लो, शीघ्र ही तुम जान लोगे।"
اَمْ اَنْزَلْنَا عَلَيْهِمْ سُلْطَانًا فَهُوَ يَتَكَلَّمُ بِمَا كَانُوا بِه۪ يُشْرِكُونَ35
(क्या उनके देवताओं ने उनकी सहायता की थी) या हमने उनपर ऐसा कोई प्रमाण उतारा है कि वह उसके हक़ में बोलता हो, जो वे उसके साथ साझी ठहराते है
وَاِذَٓا اَذَقْنَا النَّاسَ رَحْمَةً فَرِحُوا بِهَاۜ وَاِنْ تُصِبْهُمْ سَيِّئَةٌ بِمَا قَدَّمَتْ اَيْد۪يهِمْ اِذَا هُمْ يَقْنَطُونَ36
और जब हम लोगों को दयालुता का रसास्वादन कराते है तो वे उसपर इतराने लगते है; परन्तु जो कुछ उनके हाथों ने आगे भेजा है यदि उसके कारण उनपर कोई विपत्ति आ जाए, तो क्या देखते है कि वे निराश हो रहे है
اَوَلَمْ يَرَوْا اَنَّ اللّٰهَ يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَنْ يَشَٓاءُ وَيَقْدِرُۜ اِنَّ ف۪ي ذٰلِكَ لَاٰيَاتٍ لِقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ37
क्या उन्होंने विचार नहीं किया कि अल्लाह जिसके लिए चाहता है रोज़ी कुशादा कर देता है और जिसके लिए चाहता है नपी-तुली कर देता है? निस्संदेह इसमें उन लोगों के लिए निशानियाँ है, जो ईमान लाएँ
فَاٰتِ ذَا الْقُرْبٰى حَقَّهُ وَالْمِسْك۪ينَ وَابْنَ السَّب۪يلِۜ ذٰلِكَ خَيْرٌ لِلَّذ۪ينَ يُر۪يدُونَ وَجْهَ اللّٰهِۘ وَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ38
अतः नातेदार को उसका हक़ दो और मुहताज और मुसाफ़िर को भी। यह अच्छा है उनके लिए जो अल्लाह की प्रसन्नता के इच्छुक हों और वही सफल है
وَمَٓا اٰتَيْتُمْ مِنْ رِبًا لِيَرْبُوَ۬ا ف۪ٓي اَمْوَالِ النَّاسِ فَلَا يَرْبُوا عِنْدَ اللّٰهِۚ وَمَٓا اٰتَيْتُمْ مِنْ زَكٰوةٍ تُر۪يدُونَ وَجْهَ اللّٰهِ فَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْمُضْعِفُونَ39
तुम जो कुछ ब्याज पर देते हो, ताकि वह लोगों के मालों में सम्मिलित होकर बढ़ जाए, तो वह अल्लाह के यहाँ नहीं बढ़ता। किन्तु जो ज़कात तुमने अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए दी, तो ऐसे ही लोग (अल्लाह के यहाँ) अपना माल बढ़ाते है
اَللّٰهُ الَّذ۪ي خَلَقَكُمْ ثُمَّ رَزَقَكُمْ ثُمَّ يُم۪يتُكُمْ ثُمَّ يُحْي۪يكُمْۜ هَلْ مِنْ شُرَكَٓائِكُمْ مَنْ يَفْعَلُ مِنْ ذٰلِكُمْ مِنْ شَيْءٍۜ سُبْحَانَهُ وَتَعَالٰى عَمَّا يُشْرِكُونَ۟40
अल्लाह ही है जिसने तुम्हें पैदा किया, फिर तुम्हें रोज़ी दी; फिर वह तुम्हें मृत्यु देता है; फिर तुम्हें जीवित करेगा। क्या तुम्हारे ठहराए हुए साझीदारों में भी कोई है, जो इन कामों में से कुछ कर सके? महान और उच्च है वह उसमें जो साझी वे ठहराते है
ظَهَرَ الْفَسَادُ فِي الْبَرِّ وَالْبَحْرِ بِمَا كَسَبَتْ اَيْدِي النَّاسِ لِيُذ۪يقَهُمْ بَعْضَ الَّذ۪ي عَمِلُوا لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ41
थल और जल में बिगाड़ फैल गया स्वयं लोगों ही के हाथों की कमाई के कारण, ताकि वह उन्हें उनकी कुछ करतूतों का मज़ा चखाए, कदाचित वे बाज़ आ जाएँ
قُلْ س۪يرُوا فِي الْاَرْضِ فَانْظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الَّذ۪ينَ مِنْ قَبْلُۜ كَانَ اَكْثَرُهُمْ مُشْرِك۪ينَ42
कहो, "धरती में चल-फिरकर देखो कि उन लोगों का कैसा परिणाम हुआ जो पहले गुज़रे है। उनमें अधिकतर बहुदेववादी ही थे।"
فَاَقِمْ وَجْهَكَ لِلدّ۪ينِ الْقَيِّمِ مِنْ قَبْلِ اَنْ يَاْتِيَ يَوْمٌ لَا مَرَدَّ لَهُ مِنَ اللّٰهِ يَوْمَئِذٍ يَصَّدَّعُونَ43
अतः तुम अपना रुख़ सीधे व ठीक धर्म की ओर जमा दो, इससे पहले कि अल्लाह की ओर से वह दिन आ जाए जिसके लिए वापसी नहीं। उस दिन लोग अलग-अलग हो जाएँगे
مَنْ كَفَرَ فَعَلَيْهِ كُفْرُهُۚ وَمَنْ عَمِلَ صَالِحًا فَلِاَنْفُسِهِمْ يَمْهَدُونَۙ44
जिस किसी ने इनकार किया तो उसका इनकार उसी के लिए घातक सिद्ध होगा, और जिन लोगों ने अच्छा कर्म किया वे अपने ही लिए आराम का साधन जुटा रहे है
لِيَجْزِيَ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ مِنْ فَضْلِه۪ۜ اِنَّهُ لَا يُحِبُّ الْكَافِر۪ينَ45
ताकि वह अपने उदार अनुग्रह से उन लोगों को बदला दे जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए। निश्चय ही वह इनकार करनेवालों को पसन्द नहीं करता। -
وَمِنْ اٰيَاتِه۪ٓ اَنْ يُرْسِلَ الرِّيَاحَ مُبَشِّرَاتٍ وَلِيُذ۪يقَكُمْ مِنْ رَحْمَتِه۪ وَلِتَجْرِيَ الْفُلْكُ بِاَمْرِه۪ وَلِتَبْتَغُوا مِنْ فَضْلِه۪ وَلَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ46
और उसकी निशानियों में से यह भी है कि शुभ सूचना देनेवाली हवाएँ भेजता है (ताकि उनके द्वारा तुम्हें वर्षा की शुभ सूचना मिले) और ताकि वह तुम्हें अपनी दयालुता का रसास्वादन कराए और ताकि उसके आदेश से नौकाएँ चलें और ताकि तुम उसका अनुग्रह (रोज़ी) तलाश करो और कदाचित तुम कृतज्ञता दिखलाओ
وَلَقَدْ اَرْسَلْنَا مِنْ قَبْلِكَ رُسُلًا اِلٰى قَوْمِهِمْ فَجَٓاؤُ۫هُمْ بِالْبَيِّنَاتِ فَانْتَقَمْنَا مِنَ الَّذ۪ينَ اَجْرَمُواۜ وَكَانَ حَقًّا عَلَيْنَا نَصْرُ الْمُؤْمِن۪ينَ47
हम तुमसे पहले कितने ही रसूलों को उनकी क़ौम की ओर भेज चुके है और वे उनके पास खुली निशानियाँ लेकर आए। फिर हम उन लोगों से बदला लेकर रहे जिन्होंने अपराध किया, और ईमानवालों की सहायता करना तो हमपर एक हक़ है
اَللّٰهُ الَّذ۪ي يُرْسِلُ الرِّيَاحَ فَتُث۪يرُ سَحَابًا فَيَبْسُطُهُ فِي السَّمَٓاءِ كَيْفَ يَشَٓاءُ وَيَجْعَلُهُ كِسَفًا فَتَرَى الْوَدْقَ يَخْرُجُ مِنْ خِلَالِه۪ۚ فَاِذَٓا اَصَابَ بِه۪ مَنْ يَشَٓاءُ مِنْ عِبَادِه۪ٓ اِذَا هُمْ يَسْتَبْشِرُونَ48
अल्लाह ही है जो हवाओं को भेजता है। फिर वे बादलों को उठाती हैं; फिर जिस तरह चाहता है उन्हें आकाश में फैला देता है और उन्हें परतों और टुकड़ियों का रूप दे देता है। फिर तुम देखते हो कि उनके बीच से वर्षा की बूँदें टपकी चली आती है। फिर जब वह अपने बन्दों में से जिनपर चाहता है, उसे बरसाता है। तो क्या देखते है कि वे हर्षित हो उठे
وَاِنْ كَانُوا مِنْ قَبْلِ اَنْ يُنَزَّلَ عَلَيْهِمْ مِنْ قَبْلِه۪ لَمُبْلِس۪ينَ49
जबकि इससे पूर्व, इससे पहले कि वह उनपर उतरे, वे बिलकुल निराश थे
فَانْظُرْ اِلٰٓى اٰثَارِ رَحْمَتِ اللّٰهِ كَيْفَ يُحْيِ الْاَرْضَ بَعْدَ مَوْتِهَاۜ اِنَّ ذٰلِكَ لَمُحْيِ الْمَوْتٰىۚ وَهُوَ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَد۪يرٌ50
अतः देखों अल्लाह की दयालुता के चिन्ह! वह किस प्रकार धरती को उसके मृत हो जाने के पश्चात जीवन प्रदान करता है। निश्चय ही वह मुर्दों को जीवत करनेवाला है, और उसे हर चीज़ का सामर्थ्य प्राप्ती है
وَلَئِنْ اَرْسَلْنَا ر۪يحًا فَرَاَوْهُ مُصْفَرًّا لَظَلُّوا مِنْ بَعْدِه۪ يَكْفُرُونَ51
किन्तु यदि हम एक दूसरी हवा भेज दें, जिसके प्रभाव से वे उस (खेती) को पीली पड़ी हुई देखें तो इसके पश्चात वे कुफ़्र करने लग जाएँ
فَاِنَّكَ لَا تُسْمِعُ الْمَوْتٰى وَلَا تُسْمِعُ الصُّمَّ الدُّعَٓاءَ اِذَا وَلَّوْا مُدْبِر۪ينَ52
अतः तुम मुर्दों को नहीं सुना सकते और न बहरों को अपनी पुकार सुना सकते हो, जबकि वे पीठ फेरे चले जो रहे हों
وَمَٓا اَنْتَ بِهَادِ الْعُمْيِ عَنْ ضَلَالَتِهِمْۜ اِنْ تُسْمِعُ اِلَّا مَنْ يُؤْمِنُ بِاٰيَاتِنَا فَهُمْ مُسْلِمُونَ۟53
और न तुम अंधों को उनकी गुमराही से फेरकर मार्ग पर ला सकते हो। तुम तो केवल उन्हीं को सुना सकते हो जो हमारी आयतों पर ईमान लाएँ। तो वही आज्ञाकारी हैं
اَللّٰهُ الَّذ۪ي خَلَقَكُمْ مِنْ ضَعْفٍ ثُمَّ جَعَلَ مِنْ بَعْدِ ضَعْفٍ قُوَّةً ثُمَّ جَعَلَ مِنْ بَعْدِ قُوَّةٍ ضَعْفًا وَشَيْبَةًۜ يَخْلُقُ مَا يَشَٓاءُۚ وَهُوَ الْعَل۪يمُ الْقَد۪يرُ54
अल्लाह ही है जिसनें तुम्हें निर्बल पैदा किया, फिर निर्बलता के पश्चात शक्ति प्रदान की; फिर शक्ति के पश्चात निर्बलता औऱ बुढापा दिया। वह जो कुछ चाहता है पैदा करता है। वह जाननेवाला, सामर्थ्यवान है
وَيَوْمَ تَقُومُ السَّاعَةُ يُقْسِمُ الْمُجْرِمُونَۙ مَا لَبِثُوا غَيْرَ سَاعَةٍۜ كَذٰلِكَ كَانُوا يُؤْفَكُونَ55
जिस दिन वह घड़ी आ खड़ी होगी अपराधी क़सम खाएँगे कि वे घड़ी भर से अधिक नहीं ठहरें। इसी प्रकार वे उलटे फिरे चले जाते थे
وَقَالَ الَّذ۪ينَ اُو۫تُوا الْعِلْمَ وَالْا۪يمَانَ لَقَدْ لَبِثْتُمْ ف۪ي كِتَابِ اللّٰهِ اِلٰى يَوْمِ الْبَعْثِۘ فَهٰذَا يَوْمُ الْبَعْثِ وَلٰكِنَّكُمْ كُنْتُمْ لَا تَعْلَمُونَ56
किन्तु जिन लोगों को ज्ञान और ईमान प्रदान हुआ, वे कहते, "अल्लाह के लेख में तो तुम जीवित होकर उठने के दिन ठहरे रहे हो। तो यही जीवित हो उठाने का दिन है। किन्तु तुम जानते न थे।"
فَيَوْمَئِذٍ لَا يَنْفَعُ الَّذ۪ينَ ظَلَمُوا مَعْذِرَتُهُمْ وَلَا هُمْ يُسْتَعْتَبُونَ57
अतः उस दिन ज़ुल्म करनेवालों को उनका कोई उज़्र (सफाई पेश करना) काम न आएगा और न उनसे यह चाहा जाएगा कि वे किसी यत्न से (अल्लाह के) प्रकोप को टाल सकें
وَلَقَدْ ضَرَبْنَا لِلنَّاسِ ف۪ي هٰذَا الْقُرْاٰنِ مِنْ كُلِّ مَثَلٍۜ وَلَئِنْ جِئْتَهُمْ بِاٰيَةٍ لَيَقُولَنَّ الَّذ۪ينَ كَفَرُٓوا اِنْ اَنْتُمْ اِلَّا مُبْطِلُونَ58
हमने इस क़ुरआन में लोगों के लिए प्रत्येक मिसाल पेश कर दी है। यदि तुम कोई भी निशानी उनके पास ले आओ, जिन लोगों ने इनकार किया है, वे तो यही कहेंगे, "तुम तो बस झूठ घड़ते हो।"
كَذٰلِكَ يَطْبَعُ اللّٰهُ عَلٰى قُلُوبِ الَّذ۪ينَ لَا يَعْلَمُونَ59
इस प्रकार अल्लाह उन लोगों के दिलों पर ठप्पा लगा देता है जो अज्ञानी है
فَاصْبِرْ اِنَّ وَعْدَ اللّٰهِ حَقٌّ وَلَا يَسْتَخِفَّنَّكَ الَّذ۪ينَ لَا يُوقِنُونَ60
अतः धैर्य से काम लो निश्चय ही अल्लाह का वादा सच्चा है और जिन्हें विश्वास नहीं, वे तुम्हें कदापि हल्का न पाएँ
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
الٓمٓ۠1
अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰
تِلْكَ اٰيَاتُ الْكِتَابِ الْحَك۪يمِۙ2
(जो आयतें उतर रही हैं) वे तत्वज्ञान से परिपूर्ण किताब की आयते हैं
هُدًى وَرَحْمَةً لِلْمُحْسِن۪ينَۙ3
मार्गदर्शन और दयालुता उत्तमकारों के लिए
اَلَّذ۪ينَ يُق۪يمُونَ الصَّلٰوةَ وَيُؤْتُونَ الزَّكٰوةَ وَهُمْ بِالْاٰخِرَةِ هُمْ يُوقِنُونَۜ4
जो नमाज़ का आयोजन करते है और ज़कात देते है और आख़िरत पर विश्वास रखते है
اُو۬لٰٓئِكَ عَلٰى هُدًى مِنْ رَبِّهِمْ وَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ5
वही अपने रब की और से मार्ग पर हैं और वही सफल है
وَمِنَ النَّاسِ مَنْ يَشْتَر۪ي لَهْوَ الْحَد۪يثِ لِيُضِلَّ عَنْ سَب۪يلِ اللّٰهِ بِغَيْرِ عِلْمٍۙ وَيَتَّخِذَهَا هُزُوًاۜ اُو۬لٰٓئِكَ لَهُمْ عَذَابٌ مُه۪ينٌ6
लोगों में से कोई ऐसा भी है जो दिल को लुभानेवाली बातों का ख़रीदार बनता है, ताकि बिना किसी ज्ञान के अल्लाह के मार्ग से (दूसरों को) भटकाए और उनका परिहास करे। वही है जिनके लिए अपमानजनक यातना है
وَاِذَا تُتْلٰى عَلَيْهِ اٰيَاتُنَا وَلّٰى مُسْتَكْبِرًا كَاَنْ لَمْ يَسْمَعْهَا كَاَنَّ ف۪ٓي اُذُنَيْهِ وَقْرًاۚ فَبَشِّرْهُ بِعَذَابٍ اَل۪يمٍ7
जब उसे हमारी आयतें सुनाई जाती हैं तो वह स्वयं को बड़ा समझता हुआ पीठ फेरकर चल देता है, मानो उसने उन्हें सुना ही नहीं, मानो उसके काम बहरे है। अच्छा तो उसे एक दुखद यातना की शुभ सूचना दे दो
اِنَّ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَهُمْ جَنَّاتُ النَّع۪يمِۙ8
अलबत्ता जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए उनके लिए नेमत भरी जन्नतें हैं,
خَالِد۪ينَ ف۪يهَاۜ وَعْدَ اللّٰهِ حَقًّاۜ وَهُوَ الْعَز۪يزُ الْحَك۪يمُ9
जिनमें वे सदैव रहेंगे। यह अल्लाह का सच्चा वादा है और वह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
خَلَقَ السَّمٰوَاتِ بِغَيْرِ عَمَدٍ تَرَوْنَهَا وَاَلْقٰى فِي الْاَرْضِ رَوَاسِيَ اَنْ تَم۪يدَ بِكُمْ وَبَثَّ ف۪يهَا مِنْ كُلِّ دَٓابَّةٍۜ وَاَنْزَلْنَا مِنَ السَّمَٓاءِ مَٓاءً فَاَنْبَتْنَا ف۪يهَا مِنْ كُلِّ زَوْجٍ كَر۪يمٍ10
उसने आकाशों को पैदा किया, (जो थमें हुए हैं) बिना ऐसे स्तम्भों के जो तुम्हें दिखाई दें। और उसने धरती में पहाड़ डाल दिए कि ऐसा न हो कि तुम्हें लेकर डाँवाडोल हो जाए और उसने उसमें हर प्रकार के जानवर फैला दिए। और हमने ही आकाश से पानी उतारा, फिर उसमें हर प्रकार की उत्तम चीज़े उगाई
هٰذَا خَلْقُ اللّٰهِ فَاَرُون۪ي مَاذَا خَلَقَ الَّذ۪ينَ مِنْ دُونِه۪ۜ بَلِ الظَّالِمُونَ ف۪ي ضَلَالٍ مُب۪ينٍ۟11
यह तो अल्लाह की संरचना है। अब तनिक मुझे दिखाओं कि उससे हटकर जो दूसरे हैं (तुम्हारे ठहराए हुए प्रुभ) उन्होंने क्या पैदा किया हैं! नहीं, बल्कि ज़ालिम तो एक खुली गुमराही में पड़े हुए है
وَلَقَدْ اٰتَيْنَا لُقْمٰنَ الْحِكْمَةَ اَنِ اشْكُرْ لِلّٰهِۜ وَمَنْ يَشْكُرْ فَاِنَّمَا يَشْكُرُ لِنَفْسِه۪ۚ وَمَنْ كَفَرَ فَاِنَّ اللّٰهَ غَنِيٌّ حَم۪يدٌ12
निश्चय ही हमने लुकमान को तत्वदर्शिता प्रदान की थी कि अल्लाह के प्रति कृतज्ञता दिखलाओ और जो कोई कृतज्ञता दिखलाए, वह अपने ही भले के लिए कृतज्ञता दिखलाता है। और जिसने अकृतज्ञता दिखलाई तो अल्लाह वास्तव में निस्पृह, प्रशंसनीय है
وَاِذْ قَالَ لُقْمٰنُ لِابْنِه۪ وَهُوَ يَعِظُهُ يَا بُنَيَّ لَا تُشْرِكْ بِاللّٰهِۜ اِنَّ الشِّرْكَ لَظُلْمٌ عَظ۪يمٌ13
याद करो जब लुकमान ने अपने बेटे से, उसे नसीहत करते हुए कहा, "ऐ मेरे बेटे! अल्लाह का साझी न ठहराना। निश्चय ही शिर्क (बहुदेववाद) बहुत बड़ा ज़ुल्म है।"
وَوَصَّيْنَا الْاِنْسَانَ بِوَالِدَيْهِۚ حَمَلَتْهُ اُمُّهُ وَهْنًا عَلٰى وَهْنٍ وَفِصَالُهُ ف۪ي عَامَيْنِ اَنِ اشْكُرْ ل۪ي وَلِوَالِدَيْكَۜ اِلَيَّ الْمَص۪يرُ14
और हमने मनुष्य को उसके अपने माँ-बाप के मामले में ताकीद की है - उसकी माँ ने निढाल होकर उसे पेट में रखा और दो वर्ष उसके दूध छूटने में लगे - कि "मेरे प्रति कृतज्ञ हो और अपने माँ-बाप के प्रति भी। अंततः मेरी ही ओर आना है
وَاِنْ جَاهَدَاكَ عَلٰٓى اَنْ تُشْرِكَ ب۪ي مَا لَيْسَ لَكَ بِه۪ عِلْمٌ فَلَا تُطِعْهُمَا وَصَاحِبْهُمَا فِي الدُّنْيَا مَعْرُوفًاۘ وَاتَّبِعْ سَب۪يلَ مَنْ اَنَابَ اِلَيَّۚ ثُمَّ اِلَيَّ مَرْجِعُكُمْ فَاُنَبِّئُكُمْ بِمَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ15
किन्तु यदि वे तुझपर दबाव डाले कि तू किसी को मेरे साथ साझी ठहराए, जिसका तुझे ज्ञान नहीं, तो उसकी बात न मानना और दुनिया में उसके साथ भले तरीके से रहना। किन्तु अनुसरण उस व्यक्ति के मार्ग का करना जो मेरी ओर रुजू हो। फिर तुम सबको मेरी ही ओर पलटना है; फिर मैं तुम्हें बता दूँगा जो कुछ तुम करते रहे होगे।"-
يَا بُنَيَّ اِنَّهَٓا اِنْ تَكُ مِثْقَالَ حَبَّةٍ مِنْ خَرْدَلٍ فَتَكُنْ ف۪ي صَخْرَةٍ اَوْ فِي السَّمٰوَاتِ اَوْ فِي الْاَرْضِ يَاْتِ بِهَا اللّٰهُۜ اِنَّ اللّٰهَ لَط۪يفٌ خَب۪يرٌ16
"ऐ मेरे बेटे! इसमें सन्देह नहीं कि यदि वह राई के दाने के बराबर भी हो, फिर वह किसी चट्टान के बीच हो या आकाशों में हो या धरती में हो, अल्लाह उसे ला उपस्थित करेगा। निस्संदेह अल्लाह अत्यन्त सूक्ष्मदर्शी, ख़बर रखनेवाला है।
يَا بُنَيَّ اَقِمِ الصَّلٰوةَ وَاْمُرْ بِالْمَعْرُوفِ وَانْهَ عَنِ الْمُنْكَرِ وَاصْبِرْ عَلٰى مَٓا اَصَابَكَۜ اِنَّ ذٰلِكَ مِنْ عَزْمِ الْاُمُورِۚ17
"ऐ मेरे बेटे! नमाज़ का आयोजन कर और भलाई का हुक्म दे और बुराई से रोक और जो मुसीबत भी तुझपर पड़े उसपर धैर्य से काम ले। निस्संदेह ये उन कामों में से है जो अनिवार्य और ढृढसंकल्प के काम है
وَلَا تُصَعِّرْ خَدَّكَ لِلنَّاسِ وَلَا تَمْشِ فِي الْاَرْضِ مَرَحًاۜ اِنَّ اللّٰهَ لَا يُحِبُّ كُلَّ مُخْتَالٍ فَخُورٍۚ18
"और लोगों से अपना रूख़ न फेर और न धरती में इतराकर चल। निश्चय ही अल्लाह किसी अहंकारी, डींग मारनेवाले को पसन्द नहीं करता
وَاقْصِدْ ف۪ي مَشْيِكَ وَاغْضُضْ مِنْ صَوْتِكَۜ اِنَّ اَنْكَرَ الْاَصْوَاتِ لَصَوْتُ الْحَم۪يرِ۟19
"और अपनी चाल में सहजता और संतुलन बनाए रख और अपनी आवाज़ धीमी रख। निस्संदेह आवाज़ों में सबसे बुरी आवाज़ गधों की आवाज़ होती है।"
اَلَمْ تَرَوْا اَنَّ اللّٰهَ سَخَّرَ لَكُمْ مَا فِي السَّمٰوَاتِ وَمَا فِي الْاَرْضِ وَاَسْبَغَ عَلَيْكُمْ نِعَمَهُ ظَاهِرَةً وَبَاطِنَةًۜ وَمِنَ النَّاسِ مَنْ يُجَادِلُ فِي اللّٰهِ بِغَيْرِ عِلْمٍ وَلَا هُدًى وَلَا كِتَابٍ مُن۪يرٍ20
क्या तुमने देखा नहीं कि अल्लाह ने, जो कुछ आकाशों में और जो कुछ धरती में है, सबको तुम्हारे काम में लगा रखा है और उसने तुमपर अपनी प्रकट और अप्रकट अनुकम्पाएँ पूर्ण कर दी है? इसपर भी कुछ लोग ऐसे है जो अल्लाह के विषय में बिना किसी ज्ञान, बिना किसी मार्गदर्शन और बिना किसी प्रकाशमान किताब के झगड़ते है
وَاِذَا ق۪يلَ لَهُمُ اتَّبِعُوا مَٓا اَنْزَلَ اللّٰهُ قَالُوا بَلْ نَتَّبِعُ مَا وَجَدْنَا عَلَيْهِ اٰبَٓاءَنَاۜ اَوَلَوْ كَانَ الشَّيْطَانُ يَدْعُوهُمْ اِلٰى عَذَابِ السَّع۪يرِ21
अब जब उनसे कहा जाता है कि "उस चीज़ का अनुसरण करो जो अल्लाह न उतारी है," तो कहते है, "नहीं, बल्कि हम तो उस चीज़ का अनुसरण करेंगे जिसपर हमने अपने बाप-दादा को पाया है।" क्या यद्यपि शैतान उनको भड़कती आग की यातना की ओर बुला रहा हो तो भी?
وَمَنْ يُسْلِمْ وَجْهَهُٓ اِلَى اللّٰهِ وَهُوَ مُحْسِنٌ فَقَدِ اسْتَمْسَكَ بِالْعُرْوَةِ الْوُثْقٰىۜ وَاِلَى اللّٰهِ عَاقِبَةُ الْاُمُورِ22
जो कोई आज्ञाकारिता के साथ अपना रुख़ अल्लाह की ओर करे, और वह उत्तमकर भी हो तो उसने मज़बूत सहारा थाम लिया। सारे मामलों की परिणति अल्लाह ही की ओर है
وَمَنْ كَفَرَ فَلَا يَحْزُنْكَ كُفْرُهُۜ اِلَيْنَا مَرْجِعُهُمْ فَنُنَبِّئُهُمْ بِمَا عَمِلُواۜ اِنَّ اللّٰهَ عَل۪يمٌ بِذَاتِ الصُّدُورِ23
और जिस किसी ने इनकार किया तो उसका इनकार तुम्हें शोकाकुल न करे। हमारी ही ओर तो उन्हें पलटकर आना है। फिर जो कुछ वे करते रहे होंगे, उससे हम उन्हें अवगत करा देंगे। निस्संदेह अल्लाह सीनों की बात तक जानता है
نُمَتِّعُهُمْ قَل۪يلًا ثُمَّ نَضْطَرُّهُمْ اِلٰى عَذَابٍ غَل۪يظٍ24
हम उन्हें थोड़ा मज़ा उड़ाने देंगे। फिर उन्हें विवश करके एक कठोर यातना की ओर खींच ले जाएँगे
وَلَئِنْ سَاَلْتَهُمْ مَنْ خَلَقَ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضَ لَيَقُولُنَّ اللّٰهُۜ قُلِ الْحَمْدُ لِلّٰهِۜ بَلْ اَكْثَرُهُمْ لَا يَعْلَمُونَ25
यदि तुम उनसे पूछो कि "आकाशों और धरती को किसने पैदा किया?" तो वे अवश्य कहेंगे कि "अल्लाह ने।" कहो, "प्रशंसा भी अल्लाह के लिए है।" वरन उनमें से अधिकांश जानते नहीं
لِلّٰهِ مَا فِي السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ اِنَّ اللّٰهَ هُوَ الْغَنِيُّ الْحَم۪يدُ26
आकाशों और धरती में जो कुछ है अल्लाह ही का है। निस्संदेह अल्लाह ही निस्पृह, स्वतः प्रशंसित है
وَلَوْ اَنَّ مَا فِي الْاَرْضِ مِنْ شَجَرَةٍ اَقْلَامٌ وَالْبَحْرُ يَمُدُّهُ مِنْ بَعْدِه۪ سَبْعَةُ اَبْحُرٍ مَا نَفِدَتْ كَلِمَاتُ اللّٰهِۜ اِنَّ اللّٰهَ عَز۪يزٌ حَك۪يمٌ27
धरती में जितने वृक्ष है, यदि वे क़लम हो जाएँ और समुद्र उसकी स्याही हो जाए, उसके बाद सात और समुद्र हों, तब भी अल्लाह के बोल समाप्त न हो सकेंगे। निस्संदेह अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
مَا خَلْقُكُمْ وَلَا بَعْثُكُمْ اِلَّا كَنَفْسٍ وَاحِدَةٍۜ اِنَّ اللّٰهَ سَم۪يعٌ بَص۪يرٌ28
तुम सबका पैदा करना और तुम सबका जीवित करके पुनः उठाना तो बस ऐसा है, जैसे एक जीव का। अल्लाह तो सब कुछ सुनता, देखता है
اَلَمْ تَرَ اَنَّ اللّٰهَ يُولِجُ الَّيْلَ فِي النَّهَارِ وَيُولِجُ النَّهَارَ فِي الَّيْلِ وَسَخَّرَ الشَّمْسَ وَالْقَمَرَۘ كُلٌّ يَجْر۪ٓي اِلٰٓى اَجَلٍ مُسَمًّى وَاَنَّ اللّٰهَ بِمَا تَعْمَلُونَ خَب۪يرٌ29
क्या तुमने देखा नहीं कि अल्लाह रात को दिन में प्रविष्ट करता है और दिन को रात में प्रविष्ट करता है। उसने सूर्य और चन्द्रमा को काम में लगा रखा है? प्रत्येक एक नियत समय तक चला जा रहा है और इसके साथ यह कि जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है
ذٰلِكَ بِاَنَّ اللّٰهَ هُوَ الْحَقُّ وَاَنَّ مَا يَدْعُونَ مِنْ دُونِهِ الْبَاطِلُۙ وَاَنَّ اللّٰهَ هُوَ الْعَلِيُّ الْكَب۪يرُ۟30
यह सब कुछ इस कारण से है कि अल्लाह ही सत्य है और यह कि उसे छोड़कर जिनको वे पुकारते है, वे असत्य है। और यह कि अल्लाह ही सर्वोच्च, महान है
اَلَمْ تَرَ اَنَّ الْفُلْكَ تَجْر۪ي فِي الْبَحْرِ بِنِعْمَتِ اللّٰهِ لِيُرِيَكُمْ مِنْ اٰيَاتِه۪ۜ اِنَّ ف۪ي ذٰلِكَ لَاٰيَاتٍ لِكُلِّ صَبَّارٍ شَكُورٍ31
क्या तुमने देखा नहीं कि नौका समुद्र में अल्लाह के अनुग्रह से चलती है, ताकि वह तुम्हें अपनी कुछ निशानियाँ दिखाए। निस्संदेह इसमें प्रत्येक धैर्यवान, कृतज्ञ के लिए निशानियाँ है
وَاِذَا غَشِيَهُمْ مَوْجٌ كَالظُّلَلِ دَعَوُا اللّٰهَ مُخْلِص۪ينَ لَهُ الدّ۪ينَۚ فَلَمَّا نَجّٰيهُمْ اِلَى الْبَرِّ فَمِنْهُمْ مُقْتَصِدٌۜ وَمَا يَجْحَدُ بِاٰيَاتِنَٓا اِلَّا كُلُّ خَتَّارٍ كَفُورٍ32
और जब कोई मौज छाया-छत्रों की तरह उन्हें ढाँक लेती है, तो वे अल्लाह को उसी के लिए अपने निष्ठाभाव के विशुद्ध करते हुए पुकारते है, फिर जब वह उन्हें बचाकर स्थल तक पहुँचा देता है, तो उनमें से कुछ लोग संतुलित मार्ग पर रहते है। (अधिकांश तो पुनः पथभ्रष्ट हो जाते है।) हमारी निशानियों का इनकार तो बस प्रत्येक वह व्यक्ति करता है जो विश्वासघाती, कृतध्न हो
يَٓا اَيُّهَا النَّاسُ اتَّقُوا رَبَّكُمْ وَاخْشَوْا يَوْمًا لَا يَجْز۪ي وَالِدٌ عَنْ وَلَدِه۪ۘ وَلَا مَوْلُودٌ هُوَ جَازٍ عَنْ وَالِدِه۪ شَيْـًٔاۜ اِنَّ وَعْدَ اللّٰهِ حَقٌّ فَلَا تَغُرَّنَّكُمُ الْحَيٰوةُ الدُّنْيَا۠ وَلَا يَغُرَّنَّكُمْ بِاللّٰهِ الْغَرُورُ33
ऐ लोगों! अपने रब का डर रखो और उस दिन से डरो जब न कोई बाप अपनी औलाद की ओर से बदला देगा और न कोई औलाद ही अपने बाप की ओर से बदला देनेवाली होगी। निश्चय ही अल्लाह का वादा सच्चा है। अतः सांसारिक जीवन कदापि तुम्हें धोखे में न डाले। और न अल्लाह के विषय में वह धोखेबाज़ तुम्हें धोखें में डाले
اِنَّ اللّٰهَ عِنْدَهُ عِلْمُ السَّاعَةِۚ وَيُنَزِّلُ الْغَيْثَۚ وَيَعْلَمُ مَا فِي الْاَرْحَامِۜ وَمَا تَدْر۪ي نَفْسٌ مَاذَا تَكْسِبُ غَدًاۜ وَمَا تَدْر۪ي نَفْسٌ بِاَيِّ اَرْضٍ تَمُوتُۜ اِنَّ اللّٰهَ عَل۪يمٌ خَب۪يرٌ34
निस्संदेह उस घड़ी का ज्ञान अल्लाह ही के पास है। वही मेंह बरसाता है और जानता है जो कुछ गर्भाशयों में होता है। कोई क्यक्ति नहीं जानता कि कल वह क्या कमाएगा और कोई व्यक्ति नहीं जानता है कि किस भूभाग में उसक मृत्यु होगी। निस्संदेह अल्लाह जाननेवाला, ख़बर रखनेवाला है
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
الٓمٓ۠1
अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰
تَنْز۪يلُ الْكِتَابِ لَا رَيْبَ ف۪يهِ مِنْ رَبِّ الْعَالَم۪ينَۜ2
इस किताब का अवतरण - इसमें सन्देह नहीं - सारे संसार के रब की ओर से है
اَمْ يَقُولُونَ افْتَرٰيهُۚ بَلْ هُوَ الْحَقُّ مِنْ رَبِّكَ لِتُنْذِرَ قَوْمًا مَٓا اَتٰيهُمْ مِنْ نَذ۪يرٍ مِنْ قَبْلِكَ لَعَلَّهُمْ يَهْتَدُونَ3
(क्या वे इसपर विश्वास नहीं रखते) या वे कहते है कि "इस व्यक्ति ने इसे स्वयं ही घड़ लिया है?" नहीं, बल्कि वह सत्य है तेरे रब की ओर से, ताकि तू उन लोगों को सावधान कर दे जिनके पास तुझसे पहले कोई सावधान करनेवाला नहीं आया। कदाचित वे मार्ग पाएँ
اَللّٰهُ الَّذ۪ي خَلَقَ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَا ف۪ي سِتَّةِ اَيَّامٍ ثُمَّ اسْتَوٰى عَلَى الْعَرْشِۜ مَا لَكُمْ مِنْ دُونِه۪ مِنْ وَلِيٍّ وَلَا شَف۪يعٍۜ اَفَلَا تَتَذَكَّرُونَ4
अल्लाह ही है जिसने आकाशों और धरती को और जो कुछ दोनों के बीच है छह दिनों में पैदा किया। फिर सिंहासन पर विराजमान हुआ। उससे हटकर न तो तुम्हारा कोई संरक्षक मित्र है और न उसके मुक़ाबले में कोई सिफ़ारिस करनेवाला। फिर क्या तुम होश में न आओगे?
يُدَبِّرُ الْاَمْرَ مِنَ السَّمَٓاءِ اِلَى الْاَرْضِ ثُمَّ يَعْرُجُ اِلَيْهِ ف۪ي يَوْمٍ كَانَ مِقْدَارُهُٓ اَلْفَ سَنَةٍ مِمَّا تَعُدُّونَ5
वह कार्य की व्यवस्था करता है आकाश से धरती तक - फिर सारे मामले उसी की तरफ़ लौटते है - एक दिन में, जिसकी माप तुम्हारी गणना के अनुसार एक हज़ार वर्ष है
ذٰلِكَ عَالِمُ الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ الْعَز۪يزُ الرَّح۪يمُۙ6
वही है परोक्ष और प्रत्यक्ष का जाननेवाला अत्यन्त प्रभुत्वशाली, दयावान है
اَلَّذ۪ٓي اَحْسَنَ كُلَّ شَيْءٍ خَلَقَهُ وَبَدَاَ خَلْقَ الْاِنْسَانِ مِنْ ط۪ينٍۚ7
जिसने हरेक चीज़, जो बनाई ख़ूब ही बनाई और उसने मनुष्य की संरचना का आरम्भ गारे से किया
ثُمَّ جَعَلَ نَسْلَهُ مِنْ سُلَالَةٍ مِنْ مَٓاءٍ مَه۪ينٍۚ8
फिर उसकी सन्तति एक तुच्छ पानी के सत से चलाई
ثُمَّ سَوّٰيهُ وَنَفَخَ ف۪يهِ مِنْ رُوحِه۪ وَجَعَلَ لَكُمُ السَّمْعَ وَالْاَبْصَارَ وَالْاَفْـِٔدَةَۜ قَل۪يلًا مَا تَشْكُرُونَ9
फिर उसे ठीक-ठीक किया और उसमें अपनी रूह (आत्मा) फूँकी। और तुम्हें कान और आँखें और दिल दिए। तुम आभारी थोड़े ही होते हो
وَقَالُٓوا ءَاِذَا ضَلَلْنَا فِي الْاَرْضِ ءَاِنَّا لَف۪ي خَلْقٍ جَد۪يدٍۜ بَلْ هُمْ بِلِقَٓاءِ رَبِّهِمْ كَافِرُونَ10
और उन्होंने कहा, "जब हम धरती में रल-मिल जाएँगे तो फिर क्या हम वास्तब में नवीन काय में जीवित होंगे?" नहीं, बल्कि उन्हें अपने रब से मिलने का इनकार है
قُلْ يَتَوَفّٰيكُمْ مَلَكُ الْمَوْتِ الَّذ۪ي وُكِّلَ بِكُمْ ثُمَّ اِلٰى رَبِّكُمْ تُرْجَعُونَ۟11
कहो, "मृत्यु का फ़रिश्ता जो तुमपर नियुक्त है, वह तुम्हें पूर्ण रूप से अपने क़ब्जे में ले लेता है। फिर तुम अपने रब की ओर वापस होंगे।"
وَلَوْ تَرٰٓى اِذِ الْمُجْرِمُونَ نَاكِسُوا رُؤُ۫سِهِمْ عِنْدَ رَبِّهِمْۜ رَبَّنَٓا اَبْصَرْنَا وَسَمِعْنَا فَارْجِعْنَا نَعْمَلْ صَالِحًا اِنَّا مُوقِنُونَ12
और यदि कहीं तुम देखते जब वे अपराधी अपने रब के सामने अपने सिर झुकाए होंगे कि "हमारे रब! हमने देख लिया और सुन लिया। अब हमें वापस भेज दे, ताकि हम अच्छे कर्म करें। निस्संदेह अब हमें विश्वास हो गया।"
وَلَوْ شِئْنَا لَاٰتَيْنَا كُلَّ نَفْسٍ هُدٰيهَا وَلٰكِنْ حَقَّ الْقَوْلُ مِنّ۪ي لَاَمْلَـَٔنَّ جَهَنَّمَ مِنَ الْجِنَّةِ وَالنَّاسِ اَجْمَع۪ينَ13
यदि हम चाहते तो प्रत्येक व्यक्ति को उसका अपना संमार्ग दिखा देते, तिन्तु मेरी ओर से बात सत्यापित हो चुकी है कि "मैं जहन्नम को जिन्नों और मनुष्यों, सबसे भरकर रहूँगा।"
فَذُوقُوا بِمَا نَس۪يتُمْ لِقَٓاءَ يَوْمِكُمْ هٰذَاۚ اِنَّا نَس۪ينَاكُمْ وَذُوقُوا عَذَابَ الْخُلْدِ بِمَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ14
अतः अब चखो मज़ा, इसका कि तुमने अपने इस दिन के मिलन को भुलाए रखा। तो हमने भी तुम्हें भुला दिया। शाश्वत यातना का रसास्वादन करो, उसके बदले में जो तुम करते रहे हो
اِنَّمَا يُؤْمِنُ بِاٰيَاتِنَا الَّذ۪ينَ اِذَا ذُكِّرُوا بِهَا خَرُّوا سُجَّدًا وَسَبَّحُوا بِحَمْدِ رَبِّهِمْ وَهُمْ لَا يَسْتَكْبِرُونَ15
हमारी आयतों पर जो बस वही लोग ईमान लाते है, जिन्हें उनके द्वारा जब याद दिलाया जाता है तो सजदे में गिर पड़ते है और अपने रब का गुणगान करते है और घमंड नहीं करते
تَتَجَافٰى جُنُوبُهُمْ عَنِ الْمَضَاجِعِ يَدْعُونَ رَبَّهُمْ خَوْفًا وَطَمَعًاۘ وَمِمَّا رَزَقْنَاهُمْ يُنْفِقُونَ16
उनके पहलू बिस्तरों से अलग रहते है कि वे अपने रब को भय और लालसा के साथ पुकारते है, और जो कुछ हमने उन्हें दिया है उसमें से ख़र्च करते है
فَلَا تَعْلَمُ نَفْسٌ مَٓا اُخْفِيَ لَهُمْ مِنْ قُرَّةِ اَعْيُنٍۚ جَزَٓاءً بِمَا كَانُوا يَعْمَلُونَ17
फिर कोई प्राणी नहीं जानता आँखों की जो ठंडक उसके लिए छिपा रखी गई है उसके बदले में देने के ध्येय से जो वे करते रहे होंगे
اَفَمَنْ كَانَ مُؤْمِنًا كَمَنْ كَانَ فَاسِقًاۜ لَا يَسْتَوُ۫نَ18
भला जो व्यक्ति ईमानवाला हो वह उस व्यक्ति जैसा हो सकता है जो अवज्ञाकारी हो? वे बराबर नहीं हो सकते
اَمَّا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ فَلَهُمْ جَنَّاتُ الْمَاْوٰىۘ نُزُلًا بِمَا كَانُوا يَعْمَلُونَ19
रहे वे लोग जा ईमान लाए और उन्हें अच्छे कर्म किए, उनके लिए जो कर्म वे करते रहे उसके बदले में आतिथ्य स्वरूप रहने के बाग़ है
وَاَمَّا الَّذ۪ينَ فَسَقُوا فَمَاْوٰيهُمُ النَّارُۜ كُلَّمَٓا اَرَادُٓوا اَنْ يَخْرُجُوا مِنْهَٓا اُع۪يدُوا ف۪يهَا وَق۪يلَ لَهُمْ ذُوقُوا عَذَابَ النَّارِ الَّذ۪ي كُنْتُمْ بِه۪ تُكَذِّبُونَ20
रहे वे लोग जिन्होंने सीमा का उल्लंघन किया, उनका ठिकाना आग है। जब कभी भी वे चाहेंगे कि उससे निकल जाएँ तो उसी में लौटा दिए जाएँगे और उनसे कहा जाएगा, "चखो उस आग की यातना का मज़ा, जिसे तुम झूठ समझते थे।"
وَلَنُذ۪يقَنَّهُمْ مِنَ الْعَذَابِ الْاَدْنٰى دُونَ الْعَذَابِ الْاَكْبَرِ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ21
हम बड़ी यातना से इतर उन्हें छोटी यातना का मज़ा चखाएँगे, कदाचित वे पलट आएँ
وَمَنْ اَظْلَمُ مِمَّنْ ذُكِّرَ بِاٰيَاتِ رَبِّه۪ ثُمَّ اَعْرَضَ عَنْهَاۜ اِنَّا مِنَ الْمُجْرِم۪ينَ مُنْتَقِمُونَ۟22
और उस व्यक्ति से बढकर अत्याचारी कौन होगा जिसे उसके रब की आयतों के द्वारा याद दिलाया जाए,फिर वह उनसे मुँह फेर ले? निश्चय ही हम अपराधियों से बदला लेकर रहेंगे
وَلَقَدْ اٰتَيْنَا مُوسَى الْكِتَابَ فَلَا تَكُنْ ف۪ي مِرْيَةٍ مِنْ لِقَٓائِه۪ وَجَعَلْنَاهُ هُدًى لِبَن۪ٓي اِسْرَٓاء۪يلَۚ23
हमने मूसा को किताब प्रदान की थी - अतः उसके मिलने के प्रति तुम किसी सन्देह में न रहना और हमने इसराईल की सन्तान के लिए उस (किताब) को मार्गदर्शन बनाया था
وَجَعَلْنَا مِنْهُمْ اَئِمَّةً يَهْدُونَ بِاَمْرِنَا لَمَّا صَبَرُواۜ وَكَانُوا بِاٰيَاتِنَا يُوقِنُونَ24
और जब वे जमे रहे और उन्हें हमारी आयतों पर विश्वास था, तो हमने उनमें ऐसे नायक बनाए जो हमारे आदेश से मार्ग दिखाते थे
اِنَّ رَبَّكَ هُوَ يَفْصِلُ بَيْنَهُمْ يَوْمَ الْقِيٰمَةِ ف۪يمَا كَانُوا ف۪يهِ يَخْتَلِفُونَ25
निश्चय ही तेरा रब ही क़ियामत के दिन उनके बीच उन बातों का फ़ैसला करेगा, जिनमें वे मतभेद करते रहे है
اَوَلَمْ يَهْدِ لَهُمْ كَمْ اَهْلَكْنَا مِنْ قَبْلِهِمْ مِنَ الْقُرُونِ يَمْشُونَ ف۪ي مَسَاكِنِهِمْۜ اِنَّ ف۪ي ذٰلِكَ لَاٰيَاتٍۜ اَفَلَا يَسْمَعُونَ26
क्या उनके लिए यह चीज़ भी मार्गदर्शक सिद्ध नहीं हुई कि उनसे पहले कितनी ही नस्लों को हम विनष्ट कर चुके है, जिनके रहने-बसने की जगहों में वे चलते-फिरते है? निस्संदेह इसमें बहुत-सी निशानियाँ है। फिर क्या वे सुनने नहीं?
اَوَلَمْ يَرَوْا اَنَّا نَسُوقُ الْمَٓاءَ اِلَى الْاَرْضِ الْجُرُزِ فَنُخْرِجُ بِه۪ زَرْعًا تَاْكُلُ مِنْهُ اَنْعَامُهُمْ وَاَنْفُسُهُمْۜ اَفَلَا يُبْصِرُونَ27
क्या उन्होंने देखा नहीं कि हम सूखी पड़ी भूमि की ओर पानी ले जाते है। फिर उससे खेती उगाते है, जिसमें से उनके चौपाए भी खाते है और वे स्वयं भी? तो क्या उन्हें सूझता नहीं?
وَيَقُولُونَ مَتٰى هٰذَا الْفَتْحُ اِنْ كُنْتُمْ صَادِق۪ينَ28
वे कहते है कि "यह फ़ैसला कब होगा, यदि तुम सच्चे हो?"
قُلْ يَوْمَ الْفَتْحِ لَا يَنْفَعُ الَّذ۪ينَ كَفَرُٓوا ا۪يمَانُهُمْ وَلَا هُمْ يُنْظَرُونَ29
कह दो कि "फ़ैसले के दिन इनकार करनेवालों का ईमान उनके लिए कुछ लाभदायक न होगा और न उन्हें ठील ही दी जाएगी।"
فَاَعْرِضْ عَنْهُمْ وَانْتَظِرْ اِنَّهُمْ مُنْتَظِرُونَ30
अच्छा, उन्हें उनके हाल पर छोड़ दो और प्रतीक्षा करो। वे भी परीक्षारत है
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
يَٓا اَيُّهَا النَّبِيُّ اتَّقِ اللّٰهَ وَلَا تُطِعِ الْكَافِر۪ينَ وَالْمُنَافِق۪ينَۜ اِنَّ اللّٰهَ كَانَ عَل۪يمًا حَك۪يمًاۙ1
ऐ नबी! अल्लाह का डर रखना और इनकार करनेवालों और कपटाचारियों का कहना न मानना। वास्तब में अल्लाह सर्वज्ञ, तत्वदर्शी है
وَاتَّبِعْ مَا يُوحٰٓى اِلَيْكَ مِنْ رَبِّكَۜ اِنَّ اللّٰهَ كَانَ بِمَا تَعْمَلُونَ خَب۪يرًاۙ2
और अनुकरण करना उस चीज़ का जो तुम्हारे रब की ओर से तुम्हें प्रकाशना की जा रही है। निश्चय ही अल्लाह उसकी ख़बर रखता है जो तुम करते हो
وَتَوَكَّلْ عَلَى اللّٰهِۜ وَكَفٰى بِاللّٰهِ وَك۪يلًا3
और अल्लाह पर भरोसा रखो। और अल्लाह भरोसे के लिए काफी है
مَا جَعَلَ اللّٰهُ لِرَجُلٍ مِنْ قَلْبَيْنِ ف۪ي جَوْفِه۪ۚ وَمَا جَعَلَ اَزْوَاجَكُمُ الّٰٓـ۪ٔي تُظَاهِرُونَ مِنْهُنَّ اُمَّهَاتِكُمْۚ وَمَا جَعَلَ اَدْعِيَٓاءَكُمْ اَبْنَٓاءَكُمْۜ ذٰلِكُمْ قَوْلُكُمْ بِاَفْوَاهِكُمْۜ وَاللّٰهُ يَقُولُ الْحَقَّ وَهُوَ يَهْدِي السَّب۪يلَ4
अल्लाह ने किसी व्यक्ति के सीने में दो दिल नहीं रखे। और न उसने तुम्हारी उन पत्ऩियों को जिनसे तुम ज़िहार कर बैठते हो, वास्तव में तुम्हारी माँ बनाया, और न उसने तुम्हारे मुँह बोले बेटों को तुम्हारे वास्तविक बेटे बनाए। ये तो तुम्हारे मुँह की बातें है। किन्तु अल्लाह सच्ची बात कहता है और वही मार्ग दिखाता है
اُدْعُوهُمْ لِاٰبَٓائِهِمْ هُوَ اَقْسَطُ عِنْدَ اللّٰهِۚ فَاِنْ لَمْ تَعْلَمُٓوا اٰبَٓاءَهُمْ فَاِخْوَانُكُمْ فِي الدّ۪ينِ وَمَوَال۪يكُمْۜ وَلَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ ف۪يمَٓا اَخْطَاْتُمْ بِه۪ۙ وَلٰكِنْ مَا تَعَمَّدَتْ قُلُوبُكُمْۜ وَكَانَ اللّٰهُ غَفُورًا رَح۪يمًا5
उन्हें उनके बापों का बेटा करकर पुकारो। अल्लाह के यहाँ यही अधिक न्यायसंगत बात है। और यदि तुम उनके बापों को न जानते हो, तो धर्म में वे तुम्हारे भाई तो है ही और तुम्हारे सहचर भी। इस सिलसिले में तुमसे जो ग़लती हुई हो उसमें तुमपर कोई गुनाह नहीं, किन्तु जिसका संकल्प तुम्हारे दिलों ने कर लिया, उसकी बात और है। वास्तव में अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है
اَلنَّبِيُّ اَوْلٰى بِالْمُؤْمِن۪ينَ مِنْ اَنْفُسِهِمْ وَاَزْوَاجُهُٓ اُمَّهَاتُهُمْۜ وَاُو۬لُوا الْاَرْحَامِ بَعْضُهُمْ اَوْلٰى بِبَعْضٍ ف۪ي كِتَابِ اللّٰهِ مِنَ الْمُؤْمِن۪ينَ وَالْمُهَاجِر۪ينَ اِلَّٓا اَنْ تَفْعَلُٓوا اِلٰٓى اَوْلِيَٓائِكُمْ مَعْرُوفًاۜ كَانَ ذٰلِكَ فِي الْكِتَابِ مَسْطُورًا6
नबी का हक़ ईमानवालों पर स्वयं उनके अपने प्राणों से बढ़कर है। और उसकी पत्नियों उनकी माएँ है। और अल्लाह के विधान के अनुसार सामान्य मोमिनों और मुहाजिरों की अपेक्षा नातेदार आपस में एक-दूसरे से अधिक निकट है। यह और बात है कि तुम अपने साथियों के साथ कोई भलाई करो। यह बात किताब में लिखी हुई है
وَاِذْ اَخَذْنَا مِنَ النَّبِيّ۪نَ م۪يثَاقَهُمْ وَمِنْكَ وَمِنْ نُوحٍ وَاِبْرٰه۪يمَ وَمُوسٰى وَع۪يسَى ابْنِ مَرْيَمَۖ وَاَخَذْنَا مِنْهُمْ م۪يثَاقًا غَل۪يظًاۙ7
और याद करो जब हमने नबियों से वचन लिया, तुमसे भी और नूह और इबराहीम और मूसा और मरयम के बेटे ईसा से भी। इन सबसे हमने ढृढ़ वचन लिया,
لِيَسْـَٔلَ الصَّادِق۪ينَ عَنْ صِدْقِهِمْۚ وَاَعَدَّ لِلْكَافِر۪ينَ عَذَابًا اَل۪يمًا۟8
ताकि वह सच्चे लोगों से उनकी सच्चाई के बारे में पूछे। और इनकार करनेवालों के लिए तो उसने दुखद यातना तैयार कर रखी है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا اذْكُرُوا نِعْمَةَ اللّٰهِ عَلَيْكُمْ اِذْ جَٓاءَتْكُمْ جُنُودٌ فَاَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ ر۪يحًا وَجُنُودًا لَمْ تَرَوْهَاۜ وَكَانَ اللّٰهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَص۪يرًاۚ9
ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह की उस अनुकम्पा को याद करो जो तुमपर हुई; जबकि सेनाएँ तुमपर चढ़ आई तो हमने उनपर एक हवा भेज दी और ऐसी सेनाएँ भी, जिनको तुमने देखा नहीं। और अल्लाह वह सब कुछ देखता है जो तुम करते हो
اِذْ جَٓاؤُ۫كُمْ مِنْ فَوْقِكُمْ وَمِنْ اَسْفَلَ مِنْكُمْ وَاِذْ زَاغَتِ الْاَبْصَارُ وَبَلَغَتِ الْقُلُوبُ الْحَنَاجِرَ وَتَظُنُّونَ بِاللّٰهِ الظُّنُونَا10
याद करो जब वे तुम्हारे ऊपर की ओर से और तुम्हारे नीचे की ओर से भी तुमपर चढ़ आए, और जब निगाहें टेढ़ी-तिरछी हो गई और उर (हृदय) कंठ को आ लगे। और तुम अल्लाह के बारे में तरह-तरह के गुमान करने लगे थे
هُنَالِكَ ابْتُلِيَ الْمُؤْمِنُونَ وَزُلْزِلُوا زِلْزَالًا شَد۪يدًا11
उस समय ईमानवाले आज़माए गए और पूरी तरह हिला दिए गए
وَاِذْ يَقُولُ الْمُنَافِقُونَ وَالَّذ۪ينَ ف۪ي قُلُوبِهِمْ مَرَضٌ مَا وَعَدَنَا اللّٰهُ وَرَسُولُهُٓ اِلَّا غُرُورًا12
और जब कपटाचारी और वे लोग जिनके दिलों में रोग है कहने लगे, "अल्लाह और उसके रसूल ने हमसे जो वादा किया था वह तो धोखा मात्र था।"
وَاِذْ قَالَتْ طَٓائِفَةٌ مِنْهُمْ يَٓا اَهْلَ يَثْرِبَ لَا مُقَامَ لَكُمْ فَارْجِعُواۚ وَيَسْتَاْذِنُ فَر۪يقٌ مِنْهُمُ النَّبِيَّ يَقُولُونَ اِنَّ بُيُوتَنَا عَوْرَةٌ وَمَا هِيَ بِعَوْرَةٍۜ اِنْ يُر۪يدُونَ اِلَّا فِرَارًا13
और जबकि उनमें से एक गिरोह ने कहा, "ऐ यसरिबवालो, तुम्हारे लिए ठहरने का कोई मौक़ा नहीं। अतः लौट चलो।" और उनका एक गिरोह नबी से यह कहकर (वापस जाने की) अनुमति चाह रहा था कि "हमारे घर असुरक्षित है।" यद्यपि वे असुरक्षित न थे। वे तो बस भागना चाहते थे
وَلَوْ دُخِلَتْ عَلَيْهِمْ مِنْ اَقْطَارِهَا ثُمَّ سُئِلُوا الْفِتْنَةَ لَاٰتَوْهَا وَمَا تَلَبَّثُوا بِهَٓا اِلَّا يَس۪يرًا14
और यदि उसके चतुर्दिक से उनपर हमला हो जाता, फिर उस समय उनसे उपद्रव के लिए कहा जाता, तो वे ऐसा कर डालते और इसमें विलम्ब थोड़े ही करते!
وَلَقَدْ كَانُوا عَاهَدُوا اللّٰهَ مِنْ قَبْلُ لَا يُوَلُّونَ الْاَدْبَارَۜ وَكَانَ عَهْدُ اللّٰهِ مَسْؤُ۫لًا15
यद्यपि वे इससे पहले अल्लाह को वचन दे चुके थे कि वे पीठ न फेरेंगे, और अल्लाह से की गई प्रतिज्ञा के विषय में तो पूछा जाना ही है
قُلْ لَنْ يَنْفَعَكُمُ الْفِرَارُ اِنْ فَرَرْتُمْ مِنَ الْمَوْتِ اَوِ الْقَتْلِ وَاِذًا لَا تُمَتَّعُونَ اِلَّا قَل۪يلًا16
कह दो, "यदि तुम मृत्यु और मारे जाने से भागो भी तो यह भागना तुम्हारे लिए कदापि लाभप्रद न होगा। और इस हालत में भी तुम सुख थोड़े ही प्राप्त कर सकोगे।"
قُلْ مَنْ ذَا الَّذ۪ي يَعْصِمُكُمْ مِنَ اللّٰهِ اِنْ اَرَادَ بِكُمْ سُٓوءًا اَوْ اَرَادَ بِكُمْ رَحْمَةًۜ وَلَا يَجِدُونَ لَهُمْ مِنْ دُونِ اللّٰهِ وَلِيًّا وَلَا نَص۪يرًا17
कहो, "कहो है जो तुम्हें अल्लाह से बचा सकता है, यदि वह तुम्हारी कोई बुराई चाहे या वह तुम्हारे प्रति दयालुता का इरादा करे (तो कौन है जो उसकी दयालुता को रोक सके)?" वे अल्लाह के अल्लाह के अलावा न अपना कोई निकटवर्ती समर्थक पाएँगे और न (दूर का) सहायक
قَدْ يَعْلَمُ اللّٰهُ الْمُعَوِّق۪ينَ مِنْكُمْ وَالْقَٓائِل۪ينَ لِاِخْوَانِهِمْ هَلُمَّ اِلَيْنَاۚ وَلَا يَاْتُونَ الْبَاْسَ اِلَّا قَل۪يلًاۙ18
अल्लाह तुममें से उन लोगों को भली-भाँति जानता है जो (युद्ध से) रोकते है और अपने भाइयों से कहते है, "हमारे पास आ जाओ।" और वे लड़ाई में थोड़े ही आते है, (क्योंकि वे)
اَشِحَّةً عَلَيْكُمْۚ فَاِذَا جَٓاءَ الْخَوْفُ رَاَيْتَهُمْ يَنْظُرُونَ اِلَيْكَ تَدُورُ اَعْيُنُهُمْ كَالَّذ۪ي يُغْشٰى عَلَيْهِ مِنَ الْمَوْتِۚ فَاِذَا ذَهَبَ الْخَوْفُ سَلَقُوكُمْ بِاَلْسِنَةٍ حِدَادٍ اَشِحَّةً عَلَى الْخَيْرِۜ اُو۬لٰٓئِكَ لَمْ يُؤْمِنُوا فَاَحْبَطَ اللّٰهُ اَعْمَالَهُمْۜ وَكَانَ ذٰلِكَ عَلَى اللّٰهِ يَس۪يرًا19
तुम्हारे साथ कृपणता से काम लेते है। अतः जब भय का समय आ जाता है, तो तुम उन्हें देखते हो कि वे तुम्हारी ओर इस प्रकार ताक रहे कि उनकी आँखें चक्कर खा रही है, जैसे किसी व्यक्ति पर मौत की बेहोशी छा रही हो। किन्तु जब भय जाता रहता है तो वे माल के लोभ में तेज़ ज़बाने तुमपर चलाते है। ऐसे लोग ईमान लाए ही नहीं। अतः अल्लाह ने उनके कर्म उनकी जान को लागू कर दिए। और यह अल्लाह के लिए बहुत सरल है
يَحْسَبُونَ الْاَحْزَابَ لَمْ يَذْهَبُواۚ وَاِنْ يَاْتِ الْاَحْزَابُ يَوَدُّوا لَوْ اَنَّهُمْ بَادُونَ فِي الْاَعْرَابِ يَسْـَٔلُونَ عَنْ اَنْبَٓائِكُمْۜ وَلَوْ كَانُوا ف۪يكُمْ مَا قَاتَلُٓوا اِلَّا قَل۪يلًا۟20
वे समझ रहे है कि (शत्रु के) सैन्य दल अभी गए नहीं हैं, और यदि वे गिरोह फिर आ जाएँ तो वे चाहेंगे कि किसी प्रकार बाहर (मरुस्थल में) बद्दु ओं के साथ हो रहें और वहीं से तुम्हारे बारे में समाचार पूछते रहे। और यदि वे तुम्हारे साथ होते भी तो लड़ाई में हिस्सा थोड़े ही लेते
لَقَدْ كَانَ لَكُمْ ف۪ي رَسُولِ اللّٰهِ اُسْوَةٌ حَسَنَةٌ لِمَنْ كَانَ يَرْجُوا اللّٰهَ وَالْيَوْمَ الْاٰخِرَ وَذَكَرَ اللّٰهَ كَث۪يرًاۜ21
निस्संदेह तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल में एक उत्तम आदर्श है अर्थात उस व्यक्ति के लिए जो अल्लाह और अन्तिम दिन की आशा रखता हो और अल्लाह को अधिक याद करे
وَلَمَّا رَاَ الْمُؤْمِنُونَ الْاَحْزَابَۙ قَالُوا هٰذَا مَا وَعَدَنَا اللّٰهُ وَرَسُولُهُ وَصَدَقَ اللّٰهُ وَرَسُولُهُۘ وَمَا زَادَهُمْ اِلَّٓا ا۪يمَانًا وَتَسْل۪يمًاۜ22
और जब ईमानवालों ने सैन्य दलों को देखा तो वे पुकार उठे, "यह तो वही चीज़ है, जिसका अल्लाह और उसके रसूल ने हमसे वादा किया था। और अल्लाह और उसके रसूल ने सच कहा था।" इस चीज़ ने उनके ईमान और आज्ञाकारिता ही को बढ़ाया
مِنَ الْمُؤْمِن۪ينَ رِجَالٌ صَدَقُوا مَا عَاهَدُوا اللّٰهَ عَلَيْهِۚ فَمِنْهُمْ مَنْ قَضٰى نَحْبَهُ وَمِنْهُمْ مَنْ يَنْتَظِرُۘ وَمَا بَدَّلُوا تَبْد۪يلًاۙ23
ईमानवालों के रूप में ऐसे पुरुष मौजूद है कि जो प्रतिज्ञा उन्होंने अल्लाह से की थी उसे उन्होंने सच्चा कर दिखाया। फिर उनमें से कुछ तो अपना प्रण पूरा कर चुके और उनमें से कुछ प्रतीक्षा में है। और उन्होंने अपनी बात तनिक भी नहीं बदली
لِيَجْزِيَ اللّٰهُ الصَّادِق۪ينَ بِصِدْقِهِمْ وَيُعَذِّبَ الْمُنَافِق۪ينَ اِنْ شَٓاءَ اَوْ يَتُوبَ عَلَيْهِمْۜ اِنَّ اللّٰهَ كَانَ غَفُورًا رَح۪يمًاۚ24
ताकि इसके परिणामस्वरूप अल्लाह सच्चों को उनकी सच्चाई का बदला दे और कपटाचारियों को चाहे तो यातना दे या उनकी तौबा क़बूल करे। निश्चय ही अल्लाह बड़ी क्षमाशील, दयावान है
وَرَدَّ اللّٰهُ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا بِغَيْظِهِمْ لَمْ يَنَالُوا خَيْرًاۜ وَكَفَى اللّٰهُ الْمُؤْمِن۪ينَ الْقِتَالَۜ وَكَانَ اللّٰهُ قَوِيًّا عَز۪يزًاۚ25
अल्लाह ने इनकार करनेवालों को उनके अपने क्रोध के साथ फेर दिया। वे कोई भलाई प्राप्त न कर सके। अल्लाह ने मोमिनों को युद्ध करने से बचा लिया। अल्लाह तो है ही बड़ा शक्तिवान, प्रभुत्वशाली
وَاَنْزَلَ الَّذ۪ينَ ظَاهَرُوهُمْ مِنْ اَهْلِ الْكِتَابِ مِنْ صَيَاص۪يهِمْ وَقَذَفَ ف۪ي قُلُوبِهِمُ الرُّعْبَ فَر۪يقًا تَقْتُلُونَ وَتَاْسِرُونَ فَر۪يقًاۚ26
और किताबवालों में सो जिन लोगों ने उसकी सहायता की थी, उन्हें उनकी गढ़ियों से उतार लाया। और उनके दिलों में धाक बिठा दी कि तुम एक गिरोह को जान से मारने लगे और एक गिरोह को बन्दी बनाने लगे
وَاَوْرَثَكُمْ اَرْضَهُمْ وَدِيَارَهُمْ وَاَمْوَالَهُمْ وَاَرْضًا لَمْ تَطَؤُ۫هَاۜ وَكَانَ اللّٰهُ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَد۪يرًا۟27
और उसने तुम्हें उनके भू-भाग और उनके घरों और उनके मालों का वारिस बना दिया और उस भू-भाग का भी जिसे तुमने पददलित नहीं किया। वास्तव में अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है
يَٓا اَيُّهَا النَّبِيُّ قُلْ لِاَزْوَاجِكَ اِنْ كُنْتُنَّ تُرِدْنَ الْحَيٰوةَ الدُّنْيَا وَز۪ينَتَهَا فَتَعَالَيْنَ اُمَتِّعْكُنَّ وَاُسَرِّحْكُنَّ سَرَاحًا جَم۪يلًا28
ऐ नबी! अपनी पत्नि यों से कह दो कि "यदि तुम सांसारिक जीवन और उसकी शोभा चाहती हो तो आओ, मैं तुम्हें कुछ दे-दिलाकर भली रीति से विदा कर दूँ
وَاِنْ كُنْتُنَّ تُرِدْنَ اللّٰهَ وَرَسُولَهُ وَالدَّارَ الْاٰخِرَةَ فَاِنَّ اللّٰهَ اَعَدَّ لِلْمُحْسِنَاتِ مِنْكُنَّ اَجْرًا عَظ۪يمًا29
"किन्तु यदि तुम अल्लाह और उसके रसूल और आख़िरत के घर को चाहती हो तो निश्चय ही अल्लाह ने तुममे से उत्तमकार स्त्रियों के लिए बड़ा प्रतिदान रख छोड़ा है।"
يَا نِسَٓاءَ النَّبِيِّ مَنْ يَاْتِ مِنْكُنَّ بِفَاحِشَةٍ مُبَيِّنَةٍ يُضَاعَفْ لَهَا الْعَذَابُ ضِعْفَيْنِۜ وَكَانَ ذٰلِكَ عَلَى اللّٰهِ يَس۪يرًا30
ऐ नबी की स्त्रियों! तुममें से जो कोई प्रत्यक्ष अनुचित कर्म करे तो उसके लिए दोहरी यातना होगी। और यह अल्लाह के लिए बहुत सरल है