22. जुज़ - कुरान पढ़ें

22. जुज़
33 · अल-अहज़ाब
وَمَنْ يَقْنُتْ مِنْكُنَّ لِلّٰهِ وَرَسُولِه۪ وَتَعْمَلْ صَالِحًا نُؤْتِهَٓا اَجْرَهَا مَرَّتَيْنِۙ وَاَعْتَدْنَا لَهَا رِزْقًا كَر۪يمًا31
किन्तु तुममें से जो अल्लाह और उसके रसूल के प्रति निष्ठापूर्वक आज्ञाकारिता की नीति अपनाए और अच्छा कर्म करे, उसे हम दोहरा प्रतिदान प्रदान करेंगे और उसके लिए हमने सम्मानपूर्ण आजीविका तैयार कर रखी है
يَا نِسَٓاءَ النَّبِيِّ لَسْتُنَّ كَاَحَدٍ مِنَ النِّسَٓاءِ اِنِ اتَّقَيْتُنَّ فَلَا تَخْضَعْنَ بِالْقَوْلِ فَيَطْمَعَ الَّذ۪ي ف۪ي قَلْبِه۪ مَرَضٌ وَقُلْنَ قَوْلًا مَعْرُوفًاۚ32
ऐ नबी की स्त्रियों! तुम सामान्य स्त्रियों में से किसी की तरह नहीं हो, यदि तुम अल्लाह का डर रखो। अतः तुम्हारी बातों में लोच न हो कि वह व्यक्ति जिसके दिल में रोग है, वह लालच में पड़ जाए। तुम सामान्य रूप से बात करो
وَقَرْنَ ف۪ي بُيُوتِكُنَّ وَلَا تَبَرَّجْنَ تَبَرُّجَ الْجَاهِلِيَّةِ الْاُو۫لٰى وَاَقِمْنَ الصَّلٰوةَ وَاٰت۪ينَ الزَّكٰوةَ وَاَطِعْنَ اللّٰهَ وَرَسُولَهُۜ اِنَّمَا يُر۪يدُ اللّٰهُ لِيُذْهِبَ عَنْكُمُ الرِّجْسَ اَهْلَ الْبَيْتِ وَيُطَهِّرَكُمْ تَطْه۪يرًاۚ33
अपने घरों में टिककर रहो और विगत अज्ञानकाल की-सी सज-धज न दिखाती फिरना। नमाज़ का आयोजन करो और ज़कात दो। और अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो। अल्लाह तो बस यही चाहता है कि ऐ नबी के घरवालो, तुमसे गन्दगी को दूर रखे और तुम्हें तरह पाक-साफ़ रखे
وَاذْكُرْنَ مَا يُتْلٰى ف۪ي بُيُوتِكُنَّ مِنْ اٰيَاتِ اللّٰهِ وَالْحِكْمَةِۜ اِنَّ اللّٰهَ كَانَ لَط۪يفًا خَب۪يرًا۟34
तुम्हारे घरों में अल्लाह की जो आयतें और तत्वदर्शिता की बातें सुनाई जाती है उनकी चर्चा करती रहो। निश्चय ही अल्लाह अत्यन्त सूक्ष्मदर्शी, खबर रखनेवाला है
اِنَّ الْمُسْلِم۪ينَ وَالْمُسْلِمَاتِ وَالْمُؤْمِن۪ينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ وَالْقَانِت۪ينَ وَالْقَانِتَاتِ وَالصَّادِق۪ينَ وَالصَّادِقَاتِ وَالصَّابِر۪ينَ وَالصَّابِرَاتِ وَالْخَاشِع۪ينَ وَالْخَاشِعَاتِ وَالْمُتَصَدِّق۪ينَ وَالْمُتَصَدِّقَاتِ وَالصَّٓائِم۪ينَ وَالصَّٓائِمَاتِ وَالْحَافِظ۪ينَ فُرُوجَهُمْ وَالْحَافِظَاتِ وَالذَّاكِر۪ينَ اللّٰهَ كَث۪يرًا وَالذَّاكِرَاتِ اَعَدَّ اللّٰهُ لَهُمْ مَغْفِرَةً وَاَجْرًا عَظ۪يمًا35
मुस्लिम पुरुष और मुस्लिम स्त्रियाँ, ईमानवाले पुरुष और ईमानवाली स्त्रियाँ, निष्ठा्पूर्वक आज्ञापालन करनेवाले पुरुष और निष्ठापूर्वक आज्ञापालन करनेवाली स्त्रियाँ, सत्यवादी पुरुष और सत्यवादी स्त्रियाँ, धैर्यवान पुरुष और धैर्य रखनेवाली स्त्रियाँ, विनम्रता दिखानेवाले पुरुष और विनम्रता दिखानेवाली स्त्रियाँ, सदक़ा (दान) देनेवाले पुरुष और सदक़ा देनेवाली स्त्रियाँ, रोज़ा रखनेवाले पुरुष और रोज़ा रखनेवाली स्त्रियाँ, अपने गुप्तांगों की रक्षा करनेवाले पुरुष और रक्षा करनेवाली स्त्रियाँ और अल्लाह को अधिक याद करनेवाले पुरुष और याद करनेवाली स्त्रियाँ - इनके लिए अल्लाह ने क्षमा और बड़ा प्रतिदान तैयार कर रखा है
وَمَا كَانَ لِمُؤْمِنٍ وَلَا مُؤْمِنَةٍ اِذَا قَضَى اللّٰهُ وَرَسُولُهُٓ اَمْرًا اَنْ يَكُونَ لَهُمُ الْخِيَرَةُ مِنْ اَمْرِهِمْۜ وَمَنْ يَعْصِ اللّٰهَ وَرَسُولَهُ فَقَدْ ضَلَّ ضَلَالًا مُب۪ينًا36
न किसी ईमानवाले पुरुष और न किसी ईमानवाली स्त्री को यह अधिकार है कि जब अल्लाह और उसका रसूल किसी मामले का फ़ैसला कर दें, तो फिर उन्हें अपने मामले में कोई अधिकार शेष रहे। जो कोई अल्लाह और उसके रसूल की अवज्ञा करे तो वह खुली गुमराही में पड़ गया
وَاِذْ تَقُولُ لِلَّذ۪ٓي اَنْعَمَ اللّٰهُ عَلَيْهِ وَاَنْعَمْتَ عَلَيْهِ اَمْسِكْ عَلَيْكَ زَوْجَكَ وَاتَّقِ اللّٰهَ وَتُخْف۪ي ف۪ي نَفْسِكَ مَا اللّٰهُ مُبْد۪يهِ وَتَخْشَى النَّاسَۚ وَاللّٰهُ اَحَقُّ اَنْ تَخْشٰيهُۜ فَلَمَّا قَضٰى زَيْدٌ مِنْهَا وَطَرًا زَوَّجْنَاكَهَا لِكَيْ لَا يَكُونَ عَلَى الْمُؤْمِن۪ينَ حَرَجٌ ف۪ٓي اَزْوَاجِ اَدْعِيَٓائِهِمْ اِذَا قَضَوْا مِنْهُنَّ وَطَرًاۜ وَكَانَ اَمْرُ اللّٰهِ مَفْعُولًا37
याद करो (ऐ नबी), जबकि तुम उस व्यक्ति से कह रहे थे जिसपर अल्लाह ने अनुकम्पा की, और तुमने भी जिसपर अनुकम्पा की कि "अपनी पत्नी को अपने पास रोक रखो और अल्लाह का डर रखो, और तुम अपने जी में उस बात को छिपा रहे हो जिसको अल्लाह प्रकट करनेवाला है। तुम लोगों से डरते हो, जबकि अल्लाह इसका ज़्यादा हक़ रखता है कि तुम उससे डरो।" अतः जब ज़ैद उससे अपनी ज़रूरत पूरी कर चुका तो हमने उसका तुमसे विवाह कर दिया, ताकि ईमानवालों पर अपने मुँह बोले बेटों की पत्नियों के मामले में कोई तंगी न रहे जबकि वे उनसे अपनी ज़रूरत पूरी कर लें। अल्लाह का फ़ैसला तो पूरा होकर ही रहता है
مَا كَانَ عَلَى النَّبِيِّ مِنْ حَرَجٍ ف۪يمَا فَرَضَ اللّٰهُ لَهُۜ سُنَّةَ اللّٰهِ فِي الَّذ۪ينَ خَلَوْا مِنْ قَبْلُۜ وَكَانَ اَمْرُ اللّٰهِ قَدَرًا مَقْدُورًاۙ38
नबी पर उस काम में कोई तंगी नहीं जो अल्लाह ने उसके लिए ठहराया हो। यही अल्लाह का दस्तूर उन लोगों के मामले में भी रहा है जो पहले गुज़र चुके है - और अल्लाह का काम तो जँचा-तुला होता है। -
اَلَّذ۪ينَ يُبَلِّغُونَ رِسَالَاتِ اللّٰهِ وَيَخْشَوْنَهُ وَلَا يَخْشَوْنَ اَحَدًا اِلَّا اللّٰهَۜ وَكَفٰى بِاللّٰهِ حَس۪يبًا39
जो अल्लाह के सन्देश पहुँचाते थे और उसी से डरते थे और अल्लाह के सिवा किसी से नहीं डरते थे। और हिसाब लेने के लिए अल्लाह काफ़ी है। -
مَا كَانَ مُحَمَّدٌ اَبَٓا اَحَدٍ مِنْ رِجَالِكُمْ وَلٰكِنْ رَسُولَ اللّٰهِ وَخَاتَمَ النَّبِيّ۪نَۜ وَكَانَ اللّٰهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَل۪يمًا۟40
मुहम्मद तुम्हारे पुरुषों में से किसी के बाप नहीं है, बल्कि वे अल्लाह के रसूल और नबियों के समापक है। अल्लाह को हर चीज़ का पूरा ज्ञान है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا اذْكُرُوا اللّٰهَ ذِكْرًا كَث۪يرًاۙ41
ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह को अधिक याद करो
وَسَبِّحُوهُ بُكْرَةً وَاَص۪يلًا42
और प्रातःकाल और सन्ध्या समय उसकी तसबीह करते रहो -
هُوَ الَّذ۪ي يُصَلّ۪ي عَلَيْكُمْ وَمَلٰٓئِكَتُهُ لِيُخْرِجَكُمْ مِنَ الظُّلُمَاتِ اِلَى النُّورِۜ وَكَانَ بِالْمُؤْمِن۪ينَ رَح۪يمًا43
वही है जो तुमपर रहमत भेजता है और उसके फ़रिश्ते भी (दुआएँ करते है) - ताकि वह तुम्हें अँधरों से प्रकाश की ओर निकाल लाए। वास्तव में, वह ईमानवालों पर बहुत दयालु है
تَحِيَّتُهُمْ يَوْمَ يَلْقَوْنَهُ سَلَامٌۚ وَاَعَدَّ لَهُمْ اَجْرًا كَر۪يمًا44
जिस दिन वे उससे मिलेंगे उनका अभिवादन होगा, सलाम और उनके लिए प्रतिष्ठामय प्रदान तैयार कर रखा है
يَٓا اَيُّهَا النَّبِيُّ اِنَّٓا اَرْسَلْنَاكَ شَاهِدًا وَمُبَشِّرًا وَنَذ۪يرًاۙ45
ऐ नबी! हमने तुमको साक्षी और शुभ सूचना देनेवाला और सचेल करनेवाला बनाकर भेजा है;
وَدَاعِيًا اِلَى اللّٰهِ بِاِذْنِه۪ وَسِرَاجًا مُن۪يرًا46
और अल्लाह की अनुज्ञा से उसकी ओर बुलानेवाला और प्रकाशमान प्रदीप बनाकर
وَبَشِّرِ الْمُؤْمِن۪ينَ بِاَنَّ لَهُمْ مِنَ اللّٰهِ فَضْلًا كَب۪يرًا47
ईमानवालों को शुभ सूचना दे दो कि उनके लिए अल्लाह को ओर से बहुत बड़ा उदार अनुग्रह है
وَلَا تُطِعِ الْكَافِر۪ينَ وَالْمُنَافِق۪ينَ وَدَعْ اَذٰيهُمْ وَتَوَكَّلْ عَلَى اللّٰهِۜ وَكَفٰى بِاللّٰهِ وَك۪يلًا48
और इनकार करनेवालों और कपटाचारियों के कहने में न आना। उनकी पहुँचाई हुई तकलीफ़ का ख़याल न करो। और अल्लाह पर भरोसा रखो। अल्लाह इसके लिए काफ़ी है कि अपने मामले में उसपर भरोसा किया जाए
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اِذَا نَكَحْتُمُ الْمُؤْمِنَاتِ ثُمَّ طَلَّقْتُمُوهُنَّ مِنْ قَبْلِ اَنْ تَمَسُّوهُنَّ فَمَا لَكُمْ عَلَيْهِنَّ مِنْ عِدَّةٍ تَعْتَدُّونَهَاۚ فَمَتِّعُوهُنَّ وَسَرِّحُوهُنَّ سَرَاحًا جَم۪يلًا49
ऐ ईमान लानेवालो! जब तुम ईमान लानेवाली स्त्रियों से विवाह करो और फिर उन्हें हाथ लगाने से पहले तलाक़ दे दो तो तुम्हारे लिए उनपर कोई इद्दत नहीं, जिसकी तुम गिनती करो। अतः उन्हें कुछ सामान दे दो और भली रीति से विदा कर दो
يَٓا اَيُّهَا النَّبِيُّ اِنَّٓا اَحْلَلْنَا لَكَ اَزْوَاجَكَ الّٰت۪ٓي اٰتَيْتَ اُجُورَهُنَّ وَمَا مَلَكَتْ يَم۪ينُكَ مِمَّٓا اَفَٓاءَ اللّٰهُ عَلَيْكَ وَبَنَاتِ عَمِّكَ وَبَنَاتِ عَمَّاتِكَ وَبَنَاتِ خَالِكَ وَبَنَاتِ خَالَاتِكَ الّٰت۪ي هَاجَرْنَ مَعَكَۘ وَامْرَاَةً مُؤْمِنَةً اِنْ وَهَبَتْ نَفْسَهَا لِلنَّبِيِّ اِنْ اَرَادَ النَّبِيُّ اَنْ يَسْتَنْكِحَهَاۗ خَالِصَةً لَكَ مِنْ دُونِ الْمُؤْمِن۪ينَۜ قَدْ عَلِمْنَا مَا فَرَضْنَا عَلَيْهِمْ ف۪ٓي اَزْوَاجِهِمْ وَمَا مَلَكَتْ اَيْمَانُهُمْ لِكَيْلَا يَكُونَ عَلَيْكَ حَرَجٌۜ وَكَانَ اللّٰهُ غَفُورًا رَح۪يمًا50
ऐ नबी! हमने तुम्हारे लिए तुम्हारी वे पत्नियों वैध कर दी है जिनके मह्रक तुम दे चुके हो, और उन स्त्रियों को भी जो तुम्हारी मिल्कियत में आई, जिन्हें अल्लाह ने ग़नीमत के रूप में तुम्हें दी और तुम्हारी चचा की बेटियाँ और तुम्हारी फूफियों की बेटियाँ और तुम्हारे मामुओं की बेटियाँ और तुम्हारी ख़ालाओं की बेटियाँ जिन्होंने तुम्हारे साथ हिजरत की है और वह ईमानवाली स्त्री जो अपने आपको नबी के लिए दे दे, यदि नबी उससे विवाह करना चाहे। ईमानवालों से हटकर यह केवल तुम्हारे ही लिए है, हमें मालूम है जो कुछ हमने उनकी पत्ऩियों और उनकी लौड़ियों के बारे में उनपर अनिवार्य किया है - ताकि तुमपर कोई तंगी न रहे। अल्लाह बहुत क्षमाशील, दयावान है
تُرْج۪ي مَنْ تَشَٓاءُ مِنْهُنَّ وَتُـْٔو۪ٓي اِلَيْكَ مَنْ تَشَٓاءُۜ وَمَنِ ابْتَغَيْتَ مِمَّنْ عَزَلْتَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكَۜ ذٰلِكَ اَدْنٰٓى اَنْ تَقَرَّ اَعْيُنُهُنَّ وَلَا يَحْزَنَّ وَيَرْضَيْنَ بِمَٓا اٰتَيْتَهُنَّ كُلُّهُنَّۜ وَاللّٰهُ يَعْلَمُ مَا ف۪ي قُلُوبِكُمْۜ وَكَانَ اللّٰهُ عَل۪يمًا حَل۪يمًا51
तुम उनमें से जिसे चाहो अपने से अलग रखो और जिसे चाहो अपने पास रखो, और जिनको तुमने अलग रखा हो, उनमें से किसी के इच्छुक हो तो इसमें तुमपर कोई दोष नहीं, इससे इस बात की अधिक सम्भावना है कि उनकी आँखें ठंड़ी रहें और वे शोकाकुल न हों और जो कुछ तुम उन्हें दो उसपर वे राज़ी रहें। अल्लाह जानता है जो कुछ तुम्हारे दिलों में है। अल्लाह सर्वज्ञ, बहुत सहनशील है
لَا يَحِلُّ لَكَ النِّسَٓاءُ مِنْ بَعْدُ وَلَٓا اَنْ تَبَدَّلَ بِهِنَّ مِنْ اَزْوَاجٍ وَلَوْ اَعْجَبَكَ حُسْنُهُنَّ اِلَّا مَا مَلَكَتْ يَم۪ينُكَۜ وَكَانَ اللّٰهُ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ رَق۪يبًا۟52
इसके पश्चात तुम्हारे लिए दूसरी स्त्रियाँ वैध नहीं और न यह कि तुम उनकी जगह दूसरी पत्नियों ले आओ, यद्यपि उनका सौन्दर्य तुम्हें कितना ही भाए। उनकी बात औऱ है जो तुम्हारी लौंडियाँ हो। वास्तव में अल्लाह की स्पष्ट हर चीज़ पर है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لَا تَدْخُلُوا بُيُوتَ النَّبِيِّ اِلَّٓا اَنْ يُؤْذَنَ لَكُمْ اِلٰى طَعَامٍ غَيْرَ نَاظِر۪ينَ اِنٰيهُۙ وَلٰكِنْ اِذَا دُع۪يتُمْ فَادْخُلُوا فَاِذَا طَعِمْتُمْ فَانْتَشِرُوا وَلَا مُسْتَاْنِس۪ينَ لِحَد۪يثٍۜ اِنَّ ذٰلِكُمْ كَانَ يُؤْذِي النَّبِيَّ فَيَسْتَحْي۪ مِنْكُمْۘ وَاللّٰهُ لَا يَسْتَحْي۪ مِنَ الْحَقِّۜ وَاِذَا سَاَلْتُمُوهُنَّ مَتَاعًا فَسْـَٔلُوهُنَّ مِنْ وَرَٓاءِ حِجَابٍۜ ذٰلِكُمْ اَطْهَرُ لِقُلُوبِكُمْ وَقُلُوبِهِنَّۜ وَمَا كَانَ لَكُمْ اَنْ تُؤْذُوا رَسُولَ اللّٰهِ وَلَٓا اَنْ تَنْكِحُٓوا اَزْوَاجَهُ مِنْ بَعْدِه۪ٓ اَبَدًاۜ اِنَّ ذٰلِكُمْ كَانَ عِنْدَ اللّٰهِ عَظ۪يمًا53
ऐ ईमान लानेवालो! नबी के घरों में प्रवेश न करो, सिवाय इसके कि कभी तुम्हें खाने पर आने की अनुमति दी जाए। वह भी इस तरह कि उसकी (खाना पकने की) तैयारी की प्रतिक्षा में न रहो। अलबत्ता जब तुम्हें बुलाया जाए तो अन्दर जाओ, और जब तुम खा चुको तो उठकर चले जाओ, बातों में लगे न रहो। निश्चय ही यह हरकत नबी को तकलीफ़ देती है। किन्तु उन्हें तुमसे लज्जा आती है। किन्तु अल्लाह सच्ची बात कहने से लज्जा नहीं करता। और जब तुम उनसे कुछ माँगों तो उनसे परदे के पीछे से माँगो। यह अधिक शुद्धता की बात है तुम्हारे दिलों के लिए और उनके दिलों के लिए भी। तुम्हारे लिए वैध नहीं कि तुम अल्लाह के रसूल को तकलीफ़ पहुँचाओ और न यह कि उसके बाद कभी उसकी पत्नियों से विवाह करो। निश्चय ही अल्लाह की दृष्टि में यह बड़ी गम्भीर बात है
اِنْ تُبْدُوا شَيْـًٔا اَوْ تُخْفُوهُ فَاِنَّ اللّٰهَ كَانَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَل۪يمًا54
तुम चाहे किसी चीज़ को व्यक्त करो या उसे छिपाओ, अल्लाह को तो हर चीज़ का ज्ञान है
لَا جُنَاحَ عَلَيْهِنَّ ف۪ٓي اٰبَٓائِهِنَّ وَلَٓا اَبْنَٓائِهِنَّ وَلَٓا اِخْوَانِهِنَّ وَلَٓا اَبْنَٓاءِ اِخْوَانِهِنَّ وَلَٓا اَبْنَٓاءِ اَخَوَاتِهِنَّ وَلَا نِسَٓائِهِنَّ وَلَا مَا مَلَكَتْ اَيْمَانُهُنَّۚ وَاتَّق۪ينَ اللّٰهَۜ اِنَّ اللّٰهَ كَانَ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ شَه۪يدًا55
न उनके लिए अपने बापों के सामने होने में कोई दोष है और न अपने बेटों, न अपने भाइयों, न अपने भतीजों, न अपने भांजो, न अपने मेल की स्त्रियों और न जिनपर उन्हें स्वामित्व का अधिकार प्राप्त हो उनके सामने होने में। अल्लाह का डर रखो, निश्चय ही अल्लाह हर चीज़ का साक्षी है
اِنَّ اللّٰهَ وَمَلٰٓئِكَتَهُ يُصَلُّونَ عَلَى النَّبِيِّۜ يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا صَلُّوا عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا تَسْل۪يمًا56
निस्संदेह अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर रहमत भेजते है। ऐ ईमान लानेवालो, तुम भी उसपर रहमत भेजो और ख़ूब सलाम भेजो
اِنَّ الَّذ۪ينَ يُؤْذُونَ اللّٰهَ وَرَسُولَهُ لَعَنَهُمُ اللّٰهُ فِي الدُّنْيَا وَالْاٰخِرَةِ وَاَعَدَّ لَهُمْ عَذَابًا مُه۪ينًا57
जो लोग अल्लाह और उसके रसूल को दुख पहुँचाते है, अल्लाह ने उनपर दुनिया और आख़िरत में लानत की है और उनके लिए अपमानजनक यातना तैयार कर रखी है
وَالَّذ۪ينَ يُؤْذُونَ الْمُؤْمِن۪ينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ بِغَيْرِ مَا اكْتَسَبُوا فَقَدِ احْتَمَلُوا بُهْتَانًا وَاِثْمًا مُب۪ينًا۟58
और जो लोग ईमानवाले पुरुषों और ईमानवाली स्त्रियों को, बिना इसके कि उन्होंने कुछ किया हो (आरोप लगाकर), दुख पहुँचाते है, उन्होंने तो बड़े मिथ्यारोपण और प्रत्यक्ष गुनाह का बोझ अपने ऊपर उठा लिया
يَٓا اَيُّهَا النَّبِيُّ قُلْ لِاَزْوَاجِكَ وَبَنَاتِكَ وَنِسَٓاءِ الْمُؤْمِن۪ينَ يُدْن۪ينَ عَلَيْهِنَّ مِنْ جَلَاب۪يبِهِنَّۜ ذٰلِكَ اَدْنٰٓى اَنْ يُعْرَفْنَ فَلَا يُؤْذَيْنَۜ وَكَانَ اللّٰهُ غَفُورًا رَح۪يمًا59
ऐ नबी! अपनी पत्नि यों और अपनी बेटियों और ईमानवाली स्त्रियों से कह दो कि वे अपने ऊपर अपनी चादरों का कुछ हिस्सा लटका लिया करें। इससे इस बात की अधिक सम्भावना है कि वे पहचान ली जाएँ और सताई न जाएँ। अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है
لَئِنْ لَمْ يَنْتَهِ الْمُنَافِقُونَ وَالَّذ۪ينَ ف۪ي قُلُوبِهِمْ مَرَضٌ وَالْمُرْجِفُونَ فِي الْمَد۪ينَةِ لَنُغْرِيَنَّكَ بِهِمْ ثُمَّ لَا يُجَاوِرُونَكَ ف۪يهَٓا اِلَّا قَل۪يلًاۚۛ60
यदि कपटाचारी और वे लोग जिनके दिलों में रोग है और मदीना में खलबली पैदा करनेवाली अफ़वाहें फैलाने से बाज़ न आएँ तो हम तुम्हें उनके विरुद्ध उभार खड़ा करेंगे। फिर वे उसमें तुम्हारे साथ थोड़ा ही रहने पाएँगे,
مَلْعُون۪ينَۚۛ اَيْنَ مَا ثُقِفُٓوا اُخِذُوا وَقُتِّلُوا تَقْت۪يلًا61
फिटकारे हुए होंगे। जहाँ कही पाए गए पकड़े जाएँगे और बुरी तरह जान से मारे जाएँगे
سُنَّةَ اللّٰهِ فِي الَّذ۪ينَ خَلَوْا مِنْ قَبْلُۚ وَلَنْ تَجِدَ لِسُنَّةِ اللّٰهِ تَبْد۪يلًا62
यही अल्लाह की रीति रही है उन लोगों के विषय में भी जो पहले गुज़र चुके हैं। और तुम अल्लाह की रीति में कदापि परिवर्तन न पाओगे
يَسْـَٔلُكَ النَّاسُ عَنِ السَّاعَةِۜ قُلْ اِنَّمَا عِلْمُهَا عِنْدَ اللّٰهِۜ وَمَا يُدْر۪يكَ لَعَلَّ السَّاعَةَ تَكُونُ قَر۪يبًا63
लोग तुमसे क़ियामत की घड़ी के बारे में पूछते है। कह दो, "उसका ज्ञान तो बस अल्लाह ही के पास है। तुम्हें क्या मालूम? कदाचित वह घड़ी निकट ही हो।"
اِنَّ اللّٰهَ لَعَنَ الْكَافِر۪ينَ وَاَعَدَّ لَهُمْ سَع۪يرًاۙ64
निश्चय ही अल्लाह ने इनकार करनेवालों पर लानत की है और उनके लिए भड़कती आग तैयार कर रखी है,
خَالِد۪ينَ ف۪يهَٓا اَبَدًاۚ لَا يَجِدُونَ وَلِيًّا وَلَا نَص۪يرًاۚ65
जिसमें वे सदैव रहेंगे। न वे कोई निकटवर्ती समर्थक पाएँगे और न (दूर का) सहायक
يَوْمَ تُقَلَّبُ وُجُوهُهُمْ فِي النَّارِ يَقُولُونَ يَا لَيْتَنَٓا اَطَعْنَا اللّٰهَ وَاَطَعْنَا الرَّسُولَا66
जिस दिन उनके चहेरे आग में उलटे-पलटे जाएँगे, वे कहेंगे, "क्या ही अच्छा होता कि हमने अल्लाह का आज्ञापालन किया होता और रसूल का आज्ञापालन किया होता!"
وَقَالُوا رَبَّنَٓا اِنَّٓا اَطَعْنَا سَادَتَنَا وَكُبَرَٓاءَنَا فَاَضَلُّونَا السَّب۪يلَا67
वे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! वास्तव में हमने अपने सरदारों और अपने बड़ो का आज्ञा का पालन किया और उन्होंने हमें मार्ग से भटका दिया।
رَبَّنَٓا اٰتِهِمْ ضِعْفَيْنِ مِنَ الْعَذَابِ وَالْعَنْهُمْ لَعْنًا كَب۪يرًا۟68
"ऐ हमारे रब! उन्हें दोहरी यातना दे और उनपर बड़ी लानत कर!"
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لَا تَكُونُوا كَالَّذ۪ينَ اٰذَوْا مُوسٰى فَبَرَّاَهُ اللّٰهُ مِمَّا قَالُواۜ وَكَانَ عِنْدَ اللّٰهِ وَج۪يهًا69
ऐ ईमान लानेवालो! उन लोगों की तरह न हो जाना जिन्होंने मूसा को दुख पहुँचाया, तो अल्लाह ने उससे जो कुछ उन्होंने कहा था उसे बरी कर दिया। वह अल्लाह के यहाँ बड़ा गरिमावान था
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا اتَّقُوا اللّٰهَ وَقُولُوا قَوْلًا سَد۪يدًاۙ70
ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह का डर रखो और बात कहो ठीक सधी हुई
يُصْلِحْ لَكُمْ اَعْمَالَكُمْ وَيَغْفِرْ لَكُمْ ذُنُوبَكُمْۜ وَمَنْ يُطِعِ اللّٰهَ وَرَسُولَهُ فَقَدْ فَازَ فَوْزًا عَظ۪يمًا71
वह तुम्हारे कर्मों को सँवार देगा और तुम्हारे गुनाहों को क्षमा कर देगा। और जो अल्लाह और उसके रसूल का आज्ञापालन करे, उसने बड़ी सफलता प्राप्त॥ कर ली है
اِنَّا عَرَضْنَا الْاَمَانَةَ عَلَى السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِ وَالْجِبَالِ فَاَبَيْنَ اَنْ يَحْمِلْنَهَا وَاَشْفَقْنَ مِنْهَا وَحَمَلَهَا الْاِنْسَانُۜ اِنَّهُ كَانَ ظَلُومًا جَهُولًاۙ72
हमने अमानत को आकाशों और धरती और पर्वतों के समक्ष प्रस्तुत किया, किन्तु उन्होंने उसके उठाने से इनकार कर दिया और उससे डर गए। लेकिन मनुष्य ने उसे उठा लिया। निश्चय ही वह बड़ी ज़ालिम, आवेश के वशीभूत हो जानेवाला है
لِيُعَذِّبَ اللّٰهُ الْمُنَافِق۪ينَ وَالْمُنَافِقَاتِ وَالْمُشْرِك۪ينَ وَالْمُشْرِكَاتِ وَيَتُوبَ اللّٰهُ عَلَى الْمُؤْمِن۪ينَ وَالْمُؤْمِنَاتِۜ وَكَانَ اللّٰهُ غَفُورًا رَح۪يمًا73
ताकि अल्लाह कपटाचारी पुरुषों और कपटाचारी स्त्रियों और बहुदेववादी पुरुषों और बहुदेववादी स्त्रियों को यातना दे, और ईमानवाले पुरुषों और ईमानवाली स्त्रियों पर अल्लाह कृपा-स्पष्ट करे। वास्तव में अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है
34 · सबा
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
اَلْحَمْدُ لِلّٰهِ الَّذ۪ي لَهُ مَا فِي السَّمٰوَاتِ وَمَا فِي الْاَرْضِ وَلَهُ الْحَمْدُ فِي الْاٰخِرَةِۜ وَهُوَ الْحَك۪يمُ الْخَب۪يرُ1
प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है जिसका वह सब कुछ है जो आकाशों और धरती में है। और आख़िरत में भी उसी के लिए प्रशंसा है। और वही तत्वदर्शी, ख़बर रखनेवाला है
يَعْلَمُ مَا يَلِجُ فِي الْاَرْضِ وَمَا يَخْرُجُ مِنْهَا وَمَا يَنْزِلُ مِنَ السَّمَٓاءِ وَمَا يَعْرُجُ ف۪يهَاۜ وَهُوَ الرَّح۪يمُ الْغَفُورُ2
वह जानता है जो कुछ धरती में प्रविष्ट होता है और जो कुथ उससे निकलता है और जो कुछ आकाश से उतरता है और जो कुछ उसमें चढ़ता है। और वही अत्यन्त दयावान, क्षमाशील है
وَقَالَ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا لَا تَاْت۪ينَا السَّاعَةُۜ قُلْ بَلٰى وَرَبّ۪ي لَتَاْتِيَنَّكُمْ عَالِمِ الْغَيْبِۚ لَا يَعْزُبُ عَنْهُ مِثْقَالُ ذَرَّةٍ فِي السَّمٰوَاتِ وَلَا فِي الْاَرْضِ وَلَٓا اَصْغَرُ مِنْ ذٰلِكَ وَلَٓا اَكْبَرُ اِلَّا ف۪ي كِتَابٍ مُب۪ينٍۙ3
जिन लोगों ने इनकार किया उनका कहना है कि "हमपर क़ियामत की घड़ी नहीं आएगी।" कह दो, "क्यों नहीं, मेरे परोक्ष ज्ञाता रब की क़सम! वह तो तुमपर आकर रहेगी - उससे कणभर भी कोई चीज़ न तो आकाशों में ओझल है और न धरती में, और न इससे छोटी कोई चीज़ और न बड़ी। किन्तु वह एक स्पष्ट किताब में अंकित है। -
لِيَجْزِيَ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِۜ اُو۬لٰٓئِكَ لَهُمْ مَغْفِرَةٌ وَرِزْقٌ كَر۪يمٌ4
"ताकि वह उन लोगों को बदला दे, जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए। वहीं है जिनके लिए क्षमा और प्रतिष्ठामय आजीविका है
وَالَّذ۪ينَ سَعَوْ ف۪ٓي اٰيَاتِنَا مُعَاجِز۪ينَ اُو۬لٰٓئِكَ لَهُمْ عَذَابٌ مِنْ رِجْزٍ اَل۪يمٌۗ5
"रहे वे लोग जिन्होंने हमारी आयतों को मात करने का प्रयास किया, वह है जिनके लिए बहुत ही बुरे प्रकार की दुखद यातना है।"
وَيَرَى الَّذ۪ينَ اُو۫تُوا الْعِلْمَ الَّذ۪ٓي اُنْزِلَ اِلَيْكَ مِنْ رَبِّكَ هُوَ الْحَقَّۙ وَيَهْد۪ٓي اِلٰى صِرَاطِ الْعَز۪يزِ الْحَم۪يدِ6
जिन लोगों को ज्ञान प्राप्त हुआ है वे स्वयं देखते है कि जो कुछ तुम्हारे रब की ओर से तुम्हारी ओर अवतरित हुआ है वही सत्य है, और वह उसका मार्ग दिखाता है जो प्रभुत्वशाली, प्रशंसा का अधिकारी है
وَقَالَ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا هَلْ نَدُلُّكُمْ عَلٰى رَجُلٍ يُنَبِّئُكُمْ اِذَا مُزِّقْتُمْ كُلَّ مُمَزَّقٍۙ اِنَّكُمْ لَف۪ي خَلْقٍ جَد۪يدٍۚ7
जिन लोगों ने इनकार किया वे कहते है कि "क्या हम तुम्हें एक ऐसा आदमी बताएँ जो तुम्हें ख़बर देता है कि जब तुम बिलकुल चूर्ण-विचूर्ण हो जाओगे तो तुम नवीन काय में जीवित होगे?"
اَفْتَرٰى عَلَى اللّٰهِ كَذِبًا اَمْ بِه۪ جِنَّةٌۜ بَلِ الَّذ۪ينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِالْاٰخِرَةِ فِي الْعَذَابِ وَالضَّلَالِ الْبَع۪يدِ8
क्या उसने अल्लाह पर झूठ घड़कर थोपा है, या उसे कुछ उन्माद है? नहीं, बल्कि जो लोग आख़िरत पर ईमान नहीं रखते वे यातना और परले दरजे की गुमराही में हैं
اَفَلَمْ يَرَوْا اِلٰى مَا بَيْنَ اَيْد۪يهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ مِنَ السَّمَٓاءِ وَالْاَرْضِۜ اِنْ نَشَاْ نَخْسِفْ بِهِمُ الْاَرْضَ اَوْ نُسْقِطْ عَلَيْهِمْ كِسَفًا مِنَ السَّمَٓاءِۜ اِنَّ ف۪ي ذٰلِكَ لَاٰيَةً لِكُلِّ عَبْدٍ مُن۪يبٍ۟9
क्या उन्होंने आकाश और धरती को नहीं देखा, जो उनके आगे भी है और उनके पीछे भी? यदि हम चाहें तो उन्हें धरती में धँसा दें या उनपर आकाश से कुछ टुकड़े गिरा दें। निश्चय ही इसमें एक निशानी है हर उस बन्दे के लिए जो रुजू करनेवाला हो
وَلَقَدْ اٰتَيْنَا دَاوُ۫دَ مِنَّا فَضْلًاۜ يَا جِبَالُ اَوِّب۪ي مَعَهُ وَالطَّيْرَۚ وَاَلَنَّا لَهُ الْحَد۪يدَۙ10
हमने दाऊद को अपनी ओर से श्रेष्ठ ता प्रदान की, "ऐ पर्वतों! उसके साथ तसबीह को प्रतिध्वनित करो, और पक्षियों तुम भी!" और हमने उसके लिए लोहे को नर्म कर दिया
اَنِ اعْمَلْ سَابِغَاتٍ وَقَدِّرْ فِي السَّرْدِ وَاعْمَلُوا صَالِحًاۜ اِنّ۪ي بِمَا تَعْمَلُونَ بَص۪يرٌ11
कि "पूरी कवचें बना और कड़ियों को ठीक अंदाज़ें से जोड।" - और तुम अच्छा कर्म करो। निस्संदेह जो कुछ तुम करते हो उसे मैं देखता हूँ
وَلِسُلَيْمٰنَ الرّ۪يحَ غُدُوُّهَا شَهْرٌ وَرَوَاحُهَا شَهْرٌۚ وَاَسَلْنَا لَهُ عَيْنَ الْقِطْرِۜ وَمِنَ الْجِنِّ مَنْ يَعْمَلُ بَيْنَ يَدَيْهِ بِاِذْنِ رَبِّه۪ۜ وَمَنْ يَزِغْ مِنْهُمْ عَنْ اَمْرِنَا نُذِقْهُ مِنْ عَذَابِ السَّع۪يرِ12
और सुलैमान के लिए वायु को वशीभुत कर दिया था। प्रातः समय उसका चलना एक महीने की राह तक और सायंकाल को उसका चलना एक महीने की राह तक - और हमने उसके लिए पिघले हुए ताँबे का स्रोत बहा दिया - और जिन्नों में से भी कुछ को (उसके वशीभूत कर दिया था,) जो अपने रब की अनुज्ञा से उसके आगे काम करते थे। (हमारा आदेशा था,) "उनमें से जो हमारे हुक्म से फिरेगा उसे हम भडकती आग का मज़ा चखाएँगे।"
يَعْمَلُونَ لَهُ مَا يَشَٓاءُ مِنْ مَحَار۪يبَ وَتَمَاث۪يلَ وَجِفَانٍ كَالْجَوَابِ وَقُدُورٍ رَاسِيَاتٍۜ اِعْمَلُٓوا اٰلَ دَاوُ۫دَ شُكْرًاۜ وَقَل۪يلٌ مِنْ عِبَادِيَ الشَّكُورُ13
वे उसके लिए बनाते, जो कुछ वह चाहता - बड़े-बड़े भवन, प्रतिमाएँ, बड़े हौज़ जैसे थाल और जमी रहनेवाली देगें - "ऐ दाऊद के लोगों! कर्म करो, कृतज्ञता दिखाने रूप में। मेरे बन्दों में कृतज्ञ थोड़े ही हैं।"
فَلَمَّا قَضَيْنَا عَلَيْهِ الْمَوْتَ مَا دَلَّهُمْ عَلٰى مَوْتِه۪ٓ اِلَّا دَٓابَّةُ الْاَرْضِ تَاْكُلُ مِنْسَاَتَهُۚ فَلَمَّا خَرَّ تَبَيَّنَتِ الْجِنُّ اَنْ لَوْ كَانُوا يَعْلَمُونَ الْغَيْبَ مَا لَبِثُوا فِي الْعَذَابِ الْمُه۪ينِ14
फिर जब हमने उसके लिए मौत का फ़ैसला लागू किया तो फिर उन जिन्नों को उसकी मौत का पता बस भूमि के उस कीड़े ने दिया जो उसकी लाठी को खा रहा था। फिर जब वह गिर पड़ा, तब जिन्नों पर प्रकट हुआ कि यदि वे परोक्ष के जाननेवाले होते तो इस अपमानजनक यातना में पड़े न रहते
لَقَدْ كَانَ لِسَبَاٍ ف۪ي مَسْكَنِهِمْ اٰيَةٌۚ جَنَّتَانِ عَنْ يَم۪ينٍ وَشِمَالٍۜ كُلُوا مِنْ رِزْقِ رَبِّكُمْ وَاشْكُرُوا لَهُۜ بَلْدَةٌ طَيِّبَةٌ وَرَبٌّ غَفُورٌ15
सबा के लिए उनके निवास-स्थान ही में एक निशानी थी - दाएँ और बाएँ दो बाग, "खाओ अपने रब की रोज़ी, और उसके प्रति आभार प्रकट करो। भूमि भी अच्छी-सी और रब भी क्षमाशील।"
فَاَعْرَضُوا فَاَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ سَيْلَ الْعَرِمِ وَبَدَّلْنَاهُمْ بِجَنَّتَيْهِمْ جَنَّتَيْنِ ذَوَاتَيْ اُكُلٍ خَمْطٍ وَاَثْلٍ وَشَيْءٍ مِنْ سِدْرٍ قَل۪يلٍ16
किन्तु वे ध्यान में न लाए तो हमने उनपर बँध-तोड़ बाढ़ भेज दी और उनके दोनों बाग़ों के बदले में उन्हें दो दूसरे बाग़ दिए, जिनमें कड़वे-कसैले फल और झाड़ थे, और कुछ थोड़ी-सी झड़-बेरियाँ
ذٰلِكَ جَزَيْنَاهُمْ بِمَا كَفَرُواۜ وَهَلْ نُجَاز۪ٓي اِلَّا الْكَفُورَ17
यह बदला हमने उन्हें इसलिए दिया कि उन्होंने कृतध्नता दिखाई। ऐसा बदला तो हम कृतध्न लोगों को ही देते है
وَجَعَلْنَا بَيْنَهُمْ وَبَيْنَ الْقُرَى الَّت۪ي بَارَكْنَا ف۪يهَا قُرًى ظَاهِرَةً وَقَدَّرْنَا ف۪يهَا السَّيْرَۜ س۪يرُوا ف۪يهَا لَيَالِيَ وَاَيَّامًا اٰمِن۪ينَ18
और हमने उनके और उन बस्तियों के बीच जिनमें हमने बरकत रखी थी प्रत्यक्ष बस्तियाँ बसाई और उनमें सफ़र की मंज़िलें ख़ास अंदाज़े पर रखीं, "उनमें रात-दिन निश्चिन्त होकर चलो फिरो!"
فَقَالُوا رَبَّنَا بَاعِدْ بَيْنَ اَسْفَارِنَا وَظَلَمُٓوا اَنْفُسَهُمْ فَجَعَلْنَاهُمْ اَحَاد۪يثَ وَمَزَّقْنَاهُمْ كُلَّ مُمَزَّقٍۜ اِنَّ ف۪ي ذٰلِكَ لَاٰيَاتٍ لِكُلِّ صَبَّارٍ شَكُورٍ19
किन्तु उन्होंने कहा, "ऐ हमारे रब! हमारी यात्राओं में दूरी कर दे।" उन्होंने स्वयं अपने ही ऊपर ज़ुल्म किया। अन्ततः हम उन्हें (अतीत की) कहानियाँ बनाकर रहे, औऱ उन्हें बिल्कुल छिन्न-भिन्न कर डाला। निश्चय ही इसमें निशानियाँ है प्रत्येक बड़े धैर्यवान, कृतज्ञ के लिए
وَلَقَدْ صَدَّقَ عَلَيْهِمْ اِبْل۪يسُ ظَنَّهُ فَاتَّبَعُوهُ اِلَّا فَر۪يقًا مِنَ الْمُؤْمِن۪ينَ20
इबलीस ने उनके विषय में अपना गुमान सत्य पाया और ईमानवालो के एक गिरोह के सिवा उन्होंने उसी का अनुसरण किया
وَمَا كَانَ لَهُ عَلَيْهِمْ مِنْ سُلْطَانٍ اِلَّا لِنَعْلَمَ مَنْ يُؤْمِنُ بِالْاٰخِرَةِ مِمَّنْ هُوَ مِنْهَا ف۪ي شَكٍّۜ وَرَبُّكَ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ حَف۪يظٌ۟21
यद्यपि उसको उनपर कोई ज़ोर और अधिकार प्राप्त न था, किन्तु यह इसलिए कि हम उन लोगों को जो आख़िरत पर ईमान रखते है उन लोगों से अलग जान ले जो उसकी ओर से किसी सन्देह में पड़े हुए है। तुम्हारा रब हर चीज़ का अभिरक्षक है
قُلِ ادْعُوا الَّذ۪ينَ زَعَمْتُمْ مِنْ دُونِ اللّٰهِۚ لَا يَمْلِكُونَ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ فِي السَّمٰوَاتِ وَلَا فِي الْاَرْضِ وَمَا لَهُمْ ف۪يهِمَا مِنْ شِرْكٍ وَمَا لَهُ مِنْهُمْ مِنْ ظَه۪يرٍ22
कह दो, "अल्लाह को छोड़कर जिनका तुम्हें (उपास्य होने का) दावा है, उन्हें पुकार कर देखो। वे न अल्लाह में कणभर चीज़ के मालिक है और न धरती में और न उन दोनों में उनका कोई साझी है और न उनमें से कोई उसका सहायक है।"
وَلَا تَنْفَعُ الشَّفَاعَةُ عِنْدَهُٓ اِلَّا لِمَنْ اَذِنَ لَهُۜ حَتّٰٓى اِذَا فُزِّعَ عَنْ قُلُوبِهِمْ قَالُوا مَاذَاۙ قَالَ رَبُّكُمْۜ قَالُوا الْحَقَّۚ وَهُوَ الْعَلِيُّ الْكَب۪يرُ23
और उसके यहाँ कोई सिफ़ारिश काम नहीं आएगी, किन्तु उसी की जिसे उसने (सिफ़ारिश करने की) अनुमति दी हो। यहाँ तक कि जब उनके दिलों से घबराहट दूर हो जाएगी, तो वे कहेंगे, "तुम्हारे रब ने क्या कहा?" वे कहेंगे, "सर्वथा सत्य। और वह अत्यन्त उच्च, महान है।"
قُلْ مَنْ يَرْزُقُكُمْ مِنَ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ قُلِ اللّٰهُۙ وَاِنَّٓا اَوْ اِيَّاكُمْ لَعَلٰى هُدًى اَوْ ف۪ي ضَلَالٍ مُب۪ينٍ24
कहो, "कौन तुम्हें आकाशों और धरती में रोज़ी देता है?" कहो, "अल्लाह!" अब अवश्य ही हम है या तुम ही हो मार्ग पर, या खुली गुमराही में
قُلْ لَا تُسْـَٔلُونَ عَمَّٓا اَجْرَمْنَا وَلَا نُسْـَٔلُ عَمَّا تَعْمَلُونَ25
कहो, "जो अपराध हमने किए, उसकी पूछ तुमसे न होगी और न उसकी पूछ हमसे होगी जो तुम कर रहे हो।"
قُلْ يَجْمَعُ بَيْنَنَا رَبُّنَا ثُمَّ يَفْتَحُ بَيْنَنَا بِالْحَقِّۜ وَهُوَ الْفَتَّاحُ الْعَل۪يمُ26
कह दो, "हमारा रब हम सबको इकट्ठा करेगा। फिर हमारे बीच ठीक-ठीक फ़ैसला कर देगा। वही ख़ूब फ़ैसला करनेवाला, अत्यन्त ज्ञानवान है।"
قُلْ اَرُونِيَ الَّذ۪ينَ اَلْحَقْتُمْ بِه۪ شُرَكَٓاءَ كَلَّاۜ بَلْ هُوَ اللّٰهُ الْعَز۪يزُ الْحَك۪يمُ27
कहो, "मुझे उनको दिखाओ तो, जिनको तुमने साझीदार बनाकर उसके साथ जोड रखा है। कुछ नहीं, बल्कि बही अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है।"
وَمَٓا اَرْسَلْنَاكَ اِلَّا كَٓافَّةً لِلنَّاسِ بَش۪يرًا وَنَذ۪يرًا وَلٰكِنَّ اَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ28
हमने तो तुम्हें सारे ही मनुष्यों को शुभ-सूचना देनेवाला और सावधान करनेवाला बनाकर भेजा, किन्तु अधिकतर लोग जानते नहीं
وَيَقُولُونَ مَتٰى هٰذَا الْوَعْدُ اِنْ كُنْتُمْ صَادِق۪ينَ29
वे कहते है, "यह वादा कब पूरा होगा, यदि तुम सच्चे हो?"
قُلْ لَكُمْ م۪يعَادُ يَوْمٍ لَا تَسْتَاْخِرُونَ عَنْهُ سَاعَةً وَلَا تَسْتَقْدِمُونَ۟30
कह दो, "तुम्हारे लिए एक विशेष दिन की अवधि नियत है, जिससे न एक घड़ी भर पीछे हटोगे और न आगे बढ़ोगे।"
وَقَالَ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا لَنْ نُؤْمِنَ بِهٰذَا الْقُرْاٰنِ وَلَا بِالَّذ۪ي بَيْنَ يَدَيْهِۜ وَلَوْ تَرٰٓى اِذِ الظَّالِمُونَ مَوْقُوفُونَ عِنْدَ رَبِّهِمْۚ يَرْجِعُ بَعْضُهُمْ اِلٰى بَعْضٍۨ الْقَوْلَۚ يَقُولُ الَّذ۪ينَ اسْتُضْعِفُوا لِلَّذ۪ينَ اسْتَكْبَرُوا لَوْلَٓا اَنْتُمْ لَكُنَّا مُؤْمِن۪ينَ31
जिन लोगों ने इनकार किया वे कहते है, "हम इस क़ुरआन को कदापि न मानेंगे और न उसको जो इसके आगे है।" और यदि तुम देख पाते जब ज़ालिम अपने रब के सामने खड़े कर दिए जाएँगे। वे आपस में एक-दूसरे पर इल्ज़ाम डाल रहे होंगे। जो लोग कमज़ोर समझे गए वे उन लोगों से जो बड़े बनते थे कहेंगे, "यदि तुम न होते तो हम अवश्य ही ईमानवाले होते।"
قَالَ الَّذ۪ينَ اسْتَكْبَرُوا لِلَّذ۪ينَ اسْتُضْعِفُٓوا اَنَحْنُ صَدَدْنَاكُمْ عَنِ الْهُدٰى بَعْدَ اِذْ جَٓاءَكُمْ بَلْ كُنْتُمْ مُجْرِم۪ينَ32
वे लोग जो बड़े बनते थे उन लोगों से जो कमज़ोर समझे गए थे, कहेंगे, "क्या हमने तुम्हे उस मार्गदर्शन से रोका था, वह तुम्हारे पास आया था? नहीं, बल्कि तुम स्वयं ही अपराधी हो।"
وَقَالَ الَّذ۪ينَ اسْتُضْعِفُوا لِلَّذ۪ينَ اسْتَكْبَرُوا بَلْ مَكْرُ الَّيْلِ وَالنَّهَارِ اِذْ تَاْمُرُونَنَٓا اَنْ نَكْفُرَ بِاللّٰهِ وَنَجْعَلَ لَهُٓ اَنْدَادًاۜ وَاَسَرُّوا النَّدَامَةَ لَمَّا رَاَوُا الْعَذَابَۜ وَجَعَلْنَا الْاَغْلَالَ ف۪ٓي اَعْنَاقِ الَّذ۪ينَ كَفَرُواۜ هَلْ يُجْزَوْنَ اِلَّا مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ33
वे लोग कमज़ोर समझे गए थे बड़े बननेवालों से कहेंगे, "नहीं, बल्कि रात-दिन की मक्कारी थी जब तुम हमसे कहते थे कि हम अल्लाह के साथ कुफ़्र करें और दूसरों को उसका समकक्ष ठहराएँ।" जब वे यातना देखेंगे तो मन ही मन पछताएँगे और हम उन लोगों की गरदनों में जिन्होंने कुफ़्र की नीति अपनाई, तौक़ डाल देंगे। वे वही तो बदले में पाएँगे, जो वे करते रहे थे?
وَمَٓا اَرْسَلْنَا ف۪ي قَرْيَةٍ مِنْ نَذ۪يرٍ اِلَّا قَالَ مُتْرَفُوهَٓاۙ اِنَّا بِمَٓا اُرْسِلْتُمْ بِه۪ كَافِرُونَ34
हमने जिस बस्ती में भी कोई सचेतकर्ता भेजा तो वहाँ के सम्पन्न लोगों ने यही कहा कि "जो कुछ देकर तुम्हें भेजा गया है, हम तो उसको नहीं मानते।"
وَقَالُوا نَحْنُ اَكْثَرُ اَمْوَالًا وَاَوْلَادًاۙ وَمَا نَحْنُ بِمُعَذَّب۪ينَ35
उन्होंने यह भी कहा कि "हम तो धन और संतान में तुमसे बढ़कर है और हम यातनाग्रस्त होनेवाले नहीं।"
قُلْ اِنَّ رَبّ۪ي يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَنْ يَشَٓاءُ وَيَقْدِرُ وَلٰكِنَّ اَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ۟36
कहो, "निस्संदेह मेरा रब जिसके लिए चाहता है रोज़ी कुशादा कर देता है और जिसे चाहता है नपी-तुली देता है। किन्तु अधिकांश लोग जानते नहीं।"
وَمَٓا اَمْوَالُكُمْ وَلَٓا اَوْلَادُكُمْ بِالَّت۪ي تُقَرِّبُكُمْ عِنْدَنَا زُلْفٰٓى اِلَّا مَنْ اٰمَنَ وَعَمِلَ صَالِحًاۘ فَاُو۬لٰٓئِكَ لَهُمْ جَزَٓاءُ الضِّعْفِ بِمَا عَمِلُوا وَهُمْ فِي الْغُرُفَاتِ اٰمِنُونَ37
वह चीज़ न तुम्हारे धन है और न तुम्हारी सन्तान, जो तुम्हें हमसे निकट कर दे। अलबता, जो कोई ईमान लाया और उसने अच्छा कर्म किया, तो ऐसे ही लोग है जिनके लिए उसका कई गुना बदला है, जो उन्होंने किया। और वे ऊपरी मंजिल के कक्षों में निश्चिन्तता-पूर्वक रहेंगे
وَالَّذ۪ينَ يَسْعَوْنَ ف۪ٓي اٰيَاتِنَا مُعَاجِز۪ينَ اُو۬لٰٓئِكَ فِي الْعَذَابِ مُحْضَرُونَ38
रहे वे लोग जो हमारी आयतों को मात करने के लिए प्रयासरत है, वे लाकर यातनाग्रस्त किए जाएँगे
قُلْ اِنَّ رَبّ۪ي يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَنْ يَشَٓاءُ مِنْ عِبَادِه۪ وَيَقْدِرُ لَهُۜ وَمَٓا اَنْفَقْتُمْ مِنْ شَيْءٍ فَهُوَ يُخْلِفُهُۚ وَهُوَ خَيْرُ الرَّازِق۪ينَ39
कह दो, "मेरा रब ही है जो अपने बन्दों में से जिसके लिए चाहता है रोज़ी कुशादा कर देता है और जिसके लिए चाहता है नपी-तुली कर देता है। और जो कुछ भी तुमने ख़र्च किया, उसकी जगह वह तुम्हें और देगा। वह सबसे अच्छा रोज़ी देनेवाला है।"
وَيَوْمَ يَحْشُرُهُمْ جَم۪يعًا ثُمَّ يَقُولُ لِلْمَلٰٓئِكَةِ اَهٰٓؤُ۬لَٓاءِ اِيَّاكُمْ كَانُوا يَعْبُدُونَ40
याद करो जिस दिन वह उन सबको इकट्ठा करेगा, फिर फ़रिश्तों से कहेगा, "क्या तुम्ही को ये पूजते रहे है?"
قَالُوا سُبْحَانَكَ اَنْتَ وَلِيُّنَا مِنْ دُونِهِمْۚ بَلْ كَانُوا يَعْبُدُونَ الْجِنَّۚ اَكْثَرُهُمْ بِهِمْ مُؤْمِنُونَ41
वे कहेंगे, "महान है तू, हमारा निकटता का मधुर सम्बन्ध तो तुझी से है, उनसे नहीं; बल्कि बात यह है कि वे जिन्नों को पूजते थे। उनमें से अधिकतर उन्हीं पर ईमान रखते थे।"
فَالْيَوْمَ لَا يَمْلِكُ بَعْضُكُمْ لِبَعْضٍ نَفْعًا وَلَا ضَرًّاۜ وَنَقُولُ لِلَّذ۪ينَ ظَلَمُوا ذُوقُوا عَذَابَ النَّارِ الَّت۪ي كُنْتُمْ بِهَا تُكَذِّبُونَ42
"अतः आज न तो तुम परस्पर एक-दूसरे के लाभ का अधिकार रखते हो और न हानि का।" और हम उन ज़ालिमों से कहेंगे, "अब उस आग की यातना का मज़ा चखो, जिसे तुम झुठलाते रहे हो।"
وَاِذَا تُتْلٰى عَلَيْهِمْ اٰيَاتُنَا بَيِّنَاتٍ قَالُوا مَا هٰذَٓا اِلَّا رَجُلٌ يُر۪يدُ اَنْ يَصُدَّكُمْ عَمَّا كَانَ يَعْبُدُ اٰبَٓاؤُ۬كُمْۚ وَقَالُوا مَا هٰذَٓا اِلَّٓا اِفْكٌ مُفْتَرًىۜ وَقَالَ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا لِلْحَقِّ لَمَّا جَٓاءَهُمْۙ اِنْ هٰذَٓا اِلَّا سِحْرٌ مُب۪ينٌ43
उन्हें जब हमारी स्पष्ट़ आयतें पढ़कर सुनाई जाती है तो वे कहते है, "यह तो बस ऐसा व्यक्ति है जो चाहता है कि तुम्हें उनसे रोक दें जिनको तुम्हारे बाप-दादा पूजते रहे है।" और कहते है, "यह तो एक घड़ा हुआ झूठ है।" जिन लोगों ने इनकार किया उन्होंने सत्य के विषय में, जबकि वह उनके पास आया, कह दिया, "यह तो बस एक प्रत्यक्ष जादू है।"
وَمَٓا اٰتَيْنَاهُمْ مِنْ كُتُبٍ يَدْرُسُونَهَا وَمَٓا اَرْسَلْنَٓا اِلَيْهِمْ قَبْلَكَ مِنْ نَذ۪يرٍۜ44
हमने उन्हें न तो किताबे दी थीं, जिनको वे पढ़ते हों और न तुमसे पहले उनकी ओर कोई सावधान करनेवाला ही भेजा था
وَكَذَّبَ الَّذ۪ينَ مِنْ قَبْلِهِمْۙ وَمَا بَلَغُوا مِعْشَارَ مَٓا اٰتَيْنَاهُمْ فَكَذَّبُوا رُسُل۪ي۠ فَكَيْفَ كَانَ نَك۪يرِ۟45
और झूठलाया उन लोगों ने भी जो उनसे पहले थे। और जो कुछ हमने उन्हें दिया था ये तो उसके दसवें भाग को भी नहीं पहुँचे है। तो उन्होंने मेरे रसूलों को झुठलाया। तो फिर कैसी रही मेरी यातना!
قُلْ اِنَّمَٓا اَعِظُكُمْ بِوَاحِدَةٍۚ اَنْ تَقُومُوا لِلّٰهِ مَثْنٰى وَفُرَادٰى ثُمَّ تَتَفَكَّرُوا۠ مَا بِصَاحِبِكُمْ مِنْ جِنَّةٍۜ اِنْ هُوَ اِلَّا نَذ۪يرٌ لَكُمْ بَيْنَ يَدَيْ عَذَابٍ شَد۪يدٍ46
कहो, "मैं तुम्हें बस एक बात की नसीहत करता हूँ कि अल्लाह के लिए दो-दो औऱ एक-एक करके उठ रखे हो; फिर विचार करो। तुम्हारे साथी को कोई उन्माद नहीं है। वह तो एक कठोर यातना से पहले तुम्हें सचेत करनेवाला ही है।"
قُلْ مَا سَاَلْتُكُمْ مِنْ اَجْرٍ فَهُوَ لَكُمْۜ اِنْ اَجْرِيَ اِلَّا عَلَى اللّٰهِۚ وَهُوَ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ شَه۪يدٌ47
कहो, "मैं तुमसे कोई बदला नहीं माँगता वह तुम्हें ही मुबारक हो। मेरा बदला तो बस अल्लाह के ज़िम्मे है और वह हर चीज का साक्षी है।"
قُلْ اِنَّ رَبّ۪ي يَقْذِفُ بِالْحَقِّۚ عَلَّامُ الْغُيُوبِ48
कहो, "निश्चय ही मेरा रब सत्य को असत्य पर ग़ालिब करता है। वह परोक्ष की बातें भली-भाँथि जानता है।"
قُلْ جَٓاءَ الْحَقُّ وَمَا يُبْدِئُ الْبَاطِلُ وَمَا يُع۪يدُ49
कह दो, "सत्य आ गया (असत्य मिट गया) और असत्य न तो आरम्भ करता है और न पुनरावृत्ति ही।"
قُلْ اِنْ ضَلَلْتُ فَاِنَّمَٓا اَضِلُّ عَلٰى نَفْس۪يۚ وَاِنِ اهْتَدَيْتُ فَبِمَا يُوح۪ٓي اِلَيَّ رَبّ۪يۜ اِنَّهُ سَم۪يعٌ قَر۪يبٌ50
कहो, "यदि मैं पथभ्रष्ट॥ हो जाऊँ तो पथभ्रष्ट होकर मैं अपना ही बुरा करूँगा, और यदि मैं सीधे मार्ग पर हूँ, तो इसका कारण वह प्रकाशना है जो मेरा रब मेरी ओर करता है। निस्संदेह वह सब कुछ सुनता है, निकट है।"
وَلَوْ تَرٰٓى اِذْ فَزِعُوا فَلَا فَوْتَ وَاُخِذُوا مِنْ مَكَانٍ قَر۪يبٍۙ51
और यदि तुम देख लेते जब वे घबराए हुए होंगे; फिर बचकर भाग न सकेंगे और निकट स्थान ही से पकड़ लिए जाएँगे
وَقَالُٓوا اٰمَنَّا بِه۪ۚ وَاَنّٰى لَهُمُ التَّنَاوُشُ مِنْ مَكَانٍ بَع۪يدٍۚ52
और कहेंगे, "हम उसपर ईमान ले आए।" हालाँकि उनके लिए कहाँ सम्भव है कि इतने दूरस्थ स्थान से उसको पास सकें
وَقَدْ كَفَرُوا بِه۪ مِنْ قَبْلُۚ وَيَقْذِفُونَ بِالْغَيْبِ مِنْ مَكَانٍ بَع۪يدٍ53
इससे पहले तो उन्होंने उसका इनकार किया और दूरस्थ स्थान से बिन देखे तीर-तूक्के चलाते रहे
وَح۪يلَ بَيْنَهُمْ وَبَيْنَ مَا يَشْتَهُونَ كَمَا فُعِلَ بِاَشْيَاعِهِمْ مِنْ قَبْلُۜ اِنَّهُمْ كَانُوا ف۪ي شَكٍّ مُر۪يبٍ54
उनके और उनकी चाहतों के बीच रोक लगा दी जाएगी; जिस प्रकार इससे पहले उनके सहमार्गी लोगों के साथ मामला किया गया। निश्चय ही वे डाँवाडोल कर देनेवाले संदेह में पड़े रहे हैं
35 · फ़ातिर
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
اَلْحَمْدُ لِلّٰهِ فَاطِرِ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِ جَاعِلِ الْمَلٰٓئِكَةِ رُسُلًا اُو۬ل۪ٓي اَجْنِحَةٍ مَثْنٰى وَثُلٰثَ وَرُبَاعَۜ يَز۪يدُ فِي الْخَلْقِ مَا يَشَٓاءُۜ اِنَّ اللّٰهَ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَد۪يرٌ1
सब प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जो आकाशों और धरती का पैदा करनेवाला है। दो-दो, तीन-तीन और चार-चार फ़रिश्तों को बाज़ुओंवालों सन्देशवाहक बनाकर नियुक्त करता है। वह संरचना में जैसी चाहता है, अभिवृद्धि करता है। निश्चय ही अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है
مَا يَفْتَحِ اللّٰهُ لِلنَّاسِ مِنْ رَحْمَةٍ فَلَا مُمْسِكَ لَهَاۚ وَمَا يُمْسِكْۙ فَلَا مُرْسِلَ لَهُ مِنْ بَعْدِه۪ۜ وَهُوَ الْعَز۪يزُ الْحَك۪يمُ2
अल्लाह जो दयालुता लोगों के लिए खोल दे उसे कोई रोकनेवाला नहीं और जिसे वह रोक ले तो उसके बाद उसे कोई जारी करनेवाला भी नहीं। वह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
يَٓا اَيُّهَا النَّاسُ اذْكُرُوا نِعْمَتَ اللّٰهِ عَلَيْكُمْۜ هَلْ مِنْ خَالِقٍ غَيْرُ اللّٰهِ يَرْزُقُكُمْ مِنَ السَّمَٓاءِ وَالْاَرْضِۜ لَٓا اِلٰهَ اِلَّا هُوَۘ فَاَنّٰى تُؤْفَكُونَ3
ऐ लोगो! अल्लाह की तुमपर जो अनुकम्पा है, उसे याद करो। क्या अल्लाह के सिवा कोई और पैदा करनेवाला है, जो तुम्हें आकाश और धरती से रोज़ी देता हो? उसके सिवा कोई पूज्य-प्रभु नहीं। तो तुम कहाँ से उलटे भटके चले जा रहे हो?
وَاِنْ يُكَذِّبُوكَ فَقَدْ كُذِّبَتْ رُسُلٌ مِنْ قَبْلِكَۜ وَاِلَى اللّٰهِ تُرْجَعُ الْاُمُورُ4
और यदि वे तुम्हें झुठलाते तो तुमसे पहले भी कितने ही रसूल झुठलाए जा चुके है। सारे मामले अल्लाह ही की ओर पलटते हैं
يَٓا اَيُّهَا النَّاسُ اِنَّ وَعْدَ اللّٰهِ حَقٌّ فَلَا تَغُرَّنَّكُمُ الْحَيٰوةُ الدُّنْيَا۠ وَلَا يَغُرَّنَّكُمْ بِاللّٰهِ الْغَرُورُ5
ऐ लोगों! निश्चय ही अल्लाह का वादा सच्चा है। अतः सांसारिक जीवन तुम्हें धोखे में न डाले और न वह धोखेबाज़ अल्लाह के विषय में तुम्हें धोखा दे
اِنَّ الشَّيْطَانَ لَكُمْ عَدُوٌّ فَاتَّخِذُوهُ عَدُوًّاۜ اِنَّمَا يَدْعُوا حِزْبَهُ لِيَكُونُوا مِنْ اَصْحَابِ السَّع۪يرِۜ6
निश्चय ही शैतान तुम्हारा शत्रु है। अतः तुम उसे शत्रु ही समझो। वह तो अपने गिरोह को केवल इसी लिए बुला रहा है कि वे दहकती आगवालों में सम्मिलित हो जाएँ
اَلَّذ۪ينَ كَفَرُوا لَهُمْ عَذَابٌ شَد۪يدٌۜ وَالَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَهُمْ مَغْفِرَةٌ وَاَجْرٌ كَب۪يرٌ۟7
वे लोग है कि जिन्होंने इनकार किया उनके लिए कठोर यातना है। किन्तु जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए उनके लिए क्षमा और बड़ा प्रतिदान है
اَفَمَنْ زُيِّنَ لَهُ سُٓوءُ عَمَلِه۪ فَرَاٰهُ حَسَنًاۜ فَاِنَّ اللّٰهَ يُضِلُّ مَنْ يَشَٓاءُ وَيَهْد۪ي مَنْ يَشَٓاءُۘ فَلَا تَذْهَبْ نَفْسُكَ عَلَيْهِمْ حَسَرَاتٍۜ اِنَّ اللّٰهَ عَل۪يمٌ بِمَا يَصْنَعُونَ8
फिर क्या वह व्यक्ति जिसके लिए उसका बुरा कर्म सुहाना बना दिया गया हो और वह उसे अच्छा दिख रहा हो (तो क्या वह बुराई को छोड़ेगा)? निश्चय ही अल्लाह जिसे चाहता है मार्ग से वंचित रखता है और जिसे चाहता है सीधा मार्ग दिखाता है। अतः उनपर अफ़सोस करते-करते तुम्हारी जान न जाती रहे। अल्लाह भली-भाँति जानता है जो कुछ वे रच रहे है
وَاللّٰهُ الَّذ۪ٓي اَرْسَلَ الرِّيَاحَ فَتُث۪يرُ سَحَابًا فَسُقْنَاهُ اِلٰى بَلَدٍ مَيِّتٍ فَاَحْيَيْنَا بِهِ الْاَرْضَ بَعْدَ مَوْتِهَاۜ كَذٰلِكَ النُّشُورُ9
अल्लाह ही तो है जिसने हवाएँ चलाई फिर वह बादलों को उभारती है, फिर हम उसे किसी शुष्क और निर्जीव भूभाग की ओर ले गए, और उसके द्वारा हमने धरती को उसके मुर्दा हो जाने के पश्चात जीवित कर दिया। इसी प्रकार (लोगों का नए सिरे से) जीवित होकर उठना भी है
مَنْ كَانَ يُر۪يدُ الْعِزَّةَ فَلِلّٰهِ الْعِزَّةُ جَم۪يعًاۜ اِلَيْهِ يَصْعَدُ الْكَلِمُ الطَّيِّبُ وَالْعَمَلُ الصَّالِحُ يَرْفَعُهُۜ وَالَّذ۪ينَ يَمْكُرُونَ السَّيِّـَٔاتِ لَهُمْ عَذَابٌ شَد۪يدٌۜ وَمَكْرُ اُو۬لٰٓئِكَ هُوَ يَبُورُ10
जो कोई प्रभुत्व चाहता हो तो प्रभुत्व तो सारा का सारा अल्लाह के लिए है। उसी की ओर अच्छा-पवित्र बोल चढ़ता है और अच्छा कर्म उसे ऊँचा उठाता है। रहे वे लोग जो बुरी चालें चलते है, उनके लिए कठोर यातना है और उनकी चालबाज़ी मटियामेट होकर रहेगी
وَاللّٰهُ خَلَقَكُمْ مِنْ تُرَابٍ ثُمَّ مِنْ نُطْفَةٍ ثُمَّ جَعَلَكُمْ اَزْوَاجًاۜ وَمَا تَحْمِلُ مِنْ اُنْثٰى وَلَا تَضَعُ اِلَّا بِعِلْمِه۪ۜ وَمَا يُعَمَّرُ مِنْ مُعَمَّرٍ وَلَا يُنْقَصُ مِنْ عُمُرِه۪ٓ اِلَّا ف۪ي كِتَابٍۜ اِنَّ ذٰلِكَ عَلَى اللّٰهِ يَس۪يرٌ11
अल्लाह ने तुम्हें मिट्टी से पैदा किया, फिर वीर्य से, फिर तुम्हें जोड़े-जोड़े बनाया। उसके ज्ञान के बिना न कोई स्त्री गर्भवती होती है और न जन्म देती है। और जो कोई आयु को प्राप्ति करनेवाला आयु को प्राप्त करता है और जो कुछ उसकी आयु में कमी होती है। अनिवार्यतः यह सब एक किताब में लिखा होता है। निश्चय ही यह सब अल्लाह के लिए अत्यन्त सरल है
وَمَا يَسْتَوِي الْبَحْرَانِۗ هٰذَا عَذْبٌ فُرَاتٌ سَٓائِغٌ شَرَابُهُ وَهٰذَا مِلْحٌ اُجَاجٌۜ وَمِنْ كُلٍّ تَاْكُلُونَ لَحْمًا طَرِيًّا وَتَسْتَخْرِجُونَ حِلْيَةً تَلْبَسُونَهَاۚ وَتَرَى الْفُلْكَ ف۪يهِ مَوَاخِرَ لِتَبْتَغُوا مِنْ فَضْلِه۪ وَلَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ12
दोनों सागर समान नहीं, यह मीठा सुस्वाद है जिससे प्यास जाती रहे, पीने में रुचिकर। और यह खारा-कडुवा है। और तुम प्रत्येक में से तरोताज़ा माँस खाते हो और आभूषण निकालते हो, जिसे तुम पहनते हो। और तुम नौकाओं को देखते हो कि चीरती हुई उसमें चली जा रही हैं, ताकि तुम उसका उदार अनुग्रह तलाश करो और कदाचित तुम आभारी बनो
يُولِجُ الَّيْلَ فِي النَّهَارِ وَيُولِجُ النَّهَارَ فِي الَّيْلِۙ وَسَخَّرَ الشَّمْسَ وَالْقَمَرَۘ كُلٌّ يَجْر۪ي لِاَجَلٍ مُسَمًّىۜ ذٰلِكُمُ اللّٰهُ رَبُّكُمْ لَهُ الْمُلْكُۜ وَالَّذ۪ينَ تَدْعُونَ مِنْ دُونِه۪ مَا يَمْلِكُونَ مِنْ قِطْم۪يرٍۜ13
वह रात को दिन में प्रविष्ट करता है और दिन को रात में प्रविष्ट करता हैं। उसने सूर्य और चन्द्रमा को काम में लगा रखा है। प्रत्येक एक नियत समय पूरी करने के लिए चल रहा है। वही अल्लाह तुम्हारा रब है। उसी की बादशाही है। उससे हटकर जिनको तुम पुकारते हो वे एक तिनके के भी मालिक नहीं
اِنْ تَدْعُوهُمْ لَا يَسْمَعُوا دُعَٓاءَكُمْۚ وَلَوْ سَمِعُوا مَا اسْتَجَابُوا لَكُمْۜ وَيَوْمَ الْقِيٰمَةِ يَكْفُرُونَ بِشِرْكِكُمْۜ وَلَا يُنَبِّئُكَ مِثْلُ خَب۪يرٍ۟14
यदि तुम उन्हें पुकारो तो वे तुम्हारी पुकार सुनेगे नहीं। और यदि वे सुनते तो भी तुम्हारी याचना स्वीकार न कर सकते और क़ियामत के दिन वे तुम्हारे साझी ठहराने का इनकार कर देंगे। पूरी ख़बर रखनेवाला (अल्लाह) की तरह तुम्हें कोई न बताएगा
يَٓا اَيُّهَا النَّاسُ اَنْتُمُ الْفُقَرَٓاءُ اِلَى اللّٰهِۚ وَاللّٰهُ هُوَ الْغَنِيُّ الْحَم۪يدُ15
ऐ लोगों! तुम्ही अल्लाह के मुहताज हो और अल्लाह तो निस्पृह, स्वप्रशंसित है
اِنْ يَشَاْ يُذْهِبْكُمْ وَيَاْتِ بِخَلْقٍ جَد۪يدٍۚ16
यदि वह चाहे तो तुम्हें हटा दे और एक नई संसृति ले आए
وَمَا ذٰلِكَ عَلَى اللّٰهِ بِعَز۪يزٍ17
और यह अल्लाह के लिए कुछ भी कठिन नहीं
وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ اُخْرٰىۜ وَاِنْ تَدْعُ مُثْقَلَةٌ اِلٰى حِمْلِهَا لَا يُحْمَلْ مِنْهُ شَيْءٌ وَلَوْ كَانَ ذَا قُرْبٰىۜ اِنَّمَا تُنْذِرُ الَّذ۪ينَ يَخْشَوْنَ رَبَّهُمْ بِالْغَيْبِ وَاَقَامُوا الصَّلٰوةَۜ وَمَنْ تَزَكّٰى فَاِنَّمَا يَتَزَكّٰى لِنَفْسِه۪ۜ وَاِلَى اللّٰهِ الْمَص۪يرُ18
कोई बोझ उठानेवाला किसी दूसरे का बोझ न उठाएगा। और यदि कोई कोई से दबा हुआ व्यक्ति अपना बोझ उठाने के लिए पुकारे तो उसमें से कुछ भी न उठाया, यद्यपि वह निकट का सम्बन्धी ही क्यों न हो। तुम तो केवल सावधान कर रहे हो। जो परोक्ष में रहते हुए अपने रब से डरते हैं और नमाज़ के पाबन्द हो चुके है (उनकी आत्मा का विकास हो गया) । और जिसने स्वयं को विकसित किया वह अपने ही भले के लिए अपने आपको विकसित करेगा। और पलटकर जाना तो अल्लाह ही की ओर है
وَمَا يَسْتَوِي الْاَعْمٰى وَالْبَص۪يرُۙ19
अंधा और आँखोंवाला बराबर नहीं,
وَلَا الظُّلُمَاتُ وَلَا النُّورُۙ20
और न अँधेरे और प्रकाश,
وَلَا الظِّلُّ وَلَا الْحَرُورُۚ21
और न छाया और धूप
وَمَا يَسْتَوِي الْاَحْيَٓاءُ وَلَا الْاَمْوَاتُۜ اِنَّ اللّٰهَ يُسْمِعُ مَنْ يَشَٓاءُۚ وَمَٓا اَنْتَ بِمُسْمِعٍ مَنْ فِي الْقُبُورِ22
और न जीवित और मृत बराबर है। निश्चय ही अल्लाह जिसे चाहता है सुनाता है। तुम उन लोगों को नहीं सुना सकते, जो क़ब्रों में हो।
اِنْ اَنْتَ اِلَّا نَذ۪يرٌ23
तुम तो बस एक सचेतकर्ता हो
اِنَّٓا اَرْسَلْنَاكَ بِالْحَقِّ بَش۪يرًا وَنَذ۪يرًاۜ وَاِنْ مِنْ اُمَّةٍ اِلَّا خَلَا ف۪يهَا نَذ۪يرٌ24
हमने तुम्हें सत्य के साथ भेजा है, शुभ-सूचना देनेवाला और सचेतकर्ता बनाकर। और जो भी समुदाय गुज़रा है, उसमें अनिवार्यतः एक सचेतकर्ता हुआ है
وَاِنْ يُكَذِّبُوكَ فَقَدْ كَذَّبَ الَّذ۪ينَ مِنْ قَبْلِهِمْۚ جَٓاءَتْهُمْ رُسُلُهُمْ بِالْبَيِّنَاتِ وَبِالزُّبُرِ وَبِالْكِتَابِ الْمُن۪يرِ25
यदि वे तुम्हें झुठलाते है तो जो उनसे पहले थे वे भी झुठला चुके है। उनके रसूल उनके पास स्पष्ट और ज़बूरें और प्रकाशमान किताब लेकर आए थे
ثُمَّ اَخَذْتُ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا فَكَيْفَ كَانَ نَك۪يرِ۟26
फिर मैं उन लोगों को, जिन्होंने इनकार किया, पकड़ लिया (तो फिर कैसा रहा मेरा इनकार!)
اَلَمْ تَرَ اَنَّ اللّٰهَ اَنْزَلَ مِنَ السَّمَٓاءِ مَٓاءًۚ فَاَخْرَجْنَا بِه۪ ثَمَرَاتٍ مُخْتَلِفًا اَلْوَانُهَاۜ وَمِنَ الْجِبَالِ جُدَدٌ ب۪يضٌ وَحُمْرٌ مُخْتَلِفٌ اَلْوَانُهَا وَغَرَاب۪يبُ سُودٌ27
क्या तुमने नहीं देखा कि अल्लाह ने आकाश से पानी बरसाया, फिर उसके द्वारा हमने फल निकाले, जिनके रंग विभिन्न प्रकार के होते है? और पहाड़ो में भी श्वेत और लाल विभिन्न रंगों की धारियाँ पाई जाती है, और भुजंग काली भी
وَمِنَ النَّاسِ وَالدَّوَٓابِّ وَالْاَنْعَامِ مُخْتَلِفٌ اَلْوَانُهُ كَذٰلِكَۜ اِنَّمَا يَخْشَى اللّٰهَ مِنْ عِبَادِهِ الْعُلَمٰٓؤُ۬اۜ اِنَّ اللّٰهَ عَز۪يزٌ غَفُورٌ28
और मनुष्यों और जानवरों और चौपायों के रंग भी इसी प्रकार भिन्न हैं। अल्लाह से डरते तो उसके वही बन्दे हैं, जो बाख़बर है। निश्चय ही अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, क्षमाशील है
اِنَّ الَّذ۪ينَ يَتْلُونَ كِتَابَ اللّٰهِ وَاَقَامُوا الصَّلٰوةَ وَاَنْفَقُوا مِمَّا رَزَقْنَاهُمْ سِرًّا وَعَلَانِيَةً يَرْجُونَ تِجَارَةً لَنْ تَبُورَۙ29
निश्चय ही जो लोग अल्लाह की किताब पढ़ते हैं, इस हाल मे कि नमाज़ के पाबन्द हैं, और जो कुछ हमने उन्हें दिया है, उसमें से छिपे और खुले ख़र्च किया है, वे एक ऐसे व्यापार की आशा रखते है जो कभी तबाह न होगा
لِيُوَفِّيَهُمْ اُجُورَهُمْ وَيَز۪يدَهُمْ مِنْ فَضْلِه۪ۜ اِنَّهُ غَفُورٌ شَكُورٌ30
परिणामस्वरूप वह उन्हें उनके प्रतिदान पूरे-पूरे दे और अपने उदार अनुग्रह से उन्हें और अधिक भी प्रदान करे। निस्संदेह वह बहुत क्षमाशील, अत्यन्त गुणग्राहक है
وَالَّذ۪ٓي اَوْحَيْنَٓا اِلَيْكَ مِنَ الْكِتَابِ هُوَ الْحَقُّ مُصَدِّقًا لِمَا بَيْنَ يَدَيْهِۜ اِنَّ اللّٰهَ بِعِبَادِه۪ لَخَب۪يرٌ بَص۪يرٌ31
जो किताब हमने तुम्हारी ओर प्रकाशना द्वारा भेजी है, वही सत्य है। अपने से पहले (की किताबों) की पुष्टि में है। निश्चय ही अल्लाह अपने बन्दों की ख़बर पूरी रखनेवाला, देखनेवाला है
ثُمَّ اَوْرَثْنَا الْكِتَابَ الَّذ۪ينَ اصْطَفَيْنَا مِنْ عِبَادِنَاۚ فَمِنْهُمْ ظَالِمٌ لِنَفْسِه۪ۚ وَمِنْهُمْ مُقْتَصِدٌۚ وَمِنْهُمْ سَابِقٌ بِالْخَيْرَاتِ بِاِذْنِ اللّٰهِۜ ذٰلِكَ هُوَ الْفَضْلُ الْكَب۪يرُۜ32
फिर हमने इस किताब का उत्तराधिकारी उन लोगों को बनाया, जिन्हें हमने अपने बन्दो में से चुन लिया है। अब कोई तो उनमें से अपने आप पर ज़ुल्म करता है और कोई उनमें से मध्य श्रेणी का है और कोई उनमें से अल्लाह के कृपायोग से भलाइयों में अग्रसर है। यही है बड़ी श्रेष्ठता। -
جَنَّاتُ عَدْنٍ يَدْخُلُونَهَا يُحَلَّوْنَ ف۪يهَا مِنْ اَسَاوِرَ مِنْ ذَهَبٍ وَلُؤْلُؤً۬اۚ وَلِبَاسُهُمْ ف۪يهَا حَر۪يرٌ33
सदैव रहने के बाग है, जिनमें वे प्रवेश करेंगे। वहाँ उन्हें सोने के कंगनों और मोती से आभूषित किया जाएगा। और वहाँ उनका वस्त्र रेशम होगा
وَقَالُوا الْحَمْدُ لِلّٰهِ الَّذ۪ٓي اَذْهَبَ عَنَّا الْحَزَنَۜ اِنَّ رَبَّنَا لَغَفُورٌ شَكُورٌۙ34
और वे कहेंगे, "सब प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जिसने हमसे ग़म दूर कर दिया। निश्चय ही हमारा रब अत्यन्त क्षमाशील, बड़ा गुणग्राहक है
اَلَّذ۪ٓي اَحَلَّنَا دَارَ الْمُقَامَةِ مِنْ فَضْلِه۪ۚ لَا يَمَسُّنَا ف۪يهَا نَصَبٌ وَلَا يَمَسُّنَا ف۪يهَا لُغُوبٌ35
जिसने हमें अपने उदार अनुग्रह से रहने के ऐसे घर में उतारा जहाँ न हमें कोई मशक़्क़त उठानी पड़ती है और न हमें कोई थकान ही आती है।"
وَالَّذ۪ينَ كَفَرُوا لَهُمْ نَارُ جَهَنَّمَۚ لَا يُقْضٰى عَلَيْهِمْ فَيَمُوتُوا وَلَا يُخَفَّفُ عَنْهُمْ مِنْ عَذَابِهَاۜ كَذٰلِكَ نَجْز۪ي كُلَّ كَفُورٍۚ36
रहे वे लोग जिन्होंने इनकार किया, उनके लिए जहन्नम की आग है, न उनका काम तमाम किया जाएगा कि मर जाएँ और न उनसे उसकी यातना ही कुछ हल्की की जाएगी। हम ऐसा ही बदला प्रत्येक अकृतज्ञ को देते है
وَهُمْ يَصْطَرِخُونَ ف۪يهَاۚ رَبَّنَٓا اَخْرِجْنَا نَعْمَلْ صَالِحًا غَيْرَ الَّذ۪ي كُنَّا نَعْمَلُۜ اَوَلَمْ نُعَمِّرْكُمْ مَا يَتَذَكَّرُ ف۪يهِ مَنْ تَذَكَّرَ وَجَٓاءَكُمُ النَّذ۪يرُۜ فَذُوقُوا فَمَا لِلظَّالِم۪ينَ مِنْ نَص۪يرٍ۟37
वे वहाँ चिल्लाएँगे कि "ऐ हमारे रब! हमें निकाल ले। हम अच्छा कर्म करेंगे, उससे भिन्न जो हम करते रहे।" "क्या हमने तुम्हें इतनी आयु नहीं दी कि जिसमें कोई होश में आना चाहता तो होश में आ जाता? और तुम्हारे पास सचेतकर्ता भी आया था, तो अब मज़ा चखते रहो! ज़ालिमोंं को कोई सहायक नहीं!"
اِنَّ اللّٰهَ عَالِمُ غَيْبِ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ اِنَّهُ عَل۪يمٌ بِذَاتِ الصُّدُورِ38
निस्संदेह अल्लाह आकाशों और धरती की छिपी बात को जानता है। वह तो सीनो तक की बात जानता है
هُوَ الَّذ۪ي جَعَلَكُمْ خَلَٓائِفَ فِي الْاَرْضِۜ فَمَنْ كَفَرَ فَعَلَيْهِ كُفْرُهُۜ وَلَا يَز۪يدُ الْكَافِر۪ينَ كُفْرُهُمْ عِنْدَ رَبِّهِمْ اِلَّا مَقْتًاۚ وَلَا يَز۪يدُ الْكَافِر۪ينَ كُفْرُهُمْ اِلَّا خَسَارًا39
वही तो है जिसने तुम्हे धरती में ख़लीफ़ा बनाया। अब तो कोई इनकार करेगा, उसके इनकार का वबाल उसी पर है। इनकार करनेवालों का इनकार उनके रब के यहाँ केवल प्रकोप ही को बढ़ाता है, और इनकार करनेवालों का इनकार केवल घाटे में ही अभिवृद्धि करता है
قُلْ اَرَاَيْتُمْ شُرَكَٓاءَكُمُ الَّذ۪ينَ تَدْعُونَ مِنْ دُونِ اللّٰهِۜ اَرُون۪ي مَاذَا خَلَقُوا مِنَ الْاَرْضِ اَمْ لَهُمْ شِرْكٌ فِي السَّمٰوَاتِۚ اَمْ اٰتَيْنَاهُمْ كِتَابًا فَهُمْ عَلٰى بَيِّنَتٍ مِنْهُۚ بَلْ اِنْ يَعِدُ الظَّالِمُونَ بَعْضُهُمْ بَعْضًا اِلَّا غُرُورًا40
कहो, "क्या तुमने अपने ठहराए हुए साझीदारो का अवलोकन भी किया, जिन्हें तुम अल्लाह को छोड़कर पुकारते हो? मुझे दिखाओ उन्होंने धरती का कौन-सा भाग पैदा किया है या आकाशों में उनकी कोई भागीदारी है?" या हमने उन्हें कोई किताब ही है कि उसका कोई स्पष्ट प्रमाण उनके पक्ष में हो? नहीं, बल्कि वे ज़ालिम आपस में एक-दूसरे से केवल धोखे का वादा कर रहे है
اِنَّ اللّٰهَ يُمْسِكُ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضَ اَنْ تَزُولَاۚ وَلَئِنْ زَالَتَٓا اِنْ اَمْسَكَهُمَا مِنْ اَحَدٍ مِنْ بَعْدِه۪ۜ اِنَّهُ كَانَ حَل۪يمًا غَفُورًا41
अल्लाह ही आकाशों और धरती को थामे हुए है कि वे टल न जाएँ और यदि वे टल जाएँ तो उसके पश्चात कोई भी नहीं जो उन्हें थाम सके। निस्संदेह, वह बहुत सहनशील, क्षमा करनेवाला है
وَاَقْسَمُوا بِاللّٰهِ جَهْدَ اَيْمَانِهِمْ لَئِنْ جَٓاءَهُمْ نَذ۪يرٌ لَيَكُونُنَّ اَهْدٰى مِنْ اِحْدَى الْاُمَمِۚ فَلَمَّا جَٓاءَهُمْ نَذ۪يرٌ مَا زَادَهُمْ اِلَّا نُفُورًاۙ42
उन्होंने अल्लाह की कड़ी-कड़ी क़समें खाई थी कि यदि उनके पास कोई सचेतकर्ता आए तो वे समुदायों में से प्रत्येक से बढ़कर सीधे मार्ग पर होंगे। किन्तु जब उनके पास एक सचेतकर्ता आ गया तो इस चीज़ ने धरती में उनके घमंड और बुरी चालों के कारण उनकी नफ़रत ही में अभिवृद्धि की,
اِسْتِكْبَارًا فِي الْاَرْضِ وَمَكْرَ السَّيِّئِۜ وَلَا يَح۪يقُ الْمَكْرُ السَّيِّئُ اِلَّا بِاَهْلِه۪ۜ فَهَلْ يَنْظُرُونَ اِلَّا سُنَّتَ الْاَوَّل۪ينَۚ فَلَنْ تَجِدَ لِسُنَّتِ اللّٰهِ تَبْد۪يلًاۚ وَلَنْ تَجِدَ لِسُنَّتِ اللّٰهِ تَحْو۪يلًا43
हालाँकि बुरी चाल अपने ही लोगों को घेर लेती है। तो अब क्या जो रीति अगलों के सिलसिले में रही है वे बस उसी रीति की प्रतिक्षा कर रहे है? तो तुम अल्लाह की रीति में कदापि कोई परिवर्तन न पाओगे और न तुम अल्लाह की रीति को कभी टलते ही पाओगे
اَوَلَمْ يَس۪يرُوا فِي الْاَرْضِ فَيَنْظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الَّذ۪ينَ مِنْ قَبْلِهِمْ وَكَانُٓوا اَشَدَّ مِنْهُمْ قُوَّةًۜ وَمَا كَانَ اللّٰهُ لِيُعْجِزَهُ مِنْ شَيْءٍ فِي السَّمٰوَاتِ وَلَا فِي الْاَرْضِۜ اِنَّهُ كَانَ عَل۪يمًا قَد۪يرًا44
क्या वे धरती में चले-फिरे नहीं कि देखते कि उन लोगों का कैसा परिणाम हुआ है जो उनसे पहले गुज़रे हैं? हालाँकि वे शक्ति में उनसे कही बढ़-चढ़कर थे। अल्लाह ऐसा नहीं कि आकाशों में कोई चीज़ उसे मात कर सके और न धरती ही में। निस्संदेह वह सर्वज्ञ, सामर्थ्यमान है
وَلَوْ يُؤَاخِذُ اللّٰهُ النَّاسَ بِمَا كَسَبُوا مَا تَرَكَ عَلٰى ظَهْرِهَا مِنْ دَٓابَّةٍ وَلٰكِنْ يُؤَخِّرُهُمْ اِلٰٓى اَجَلٍ مُسَمًّىۚ فَاِذَا جَٓاءَ اَجَلُهُمْ فَاِنَّ اللّٰهَ كَانَ بِعِبَادِه۪ بَص۪يرًا45
यदि अल्लाह लोगों को उनकी कमाई के कारण पकड़ने पर आ जाए तो इस धरती की पीठ पर किसी जीवधारी को भी न छोड़े। किन्तु वह उन्हें एक नियत समय तक ढील देता है, फिर जब उनका नियत समय आ जाता है तो निश्चय ही अल्लाह तो अपने बन्दों को देख ही रहा है
36 · यासीन
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
يٰسٓۜ1
या॰ सीन॰
وَالْقُرْاٰنِ الْحَك۪يمِۙ2
गवाह है हिकमतवाला क़ुरआन
اِنَّكَ لَمِنَ الْمُرْسَل۪ينَۙ3
- कि तुम निश्चय ही रसूलों में से हो
عَلٰى صِرَاطٍ مُسْتَق۪يمٍۜ4
एक सीधे मार्ग पर
تَنْز۪يلَ الْعَز۪يزِ الرَّح۪يمِۙ5
- क्या ही ख़ूब है, प्रभुत्वशाली, अत्यन्त दयावाल का इसको अवतरित करना!
لِتُنْذِرَ قَوْمًا مَٓا اُنْذِرَ اٰبَٓاؤُ۬هُمْ فَهُمْ غَافِلُونَ6
ताकि तुम ऐसे लोगों को सावधान करो, जिनके बाप-दादा को सावधान नहीं किया गया; इस कारण वे गफ़लत में पड़े हुए है
لَقَدْ حَقَّ الْقَوْلُ عَلٰٓى اَكْثَرِهِمْ فَهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ7
उनमें से अधिकतर लोगों पर बात सत्यापित हो चुकी है। अतः वे ईमान नहीं लाएँगे।
اِنَّا جَعَلْنَا ف۪ٓي اَعْنَاقِهِمْ اَغْلَالًا فَهِيَ اِلَى الْاَذْقَانِ فَهُمْ مُقْمَحُونَ8
हमने उनकी गर्दनों में तौक़ डाल दिए है जो उनकी ठोड़ियों से लगे है। अतः उनके सिर ऊपर को उचके हुए है
وَجَعَلْنَا مِنْ بَيْنِ اَيْد۪يهِمْ سَدًّا وَمِنْ خَلْفِهِمْ سَدًّا فَاَغْشَيْنَاهُمْ فَهُمْ لَا يُبْصِرُونَ9
और हमने उनके आगे एक दीवार खड़ी कर दी है और एक दीवार उनके पीछे भी। इस तरह हमने उन्हें ढाँक दिया है। अतः उन्हें कुछ सुझाई नहीं देता
وَسَوَٓاءٌ عَلَيْهِمْ ءَاَنْذَرْتَهُمْ اَمْ لَمْ تُنْذِرْهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ10
उनके लिए बराबर है तुमने सचेत किया या उन्हें सचेत नहीं किया, वे ईमान नहीं लाएँगे
اِنَّمَا تُنْذِرُ مَنِ اتَّبَعَ الذِّكْرَ وَخَشِيَ الرَّحْمٰنَ بِالْغَيْبِۚ فَبَشِّرْهُ بِمَغْفِرَةٍ وَاَجْرٍ كَر۪يمٍ11
तुम तो बस सावधान कर रहे हो। जो कोई अनुस्मृति का अनुसरण करे और परोक्ष में रहते हुए रहमान से डरे, अतः क्षमा और प्रतिष्ठामय बदले की शुभ सूचना दे दो
اِنَّا نَحْنُ نُحْيِ الْمَوْتٰى وَنَكْتُبُ مَا قَدَّمُوا وَاٰثَارَهُمْۜ وَكُلَّ شَيْءٍ اَحْصَيْنَاهُ ف۪ٓي اِمَامٍ مُب۪ينٍ۟12
निस्संदेह हम मुर्दों को जीवित करेंगे और हम लिखेंगे जो कुछ उन्होंने आगे के लिए भेजा और उनके चिन्हों को (जो पीछे रहा) । हर चीज़ हमने एक स्पष्ट किताब में गिन रखी है
وَاضْرِبْ لَهُمْ مَثَلًا اَصْحَابَ الْقَرْيَةِۢ اِذْ جَٓاءَهَا الْمُرْسَلُونَۚ13
उनके लिए बस्तीवालों की एक मिसाल पेश करो, जबकि वहाँ भेजे हुए दूत आए
اِذْ اَرْسَلْنَٓا اِلَيْهِمُ اثْنَيْنِ فَكَذَّبُوهُمَا فَعَزَّزْنَا بِثَالِثٍ فَقَالُٓوا اِنَّٓا اِلَيْكُمْ مُرْسَلُونَ14
जबकि हमने उनकी ओर दो दूत भेजे, तो उन्होंने झुठला दिया। तब हमने तीसरे के द्वारा शक्ति पहुँचाई, तो उन्होंने कहा, "हम तुम्हारी ओर भेजे गए हैं।"
قَالُوا مَٓا اَنْتُمْ اِلَّا بَشَرٌ مِثْلُنَاۙ وَمَٓا اَنْزَلَ الرَّحْمٰنُ مِنْ شَيْءٍۙ اِنْ اَنْتُمْ اِلَّا تَكْذِبُونَ15
वे बोले, "तुम तो बस हमारे ही जैसे मनुष्य हो। रहमान ने तो कोई भी चीज़ अवतरित नहीं की है। तुम केवल झूठ बोलते हो।"
قَالُوا رَبُّنَا يَعْلَمُ اِنَّٓا اِلَيْكُمْ لَمُرْسَلُونَ16
उन्होंने कहा, "हमारा रब जानता है कि हम निश्चय ही तुम्हारी ओर भेजे गए है
وَمَا عَلَيْنَٓا اِلَّا الْبَلَاغُ الْمُب۪ينُ17
औऱ हमारी ज़िम्मेदारी तो केवल स्पष्ट रूप से संदेश पहुँचा देने की हैं।"
قَالُٓوا اِنَّا تَطَيَّرْنَا بِكُمْۚ لَئِنْ لَمْ تَنْتَهُوا لَنَرْجُمَنَّكُمْ وَلَيَمَسَّنَّكُمْ مِنَّا عَذَابٌ اَل۪يمٌ18
वे बोले, "हम तो तुम्हें अपशकुन समझते है, यदि तुम बाज न आए तो हम तुम्हें पथराव करके मार डालेंगे और तुम्हें अवश्य हमारी ओर से दुखद यातना पहुँचेगी।"
قَالُوا طَٓائِرُكُمْ مَعَكُمْۜ اَئِنْ ذُكِّرْتُمْۜ بَلْ اَنْتُمْ قَوْمٌ مُسْرِفُونَ19
उन्होंने कहा, "तुम्हारा अवशकुन तो तुम्हारे अपने ही साथ है। क्या यदि तुम्हें याददिहानी कराई जाए (तो यह कोई क्रुद्ध होने की बात है)? नहीं, बल्कि तुम मर्यादाहीन लोग हो।"
وَجَٓاءَ مِنْ اَقْصَا الْمَد۪ينَةِ رَجُلٌ يَسْعٰى قَالَ يَا قَوْمِ اتَّبِعُوا الْمُرْسَل۪ينَۙ20
इतने में नगर के दूरवर्ती सिरे से एक व्यक्ति दौड़ता हुआ आया। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! उनका अनुवर्तन करो, जो भेजे गए है।
اِتَّبِعُوا مَنْ لَا يَسْـَٔلُكُمْ اَجْرًا وَهُمْ مُهْتَدُونَ21
उसका अनुवर्तन करो जो तुमसे कोई बदला नहीं माँगते और वे सीधे मार्ग पर है
وَمَا لِيَ لَٓا اَعْبُدُ الَّذ۪ي فَطَرَن۪ي وَاِلَيْهِ تُرْجَعُونَ22
"और मुझे क्या हुआ है कि मैं उसकी बन्दगी न करूँ, जिसने मुझे पैदा किया और उसी की ओर तुम्हें लौटकर जाना है?
ءَاَتَّخِذُ مِنْ دُونِه۪ٓ اٰلِهَةً اِنْ يُرِدْنِ الرَّحْمٰنُ بِضُرٍّ لَا تُغْنِ عَنّ۪ي شَفَاعَتُهُمْ شَيْـًٔا وَلَا يُنْقِذُونِۚ23
"क्या मैं उससे इतर दूसरे उपास्य बना लूँ? यदि रहमान मुझे कोई तकलीफ़ पहुँचाना चाहे तो उनकी सिफ़ारिश मेरे कुछ काम नहीं आ सकती और न वे मुझे छुडा ही सकते है
اِنّ۪ٓي اِذًا لَف۪ي ضَلَالٍ مُب۪ينٍ24
"तब तो मैं अवश्य स्पष्ट गुमराही में पड़ जाऊँगा
اِنّ۪ٓي اٰمَنْتُ بِرَبِّكُمْ فَاسْمَعُونِۜ25
"मैं तो तुम्हारे रब पर ईमान ले आया, अतः मेरी सुनो!"
ق۪يلَ ادْخُلِ الْجَنَّةَۜ قَالَ يَا لَيْتَ قَوْم۪ي يَعْلَمُونَۙ26
कहा गया, "प्रवेश करो जन्नत में!" उसने कहा, "ऐ काश! मेरी क़ौम के लोग जानते
بِمَا غَفَرَ ل۪ي رَبّ۪ي وَجَعَلَن۪ي مِنَ الْمُكْرَم۪ينَ27
कि मेरे रब ने मुझे क्षमा कर दिया और मुझे प्रतिष्ठित लोगों में सम्मिलित कर दिया।"