25. जुज़ - कुरान पढ़ें
41 · हामीम अस-सजदा42 · अश-शूरा43 · अज़-ज़ुख़रुफ़44 · अद-दुखान45 · अल-जासिया
اِلَيْهِ يُرَدُّ عِلْمُ السَّاعَةِۜ وَمَا تَخْرُجُ مِنْ ثَمَرَاتٍ مِنْ اَكْمَامِهَا وَمَا تَحْمِلُ مِنْ اُنْثٰى وَلَا تَضَعُ اِلَّا بِعِلْمِه۪ۜ وَيَوْمَ يُنَاد۪يهِمْ اَيْنَ شُرَكَٓاء۪يۙ قَالُٓوا اٰذَنَّاكَۙ مَا مِنَّا مِنْ شَه۪يدٍۚ47
उस घड़ी का ज्ञान अल्लाह की ओर फिरता है। जो फल भी अपने कोषों से निकलते है और जो मादा भी गर्भवती होती है और बच्चा जनती है, अनिवार्यतः उसे इन सबका ज्ञान होता है। जिस दिन वह उन्हें पुकारेगा, "कहाँ है मेरे साझीदार?" वे कहेंगे, "हम तेरे समक्ष खुल्लम-ख़ुल्ला कह चुके है कि हममें से कोई भी इसका गवाह नहीं।"
وَضَلَّ عَنْهُمْ مَا كَانُوا يَدْعُونَ مِنْ قَبْلُ وَظَنُّوا مَا لَهُمْ مِنْ مَح۪يصٍ48
और जिन्हें वे पहले पुकारा करते थे वे उनसे गुम हो जाएँगे। और वे समझ लेंगे कि उनके लिए कोई भी भागने की जगह नहीं है
لَا يَسْـَٔمُ الْاِنْسَانُ مِنْ دُعَٓاءِ الْخَيْرِۘ وَاِنْ مَسَّهُ الشَّرُّ فَيَؤُ۫سٌ قَنُوطٌ49
मनुष्य भलाई माँगने से नहीं उकताता, किन्तु यदि उसे कोई तकलीफ़ छू जाती है तो वह निराश होकर आस छोड़ बैठता है
وَلَئِنْ اَذَقْنَاهُ رَحْمَةً مِنَّا مِنْ بَعْدِ ضَرَّٓاءَ مَسَّتْهُ لَيَقُولَنَّ هٰذَا ل۪يۙ وَمَٓا اَظُنُّ السَّاعَةَ قَٓائِمَةًۙ وَلَئِنْ رُجِعْتُ اِلٰى رَبّ۪ٓي اِنَّ ل۪ي عِنْدَهُ لَلْحُسْنٰىۚ فَلَنُنَبِّئَنَّ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا بِمَا عَمِلُواۘ وَلَنُذ۪يقَنَّهُمْ مِنْ عَذَابٍ غَل۪يظٍ50
और यदि उस तकलीफ़ के बाद, जो उसे पहुँची, हम उसे अपनी दयालुता का आस्वादन करा दें तो वह निश्चय ही कहेंगा, "यह तो मेरा हक़ ही है। मैं तो यह नहीं समझता कि वह, क़ियामत की घड़ी, घटित होगी और यदि मैं अपने रब की ओर लौटाया भी गया तो अवश्य ही उसके पास मेरे लिए अच्छा पारितोषिक होगा।" फिर हम उन लोगों को जिन्होंने इनकार किया, अवश्य बताकर रहेंगे, जो कुछ उन्होंने किया होगा। और हम उन्हें अवश्य ही कठोर यातना का मज़ा चखाएँगे
وَاِذَٓا اَنْعَمْنَا عَلَى الْاِنْسَانِ اَعْرَضَ وَنَاٰ بِجَانِبِه۪ۚ وَاِذَا مَسَّهُ الشَّرُّ فَذُو دُعَٓاءٍ عَر۪يضٍ51
जब हम मनुष्य पर अनुकम्पा करते है तो वह ध्यान में नहीं लाता और अपना पहलू फेर लेता है। किन्तु जब उसे तकलीफ़ छू जाती है, तो वह लम्बी-चौड़ी प्रार्थनाएँ करने लगता है
قُلْ اَرَاَيْتُمْ اِنْ كَانَ مِنْ عِنْدِ اللّٰهِ ثُمَّ كَفَرْتُمْ بِه۪ مَنْ اَضَلُّ مِمَّنْ هُوَ ف۪ي شِقَاقٍ بَع۪يدٍ52
कह दो, "क्या तुमने विचार किया, यदि वह (क़ुरआन) अल्लाह की ओर सो ही हुआ और तुमने उसका इनकार किया तो उससे बढ़कर भटका हुआ और कौन होगा जो विरोध में बहुत दूर जा पड़ा हो?"
سَنُر۪يهِمْ اٰيَاتِنَا فِي الْاٰفَاقِ وَف۪ٓي اَنْفُسِهِمْ حَتّٰى يَتَبَيَّنَ لَهُمْ اَنَّهُ الْحَقُّۜ اَوَلَمْ يَكْفِ بِرَبِّكَ اَنَّهُ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ شَه۪يدٌ53
शीघ्र ही हम उन्हें अपनी निशानियाँ वाह्य क्षेत्रों में दिखाएँगे और स्वयं उनके अपने भीतर भी, यहाँ तक कि उनपर स्पष्टा हो जाएगा कि वह (क़ुरआन) सत्य है। क्या तुम्हारा रब इस दृष्टि, से काफ़ी नहीं कि वह हर चीज़ का साक्षी है
اَلَٓا اِنَّهُمْ ف۪ي مِرْيَةٍ مِنْ لِقَٓاءِ رَبِّهِمْۜ اَلَٓا اِنَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ مُح۪يطٌ54
जान लो कि वे लोग अपने रब से मिलन के बारे में संदेह में पड़े हुए है। जान लो कि निश्चय ही वह हर चीज़ को अपने घेरे में लिए हुए है
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
حٰمٓ1
हा॰ मीम॰
عٓسٓقٓ۠2
ऐन॰ सीन॰ क़ाफ़॰
كَذٰلِكَ يُوح۪ٓي اِلَيْكَ وَاِلَى الَّذ۪ينَ مِنْ قَبْلِكَۙ اللّٰهُ الْعَز۪يزُ الْحَك۪يمُ3
इसी प्रकार अल्लाह प्रुभत्वशाली, तत्वदर्शी तुम्हारी ओर और उन लोगों की ओर प्रकाशना (वह्यप) करता रहा है, जो तुमसे पहले गुज़र चुके है
لَهُ مَا فِي السَّمٰوَاتِ وَمَا فِي الْاَرْضِۜ وَهُوَ الْعَلِيُّ الْعَظ۪يمُ4
आकाशों और धरती में जो कुछ है उसी का है और वह सर्वोच्च महिमावान है
تَكَادُ السَّمٰوَاتُ يَتَفَطَّرْنَ مِنْ فَوْقِهِنَّ وَالْمَلٰٓئِكَةُ يُسَبِّحُونَ بِحَمْدِ رَبِّهِمْ وَيَسْتَغْفِرُونَ لِمَنْ فِي الْاَرْضِۜ اَلَٓا اِنَّ اللّٰهَ هُوَ الْغَفُورُ الرَّح۪يمُ5
लगता है कि आकाश स्वयं अपने ऊपर से फट पड़े। हाल यह है कि फ़रिश्ते अपने रब का गुणगान कर रहे, और उन लोगों के लिए जो धरती में है, क्षमा की प्रार्थना करते रहते है। सुन लो! निश्चय ही अल्लाह ही क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
وَالَّذ۪ينَ اتَّخَذُوا مِنْ دُونِه۪ٓ اَوْلِيَٓاءَ اللّٰهُ حَف۪يظٌ عَلَيْهِمْۘ وَمَٓا اَنْتَ عَلَيْهِمْ بِوَك۪يلٍ6
और जिन लोगों ने उससे हटकर अपने कुछ दूसरे संरक्षक बना रखे हैं, अल्लाह उनपर निगरानी रखे हुए है। तुम उनके कोई ज़िम्मेदार नहीं हो
وَكَذٰلِكَ اَوْحَيْنَٓا اِلَيْكَ قُرْاٰنًا عَرَبِيًّا لِتُنْذِرَ اُمَّ الْقُرٰى وَمَنْ حَوْلَهَا وَتُنْذِرَ يَوْمَ الْجَمْعِ لَا رَيْبَ ف۪يهِۜ فَر۪يقٌ فِي الْجَنَّةِ وَفَر۪يقٌ فِي السَّع۪يرِ7
और (जैसे हम स्पष्ट आयतें उतारते है) उसी प्रकार हमने तुम्हारी ओर एक अरबी क़ुरआन की प्रकाशना की है, ताकि तुम बस्तियों के केन्द्र (मक्का) को और जो लोग उसके चतुर्दिक है उनको सचेत कर दो और सचेत करो इकट्ठा होने के दिन से, जिसमें कोई सन्देह नहीं। एक गिरोह जन्नत में होगा और एक गिरोह भड़कती आग में
وَلَوْ شَٓاءَ اللّٰهُ لَجَعَلَهُمْ اُمَّةً وَاحِدَةً وَلٰكِنْ يُدْخِلُ مَنْ يَشَٓاءُ ف۪ي رَحْمَتِه۪ۜ وَالظَّالِمُونَ مَا لَهُمْ مِنْ وَلِيٍّ وَلَا نَص۪يرٍ8
यदि अल्लाह चाहता तो उन्हें एक ही समुदाय बना देता, किन्तु वह जिसे चाहता है अपनी दयालुता में दाख़िल करता है। रहे ज़ालिम, तो उनका न तो कोई निकटवर्ती मित्र है और न कोई (दूर का) सहायक
اَمِ اتَّخَذُوا مِنْ دُونِه۪ٓ اَوْلِيَٓاءَۚ فَاللّٰهُ هُوَ الْوَلِيُّ وَهُوَ يُحْيِ الْمَوْتٰىۘ وَهُوَ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَد۪يرٌ۟9
(क्या उन्होंने अल्लाह से हटकर दूसरे सहायक बना लिए है,) या उन्होंने उससे हटकर दूसरे संरक्षक बना रखे है? संरक्षक तो अल्लाह ही है। वही मुर्दों को जीवित करता है और उसे हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है
وَمَا اخْتَلَفْتُمْ ف۪يهِ مِنْ شَيْءٍ فَحُكْمُهُٓ اِلَى اللّٰهِۜ ذٰلِكُمُ اللّٰهُ رَبّ۪ي عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُۗ وَاِلَيْهِ اُن۪يبُ10
(रसूल ने कहा,) "जिस चीज़ में तुमने विभेद किया है उसका फ़ैसला तो अल्लाह के हवाले है। वही अल्लाह मेरा रब है। उसी पर मैंने भरोसा किया है, और उसी की ओर में रुजू करता हूँ
فَاطِرُ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ جَعَلَ لَكُمْ مِنْ اَنْفُسِكُمْ اَزْوَاجًا وَمِنَ الْاَنْعَامِ اَزْوَاجًاۚ يَذْرَؤُ۬كُمْ ف۪يهِۜ لَيْسَ كَمِثْلِه۪ شَيْءٌۚ وَهُوَ السَّم۪يعُ الْبَص۪يرُ11
वह आकाशों और धरती का पैदा करनेवाला है। उसने तुम्हारे लिए तुम्हारी अपनी सहजाति से जोड़े बनाए और चौपायों के जोड़े भी। फैला रहा है वह तुमको अपने में। उसके सदृश कोई चीज़ नहीं। वही सबकुछ सुनता, देखता है
لَهُ مَقَال۪يدُ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۚ يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَنْ يَشَٓاءُ وَيَقْدِرُۜ اِنَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَل۪يمٌ12
आकाशों और धरती की कुंजियाँ उसी के पास हैं। वह जिसके लिए चाहता है रोज़ी कुशादा कर देता है और जिसके लिए चाहता है नपी-तुली कर देता है। निस्संदेह उसे हर चीज़ का ज्ञान है
شَرَعَ لَكُمْ مِنَ الدّ۪ينِ مَا وَصّٰى بِه۪ نُوحًا وَالَّذ۪ٓي اَوْحَيْنَٓا اِلَيْكَ وَمَا وَصَّيْنَا بِه۪ٓ اِبْرٰه۪يمَ وَمُوسٰى وَع۪يسٰٓى اَنْ اَق۪يمُوا الدّ۪ينَ وَلَا تَتَفَرَّقُوا ف۪يهِۜ كَبُرَ عَلَى الْمُشْرِك۪ينَ مَا تَدْعُوهُمْ اِلَيْهِۜ اَللّٰهُ يَجْتَب۪ٓي اِلَيْهِ مَنْ يَشَٓاءُ وَيَهْد۪ٓي اِلَيْهِ مَنْ يُن۪يبُ13
उसने तुम्हारे लिए वही धर्म निर्धारित किया जिसकी ताकीद उसने नूह को की थी।" और वह (जीवन्त आदेश) जिसकी प्रकाशना हमने तुम्हारी ओर की है और वह जिसकी ताकीद हमने इबराहीम और मूसा और ईसा को की थी यह है कि "धर्म को क़ायम करो और उसके विषय में अलग-अलग न हो जाओ।" बहुदेववादियों को वह चीज़ बहुत अप्रिय है, जिसकी ओर तुम उन्हें बुलाते हो। अल्लाह जिसे चाहता है अपनी ओर छाँट लेता है और अपनी ओर का मार्ग उसी को दिखाता है जो उसकी ओर रुजू करता है
وَمَا تَفَرَّقُٓوا اِلَّا مِنْ بَعْدِ مَا جَٓاءَهُمُ الْعِلْمُ بَغْيًا بَيْنَهُمْۜ وَلَوْلَا كَلِمَةٌ سَبَقَتْ مِنْ رَبِّكَ اِلٰٓى اَجَلٍ مُسَمًّى لَقُضِيَ بَيْنَهُمْۜ وَاِنَّ الَّذ۪ينَ اُو۫رِثُوا الْكِتَابَ مِنْ بَعْدِهِمْ لَف۪ي شَكٍّ مِنْهُ مُر۪يبٍ14
उन्होंने तो परस्पर एक-दूसरे पर ज़्यादती करने के उद्देश्य से इसके पश्चात विभेद किया कि उनके पास ज्ञान आ चुका था। और यदि तुम्हारे रब की ओर से एक नियत अवधि तक के लिए बात पहले निश्चित न हो चुकी होती तो उनके बीच फ़ैसला चुका दिया गया होता। किन्तु जो लोग उनके पश्चात किताब के वारिस हुए वे उसकी ओर से एक उलझन में डाल देनेवाले संदेह में पड़े हुए है
فَلِذٰلِكَ فَادْعُۚ وَاسْتَقِمْ كَمَٓا اُمِرْتَۚ وَلَا تَتَّبِعْ اَهْوَٓاءَهُمْۚ وَقُلْ اٰمَنْتُ بِمَٓا اَنْزَلَ اللّٰهُ مِنْ كِتَابٍۚ وَاُمِرْتُ لِاَعْدِلَ بَيْنَكُمْۜ اَللّٰهُ رَبُّنَا وَرَبُّكُمْۜ لَنَٓا اَعْمَالُنَا وَلَكُمْ اَعْمَالُكُمْۜ لَا حُجَّةَ بَيْنَنَا وَبَيْنَكُمْۜ اَللّٰهُ يَجْمَعُ بَيْنَنَاۚ وَاِلَيْهِ الْمَص۪يرُۜ15
अतः इसी लिए (उन्हें सत्य की ओर) बुलाओ, और जैसा कि तुम्हें हुक्म दिया गया है स्वयं क़ायम रहो, और उनकी इच्छाओं का पालन न करना और कह दो, "अल्लाह ने जो किताब अवतरित की है, मैं उसपर ईमान लाया। मुझे तो आदेश हुआ है कि मैं तुम्हारे बीच न्याय करूँ। अल्लाह ही हमारा भी रब है और तुम्हारा भी। हमारे लिए हमारे कर्म है और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म। हममें और तुममें कोई झगड़ा नहीं। अल्लाह हम सबको इकट्ठा करेगा और अन्ततः उसी की ओर जाना है।"
وَالَّذ۪ينَ يُحَٓاجُّونَ فِي اللّٰهِ مِنْ بَعْدِ مَا اسْتُج۪يبَ لَهُ حُجَّتُهُمْ دَاحِضَةٌ عِنْدَ رَبِّهِمْ وَعَلَيْهِمْ غَضَبٌ وَلَهُمْ عَذَابٌ شَد۪يدٌ16
जो लोग अल्लाह के विषय में झगड़ते है, इसके पश्चात कि उसकी पुकार स्वीकार कर ली गई, उनका झगड़ना उनके रब की स्पष्ट में बिलकुल न ठहरनेवाला (असत्य) है। प्रकोप है उनपर और उनके लिए कड़ी यातना है
اَللّٰهُ الَّذ۪ٓي اَنْزَلَ الْكِتَابَ بِالْحَقِّ وَالْم۪يزَانَۜ وَمَا يُدْر۪يكَ لَعَلَّ السَّاعَةَ قَر۪يبٌ17
वह अल्लाह ही है जिसने हक़ के साथ किताब और तुला अवतरित की। और तुम्हें क्या मालूम कदाचित क़ियामत की घड़ी निकट ही आ लगी हो
يَسْتَعْجِلُ بِهَا الَّذ۪ينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِهَاۚ وَالَّذ۪ينَ اٰمَنُوا مُشْفِقُونَ مِنْهَاۙ وَيَعْلَمُونَ اَنَّهَا الْحَقُّۜ اَلَٓا اِنَّ الَّذ۪ينَ يُمَارُونَ فِي السَّاعَةِ لَف۪ي ضَلَالٍ بَع۪يدٍ18
उसकी जल्दी वे लोग मचाते है जो उसपर ईमान नहीं रखते, किन्तु जो ईमान रखते है वे तो उससे डरते है और जानते है कि वह सत्य है। जान लो, जो लोग उस घड़ी के बारे में सन्देह डालनेवाली बहसें करते है, वे परले दरजे की गुमराही में पड़े हुए है
اَللّٰهُ لَط۪يفٌ بِعِبَادِه۪ يَرْزُقُ مَنْ يَشَٓاءُۚ وَهُوَ الْقَوِيُّ الْعَز۪يزُ۟19
अल्लाह अपने बन्दों पर अत्यन्त दयालु है। वह जिसे चाहता है रोज़ी देता है। वह शक्तिमान, अत्यन्त प्रभुत्वशाली है
مَنْ كَانَ يُر۪يدُ حَرْثَ الْاٰخِرَةِ نَزِدْ لَهُ ف۪ي حَرْثِه۪ۚ وَمَنْ كَانَ يُر۪يدُ حَرْثَ الدُّنْيَا نُؤْتِه۪ مِنْهَا وَمَا لَهُ فِي الْاٰخِرَةِ مِنْ نَص۪يبٍ20
जो कोई आख़िरत की खेती चाहता है, हम उसके लिए उसकी खेती में बढ़ोत्तरी प्रदान करेंगे और जो कोई दुनिया की खेती चाहता है, हम उसमें से उसे कुछ दे देते है, किन्तु आख़िरत में उसका कोई हिस्सा नहीं
اَمْ لَهُمْ شُرَكٰٓؤُ۬ا شَرَعُوا لَهُمْ مِنَ الدّ۪ينِ مَا لَمْ يَاْذَنْ بِهِ اللّٰهُۜ وَلَوْلَا كَلِمَةُ الْفَصْلِ لَقُضِيَ بَيْنَهُمْۜ وَاِنَّ الظَّالِم۪ينَ لَهُمْ عَذَابٌ اَل۪يمٌ21
(क्या उन्हें समझ नहीं) या उनके कुछ ऐसे (ठहराए हुए) साझीदार है, जिन्होंन उनके लिए कोई ऐसा धर्म निर्धारित कर दिया है जिसकी अनुज्ञा अल्लाह ने नहीं दी? यदि फ़ैसले की बात निश्चित न हो गई होती तो उनके बीच फ़ैसला हो चुका होता। निश्चय ही ज़ालिमों के लिए दुखद यातना है
تَرَى الظَّالِم۪ينَ مُشْفِق۪ينَ مِمَّا كَسَبُوا وَهُوَ وَاقِعٌ بِهِمْۜ وَالَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ ف۪ي رَوْضَاتِ الْجَنَّاتِۚ لَهُمْ مَا يَشَٓاؤُ۫نَ عِنْدَ رَبِّهِمْۜ ذٰلِكَ هُوَ الْفَضْلُ الْكَب۪يرُ22
तुम ज़ालिमों को देखोगे कि उन्होंने जो कुछ कमाया उससे डर रहे होंगे, किन्तु वह तो उनपर पड़कर रहेगा। किन्तु जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए, वे जन्न्तों की वाटिकाओं में होंगे। उनके लिए उनके रब के पास वह सब कुछ है जिसकी वे इच्छा करेंगे। वही तो बड़ा उदार अनुग्रह है
ذٰلِكَ الَّذ۪ي يُبَشِّرُ اللّٰهُ عِبَادَهُ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِۜ قُلْ لَٓا اَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ اَجْرًا اِلَّا الْمَوَدَّةَ فِي الْقُرْبٰىۜ وَمَنْ يَقْتَرِفْ حَسَنَةً نَزِدْ لَهُ ف۪يهَا حُسْنًاۜ اِنَّ اللّٰهَ غَفُورٌ شَكُورٌ23
उसी की शुभ सूचना अल्लाह अपने बन्दों को देता है जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए। कहो, "मैं इसका तुमसे कोई पारिश्रमिक नहीं माँगता, बस निकटता का प्रेम-भाव चाहता हूँ, जो कोई नेकी कमाएगा हम उसके लिए उसमें अच्छाई की अभिवृद्धि करेंगे। निश्चय ही अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, गुणग्राहक है।"
اَمْ يَقُولُونَ افْتَرٰى عَلَى اللّٰهِ كَذِبًاۚ فَاِنْ يَشَاِ اللّٰهُ يَخْتِمْ عَلٰى قَلْبِكَۜ وَيَمْحُ اللّٰهُ الْبَاطِلَ وَيُحِقُّ الْحَقَّ بِكَلِمَاتِه۪ۜ اِنَّهُ عَل۪يمٌ بِذَاتِ الصُّدُورِ24
(क्या वे ईमान नहीं लाएँगे) या उनका कहना है कि "इस व्यक्ति ने अल्लाह पर मिथ्यारोपण किया है?" यदि अल्लाह चाहे तो तुम्हारे दिल पर मुहर लगा दे (जिस प्रकार उसने इनकार करनेवालों के दिल पर मुहर लगा दी है) । अल्लाह तो असत्य को मिटा रहा है और सत्य को अपने बोलों से सिद्ध कर रहा है। निश्चय ही वह सीनों तक की बात को भी भली-भाँति जानता है
وَهُوَ الَّذ۪ي يَقْبَلُ التَّوْبَةَ عَنْ عِبَادِه۪ وَيَعْفُوا عَنِ السَّيِّـَٔاتِ وَيَعْلَمُ مَا تَفْعَلُونَۙ25
वही है जो अपने बन्दों की तौबा क़बूल करता है और बुराइयों को माफ़ करता है, हालाँकि वह जानता है, जो कुछ तुम करते हो
وَيَسْتَج۪يبُ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ وَيَز۪يدُهُمْ مِنْ فَضْلِه۪ۜ وَالْكَافِرُونَ لَهُمْ عَذَابٌ شَد۪يدٌ26
और वह उन लोगों की प्रार्थनाएँ स्वीकार करता है जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए। और अपने उदार अनुग्रह से उन्हें और अधिक प्रदान करता है। रहे इनकार करनेवाले, तो उनके लिए कड़ा यातना है
وَلَوْ بَسَطَ اللّٰهُ الرِّزْقَ لِعِبَادِه۪ لَبَغَوْا فِي الْاَرْضِ وَلٰكِنْ يُنَزِّلُ بِقَدَرٍ مَا يَشَٓاءُۜ اِنَّهُ بِعِبَادِه۪ خَب۪يرٌ بَص۪يرٌ27
यदि अल्लाह अपने बन्दों के लिए रोज़ी कुशादा कर देता तो वे धरती में सरकशी करने लगते। किन्तु वह एक अंदाज़े के साथ जो चाहता है, उतारता है। निस्संदेह वह अपने बन्दों की ख़बर रखनेवाला है। वह उनपर निगाह रखता है
وَهُوَ الَّذ۪ي يُنَزِّلُ الْغَيْثَ مِنْ بَعْدِ مَا قَنَطُوا وَيَنْشُرُ رَحْمَتَهُۜ وَهُوَ الْوَلِيُّ الْحَم۪يدُ28
वही है जो इसके पश्चात कि लोग निराश हो चुके होते है, मेंह बरसाता है और अपनी दयालुता को फैला देता है। और वही है संरक्षक मित्र, प्रशंसनीय!
وَمِنْ اٰيَاتِه۪ خَلْقُ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِ وَمَا بَثَّ ف۪يهِمَا مِنْ دَٓابَّةٍۜ وَهُوَ عَلٰى جَمْعِهِمْ اِذَا يَشَٓاءُ قَد۪يرٌ۟29
और उसकी निशानियों में से है आकाशों और धरती को पैदा करना, और वे जीवधारी भी जो उसने इन दोनों में फैला रखे है। वह जब चाहे उन्हें इकट्ठा करने की सामर्थ्य भी रखता है
وَمَٓا اَصَابَكُمْ مِنْ مُص۪يبَةٍ فَبِمَا كَسَبَتْ اَيْد۪يكُمْ وَيَعْفُوا عَنْ كَث۪يرٍۜ30
जो मुसीबत तुम्हें पहुँची वह तो तुम्हारे अपने हाथों की कमाई से पहुँची और बहुत कुछ तो वह माफ़ कर देता है
وَمَٓا اَنْتُمْ بِمُعْجِز۪ينَ فِي الْاَرْضِۚ وَمَا لَكُمْ مِنْ دُونِ اللّٰهِ مِنْ وَلِيٍّ وَلَا نَص۪يرٍ31
तुम धरती में काबू से निकल जानेवाले नहीं हो, और न अल्लाह से हटकर तुम्हारा कोई संरक्षक मित्र है और न सहायक ही
وَمِنْ اٰيَاتِهِ الْجَوَارِ فِي الْبَحْرِ كَالْاَعْلَامِۜ32
उसकी निशानियों में से समुद्र में पहाड़ो के सदृश चलते जहाज़ भी है
اِنْ يَشَاْ يُسْكِنِ الرّ۪يحَ فَيَظْلَلْنَ رَوَاكِدَ عَلٰى ظَهْرِه۪ۜ اِنَّ ف۪ي ذٰلِكَ لَاٰيَاتٍ لِكُلِّ صَبَّارٍ شَكُورٍۙ33
यदि वह चाहे तो वायु को ठहरा दे, तो वे समुद्र की पीठ पर ठहरे रह जाएँ - निश्चय ही इसमें कितनी ही निशानियाँ है हर उस व्यक्ति के लिए जो अत्यन्त धैर्यवान, कृतज्ञ हो
اَوْ يُوبِقْهُنَّ بِمَا كَسَبُوا وَيَعْفُ عَنْ كَث۪يرٍۘ34
या उनको उनकी कमाई के कारण विनष्ट कर दे और बहुतो को माफ़ भी कर दे
وَيَعْلَمَ الَّذ۪ينَ يُجَادِلُونَ ف۪ٓي اٰيَاتِنَاۜ مَا لَهُمْ مِنْ مَح۪يصٍ35
और परिणामतः वे लोग जान लें जो हमारी आयतों में झगड़ते है कि उनके लिए भागने की कोई जगह नहीं
فَمَٓا اُو۫ت۪يتُمْ مِنْ شَيْءٍ فَمَتَاعُ الْحَيٰوةِ الدُّنْيَاۚ وَمَا عِنْدَ اللّٰهِ خَيْرٌ وَاَبْقٰى لِلَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَلٰى رَبِّهِمْ يَتَوَكَّلُونَۚ36
तुम्हें जो चीज़ भी मिली है वह तो सांसारिक जीवन की अस्थायी सुख-सामग्री है। किन्तु जो कुछ अल्लाह के पास है वह उत्तम है और शेष रहनेवाला भी, वह उन्ही के लिए है जो ईमान लाए और अपने रब पर भरोसा रखते है;
وَالَّذ۪ينَ يَجْتَنِبُونَ كَبَٓائِرَ الْاِثْمِ وَالْفَوَاحِشَ وَاِذَا مَا غَضِبُوا هُمْ يَغْفِرُونَۚ37
जो बड़े-बड़े गुनाहों और अश्लील कर्मों से बचते है और जब उन्हे (किसी पर) क्रोध आता है तो वे क्षमा कर देते हैं;
وَالَّذ۪ينَ اسْتَجَابُوا لِرَبِّهِمْ وَاَقَامُوا الصَّلٰوةَۖ وَاَمْرُهُمْ شُورٰى بَيْنَهُمْۖ وَمِمَّا رَزَقْنَاهُمْ يُنْفِقُونَۚ38
और जिन्होंने अपने रब का हुक्म माना और नमाज़ क़ायम की, और उनका मामला उनके पारस्परिक परामर्श से चलता है, और जो कुछ हमने उन्हें दिया है उसमें से ख़र्च करते है;
وَالَّذ۪ينَ اِذَٓا اَصَابَهُمُ الْبَغْيُ هُمْ يَنْتَصِرُونَ39
और जो ऐसे है कि जब उनपर ज़्यादती होती है तो वे प्रतिशोध करते है
وَجَزٰٓؤُ۬ا سَيِّئَةٍ سَيِّئَةٌ مِثْلُهَاۚ فَمَنْ عَفَا وَاَصْلَحَ فَاَجْرُهُ عَلَى اللّٰهِۜ اِنَّهُ لَا يُحِبُّ الظَّالِم۪ينَ40
बुराई का बदला वैसी ही बुराई है किन्तु जो क्षमा कर दे और सुधार करे तो उसका बदला अल्लाह के ज़िम्मे है। निश्चय ही वह ज़ालिमों को पसन्द नहीं करता
وَلَمَنِ انْتَصَرَ بَعْدَ ظُلْمِه۪ فَاُو۬لٰٓئِكَ مَا عَلَيْهِمْ مِنْ سَب۪يلٍۜ41
और जो कोई अपने ऊपर ज़ु्ल्म होने के पश्चात बदला ले ले, तो ऐसे लोगों पर कोई इलज़ाम नहीं
اِنَّمَا السَّب۪يلُ عَلَى الَّذ۪ينَ يَظْلِمُونَ النَّاسَ وَيَبْغُونَ فِي الْاَرْضِ بِغَيْرِ الْحَقِّۜ اُو۬لٰٓئِكَ لَهُمْ عَذَابٌ اَل۪يمٌ42
इलज़ाम तो केवल उनपर आता है जो लोगों पर ज़ुल्म करते है और धरती में नाहक़ ज़्यादती करते है। ऐसे लोगों के लिए दुखद यातना है
وَلَمَنْ صَبَرَ وَغَفَرَ اِنَّ ذٰلِكَ لَمِنْ عَزْمِ الْاُمُورِ۟43
किन्तु जिसने धैर्य से काम लिया और क्षमा कर दिया तो निश्चय ही वह उन कामों में से है जो (सफलता के लिए) आवश्यक ठहरा दिए गए है
وَمَنْ يُضْلِلِ اللّٰهُ فَمَا لَهُ مِنْ وَلِيٍّ مِنْ بَعْدِه۪ۜ وَتَرَى الظَّالِم۪ينَ لَمَّا رَاَوُا الْعَذَابَ يَقُولُونَ هَلْ اِلٰى مَرَدٍّ مِنْ سَب۪يلٍۚ44
जिस व्यक्ति को अल्लाह गुमराही में डाल दे, तो उसके पश्चात उसे सम्भालनेवाला कोई भी नहीं। तुम ज़ालिमों को देखोगे कि जब वे यातना को देख लेंगे तो कह रहे होंगे, "क्या लौटने का भी कोई मार्ग है?"
وَتَرٰيهُمْ يُعْرَضُونَ عَلَيْهَا خَاشِع۪ينَ مِنَ الذُّلِّ يَنْظُرُونَ مِنْ طَرْفٍ خَفِيٍّۜ وَقَالَ الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اِنَّ الْخَاسِر۪ينَ الَّذ۪ينَ خَسِرُٓوا اَنْفُسَهُمْ وَاَهْل۪يهِمْ يَوْمَ الْقِيٰمَةِۜ اَلَٓا اِنَّ الظَّالِم۪ينَ ف۪ي عَذَابٍ مُق۪يمٍ45
और तुम उन्हें देखोगे कि वे उस (जहन्नम) पर इस दशा में लाए जा रहे है कि बेबसी और अपमान के कारण दबे हुए है। कनखियों से देख रहे है। जो लोग ईमान लाए, वे उस समय कहेंगे कि "निश्चय ही घाटे में पड़नेवाले वही है जिन्होंने क़ियामत के दिन अपने आपको और अपने लोगों को घाटे में डाल दिया। सावधान! निश्चय ही ज़ालिम स्थिर रहनेवाली यातना में होंगे
وَمَا كَانَ لَهُمْ مِنْ اَوْلِيَٓاءَ يَنْصُرُونَهُمْ مِنْ دُونِ اللّٰهِۜ وَمَنْ يُضْلِلِ اللّٰهُ فَمَا لَهُ مِنْ سَب۪يلٍۜ46
और उनके कुछ संरक्षक भी न होंगे, जो सहायता करके उन्हें अल्लाह से बचा सकें। जिसे अल्लाह गुमराही में डाल दे तो उसके लिए फिर कोई मार्ग नहीं।"
اِسْتَج۪يبُوا لِرَبِّكُمْ مِنْ قَبْلِ اَنْ يَاْتِيَ يَوْمٌ لَا مَرَدَّ لَهُ مِنَ اللّٰهِۜ مَا لَكُمْ مِنْ مَلْجَاٍ يَوْمَئِذٍ وَمَا لَكُمْ مِنْ نَك۪يرٍ47
अपने रब की बात मान लो इससे पहले कि अल्लाह की ओर से वह दिन आ जाए जो पलटने का नहीं। उस दिन तुम्हारे लिए न कोई शरण-स्थल होगा और न तुम किसी चीज़ को रद्द कर सकोगे
فَاِنْ اَعْرَضُوا فَمَٓا اَرْسَلْنَاكَ عَلَيْهِمْ حَف۪يظًاۜ اِنْ عَلَيْكَ اِلَّا الْبَلَاغُۜ وَاِنَّٓا اِذَٓا اَذَقْنَا الْاِنْسَانَ مِنَّا رَحْمَةً فَرِحَ بِهَاۜ وَاِنْ تُصِبْهُمْ سَيِّئَةٌ بِمَا قَدَّمَتْ اَيْد۪يهِمْ فَاِنَّ الْاِنْسَانَ كَفُورٌ48
अब यदि वे ध्यान में न लाएँ तो हमने तो तुम्हें उनपर कोई रक्षक बनाकर तो भेजा नहीं है। तुमपर तो केवल (संदेश) पहुँचा देने की ज़िम्मेदारी है। हाल यह है कि जब हम मनुष्य को अपनी ओर से किसी दयालुता का आस्वादन कराते है तो वह उसपर इतराने लगता है, किन्तु ऐसे लोगों के हाथों ने जो कुछ आगे भेजा है उसके कारण यदि उन्हें कोई तकलीफ़ पहुँचती है तो निश्चय ही वही मनुष्य बड़ा कृतघ्न बन जाता है
لِلّٰهِ مُلْكُ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ يَخْلُقُ مَا يَشَٓاءُۜ يَهَبُ لِمَنْ يَشَٓاءُ اِنَاثًا وَيَهَبُ لِمَنْ يَشَٓاءُ الذُّكُورَۙ49
अल्लाह ही की है आकाशों और धरती की बादशाही। वह जो चाहता है पैदा करता है, जिसे चाहता है लड़कियाँ देता है और जिसे चाहता है लड़के देता है।
اَوْ يُزَوِّجُهُمْ ذُكْرَانًا وَاِنَاثًاۚ وَيَجْعَلُ مَنْ يَشَٓاءُ عَق۪يمًاۜ اِنَّهُ عَل۪يمٌ قَد۪يرٌ50
या उन्हें लड़के और लड़कियाँ मिला-जुलाकर देता है और जिसे चाहता है निस्संतान रखता है। निश्चय ही वह सर्वज्ञ, सामर्थ्यवान है
وَمَا كَانَ لِبَشَرٍ اَنْ يُكَلِّمَهُ اللّٰهُ اِلَّا وَحْيًا اَوْ مِنْ وَرَٓائِ۬ حِجَابٍ اَوْ يُرْسِلَ رَسُولًا فَيُوحِيَ بِاِذْنِه۪ مَا يَشَٓاءُۜ اِنَّهُ عَلِيٌّ حَك۪يمٌ51
किसी मनुष्य की यह शान नहीं कि अल्लाह उससे बात करे, सिवाय इसके कि प्रकाशना के द्वारा या परदे के पीछे से (बात करे) । या यह कि वह एक रसूल (फ़रिश्ता) भेज दे, फिर वह उसकी अनुज्ञा से जो कुछ वह चाहता है प्रकाशना कर दे। निश्चय ही वह सर्वोच्च अत्यन्त तत्वदर्शी है
وَكَذٰلِكَ اَوْحَيْنَٓا اِلَيْكَ رُوحًا مِنْ اَمْرِنَاۜ مَا كُنْتَ تَدْر۪ي مَا الْكِتَابُ وَلَا الْا۪يمَانُ وَلٰكِنْ جَعَلْنَاهُ نُورًا نَهْد۪ي بِه۪ مَنْ نَشَٓاءُ مِنْ عِبَادِنَاۜ وَاِنَّكَ لَتَهْد۪ٓي اِلٰى صِرَاطٍ مُسْتَق۪يمٍۙ52
और इसी प्रकार हमने अपने आदेश से एक रूह (क़ुरआन) की प्रकाशना तुम्हारी ओर की है। तुम नहीं जानते थे कि किताब क्या होती है और न ईमान को (जानते थे), किन्तु हमने इस (प्रकाशना) को एक प्रकाश बनाया, जिसके द्वारा हम अपने बन्दों में से जिसे चाहते है मार्ग दिखाते है। निश्चय ही तुम एक सीधे मार्ग की ओर पथप्रदर्शन कर रहे हो-
صِرَاطِ اللّٰهِ الَّذ۪ي لَهُ مَا فِي السَّمٰوَاتِ وَمَا فِي الْاَرْضِۜ اَلَٓا اِلَى اللّٰهِ تَص۪يرُ الْاُمُورُ53
उस अल्लाह के मार्ग की ओर जिसका वह सब कुछ है, जो आकाशों में है और जो धरती में है। सुन लो, सारे मामले अन्ततः अल्लाह ही की ओर पलटते हैं
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
حٰمٓۜ1
हा॰ मीम॰
وَالْكِتَابِ الْمُب۪ينِۙ2
गवाह है स्पष्ट किताब
اِنَّا جَعَلْنَاهُ قُرْءٰنًا عَرَبِيًّا لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَۚ3
हमने उसे अरबी क़ुरआन बनाया, ताकि तुम समझो
وَاِنَّهُ ف۪ٓي اُمِّ الْكِتَابِ لَدَيْنَا لَعَلِيٌّ حَك۪يمٌۜ4
और निश्चय ही वह मूल किताब में अंकित है, हमारे यहाँ बहुच उच्च कोटि की, तत्वदर्शिता से परिपूर्ण है
اَفَنَضْرِبُ عَنْكُمُ الذِّكْرَ صَفْحًا اَنْ كُنْتُمْ قَوْمًا مُسْرِف۪ينَ5
क्या इसलिए कि तुम मर्यादाहीन लोग हो, हम तुमपर से बिलकुल ही नज़र फेर लेंगे?
وَكَمْ اَرْسَلْنَا مِنْ نَبِيٍّ فِي الْاَوَّل۪ينَ6
हमने पहले के लोगों में कितने ही रसूल भेजे
وَمَا يَاْت۪يهِمْ مِنْ نَبِيٍّ اِلَّا كَانُوا بِه۪ يَسْتَهْزِؤُ۫نَ7
किन्तु जो भी नबी उनके पास आया, वे उसका परिहास ही करते रहे
فَاَهْلَكْنَٓا اَشَدَّ مِنْهُمْ بَطْشًا وَمَضٰى مَثَلُ الْاَوَّل۪ينَ8
अन्ततः हमने उनको पकड़ में लेकर विनष्ट कर दिया जो उनसे कहीं अधिक बलशाली थे। और पहले के लोगों की मिसाल गुज़र-चुकी है
وَلَئِنْ سَاَلْتَهُمْ مَنْ خَلَقَ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضَ لَيَقُولُنَّ خَلَقَهُنَّ الْعَز۪يزُ الْعَل۪يمُۙ9
यदि तुम उनसे पूछो कि "आकाशों और धरती को किसने पैदा किया?" तो वे अवश्य कहेंगे, "उन्हें अत्यन्त प्रभुत्वशाली, सर्वज्ञ सत्ता ने पैदा किया।"
اَلَّذ۪ي جَعَلَ لَكُمُ الْاَرْضَ مَهْدًا وَجَعَلَ لَكُمْ ف۪يهَا سُبُلًا لَعَلَّكُمْ تَهْتَدُونَۚ10
जिसने तुम्हारे लिए धरती को गहवारा बनाया औऱ उसमें तुम्हारे लिए मार्ग बना दिए. ताकि तुम्हें मार्गदर्शन प्राप्त हो
وَالَّذ۪ي نَزَّلَ مِنَ السَّمَٓاءِ مَٓاءً بِقَدَرٍۚ فَاَنْشَرْنَا بِه۪ بَلْدَةً مَيْتًاۚ كَذٰلِكَ تُخْرَجُونَ11
और जिसने आकाश से एक अन्दाज़े से पानी उतारा। और हमने उसके द्वारा मृत भूमि को जीवित कर दिया। इसी तरह तुम भी (जीवित करके) निकाले जाओगे
وَالَّذ۪ي خَلَقَ الْاَزْوَاجَ كُلَّهَا وَجَعَلَ لَكُمْ مِنَ الْفُلْكِ وَالْاَنْعَامِ مَا تَرْكَبُونَۙ12
और जिसने विभिन्न प्रकार की चीज़े पैदा कीं, और तुम्हारे लिए वे नौकाएँ और जानवर बनाए जिनपर तुम सवार होते हो
لِتَسْتَوُ۫ا عَلٰى ظُهُورِه۪ ثُمَّ تَذْكُرُوا نِعْمَةَ رَبِّكُمْ اِذَا اسْتَوَيْتُمْ عَلَيْهِ وَتَقُولُوا سُبْحَانَ الَّذ۪ي سَخَّرَ لَنَا هٰذَا وَمَا كُنَّا لَهُ مُقْرِن۪ينَۙ13
ताकि तुम उनकी पीठों पर जमकर बैठो, फिर याद करो अपने रब की अनुकम्पा को जब तुम उनपर बैठ जाओ और कहो, "कितना महिमावान है वह जिसने इसको हमारे वश में किया, अन्यथा हम तो इसे क़ाबू में कर सकनेवाले न थे
وَاِنَّٓا اِلٰى رَبِّنَا لَمُنْقَلِبُونَ14
और निश्चय ही हम अपने रब की ओर लौटनेवाले है।"
وَجَعَلُوا لَهُ مِنْ عِبَادِه۪ جُزْءًاۜ اِنَّ الْاِنْسَانَ لَكَفُورٌ مُب۪ينٌۜ15
उन्होंने उसके बन्दों में से कुछ को उसका अंश ठहरा दिया! निश्चय ही मनुष्य खुला कृतघ्न है
اَمِ اتَّخَذَ مِمَّا يَخْلُقُ بَنَاتٍ وَاَصْفٰيكُمْ بِالْبَن۪ينَ۟16
(क्या किसी ने अल्लाह को इससे रोक दिया है कि वह अपने लिए बेटे चुनता) या जो कुछ वह पैदा करता है उसमें से उसने स्वयं ही अपने लिए तो बेटियाँ लीं और तुम्हें चुन लिया बेटों के लिए?
وَاِذَا بُشِّرَ اَحَدُهُمْ بِمَا ضَرَبَ لِلرَّحْمٰنِ مَثَلًا ظَلَّ وَجْهُهُ مُسْوَدًّا وَهُوَ كَظ۪يمٌ17
और हाल यह है कि जब उनमें से किसी को उसकी मंगल सूचना दी जाती है, जो वह रहमान के लिए बयान करता है, तो उसके मुँह पर कलौंस छा जाती है और वह ग़म के मारे घुटा-घुटा रहने लगता है
اَوَمَنْ يُنَشَّؤُ۬ا فِي الْحِلْيَةِ وَهُوَ فِي الْخِصَامِ غَيْرُ مُب۪ينٍ18
और क्या वह जो आभूषणों में पले और वह जो वाद-विवाद और झगड़े में खुल न पाए (ऐसी अबला को अल्लाह की सन्तान घोषित करते हो)?
وَجَعَلُوا الْمَلٰٓئِكَةَ الَّذ۪ينَ هُمْ عِبَادُ الرَّحْمٰنِ اِنَاثًاۜ اَشَهِدُوا خَلْقَهُمْۜ سَتُكْتَبُ شَهَادَتُهُمْ وَيُسْـَٔلُونَ19
उन्होंने फ़रिश्तों को, जो रहमान के बन्दे है, स्त्रियाँ ठहरा ली है। क्या वे उनकी संरचना के समय मौजूद थे? उनकी गवाही लिख ली जाएगी और उनसे पूछ होगी
وَقَالُوا لَوْ شَٓاءَ الرَّحْمٰنُ مَا عَبَدْنَاهُمْۜ مَا لَهُمْ بِذٰلِكَ مِنْ عِلْمٍۗ اِنْ هُمْ اِلَّا يَخْرُصُونَۜ20
वे कहते है कि "यदि रहमान चाहता तो हम उन्हें न पूजते।" उन्हें इसका कुछ ज्ञान नहीं। वे तो बस अटकल दौड़ाते है
اَمْ اٰتَيْنَاهُمْ كِتَابًا مِنْ قَبْلِه۪ فَهُمْ بِه۪ مُسْتَمْسِكُونَ21
(क्या हमने इससे पहले उनके पास कोई रसूल भेजा है) या हमने इससे पहले उनको कोई किताब दी है तो वे उसे दृढ़तापूर्वक थामें हुए है?
بَلْ قَالُٓوا اِنَّا وَجَدْنَٓا اٰبَٓاءَنَا عَلٰٓى اُمَّةٍ وَاِنَّا عَلٰٓى اٰثَارِهِمْ مُهْتَدُونَ22
नहीं, बल्कि वे कहते है, "हमने तो अपने बाप-दादा को एक तरीक़े पर पाया और हम उन्हीं के पद-चिन्हों पर हैं, सीधे मार्ग पर चल रहे है।"
وَكَذٰلِكَ مَٓا اَرْسَلْنَا مِنْ قَبْلِكَ ف۪ي قَرْيَةٍ مِنْ نَذ۪يرٍ اِلَّا قَالَ مُتْرَفُوهَٓاۙ اِنَّا وَجَدْنَٓا اٰبَٓاءَنَا عَلٰٓى اُمَّةٍ وَاِنَّا عَلٰٓى اٰثَارِهِمْ مُقْتَدُونَ23
इसी प्रकार हमने जिस किसी बस्ती में तुमसे पहले कोई सावधान करनेवाला भेजा तो वहाँ के सम्पन्न लोगों ने बस यही कहा कि "हमने तो अपने बाप-दादा को एक तरीक़े पर पाया और हम उन्हीं के पद-चिन्हों पर है, उनका अनुसरण कर रहे है।"
قَالَ اَوَلَوْ جِئْتُكُمْ بِاَهْدٰى مِمَّا وَجَدْتُمْ عَلَيْهِ اٰبَٓاءَكُمْۜ قَالُٓوا اِنَّا بِمَٓا اُرْسِلْتُمْ بِه۪ كَافِرُونَ24
उसने कहा, "क्या यदि मैं उससे उत्तम मार्गदर्शन लेकर आया हूँ, जिसपर तूने अपने बाप-दादा को पाया है, तब भी (तुम अपने बाप-दादा के पद-चिह्मों का ही अनुसरण करोगं)?" उन्होंने कहा, "तुम्हें जो कुछ देकर भेजा गया है, हम तो उसका इनकार करते है।"
فَانْتَقَمْنَا مِنْهُمْ فَانْظُرْ كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الْمُكَذِّب۪ينَ۟25
अन्ततः हमने उनसे बदला लिया। तो देख लो कि झुठलानेवालों का कैसा परिणाम हुआ?
وَاِذْ قَالَ اِبْرٰه۪يمُ لِاَب۪يهِ وَقَوْمِه۪ٓ اِنَّن۪ي بَرَٓاءٌ مِمَّا تَعْبُدُونَۙ26
याद करो, जबकि इबराहीम ने अपने बाप और अपनी क़ौम से कहा, "तुम जिनको पूजते हो उनसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं,
اِلَّا الَّذ۪ي فَطَرَن۪ي فَاِنَّهُ سَيَهْد۪ينِ27
सिवाय उसके जिसने मुझे पैदा किया। अतः निश्चय ही वह मुझे मार्ग दिखाएगा।"
وَجَعَلَهَا كَلِمَةً بَاقِيَةً ف۪ي عَقِبِه۪ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ28
और यही बात वह अपने पीछे (अपनी सन्तान में) बाक़ी छोड़ गया, ताकि वे रुजू करें
بَلْ مَتَّعْتُ هٰٓؤُ۬لَٓاءِ وَاٰبَٓاءَهُمْ حَتّٰى جَٓاءَهُمُ الْحَقُّ وَرَسُولٌ مُب۪ينٌ29
नहीं,बल्कि मैं उन्हें और उनके बाप-दादा को जीवन-सुख प्रदान करता रहा, यहाँ तक कि उनके पास सत्य और खोल-खोलकर बतानेवाला रसूल आ गया
وَلَمَّا جَٓاءَهُمُ الْحَقُّ قَالُوا هٰذَا سِحْرٌ وَاِنَّا بِه۪ كَافِرُونَ30
किन्तु जब वह हक़ लेकर उनके पास आया तो वे कहने लगे, "यह तो जादू है। और हम तो इसका इनकार करते है।"
وَقَالُوا لَوْلَا نُزِّلَ هٰذَا الْقُرْاٰنُ عَلٰى رَجُلٍ مِنَ الْقَرْيَتَيْنِ عَظ۪يمٍ31
वे कहते है, "यह क़ुरआन इन दो बस्तियों के किसी बड़े आदमी पर क्यों नहीं अवतरित हुआ?"
اَهُمْ يَقْسِمُونَ رَحْمَتَ رَبِّكَۜ نَحْنُ قَسَمْنَا بَيْنَهُمْ مَع۪يشَتَهُمْ فِي الْحَيٰوةِ الدُّنْيَا وَرَفَعْنَا بَعْضَهُمْ فَوْقَ بَعْضٍ دَرَجَاتٍ لِيَتَّخِذَ بَعْضُهُمْ بَعْضًا سُخْرِيًّاۜ وَرَحْمَتُ رَبِّكَ خَيْرٌ مِمَّا يَجْمَعُونَ32
क्या वे तुम्हारे रब की दयालुता को बाँटते है? सांसारिक जीवन में उनके जीवन-यापन के साधन हमने उनके बीच बाँटे है और हमने उनमें से कुछ लोगों को दूसरे कुछ लोगों से श्रेणियों की दृष्टि से उच्च रखा है, ताकि उनमें से वे एक-दूसरे से काम लें। और तुम्हारे रब की दयालुता उससे कहीं उत्तम है जिसे वे समेट रहे है
وَلَوْلَٓا اَنْ يَكُونَ النَّاسُ اُمَّةً وَاحِدَةً لَجَعَلْنَا لِمَنْ يَكْفُرُ بِالرَّحْمٰنِ لِبُيُوتِهِمْ سُقُفًا مِنْ فِضَّةٍ وَمَعَارِجَ عَلَيْهَا يَظْهَرُونَۙ33
यदि इस बात की सम्भावना न होती कि सब लोग एक ही समुदाय (अधर्मी) हो जाएँगे, तो जो लोग रहमान के साथ कुफ़्र करते है उनके लिए हम उनके घरों की छतें चाँदी की कर देते है और सीढ़ियाँ भी जिनपर वे चढ़ते।
وَلِبُيُوتِهِمْ اَبْوَابًا وَسُرُرًا عَلَيْهَا يَتَّكِؤُ۫نَۙ34
और उनके घरों के दरवाज़े भी और वे तख़्त भी जिनपर वे टेक लगाते
وَزُخْرُفًاۜ وَاِنْ كُلُّ ذٰلِكَ لَمَّا مَتَاعُ الْحَيٰوةِ الدُّنْيَاۜ وَالْاٰخِرَةُ عِنْدَ رَبِّكَ لِلْمُتَّق۪ينَ۟35
और सोने द्वारा सजावट का आयोजन भी कर देते। यह सब तो कुछ भी नहीं, बस सांसारिक जीवन की अस्थायी सुख-सामग्री है। और आख़िरत तुम्हारे रब के यहाँ डर रखनेवालों के लिए है
وَمَنْ يَعْشُ عَنْ ذِكْرِ الرَّحْمٰنِ نُقَيِّضْ لَهُ شَيْطَانًا فَهُوَ لَهُ قَر۪ينٌ36
जो रहमान के स्मरण की ओर से अंधा बना रहा है, हम उसपर एक शैतान नियुक्त कर देते है तो वही उसका साथी होता है
وَاِنَّهُمْ لَيَصُدُّونَهُمْ عَنِ السَّب۪يلِ وَيَحْسَبُونَ اَنَّهُمْ مُهْتَدُونَ37
औऱ वे (शैतान) उन्हें मार्ग से रोकते है और वे (इनकार करनेवाले) यह समझते है कि वे मार्ग पर है
حَتّٰٓى اِذَا جَٓاءَنَا قَالَ يَا لَيْتَ بَيْن۪ي وَبَيْنَكَ بُعْدَ الْمَشْرِقَيْنِ فَبِئْسَ الْقَر۪ينُ38
यहाँ तक कि जब वह हमारे पास आएगा तो (शैतान से) कहेगा, "ऐ काश, मेरे और तेरे बीच पूरब के दोनों किनारों की दूरी होती! तू तो बहुत ही बुरा साथी निकला!"
وَلَنْ يَنْفَعَكُمُ الْيَوْمَ اِذْ ظَلَمْتُمْ اَنَّكُمْ فِي الْعَذَابِ مُشْتَرِكُونَ39
और जबकि तुम ज़ालिम ठहरे तो आज यह बात तुम्हें कुछ लाभ न पहुँचा सकेगी कि यातना में तुम एक-दूसरे के साझी हो
اَفَاَنْتَ تُسْمِعُ الصُّمَّ اَوْ تَهْدِي الْعُمْيَ وَمَنْ كَانَ ف۪ي ضَلَالٍ مُب۪ينٍ40
क्या तुम बहरों को सुनाओगे या अंधो को और जो खुली गुमराही में पड़ा हुआ हो उसको राह दिखाओगे?
فَاِمَّا نَذْهَبَنَّ بِكَ فَاِنَّا مِنْهُمْ مُنْتَقِمُونَۙ41
फिर यदि तुम्हें उठा भी लें तब भी हम उनसे बदला लेकर रहेंगे
اَوْ نُرِيَنَّكَ الَّذ۪ي وَعَدْنَاهُمْ فَاِنَّا عَلَيْهِمْ مُقْتَدِرُونَ42
या हम तुम्हें वह चीज़ दिखा देंगे जिसका हमने वादा किया है। निस्संदेह हमें उनपर पूरी सामर्थ्य प्राप्त है
فَاسْتَمْسِكْ بِالَّذ۪ٓي اُو۫حِيَ اِلَيْكَۚ اِنَّكَ عَلٰى صِرَاطٍ مُسْتَق۪يمٍ43
अतः तुम उस चीज़ को मज़बूती से थामे रहो जिसकी तुम्हारी ओर प्रकाशना की गई। निश्चय ही तु सीधे मार्ग पर हो
وَاِنَّهُ لَذِكْرٌ لَكَ وَلِقَوْمِكَۚ وَسَوْفَ تُسْـَٔلُونَ44
निश्चय ही वह अनुस्मृति है तुम्हारे लिए और तुम्हारी क़ौम के लिए। शीघ्र ही तुम सबसे पूछा जाएगा
وَسْـَٔلْ مَنْ اَرْسَلْنَا مِنْ قَبْلِكَ مِنْ رُسُلِنَاۗ اَجَعَلْنَا مِنْ دُونِ الرَّحْمٰنِ اٰلِهَةً يُعْبَدُونَ۟45
तुम हमारे रसूलों से, जिन्हें हमने तुमसे पहले भेजा, पूछ लो कि क्या हमने रहमान के सिवा भी कुछ उपास्य ठहराए थे, जिनकी बन्दगी की जाए?
وَلَقَدْ اَرْسَلْنَا مُوسٰى بِاٰيَاتِنَٓا اِلٰى فِرْعَوْنَ وَمَلَا۬ئِه۪ فَقَالَ اِنّ۪ي رَسُولُ رَبِّ الْعَالَم۪ينَ46
और हमने मूसा को अपनी निशानियों के साथ फ़िरऔन और उसके सरदारों के पास भेजा तो उसने कहा, "मैं सारे संसार के रब का रसूल हूँ।"
فَلَمَّا جَٓاءَهُمْ بِاٰيَاتِنَٓا اِذَا هُمْ مِنْهَا يَضْحَكُونَ47
लेकिन जब वह उनके पास हमारी निशानियाँ लेकर आया तो क्या देखते है कि वे लगे उनकी हँसी उड़ाने
وَمَا نُر۪يهِمْ مِنْ اٰيَةٍ اِلَّا هِيَ اَكْبَرُ مِنْ اُخْتِهَاۘ وَاَخَذْنَاهُمْ بِالْعَذَابِ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ48
और हम उन्हें जो निशानी भी दिखाते वह अपने प्रकार की पहली निशानी से बढ़-चढ़कर होती और हमने उन्हें यातना से ग्रस्त कर लिया, ताकि वे रुजू करें
وَقَالُوا يَٓا اَيُّهَ السَّاحِرُ ادْعُ لَنَا رَبَّكَ بِمَا عَهِدَ عِنْدَكَ اِنَّنَا لَمُهْتَدُونَ49
उनका कहना था, "ऐ जादूगर! अपने रब से हमारे लिए प्रार्थना कर, उस प्रतिज्ञा के आधार पर जो उसने तुझसे कर रखी है। निश्चय ही हम सीधे मार्ग पर चलेंगे।"
فَلَمَّا كَشَفْنَا عَنْهُمُ الْعَذَابَ اِذَا هُمْ يَنْكُثُونَ50
फिर जब भी हम उनपर ले यातना हटा देते है, तो क्या देखते है कि वे प्रतिज्ञा-भंग कर रहे है
وَنَادٰى فِرْعَوْنُ ف۪ي قَوْمِه۪ قَالَ يَا قَوْمِ اَلَيْسَ ل۪ي مُلْكُ مِصْرَ وَهٰذِهِ الْاَنْهَارُ تَجْر۪ي مِنْ تَحْت۪يۚ اَفَلَا تُبْصِرُونَۜ51
फ़िरऔन ने अपनी क़ौम के बीच पुकारकर कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! क्या मिस्र का राज्य मेरा नहीं और ये मेरे नीचे बहती नहरें? तो क्या तुम देखते नहीं?
اَمْ اَنَا۬ خَيْرٌ مِنْ هٰذَا الَّذ۪ي هُوَ مَه۪ينٌ وَلَا يَكَادُ يُب۪ينُ52
(यह अच्छा है) या मैं इससे अच्छा हूँ जो तुच्छ है, और साफ़ बोल भी नहीं पाता?
فَلَوْلَٓا اُلْقِيَ عَلَيْهِ اَسْوِرَةٌ مِنْ ذَهَبٍ اَوْ جَٓاءَ مَعَهُ الْمَلٰٓئِكَةُ مُقْتَرِن۪ينَ53
(यदि वह रसूल है तो) फिर ऐसा क्यों न हुआ कि उसके लिए ऊपर से सोने के कंगन डाले गए होते या उसके साथ पार्श्ववर्ती होकर फ़रिश्ते आए होते?"
فَاسْتَخَفَّ قَوْمَهُ فَاَطَاعُوهُۜ اِنَّهُمْ كَانُوا قَوْمًا فَاسِق۪ينَ54
तो उसने अपनी क़ौम के लोगों को मूर्ख बनाया औऱ उन्होंने उसकी बात मान ली। निश्चय ही वे अवज्ञाकारी लोग थे
فَلَمَّٓا اٰسَفُونَا انْتَقَمْنَا مِنْهُمْ فَاَغْرَقْنَاهُمْ اَجْمَع۪ينَۙ55
अन्ततः जब उन्होंने हमें अप्रसन्न कर दिया तो हमने उनसे बदला लिया और हमने उन सबको डूबो दिया
فَجَعَلْنَاهُمْ سَلَفًا وَمَثَلًا لِلْاٰخِر۪ينَ۟56
अतः हमने उन्हें अग्रगामी और बादवालों के लिए शिक्षाप्रद उदाहरण बना दिया
وَلَمَّا ضُرِبَ ابْنُ مَرْيَمَ مَثَلًا اِذَا قَوْمُكَ مِنْهُ يَصِدُّونَ57
और जब मरयम के बेटे की मिसाल दी गई तो क्या देखते है कि उसपर तुम्हारी क़ौम के लोग लगे चिल्लाने
وَقَالُٓوا ءَاٰلِهَتُنَا خَيْرٌ اَمْ هُوَۜ مَا ضَرَبُوهُ لَكَ اِلَّا جَدَلًاۜ بَلْ هُمْ قَوْمٌ خَصِمُونَ58
और कहने लगे, "क्या हमारे उपास्य अच्छे नहीं या वह (मसीह)?" उन्होंने यह बात तुमसे केवल झगड़ने के लिए कही, बल्कि वे तो है ही झगड़ालू लोग
اِنْ هُوَ اِلَّا عَبْدٌ اَنْعَمْنَا عَلَيْهِ وَجَعَلْنَاهُ مَثَلًا لِبَن۪ٓي اِسْرَٓاء۪يلَۜ59
वह (ईसा मसीह) तो बस एक बन्दा था, जिसपर हमने अनुकम्पा की और उसे हमने इसराईल की सन्तान के लिए एक आदर्श बनाया
وَلَوْ نَشَٓاءُ لَجَعَلْنَا مِنْكُمْ مَلٰٓئِكَةً فِي الْاَرْضِ يَخْلُفُونَ60
और यदि हम चाहते हो तुममें से फ़रिश्ते पैदा कर देते, जो धरती में उत्ताराधिकारी होते
وَاِنَّهُ لَعِلْمٌ لِلسَّاعَةِ فَلَا تَمْتَرُنَّ بِهَا وَاتَّبِعُونِۜ هٰذَا صِرَاطٌ مُسْتَق۪يمٌ61
निश्चय ही वह उस घड़ी (जिसका वादा किया गया है) के ज्ञान का साधन है। अतः तुम उसके बारे में संदेह न करो और मेरा अनुसरण करो। यही सीधा मार्ग है
وَلَا يَصُدَّنَّكُمُ الشَّيْطَانُۚ اِنَّهُ لَكُمْ عَدُوٌّ مُب۪ينٌ62
और शैतान तुम्हें रोक न दे, निश्चय ही वह तुम्हारा खुला शत्रु है
وَلَمَّا جَٓاءَ ع۪يسٰى بِالْبَيِّنَاتِ قَالَ قَدْ جِئْتُكُمْ بِالْحِكْمَةِ وَلِاُبَيِّنَ لَكُمْ بَعْضَ الَّذ۪ي تَخْتَلِفُونَ ف۪يهِۚ فَاتَّقُوا اللّٰهَ وَاَط۪يعُونِ63
जब ईसा स्पष्ट प्रमाणों के साथ आया तो उसने कहा, "मैं तुम्हारे पास तत्वदर्शिता लेकर आया हूँ (ताकि उसकी शिक्षा तुम्हें दूँ) और ताकि कुछ ऐसी बातें तुमपर खोल दूँ, जिनमं तुम मतभेद करते हो। अतः अल्लाह का डर रखो और मेरी बात मानो
اِنَّ اللّٰهَ هُوَ رَبّ۪ي وَرَبُّكُمْ فَاعْبُدُوهُۜ هٰذَا صِرَاطٌ مُسْتَق۪يمٌ64
वास्तव में अल्लाह ही मेरा भी रब है और तुम्हारा भी रब है, तो उसी की बन्दगी करो। यही सीधा मार्ग है।"
فَاخْتَلَفَ الْاَحْزَابُ مِنْ بَيْنِهِمْۚ فَوَيْلٌ لِلَّذ۪ينَ ظَلَمُوا مِنْ عَذَابِ يَوْمٍ اَل۪يمٍ65
किन्तु उनमें के कितने ही गिरोहों ने आपस में विभेद किया। अतः तबाही है एक दुखद दिन की यातना से, उन लोगों के लिए जिन्होंने ज़ुल्म किया
هَلْ يَنْظُرُونَ اِلَّا السَّاعَةَ اَنْ تَاْتِيَهُمْ بَغْتَةً وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ66
क्या वे बस उस (क़ियामत की) घड़ी की प्रतीक्षा कर रहे है कि वह सहसा उनपर आ पड़े और उन्हें ख़बर भी न हो
اَلْاَخِلَّٓاءُ يَوْمَئِذٍ بَعْضُهُمْ لِبَعْضٍ عَدُوٌّ اِلَّا الْمُتَّق۪ينَۜ۟67
उस दिन सभी मित्र परस्पर एक-दूसरे के शत्रु होंगे सिवाय डर रखनेवालों के। -
يَا عِبَادِ لَا خَوْفٌ عَلَيْكُمُ الْيَوْمَ وَلَٓا اَنْتُمْ تَحْزَنُونَۚ68
"ऐ मेरे बन्दों! आज न तुम्हें कोई भय है और न तुम शोकाकुल होगे।" -
اَلَّذ۪ينَ اٰمَنُوا بِاٰيَاتِنَا وَكَانُوا مُسْلِم۪ينَۚ69
वह जो हमारी आयतों पर ईमान लाए और आज्ञाकारी रहे;
اُدْخُلُوا الْجَنَّةَ اَنْتُمْ وَاَزْوَاجُكُمْ تُحْبَرُونَ70
"प्रवेश करो जन्नत में, तुम भी और तुम्हारे जोड़े भी, हर्षित होकर!"
يُطَافُ عَلَيْهِمْ بِصِحَافٍ مِنْ ذَهَبٍ وَاَكْوَابٍۚ وَف۪يهَا مَا تَشْتَه۪يهِ الْاَنْفُسُ وَتَلَذُّ الْاَعْيُنُۚ وَاَنْتُمْ ف۪يهَا خَالِدُونَۚ71
उनके आगे सोने की तशतरियाँ और प्याले गर्दिश करेंगे और वहाँ वह सब कुछ होगा, जो दिलों को भाए और आँखे जिससे लज़्ज़त पाएँ। "और तुम उसमें सदैव रहोगे
وَتِلْكَ الْجَنَّةُ الَّت۪ٓي اُو۫رِثْتُمُوهَا بِمَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ72
यह वह जन्नत है जिसके तुम वारिस उसके बदले में हुए जो कर्म तुम करते रहे।
لَكُمْ ف۪يهَا فَاكِهَةٌ كَث۪يرَةٌ مِنْهَا تَاْكُلُونَ73
तुम्हारे लिए वहाँ बहुत-से स्वादिष्ट फल है जिन्हें तुम खाओगे।"
اِنَّ الْمُجْرِم۪ينَ ف۪ي عَذَابِ جَهَنَّمَ خَالِدُونَۚ74
निस्संदेह अपराधी लोग सदैव जहन्नम की यातना में रहेंगे
لَا يُفَتَّرُ عَنْهُمْ وَهُمْ ف۪يهِ مُبْلِسُونَۚ75
वह (यातना) कभी उनपर से हल्की न होगी और वे उसी में निराश पड़े रहेंगे
وَمَا ظَلَمْنَاهُمْ وَلٰكِنْ كَانُوا هُمُ الظَّالِم۪ينَ76
हमने उनपर कोई ज़ुल्म नहीं किया, परन्तु वे खुद ही ज़ालिम थे
وَنَادَوْا يَا مَالِكُ لِيَقْضِ عَلَيْنَا رَبُّكَۜ قَالَ اِنَّكُمْ مَاكِثُونَ77
वे पुकारेंगे, "ऐ मालिक! तुम्हारा रब हमारा काम ही तमाम कर दे!" वह कहेगा, "तुम्हें तो इसी दशा में रहना है।"
لَقَدْ جِئْنَاكُمْ بِالْحَقِّ وَلٰكِنَّ اَكْثَرَكُمْ لِلْحَقِّ كَارِهُونَ78
"निश्चय ही हम तुम्हारे पास सत्य लेकर आए है, किन्तु तुममें से अधिकतर लोगों को सत्य प्रिय नहीं
اَمْ اَبْرَمُٓوا اَمْرًا فَاِنَّا مُبْرِمُونَۚ79
(क्या उन्होंने कुछ निश्चय नहीं किया है) या उन्होंने किसी बात का निश्चय कर लिया है? अच्छा तो हमने भी निश्चय कर लिया है
اَمْ يَحْسَبُونَ اَنَّا لَا نَسْمَعُ سِرَّهُمْ وَنَجْوٰيهُمْۜ بَلٰى وَرُسُلُنَا لَدَيْهِمْ يَكْتُبُونَ80
या वे समझते है कि हम उनकी छिपी बात और उनकी कानाफूसी को सुनते नही? क्यों नहीं, और हमारे भेजे हुए (फ़रिश्ते) उनके समीप हैं, वे लिखते रहते है।"
قُلْ اِنْ كَانَ لِلرَّحْمٰنِ وَلَدٌۗ فَاَنَا۬ اَوَّلُ الْعَابِد۪ينَ81
कहो, "यदि रहमान की कोई सन्तान होती तो सबसे पहले मैं (उसे) पूजता
سُبْحَانَ رَبِّ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِ رَبِّ الْعَرْشِ عَمَّا يَصِفُونَ82
आकाशों और धरती का रब, सिंहासन का स्वामी, उससे महान और उच्च है जो वे बयान करते है।"
فَذَرْهُمْ يَخُوضُوا وَيَلْعَبُوا حَتّٰى يُلَاقُوا يَوْمَهُمُ الَّذ۪ي يُوعَدُونَ83
अच्छा, छोड़ो उन्हें कि वे व्यर्थ की बहस में पड़े रहे और खेलों में लगे रहें। यहाँ तक कि उनकी भेंट अपने उस दिन से हो जिसका वादा उनसे किया जाता है
وَهُوَ الَّذ۪ي فِي السَّمَٓاءِ اِلٰهٌ وَفِي الْاَرْضِ اِلٰهٌۜ وَهُوَ الْحَك۪يمُ الْعَل۪يمُ84
वही है जो आकाशों में भी पूज्य है और धरती में भी पूज्य है और वह तत्वदर्शी, सर्वज्ञ है
وَتَبَارَكَ الَّذ۪ي لَهُ مُلْكُ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَاۚ وَعِنْدَهُ عِلْمُ السَّاعَةِۚ وَاِلَيْهِ تُرْجَعُونَ85
बड़ी ही बरकतवाली है वह सत्ता, जिसके अधिकार में है आकाशों और धरती की बादशाही और जो कुछ उन दिनों के बीच है उसकी भी। और उसी के पास उस घड़ी का ज्ञान है, और उसी की ओर तुम लौटाए जाओगे।
وَلَا يَمْلِكُ الَّذ۪ينَ يَدْعُونَ مِنْ دُونِهِ الشَّفَاعَةَ اِلَّا مَنْ شَهِدَ بِالْحَقِّ وَهُمْ يَعْلَمُونَ86
और जिन्हें वे उसके और अपने बीच माध्यम ठहराकर पुकारते है, उन्हें सिफ़ारिश का कुछ भी अधिकार नहीं, बस उसे ही यह अधिकार प्राप्त, है जो हक की गवाही दे, और ऐसे लोग जानते है।-
وَلَئِنْ سَاَلْتَهُمْ مَنْ خَلَقَهُمْ لَيَقُولُنَّ اللّٰهُ فَاَنّٰى يُؤْفَكُونَۙ87
यदि तुम उनसे पूछो कि "उन्हें किसने पैदा किया?" तो वे अवश्य कहेंगे, "अल्लाह ने।" तो फिर वे कहाँ उलटे फिर जाते है?-
وَق۪يلِه۪ يَا رَبِّ اِنَّ هٰٓؤُ۬لَٓاءِ قَوْمٌ لَا يُؤْمِنُونَۢ88
और उसका कहना हो कि "ऐ मेरे रब! निश्चय ही ये वे लोग है, जो ईमान नहीं रखते थे।"
فَاصْفَحْ عَنْهُمْ وَقُلْ سَلَامٌۜ فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ89
अच्छा तो उनसे नज़र फेर लो और कह दो, "सलाम है तुम्हें!" अन्ततः शीघ्र ही वे स्वयं जान लेंगे
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
حٰمٓۜ1
हा॰ मीम॰
وَالْكِتَابِ الْمُب۪ينِۙ2
गवाह है स्पष्ट किताब
اِنَّٓا اَنْزَلْنَاهُ ف۪ي لَيْلَةٍ مُبَارَكَةٍ اِنَّا كُنَّا مُنْذِر۪ينَ3
निस्संदेह हमने उसे एक बरकत भरी रात में अवतरित किया है। - निश्चय ही हम सावधान करनेवाले है।-
ف۪يهَا يُفْرَقُ كُلُّ اَمْرٍ حَك۪يمٍۜ4
उस (रात) में तमाम तत्वदर्शिता युक्त मामलों का फ़ैसला किया जाता है,
اَمْرًا مِنْ عِنْدِنَاۜ اِنَّا كُنَّا مُرْسِل۪ينَۚ5
हमारे यहाँ से आदेश के रूप में। निस्संदेह रसूलों को भेजनेवाले हम ही है। -
رَحْمَةً مِنْ رَبِّكَۜ اِنَّهُ هُوَ السَّم۪يعُ الْعَل۪يمُۙ6
तुम्हारे रब की दयालुता के कारण। निस्संदेह वही सब कुछ सुननेवाला, जाननेवाला है
رَبِّ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَاۢ اِنْ كُنْتُمْ مُوقِن۪ينَ7
आकाशों और धरती का रब और जो कुछ उन दोनों के बीच है उसका भी, यदि तुम विश्वास रखनेवाले हो (तो विश्वास करो कि किताब का अवतरण अल्लाह की दयालुता है)
لَٓا اِلٰهَ اِلَّا هُوَ يُحْي۪ وَيُم۪يتُۜ رَبُّكُمْ وَرَبُّ اٰبَٓائِكُمُ الْاَوَّل۪ينَ8
उसके अतिरिक्त कोई पूज्य-प्रभु नहीं; वही जीवित करता और मारता है; तुम्हारा रब और तुम्हारे अगले बाप-दादों का रब है
بَلْ هُمْ ف۪ي شَكٍّ يَلْعَبُونَ9
बल्कि वे संदेह में पड़े रहे हैं
فَارْتَقِبْ يَوْمَ تَاْتِي السَّمَٓاءُ بِدُخَانٍ مُب۪ينٍۙ10
अच्छा तो तुम उस दिन की प्रतीक्षा करो, जब आकाश प्रत्यक्ष धुँआ लाएगा।
يَغْشَى النَّاسَۜ هٰذَا عَذَابٌ اَل۪يمٌ11
वह लोगों का ढाँक लेगा। यह है दुखद यातना!
رَبَّنَا اكْشِفْ عَنَّا الْعَذَابَ اِنَّا مُؤْمِنُونَ12
वे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! हमपर से यातना हटा दे। हम ईमान लाते है।"
اَنّٰى لَهُمُ الذِّكْرٰى وَقَدْ جَٓاءَهُمْ رَسُولٌ مُب۪ينٌۙ13
अब उनके होश में आने का मौक़ा कहाँ बाक़ी रहा। उनका हाल तो यह है कि उनके पास साफ़-साफ़ बतानेवाला एक रसूल आ चुका है।
ثُمَّ تَوَلَّوْا عَنْهُ وَقَالُوا مُعَلَّمٌ مَجْنُونٌۢ14
फिर उन्होंने उसकी ओर से मुँह मोड़ लिया और कहने लगे, "यह तो एक सिखाया-पढ़ाया दीवाना है।"
اِنَّا كَاشِفُوا الْعَذَابِ قَل۪يلًا اِنَّكُمْ عَٓائِدُونَۢ15
"हम यातना थोड़ा हटा देते है तो तुम पुनः फिर जाते हो।
يَوْمَ نَبْطِشُ الْبَطْشَةَ الْكُبْرٰىۚ اِنَّا مُنْتَقِمُونَ16
याद रखो, जिस दिन हम बड़ी पकड़ पकड़ेंगे, तो निश्चय ही हम बदला लेकर रहेंगे
وَلَقَدْ فَتَنَّا قَبْلَهُمْ قَوْمَ فِرْعَوْنَ وَجَٓاءَهُمْ رَسُولٌ كَر۪يمٌۙ17
उनसे पहले हम फ़िरऔन की क़ौम के लोगों को परीक्षा में डाल चुके हैं, जबकि उनके पास एक अत्यन्त सज्जन रसूल आया
اَنْ اَدُّٓوا اِلَيَّ عِبَادَ اللّٰهِۜ اِنّ۪ي لَكُمْ رَسُولٌ اَم۪ينٌۙ18
कि "तुम अल्लाह के बन्दों को मेरे हवाले कर दो। निश्चय ही मै तुम्हारे लिए एक विश्वसनीय रसूल हूँ
وَاَنْ لَا تَعْلُوا عَلَى اللّٰهِۚ اِنّ۪ٓي اٰت۪يكُمْ بِسُلْطَانٍ مُب۪ينٍۚ19
और अल्लाह के मुक़ाबले में सरकशी न करो, मैं तुम्हारे लिए एक स्पष्ट प्रमाण लेकर आया हूँ
وَاِنّ۪ي عُذْتُ بِرَبّ۪ي وَرَبِّكُمْ اَنْ تَرْجُمُونِۘ20
और मैं इससे अपने रब और तुम्हारे रब की शरण ले चुका हूँ कि तुम मुझ पर पथराव करके मार डालो
وَاِنْ لَمْ تُؤْمِنُوا ل۪ي فَاعْتَزِلُونِ21
किन्तु यदि तुम मेरी बात नहीं मानते तो मुझसे अलग हो जाओ!"
فَدَعَا رَبَّهُٓ اَنَّ هٰٓؤُ۬لَٓاءِ قَوْمٌ مُجْرِمُونَ22
अन्ततः उसने अपने रब को पुकारा कि "ये अपराधी लोग है।"
فَاَسْرِ بِعِبَاد۪ي لَيْلًا اِنَّكُمْ مُتَّبَعُونَۙ23
"अच्छा तुम रातों रात मेरे बन्दों को लेकर चले जाओ। निश्चय ही तुम्हारा पीछा किया जाएगा
وَاتْرُكِ الْبَحْرَ رَهْوًاۜ اِنَّهُمْ جُنْدٌ مُغْرَقُونَ24
और सागर को स्थिर छोड़ दो। वे तो एक सेना दल हैं, डूब जानेवाले।"
كَمْ تَرَكُوا مِنْ جَنَّاتٍ وَعُيُونٍۙ25
वे छोड़ गये कितनॆ ही बाग़ और स्रोत
وَزُرُوعٍ وَمَقَامٍ كَر۪يمٍۙ26
और ख़ेतियां और उत्तम आवास-
وَنَعْمَةٍ كَانُوا ف۪يهَا فَاكِه۪ينَۙ27
और सुख सामग्री जिनमें वे मज़े कर रहे थे।
كَذٰلِكَ۠ وَاَوْرَثْنَاهَا قَوْمًا اٰخَر۪ينَ28
हम ऐसा ही मामला करते है, और उन चीज़ों का वारिस हमने दूसरे लोगों को बनाया
فَمَا بَكَتْ عَلَيْهِمُ السَّمَٓاءُ وَالْاَرْضُ وَمَا كَانُوا مُنْظَر۪ينَ۟29
फिर न तो आकाश और धरती ने उनपर विलाप किया और न उन्हें मुहलत ही मिली
وَلَقَدْ نَجَّيْنَا بَن۪ٓي اِسْرَٓاء۪يلَ مِنَ الْعَذَابِ الْمُه۪ينِۙ30
इस प्रकार हमने इसराईल की सन्तान को अपमानजनक यातना से
مِنْ فِرْعَوْنَۜ اِنَّهُ كَانَ عَالِيًا مِنَ الْمُسْرِف۪ينَ31
अर्थात फ़िरऔन से छुटकारा दिया। निश्चय ही वह मर्यादाहीन लोगों में से बड़ा ही सरकश था
وَلَقَدِ اخْتَرْنَاهُمْ عَلٰى عِلْمٍ عَلَى الْعَالَم۪ينَۚ32
और हमने (उनकी स्थिति को) जानते हुए उन्हें सारे संसारवालों के मुक़ाबले मं चुन लिया
وَاٰتَيْنَاهُمْ مِنَ الْاٰيَاتِ مَا ف۪يهِ بَلٰٓؤٌا مُب۪ينٌ33
और हमने उन्हें निशानियों के द्वारा वह चीज़ दी जिसमें स्पष्ट परीक्षा थी
اِنَّ هٰٓؤُ۬لَٓاءِ لَيَقُولُونَۙ34
ये लोग बड़ी दृढ़तापूर्वक कहते है,
اِنْ هِيَ اِلَّا مَوْتَتُنَا الْاُو۫لٰى وَمَا نَحْنُ بِمُنْشَر۪ينَ35
"बस यह हमारी पहली मृत्यु ही है, हम दोबारा उठाए जानेवाले नहीं हैं
فَاْتُوا بِاٰبَٓائِنَٓا اِنْ كُنْتُمْ صَادِق۪ينَ36
तो ले आओ हमारे बाप-दादा को, यदि तुम सच्चे हो!"
اَهُمْ خَيْرٌ اَمْ قَوْمُ تُبَّعٍۙ وَالَّذ۪ينَ مِنْ قَبْلِهِمْۜ اَهْلَكْنَاهُمْۘ اِنَّهُمْ كَانُوا مُجْرِم۪ينَ37
क्या वे अच्छे है या तुब्बा की क़ौम या वे लोग जो उनसे पहले गुज़र चुके है? हमने उन्हें विनष्ट कर दिया, निश्चय ही वे अपराधी थे
وَمَا خَلَقْنَا السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَا لَاعِب۪ينَ38
हमने आकाशों और धरती को और जो कुछ उनके बीच है उन्हें खेल नहीं बनाया
مَا خَلَقْنَاهُمَٓا اِلَّا بِالْحَقِّ وَلٰكِنَّ اَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ39
हमने उन्हें हक़ के साथ पैदा किया, किन्तु उनमें से अधिककर लोग जानते नहीं
اِنَّ يَوْمَ الْفَصْلِ م۪يقَاتُهُمْ اَجْمَع۪ينَۙ40
निश्चय ही फ़ैसले का दिन उन सबका नियत समय है,
يَوْمَ لَا يُغْن۪ي مَوْلًى عَنْ مَوْلًى شَيْـًٔا وَلَا هُمْ يُنْصَرُونَۙ41
जिस दिन कोई अपना किसी अपने के कुछ काम न आएगा और न कोई सहायता पहुँचेगी,
اِلَّا مَنْ رَحِمَ اللّٰهُۜ اِنَّهُ هُوَ الْعَز۪يزُ الرَّح۪يمُ۟42
सिवाय उस व्यक्ति के जिसपर अल्लाह दया करे। निश्चय ही वह प्रभुत्वशाली, अत्यन्त दयावान है
اِنَّ شَجَرَةَ الزَّقُّومِۙ43
निस्संदेह ज़क़्क़ूम का वृक्ष
طَعَامُ الْاَث۪يمِۚۛ44
गुनहगार का भोजन होगा,
كَالْمُهْلِۚۛ يَغْل۪ي فِي الْبُطُونِۙ45
तेल की तलछट जैसा, वह पेटों में खौलता होगा,
كَغَلْيِ الْحَم۪يمِ46
जैसे गर्म पानी खौलता है
خُذُوهُ فَاعْتِلُوهُ اِلٰى سَوَٓاءِ الْجَح۪يمِۚ47
"पकड़ो उसे, और भड़कती हुई आग के बीच तक घसीट ले जाओ,
ثُمَّ صُبُّوا فَوْقَ رَاْسِه۪ مِنْ عَذَابِ الْحَم۪يمِۜ48
फिर उसके सिर पर खौलते हुए पानी का यातना उंडेल दो!"
ذُقْۚۙ اِنَّكَ اَنْتَ الْعَز۪يزُ الْكَر۪يمُ49
"मज़ा चख, तू तो बड़ा बलशाली, सज्जन और आदरणीय है!
اِنَّ هٰذَا مَا كُنْتُمْ بِه۪ تَمْتَرُونَ50
यही तो है जिसके विषय में तुम संदेह करते थे।"
اِنَّ الْمُتَّق۪ينَ ف۪ي مَقَامٍ اَم۪ينٍۙ51
निस्संदेह डर रखनेवाले निश्चिन्तता की जगह होंगे,
ف۪ي جَنَّاتٍ وَعُيُونٍۚ52
बाग़ों और स्रोतों में
يَلْبَسُونَ مِنْ سُنْدُسٍ وَاِسْتَبْرَقٍ مُتَقَابِل۪ينَۚ53
बारीक और गाढ़े रेशम के वस्त्र पहने हुए, एक-दूसरे के आमने-सामने उपस्थित होंगे
كَذٰلِكَ۠ وَزَوَّجْنَاهُمْ بِحُورٍ ع۪ينٍۜ54
ऐसा ही उनके साथ मामला होगा। और हम साफ़ गोरी, बड़ी नेत्रोवाली स्त्रियों से उनका विवाह कर देंगे
يَدْعُونَ ف۪يهَا بِكُلِّ فَاكِهَةٍ اٰمِن۪ينَۙ55
वे वहाँ निश्चिन्तता के साथ हर प्रकार के स्वादिष्ट फल मँगवाते होंगे
لَا يَذُوقُونَ ف۪يهَا الْمَوْتَ اِلَّا الْمَوْتَةَ الْاُو۫لٰىۚ وَوَقٰيهُمْ عَذَابَ الْجَح۪يمِۙ56
वहाँ वे मृत्यु का मज़ा कभी न चखेगे। बस पहली मृत्यु जो हुई, सो हुई। और उसने उन्हें भड़कती हुई आग की यातना से बचा लिया
فَضْلًا مِنْ رَبِّكَۜ ذٰلِكَ هُوَ الْفَوْزُ الْعَظ۪يمُ57
यह सब तुम्हारे रब के विशेष उदार अनुग्रह के कारण होगा, वही बड़ी सफलता है
فَاِنَّمَا يَسَّرْنَاهُ بِلِسَانِكَ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ58
हमने तो इस (क़ुरआन) को बस तुम्हारी भाषा में सहज एवं सुगम बना दिया है ताकि वे याददिहानी प्राप्त (करें
فَارْتَقِبْ اِنَّهُمْ مُرْتَقِبُونَ59
अच्छा तुम भी प्रतीक्षा करो, वे भी प्रतीक्षा में हैं
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
حٰمٓۜ1
हा॰ मीम॰
تَنْز۪يلُ الْكِتَابِ مِنَ اللّٰهِ الْعَز۪يزِ الْحَك۪يمِ2
इस किताब का अवतरण अल्लाह की ओर से है, जो अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है। -
اِنَّ فِي السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِ لَاٰيَاتٍ لِلْمُؤْمِن۪ينَ3
निस्संदेह आकाशों और धरती में ईमानवालों के लिए बहुत-सी निशानियाँ है
وَف۪ي خَلْقِكُمْ وَمَا يَبُثُّ مِنْ دَٓابَّةٍ اٰيَاتٌ لِقَوْمٍ يُوقِنُونَۜ4
और तुम्हारी संरचना में, और उनकी भी जो जानवर वह फैलाता रहता है, निशानियाँ है उन लोगों के लिए जो विश्वास करें
وَاخْتِلَافِ الَّيْلِ وَالنَّهَارِ وَمَٓا اَنْزَلَ اللّٰهُ مِنَ السَّمَٓاءِ مِنْ رِزْقٍ فَاَحْيَا بِهِ الْاَرْضَ بَعْدَ مَوْتِهَا وَتَصْر۪يفِ الرِّيَاحِ اٰيَاتٌ لِقَوْمٍ يَعْقِلُونَۙ5
और रात और दिन के उलट-फेर में भी, और उस रोज़ी (पानी) में भी जिसे अल्लाह ने आकाश से उतारा, फिर उसके द्वारा धरती को उसके उन मुर्दा हो जाने के पश्चात जीवित किया और हवाओं की गर्दिश में भीलोगों के लिए बहुत-सी निशानियाँ है जो बुद्धि से काम लें
تِلْكَ اٰيَاتُ اللّٰهِ نَتْلُوهَا عَلَيْكَ بِالْحَقِّۚ فَبِاَيِّ حَد۪يثٍ بَعْدَ اللّٰهِ وَاٰيَاتِه۪ يُؤْمِنُونَ6
ये अल्लाह की आयतें हैं, हम उन्हें हक़ के साथ तुमको सुना रहे हैं। अब आख़िर अल्लाह और उसकी आयतों के पश्चात और कौन-सी बात है जिसपर वे ईमान लाएँगे?
وَيْلٌ لِكُلِّ اَفَّاكٍ اَث۪يمٍۙ7
तबाही है हर झूठ घड़नेवाले गुनहगार के लिए,
يَسْمَعُ اٰيَاتِ اللّٰهِ تُتْلٰى عَلَيْهِ ثُمَّ يُصِرُّ مُسْتَكْبِرًا كَاَنْ لَمْ يَسْمَعْهَاۚ فَبَشِّرْهُ بِعَذَابٍ اَل۪يمٍ8
जो अल्लाह की उन आयतों को सुनता है जो उसे पढ़कर सुनाई जाती है। फिर घमंड के साथ अपनी (इनकार की) नीति पर अड़ा रहता है मानो उसने उनको सुना ही नहीं। अतः उसको दुखद यातना की शुभ सूचना दे दो
وَاِذَا عَلِمَ مِنْ اٰيَاتِنَا شَيْـًٔاۨ اتَّخَذَهَا هُزُوًاۜ اُو۬لٰٓئِكَ لَهُمْ عَذَابٌ مُه۪ينٌۜ9
जब हमारी आयतों में से कोई बात वह जान लेता है तो वह उनका परिहास करता है, ऐसे लोगों के लिए रुसवा कर देनेवाली यातना है
مِنْ وَرَٓائِهِمْ جَهَنَّمُۚ وَلَا يُغْن۪ي عَنْهُمْ مَا كَسَبُوا شَيْـًٔا وَلَا مَا اتَّخَذُوا مِنْ دُونِ اللّٰهِ اَوْلِيَٓاءَۚ وَلَهُمْ عَذَابٌ عَظ۪يمٌۜ10
उनके आगे जहन्नम है, जो उन्होंने कमाया वह उनके कुछ काम न आएगा और न यही कि उन्होंने अल्लाह को छोड़कर अपने संरक्षक ठहरा रखे है। उनके लिए तो बड़ी यातना है
هٰذَا هُدًىۚ وَالَّذ۪ينَ كَفَرُوا بِاٰيَاتِ رَبِّهِمْ لَهُمْ عَذَابٌ مِنْ رِجْزٍ اَل۪يمٍ۟11
यह सर्वथा मार्गदर्शन है। और जिन लोगों ने अपने रब की आयतों को इनकार किया, उनके लिए हिला देनेवाली दुखद यातना है
اَللّٰهُ الَّذ۪ي سَخَّرَ لَكُمُ الْبَحْرَ لِتَجْرِيَ الْفُلْكُ ف۪يهِ بِاَمْرِه۪ وَلِتَبْتَغُوا مِنْ فَضْلِه۪ وَلَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَۚ12
वह अल्लाह ही है जिसने समुद्र को तुम्हारे लिए वशीभूत कर दिया है, ताकि उसके आदेश से नौकाएँ उसमें चलें; और ताकि तुम उसका उदार अनुग्रह तलाश करो; और इसलिए कि तुम कृतज्ञता दिखाओ
وَسَخَّرَ لَكُمْ مَا فِي السَّمٰوَاتِ وَمَا فِي الْاَرْضِ جَم۪يعًا مِنْهُۜ اِنَّ ف۪ي ذٰلِكَ لَاٰيَاتٍ لِقَوْمٍ يَتَفَكَّرُونَ13
जो चीज़ें आकाशों में है और जो धरती में हैं, उसने उन सबको अपनी ओर से तुम्हारे काम में लगा रखा है। निश्चय ही इसमें उन लोगों के लिए निशानियाँ है जो सोच-विचार से काम लेते है
قُلْ لِلَّذ۪ينَ اٰمَنُوا يَغْفِرُوا لِلَّذ۪ينَ لَا يَرْجُونَ اَيَّامَ اللّٰهِ لِيَجْزِيَ قَوْمًا بِمَا كَانُوا يَكْسِبُونَ14
जो लोग ईमान लाए उनसे कह दो कि, "वे उन लोगों को क्षमा करें (उनकी करतूतों पर ध्यान न दे) अल्लाह के दिनों की आशा नहीं रखते, ताकि वह इसके परिणामस्वरूप उन लोगों को उनकी अपनी कमाई का बदला दे
مَنْ عَمِلَ صَالِحًا فَلِنَفْسِه۪ۚ وَمَنْ اَسَٓاءَ فَعَلَيْهَاۘ ثُمَّ اِلٰى رَبِّكُمْ تُرْجَعُونَ15
जो कुछ अच्छा कर्म करता है तो अपने ही लिए करेगा और जो कोई बुरा कर्म करता है तो उसका वबाल उसी पर होगा। फिर तुम अपने रब की ओर लौटाये जाओगे
وَلَقَدْ اٰتَيْنَا بَن۪ٓي اِسْرَٓاء۪يلَ الْكِتَابَ وَالْحُكْمَ وَالنُّبُوَّةَ وَرَزَقْنَاهُمْ مِنَ الطَّيِّبَاتِ وَفَضَّلْنَاهُمْ عَلَى الْعَالَم۪ينَۚ16
निश्चय ही हमने इसराईल की सन्तान को किताब और हुक्म और पैग़म्बरी प्रदान की थी। और हमने उन्हें पवित्र चीज़ो की रोज़ी दी और उन्हें सारे संसारवालों पर श्रेष्ठता प्रदान की
وَاٰتَيْنَاهُمْ بَيِّنَاتٍ مِنَ الْاَمْرِۚ فَمَا اخْتَلَفُٓوا اِلَّا مِنْ بَعْدِ مَا جَٓاءَهُمُ الْعِلْمُۙ بَغْيًا بَيْنَهُمْۜ اِنَّ رَبَّكَ يَقْض۪ي بَيْنَهُمْ يَوْمَ الْقِيٰمَةِ ف۪يمَا كَانُوا ف۪يهِ يَخْتَلِفُونَ17
और हमने उन्हें इस मामले के विषय में स्पष्ट निशानियाँ प्रदान कीं। फिर जो भी विभेद उन्होंने किया, वह इसके पश्चात ही किया कि उनके पास ज्ञान आ चुका था और इस कारण कि वे परस्पर एक-दूसरे पर ज़्यादती करना चाहते थे। निश्चय ही तुम्हारा रब क़ियामत के दिन उनके बीच उन चीज़ों के बारे में फ़ैसला कर देगा, जिनमें वे परस्पर विभेद करते रहे है
ثُمَّ جَعَلْنَاكَ عَلٰى شَر۪يعَةٍ مِنَ الْاَمْرِ فَاتَّبِعْهَا وَلَا تَتَّبِعْ اَهْوَٓاءَ الَّذ۪ينَ لَا يَعْلَمُونَ18
फिर हमने तुम्हें इस मामलें में एक खुले मार्ग (शरीअत) पर कर दिया। अतः तुम उसी पर चलो और उन लोगों की इच्छाओं का अनुपालन न करना जो जानते नहीं
اِنَّهُمْ لَنْ يُغْنُوا عَنْكَ مِنَ اللّٰهِ شَيْـًٔاۜ وَاِنَّ الظَّالِم۪ينَ بَعْضُهُمْ اَوْلِيَٓاءُ بَعْضٍۚ وَاللّٰهُ وَلِيُّ الْمُتَّق۪ينَ19
वे अल्लाह के मुक़ाबले में तुम्हारे कदापि कुछ काम नहीं आ सकते। निश्चय ही ज़ालिम लोग एक-दूसरे के साथी है और डर रखनेवालों का साथी अल्लाह है
هٰذَا بَصَٓائِرُ لِلنَّاسِ وَهُدًى وَرَحْمَةٌ لِقَوْمٍ يُوقِنُونَ20
वह लोगों के लिए सूझ के प्रकाशों का पुंज है, और मार्गदर्शन और दयालुता है उन लोगों के लिए जो विश्वास करें
اَمْ حَسِبَ الَّذ۪ينَ اجْتَرَحُوا السَّيِّـَٔاتِ اَنْ نَجْعَلَهُمْ كَالَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِۙ سَوَٓاءً مَحْيَاهُمْ وَمَمَاتُهُمْۜ سَٓاءَ مَا يَحْكُمُونَ۟21
(क्या मार्गदर्शन और पथभ्रष्ट ता समान है) या वे लोग, जिन्होंने बुराइयाँ कमाई है, यह समझ बैठे हैं कि हम उन्हें उन लोगों जैसा कर देंगे जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए कि उनका जीना और मरना समान हो जाए? बहुत ही बुरा है जो निर्णय वे करते है!
وَخَلَقَ اللّٰهُ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضَ بِالْحَقِّ وَلِتُجْزٰى كُلُّ نَفْسٍ بِمَا كَسَبَتْ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ22
अल्लाह ने आकाशों और धरती को हक़ के साथ पैदा किया और इसलिए कि प्रत्येक व्यक्ति को उसकी कमाई का बदला दिया जाए और उनपर ज़ुल्म न किया जाए
اَفَرَاَيْتَ مَنِ اتَّخَذَ اِلٰهَهُ هَوٰيهُ وَاَضَلَّهُ اللّٰهُ عَلٰى عِلْمٍ وَخَتَمَ عَلٰى سَمْعِه۪ وَقَلْبِه۪ وَجَعَلَ عَلٰى بَصَرِه۪ غِشَاوَةًۜ فَمَنْ يَهْد۪يهِ مِنْ بَعْدِ اللّٰهِۜ اَفَلَا تَذَكَّرُونَ23
क्या तुमने उस व्यक्ति को नहीं देखा जिसने अपनी इच्छा ही को अपना उपास्य बना लिया? अल्लाह ने (उसकी स्थिति) जानते हुए उसे गुमराही में डाल दिया, और उसके कान और उसके दिल पर ठप्पा लगा दिया और उसकी आँखों पर परदा डाल दिया। फिर अब अल्लाह के पश्चात कौन उसे मार्ग पर ला सकता है? तो क्या तुम शिक्षा नहीं ग्रहण करते?
وَقَالُوا مَا هِيَ اِلَّا حَيَاتُنَا الدُّنْيَا نَمُوتُ وَنَحْيَا وَمَا يُهْلِكُنَٓا اِلَّا الدَّهْرُۚ وَمَا لَهُمْ بِذٰلِكَ مِنْ عِلْمٍۚ اِنْ هُمْ اِلَّا يَظُنُّونَ24
वे कहते है, "वह तो बस हमारा सांसारिक जीवन ही है। हम मरते और जीते है। हमें तो बस काल (समय) ही विनष्ट करता है।" हालाँकि उनके पास इसका कोई ज्ञान नहीं। वे तो बस अटकलें ही दौड़ाते है
وَاِذَا تُتْلٰى عَلَيْهِمْ اٰيَاتُنَا بَيِّنَاتٍ مَا كَانَ حُجَّتَهُمْ اِلَّٓا اَنْ قَالُوا ائْتُوا بِاٰبَٓائِنَٓا اِنْ كُنْتُمْ صَادِق۪ينَ25
और जब उनके सामने हमारी स्पष्ट आयतें पढ़ी जाती है, तो उनकी हुज्जत इसके सिवा कुछ और नहीं होती कि वे कहते है, "यदि तुम सच्चे हो तो हमारे बाप-दादा को ले आओ।"
قُلِ اللّٰهُ يُحْي۪يكُمْ ثُمَّ يُم۪يتُكُمْ ثُمَّ يَجْمَعُكُمْ اِلٰى يَوْمِ الْقِيٰمَةِ لَا رَيْبَ ف۪يهِ وَلٰكِنَّ اَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ۟26
कह दो, "अल्लाह ही तुम्हें जीवन प्रदान करता है। फिर वहीं तुम्हें मृत्यु देता है। फिर वही तुम्हें क़ियामत के दिन तक इकट्ठा कर रहा है, जिसमें कोई संदेह नहीं। किन्तु अधिकतर लोग जानते नहीं
وَلِلّٰهِ مُلْكُ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ وَيَوْمَ تَقُومُ السَّاعَةُ يَوْمَئِذٍ يَخْسَرُ الْمُبْطِلُونَ27
आकाशों और धरती की बादशाही अल्लाह ही की है। और जिस दिन वह घड़ी घटित होगी उस दिन झूठवाले घाटे में होंगे
وَتَرٰى كُلَّ اُمَّةٍ جَاثِيَةً۠ كُلُّ اُمَّةٍ تُدْعٰٓى اِلٰى كِتَابِهَاۜ اَلْيَوْمَ تُجْزَوْنَ مَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ28
और तुम प्रत्येक गिरोह को घुटनों के बल झुका हुआ देखोगे। प्रत्येक गिरोह अपनी किताब की ओर बुलाया जाएगा, "आज तुम्हें उसी का बदला दिया जाएगा, जो तुम करते थे
هٰذَا كِتَابُنَا يَنْطِقُ عَلَيْكُمْ بِالْحَقِّۜ اِنَّا كُنَّا نَسْتَنْسِخُ مَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ29
"यह हमारी किताब है, जो तुम्हारे मुक़ाबले में ठीक-ठीक बोल रही है। निश्चय ही हम लिखवाते रहे हैं जो कुछ तुम करते थे।"
فَاَمَّا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ فَيُدْخِلُهُمْ رَبُّهُمْ ف۪ي رَحْمَتِه۪ۜ ذٰلِكَ هُوَ الْفَوْزُ الْمُب۪ينُ30
अतः जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए उन्हें उनका रब अपनी दयालुता में दाख़िल करेगा, यही स्पष्ट सफलता है
وَاَمَّا الَّذ۪ينَ كَفَرُوا۠ اَفَلَمْ تَكُنْ اٰيَات۪ي تُتْلٰى عَلَيْكُمْ فَاسْتَكْبَرْتُمْ وَكُنْتُمْ قَوْمًا مُجْرِم۪ينَ31
रहे वे लोग जिन्होंने इनकार किया (उनसे कहा जाएगा,) "क्या तुम्हें हमारी आयतें पढ़कर नहीं सुनाई जाती थी? किन्तु तुमने घमंड किया और तुम थे ही अपराधी लोग
وَاِذَا ق۪يلَ اِنَّ وَعْدَ اللّٰهِ حَقٌّ وَالسَّاعَةُ لَا رَيْبَ ف۪يهَا قُلْتُمْ مَا نَدْر۪ي مَا السَّاعَةُۙ اِنْ نَظُنُّ اِلَّا ظَنًّا وَمَا نَحْنُ بِمُسْتَيْقِن۪ينَ32
और जब कहा जाता था कि अल्लाह का वादा सच्चा है और (क़ियामत की) घड़ी में कोई संदेह नहीं हैं। तो तुम कहते थे, "हम नहीं जानते कि वह घड़ी क्या हैं? तो तुम कहते थे, 'हम नहीं जानते कि वह घड़ी क्या है? हमें तो बस एक अनुमान-सा प्रतीत होता है और हमें विश्वास नहीं होता।'"
وَبَدَا لَهُمْ سَيِّـَٔاتُ مَا عَمِلُوا وَحَاقَ بِهِمْ مَا كَانُوا بِه۪ يَسْتَهْزِؤُ۫نَ33
और जो कुछ वे करते रहे उसकी बुराइयाँ उनपर प्रकट हो गई और जिस चीज़ का वे परिहास करते थे उसी ने उन्हें आ घेरा
وَق۪يلَ الْيَوْمَ نَنْسٰيكُمْ كَمَا نَس۪يتُمْ لِقَٓاءَ يَوْمِكُمْ هٰذَا وَمَاْوٰيكُمُ النَّارُ وَمَا لَكُمْ مِنْ نَاصِر۪ينَ34
और कह दिया जाएगा कि "आज हम तुम्हें भुला देते हैं जैसे तुमने इस दिन की भेंट को भुला रखा था। तुम्हारा ठिकाना अब आग है और तुम्हारा कोई सहायक नहीं
ذٰلِكُمْ بِاَنَّكُمُ اتَّخَذْتُمْ اٰيَاتِ اللّٰهِ هُزُوًا وَغَرَّتْكُمُ الْحَيٰوةُ الدُّنْيَاۚ فَالْيَوْمَ لَا يُخْرَجُونَ مِنْهَا وَلَا هُمْ يُسْتَعْتَبُونَ35
यह इस कारण कि तुमने अल्लाह की आयतों की हँसी उड़ाई थी और सांसारिक जीवन ने तुम्हें धोखे में डाले रखा।" अतः आज वे न तो उससे निकाले जाएँगे और न उनसे यह चाहा जाएगा कि वे किसी उपाय से (अल्लाह के) प्रकोप को दूर कर सकें
فَلِلّٰهِ الْحَمْدُ رَبِّ السَّمٰوَاتِ وَرَبِّ الْاَرْضِ رَبِّ الْعَالَم۪ينَ36
अतः सारी प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है जो आकाशों का रब और घरती का रब, सारे संसार का रब है
وَلَهُ الْكِبْرِيَٓاءُ فِي السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۖ وَهُوَ الْعَز۪يزُ الْحَك۪يمُ37
आकाशों और धरती में बड़ाई उसी के लिए है, और वही प्रभुत्वशाली, अत्यन्त तत्वदर्शी है