26. जुज़ - कुरान पढ़ें

26. जुज़
46 · अल-अहक़ाफ़
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
حٰمٓ1
हा॰ मीम॰
تَنْز۪يلُ الْكِتَابِ مِنَ اللّٰهِ الْعَز۪يزِ الْحَك۪يمِ2
इस किताब का अवतरण अल्लाह की ओर से है, जो प्रभुत्वशाली, अत्यन्त तत्वदर्शी है
مَا خَلَقْنَا السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَٓا اِلَّا بِالْحَقِّ وَاَجَلٍ مُسَمًّىۜ وَالَّذ۪ينَ كَفَرُوا عَمَّٓا اُنْذِرُوا مُعْرِضُونَ3
हमने आकाशों और धरती को और जो कुछ उन दोनों के मध्य है उसे केवल हक़ के साथ और एक नियत अवधि तक के लिए पैदा किया है। किन्तु जिन लोगों ने इनकार किया है, वे उस चीज़ को ध्यान में नहीं लाते जिससे उन्हें सावधान किया गया है
قُلْ اَرَاَيْتُمْ مَا تَدْعُونَ مِنْ دُونِ اللّٰهِ اَرُون۪ي مَاذَا خَلَقُوا مِنَ الْاَرْضِ اَمْ لَهُمْ شِرْكٌ فِي السَّمٰوَاتِۜ ا۪يتُون۪ي بِكِتَابٍ مِنْ قَبْلِ هٰذَٓا اَوْ اَثَارَةٍ مِنْ عِلْمٍ اِنْ كُنْتُمْ صَادِق۪ينَ4
कहो, "क्या तुमने उनको देखा भी, जिन्हें तुम अल्लाह को छोड़कर पुकारते हो? मुझे दिखाओ उन्होंने धरती की चीज़ों में से क्या पैदा किया है या आकाशों में उनकी कोई साझेदारी है? मेरे पास इससे पहले की कोई किताब ले आओ या ज्ञान की कोई अवशेष बात ही, यदि तुम सच्चे हो।"
وَمَنْ اَضَلُّ مِمَّنْ يَدْعُوا مِنْ دُونِ اللّٰهِ مَنْ لَا يَسْتَج۪يبُ لَهُٓ اِلٰى يَوْمِ الْقِيٰمَةِ وَهُمْ عَنْ دُعَٓائِهِمْ غَافِلُونَ5
आख़़िर उस व्यक्ति से बढ़कर पथभ्रष्ट और कौन होगा, जो अल्लाह से हटकर उन्हें पुकारता हो जो क़ियामत के दिन तक उसकी पुकार को स्वीकार नहीं कर सकते, बल्कि वे तो उनकी पुकार से भी बेख़बर है;
وَاِذَا حُشِرَ النَّاسُ كَانُوا لَهُمْ اَعْدَٓاءً وَكَانُوا بِعِبَادَتِهِمْ كَافِر۪ينَ6
और जब लोग इकट्ठे किए जाएँगे तो वे उनके शत्रु होंगे औऱ उनकी बन्दगी का इनकार करेंगे
وَاِذَا تُتْلٰى عَلَيْهِمْ اٰيَاتُنَا بَيِّنَاتٍ قَالَ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا لِلْحَقِّ لَمَّا جَٓاءَهُمْۙ هٰذَا سِحْرٌ مُب۪ينٌۜ7
जब हमारी स्पष्ट आयतें उन्हें पढ़कर सुनाई जाती है तो वे लोग जिन्होंने इनकार किया, सत्य के विषय में, जबकि वह उनके पास आ गया, कहते है कि "यह तो खुला जादू है।"
اَمْ يَقُولُونَ افْتَرٰيهُۜ قُلْ اِنِ افْتَرَيْتُهُ فَلَا تَمْلِكُونَ ل۪ي مِنَ اللّٰهِ شَيْـًٔاۜ هُوَ اَعْلَمُ بِمَا تُف۪يضُونَ ف۪يهِۜ كَفٰى بِه۪ شَه۪يدًا بَيْن۪ي وَبَيْنَكُمْۜ وَهُوَ الْغَفُورُ الرَّح۪يمُ8
(क्या ईमान लाने से उन्हें कोई चीज़ रोक रही है) या वे कहते है, "उसने इसे स्वयं ही घड़ लिया है?" कहो, "यदि मैंने इसे स्वयं घड़ा है तो अल्लाह के विरुद्ध मेरे लिए तुम कुछ भी अधिकार नहीं रखते। जिसके विषय में तुम बातें बनाने में लगे हो, वह उसे भली-भाँति जानता है। और वह मेरे और तुम्हारे बीच गवाह की हैसियत से काफ़ी है। और वही बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है।"
قُلْ مَا كُنْتُ بِدْعًا مِنَ الرُّسُلِ وَمَٓا اَدْر۪ي مَا يُفْعَلُ ب۪ي وَلَا بِكُمْۜ اِنْ اَتَّبِعُ اِلَّا مَا يُوحٰٓى اِلَيَّ وَمَٓا اَنَا۬ اِلَّا نَذ۪يرٌ مُب۪ينٌ9
कह दो, "मैं कोई पहला रसूल तो नहीं हूँ। और मैं नहीं जानता कि मेरे साथ क्या किया जाएगा और न यह कि तुम्हारे साथ क्या किया जाएगा। मैं तो बस उसी का अनुगामी हूँ, जिसकी प्रकाशना मेरी ओर की जाती है और मैं तो केवल एक स्पष्ट सावधान करनेवाला हूँ।"
قُلْ اَرَاَيْتُمْ اِنْ كَانَ مِنْ عِنْدِ اللّٰهِ وَكَفَرْتُمْ بِه۪ وَشَهِدَ شَاهِدٌ مِنْ بَن۪ٓي اِسْرَٓاء۪يلَ عَلٰى مِثْلِه۪ فَاٰمَنَ وَاسْتَكْبَرْتُمْۜ اِنَّ اللّٰهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الظَّالِم۪ينَ۟10
कहो, "क्या तुमने सोचा भी (कि तुम्हारा क्या परिणाम होगा)? यदि वह (क़ुरआन) अल्लाह के यहाँ से हुआ और तुमने उसका इनकार कर दिया, हालाँकि इसराईल की सन्तान में से एक गवाह ने उसके एक भाग की गवाही भी दी। सो वह ईमान ले आया और तुम घमंड में पड़े रहे। अल्लाह तो ज़ालिम लोगों को मार्ग नहीं दिखाता।"
وَقَالَ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا لِلَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لَوْ كَانَ خَيْرًا مَا سَبَقُونَٓا اِلَيْهِۜ وَاِذْ لَمْ يَهْتَدُوا بِه۪ فَسَيَقُولُونَ هٰذَٓا اِفْكٌ قَد۪يمٌ11
जिन लोगों ने इनकार किया, वे ईमान लानेवालों के बारे में कहते है, "यदि वह अच्छा होता तो वे उसकी ओर (बढ़ने में) हमसे अग्रसर न रहते।" औऱ जब उन्होंने उससे मार्ग ग्रहण नहीं किया तो अब अवश्य कहेंगे, "यह तो पुराना झूठ है!"
وَمِنْ قَبْلِه۪ كِتَابُ مُوسٰٓى اِمَامًا وَرَحْمَةًۜ وَهٰذَا كِتَابٌ مُصَدِّقٌ لِسَانًا عَرَبِيًّا لِيُنْذِرَ الَّذ۪ينَ ظَلَمُواۗ وَبُشْرٰى لِلْمُحْسِن۪ينَ12
हालाँकि इससे पहले मूसा की किताब पथप्रदर्शक और दयालुता रही है। और यह किताब, जो अरबी भाषा में है, उसकी पुष्टि में है, ताकि उन लोगों को सचेत कर दे जिन्होंने ज़ु्ल्म किया और शुभ सूचना हो उत्तमकारों के लिए
اِنَّ الَّذ۪ينَ قَالُوا رَبُّنَا اللّٰهُ ثُمَّ اسْتَقَامُوا فَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَۚ13
निश्चय ही जिन लोगों ने कहा, "हमारा रब अल्लाह है।" फिर वे उसपर जमे रहे, तो उन्हें न तो कोई भय होगा और न वे शोकाकुल होगे
اُو۬لٰٓئِكَ اَصْحَابُ الْجَنَّةِ خَالِد۪ينَ ف۪يهَاۚ جَزَٓاءً بِمَا كَانُوا يَعْمَلُونَ14
वही जन्नतवाले है, वहाँ वे सदैव रहेंगे उसके बदले में जो वे करते रहे है
وَوَصَّيْنَا الْاِنْسَانَ بِوَالِدَيْهِ اِحْسَانًاۜ حَمَلَتْهُ اُمُّهُ كُرْهًا وَوَضَعَتْهُ كُرْهًاۜ وَحَمْلُهُ وَفِصَالُهُ ثَلٰثُونَ شَهْرًاۜ حَتّٰٓى اِذَا بَلَغَ اَشُدَّهُ وَبَلَغَ اَرْبَع۪ينَ سَنَةًۙ قَالَ رَبِّ اَوْزِعْن۪ٓي اَنْ اَشْكُرَ نِعْمَتَكَ الَّت۪ٓي اَنْعَمْتَ عَلَيَّ وَعَلٰى وَالِدَيَّ وَاَنْ اَعْمَلَ صَالِحًا تَرْضٰيهُ وَاَصْلِحْ ل۪ي ف۪ي ذُرِّيَّت۪يۚ اِنّ۪ي تُبْتُ اِلَيْكَ وَاِنّ۪ي مِنَ الْمُسْلِم۪ينَ15
हमने मनुष्य को अपने माँ-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करने की ताकीद की। उसकी माँ ने उसे (पेट में) तकलीफ़ के साथ उठाए रखा और उसे जना भी तकलीफ़ के साथ। और उसके गर्भ की अवस्था में रहने और दूध छुड़ाने की अवधि तीस माह है, यहाँ तक कि जब वह अपनी पूरी शक्ति को पहुँचा और चालीस वर्ष का हुआ तो उसने कहा, "ऐ मेरे रब! मुझे सम्भाल कि मैं तेरी उस अनुकम्पा के प्रति कृतज्ञता दिखाऊँ, जो तुने मुझपर और मेरे माँ-बाप पर की है। और यह कि मैं ऐसा अच्छा कर्म करूँ जो तुझे प्रिय हो और मेरे लिए मेरी संतति में भलाई रख दे। मैं तेरे आगे तौबा करता हूँ औऱ मैं मुस्लिम (आज्ञाकारी) हूँ।"
اُو۬لٰٓئِكَ الَّذ۪ينَ نَتَقَبَّلُ عَنْهُمْ اَحْسَنَ مَا عَمِلُوا وَنَتَجَاوَزُ عَنْ سَيِّـَٔاتِهِمْ ف۪ٓي اَصْحَابِ الْجَنَّةِۜ وَعْدَ الصِّدْقِ الَّذ۪ي كَانُوا يُوعَدُونَ16
ऐसे ही लोग जिनसे हम अच्छे कर्म, जो उन्होंने किए होंगे, स्वीकार कर लेगें और उनकी बुराइयों को टाल जाएँगे। इस हाल में कि वे जन्नतवालों में होंगे, उस सच्चे वादे के अनुरूप जो उनसे किया जाता रहा है
وَالَّذ۪ي قَالَ لِوَالِدَيْهِ اُفٍّ لَكُمَٓا اَتَعِدَانِن۪ٓي اَنْ اُخْرَجَ وَقَدْ خَلَتِ الْقُرُونُ مِنْ قَبْل۪ي وَهُمَا يَسْتَغ۪يثَانِ اللّٰهَ وَيْلَكَ اٰمِنْۗ اِنَّ وَعْدَ اللّٰهِ حَقٌّۚ فَيَقُولُ مَا هٰذَٓا اِلَّٓا اَسَاط۪يرُ الْاَوَّل۪ينَ17
किन्तु वह व्यक्ति जिसने अपने माँ-बाप से कहा, "धिक है तुम पर! क्या तुम मुझे डराते हो कि मैं (क़ब्र से) निकाला जाऊँगा, हालाँकि मुझसे पहले कितनी ही नस्लें गुज़र चुकी है?" और वे दोनों अल्लाह से फ़रियाद करते है - "अफ़सोस है तुमपर! मान जा। निस्संदेह अल्लाह का वादा सच्चा है।" किन्तु वह कहता है, "ये तो बस पहले के लोगों की कहानियाँ है।"
اُو۬لٰٓئِكَ الَّذ۪ينَ حَقَّ عَلَيْهِمُ الْقَوْلُ ف۪ٓي اُمَمٍ قَدْ خَلَتْ مِنْ قَبْلِهِمْ مِنَ الْجِنِّ وَالْاِنْسِۜ اِنَّهُمْ كَانُوا خَاسِر۪ينَ18
ऐसे ही लोग है जिनपर उन गिरोहों के साथ यातना की बात सत्यापित होकर रही जो जिन्नों और मनुष्यों में से उनसे पहले गुज़र चुके है। निश्चय ही वे घाटे में रहे
وَلِكُلٍّ دَرَجَاتٌ مِمَّا عَمِلُواۚ وَلِيُوَفِّيَهُمْ اَعْمَالَهُمْ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ19
उनमें से प्रत्येक के दरजे उनके अपने किए हुए कर्मों के अनुसार होंगे (ताकि अल्लाह का वादा पूरा हो) और वह उन्हें उनके कर्मों का पूरा-पूरा बदला चुका दे और उनपर कदापि ज़ुल्म न होगा
وَيَوْمَ يُعْرَضُ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا عَلَى النَّارِۜ اَذْهَبْتُمْ طَيِّبَاتِكُمْ ف۪ي حَيَاتِكُمُ الدُّنْيَا وَاسْتَمْتَعْتُمْ بِهَاۚ فَالْيَوْمَ تُجْزَوْنَ عَذَابَ الْهُونِ بِمَا كُنْتُمْ تَسْتَكْبِرُونَ فِي الْاَرْضِ بِغَيْرِ الْحَقِّ وَبِمَا كُنْتُمْ تَفْسُقُونَ۟20
और याद करो जिस दिन वे लोग जिन्होंने इनकार किया, आग के सामने पेश किए जाएँगे। (कहा जाएगा), "तुम अपने सांसारिक जीवन में अच्छी रुचिकर चीज़े नष्ट कर बैठे और उनका मज़ा ले चुके। अतः आज तुम्हे अपमानजनक यातना दी जाएगी, क्योंकि तुम धरती में बिना किसी हक़ के घमंड करते रहे और इसलिए कि तुम आज्ञा का उल्लंघन करते रहे।"
وَاذْكُرْ اَخَا عَادٍۜ اِذْ اَنْذَرَ قَوْمَهُ بِالْاَحْقَافِ وَقَدْ خَلَتِ النُّذُرُ مِنْ بَيْنِ يَدَيْهِ وَمِنْ خَلْفِه۪ٓ اَلَّا تَعْبُدُٓوا اِلَّا اللّٰهَۜ اِنّ۪ٓي اَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ عَظ۪يمٍ21
आद के भाई को याद करो, जबकि उसने अपनी क़ौम के लोगों को अहक़ाफ़ में सावधान किया, और उसके आगे और पीछे भी सावधान करनेवाले गुज़र चुके थे - कि, "अल्लाह के सिवा किसी की बन्दगी न करो। मुझे तुम्हारे बारे में एक बड़े दिन की यातना का भय है।"
قَالُٓوا اَجِئْتَنَا لِتَاْفِكَنَا عَنْ اٰلِهَتِنَاۚ فَاْتِنَا بِمَا تَعِدُنَٓا اِنْ كُنْتَ مِنَ الصَّادِق۪ينَ22
उन्होंने कहा, "क्या तू हमारे पास इसलिए आया है कि झूठ बोलकर हमको अपने उपास्यों से विमुख कर दे? अच्छा, तो हमपर ले आ, जिसकी तू हमें धमकी देता है, यदि तू सच्चा है।"
قَالَ اِنَّمَا الْعِلْمُ عِنْدَ اللّٰهِۘ وَاُبَلِّغُكُمْ مَٓا اُرْسِلْتُ بِه۪ وَلٰكِنّ۪ٓي اَرٰيكُمْ قَوْمًا تَجْهَلُونَ23
उसने कहा, "ज्ञान तो अल्लाह ही के पास है (कि वह कब यातना लाएगा) । और मैं तो तुम्हें वह संदेश पहुँचा रहा हूँ जो मुझे देकर भेजा गया है। किन्तु मैं तुम्हें देख रहा हूँ कि तुम अज्ञानता से काम ले रहे हो।"
فَلَمَّا رَاَوْهُ عَارِضًا مُسْتَقْبِلَ اَوْدِيَتِهِمْۙ قَالُوا هٰذَا عَارِضٌ مُمْطِرُنَاۜ بَلْ هُوَ مَا اسْتَعْجَلْتُمْ بِه۪ۜ ر۪يحٌ ف۪يهَا عَذَابٌ اَل۪يمٌۙ24
फिर जब उन्होंने उसे बादल के रूप में देखा, जिसका रुख़ उनकी घाटियों की ओर था, तो वे कहने लगे, "यह बादल है जो हमपर बरसनेवाला है!' "नहीं, बल्कि यह तो वही चीज़ है जिसके लिए तुमने जल्दी मचा रखी थी। - यह वायु है जिसमें दुखद यातना है
تُدَمِّرُ كُلَّ شَيْءٍ بِاَمْرِ رَبِّهَا فَاَصْبَحُوا لَا يُرٰٓى اِلَّا مَسَاكِنُهُمْۜ كَذٰلِكَ نَجْزِي الْقَوْمَ الْمُجْرِم۪ينَ25
हर चीज़ को अपने रब के आदेश से विनष्ट- कर देगी।" अन्ततः वे ऐसे हो गए कि उनके रहने की जगहों के सिवा कुछ नज़र न आता था। अपराधी लोगों को हम इसी तरह बदला देते है
وَلَقَدْ مَكَّنَّاهُمْ ف۪يمَٓا اِنْ مَكَّنَّاكُمْ ف۪يهِ وَجَعَلْنَا لَهُمْ سَمْعًا وَاَبْصَارًا وَاَفْـِٔدَةًۘ فَمَٓا اَغْنٰى عَنْهُمْ سَمْعُهُمْ وَلَٓا اَبْصَارُهُمْ وَلَٓا اَفْـِٔدَتُهُمْ مِنْ شَيْءٍ اِذْ كَانُوا يَجْحَدُونَ بِاٰيَاتِ اللّٰهِ وَحَاقَ بِهِمْ مَا كَانُوا بِه۪ يَسْتَهْزِؤُ۫نَ۟26
हमने उन्हें उन चीज़ों में जमाव और सामर्थ्य प्रदान की थी, जिनमें तुम्हें जमाव और सामर्थ्य नहीं प्रदान की। औऱ हमने उन्हें कान, आँखें और दिल दिए थे। किन्तु न तो उनके कान उनके कुछ काम आए औऱ न उनकी आँखे और न उनके दिल ही। क्योंकि वे अल्लाह की आयतों का इनकार करते थे और जिस चीज़ की वे हँसी उड़ाते थे, उसी ने उन्हें आ घेरा
وَلَقَدْ اَهْلَكْنَا مَا حَوْلَكُمْ مِنَ الْقُرٰى وَصَرَّفْنَا الْاٰيَاتِ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ27
हम तुम्हारे आस-पास की बस्तियों को विनष्ट कर चुके हैं, हालाँकि हमने तरह-तरह से आयते पेश की थीं, ताकि वे रुजू करें
فَلَوْلَا نَصَرَهُمُ الَّذ۪ينَ اتَّخَذُوا مِنْ دُونِ اللّٰهِ قُرْبَانًا اٰلِهَةًۜ بَلْ ضَلُّوا عَنْهُمْۚ وَذٰلِكَ اِفْكُهُمْ وَمَا كَانُوا يَفْتَرُونَ28
फिर क्यों न उन बस्तियों ने उसकी सहायता की जिनको उन्होंने अपने और अल्लाह का बीच माध्यम ठहराकर सामीप्य प्राप्त करने के लिए उपास्य बना लिया था? बल्कि वे उनसे गुम हो गए, और यह था उनका मिथ्यारोपण और वह कुछ जो वे घड़ते थे
وَاِذْ صَرَفْنَٓا اِلَيْكَ نَفَرًا مِنَ الْجِنِّ يَسْتَمِعُونَ الْقُرْاٰنَۚ فَلَمَّا حَضَرُوهُ قَالُٓوا اَنْصِتُواۚ فَلَمَّا قُضِيَ وَلَّوْا اِلٰى قَوْمِهِمْ مُنْذِر۪ينَ29
और याद करो (ऐ नबी) जब हमने कुछ जिन्नों को तुम्हारी ओर फेर दिया जो क़ुरआन सुनने लगे थे, तो जब वे वहाँ पहुँचे तो कहने लगे, "चुप हो जाओ!" फिर जब वह (क़ुरआन का पाठ) पूरा हुआ तो वे अपनी क़ौम की ओर सावधान करनेवाले होकर लौटे
قَالُوا يَا قَوْمَنَٓا اِنَّا سَمِعْنَا كِتَابًا اُنْزِلَ مِنْ بَعْدِ مُوسٰى مُصَدِّقًا لِمَا بَيْنَ يَدَيْهِ يَهْد۪ٓي اِلَى الْحَقِّ وَاِلٰى طَر۪يقٍ مُسْتَق۪يمٍ30
उन्होंने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! हमने एक किताब सुनी है, जो मूसा के पश्चात अवतरित की गई है। उसकी पुष्टि में हैं जो उससे पहले से मौजूद है, सत्य की ओर और सीधे मार्ग की ओर मार्गदर्शन करती है
يَا قَوْمَنَٓا اَج۪يبُوا دَاعِيَ اللّٰهِ وَاٰمِنُوا بِه۪ يَغْفِرْ لَكُمْ مِنْ ذُنُوبِكُمْ وَيُجِرْكُمْ مِنْ عَذَابٍ اَل۪يمٍ31
ऐ हमारी क़ौम के लोगो! अल्लाह के आमंत्रणकर्त्ता का आमंत्रण स्वीकार करो और उसपर ईमान लाओ। अल्लाह तुम्हें क्षमा करके गुनाहों से तुम्हें पाक कर देगा और दुखद यातना से तुम्हें बचाएगा
وَمَنْ لَا يُجِبْ دَاعِيَ اللّٰهِ فَلَيْسَ بِمُعْجِزٍ فِي الْاَرْضِ وَلَيْسَ لَهُ مِنْ دُونِه۪ٓ اَوْلِيَٓاءُۜ اُو۬لٰٓئِكَ ف۪ي ضَلَالٍ مُب۪ينٍ32
और जो कोई अल्लाह के आमंत्रणकर्त्ता का आमंत्रण स्वीकार नहीं करेगा तो वह धरती में क़ाबू से बच निकलनेवाला नहीं है और न अल्लाह से हटकर उसके संरक्षक होंगे। ऐसे ही लोग खुली गुमराही में हैं।"
اَوَلَمْ يَرَوْا اَنَّ اللّٰهَ الَّذ۪ي خَلَقَ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضَ وَلَمْ يَعْيَ بِخَلْقِهِنَّ بِقَادِرٍ عَلٰٓى اَنْ يُحْيِيَ الْمَوْتٰىۜ بَلٰٓى اِنَّهُ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَد۪يرٌ33
क्या उन्होंने देखा नहीं कि जिस अल्लाह ने आकाशों और धरती को पैदा किया और उनके पैदा करने से थका नहीं; क्या ऐसा नहीं कि वह मुर्दों को जीवित कर दे? क्यों नहीं, निश्चय ही उसे हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है
وَيَوْمَ يُعْرَضُ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا عَلَى النَّارِۜ اَلَيْسَ هٰذَا بِالْحَقِّۜ قَالُوا بَلٰى وَرَبِّنَاۜ قَالَ فَذُوقُوا الْعَذَابَ بِمَا كُنْتُمْ تَكْفُرُونَ34
और याद करो जिस दिन वे लोग, जिन्होंने इनकार किया, आग के सामने पेश किए जाएँगे, (कहा जाएगा) "क्या यह सत्य नहीं है?" वे कहेंगे, "नहीं, हमारे रब की क़सम!" वह कहेगा, "तो अब यातना का मज़ा चखो, उउस इनकार के बदले में जो तुम करते रहे थे।"
فَاصْبِرْ كَمَا صَبَرَ اُو۬لُوا الْعَزْمِ مِنَ الرُّسُلِ وَلَا تَسْتَعْجِلْ لَهُمْۜ كَاَنَّهُمْ يَوْمَ يَرَوْنَ مَا يُوعَدُونَۙ لَمْ يَلْبَثُٓوا اِلَّا سَاعَةً مِنْ نَهَارٍۜ بَلَاغٌۚ فَهَلْ يُهْلَكُ اِلَّا الْقَوْمُ الْفَاسِقُونَ35
अतः धैर्य से काम लो, जिस प्रकार संकल्पवान रसूलों ने धैर्य से काम लिया। और उनके लिए जल्दी न करो। जिस दिन वे लोग उस चीज़ को देख लेंगे जिसका उनसे वादा किया जाता है, तो वे महसूस करेंगे कि जैसे वे बस दिन की एक घड़ी भर ही ठहरे थे। यह (संदेश) साफ़-साफ़ पहुँचा देना है। अब क्या अवज्ञाकारी लोगों के अतिरिक्त कोई और विनष्ट होगा?
47 · मुहम्मद
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
اَلَّذ۪ينَ كَفَرُوا وَصَدُّوا عَنْ سَب۪يلِ اللّٰهِ اَضَلَّ اَعْمَالَهُمْ1
जिन लोगों ने इनकार किया और अल्लाह के मार्ग से रोका उनके कर्म उसने अकारथ कर दिए
وَالَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ وَاٰمَنُوا بِمَا نُزِّلَ عَلٰى مُحَمَّدٍ وَهُوَ الْحَقُّ مِنْ رَبِّهِمْۙ كَفَّرَ عَنْهُمْ سَيِّـَٔاتِهِمْ وَاَصْلَحَ بَالَهُمْ2
रहे वे लोग जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए और उस चीज़ पर ईमान लाए जो मुहम्मद पर अवतरित किया गया - और वही सत्य है उनके रब की ओर से - उसने उसकी बुराइयाँ उनसे दूर कर दीं और उनका हाल ठीक कर दिया
ذٰلِكَ بِاَنَّ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا اتَّبَعُوا الْبَاطِلَ وَاَنَّ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا اتَّبَعُوا الْحَقَّ مِنْ رَبِّهِمْۜ كَذٰلِكَ يَضْرِبُ اللّٰهُ لِلنَّاسِ اَمْثَالَهُمْ3
यह इसलिए कि जिन लोगों ने इनकार किया उन्होंने असत्य का अनुसरण किया और यह कि जो लोग ईमान लाए उन्होंने सत्य का अनुसरण किया, जो उनके रब की ओर से है। इस प्रकार अल्लाह लोगों के लिए उनकी मिसालें बयान करता है
فَاِذَا لَق۪يتُمُ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا فَضَرْبَ الرِّقَابِۜ حَتّٰٓى اِذَٓا اَثْخَنْتُمُوهُمْ فَشُدُّوا الْوَثَاقَۙ فَاِمَّا مَنًّا بَعْدُ وَاِمَّا فِدَٓاءً حَتّٰى تَضَعَ الْحَرْبُ اَوْزَارَهَاۚۛ ذٰلِكَۜۛ وَلَوْ يَشَٓاءُ اللّٰهُ لَانْتَصَرَ مِنْهُمْۙ وَلٰكِنْ لِيَبْلُوَ۬ا بَعْضَكُمْ بِبَعْضٍۜ وَالَّذ۪ينَ قُتِلُوا ف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِ فَلَنْ يُضِلَّ اَعْمَالَهُمْ4
अतः जब इनकार करनेवालो से तुम्हारी मुठभेड़ हो तो (उनकी) गरदनें मारना है, यहाँ तक कि जब उन्हें अच्छी तरह कुचल दो तो बन्धनों में जकड़ो, फिर बाद में या तो एहसान करो या फ़िदया (अर्थ-दंड) का मामला करो, यहाँ तक कि युद्ध अपने बोझ उतारकर रख दे। यह भली-भाँति समझ लो, यदि अल्लाह चाहे तो स्वयं उनसे निपट ले। किन्तु (उसने या आदेश इसलिए दिया) ताकि तुम्हारी एक-दूसरे की परीक्षा ले। और जो लोग अल्लाह के मार्ग में मारे जाते है उनके कर्म वह कदापि अकारथ न करेगा
سَيَهْد۪يهِمْ وَيُصْلِحُ بَالَهُمْۚ5
वह उनका मार्गदर्शन करेगा और उनका हाल ठीक कर देगा
وَيُدْخِلُهُمُ الْجَنَّةَ عَرَّفَهَا لَهُمْ6
और उन्हें जन्नत में दाख़िल करेगा, जिससे वह उन्हें परिचित करा चुका है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اِنْ تَنْصُرُوا اللّٰهَ يَنْصُرْكُمْ وَيُثَبِّتْ اَقْدَامَكُمْ7
ऐ लोगों, जो ईमान लाए हो, यदि तुम अल्लाह की सहायता करोगे तो वह तुम्हारी सहायता करेगा और तुम्हारे क़दम जमा देगा
وَالَّذ۪ينَ كَفَرُوا فَتَعْسًا لَهُمْ وَاَضَلَّ اَعْمَالَهُمْ8
रहे वे लोग जिन्होंने इनकार किया, तो उनके लिए तबाही है। और उनके कर्मों को अल्लाह ने अकारथ कर दिया
ذٰلِكَ بِاَنَّهُمْ كَرِهُوا مَٓا اَنْزَلَ اللّٰهُ فَاَحْبَطَ اَعْمَالَهُمْ9
यह इसलिए कि उन्होंने उस चीज़ को नापसन्द किया जिसे अल्लाह ने अवतरित किया, तो उसने उनके कर्म अकारथ कर दिए
اَفَلَمْ يَس۪يرُوا فِي الْاَرْضِ فَيَنْظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الَّذ۪ينَ مِنْ قَبْلِهِمْۜ دَمَّرَ اللّٰهُ عَلَيْهِمْۘ وَلِلْكَافِر۪ينَ اَمْثَالُهَا10
क्या वे धरती में चले-फिरे नहीं कि देखते कि उन लोगों का कैसा परिणाम हुआ जो उनसे पहले गुज़र चुके है? अल्लाह ने उन्हें तहस-नहस कर दिया और इनकार करनेवालों के लिए ऐसे ही मामले होने है
ذٰلِكَ بِاَنَّ اللّٰهَ مَوْلَى الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَاَنَّ الْكَافِر۪ينَ لَا مَوْلٰى لَهُمْ۟11
यह इसलिए कि जो लोग ईमान लाए उनका संरक्षक अल्लाह है और यह कि इनकार करनेवालों को कोई संरक्षक नहीं
اِنَّ اللّٰهَ يُدْخِلُ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ جَنَّاتٍ تَجْر۪ي مِنْ تَحْتِهَا الْاَنْهَارُۜ وَالَّذ۪ينَ كَفَرُوا يَتَمَتَّعُونَ وَيَاْكُلُونَ كَمَا تَاْكُلُ الْاَنْعَامُ وَالنَّارُ مَثْوًى لَهُمْ12
निश्चय ही अल्लाह उन लोगों को जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए ऐसे बागों में दाख़िल करेगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी। रहे वे लोग जिन्होंने इनकार किया, वे कुछ दिनों का सुख भोग रहे है और खा रहे है, जिसे चौपाए खाते है। और आग उनका ठिकाना है
وَكَاَيِّنْ مِنْ قَرْيَةٍ هِيَ اَشَدُّ قُوَّةً مِنْ قَرْيَتِكَ الَّت۪ٓي اَخْرَجَتْكَۚ اَهْلَكْنَاهُمْ فَلَا نَاصِرَ لَهُمْ13
कितनी ही बस्तियाँ थी जो शक्ति में तुम्हारी उस बस्ती से, जिसने तुम्हें निकाल दिया, बढ़-चढ़कर थीं। हमने उन्हे विनष्टम कर दिया! फिर कोई उनका सहायक न हुआ
اَفَمَنْ كَانَ عَلٰى بَيِّنَةٍ مِنْ رَبِّه۪ كَمَنْ زُيِّنَ لَهُ سُٓوءُ عَمَلِه۪ وَاتَّبَعُٓوا اَهْوَٓاءَهُمْ14
तो क्या जो व्यक्ति अपने रब की ओर से एक स्पष्ट प्रमाण पर हो वह उन लोगों जैसा हो सकता है, जिन्हें उनका बुरा कर्म ही सुहाना लगता हो और वे अपनी इच्छाओं के पीछे ही चलने लग गए हो?
مَثَلُ الْجَنَّةِ الَّت۪ي وُعِدَ الْمُتَّقُونَۜ ف۪يهَٓا اَنْهَارٌ مِنْ مَٓاءٍ غَيْرِ اٰسِنٍۚ وَاَنْهَارٌ مِنْ لَبَنٍ لَمْ يَتَغَيَّرْ طَعْمُهُۚ وَاَنْهَارٌ مِنْ خَمْرٍ لَذَّةٍ لِلشَّارِب۪ينَۚ وَاَنْهَارٌ مِنْ عَسَلٍ مُصَفًّىۜ وَلَهُمْ ف۪يهَا مِنْ كُلِّ الثَّمَرَاتِ وَمَغْفِرَةٌ مِنْ رَبِّهِمْۜ كَمَنْ هُوَ خَالِدٌ فِي النَّارِ وَسُقُوا مَٓاءً حَم۪يمًا فَقَطَّعَ اَمْعَٓاءَهُمْ15
उस जन्नत की शान, जिसका वादा डर रखनेवालों से किया गया है, यह है कि ऐसे पानी की नहरें होगी जो प्रदूषित नहीं होता। और ऐसे दूध की नहरें होंगी जिसके स्वाद में तनिक भी अन्तर न आया होगा, और ऐसे पेय की नहरें होंगी जो पीनेवालों के लिए मज़ा ही मज़ा होंगी, और साफ़-सुधरे शहद की नहरें भी होंगी। और उनके लिए वहाँ हर प्रकार के फल होंगे और क्षमा उनके अपने रब की ओर से - क्या वे उन जैसे हो सकते है, जो सदैव आग में रहनेवाले है और जिन्हें खौलता हुआ पानी पिलाया जाएगा, जो उनकी आँतों को टुकड़े-टुकड़े करके रख देगा?
وَمِنْهُمْ مَنْ يَسْتَمِعُ اِلَيْكَۚ حَتّٰٓى اِذَا خَرَجُوا مِنْ عِنْدِكَ قَالُوا لِلَّذ۪ينَ اُو۫تُوا الْعِلْمَ مَاذَا قَالَ اٰنِفًا۠ اُو۬لٰٓئِكَ الَّذ۪ينَ طَبَعَ اللّٰهُ عَلٰى قُلُوبِهِمْ وَاتَّبَعُٓوا اَهْوَٓاءَهُمْ16
और उनमें कुछ लोग ऐसे है जो तुम्हारी ओर कान लगाते है, यहाँ तक कि जब वे तुम्हारे पास से निकलते है तो उन लोगों से, जिन्हें ज्ञान प्रदान हुआ है कहते है, "उन्होंने अभी-अभी क्या कहा?" वही वे लोग है जिनके दिलों पर अल्लाह ने ठप्पा लगा दिया है और वे अपनी इच्छाओं के पीछे चले है
وَالَّذ۪ينَ اهْتَدَوْا زَادَهُمْ هُدًى وَاٰتٰيهُمْ تَقْوٰيهُمْ17
रहे वे लोग जिन्होंने सीधा रास्ता अपनाया, (अल्लाह ने) उनके मार्गदर्शन में अभिवृद्धि कर दी और उन्हें उनकी परहेज़गारी प्रदान की
فَهَلْ يَنْظُرُونَ اِلَّا السَّاعَةَ اَنْ تَاْتِيَهُمْ بَغْتَةًۚ فَقَدْ جَٓاءَ اَشْرَاطُهَاۚ فَاَنّٰى لَهُمْ اِذَا جَٓاءَتْهُمْ ذِكْرٰيهُمْ18
अब क्या वे लोग बस उस घड़ी की प्रतीक्षा कर रहे है कि वह उनपर अचानक आ जाए? उसके लक्षण तो सामने आ चुके है, जब वह स्वयं भी उनपर आ जाएगी तो फिर उनके लिए होश में आने का अवसर कहाँ शेष रहेगा?
فَاعْلَمْ اَنَّهُ لَٓا اِلٰهَ اِلَّا اللّٰهُ وَاسْتَغْفِرْ لِذَنْبِكَ وَلِلْمُؤْمِن۪ينَ وَالْمُؤْمِنَاتِۜ وَاللّٰهُ يَعْلَمُ مُتَقَلَّبَكُمْ وَمَثْوٰيكُمْ۟19
अतः जान रखों कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई पूज्य-प्रभु नहीं। और अपने गुनाहों के लिए क्षमा-याचना करो और मोमिन पुरुषों और मोमिन स्त्रियों के लिए भी। अल्लाह तुम्हारी चलत-फिरत को भी जानता है और तुम्हारे ठिकाने को भी
وَيَقُولُ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لَوْلَا نُزِّلَتْ سُورَةٌۚ فَاِذَٓا اُنْزِلَتْ سُورَةٌ مُحْكَمَةٌ وَذُكِرَ ف۪يهَا الْقِتَالُۙ رَاَيْتَ الَّذ۪ينَ ف۪ي قُلُوبِهِمْ مَرَضٌ يَنْظُرُونَ اِلَيْكَ نَظَرَ الْمَغْشِيِّ عَلَيْهِ مِنَ الْمَوْتِۜ فَاَوْلٰى لَهُمْۚ20
जो लोग ईमान लाए वे कहते है, "कोई सूरा क्यों नहीं उतरी?" किन्तु जब एक पक्की सूरा अवतरित की जाती है, जिसमें युद्ध का उल्लेख होता है, तो तुम उन लोगों को देखते हो जिनके दिलों में रोग है कि वे तुम्हारी ओर इस प्रकार देखते है जैसे किसी पर मृत्यु की बेहोशी छा गई हो। तो अफ़सोस है उनके हाल पर!
طَاعَةٌ وَقَوْلٌ مَعْرُوفٌ۠ فَاِذَا عَزَمَ الْاَمْرُ۠ فَلَوْ صَدَقُوا اللّٰهَ لَكَانَ خَيْرًا لَهُمْۚ21
उनके लिए उचित है आज्ञापालन और अच्छी-भली बात। फिर जब (युद्ध की) बात पक्की हो जाए (तो युद्ध करना चाहिए) तो यदि वे अल्लाह के लिए सच्चे साबित होते तो उनके लिए ही अच्छा होता
فَهَلْ عَسَيْتُمْ اِنْ تَوَلَّيْتُمْ اَنْ تُفْسِدُوا فِي الْاَرْضِ وَتُقَطِّعُٓوا اَرْحَامَكُمْ22
यदि तुम उल्टे फिर गए तो क्या तुम इससे निकट हो कि धरती में बिगाड़ पैदा करो और अपने नातों-रिश्तों को काट डालो?
اُو۬لٰٓئِكَ الَّذ۪ينَ لَعَنَهُمُ اللّٰهُ فَاَصَمَّهُمْ وَاَعْمٰٓى اَبْصَارَهُمْ23
ये वे लोग है जिनपर अल्लाह ने लानत की और उन्हें बहरा और उनकी आँखों को अन्धा कर दिया
اَفَلَا يَتَدَبَّرُونَ الْقُرْاٰنَ اَمْ عَلٰى قُلُوبٍ اَقْفَالُهَا24
तो क्या वे क़ुरआन में सोच-विचार नहीं करते या उनके दिलों पर ताले लगे हैं?
اِنَّ الَّذ۪ينَ ارْتَدُّوا عَلٰٓى اَدْبَارِهِمْ مِنْ بَعْدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُمُ الْهُدَىۙ الشَّيْطَانُ سَوَّلَ لَهُمْۜ وَاَمْلٰى لَهُمْ25
वे लोग जो पीठ-फेरकर पलट गए, इसके पश्चात कि उनपर मार्ग स्पष्ट॥ हो चुका था, उन्हें शैतान ने बहका दिया और उसने उन्हें ढील दे दी
ذٰلِكَ بِاَنَّهُمْ قَالُوا لِلَّذ۪ينَ كَرِهُوا مَا نَزَّلَ اللّٰهُ سَنُط۪يعُكُمْ ف۪ي بَعْضِ الْاَمْرِۚ وَاللّٰهُ يَعْلَمُ اِسْرَارَهُمْ26
यह इसलिए कि उन्होंने उन लोगों से, जिन्होंने उस चीज़ को नापसन्द किया जो कुछ अल्लाह ने उतारा है, कहा कि "हम कुछ मामलों में तुम्हारी बात मान लेंगे।" अल्लाह उनकी गुप्त बातों को भली-भाँति जानता है
فَكَيْفَ اِذَا تَوَفَّتْهُمُ الْمَلٰٓئِكَةُ يَضْرِبُونَ وُجُوهَهُمْ وَاَدْبَارَهُمْ27
फिर उस समय क्या हाल होगा जब फ़रिश्तें उनके चहरों और उनकी पीठों पर मारते हुए उनकी रूह क़ब्ज़ करेंगे?
ذٰلِكَ بِاَنَّهُمُ اتَّبَعُوا مَٓا اَسْخَطَ اللّٰهَ وَكَرِهُوا رِضْوَانَهُ فَاَحْبَطَ اَعْمَالَهُمْ۟28
यह इसलिए कि उन्होंने उस चीज़ का अनुसरण किया जो अल्लाह को अप्रसन्न करनेवाली थी और उन्होंने उसकी ख़ुशी को नापसन्द किया तो उसने उनके कर्मों को अकारथ कर दिया
اَمْ حَسِبَ الَّذ۪ينَ ف۪ي قُلُوبِهِمْ مَرَضٌ اَنْ لَنْ يُخْرِجَ اللّٰهُ اَضْغَانَهُمْ29
(क्या अल्लाह से कोई चीज़ छिपी है) या जिन लोगों के दिलों में रोग है वे समझ बैठे है कि अल्लाह उनके द्वेषों को कदापि प्रकट न करेगा?
وَلَوْ نَشَٓاءُ لَاَرَيْنَاكَهُمْ فَلَعَرَفْتَهُمْ بِس۪يمٰيهُمْۜ وَلَتَعْرِفَنَّهُمْ ف۪ي لَحْنِ الْقَوْلِۜ وَاللّٰهُ يَعْلَمُ اَعْمَالَكُمْ30
यदि हम चाहें तो उन्हें तुम्हें दिखा दें, फिर तुम उन्हें उनके लक्षणों से पहचान लो; किन्तु तुम उन्हें उनकी बातचीत के ढब से अवश्य पहचान लोगे। अल्लाह तो तुम्हारे कर्मों को जानता ही है
وَلَنَبْلُوَنَّكُمْ حَتّٰى نَعْلَمَ الْمُجَاهِد۪ينَ مِنْكُمْ وَالصَّابِر۪ينَۙ وَنَبْلُوَ۬ا اَخْبَارَكُمْ31
हम अवश्य तुम्हारी परीक्षा करेंगे, यहाँ तक कि हम तुममें से जो जिहाद करनेवाले है और जो दृढ़तापूर्वक जमे रहनेवाले है उनको जान ले और तुम्हारी हालतों को जाँच लें
اِنَّ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا وَصَدُّوا عَنْ سَب۪يلِ اللّٰهِ وَشَٓاقُّوا الرَّسُولَ مِنْ بَعْدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُمُ الْهُدٰىۙ لَنْ يَضُرُّوا اللّٰهَ شَيْـًٔاۜ وَسَيُحْبِطُ اَعْمَالَهُمْ32
जिन लोगों ने इसके पश्चात कि मार्ग उनपर स्पष्ट हो चुका था, इनकार किया और अल्लाह के मार्ग से रोका और रसूल का विरोध किया, वे अल्लाह को कदापि कोई हानि नहीं पहुँचा सकेंगे, बल्कि वही उनका सब किया-कराया उनकी जान को लागू कर देगा
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اَط۪يعُوا اللّٰهَ وَاَط۪يعُوا الرَّسُولَ وَلَا تُبْطِلُٓوا اَعْمَالَكُمْ33
ऐ ईमान लानेवालों! अल्लाह का आज्ञापालन करो और रसूल का आज्ञापालन करो और अपने कर्मों को विनष्ट न करो
اِنَّ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا وَصَدُّوا عَنْ سَب۪يلِ اللّٰهِ ثُمَّ مَاتُوا وَهُمْ كُفَّارٌ فَلَنْ يَغْفِرَ اللّٰهُ لَهُمْ34
निश्चय ही जिन लोगों ने इनकार किया और अल्लाह के मार्ग से रोका और इनकार करनेवाले ही रहकर मर गए, अल्लाह उन्हें कदापि क्षमा न करेगा
فَلَا تَهِنُوا وَتَدْعُٓوا اِلَى السَّلْمِۗ وَاَنْتُمُ الْاَعْلَوْنَۗ وَاللّٰهُ مَعَكُمْ وَلَنْ يَتِرَكُمْ اَعْمَالَكُمْ35
अतः ऐसा न हो कि तुम हिम्मत हार जाओ और सुलह का निमंत्रण देने लगो, जबकि तुम ही प्रभावी हो। अल्लाह तुम्हारे साथ है और वह तुम्हारे कर्मों (के फल) में तुम्हें कदापि हानि न पहुँचाएगा
اِنَّمَا الْحَيٰوةُ الدُّنْيَا لَعِبٌ وَلَهْوٌۜ وَاِنْ تُؤْمِنُوا وَتَتَّقُوا يُؤْتِكُمْ اُجُورَكُمْ وَلَا يَسْـَٔلْكُمْ اَمْوَالَكُمْ36
सांसारिक जीवन तो बस एक खेल और तमाशा है। और यदि तुम ईमान लाओ और डर रखो तो वह तुम्हारे कर्मफल तुम्हें प्रदान करेगा और तुमसे धन नही माँगेगा। -
اِنْ يَسْـَٔلْكُمُوهَا فَيُحْفِكُمْ تَبْخَلُوا وَيُخْرِجْ اَضْغَانَكُمْ37
और यदि वह उनको तुमसे माँगे और समेटकर तुमसे माँगे तो तुम कंजूसी करोगे। और वह तुम्हारे द्वेष को निकाल बाहर कर देगा
هَٓا اَنْتُمْ هٰٓؤُ۬لَٓاءِ تُدْعَوْنَ لِتُنْفِقُوا ف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِۚ فَمِنْكُمْ مَنْ يَبْخَلُۚ وَمَنْ يَبْخَلْ فَاِنَّمَا يَبْخَلُ عَنْ نَفْسِه۪ۜ وَاللّٰهُ الْغَنِيُّ وَاَنْتُمُ الْفُقَرَٓاءُۚ وَاِنْ تَتَوَلَّوْا يَسْتَبْدِلْ قَوْمًا غَيْرَكُمْۙ ثُمَّ لَا يَكُونُٓوا اَمْثَالَكُمْ38
सुनो! यह तुम्ही लोग हो कि तुम्हें आमंत्रण दिया जा रहा है कि "अल्लाह के मार्ग में ख़र्च करो।" फिर तुमसे कुछ लोग है जो कंजूसी करते है। हालाँकि जो कंजूसी करता है वह वास्तव में अपने आप ही से कंजूसी करता है। अल्लाह तो निस्पृह है, तुम्हीं मुहताज हो। और यदि तुम फिर जाओ तो वह तुम्हारी जगह अन्य लोगों को ले आएगा; फिर वे तुम जैसे न होंगे
48 · अल-फतह
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
اِنَّا فَتَحْنَا لَكَ فَتْحًا مُب۪ينًاۙ1
निश्चय ही हमने तुम्हारे लिए एक खुली विजय प्रकट की,
لِيَغْفِرَ لَكَ اللّٰهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِكَ وَمَا تَاَخَّرَ وَيُتِمَّ نِعْمَتَهُ عَلَيْكَ وَيَهْدِيَكَ صِرَاطًا مُسْتَق۪يمًاۙ2
ताकि अल्लाह तुम्हारे अगले और पिछले गुनाहों को क्षमा कर दे और तुमपर अपनी अनुकम्पा पूर्ण कर दे और तुम्हें सीधे मार्ग पर चलाए,
وَيَنْصُرَكَ اللّٰهُ نَصْرًا عَز۪يزًا3
और अल्लाह तुम्हें प्रभावकारी सहायता प्रदान करे
هُوَ الَّذ۪ٓي اَنْزَلَ السَّك۪ينَةَ ف۪ي قُلُوبِ الْمُؤْمِن۪ينَ لِيَزْدَادُٓوا ا۪يمَانًا مَعَ ا۪يمَانِهِمْۜ وَلِلّٰهِ جُنُودُ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ وَكَانَ اللّٰهُ عَل۪يمًا حَك۪يمًاۙ4
वहीं है जिसने ईमानवालों के दिलों में सकीना (प्रशान्ति) उतारी, ताकि अपने ईमान के साथ वे और ईमान की अभिवृद्धि करें - आकाशों और धरती की सभी सेनाएँ अल्लाह ही की है, और अल्लाह सर्वज्ञ, तत्वदर्शी है। -
لِيُدْخِلَ الْمُؤْمِن۪ينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ جَنَّاتٍ تَجْر۪ي مِنْ تَحْتِهَا الْاَنْهَارُ خَالِد۪ينَ ف۪يهَا وَيُكَفِّرَ عَنْهُمْ سَيِّـَٔاتِهِمْۜ وَكَانَ ذٰلِكَ عِنْدَ اللّٰهِ فَوْزًا عَظ۪يمًاۙ5
ताकि वह मोमिन पुरुषों औप मोमिन स्त्रियों को ऐसे बाग़ों में दाख़िल करे जिनके नीचे नहरें बहती होंगी कि वे उनमें सदैव रहें और उनसे उनकी बुराईयाँ दूर कर दे - यह अल्लाह के यहाँ बड़ी सफलता है। -
وَيُعَذِّبَ الْمُنَافِق۪ينَ وَالْمُنَافِقَاتِ وَالْمُشْرِك۪ينَ وَالْمُشْرِكَاتِ الظَّٓانّ۪ينَ بِاللّٰهِ ظَنَّ السَّوْءِۜ عَلَيْهِمْ دَٓائِرَةُ السَّوْءِۚ وَغَضِبَ اللّٰهُ عَلَيْهِمْ وَلَعَنَهُمْ وَاَعَدَّ لَهُمْ جَهَنَّمَۜ وَسَٓاءَتْ مَص۪يرًا6
और कपटाचारी पुरुषों और कपटाचारी स्त्रियों और बहुदेववादी पुरुषों और बहुदेववादी स्त्रियों को, जो अल्लाह के बारे में बुरा गुमान रखते है, यातना दे। उन्हीं पर बुराई की गर्दिश है। उनपर अल्लाह का क्रोध हुआ और उसने उनपर लानत की, और उसने उनके लिए जहन्नम तैयार कर रखा है, और वह अत्यन्त बुरा ठिकाना है!
وَلِلّٰهِ جُنُودُ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ وَكَانَ اللّٰهُ عَز۪يزًا حَك۪يمًا7
आकाशों और धरती की सब सेनाएँ अल्लाह ही की है। अल्लाह प्रभुत्वशाली, अत्यन्त तत्वदर्शी है
اِنَّٓا اَرْسَلْنَاكَ شَاهِدًا وَمُبَشِّرًا وَنَذ۪يرًاۙ8
निश्चय ही हमने तुम्हें गवाही देनेवाला और शुभ सूचना देनेवाला और सचेतकर्त्ता बनाकर भेजा,
لِتُؤْمِنُوا بِاللّٰهِ وَرَسُولِه۪ وَتُعَزِّرُوهُ وَتُوَقِّرُوهُۜ وَتُسَبِّحُوهُ بُكْرَةً وَاَص۪يلًا9
ताकि तुम अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाओ, उसे सहायता पहुँचाओ और उसका आदर करो, और प्रातःकाल और संध्या समय उसकी तसबीह करते रहो
اِنَّ الَّذ۪ينَ يُبَايِعُونَكَ اِنَّمَا يُبَايِعُونَ اللّٰهَۜ يَدُ اللّٰهِ فَوْقَ اَيْد۪يهِمْۚ فَمَنْ نَكَثَ فَاِنَّمَا يَنْكُثُ عَلٰى نَفْسِه۪ۚ وَمَنْ اَوْفٰى بِمَا عَاهَدَ عَلَيْهُ اللّٰهَ فَسَيُؤْت۪يهِ اَجْرًا عَظ۪يمًا۟10
(ऐ नबी) वे लोग जो तुमसे बैअत करते है वे तो वास्तव में अल्लाह ही से बैअत करते है। उनके हाथों के ऊपर अल्लाह का हाथ होता है। फिर जिस किसी ने वचन भंग किया तो वह वचन भंग करके उसका बवाल अपने ही सिर लेता है, किन्तु जिसने उस प्रतिज्ञा को पूरा किया जो उसने अल्लाह से की है तो उसे वह बड़ा बदला प्रदान करेगा
سَيَقُولُ لَكَ الْمُخَلَّفُونَ مِنَ الْاَعْرَابِ شَغَلَتْنَٓا اَمْوَالُنَا وَاَهْلُونَا فَاسْتَغْفِرْ لَنَاۚ يَقُولُونَ بِاَلْسِنَتِهِمْ مَا لَيْسَ ف۪ي قُلُوبِهِمْۜ قُلْ فَمَنْ يَمْلِكُ لَكُمْ مِنَ اللّٰهِ شَيْـًٔا اِنْ اَرَادَ بِكُمْ ضَرًّا اَوْ اَرَادَ بِكُمْ نَفْعًاۜ بَلْ كَانَ اللّٰهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَب۪يرًا11
जो बद्‌दू पीछे रह गए थे, वे अब तुमसे कहेगे, "हमारे माल और हमारे घरवालों ने हमें व्यस्त कर रखा था; तो आप हमारे लिए क्षमा की प्रार्थना कीजिए।" वे अपनी ज़बानों से वे बातें कहते है जो उनके दिलों में नहीं। कहना कि, "कौन है जो अल्लाह के मुक़ाबले में तुम्हारे किए किसी चीज़ का अधिकार रखता है, यदि वह तुम्हें कोई हानि पहुँचानी चाहे या वह तुम्हें कोई लाभ पहुँचाने का इरादा करे? बल्कि जो कुछ तुम करते हो अल्लाह उसकी ख़बर रखता है। -
بَلْ ظَنَنْتُمْ اَنْ لَنْ يَنْقَلِبَ الرَّسُولُ وَالْمُؤْمِنُونَ اِلٰٓى اَهْل۪يهِمْ اَبَدًا وَزُيِّنَ ذٰلِكَ ف۪ي قُلُوبِكُمْ وَظَنَنْتُمْ ظَنَّ السَّوْءِۚ وَكُنْتُمْ قَوْمًا بُورًا12
"नहीं, बल्कि तुमने यह समझा कि रसूल और ईमानवाले अपने घरवालों की ओर लौटकर कभी न आएँगे और यह तुम्हारे दिलों को अच्छा लगा। तुमने तो बहुत बुरे गुमान किए और तुम्हीं लोग हुए तबाही में पड़नेवाले।"
وَمَنْ لَمْ يُؤْمِنْ بِاللّٰهِ وَرَسُولِه۪ فَاِنَّٓا اَعْتَدْنَا لِلْكَافِر۪ينَ سَع۪يرًا13
और अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान न लाया, तो हमने भी इनकार करनेवालों के लिए भड़कती आग तैयार कर रखी है
وَلِلّٰهِ مُلْكُ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ يَغْفِرُ لِمَنْ يَشَٓاءُ وَيُعَذِّبُ مَنْ يَشَٓاءُۜ وَكَانَ اللّٰهُ غَفُورًا رَح۪يمًا14
अल्लाह ही की है आकाशों और धरती की बादशाही। वह जिसे चाहे क्षमा करे और जिसे चाहे यातना दे। और अल्लाह बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
سَيَقُولُ الْمُخَلَّفُونَ اِذَا انْطَلَقْتُمْ اِلٰى مَغَانِمَ لِتَاْخُذُوهَا ذَرُونَا نَتَّبِعْكُمْۚ يُر۪يدُونَ اَنْ يُبَدِّلُوا كَلَامَ اللّٰهِۜ قُلْ لَنْ تَتَّبِعُونَا كَذٰلِكُمْ قَالَ اللّٰهُ مِنْ قَبْلُۚ فَسَيَقُولُونَ بَلْ تَحْسُدُونَنَاۜ بَلْ كَانُوا لَا يَفْقَهُونَ اِلَّا قَل۪يلًا15
जब तुम ग़नीमतों को प्राप्त करने के लिए उनकी ओर चलोगे तो पीछे रहनेवाले कहेंगे, "हमें भी अनुमति दी जाए कि हम तुम्हारे साथ चले।" वे चाहते है कि अल्लाह का कथन को बदल दे। कह देना, "तुम हमारे साथ कदापि नहीं चल सकते। अल्लाह ने पहले ही ऐसा कह दिया है।" इसपर वे कहेंगे, "नहीं, बल्कि तुम हमसे ईर्ष्या कर रहे हो।" नहीं, बल्कि वे लोग समझते थोड़े ही है
قُلْ لِلْمُخَلَّف۪ينَ مِنَ الْاَعْرَابِ سَتُدْعَوْنَ اِلٰى قَوْمٍ اُو۬ل۪ي بَاْسٍ شَد۪يدٍ تُقَاتِلُونَهُمْ اَوْ يُسْلِمُونَۚ فَاِنْ تُط۪يعُوا يُؤْتِكُمُ اللّٰهُ اَجْرًا حَسَنًاۚ وَاِنْ تَتَوَلَّوْا كَمَا تَوَلَّيْتُمْ مِنْ قَبْلُ يُعَذِّبْكُمْ عَذَابًا اَل۪يمًا16
पीछे रह जानेवाले बद्‌दूओं से कहना, "शीघ्र ही तुम्हें ऐसे लोगों की ओर बुलाया जाएगा जो बड़े युद्धवीर है कि तुम उनसे लड़ो या वे आज्ञाकारी हो जाएँ। तो यदि तुम आज्ञाकारी हो जाएँ। तो यदि तुम आज्ञापालन करोगे तो अल्लाह तुम्हें अच्छा बदला प्रदान करेगा। किन्तु यदि तुम फिर गए, जैसे पहले फिर गए थे, तो वह तुम्हें दुखद यातना देगा।"
لَيْسَ عَلَى الْاَعْمٰى حَرَجٌ وَلَا عَلَى الْاَعْرَجِ حَرَجٌ وَلَا عَلَى الْمَر۪يضِ حَرَجٌۜ وَمَنْ يُطِعِ اللّٰهَ وَرَسُولَهُ يُدْخِلْهُ جَنَّاتٍ تَجْر۪ي مِنْ تَحْتِهَا الْاَنْهَارُۚ وَمَنْ يَتَوَلَّ يُعَذِّبْهُ عَذَابًا اَل۪يمًا۟17
न अन्धे के लिए कोई हरज है, न लँगडे के लिए कोई हरज है और न बीमार के लिए कोई हरज है। जो भी अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करेगा, उसे वह ऐसे बाग़ों में दाख़िल करके, जिनके नीचे नहरे बह रही होगी, किन्तु जो मुँह फेरेगा उसे वह दुखद यातना देगा
لَقَدْ رَضِيَ اللّٰهُ عَنِ الْمُؤْمِن۪ينَ اِذْ يُبَايِعُونَكَ تَحْتَ الشَّجَرَةِ فَعَلِمَ مَا ف۪ي قُلُوبِهِمْ فَاَنْزَلَ السَّك۪ينَةَ عَلَيْهِمْ وَاَثَابَهُمْ فَتْحًا قَر۪يبًاۙ18
निश्चय ही अल्लाह मोमिनों से प्रसन्न हुआ, जब वे वृक्ष के नीचे तुमसे बैअत कर रहे थे। उसने जान लिया जो कुछ उनके दिलों में था। अतः उनपर उसने सकीना (प्रशान्ति) उतारी और बदले में उन्हें मिलनेवाली विजय निश्चित कर दी;
وَمَغَانِمَ كَث۪يرَةً يَاْخُذُونَهَاۜ وَكَانَ اللّٰهُ عَز۪يزًا حَك۪يمًا19
और बहुत-सी ग़नीमतें भी, जिन्हें वे प्राप्त करेंगे। अल्लाह प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
وَعَدَكُمُ اللّٰهُ مَغَانِمَ كَث۪يرَةً تَاْخُذُونَهَا فَعَجَّلَ لَكُمْ هٰذِه۪ وَكَفَّ اَيْدِيَ النَّاسِ عَنْكُمْۚ وَلِتَكُونَ اٰيَةً لِلْمُؤْمِن۪ينَ وَيَهْدِيَكُمْ صِرَاطًا مُسْتَق۪يمًاۙ20
अल्लाह ने तुमसे बहुत-सी गंनीमतों का वादा किया हैं, जिन्हें तुम प्राप्त करोगे। यह विजय तो उसने तुम्हें तात्कालिक रूप से निश्चित कर दी। और लोगों के हाथ तुमसे रोक दिए (कि वे तुमपर आक्रमण करने का साहस न कर सकें) और ताकि ईमानवालों के लिए एक निशानी हो। और वह सीधे मार्ग की ओर तुम्हारा मार्गदर्शन करे
وَاُخْرٰى لَمْ تَقْدِرُوا عَلَيْهَا قَدْ اَحَاطَ اللّٰهُ بِهَاۜ وَكَانَ اللّٰهُ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَد۪يرًا21
इसके अतिरिक्त दूसरी और विजय का भी वादा है, जिसकी सामर्थ्य अभी तुम्हे प्राप्त नहीं, उन्हें अल्लाह ने घेर रखा है। अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है
وَلَوْ قَاتَلَكُمُ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا لَوَلَّوُا الْاَدْبَارَ ثُمَّ لَا يَجِدُونَ وَلِيًّا وَلَا نَص۪يرًا22
यदि (मक्का के) इनकार करनेवाले तुमसे लड़ते तो अवश्य ही पीठ फेर जाते। फिर यह भी कि वे न तो कोई संरक्षक पाएँगे और न कोई सहायक
سُنَّةَ اللّٰهِ الَّت۪ي قَدْ خَلَتْ مِنْ قَبْلُۚ وَلَنْ تَجِدَ لِسُنَّةِ اللّٰهِ تَبْد۪يلًا23
यह अल्लाह की उस रीति के अनुकूल है जो पहले से चली आई है, और तुम अल्लाह की रीति में कदापि कोई परिवर्तन न पाओगे
وَهُوَ الَّذ۪ي كَفَّ اَيْدِيَهُمْ عَنْكُمْ وَاَيْدِيَكُمْ عَنْهُمْ بِبَطْنِ مَكَّةَ مِنْ بَعْدِ اَنْ اَظْفَرَكُمْ عَلَيْهِمْۜ وَكَانَ اللّٰهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَص۪يرًا24
वही है जिसने उसके हाथ तुमसे और तुम्हारे हाथ उनसे मक्के की घाटी में रोक दिए इसके पश्चात कि वह तुम्हें उनपर प्रभावी कर चुका था। अल्लाह उसे देख रहा था जो कुछ तुम कर रहे थे
هُمُ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا وَصَدُّوكُمْ عَنِ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ وَالْهَدْيَ مَعْكُوفًا اَنْ يَبْلُغَ مَحِلَّهُۜ وَلَوْلَا رِجَالٌ مُؤْمِنُونَ وَنِسَٓاءٌ مُؤْمِنَاتٌ لَمْ تَعْلَمُوهُمْ اَنْ تَطَؤُ۫هُمْ فَتُص۪يبَكُمْ مِنْهُمْ مَعَرَّةٌ بِغَيْرِ عِلْمٍۚ لِيُدْخِلَ اللّٰهُ ف۪ي رَحْمَتِه۪ مَنْ يَشَٓاءُۚ لَوْ تَزَيَّلُوا لَعَذَّبْنَا الَّذ۪ينَ كَفَرُوا مِنْهُمْ عَذَابًا اَل۪يمًا25
ये वही लोग तो है जिन्होंने इनकार किया और तुम्हें मस्जिदे हराम (काबा) से रोक दिया और क़ुरबानी के बँधे हुए जानवरों को भी इससे रोके रखा कि वे अपने ठिकाने पर पहुँचे। यदि यह ख़याल न होता कि बहुत-से मोमिन पुरुष और मोमिन स्त्रियाँ (मक्का में) मौजूद है, जिन्हें तुम नहीं जानते, उन्हें कुचल दोगे, फिर उनके सिलसिले में अनजाने तुमपर इल्ज़ाम आएगा (तो युद्ध की अनुमति दे दी जाती, अनुमति इसलिए नहीं दी गई) ताकि अल्लाह जिसे चाहे अपनी दयालुता में दाख़िल कर ले। यदि वे ईमानवाले अलग हो गए होते तो उनमें से जिन लोगों ने इनकार किया उनको हम अवश्य दुखद यातना देते
اِذْ جَعَلَ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا ف۪ي قُلُوبِهِمُ الْحَمِيَّةَ حَمِيَّةَ الْجَاهِلِيَّةِ فَاَنْزَلَ اللّٰهُ سَك۪ينَتَهُ عَلٰى رَسُولِه۪ وَعَلَى الْمُؤْمِن۪ينَ وَاَلْزَمَهُمْ كَلِمَةَ التَّقْوٰى وَكَانُٓوا اَحَقَّ بِهَا وَاَهْلَهَاۜ وَكَانَ اللّٰهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَل۪يمًا۟26
याद करो जब इनकार करनेवाले लोगों ने अपने दिलों में हठ को जगह दी, अज्ञानपूर्ण हठ को; तो अल्लाह ने अपने रसूल पर और ईमानवालो पर सकीना (प्रशान्ति) उतारी और उन्हें परहेज़गारी (धर्मपरायणता) की बात का पाबन्द रखा। वे इसके ज़्यादा हक़दार और इसके योग्य भी थे। अल्लाह तो हर चीज़ जानता है
لَقَدْ صَدَقَ اللّٰهُ رَسُولَهُ الرُّءْيَا بِالْحَقِّۚ لَتَدْخُلُنَّ الْمَسْجِدَ الْحَرَامَ اِنْ شَٓاءَ اللّٰهُ اٰمِن۪ينَۙ مُحَلِّق۪ينَ رُؤُ۫سَكُمْ وَمُقَصِّر۪ينَۙ لَا تَخَافُونَۜ فَعَلِمَ مَا لَمْ تَعْلَمُوا فَجَعَلَ مِنْ دُونِ ذٰلِكَ فَتْحًا قَر۪يبًا27
निश्चय ही अल्लाह ने अपने रसूल को हक़ के साथ सच्चा स्वप्न दिखाया, "यदि अल्लाह ने चाहा तो तुम अवश्य मस्जिदे हराम (काबा) में प्रवेश करोगे बेखटके, अपने सिर के बाल मुड़ाते और कतरवाते हुए, तुम्हें कोई भय न होगा।" हुआ यह कि उसने वह बात जान ली जो तुमने नहीं जानी। अतः इससे पहले उसने शीघ्र प्राप्त होनेवाली विजय तुम्हारे लिए निश्चिंत कर दी
هُوَ الَّذ۪ٓي اَرْسَلَ رَسُولَهُ بِالْهُدٰى وَد۪ينِ الْحَقِّ لِيُظْهِرَهُ عَلَى الدّ۪ينِ كُلِّه۪ۜ وَكَفٰى بِاللّٰهِ شَه۪يدًاۜ28
वही है जिसने अपने रसूल को मार्गदर्शन और सत्यधर्म के साथ भेजा, ताकि उसे पूरे के पूरे धर्म पर प्रभुत्व प्रदान करे और गवाह की हैसियत से अल्लाह काफ़ी है
مُحَمَّدٌ رَسُولُ اللّٰهِۜ وَالَّذ۪ينَ مَعَهُٓ اَشِدَّٓاءُ عَلَى الْكُفَّارِ رُحَمَٓاءُ بَيْنَهُمْ تَرٰيهُمْ رُكَّعًا سُجَّدًا يَبْتَغُونَ فَضْلًا مِنَ اللّٰهِ وَرِضْوَانًاۘ س۪يمَاهُمْ ف۪ي وُجُوهِهِمْ مِنْ اَثَرِ السُّجُودِۜ ذٰلِكَ مَثَلُهُمْ فِي التَّوْرٰيةِۚۛ وَمَثَلُهُمْ فِي الْاِنْج۪يلِ۠ۛ كَزَرْعٍ اَخْرَجَ شَطْـَٔهُ۫ فَاٰزَرَهُ فَاسْتَغْلَظَ فَاسْتَوٰى عَلٰى سُوقِه۪ يُعْجِبُ الزُّرَّاعَ لِيَغ۪يظَ بِهِمُ الْكُفَّارَۜ وَعَدَ اللّٰهُ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ مِنْهُمْ مَغْفِرَةً وَاَجْرًا عَظ۪يمًا29
अल्लाह के रसूल मुहम्मद और जो लोग उनके साथ हैं, वे इनकार करनेवालों पर भारी हैं, आपस में दयालु है। तुम उन्हें रुकू में, सजदे में, अल्लाह का उदार अनुग्रह और उसकी प्रसन्नता चाहते हुए देखोगे। वे अपने चहरों से पहचाने जाते हैं जिनपर सजदों का प्रभाव है। यही उनकी विशेषता तौरात में और उनकी विशेषता इंजील में उस खेती की तरह उल्लिखित है जिसने अपना अंकुर निकाला; फिर उसे शक्ति पहुँचाई तो वह मोटा हुआ और वह अपने तने पर सीधा खड़ा हो गया। खेती करनेवालों को भा रहा है, ताकि उनसे इनकार करनेवालों का भी जी जलाए। उनमें से जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए उनसे अल्लाह ने क्षमा और बदले का वादा किया है
49 · अल-हुजरात
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لَا تُقَدِّمُوا بَيْنَ يَدَيِ اللّٰهِ وَرَسُولِه۪ وَاتَّقُوا اللّٰهَۜ اِنَّ اللّٰهَ سَم۪يعٌ عَل۪يمٌ1
ऐ ईमानवालो! अल्लाह और उसके रसूल से आगे न बढो और अल्लाह का डर रखो। निश्चय ही अल्लाह सुनता, जानता है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لَا تَرْفَعُٓوا اَصْوَاتَكُمْ فَوْقَ صَوْتِ النَّبِيِّ وَلَا تَجْهَرُوا لَهُ بِالْقَوْلِ كَجَهْرِ بَعْضِكُمْ لِبَعْضٍ اَنْ تَحْبَطَ اَعْمَالُكُمْ وَاَنْتُمْ لَا تَشْعُرُونَ2
ऐ लोगो, जो ईमान लाए हो! तुम अपनी आवाज़ों को नबी की आवाज़ से ऊँची न करो। और जिस तरह तुम आपस में एक-दूसरे से ज़ोर से बोलते हो, उससे ऊँची आवाज़ में बात न करो। कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे कर्म अकारथ हो जाएँ और तुम्हें ख़बर भी न हो
اِنَّ الَّذ۪ينَ يَغُضُّونَ اَصْوَاتَهُمْ عِنْدَ رَسُولِ اللّٰهِ اُو۬لٰٓئِكَ الَّذ۪ينَ امْتَحَنَ اللّٰهُ قُلُوبَهُمْ لِلتَّقْوٰىۜ لَهُمْ مَغْفِرَةٌ وَاَجْرٌ عَظ۪يمٌ3
वे लोग जो अल्लाह के रसूल के समक्ष अपनी आवाज़ों को दबी रखते है, वही लोग है जिनके दिलों को अल्लाह ने परहेज़गारी के लिए जाँचकर चुन लिया है। उनके लिए क्षमा और बड़ा बदला है
اِنَّ الَّذ۪ينَ يُنَادُونَكَ مِنْ وَرَٓاءِ الْحُجُرَاتِ اَكْثَرُهُمْ لَا يَعْقِلُونَ4
जो लोग (ऐ नबी) तुम्हें कमरों के बाहर से पुकारते है उनमें से अधिकतर बुद्धि से काम नहीं लेते
وَلَوْ اَنَّهُمْ صَبَرُوا حَتّٰى تَخْرُجَ اِلَيْهِمْ لَكَانَ خَيْرًا لَهُمْۜ وَاللّٰهُ غَفُورٌ رَح۪يمٌ5
यदि वे धैर्य से काम लेते यहाँ तक कि तुम स्वयं निकलकर उनके पास आ जाते तो यह उनके लिए अच्छा होता। किन्तु अल्लाह बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اِنْ جَٓاءَكُمْ فَاسِقٌ بِنَبَاٍ فَتَبَيَّنُٓوا اَنْ تُص۪يبُوا قَوْمًا بِجَهَالَةٍ فَتُصْبِحُوا عَلٰى مَا فَعَلْتُمْ نَادِم۪ينَ6
ऐ लोगों, जो ईमान लाए हो! यदि कोई अवज्ञाकारी तुम्हारे पास कोई ख़बर लेकर आए तो उसकी छानबीन कर लिया करो। कहीं ऐसा न हो कि तुम किसी गिरोह को अनजाने में तकलीफ़ और नुक़सान पहुँचा बैठो, फिर अपने किए पर पछताओ
وَاعْلَمُٓوا اَنَّ ف۪يكُمْ رَسُولَ اللّٰهِۜ لَوْ يُط۪يعُكُمْ ف۪ي كَث۪يرٍ مِنَ الْاَمْرِ لَعَنِتُّمْ وَلٰكِنَّ اللّٰهَ حَبَّبَ اِلَيْكُمُ الْا۪يمَانَ وَزَيَّنَهُ ف۪ي قُلُوبِكُمْ وَكَرَّهَ اِلَيْكُمُ الْكُفْرَ وَالْفُسُوقَ وَالْعِصْيَانَۜ اُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الرَّاشِدُونَۙ7
जान लो कि तुम्हारे बीच अल्लाह का रसूल मौजूद है। बहुत-से मामलों में यदि वह तुम्हारी बात मान ले तो तुम कठिनाई में पड़ जाओ। किन्तु अल्लाह ने तुम्हारे लिए ईमान को प्रिय बना दिया और उसे तुम्हारे दिलों में सुन्दरता दे दी और इनकार, उल्लंघन और अवज्ञा को तुम्हारे लिए बहुत अप्रिय बना दिया।
فَضْلًا مِنَ اللّٰهِ وَنِعْمَةًۜ وَاللّٰهُ عَل۪يمٌ حَك۪يمٌ8
ऐसे ही लोग अल्लाह के उदार अनुग्रह और अनुकम्पा से सूझबूझवाले है। और अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, तत्वदर्शी है
وَاِنْ طَٓائِفَتَانِ مِنَ الْمُؤْمِن۪ينَ اقْتَتَلُوا فَاَصْلِحُوا بَيْنَهُمَاۚ فَاِنْ بَغَتْ اِحْدٰيهُمَا عَلَى الْاُخْرٰى فَقَاتِلُوا الَّت۪ي تَبْغ۪ي حَتّٰى تَف۪ٓيءَ اِلٰٓى اَمْرِ اللّٰهِۚ فَاِنْ فَٓاءَتْ فَاَصْلِحُوا بَيْنَهُمَا بِالْعَدْلِ وَاَقْسِطُواۜ اِنَّ اللّٰهَ يُحِبُّ الْمُقْسِط۪ينَ9
यदि मोमिनों में से दो गिरोह आपस में लड़ पड़े तो उनके बीच सुलह करा दो। फिर यदि उनमें से एक गिरोह दूसरे पर ज़्यादती करे, तो जो गिरोह ज़्यादती कर रहा हो उससे लड़ो, यहाँ तक कि वह अल्लाह के आदेश की ओर पलट आए। फिर यदि वह पलट आए तो उनके बीच न्याय के साथ सुलह करा दो, और इनसाफ़ करो। निश्चय ही अल्लाह इनसाफ़ करनेवालों को पसन्द करता है
اِنَّمَا الْمُؤْمِنُونَ اِخْوَةٌ فَاَصْلِحُوا بَيْنَ اَخَوَيْكُمْ وَاتَّقُوا اللّٰهَ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ۟10
मोमिन तो भाई-भाई ही है। अतः अपने दो भाईयो के बीच सुलह करा दो और अल्लाह का डर रखो, ताकि तुमपर दया की जाए
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لَا يَسْخَرْ قَوْمٌ مِنْ قَوْمٍ عَسٰٓى اَنْ يَكُونُوا خَيْرًا مِنْهُمْ وَلَا نِسَٓاءٌ مِنْ نِسَٓاءٍ عَسٰٓى اَنْ يَكُنَّ خَيْرًا مِنْهُنَّۚ وَلَا تَلْمِزُٓوا اَنْفُسَكُمْ وَلَا تَنَابَزُوا بِالْاَلْقَابِۜ بِئْسَ الِاسْمُ الْفُسُوقُ بَعْدَ الْا۪يمَانِۚ وَمَنْ لَمْ يَتُبْ فَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ11
ऐ लोगो, जो ईमान लाए हो! न पुरुषों का कोई गिरोह दूसरे पुरुषों की हँसी उड़ाए, सम्भव है वे उनसे अच्छे हों और न स्त्रियाँ स्त्रियों की हँसी उड़ाए, सम्भव है वे उनसे अच्छी हों, और न अपनों पर ताने कसो और न आपस में एक-दूसरे को बुरी उपाधियों से पुकारो। ईमान के पश्चात अवज्ञाकारी का नाम जुडना बहुत ही बुरा है। और जो व्यक्ति बाज़ न आए, तो ऐसे ही व्यक्ति ज़ालिम है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا اجْتَنِبُوا كَث۪يرًا مِنَ الظَّنِّۚ اِنَّ بَعْضَ الظَّنِّ اِثْمٌ وَلَا تَجَسَّسُوا وَلَا يَغْتَبْ بَعْضُكُمْ بَعْضًاۜ اَيُحِبُّ اَحَدُكُمْ اَنْ يَاْكُلَ لَحْمَ اَخ۪يهِ مَيْتًا فَكَرِهْتُمُوهُۜ وَاتَّقُوا اللّٰهَۜ اِنَّ اللّٰهَ تَوَّابٌ رَح۪يمٌ12
ऐ ईमान लानेवालो! बहुत से गुमानों से बचो, क्योंकि कतिपय गुमान गुनाह होते है। और न टोह में पड़ो और न तुममें से कोई किसी की पीठ पीछे निन्दा करे - क्या तुममें से कोई इसको पसन्द करेगा कि वह मरे हुए भाई का मांस खाए? वह तो तुम्हें अप्रिय होगी ही। - और अल्लाह का डर रखो। निश्चय ही अल्लाह तौबा क़बूल करनेवाला, अत्यन्त दयावान है
يَٓا اَيُّهَا النَّاسُ اِنَّا خَلَقْنَاكُمْ مِنْ ذَكَرٍ وَاُنْثٰى وَجَعَلْنَاكُمْ شُعُوبًا وَقَبَٓائِلَ لِتَعَارَفُواۜ اِنَّ اَكْرَمَكُمْ عِنْدَ اللّٰهِ اَتْقٰيكُمْۜ اِنَّ اللّٰهَ عَل۪يمٌ خَب۪يرٌ13
ऐ लोगो! हमनें तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया और तुम्हें बिरादरियों और क़बिलों का रूप दिया, ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो। वास्तव में अल्लाह के यहाँ तुममें सबसे अधिक प्रतिष्ठित वह है, जो तुममे सबसे अधिक डर रखता है। निश्चय ही अल्लाह सबकुछ जाननेवाला, ख़बर रखनेवाला है
قَالَتِ الْاَعْرَابُ اٰمَنَّاۜ قُلْ لَمْ تُؤْمِنُوا وَلٰكِنْ قُولُٓوا اَسْلَمْنَا وَلَمَّا يَدْخُلِ الْا۪يمَانُ ف۪ي قُلُوبِكُمْۜ وَاِنْ تُط۪يعُوا اللّٰهَ وَرَسُولَهُ لَا يَلِتْكُمْ مِنْ اَعْمَالِكُمْ شَيْـًٔاۜ اِنَّ اللّٰهَ غَفُورٌ رَح۪يمٌ14
बद्‌दुओं ने कहा कि, "हम ईमान लाए।" कह दो, "तुम ईमान नहीं लाए। किन्तु यूँ कहो, 'हम तो आज्ञाकारी हुए' ईमान तो अभी तुम्हारे दिलों में दाख़िल ही नहीं हुआ। यदि तुम अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो तो वह तुम्हारे कर्मों में से तुम्हारे लिए कुछ कम न करेगा। निश्चय ही अल्लाह बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है।"
اِنَّمَا الْمُؤْمِنُونَ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا بِاللّٰهِ وَرَسُولِه۪ ثُمَّ لَمْ يَرْتَابُوا وَجَاهَدُوا بِاَمْوَالِهِمْ وَاَنْفُسِهِمْ ف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِۜ اُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الصَّادِقُونَ15
मोमिन तो बस वही लोग है जो अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाए, फिर उन्होंने कोई सन्देह नहीं किया और अपने मालों और अपनी जानों से अल्लाह के मार्ग में जिहाद किया। वही लोग सच्चे है
قُلْ اَتُعَلِّمُونَ اللّٰهَ بِد۪ينِكُمْ وَاللّٰهُ يَعْلَمُ مَا فِي السَّمٰوَاتِ وَمَا فِي الْاَرْضِۜ وَاللّٰهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَل۪يمٌ16
कहो, "क्या तुम अल्लाह को अपने धर्म की सूचना दे रहे हो। हालाँकि जो कुछ आकाशों में और जो कुछ धरती में है, अल्लाह सब जानता है? अल्लाह को हर चीज़ का ज्ञान है।"
يَمُنُّونَ عَلَيْكَ اَنْ اَسْلَمُواۜ قُلْ لَا تَمُنُّوا عَلَيَّ اِسْلَامَكُمْۚ بَلِ اللّٰهُ يَمُنُّ عَلَيْكُمْ اَنْ هَدٰيكُمْ لِلْا۪يمَانِ اِنْ كُنْتُمْ صَادِق۪ينَ17
वे तुमपर एहसान जताते है कि उन्होंने इस्लाम क़बूल कर लिया। कह दो, "मुझ पर अपने इस्लाम का एहसान न रखो, बल्कि यदि तुम सच्चे हो तो अल्लाह ही तुमपर एहसान रखता है कि उसने तुम्हें ईमान की राह दिखाई।-
اِنَّ اللّٰهَ يَعْلَمُ غَيْبَ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ وَاللّٰهُ بَص۪يرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ18
"निश्चय ही अल्लाह आकाशों और धरती के अदृष्ट को जानता है। और अल्लाह देख रहा है जो कुछ तुम करते हो।"
50 · काफ
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
قٓ۠ وَالْقُرْاٰنِ الْمَج۪يدِۚ1
क़ाफ़॰; गवाह है क़ुरआन मजीद! -
بَلْ عَجِبُٓوا اَنْ جَٓاءَهُمْ مُنْذِرٌ مِنْهُمْ فَقَالَ الْكَافِرُونَ هٰذَا شَيْءٌ عَج۪يبٌ2
बल्कि उन्हें तो इस बात पर आश्चर्य हुआ कि उनके पास उन्हीं में से एक सावधान करनेवाला आ गया। फिर इनकार करनेवाले कहने लगे, "यह तो आश्चर्य की बात है
ءَاِذَا مِتْنَا وَكُنَّا تُرَابًاۚ ذٰلِكَ رَجْعٌ بَع۪يدٌ3
"क्या जब हम मर जाएँगे और मिट्टी हो जाएँगे (तो फिर हम जीवि होकर पलटेंगे)? यह पलटना तो बहुत दूर की बात है!"
قَدْ عَلِمْنَا مَا تَنْقُصُ الْاَرْضُ مِنْهُمْۚ وَعِنْدَنَا كِتَابٌ حَف۪يظٌ4
हम जानते है कि धरती उनमें जो कुछ कमी करती है और हमारे पास सुरक्षित रखनेवाली एक किताब भी है
بَلْ كَذَّبُوا بِالْحَقِّ لَمَّا جَٓاءَهُمْ فَهُمْ ف۪ٓي اَمْرٍ مَر۪يجٍ5
बल्कि उन्होंने सत्य को झुठला दिया जब वह उनके पास आया। अतः वे एक उलझन भी बात में पड़े हुए है
اَفَلَمْ يَنْظُرُٓوا اِلَى السَّمَٓاءِ فَوْقَهُمْ كَيْفَ بَنَيْنَاهَا وَزَيَّنَّاهَا وَمَا لَهَا مِنْ فُرُوجٍ6
अच्छा तो क्या उन्होंने अपने ऊपर आकाश को नहीं देखा, हमने उसे कैसा बनाया और उसे सजाया। और उसमें कोई दरार नहीं
وَالْاَرْضَ مَدَدْنَاهَا وَاَلْقَيْنَا ف۪يهَا رَوَاسِيَ وَاَنْبَتْنَا ف۪يهَا مِنْ كُلِّ زَوْجٍ بَه۪يجٍۙ7
और धरती को हमने फैलाया और उसमे अटल पहाड़ डाल दिए। और हमने उसमें हर प्रकार की सुन्दर चीज़े उगाई,
تَبْصِرَةً وَذِكْرٰى لِكُلِّ عَبْدٍ مُن۪يبٍ8
आँखें खोलने और याद दिलाने के उद्देश्य से, हर बन्दे के लिए जो रुजू करनेवाला हो
وَنَزَّلْنَا مِنَ السَّمَٓاءِ مَٓاءً مُبَارَكًا فَاَنْبَتْنَا بِه۪ جَنَّاتٍ وَحَبَّ الْحَص۪يدِۙ9
और हमने आकाश से बरकतवाला पानी उतारा, फिर उससे बाग़ और फ़सल के अनाज।
وَالنَّخْلَ بَاسِقَاتٍ لَهَا طَلْعٌ نَض۪يدٌۙ10
और ऊँचे-ऊँचे खजूर के वृक्ष उगाए जिनके गुच्छे तह पर तह होते है,
رِزْقًا لِلْعِبَادِۙ وَاَحْيَيْنَا بِه۪ بَلْدَةً مَيْتًاۜ كَذٰلِكَ الْخُرُوجُ11
बन्दों की रोजी के लिए। और हमने उस (पानी) के द्वारा निर्जीव धरती को जीवन प्रदान किया। इसी प्रकार निकलना भी हैं
كَذَّبَتْ قَبْلَهُمْ قَوْمُ نُوحٍ وَاَصْحَابُ الرَّسِّ وَثَمُودُۙ12
उनसे पहले नूह की क़ौम, 'अर्-रस' वाले, समूद,
وَعَادٌ وَفِرْعَوْنُ وَاِخْوَانُ لُوطٍۙ13
आद, फ़िरऔन , लूत के भाई,
وَاَصْحَابُ الْاَيْكَةِ وَقَوْمُ تُبَّعٍۜ كُلٌّ كَذَّبَ الرُّسُلَ فَحَقَّ وَع۪يدِ14
'अल-ऐका' वाले और तुब्बा के लोग भी झुठला चुके है। प्रत्येक ने रसूलों को झुठलाया। अन्ततः मेरी धमकी सत्यापित होकर रही
اَفَعَي۪ينَا بِالْخَلْقِ الْاَوَّلِۜ بَلْ هُمْ ف۪ي لَبْسٍ مِنْ خَلْقٍ جَد۪يدٍ۟15
क्या हम पहली बार पैदा करने से असमर्थ रहे? नहीं, बल्कि वे एक नई सृष्टि के विषय में सन्देह में पड़े है
وَلَقَدْ خَلَقْنَا الْاِنْسَانَ وَنَعْلَمُ مَا تُوَسْوِسُ بِه۪ نَفْسُهُۚ وَنَحْنُ اَقْرَبُ اِلَيْهِ مِنْ حَبْلِ الْوَر۪يدِ16
हमने मनुष्य को पैदा किया है और हम जानते है जो बातें उसके जी में आती है। और हम उससे उसकी गरदन की रग से भी अधिक निकट है
اِذْ يَتَلَقَّى الْمُتَلَقِّيَانِ عَنِ الْيَم۪ينِ وَعَنِ الشِّمَالِ قَع۪يدٌ17
जब दो प्राप्त करनेवाले (फ़रिशते) प्राप्त कर रहे होते है, दाएँ से और बाएँ से वे लगे बैठे होते है
مَا يَلْفِظُ مِنْ قَوْلٍ اِلَّا لَدَيْهِ رَق۪يبٌ عَت۪يدٌ18
कोई बात उसने कही नहीं कि उसके पास एक निरीक्षक तैयार रहता है
وَجَٓاءَتْ سَكْرَةُ الْمَوْتِ بِالْحَقِّۜ ذٰلِكَ مَا كُنْتَ مِنْهُ تَح۪يدُ19
और मौत की बेहोशी ले आई अविश्व नीय चीज़! यही वह चीज़ है जिससे तू कतराता था
وَنُفِخَ فِي الصُّورِۜ ذٰلِكَ يَوْمُ الْوَع۪يدِ20
और नरसिंघा फूँक दिया गया। यही है वह दिन जिसकी धमकी दी गई थी
وَجَٓاءَتْ كُلُّ نَفْسٍ مَعَهَا سَٓائِقٌ وَشَه۪يدٌ21
हर व्यक्ति इस दशा में आ गया कि उसके साथ एक लानेवाला है और एक गवाही देनेवाला
لَقَدْ كُنْتَ ف۪ي غَفْلَةٍ مِنْ هٰذَا فَكَشَفْنَا عَنْكَ غِطَٓاءَكَ فَبَصَرُكَ الْيَوْمَ حَد۪يدٌ22
तू इस चीज़ की ओर से ग़फ़लत में था। अब हमने तुझसे तेरा परदा हटा दिया, तो आज तेरी निगाह बड़ी तेज़ है
وَقَالَ قَر۪ينُهُ هٰذَا مَا لَدَيَّ عَت۪يدٌۜ23
उसके साथी ने कहा, "यह है (तेरी सजा)! मेरे पास कुछ (सहायता के लिए) मौजूद नहीं।"
اَلْقِيَا ف۪ي جَهَنَّمَ كُلَّ كَفَّارٍ عَن۪يدٍۙ24
"डाल दो, डाल दो, जहन्नम में! हर अकृतज्ञ द्वेष रखने वाले,
مَنَّاعٍ لِلْخَيْرِ مُعْتَدٍ مُر۪يبٍۙ25
भलाई से रोकनेवाले, सीमा का अतिक्रमण करनेवाले, सन्देहग्रस्त को
اَلَّذ۪ي جَعَلَ مَعَ اللّٰهِ اِلٰهًا اٰخَرَ فَاَلْقِيَاهُ فِي الْعَذَابِ الشَّد۪يدِ26
जिसने अल्लाह के साथ किसी दूसरे को पूज्य-प्रभु ठहराया। तो डाल दो उसे कठोर यातना में।"
قَالَ قَر۪ينُهُ رَبَّنَا مَٓا اَطْغَيْتُهُ وَلٰكِنْ كَانَ ف۪ي ضَلَالٍ بَع۪يدٍ27
उसका साथी बोला, "ऐ हमारे रब! मैंने उसे सरकश नहीं बनाया, बल्कि वह स्वयं ही परले दरजे की गुमराही में था।"
قَالَ لَا تَخْتَصِمُوا لَدَيَّ وَقَدْ قَدَّمْتُ اِلَيْكُمْ بِالْوَع۪يدِ28
कहा, "मेरे सामने मत झगड़ो। मैं तो तुम्हें पहले ही अपनी धमकी से सावधान कर चुका था। -
مَا يُبَدَّلُ الْقَوْلُ لَدَيَّ وَمَٓا اَنَا۬ بِظَلَّامٍ لِلْعَب۪يدِۚ29
"मेरे यहाँ बात बदला नहीं करती और न मैं अपने बन्दों पर तनिक भी अत्याचार करता हूँ।"
يَوْمَ نَقُولُ لِجَهَنَّمَ هَلِ امْتَلَاْتِ وَتَقُولُ هَلْ مِنْ مَز۪يدٍ30
जिस दिन हम जहन्नम से कहेंगे, "क्या तू भर गई?" और वह कहेगी, "क्या अभी और भी कुछ है?"
وَاُزْلِفَتِ الْجَنَّةُ لِلْمُتَّق۪ينَ غَيْرَ بَع۪يدٍ31
और जन्नत डर रखनेवालों के लिए निकट कर दी गई, कुछ भी दूर न रही
هٰذَا مَا تُوعَدُونَ لِكُلِّ اَوَّابٍ حَف۪يظٍۚ32
"यह है वह चीज़ जिसका तुमसे वादा किया जाता था हर रुजू करनेवाले, बड़ी निगरानी रखनेवाले के लिए; -
مَنْ خَشِيَ الرَّحْمٰنَ بِالْغَيْبِ وَجَٓاءَ بِقَلْبٍ مُن۪يبٍ33
"जो रहमान से डरा परोक्ष में और आया रुजू रहनेवाला हृदय लेकर -
اُدْخُلُوهَا بِسَلَامٍۜ ذٰلِكَ يَوْمُ الْخُلُودِ34
"प्रवेश करो उस (जन्नत) में सलामती के साथ" वह शाश्वत दिवस है
لَهُمْ مَا يَشَٓاؤُ۫نَ ف۪يهَا وَلَدَيْنَا مَز۪يدٌ35
उनके लिए उसमें वह सब कुछ है जो वे चाहे और हमारे पास उससे अधिक भी है
وَكَمْ اَهْلَكْنَا قَبْلَهُمْ مِنْ قَرْنٍ هُمْ اَشَدُّ مِنْهُمْ بَطْشًا فَنَقَّبُوا فِي الْبِلَادِۜ هَلْ مِنْ مَح۪يصٍ36
उनसे पहले हम कितनी ही नस्लों को विनष्ट कर चुके है। वे लोग शक्ति में उनसे कहीं बढ़-चढ़कर थे। (पनाह की तलाश में) उन्होंने नगरों को छान मारा, कोई है भागने को ठिकाना?
اِنَّ ف۪ي ذٰلِكَ لَذِكْرٰى لِمَنْ كَانَ لَهُ قَلْبٌ اَوْ اَلْقَى السَّمْعَ وَهُوَ شَه۪يدٌ37
निश्चय ही इसमें उस व्यक्ति के लिए शिक्षा-सामग्री है जिसके पास दिल हो या वह (दिल से) हाजिर रहकर कान लगाए
وَلَقَدْ خَلَقْنَا السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَا ف۪ي سِتَّةِ اَيَّامٍۗ وَمَا مَسَّنَا مِنْ لُغُوبٍ38
हमने आकाशों और धरती को और जो कुछ उनके बीच है छः दिनों में पैदा कर दिया और हमें कोई थकान न छू सकी
فَاصْبِرْ عَلٰى مَا يَقُولُونَ وَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ قَبْلَ طُلُوعِ الشَّمْسِ وَقَبْلَ الْغُرُوبِۚ39
अतः जो कुछ वे कहते है उसपर धैर्य से काम लो और अपने रब की प्रशंसा की तसबीह करो; सूर्योदय से पूर्व और सूर्यास्त के पूर्व,
وَمِنَ الَّيْلِ فَسَبِّحْهُ وَاَدْبَارَ السُّجُودِ40
और रात की घड़ियों में फिर उसकी तसबीह करो और सजदों के पश्चात भी
وَاسْتَمِعْ يَوْمَ يُنَادِ الْمُنَادِ مِنْ مَكَانٍ قَر۪يبٍۙ41
और कान लगाकर सुन लेगा जिस दिन पुकारनेवाला अत्यन्त निकट के स्थान से पुकारेगा,
يَوْمَ يَسْمَعُونَ الصَّيْحَةَ بِالْحَقِّۜ ذٰلِكَ يَوْمُ الْخُرُوجِ42
जिस दिन लोग भयंकर चीख़ को सत्यतः सुन रहे होंगे। वही दिन होगा निकलने का।-
اِنَّا نَحْنُ نُحْي۪ وَنُم۪يتُ وَاِلَيْنَا الْمَص۪يرُۙ43
हम ही जीलन प्रदान करते और मृत्यु देते है और हमारी ही ओर अन्ततः आना है। -
يَوْمَ تَشَقَّقُ الْاَرْضُ عَنْهُمْ سِرَاعًاۜ ذٰلِكَ حَشْرٌ عَلَيْنَا يَس۪يرٌ44
जिस दिन धरती उनपर से फट जाएगी और वे तेजी से निकल पड़ेंगे। यह इकट्ठा करना हमारे लिए अत्यन्त सरल है
نَحْنُ اَعْلَمُ بِمَا يَقُولُونَ وَمَٓا اَنْتَ عَلَيْهِمْ بِجَبَّارٍ فَذَكِّرْ بِالْقُرْاٰنِ مَنْ يَخَافُ وَع۪يدِ45
हम जानते है जो कुछ वे कहते है, तुम उनपर कोई ज़बरदस्ती करनेवाले तो हो नहीं। अतः तुम क़ुरआन के द्वारा उसे नसीहत करो जो हमारी चेतावनी से डरे
51 · अज़-ज़ारियात
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
وَالذَّارِيَاتِ ذَرْوًاۙ1
गवाह है (हवाएँ) जो गर्द-ग़ुबार उड़ाती फिरती है;
فَالْحَامِلَاتِ وِقْرًاۙ2
फिर बोझ उठाती है;
فَالْجَارِيَاتِ يُسْرًاۙ3
फिर नरमी से चलती है;
فَالْمُقَسِّمَاتِ اَمْرًاۙ4
फिर मामले को अलग-अलग करती है;
اِنَّمَا تُوعَدُونَ لَصَادِقٌۙ5
निश्चय ही तुमसे जिस चीज़ का वादा किया जाता है, वह सत्य है;
وَاِنَّ الدّ۪ينَ لَوَاقِعٌۜ6
और (कर्मों का) बदला अवश्य सामने आकर रहेगा
وَالسَّمَٓاءِ ذَاتِ الْحُبُكِۙ7
गवाह है धारियोंवाला आकाश।
اِنَّكُمْ لَف۪ي قَوْلٍ مُخْتَلِفٍۙ8
निश्चय ही तुम उस बात में पड़े हुए हो जिनमें कथन भिन्न-भिन्न है
يُؤْفَكُ عَنْهُ مَنْ اُفِكَۜ9
इसमें कोई सरफिरा ही विमुख होता है
قُتِلَ الْخَرَّاصُونَۙ10
मारे जाएँ अटकल दौड़ानेवाले;
اَلَّذ۪ينَ هُمْ ف۪ي غَمْرَةٍ سَاهُونَۙ11
जो ग़फ़लत में पड़े हुए हैं भूले हुए
يَسْـَٔلُونَ اَيَّانَ يَوْمُ الدّ۪ينِۜ12
पूछते है, "बदले का दिन कब आएगा?"
يَوْمَ هُمْ عَلَى النَّارِ يُفْتَنُونَ13
जिस दिन वे आग पर तपाए जाएँगे,
ذُوقُوا فِتْنَتَكُمْۜ هٰذَا الَّذ۪ي كُنْتُمْ بِه۪ تَسْتَعْجِلُونَ14
"चखों मज़ा. अपने फ़ितने (उपद्रव) का! यहीं है जिसके लिए तुम जल्दी मचा रहे थे।"
اِنَّ الْمُتَّق۪ينَ ف۪ي جَنَّاتٍ وَعُيُونٍۙ15
निश्चय ही डर रखनेवाले बाग़ों और स्रोतों में होंगे
اٰخِذ۪ينَ مَٓا اٰتٰيهُمْ رَبُّهُمْۜ اِنَّهُمْ كَانُوا قَبْلَ ذٰلِكَ مُحْسِن۪ينَۜ16
जो कुछ उनके रब ने उन्हें दिया, वे उसे ले रहे होंगे। निस्संदेह वे इससे पहले उत्तमकारों में से थे
كَانُوا قَل۪يلًا مِنَ الَّيْلِ مَا يَهْجَعُونَ17
रातों को थोड़ा ही सोते थे,
وَبِالْاَسْحَارِ هُمْ يَسْتَغْفِرُونَ18
और वही प्रातः की घड़ियों में क्षमा की प्रार्थना करते थे
وَف۪ٓي اَمْوَالِهِمْ حَقٌّ لِلسَّٓائِلِ وَالْمَحْرُومِ19
और उनके मालों में माँगनेवाले और धनहीन का हक़ था
وَفِي الْاَرْضِ اٰيَاتٌ لِلْمُوقِن۪ينَۙ20
और धरती में विश्वास करनेवालों के लिए बहुत-सी निशानियाँ है,
وَف۪ٓي اَنْفُسِكُمْۜ اَفَلَا تُبْصِرُونَ21
और ,स्वयं तुम्हारे अपने आप में भी। तो क्या तुम देखते नहीं?
وَفِي السَّمَٓاءِ رِزْقُكُمْ وَمَا تُوعَدُونَ22
और आकाश मे ही तुम्हारी रोज़ी है और वह चीज़ भी जिसका तुमसे वादा किया जा रहा है
فَوَرَبِّ السَّمَٓاءِ وَالْاَرْضِ اِنَّهُ لَحَقٌّ مِثْلَ مَٓا اَنَّكُمْ تَنْطِقُونَ۟23
अतः सौगन्ध है आकाश और धरती के रब की। निश्चय ही वह सत्य बात है ऐसे ही जैसे तुम बोलते हो
هَلْ اَتٰيكَ حَد۪يثُ ضَيْفِ اِبْرٰه۪يمَ الْمُكْرَم۪ينَۢ24
क्या इबराईम के प्रतिष्ठित अतिथियों का वृतान्त तुम तक पहँचा?
اِذْ دَخَلُوا عَلَيْهِ فَقَالُوا سَلَامًاۜ قَالَ سَلَامٌۚ قَوْمٌ مُنْكَرُونَ25
जब वे उसके पास आए तो कहा, "सलाम है तुमपर!" उसने भी कहा, "सलाम है आप लोगों पर भी!" (और जी में कहा) "ये तो अपरिचित लोग हैं।"
فَرَاغَ اِلٰٓى اَهْلِه۪ فَجَٓاءَ بِعِجْلٍ سَم۪ينٍۙ26
फिर वह चुपके से अपने घरवालों के पास गया और एक मोटा-ताज़ा बछड़ा (का भूना हुआ मांस) ले आया
فَقَرَّبَهُٓ اِلَيْهِمْ قَالَ اَلَا تَاْكُلُونَۘ27
और उसे उनके सामने पेश किया। कहा, "क्या आप खाते नहीं?"
فَاَوْجَسَ مِنْهُمْ خ۪يفَةًۜ قَالُوا لَا تَخَفْۜ وَبَشَّرُوهُ بِغُلَامٍ عَل۪يمٍ28
फिर उसने दिल में उनसे डर महसूस किया। उन्होंने कहा, "डरिए नहीं।" और उन्होंने उसे एक ज्ञानवान लड़के की मंगल-सूचना दी
فَاَقْبَلَتِ امْرَاَتُهُ ف۪ي صَرَّةٍ فَصَكَّتْ وَجْهَهَا وَقَالَتْ عَجُوزٌ عَق۪يمٌ29
इसपर उसकी स्त्री (चकित होकर) आगे बढ़ी और उसने अपना मुँह पीट लिया और कहने लगी, "एक बूढ़ी बाँझ (के यहाँ बच्चा पैदा होगा)!"
قَالُوا كَذٰلِكِۙ قَالَ رَبُّكِۜ اِنَّهُ هُوَ الْحَك۪يمُ الْعَل۪يمُ30
उन्होंने कहा, "ऐसी ही तेरे रब ने कहा है। निश्चय ही वह बड़ा तत्वदर्शी, ज्ञानवान है।"