28. जुज़ - कुरान पढ़ें

28. जुज़
58 · अल-मुजादिला
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
قَدْ سَمِعَ اللّٰهُ قَوْلَ الَّت۪ي تُجَادِلُكَ فِي زَوْجِهَا وَتَشْتَك۪ٓي اِلَى اللّٰهِۗ وَاللّٰهُ يَسْمَعُ تَحَاوُرَكُمَاۜ اِنَّ اللّٰهَ سَم۪يعٌ بَص۪يرٌ1
अल्लाह ने उस स्त्री की बात सुन ली जो अपने पति के विषय में तुमसे झगड़ रही है और अल्लाह से शिकायत किए जाती है। अल्लाह तुम दोनों की बातचीत सुन रहा है। निश्चय ही अल्लाह सब कुछ सुननेवाला, देखनेवाला है
اَلَّذ۪ينَ يُظَاهِرُونَ مِنْكُمْ مِنْ نِسَٓائِهِمْ مَا هُنَّ اُمَّهَاتِهِمْۜ اِنْ اُمَّهَاتُهُمْ اِلَّا الّٰٓـ۪ٔي وَلَدْنَهُمْۜ وَاِنَّهُمْ لَيَقُولُونَ مُنْكَرًا مِنَ الْقَوْلِ وَزُورًاۜ وَاِنَّ اللّٰهَ لَعَفُوٌّ غَفُورٌ2
तुममें से जो लोग अपनी स्त्रियों से ज़िहार करते हैं, उनकी माएँ वे नहीं है, उनकी माएँ तो वही है जिन्होंने उनको जन्म दिया है। यह अवश्य है कि वे लोग एक अनुचित बात और झूठ कहते है। और निश्चय ही अल्लाह टाल जानेवाला अत्यन्त क्षमाशील है
وَالَّذ۪ينَ يُظَاهِرُونَ مِنْ نِسَٓائِهِمْ ثُمَّ يَعُودُونَ لِمَا قَالُوا فَتَحْر۪يرُ رَقَبَةٍ مِنْ قَبْلِ اَنْ يَتَمَٓاسَّاۜ ذٰلِكُمْ تُوعَظُونَ بِه۪ۜ وَاللّٰهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَب۪يرٌ3
जो लोग अपनी स्त्रियों से ज़िहार करते हैं; फिर जो बात उन्होंने कही थी उससे रुजू करते है, तो इससे पहले कि दोनों एक-दूसरे को हाथ लगाएँ एक गर्दन आज़ाद करनी होगी। यह वह बात है जिसकी तुम्हें नसीहत की जाती है, और तुम जो कुछ करते हो अल्लाह उसकी ख़बर रखता है
فَمَنْ لَمْ يَجِدْ فَصِيَامُ شَهْرَيْنِ مُتَتَابِعَيْنِ مِنْ قَبْلِ اَنْ يَتَمَٓاسَّاۚ فَمَنْ لَمْ يَسْتَطِعْ فَاِطْعَامُ سِتّ۪ينَ مِسْك۪ينًاۜ ذٰلِكَ لِتُؤْمِنُوا بِاللّٰهِ وَرَسُولِه۪ۜ وَتِلْكَ حُدُودُ اللّٰهِۜ وَلِلْكَافِر۪ينَ عَذَابٌ اَل۪يمٌ4
किन्तु जिस किसी को ग़ुलाम प्राप्त न हो तो वह निरन्तर दो माह रोज़े रखे, इससे पहले कि वे दोनों एक-दूसरे को हाथ लगाएँ और जिस किसी को इसकी भी सामर्थ्य न हो तो साठ मुहताजों को भोजन कराना होगा। यह इसलिए कि तुम अल्लाह और उसके रसूल पर ईमानवाले सिद्ध हो सको। ये अल्लाह की निर्धारित की हुई सीमाएँ है। और इनकार करनेवाले के लिए दुखद यातना है
اِنَّ الَّذ۪ينَ يُحَٓادُّونَ اللّٰهَ وَرَسُولَهُ كُبِتُوا كَمَا كُبِتَ الَّذ۪ينَ مِنْ قَبْلِهِمْ وَقَدْ اَنْزَلْنَٓا اٰيَاتٍ بَيِّنَاتٍۜ وَلِلْكَافِر۪ينَ عَذَابٌ مُه۪ينٌۚ5
जो लोग अल्लाह और उसके रसूल का विरोध करते हैं, वे अपमानित और तिरस्कृत होकर रहेंगे, जैसे उनसे पहले के लोग अपमानित और तिरस्कृत हो चुके है। हमने स्पष्ट आयतें अवतरित कर दी है और इनकार करनेवालों के लिए अपमानजनक यातना है
يَوْمَ يَبْعَثُهُمُ اللّٰهُ جَم۪يعًا فَيُنَبِّئُهُمْ بِمَا عَمِلُواۜ اَحْصٰيهُ اللّٰهُ وَنَسُوهُۜ وَاللّٰهُ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ شَه۪يدٌ۟6
जिस दिन अल्लाह उन सबको उठा खड़ा करेगा और जो कुछ उन्होंने किया होगा, उससे उन्हें अवगत करा देगा। अल्लाह ने उसकी गणना कर रखी है, और वे उसे भूले हुए है, और अल्लाह हर चीज़ का साक्षी है
اَلَمْ تَرَ اَنَّ اللّٰهَ يَعْلَمُ مَا فِي السَّمٰوَاتِ وَمَا فِي الْاَرْضِۜ مَا يَكُونُ مِنْ نَجْوٰى ثَلٰثَةٍ اِلَّا هُوَ رَابِعُهُمْ وَلَا خَمْسَةٍ اِلَّا هُوَ سَادِسُهُمْ وَلَٓا اَدْنٰى مِنْ ذٰلِكَ وَلَٓا اَكْثَرَ اِلَّا هُوَ مَعَهُمْ اَيْنَ مَا كَانُواۚ ثُمَّ يُنَبِّئُهُمْ بِمَا عَمِلُوا يَوْمَ الْقِيٰمَةِۜ اِنَّ اللّٰهَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَل۪يمٌ7
क्या तुमने इसको नहीं देखा कि अल्लाह जानता है जो कुछ आकाशों में है और जो कुछ धरती में है। कभी ऐसा नहीं होता कि तीन आदमियों की गुप्त वार्ता हो और उनके बीच चौथा वह (अल्लाह) न हो। और न पाँच आदमियों की होती है जिसमें छठा वह न होता हो। और न इससे कम की कोई होती है और न इससे अधिक की भी, किन्तु वह उनके साथ होता है, जहाँ कहीं भी वे हो; फिर जो कुछ भी उन्होंने किया होगा क़ियामत के दिन उससे वह उन्हें अवगत करा देगा। निश्चय ही अल्लाह को हर चीज़ का ज्ञान है
اَلَمْ تَرَ اِلَى الَّذ۪ينَ نُهُوا عَنِ النَّجْوٰى ثُمَّ يَعُودُونَ لِمَا نُهُوا عَنْهُ وَيَتَنَاجَوْنَ بِالْاِثْمِ وَالْعُدْوَانِ وَمَعْصِيَتِ الرَّسُولِۘ وَاِذَا جَٓاؤُ۫كَ حَيَّوْكَ بِمَا لَمْ يُحَيِّكَ بِهِ اللّٰهُۙ وَيَقُولُونَ ف۪ٓي اَنْفُسِهِمْ لَوْلَا يُعَذِّبُنَا اللّٰهُ بِمَا نَقُولُۜ حَسْبُهُمْ جَهَنَّمُۚ يَصْلَوْنَهَاۚ فَبِئْسَ الْمَص۪يرُ8
क्या तुमने नहीं देखा जिन्हें कानाफूसी से रोका गया था, फिर वे वही करते रहे जिससे उन्हें रोका गया था। वे आपस में गुनाह और ज़्यादती और रसूल की अवज्ञा की कानाफूसी करते है। और जब तुम्हारे पास आते है तो तुम्हारे प्रति अभिवादन के ऐसे शब्द प्रयोग में लाते है जो शब्द अल्लाह ने तुम्हारे लिए अभिवादन के लिए नहीं कहे। और अपने जी में कहते है, "जो कुछ हम कहते है उसपर अल्लाह हमें यातना क्यों नहीं देता?" उनके लिए जहन्नम ही काफ़ी है जिसमें वे प्रविष्ट होंगे। वह तो बहुत बुरी जगह है, अन्त नें पहुँचने की!
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اِذَا تَنَاجَيْتُمْ فَلَا تَتَنَاجَوْا بِالْاِثْمِ وَالْعُدْوَانِ وَمَعْصِيَتِ الرَّسُولِ وَتَنَاجَوْا بِالْبِرِّ وَالتَّقْوٰىۜ وَاتَّقُوا اللّٰهَ الَّذ۪ٓي اِلَيْهِ تُحْشَرُونَ9
ऐ ईमान लानेवालो! जब तुम आपस में गुप्त॥ वार्ता करो तो गुनाह और ज़्यादती और रसूल की अवज्ञा की गुप्त वार्ता न करो, बल्कि नेकी और परहेज़गारी के विषय में आपस में एकान्त वार्ता करो। और अल्लाह का डर रखो, जिसके पास तुम इकट्ठे होगे
اِنَّمَا النَّجْوٰى مِنَ الشَّيْطَانِ لِيَحْزُنَ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَلَيْسَ بِضَٓارِّهِمْ شَيْـًٔا اِلَّا بِاِذْنِ اللّٰهِۜ وَعَلَى اللّٰهِ فَلْيَتَوَكَّلِ الْمُؤْمِنُونَ10
वह कानाफूसी तो केवल शैतान की ओर से है, ताकि वह उन्हें ग़म में डाले जो ईमान लाए है। हालाँकि अल्लाह की अवज्ञा के बिना उसे कुछ भी हानि पहुँचाने की सामर्थ्य प्राप्त नहीं। और ईमानवालों को तो अल्लाह ही पर भरोसा रखना चाहिए
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اِذَا ق۪يلَ لَكُمْ تَفَسَّحُوا فِي الْمَجَالِسِ فَافْسَحُوا يَفْسَحِ اللّٰهُ لَكُمْۚ وَاِذَا ق۪يلَ انْشُزُوا فَانْشُزُوا يَرْفَعِ اللّٰهُ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا مِنْكُمْۙ وَالَّذ۪ينَ اُو۫تُوا الْعِلْمَ دَرَجَاتٍۜ وَاللّٰهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَب۪يرٌ11
ऐ ईमान लानेवालो! जब तुमसे कहा जाए कि मजलिसों में जगह कुशादा कर दे, तो कुशादगी पैदा कर दो। अल्लाह तुम्हारे लिए कुशादगी पैदा करेगा। और जब कहा जाए कि उठ जाओ, तो उठ जाया करो। तुममें से जो लोग ईमान लाए है और उन्हें ज्ञान प्रदान किया गया है, अल्लाह उनके दरजों को उच्चता प्रदान करेगा। जो कुछ तुम करते हो अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اِذَا نَاجَيْتُمُ الرَّسُولَ فَقَدِّمُوا بَيْنَ يَدَيْ نَجْوٰيكُمْ صَدَقَةًۜ ذٰلِكَ خَيْرٌ لَكُمْ وَاَطْهَرُۜ فَاِنْ لَمْ تَجِدُوا فَاِنَّ اللّٰهَ غَفُورٌ رَح۪يمٌ12
ऐ ईमान लानेवालो! जब तुम रसूल से अकेले में बात करो तो अपनी गुप्त वार्ता से पहले सदक़ा दो। यह तुम्हारे लिए अच्छा और अधिक पवित्र है। फिर यदि तुम अपने को इसमें असमर्थ पाओ, तो निश्चय ही अल्लाह बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
ءَاَشْفَقْتُمْ اَنْ تُقَدِّمُوا بَيْنَ يَدَيْ نَجْوٰيكُمْ صَدَقَاتٍۜ فَاِذْ لَمْ تَفْعَلُوا وَتَابَ اللّٰهُ عَلَيْكُمْ فَاَق۪يمُوا الصَّلٰوةَ وَاٰتُوا الزَّكٰوةَ وَاَط۪يعُوا اللّٰهَ وَرَسُولَهُۜ وَاللّٰهُ خَب۪يرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ۟13
क्या तुम इससे डर गए कि अपनी गुप्त वार्ता से पहले सदक़े दो? जो जब तुमने यह न किया और अल्लाह ने तुम्हें क्षमा कर दिया. तो नमाज़ क़ायम करो, ज़कात देते रहो और अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो। और तुम जो कुछ भी करते हो अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है
اَلَمْ تَرَ اِلَى الَّذ۪ينَ تَوَلَّوْا قَوْمًا غَضِبَ اللّٰهُ عَلَيْهِمْۜ مَا هُمْ مِنْكُمْ وَلَا مِنْهُمْۙ وَيَحْلِفُونَ عَلَى الْكَذِبِ وَهُمْ يَعْلَمُونَ14
क्या तुमने उन लोगों को नहीं देखा जिन्होंने ऐसे लोगों को मित्र बनाया जिनपर अल्लाह का प्रकोप हुआ है? वे न तुममें से है और न उनमें से। और वे जानते-बूझते झूठी बात पर क़सम खाते है
اَعَدَّ اللّٰهُ لَهُمْ عَذَابًا شَد۪يدًاۜ اِنَّهُمْ سَٓاءَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ15
अल्लाह ने उनके लिए कठोर यातना तैयार कर रखी है। निश्चय ही बुरा है जो वे कर रहे है
اِتَّخَذُٓوا اَيْمَانَهُمْ جُنَّةً فَصَدُّوا عَنْ سَب۪يلِ اللّٰهِ فَلَهُمْ عَذَابٌ مُه۪ينٌ16
उन्होंने अपनी क़समों को ढाल बना रखा है। अतः वे अल्लाह के मार्ग से (लोगों को) रोकते है। तो उनके लिए रुसवा करनेवाली यातना है
لَنْ تُغْنِيَ عَنْهُمْ اَمْوَالُهُمْ وَلَٓا اَوْلَادُهُمْ مِنَ اللّٰهِ شَيْـًٔاۜ اُو۬لٰٓئِكَ اَصْحَابُ النَّارِۚ هُمْ ف۪يهَا خَالِدُونَ17
अल्लाह से बचाने के लिए न उनके माल उनके कुछ काम आएँगे और न उनकी सन्तान। वे आगवाले हैं। उसी में वे सदैव रहेंगे
يَوْمَ يَبْعَثُهُمُ اللّٰهُ جَم۪يعًا فَيَحْلِفُونَ لَهُ كَمَا يَحْلِفُونَ لَكُمْ وَيَحْسَبُونَ اَنَّهُمْ عَلٰى شَيْءٍۜ اَلَٓا اِنَّهُمْ هُمُ الْكَاذِبُونَ18
जिस दिन अल्लाह उन सबको उठाएगा तो वे उसके सामने भी इसी तरह क़समें खाएँगे, जिस तरह तुम्हारे सामने क़समें खाते है और समझते हैं कि वे किसी बुनियाद पर है। सावधान रहो, निश्चय ही वही झूठे है!
اِسْتَحْوَذَ عَلَيْهِمُ الشَّيْطَانُ فَاَنْسٰيهُمْ ذِكْرَ اللّٰهِۜ اُو۬لٰٓئِكَ حِزْبُ الشَّيْطَانِۜ اَلَٓا اِنَّ حِزْبَ الشَّيْطَانِ هُمُ الْخَاسِرُونَ19
उनपर शैतान ने पूरी तरह अपना प्रभाव जमा लिया है। अतः उसने अल्लाह की याद को उनसे भुला दिया। वे शैतान की पार्टीवाले हैं। सावधान रहो शैतान की पार्टीवाले ही घाटे में रहनेवाले हैं!
اِنَّ الَّذ۪ينَ يُحَٓادُّونَ اللّٰهَ وَرَسُولَهُٓ اُو۬لٰٓئِكَ فِي الْاَذَلّ۪ينَ20
निश्चय ही जो लोग अल्लाह और उसके रसूल का विरोध करते है वे अत्यन्त अपमानित लोगों में से है
كَتَبَ اللّٰهُ لَاَغْلِبَنَّ اَنَا۬ وَرُسُل۪يۜ اِنَّ اللّٰهَ قَوِيٌّ عَز۪يزٌ21
अल्लाह ने लिए दिया है, "मैं और मेरे रसूल ही विजयी होकर रहेंगे।" निस्संदेह अल्लाह शक्तिमान, प्रभुत्वशाली है
لَا تَجِدُ قَوْمًا يُؤْمِنُونَ بِاللّٰهِ وَالْيَوْمِ الْاٰخِرِ يُوَٓادُّونَ مَنْ حَٓادَّ اللّٰهَ وَرَسُولَهُ وَلَوْ كَانُٓوا اٰبَٓاءَهُمْ اَوْ اَبْنَٓاءَهُمْ اَوْ اِخْوَانَهُمْ اَوْ عَش۪يرَتَهُمْۜ اُو۬لٰٓئِكَ كَتَبَ ف۪ي قُلُوبِهِمُ الْا۪يمَانَ وَاَيَّدَهُمْ بِرُوحٍ مِنْهُۜ وَيُدْخِلُهُمْ جَنَّاتٍ تَجْر۪ي مِنْ تَحْتِهَا الْاَنْهَارُ خَالِد۪ينَ ف۪يهَاۜ رَضِيَ اللّٰهُ عَنْهُمْ وَرَضُوا عَنْهُۜ اُو۬لٰٓئِكَ حِزْبُ اللّٰهِۜ اَلَٓا اِنَّ حِزْبَ اللّٰهِ هُمُ الْمُفْلِحُونَ22
तुम उन लोगों को ऐसा कभी नहीं पाओगे जो अल्लाह और अन्तिम दि पर ईमान रखते है कि वे उन लोगों से प्रेम करते हो जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूल का विरोध किया, यद्यपि वे उनके अपने बाप हों या उनके अपने बेटे हो या उनके अपने भाई या उनके अपने परिवारवाले ही हो। वही लोग हैं जिनके दिलों में अल्लाह ने ईमान को अंकित कर दिया है और अपनी ओर से एक आत्मा के द्वारा उन्हें शक्ति दी है। और उन्हें वह ऐसे बाग़ों में दाख़िल करेगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी; जहाँ वे सदैव रहेंगे। अल्लाह उनसे राज़ी हुआ और वे भी उससे राज़ी हुए। वे अल्लाह की पार्टी के लोग है। सावधान रहो, निश्चय ही अल्लाह की पार्टीवाले ही सफल है
59 · अल-हश्र
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
سَبَّحَ لِلّٰهِ مَا فِي السَّمٰوَاتِ وَمَا فِي الْاَرْضِۚ وَهُوَ الْعَز۪يزُ الْحَك۪يمُ1
अल्लाह की तसबीह की है हर उस चीज़ ने जो आकाशों और धरती में है, और वही प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
هُوَ الَّذ۪ٓي اَخْرَجَ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا مِنْ اَهْلِ الْكِتَابِ مِنْ دِيَارِهِمْ لِاَوَّلِ الْحَشْرِۜ مَا ظَنَنْتُمْ اَنْ يَخْرُجُوا وَظَنُّٓوا اَنَّهُمْ مَانِعَتُهُمْ حُصُونُهُمْ مِنَ اللّٰهِ فَاَتٰيهُمُ اللّٰهُ مِنْ حَيْثُ لَمْ يَحْتَسِبُوا وَقَذَفَ ف۪ي قُلُوبِهِمُ الرُّعْبَ يُخْرِبُونَ بُيُوتَهُمْ بِاَيْد۪يهِمْ وَاَيْدِي الْمُؤْمِن۪ينَ فَاعْتَبِرُوا يَٓا اُو۬لِي الْاَبْصَارِ2
वही है जिसने किताबवालों में से उन लोगों को जिन्होंने इनकार किया, उनके घरों से पहले ही जमावड़े में निकल बाहर किया। तुम्हें गुमान न था कि उनकी गढ़ियाँ अल्लाह से उन्हें बचा लेंगी। किन्तु अल्लाह उनपर वहाँ से आया जिसका उन्हें गुमान भी न था। और उसने उनके दिलों में रोब डाल दिया कि वे अपने घरों को स्वयं अपने हाथों और ईमानवालों के हाथों भी उजाड़ने लगे। अतः शिक्षा ग्रहण करो, ऐ दृष्टि रखनेवालो!
وَلَوْلَٓا اَنْ كَتَبَ اللّٰهُ عَلَيْهِمُ الْجَلَٓاءَ لَعَذَّبَهُمْ فِي الدُّنْيَاۜ وَلَهُمْ فِي الْاٰخِرَةِ عَذَابُ النَّارِ3
यदि अल्लाह ने उनके लिए देश निकाला न लिख दिया होता तो दुनिया में ही वह उन्हें अवश्य यातना दे देता, और आख़िरत में तो उनके लिए आग की यातना है ही
ذٰلِكَ بِاَنَّهُمْ شَٓاقُّوا اللّٰهَ وَرَسُولَهُۚ وَمَنْ يُشَٓاقِّ اللّٰهَ فَاِنَّ اللّٰهَ شَد۪يدُ الْعِقَابِ4
यह इसलिए कि उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल का मुक़ाला करने की कोशिश की। और जो कोई अल्लाह का मुक़ाबला करता है तो निश्चय ही अल्लाह की यातना बहुत कठोर है
مَا قَطَعْتُمْ مِنْ ل۪ينَةٍ اَوْ تَرَكْتُمُوهَا قَٓائِمَةً عَلٰٓى اُصُولِهَا فَبِاِذْنِ اللّٰهِ وَلِيُخْزِيَ الْفَاسِق۪ينَ5
तुमने खजूर के जो वृक्ष काटे या उन्हें उनकी जड़ों पर खड़ा छोड़ दिया तो यह अल्लाह ही की अनुज्ञा से हुआ (ताकि ईमानवालों के लिए आसानी पैदा करे) और इसलिए कि वह अवज्ञाकारियों को रुसवा करे
وَمَٓا اَفَٓاءَ اللّٰهُ عَلٰى رَسُولِه۪ مِنْهُمْ فَمَٓا اَوْجَفْتُمْ عَلَيْهِ مِنْ خَيْلٍ وَلَا رِكَابٍ وَلٰكِنَّ اللّٰهَ يُسَلِّطُ رُسُلَهُ عَلٰى مَنْ يَشَٓاءُۜ وَاللّٰهُ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَد۪يرٌ6
और अल्लाह ने उनसे लेकर अपने रसूल की ओर जो कुछ पलटाया, उसके लिए न तो तुमने घोड़े दौड़ाए और न ऊँट। किन्तु अल्लाह अपने रसूलों को जिसपर चाहता है प्रभुत्व प्रदान कर देता है। अल्लाह को तो हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्ति है
مَٓا اَفَٓاءَ اللّٰهُ عَلٰى رَسُولِه۪ مِنْ اَهْلِ الْقُرٰى فَلِلّٰهِ وَلِلرَّسُولِ وَلِذِي الْقُرْبٰى وَالْيَتَامٰى وَالْمَسَاك۪ينِ وَابْنِ السَّب۪يلِۙ كَيْ لَا يَكُونَ دُولَةً بَيْنَ الْاَغْنِيَٓاءِ مِنْكُمْۜ وَمَٓا اٰتٰيكُمُ الرَّسُولُ فَخُذُوهُ وَمَا نَهٰيكُمْ عَنْهُ فَانْتَهُواۚ وَاتَّقُوا اللّٰهَۜ اِنَّ اللّٰهَ شَد۪يدُ الْعِقَابِۢ7
जो कुछ अल्लाह ने अपने रसूल की ओर बस्तियोंवालों से लेकर पलटाया वह अल्लाह और रसूल और (मुहताज) नातेदार और अनाथों और मुहताजों और मुसाफ़िर के लिए है, ताकि वह (माल) तुम्हारे मालदारों ही के बीच चक्कर न लगाता रहे - रसूल जो कुछ तुम्हें दे उसे ले लो और जिस चीज़ से तुम्हें रोक दे उससे रुक जाओ, और अल्लाह का डर रखो। निश्चय ही अल्लाह की यातना बहुत कठोर है। -
لِلْفُقَرَٓاءِ الْمُهَاجِر۪ينَ الَّذ۪ينَ اُخْرِجُوا مِنْ دِيَارِهِمْ وَاَمْوَالِهِمْ يَبْتَغُونَ فَضْلًا مِنَ اللّٰهِ وَرِضْوَانًا وَيَنْصُرُونَ اللّٰهَ وَرَسُولَهُۜ اُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الصَّادِقُونَۚ8
वह ग़रीब मुहाजिरों के लिए है, जो अपने घरों और अपने मालों से इस हालत में निकाल बाहर किए गए है कि वे अल्लाह का उदार अनुग्रह और उसकी प्रसन्नता की तलाश में है और अल्लाह और उसके रसूल की सहायता कर रहे है, और वही वास्तव में सच्चे है
وَالَّذ۪ينَ تَبَوَّؤُ الدَّارَ وَالْا۪يمَانَ مِنْ قَبْلِهِمْ يُحِبُّونَ مَنْ هَاجَرَ اِلَيْهِمْ وَلَا يَجِدُونَ ف۪ي صُدُورِهِمْ حَاجَةً مِمَّٓا اُو۫تُوا وَيُؤْثِرُونَ عَلٰٓى اَنْفُسِهِمْ وَلَوْ كَانَ بِهِمْ خَصَاصَةٌۜ وَمَنْ يُوقَ شُحَّ نَفْسِه۪ فَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَۚ9
और उनके लिए जो उनसे पहले ही से हिजरत के घर (मदीना) में ठिकाना बनाए हुए है और ईमान पर जमे हुए है, वे उनसे प्रेम करते है जो हिजरत करके उनके यहाँ आए है और जो कुछ भी उन्हें दिया गया उससे वे अपने सीनों में कोई खटक नहीं पाते और वे उन्हें अपने मुक़ाबले में प्राथमिकता देते है, यद्यपि अपनी जगह वे स्वयं मुहताज ही हों। और जो अपने मन के लोभ और कृपणता से बचा लिया जाए ऐसे लोग ही सफल है
وَالَّذ۪ينَ جَٓاؤُ۫ مِنْ بَعْدِهِمْ يَقُولُونَ رَبَّنَا اغْفِرْ لَنَا وَلِاِخْوَانِنَا الَّذ۪ينَ سَبَقُونَا بِالْا۪يمَانِ وَلَا تَجْعَلْ ف۪ي قُلُوبِنَا غِلًّا لِلَّذ۪ينَ اٰمَنُوا رَبَّنَٓا اِنَّكَ رَؤُ۫فٌ رَح۪يمٌ۟10
और (इस माल में उनका भी हिस्सा है) जो उनके बाद आए, वे कहते है, "ऐ हमारे रब! हमें क्षमा कर दे और हमारे उन भाइयों को भी जो ईमानलाने में हमसे अग्रसर रहे और हमारे दिलों में ईमानवालों के लिए कोई विद्वेष न रख। ऐ हमारे रब! तू निश्चय ही बड़ा करुणामय, अत्यन्त दयावान है।"
اَلَمْ تَرَ اِلَى الَّذ۪ينَ نَافَقُوا يَقُولُونَ لِاِخْوَانِهِمُ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا مِنْ اَهْلِ الْكِتَابِ لَئِنْ اُخْرِجْتُمْ لَنَخْرُجَنَّ مَعَكُمْ وَلَا نُط۪يعُ ف۪يكُمْ اَحَدًا اَبَدًاۙ وَاِنْ قُوتِلْتُمْ لَنَنْصُرَنَّكُمْۜ وَاللّٰهُ يَشْهَدُ اِنَّهُمْ لَكَاذِبُونَ11
क्या तुमने उन लोगों को नहीं देखा जिन्होंने कपटाचार की नीति अपनाई हैं, वे अपने किताबवाले उन भाइयों से, जो इनकार की नीति अपनाए हुए है, कहते है, "यदि तुम्हें निकाला गया तो हम भी अवश्य ही तुम्हारे साथ निकल जाएँगे और तुम्हारे मामले में किसी की बात कभी भी नहीं मानेंगे। और यदि तुमसे युद्ध किया गया तो हम अवश्य तुम्हारी सहायता करेंगे।" किन्तु अल्लाह गवाही देता है कि वे बिलकुल झूठे है
لَئِنْ اُخْرِجُوا لَا يَخْرُجُونَ مَعَهُمْۚ وَلَئِنْ قُوتِلُوا لَا يَنْصُرُونَهُمْۚ وَلَئِنْ نَصَرُوهُمْ لَيُوَلُّنَّ الْاَدْبَارَ۠ ثُمَّ لَا يُنْصَرُونَ12
यदि वे निकाले गए तो वे उनके साथ नहीं निकलेंगे और यदि उनसे युद्ध हुआ तो वे उनकी सहायता कदापि न करेंगे और यदि उनकी सहायता करें भी तो पीठ फेंर जाएँगे। फिर उन्हें कोई सहायता प्राप्त न होगी
لَاَنْتُمْ اَشَدُّ رَهْبَةً ف۪ي صُدُورِهِمْ مِنَ اللّٰهِۜ ذٰلِكَ بِاَنَّهُمْ قَوْمٌ لَا يَفْقَهُونَ13
उनके दिलों में अल्लाह से बढ़कर तुम्हारा भय समाया हुआ है। यह इसलिए कि वे ऐसे लोग है जो समझते नहीं
لَا يُقَاتِلُونَكُمْ جَم۪يعًا اِلَّا ف۪ي قُرًى مُحَصَّنَةٍ اَوْ مِنْ وَرَٓاءِ جُدُرٍۜ بَاْسُهُمْ بَيْنَهُمْ شَد۪يدٌۜ تَحْسَبُهُمْ جَم۪يعًا وَقُلُوبُهُمْ شَتّٰىۜ ذٰلِكَ بِاَنَّهُمْ قَوْمٌ لَا يَعْقِلُونَۚ14
वे इकट्ठे होकर भी तुमसे (खुले मैदान में) नहीं लड़ेगे, क़िलाबन्द बस्तियों या दीवारों के पीछ हों तो यह और बात है। उनकी आपस में सख़्त लड़ाई है। तुम उन्हें इकट्ठा समझते हो! हालाँकि उनके दिल फटे हुए है। यह इसलिए कि वे ऐसे लोग है जो बुद्धि से काम नहीं लेते
كَمَثَلِ الَّذ۪ينَ مِنْ قَبْلِهِمْ قَر۪يبًا ذَاقُوا وَبَالَ اَمْرِهِمْۚ وَلَهُمْ عَذَابٌ اَل۪يمٌۚ15
उनकी हालत उन्हीं लोगों जैसी है जो उनसे पहले निकट काल में अपने किए के वबाल का मज़ा चख चुके है, और उनके लिए दुखद यातना भी है
كَمَثَلِ الشَّيْطَانِ اِذْ قَالَ لِلْاِنْسَانِ اكْفُرْۚ فَلَمَّا كَفَرَ قَالَ اِنّ۪ي بَر۪ٓيءٌ مِنْكَ اِنّ۪ٓي اَخَافُ اللّٰهَ رَبَّ الْعَالَم۪ينَ16
इनकी मिसाल शैतान जैसी है कि जब उसने मनुष्य से कहा, "क़ुफ़्र कर!" फिर जब वह कुफ़्र कर बैठा तो कहने लगा, "मैं तुम्हारी ज़िम्मेदारी से बरी हूँ। मैं तो सारे संसार के रब अल्लाह से डरता हूँ।"
فَكَانَ عَاقِبَتَهُمَٓا اَنَّهُمَا فِي النَّارِ خَالِدَيْنِ ف۪يهَاۜ وَذٰلِكَ جَزٰٓؤُا الظَّالِم۪ينَ۟17
फिर उन दोनों का परिणाम यह हुआ कि दोनों आग में गए, जहाँ सदैव रहेंगे। और ज़ालिमों का यही बदला है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا اتَّقُوا اللّٰهَ وَلْتَنْظُرْ نَفْسٌ مَا قَدَّمَتْ لِغَدٍۚ وَاتَّقُوا اللّٰهَۜ اِنَّ اللّٰهَ خَب۪يرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ18
ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह का डर रखो। और प्रत्येक व्यक्ति को यह देखना चाहिए कि उसने कल के लिए क्या भेजा है। और अल्लाह का डर रखो। जो कुछ भी तुम करते हो निश्चय ही अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है
وَلَا تَكُونُوا كَالَّذ۪ينَ نَسُوا اللّٰهَ فَاَنْسٰيهُمْ اَنْفُسَهُمْۜ اُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْفَاسِقُونَ19
और उन लोगों की तरह न हो जाना जिन्होंने अल्लाह को भुला दिया। तो उसने भी ऐसा किया कि वे स्वयं अपने आपको भूल बैठे। वही अवज्ञाकारी है
لَا يَسْتَو۪ٓي اَصْحَابُ النَّارِ وَاَصْحَابُ الْجَنَّةِۜ اَصْحَابُ الْجَنَّةِ هُمُ الْفَٓائِزُونَ20
आगवाले और बाग़वाले (जहन्नमवाले और जन्नतवाले) कभी समान नहीं हो सकते। बाग़वाले ही सफ़ल है
لَوْ اَنْزَلْنَا هٰذَا الْقُرْاٰنَ عَلٰى جَبَلٍ لَرَاَيْتَهُ خَاشِعًا مُتَصَدِّعًا مِنْ خَشْيَةِ اللّٰهِۜ وَتِلْكَ الْاَمْثَالُ نَضْرِبُهَا لِلنَّاسِ لَعَلَّهُمْ يَتَفَكَّرُونَ21
यदि हमने इस क़ुरआन को किसी पर्वत पर भी उतार दिया होता तो तुम अवश्य देखते कि अल्लाह के भय से वह दबा हुआ और फटा जाता है। ये मिशालें लोगों के लिए हम इसलिए पेश करते है कि वे सोच-विचार करें
هُوَ اللّٰهُ الَّذ۪ي لَٓا اِلٰهَ اِلَّا هُوَۚ عَالِمُ الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِۚ هُوَ الرَّحْمٰنُ الرَّح۪يمُ22
वही अल्लाह है जिसके सिवा कोई पूज्य-प्रभु नहीं, परोक्ष और प्रत्यक्ष को जानता है। वह बड़ा कृपाशील, अत्यन्त दयावान है
هُوَ اللّٰهُ الَّذ۪ي لَٓا اِلٰهَ اِلَّا هُوَۚ اَلْمَلِكُ الْقُدُّوسُ السَّلَامُ الْمُؤْمِنُ الْمُهَيْمِنُ الْعَز۪يزُ الْجَبَّارُ الْمُتَكَبِّرُۜ سُبْحَانَ اللّٰهِ عَمَّا يُشْرِكُونَ23
वही अल्लाह है जिसके सिवा कोई पूज्य नहीं। बादशाह है अत्यन्त पवित्र, सर्वथा सलामती, निश्चिन्तता प्रदान करनेवाला, संरक्षक, प्रभुत्वशाली, प्रभावशाली (टुटे हुए को जोड़नेवाला), अपनी बड़ाई प्रकट करनेवाला। महान और उच्च है अल्लाह उस शिर्क से जो वे करते है
هُوَ اللّٰهُ الْخَالِقُ الْبَارِئُ الْمُصَوِّرُ لَهُ الْاَسْمَٓاءُ الْحُسْنٰىۜ يُسَبِّحُ لَهُ مَا فِي السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۚ وَهُوَ الْعَز۪يزُ الْحَك۪يمُ24
वही अल्लाह है जो संरचना का प्रारूपक है, अस्तित्व प्रदान करनेवाला, रूप देनेवाला है। उसी के लिए अच्छे नाम है। जो चीज़ भी आकाशों और धरती में है, उसी की तसबीह कर रही है। और वह प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
60 · अल-मुमतहिना
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لَا تَتَّخِذُوا عَدُوّ۪ي وَعَدُوَّكُمْ اَوْلِيَٓاءَ تُلْقُونَ اِلَيْهِمْ بِالْمَوَدَّةِ وَقَدْ كَفَرُوا بِمَا جَٓاءَكُمْ مِنَ الْحَقِّۚ يُخْرِجُونَ الرَّسُولَ وَاِيَّاكُمْ اَنْ تُؤْمِنُوا بِاللّٰهِ رَبِّكُمْۜ اِنْ كُنْتُمْ خَرَجْتُمْ جِهَادًا ف۪ي سَب۪يل۪ي وَابْتِغَٓاءَ مَرْضَات۪ي تُسِرُّونَ اِلَيْهِمْ بِالْمَوَدَّةِۗ وَاَنَا۬ اَعْلَمُ بِمَٓا اَخْفَيْتُمْ وَمَٓا اَعْلَنْتُمْۜ وَمَنْ يَفْعَلْهُ مِنْكُمْ فَقَدْ ضَلَّ سَوَٓاءَ السَّب۪يلِ1
ऐ ईमान लानेवालो! यदि तुम मेरे मार्ग में जिहाद के लिए और मेरी प्रसन्नता की तलाश में निकले हो तो मेरे शत्रुओं और अपने शत्रुओं को मित्र न बनाओ कि उनके प्रति प्रेम दिखाओं, जबकि तुम्हारे पास जो सत्य आया है उसका वे इनकार कर चुके है। वे रसूल को और तुम्हें इसलिए निर्वासित करते है कि तुम अपने रब - अल्लाह पर ईमान लाए हो। तुम गुप्त रूप से उनसे मित्रता की बातें करते हो। हालाँकि मैं भली-भाँति जानता हूँ जो कुछ तुम छिपाते हो और व्यक्त करते हो। और जो कोई भी तुममें से भटक गया
اِنْ يَثْقَفُوكُمْ يَكُونُوا لَكُمْ اَعْدَٓاءً وَيَبْسُطُٓوا اِلَيْكُمْ اَيْدِيَهُمْ وَاَلْسِنَتَهُمْ بِالسُّٓوءِ وَوَدُّوا لَوْ تَكْفُرُونَۜ2
यदि वे तुम्हें पा जाएँ तो तुम्हारे शत्रु हो जाएँ और कष्ट पहुँचाने के लिए तुमपर हाथ और ज़बान चलाएँ। वे तो चाहते है कि काश! तुम भी इनकार करनेवाले हो जाओ
لَنْ تَنْفَعَكُمْ اَرْحَامُكُمْ وَلَٓا اَوْلَادُكُمْۚۛ يَوْمَ الْقِيٰمَةِۚۛ يَفْصِلُ بَيْنَكُمْۜ وَاللّٰهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَص۪يرٌ3
क़ियामत के दिन तुम्हारी नातेदारियाँ कदापि तुम्हें लाभ न पहुँचाएँगी और न तुम्हारी सन्तान ही। उस दिन वह (अल्लाह) तुम्हारे बीच जुदाई डाल देगा। जो कुछ भी तुम करते हो अल्लाह उसे देख रहा होता है
قَدْ كَانَتْ لَكُمْ اُسْوَةٌ حَسَنَةٌ ف۪ٓي اِبْرٰه۪يمَ وَالَّذ۪ينَ مَعَهُۚ اِذْ قَالُوا لِقَوْمِهِمْ اِنَّا بُرَءٰٓؤُ۬ا مِنْكُمْ وَمِمَّا تَعْبُدُونَ مِنْ دُونِ اللّٰهِۘ كَفَرْنَا بِكُمْ وَبَدَا بَيْنَنَا وَبَيْنَكُمُ الْعَدَاوَةُ وَالْبَغْضَٓاءُ اَبَدًا حَتّٰى تُؤْمِنُوا بِاللّٰهِ وَحْدَهُٓ اِلَّا قَوْلَ اِبْرٰه۪يمَ لِاَب۪يهِ لَاَسْتَغْفِرَنَّ لَكَ وَمَٓا اَمْلِكُ لَكَ مِنَ اللّٰهِ مِنْ شَيْءٍۜ رَبَّنَا عَلَيْكَ تَوَكَّلْنَا وَاِلَيْكَ اَنَبْنَا وَاِلَيْكَ الْمَص۪يرُ4
तुम लोगों के लिए इबराहीम में और उन लोगों में जो उसके साथ थे अच्छा आदर्श है, जबकि उन्होंने अपनी क़ौम के लोगों से कह दिया कि "हम तुमसे और अल्लाह से हटकर जिन्हें तुम पूजते हो उनसे विरक्त है। हमने तुम्हारा इनकार किया और हमारे और तुम्हारे बीच सदैव के लिए वैर और विद्वेष प्रकट हो चुका जब तक अकेले अल्लाह पर तुम ईमान न लाओ।" इूबराहीम का अपने बाप से यह कहना अपवाद है कि "मैं आपके लिए क्षमा की प्रार्थना अवश्य करूँगा, यद्यपि अल्लाह के मुक़ाबले में आपके लिए मैं किसी चीज़ पर अधिकार नहीं रखता।" "ऐ हमारे रब! हमने तुझी पर भरोसा किया और तेरी ही ओर रुजू हुए और तेरी ही ओर अन्त में लौटना हैं। -
رَبَّنَا لَا تَجْعَلْنَا فِتْنَةً لِلَّذ۪ينَ كَفَرُوا وَاغْفِرْ لَنَا رَبَّنَاۚ اِنَّكَ اَنْتَ الْعَز۪يزُ الْحَك۪يمُ5
"ऐ हमारे रब! हमें इनकार करनेवालों के लिए फ़ितना न बना और ऐ हमारे रब! हमें क्षमा कर दे। निश्चय ही तू प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है।"
لَقَدْ كَانَ لَكُمْ ف۪يهِمْ اُسْوَةٌ حَسَنَةٌ لِمَنْ كَانَ يَرْجُوا اللّٰهَ وَالْيَوْمَ الْاٰخِرَۜ وَمَنْ يَتَوَلَّ فَاِنَّ اللّٰهَ هُوَ الْغَنِيُّ الْحَم۪يدُ۟6
निश्चय ही तुम्हारे लिए उनमें अच्छा आदर्श है और हर उस व्यक्ति के लिए जो अल्लाह और अंतिम दिन की आशा रखता हो। और जो कोई मुँह फेरे तो अल्लाह तो निस्पृह, अपने आप में स्वयं प्रशंसित है
عَسَى اللّٰهُ اَنْ يَجْعَلَ بَيْنَكُمْ وَبَيْنَ الَّذ۪ينَ عَادَيْتُمْ مِنْهُمْ مَوَدَّةًۜ وَاللّٰهُ قَد۪يرٌۜ وَاللّٰهُ غَفُورٌ رَح۪يمٌ7
आशा है कि अल्लाह तुम्हारे और उनके बीच, जिनके बीच, जिनसे तुमने शत्रुता मोल ली है, प्रेम-भाव उत्पन्न कर दे। अल्लाह बड़ी सामर्थ्य रखता है और अल्लाह बहुत क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
لَا يَنْهٰيكُمُ اللّٰهُ عَنِ الَّذ۪ينَ لَمْ يُقَاتِلُوكُمْ فِي الدّ۪ينِ وَلَمْ يُخْرِجُوكُمْ مِنْ دِيَارِكُمْ اَنْ تَبَرُّوهُمْ وَتُقْسِطُٓوا اِلَيْهِمْۜ اِنَّ اللّٰهَ يُحِبُّ الْمُقْسِط۪ينَ8
अल्लाह तुम्हें इससे नहीं रोकता कि तुम उन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध नहीं किया और न तुम्हें तुम्हारे अपने घरों से निकाला। निस्संदेह अल्लाह न्याय करनेवालों को पसन्द करता है
اِنَّمَا يَنْهٰيكُمُ اللّٰهُ عَنِ الَّذ۪ينَ قَاتَلُوكُمْ فِي الدّ۪ينِ وَاَخْرَجُوكُمْ مِنْ دِيَارِكُمْ وَظَاهَرُوا عَلٰٓى اِخْرَاجِكُمْ اَنْ تَوَلَّوْهُمْۚ وَمَنْ يَتَوَلَّهُمْ فَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ9
अल्लाह तो तुम्हें केवल उन लोगों से मित्रता करने से रोकता है जिन्होंने धर्म के मामले में तुमसे युद्ध किया और तुम्हें तुम्हारे अपने घरों से निकाला और तुम्हारे निकाले जाने के सम्बन्ध में सहायता की। जो लोग उनसे मित्रता करें वही ज़ालिम है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اِذَا جَٓاءَكُمُ الْمُؤْمِنَاتُ مُهَاجِرَاتٍ فَامْتَحِنُوهُنَّۜ اَللّٰهُ اَعْلَمُ بِا۪يمَانِهِنَّۚ فَاِنْ عَلِمْتُمُوهُنَّ مُؤْمِنَاتٍ فَلَا تَرْجِعُوهُنَّ اِلَى الْكُفَّارِۜ لَا هُنَّ حِلٌّ لَهُمْ وَلَا هُمْ يَحِلُّونَ لَهُنَّۜ وَاٰتُوهُمْ مَٓا اَنْفَقُواۜ وَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ اَنْ تَنْكِحُوهُنَّ اِذَٓا اٰتَيْتُمُوهُنَّ اُجُورَهُنَّۜ وَلَا تُمْسِكُوا بِعِصَمِ الْكَوَافِرِ وَسْـَٔلُوا مَٓا اَنْفَقْتُمْ وَلْيَسْـَٔلُوا مَٓا اَنْفَقُواۜ ذٰلِكُمْ حُكْمُ اللّٰهِۜ يَحْكُمُ بَيْنَكُمْۜ وَاللّٰهُ عَل۪يمٌ حَك۪يمٌ10
ऐ ईमान लानेवालो! जब तुम्हारे पास ईमान की दावेदार स्त्रियाँ हिजरत करके आएँ तो तुम उन्हें जाँच लिया करो। यूँ तो अल्लाह उनके ईमान से भली-भाँति परिचित है। फिर यदि वे तुम्हें ईमानवाली मालूम हो, तो उन्हें इनकार करनेवालों (अधर्मियों) की ओर न लौटाओ। न तो वे स्त्रियाँ उनके लिए वैद्य है और न वे उन स्त्रियों के लिए वैद्य है। और जो कुछ उन्होंने ख़र्च किया हो तुम उन्हें दे दो और इसमें तुम्हारे लिए कोई गुनाह नहीं कि तुम उनसे विवाह कर लो, जबकि तुम उन्हें महर अदा कर दो। और तुम स्वयं भी इनकार करनेवाली स्त्रियों के सतीत्व को अपने अधिकार में न रखो। और जो कुछ तुमने ख़र्च किया हो माँग लो। और उन्हें भी चाहिए कि जो कुछ उन्होंने ख़र्च किया हो माँग ले। यह अल्लाह का आदेश है। वह तुम्हारे बीच फ़ैसला करता है। अल्लाह सर्वज्ञ, तत्वदर्शी है
وَاِنْ فَاتَكُمْ شَيْءٌ مِنْ اَزْوَاجِكُمْ اِلَى الْكُفَّارِ فَعَاقَبْتُمْ فَاٰتُوا الَّذ۪ينَ ذَهَبَتْ اَزْوَاجُهُمْ مِثْلَ مَٓا اَنْفَقُواۜ وَاتَّقُوا اللّٰهَ الَّذ۪ٓي اَنْتُمْ بِه۪ مُؤْمِنُونَ11
और यदि तुम्हारी पत्नि यो (के मह्रों) में से कुछ तुम्हारे हाथ से निकल जाए और इनकार करनेवालों (अधर्मियों) की ओर रह जाए, फिर तुम्हारी नौबत आए, जो जिन लोगों की पत्नियों चली गई है, उन्हें जितना उन्होंने ख़र्च किया हो दे दो। और अल्लाह का डर रखो, जिसपर तुम ईमान रखते हो
يَٓا اَيُّهَا النَّبِيُّ اِذَا جَٓاءَكَ الْمُؤْمِنَاتُ يُبَايِعْنَكَ عَلٰٓى اَنْ لَا يُشْرِكْنَ بِاللّٰهِ شَيْـًٔا وَلَا يَسْرِقْنَ وَلَا يَزْن۪ينَ وَلَا يَقْتُلْنَ اَوْلَادَهُنَّ وَلَا يَاْت۪ينَ بِبُهْتَانٍ يَفْتَر۪ينَهُ بَيْنَ اَيْد۪يهِنَّ وَاَرْجُلِهِنَّ وَلَا يَعْص۪ينَكَ ف۪ي مَعْرُوفٍ فَبَايِعْهُنَّ وَاسْتَغْفِرْ لَهُنَّ اللّٰهَۜ اِنَّ اللّٰهَ غَفُورٌ رَح۪يمٌ12
ऐ नबी! जब तुम्हारे पास ईमानवाली स्त्रियाँ आकर तुमसे इसपर 'बैअत' करे कि वे अल्लाह के साथ किसी चीज़ को साझी नहीं ठहराएँगी और न चोरी करेंगी और न व्यभिचार करेंगी, और न अपनी औलाद की हत्या करेंगी और न अपने हाथों और पैरों को बीच कोई आरोप घड़कर लाएँगी. और न किसी भले काम में तुम्हारी अवज्ञा करेंगी, तो उनसे 'बैअत' ले लो और उनके लिए अल्लाह से क्षमा की प्रार्थना करो। निश्चय ही अत्यन्त बहुत क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لَا تَتَوَلَّوْا قَوْمًا غَضِبَ اللّٰهُ عَلَيْهِمْ قَدْ يَئِسُوا مِنَ الْاٰخِرَةِ كَمَا يَئِسَ الْكُفَّارُ مِنْ اَصْحَابِ الْقُبُورِ13
ऐ ईमान लानेवालो! ऐसे लोगों से मित्रता न करो जिनपर अल्लाह का प्रकोप हुआ, वे आख़िरत से निराश हो चुके है, जिस प्रकार इनकार करनेवाले क़ब्रवालों से निराश हो चुके है
61 · अस-सफ्फ़
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
سَبَّحَ لِلّٰهِ مَا فِي السَّمٰوَاتِ وَمَا فِي الْاَرْضِۚ وَهُوَ الْعَز۪يزُ الْحَك۪يمُ1
अल्लाह की तसबीह की हर उस चीज़ ने जो आकाशों और धरती में है। वही प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لِمَ تَقُولُونَ مَا لَا تَفْعَلُونَ2
ऐ ईमान लानेवालो! तुम वह बात क्यों कहते हो जो करते नहीं?
كَبُرَ مَقْتًا عِنْدَ اللّٰهِ اَنْ تَقُولُوا مَا لَا تَفْعَلُونَ3
अल्लाह के यहाँ यह अत्यन्त अप्रिय बात है कि तुम वह बात कहो, जो करो नहीं
اِنَّ اللّٰهَ يُحِبُّ الَّذ۪ينَ يُقَاتِلُونَ ف۪ي سَب۪يلِه۪ صَفًّا كَاَنَّهُمْ بُنْيَانٌ مَرْصُوصٌ4
अल्लाह तो उन लोगों से प्रेम रखता है जो उसके मार्ग में पंक्तिबद्ध होकर लड़ते है मानो वे सीसा पिलाई हुए दीवार है
وَاِذْ قَالَ مُوسٰى لِقَوْمِه۪ يَا قَوْمِ لِمَ تُؤْذُونَن۪ي وَقَدْ تَعْلَمُونَ اَنّ۪ي رَسُولُ اللّٰهِ اِلَيْكُمْۜ فَلَمَّا زَاغُٓوا اَزَاغَ اللّٰهُ قُلُوبَهُمْۜ وَاللّٰهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْفَاسِق۪ينَ5
और याद करो जब मूसा ने अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगों! तुम मुझे क्यो दुख देते हो, हालाँकि तुम जानते हो कि मैं तुम्हारी ओर भेजा हुआ अल्लाह का रसूल हूँ?" फिर जब उन्होंने टेढ़ अपनाई तो अल्लाह ने भी उनके दिल टेढ़ कर दिए। अल्लाह अवज्ञाकारियों को सीधा मार्ग नहीं दिखाता
وَاِذْ قَالَ ع۪يسَى ابْنُ مَرْيَمَ يَا بَن۪ٓي اِسْرَٓاء۪يلَ اِنّ۪ي رَسُولُ اللّٰهِ اِلَيْكُمْ مُصَدِّقًا لِمَا بَيْنَ يَدَيَّ مِنَ التَّوْرٰيةِ وَمُبَشِّرًا بِرَسُولٍ يَاْت۪ي مِنْ بَعْدِي اسْمُهُٓ اَحْمَدُۜ فَلَمَّا جَٓاءَهُمْ بِالْبَيِّنَاتِ قَالُوا هٰذَا سِحْرٌ مُب۪ينٌ6
और याद करो जबकि मरयम के बेटे ईसा ने कहा, "ऐ इसराईल की संतान! मैं तुम्हारी ओर भेजा हुआ अल्लाह का रसूल हूँ। मैं तौरात की (उस भविष्यवाणी की) पुष्टि करता हूँ जो मुझसे पहले से विद्यमान है और एक रसूल की शुभ सूचना देता हूँ जो मेरे बाद आएगा, उसका नाम अहमद होगा।" किन्तु वह जब उनके पास स्पट्जो प्रमाणों के साथ आया तो उन्होंने कहा, "यह तो जादू है।"
وَمَنْ اَظْلَمُ مِمَّنِ افْتَرٰى عَلَى اللّٰهِ الْكَذِبَ وَهُوَ يُدْعٰٓى اِلَى الْاِسْلَامِۜ وَاللّٰهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الظَّالِم۪ينَ7
अब उस व्यक्ति से बढ़कर ज़ालिम कौन होगा, जो अल्लाह पर थोपकर झूठ घड़े जबकि इस्लाम (अल्लाह के आगे समर्पण करने) का ओर बुलाया जा रहा हो? अल्लाह ज़ालिम लोगों को सीधा मार्ग नहीं दिखाया करता
يُر۪يدُونَ لِيُطْفِؤُ۫ا نُورَ اللّٰهِ بِاَفْوَاهِهِمْ وَاللّٰهُ مُتِمُّ نُورِه۪ وَلَوْ كَرِهَ الْكَافِرُونَ8
वे चाहते है कि अल्लाह के प्रकाश को अपने मुँह की फूँक से बुझा दे, किन्तु अल्लाह अपने प्रकाश को पूर्ण करके ही रहेगा, यद्यपि इनकार करनेवालों को अप्रिय ही लगे
هُوَ الَّذ۪ٓي اَرْسَلَ رَسُولَهُ بِالْهُدٰى وَد۪ينِ الْحَقِّ لِيُظْهِرَهُ عَلَى الدّ۪ينِ كُلِّه۪ وَلَوْ كَرِهَ الْمُشْرِكُونَ۟9
वही है जिसने अपने रसूल को मार्गदर्शन और सत्यधर्म के साथ भेजा, ताकि उसे पूरे के पूरे धर्म पर प्रभुत्व प्रदान कर दे, यद्यपि बहुदेवादियों को अप्रिय ही लगे
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا هَلْ اَدُلُّكُمْ عَلٰى تِجَارَةٍ تُنْج۪يكُمْ مِنْ عَذَابٍ اَل۪يمٍ10
ऐ ईमान लानेवालो! क्या मैं तुम्हें एक ऐसा व्यापार बताऊँ जो तुम्हें दुखद यातना से बचा ले?
تُؤْمِنُونَ بِاللّٰهِ وَرَسُولِه۪ وَتُجَاهِدُونَ ف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِ بِاَمْوَالِكُمْ وَاَنْفُسِكُمْۜ ذٰلِكُمْ خَيْرٌ لَكُمْ اِنْ كُنْتُمْ تَعْلَمُونَۙ11
तुम्हें ईमान लाना है अल्लाह और उसके रसूल पर, और जिहाद करना है अल्लाह के मार्ग में अपने मालों और अपनी जानों से। यही तुम्हारे लिए उत्तम है, यदि तुम जानो
يَغْفِرْ لَكُمْ ذُنُوبَكُمْ وَيُدْخِلْكُمْ جَنَّاتٍ تَجْر۪ي مِنْ تَحْتِهَا الْاَنْهَارُ وَمَسَاكِنَ طَيِّبَةً ف۪ي جَنَّاتِ عَدْنٍۜ ذٰلِكَ الْفَوْزُ الْعَظ۪يمُۙ12
वह तुम्हारे गुनाहों को क्षमा कर देगा और तुम्हें ऐसे बागों में दाखिल करेगा जिनके नीचे नहरें बह रही होगी और उन अच्छे घरों में भी जो सदाबहार बाग़ों में होंगे। यही बड़ी सफलता है
وَاُخْرٰى تُحِبُّونَهَاۜ نَصْرٌ مِنَ اللّٰهِ وَفَتْحٌ قَر۪يبٌۜ وَبَشِّرِ الْمُؤْمِن۪ينَ13
और दूसरी चीज़ भी जो तुम्हें प्रिय है (प्रदान करेगा), "अल्लाह की ओर से सहायता और निकट प्राप्त होनेवाली विजय," ईमानवालों को शुभसूचना दे दो!
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا كُونُٓوا اَنْصَارَ اللّٰهِ كَمَا قَالَ ع۪يسَى ابْنُ مَرْيَمَ لِلْحَوَارِيّ۪نَ مَنْ اَنْصَار۪ٓي اِلَى اللّٰهِۜ قَالَ الْحَوَارِيُّونَ نَحْنُ اَنْصَارُ اللّٰهِ فَاٰمَنَتْ طَٓائِفَةٌ مِنْ بَن۪ٓي اِسْرَٓاء۪يلَ وَكَفَرَتْ طَٓائِفَةٌۚ فَاَيَّدْنَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا عَلٰى عَدُوِّهِمْ فَاَصْبَحُوا ظَاهِر۪ينَ14
ऐ ईमान लानेवालों! अल्लाह के सहायक बनो, जैसा कि मरयम के बेटे ईसा ने हवारियों (साथियों) से कहा था, "कौन है अल्लाह की ओर (बुलाने में) मेरे सहायक?" हवारियों ने कहा, "हम है अल्लाह के सहायक।" फिर इसराईल की संतान में से एक गिरोह ईमान ले आया और एक गिरोह न इनकार किया। अतः हमने उन लोगों को, जो ईमान लाए थे, उनके अपने शत्रुओं के मुकाबले में शक्ति प्रदान की, तो वे छाकर रहे
62 · अल-जुमुआ
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
يُسَبِّحُ لِلّٰهِ مَا فِي السَّمٰوَاتِ وَمَا فِي الْاَرْضِ الْمَلِكِ الْقُدُّوسِ الْعَز۪يزِ الْحَك۪يمِ1
अल्लाह की तसबीह कर रही है हर वह चीज़ जो आकाशों में है और जो धरती में है, जो सम्राट है, अत्यन्त पवित्र, प्रभुत्वशाली तत्वदर्शी
هُوَ الَّذ۪ي بَعَثَ فِي الْاُمِّيّ۪نَ رَسُولًا مِنْهُمْ يَتْلُوا عَلَيْهِمْ اٰيَاتِه۪ وَيُزَكّ۪يهِمْ وَيُعَلِّمُهُمُ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَۗ وَاِنْ كَانُوا مِنْ قَبْلُ لَف۪ي ضَلَالٍ مُب۪ينٍۙ2
वही है जिसने उम्मियों में उन्हीं में से एक रसूल उठाया जो उन्हें उसकी आयतें पढ़कर सुनाता है, उन्हें निखारता है और उन्हें किताब और हिकमत (तत्वदर्शिता) की शिक्षा देता है, यद्यपि इससे पहले तो वे खुली हुई गुमराही में पड़े हुए थे, -
وَاٰخَر۪ينَ مِنْهُمْ لَمَّا يَلْحَقُوا بِهِمْۜ وَهُوَ الْعَز۪يزُ الْحَك۪يمُ3
और उन दूसरे लोगों को भी (किताब और हिकमत की शिक्षा दे) जो अभी उनसे मिले नहीं है, वे उन्हीं में से होंगे। और वही प्रभुत्वशाली, तत्वशाली है
ذٰلِكَ فَضْلُ اللّٰهِ يُؤْت۪يهِ مَنْ يَشَٓاءُۜ وَاللّٰهُ ذُو الْفَضْلِ الْعَظ۪يمِ4
यह अल्लाह का उदार अनुग्रह है, जिसको चाहता है उसे प्रदान करता है। अल्लाह बड़े अनुग्रह का मालिक है
مَثَلُ الَّذ۪ينَ حُمِّلُوا التَّوْرٰيةَ ثُمَّ لَمْ يَحْمِلُوهَا كَمَثَلِ الْحِمَارِ يَحْمِلُ اَسْفَارًاۜ بِئْسَ مَثَلُ الْقَوْمِ الَّذ۪ينَ كَذَّبُوا بِاٰيَاتِ اللّٰهِۜ وَاللّٰهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الظَّالِم۪ينَ5
जिन लोगों पर तारात का बोझ डाला गया, किन्तु उन्होंने उसे न उठाया, उनकी मिसाल उस गधे की-सी है जो किताबे लादे हुए हो। बहुत ही बुरी मिसाल है उन लोगों की जिन्होंने अल्लाह की आयतों को झुठला दिया। अल्लाह ज़ालिमों को सीधा मार्ग नहीं दिखाया करता
قُلْ يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ هَادُٓوا اِنْ زَعَمْتُمْ اَنَّكُمْ اَوْلِيَٓاءُ لِلّٰهِ مِنْ دُونِ النَّاسِ فَتَمَنَّوُا الْمَوْتَ اِنْ كُنْتُمْ صَادِق۪ينَ6
कह दो, "ऐ लोगों, जो यहूदी हुए हो! यदि तुम्हें यह गुमान है कि सारे मनुष्यों को छोड़कर तुम ही अल्लाह के प्रेमपात्र हो तो मृत्यु की कामना करो, यदि तुम सच्चे हो।"
وَلَا يَتَمَنَّوْنَهُٓ اَبَدًا بِمَا قَدَّمَتْ اَيْد۪يهِمْۜ وَاللّٰهُ عَل۪يمٌ بِالظَّالِم۪ينَ7
किन्तु वे कभी भी उसकी कामना करेंगे, उस (कर्म) के कारण जो उनके हाथों ने आगे भेजा है। अल्लाह ज़ालिमों को भली-भाँति जानता है
قُلْ اِنَّ الْمَوْتَ الَّذ۪ي تَفِرُّونَ مِنْهُ فَاِنَّهُ مُلَاق۪يكُمْ ثُمَّ تُرَدُّونَ اِلٰى عَالِمِ الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ فَيُنَبِّئُكُمْ بِمَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ۟8
कह दो, "मृत्यु जिससे तुम भागते हो, वह तो तुम्हें मिलकर रहेगी, फिर तुम उसकी ओर लौटाए जाओगे जो छिपे और खुले का जाननेवाला है। और वह तुम्हें उससे अवगत करा देगा जो कुछ तुम करते रहे होगे।" -
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اِذَا نُودِيَ لِلصَّلٰوةِ مِنْ يَوْمِ الْجُمُعَةِ فَاسْعَوْا اِلٰى ذِكْرِ اللّٰهِ وَذَرُوا الْبَيْعَۜ ذٰلِكُمْ خَيْرٌ لَكُمْ اِنْ كُنْتُمْ تَعْلَمُونَ9
ऐ ईमान लानेवालो, जब जुमा के दिन नमाज़ के लिए पुकारा जाए तो अल्लाह की याद की ओर दौड़ पड़ो और क्रय-विक्रय छोड़ दो। यह तुम्हारे लिए अच्छा है, यदि तुम जानो
فَاِذَا قُضِيَتِ الصَّلٰوةُ فَانْتَشِرُوا فِي الْاَرْضِ وَابْتَغُوا مِنْ فَضْلِ اللّٰهِ وَاذْكُرُوا اللّٰهَ كَث۪يرًا لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ10
फिर जब नमाज़ पूरी हो जाए तो धरती में फैल जाओ और अल्लाह का उदार अनुग्रह (रोजी) तलाश करो, और अल्लाह को बहुत ज़्यादा याद करते रहो, ताकि तुम सफल हो। -
وَاِذَا رَاَوْا تِجَارَةً اَوْ لَهْوًاۨ انْفَضُّٓوا اِلَيْهَا وَتَرَكُوكَ قَٓائِمًاۜ قُلْ مَا عِنْدَ اللّٰهِ خَيْرٌ مِنَ اللَّهْوِ وَمِنَ التِّجَارَةِۜ وَاللّٰهُ خَيْرُ الرَّازِق۪ينَ11
किन्तु जब वे व्यवहार और खेल-तमाशा देखते है तो उसकी ओर टूट पड़ते है और तुम्हें खड़ा छोड़ देते है। कह दो, "जो कुछ अल्लाह के पास है वह तमाशे और व्यापार से कहीं अच्छा है। और अल्लाह सबसे अच्छा आजीविका प्रदान करनेवाला है।"
63 · अल-मुनाफ़िक़ून
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
اِذَا جَٓاءَكَ الْمُنَافِقُونَ قَالُوا نَشْهَدُ اِنَّكَ لَرَسُولُ اللّٰهِۢ وَاللّٰهُ يَعْلَمُ اِنَّكَ لَرَسُولُهُۜ وَاللّٰهُ يَشْهَدُ اِنَّ الْمُنَافِق۪ينَ لَكَاذِبُونَۚ1
जब मुनाफ़िक (कपटाचारी) तुम्हारे पास आते है तो कहते है, "हम गवाही देते है कि निश्चय ही आप अल्लाह के रसूल है।" अल्लाह जानता है कि निस्संदेह तुम उसके रसूल हो, किेन्तु अल्लाह गवाही देता है कि ये मुनाफ़िक बिलकुल झूठे है
اِتَّخَذُٓوا اَيْمَانَهُمْ جُنَّةً فَصَدُّوا عَنْ سَب۪يلِ اللّٰهِۜ اِنَّهُمْ سَٓاءَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ2
उन्होंने अपनी क़समों को ढाल बना रखा है, इस प्रकार वे अल्लाह के मार्ग से रोकते है। निश्चय ही बुरा है जो वे कर रहे है
ذٰلِكَ بِاَنَّهُمْ اٰمَنُوا ثُمَّ كَفَرُوا فَطُبِعَ عَلٰى قُلُوبِهِمْ فَهُمْ لَا يَفْقَهُونَ3
यह इस कारण कि वे ईमान लाए, फिर इनकार किया, अतः उनके दिलों पर मुहर लगा दी गई, अब वे कुछ नहीं समझते
وَاِذَا رَاَيْتَهُمْ تُعْجِبُكَ اَجْسَامُهُمْۜ وَاِنْ يَقُولُوا تَسْمَعْ لِقَوْلِهِمْۜ كَاَنَّهُمْ خُشُبٌ مُسَنَّدَةٌۜ يَحْسَبُونَ كُلَّ صَيْحَةٍ عَلَيْهِمْۜ هُمُ الْعَدُوُّ فَاحْذَرْهُمْۜ قَاتَلَهُمُ اللّٰهُۘ اَنّٰى يُؤْفَكُونَ4
तुम उन्हें देखते हो तो उनके शरीर (बाह्य रूप) तुम्हें अच्छे लगते है, औरयदि वे बात करें तो उनकी बात तुम सुनते रह जाओ। किन्तु यह ऐसा ही है मानो वे लकड़ी के कुंदे है, जिन्हें (दीवार के सहारे) खड़ा कर दिया गया हो। हर ज़ोर की आवाज़ को वे अपने ही विरुद्ध समझते है। वही वास्तविक शत्रु हैं, अतः उनसे बचकर रहो। अल्लाह की मार उनपर। वे कहाँ उल्टे फिरे जा रहे है!
وَاِذَا ق۪يلَ لَهُمْ تَعَالَوْا يَسْتَغْفِرْ لَكُمْ رَسُولُ اللّٰهِ لَوَّوْا رُؤُ۫سَهُمْ وَرَاَيْتَهُمْ يَصُدُّونَ وَهُمْ مُسْتَكْبِرُونَ5
और जब उनसे कहा जाता है, "आओ, अल्लाह का रसूल तुम्हारे लिए क्षमा की प्रार्थना करे।" तो वे अपने सिर मटकाते है और तुम देखते हो कि घमंड के साथ खिंचे रहते है
سَوَٓاءٌ عَلَيْهِمْ اَسْتَغْفَرْتَ لَهُمْ اَمْ لَمْ تَسْتَغْفِرْ لَهُمْۜ لَنْ يَغْفِرَ اللّٰهُ لَهُمْۜ اِنَّ اللّٰهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْفَاسِق۪ينَ6
उनके लिए बराबर है चाहे तुम उनके किए क्षमा की प्रार्थना करो या उनके लिए क्षमा की प्रार्थना न करो। अल्लाह उन्हें कदापि क्षमा न करेगा। निश्चय ही अल्लाह अवज्ञाकारियों को सीधा मार्ग नहीं दिखाया करता
هُمُ الَّذ۪ينَ يَقُولُونَ لَا تُنْفِقُوا عَلٰى مَنْ عِنْدَ رَسُولِ اللّٰهِ حَتّٰى يَنْفَضُّواۜ وَلِلّٰهِ خَزَٓائِنُ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِ وَلٰكِنَّ الْمُنَافِق۪ينَ لَا يَفْقَهُونَ7
वे वहीं लोग है जो कहते है, "उन लोगों पर ख़र्च न करो जो अल्लाह के रसूल के पास रहनेवाले है, ताकि वे तितर-बितर हो जाएँ।" हालाँकि आकाशों और धरती के ख़जाने अल्लाह ही के है, किन्तु वे मुनाफ़िक़ समझते नहीं
يَقُولُونَ لَئِنْ رَجَعْنَٓا اِلَى الْمَد۪ينَةِ لَيُخْرِجَنَّ الْاَعَزُّ مِنْهَا الْاَذَلَّۜ وَلِلّٰهِ الْعِزَّةُ وَلِرَسُولِه۪ وَلِلْمُؤْمِن۪ينَ وَلٰكِنَّ الْمُنَافِق۪ينَ لَا يَعْلَمُونَ۟8
वे कहते है, "यदि हम मदीना लौटकर गए तो जो अधिक शक्तिवाला है, वह हीनतर (व्यक्तियों) को वहाँ से निकाल बाहर करेगा।" हालाँकि शक्ति अल्लाह और उसके रसूल और मोमिनों के लिए है, किन्तु वे मुनाफ़िक़ जानते नहीं
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لَا تُلْهِكُمْ اَمْوَالُكُمْ وَلَٓا اَوْلَادُكُمْ عَنْ ذِكْرِ اللّٰهِۚ وَمَنْ يَفْعَلْ ذٰلِكَ فَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْخَاسِرُونَ9
ऐ ईमान लानेवालो! तुम्हारे माल तुम्हें अल्लाह की याद से ग़ाफ़िल न कर दें और न तुम्हारी सन्तान ही। जो कोई ऐसा करे तो ऐसे ही लोग घाटे में रहनेवाले है
وَاَنْفِقُوا مِمَّا رَزَقْنَاكُمْ مِنْ قَبْلِ اَنْ يَاْتِيَ اَحَدَكُمُ الْمَوْتُ فَيَقُولَ رَبِّ لَوْلَٓا اَخَّرْتَن۪ٓي اِلٰٓى اَجَلٍ قَر۪يبٍۙ فَاَصَّدَّقَ وَاَكُنْ مِنَ الصَّالِح۪ينَ10
हमने तुम्हें जो कुछ दिया है उसमें से ख़र्च करो इससे पहले कि तुममें से किसी की मृत्यु आ जाए और उस समय वह करने लगे, "ऐ मेरे रब! तूने मुझे कुछ थोड़े समय तक और मुहलत क्यों न दी कि मैं सदक़ा (दान) करता (मुझे मुहलत दे कि मैं सदक़ा करूँ) और अच्छे लोगों में सम्मिलित हो जाऊँ।"
وَلَنْ يُؤَخِّرَ اللّٰهُ نَفْسًا اِذَا جَٓاءَ اَجَلُهَاۜ وَاللّٰهُ خَب۪يرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ11
किन्तु अल्लाह, किसी व्यक्ति को जब तक उसका नियत समय आ जाता है, कदापि मुहलत नहीं देता। और जो कुछ तुम करते हो अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है
64 · अत-तग़ाबुन
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
يُسَبِّحُ لِلّٰهِ مَا فِي السَّمٰوَاتِ وَمَا فِي الْاَرْضِۚ لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُۘ وَهُوَ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَد۪يرٌ1
अल्लाह की तसबीह कर रही है हर वह चीज़ जो आकाशों में है और जो धरती में है। उसी की बादशाही है और उसी के लिए प्रशंसा है और उसे हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है
هُوَ الَّذ۪ي خَلَقَكُمْ فَمِنْكُمْ كَافِرٌ وَمِنْكُمْ مُؤْمِنٌۜ وَاللّٰهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَص۪يرٌ2
वही है जिसने तुम्हें पैदा किया, फिर तुममें से कोई तो इनकार करनेवाला है और तुममें से कोई ईमानवाला है, और तुम जो कुछ भी करते हो अल्लाह उसे देख रहा होता है
خَلَقَ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضَ بِالْحَقِّ وَصَوَّرَكُمْ فَاَحْسَنَ صُوَرَكُمْۚ وَاِلَيْهِ الْمَص۪يرُ3
उसने आकाशों और धरती को हक़ के साथ पैदा किया और तुम्हारा रूप बनाया, तो बहुत ही अच्छे बनाए तुम्हारे रूप और उसी की ओर अन्ततः जाना है
يَعْلَمُ مَا فِي السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِ وَيَعْلَمُ مَا تُسِرُّونَ وَمَا تُعْلِنُونَۜ وَاللّٰهُ عَل۪يمٌ بِذَاتِ الصُّدُورِ4
वह जानता है जो कुछ आकाशों और धरती में है और उसे भी जानता है जो कुछ तुम छिपाते हो और जो कुछ तुम प्रकट करते हो। अल्लाह तो सीनों में छिपी बात तक को जानता है
اَلَمْ يَاْتِكُمْ نَبَؤُا الَّذ۪ينَ كَفَرُوا مِنْ قَبْلُۘ فَذَاقُوا وَبَالَ اَمْرِهِمْ وَلَهُمْ عَذَابٌ اَل۪يمٌ5
क्या तुम्हें उन लोगों की ख़बर नहीं पहुँची जिन्होंने इससे पहले इनकार किया था, फिर उन्होंने अपने कर्म के वबाल का मज़ा चखा और उनके लिए एक दुखद यातना भी है
ذٰلِكَ بِاَنَّهُ كَانَتْ تَاْت۪يهِمْ رُسُلُهُمْ بِالْبَيِّنَاتِ فَقَالُٓوا اَبَشَرٌ يَهْدُونَنَاۘ فَكَفَرُوا وَتَوَلَّوْا وَاسْتَغْنَى اللّٰهُۜ وَاللّٰهُ غَنِيٌّ حَم۪يدٌ6
यह इस कारण कि उनके पास उनके रसूल स्पष्ट प्रमाण लेकर आते रहे, किन्तु उन्होंने कहा, "क्या मनुष्य हमें मार्ग दिखाएँगे?" इस प्रकार उन्होंने इनकार किया और मुँह फेर लिया, तब अल्लाह भी उनसे बेपरवाह हो गया। अल्लाह तो है ही निस्पृह, अपने आप में स्वयं प्रशंसित
زَعَمَ الَّذ۪ينَ كَفَرُٓوا اَنْ لَنْ يُبْعَثُواۜ قُلْ بَلٰى وَرَبّ۪ي لَتُبْعَثُنَّ ثُمَّ لَتُنَبَّؤُ۬نَّ بِمَا عَمِلْتُمْۜ وَذٰلِكَ عَلَى اللّٰهِ يَس۪يرٌ7
जिन लोगों ने इनकार किया उन्होंने दावा किया वे मरने के पश्चात कदापि न उठाए जाएँगे। कह दो, "क्यों नहीं, मेरे रब की क़सम! तुम अवश्य उठाए जाओगे, फिर जो कुछ तुमने किया है उससे तुम्हें अवगत करा दिया जाएगा। और अल्लाह के लिए यह अत्यन्त सरल है।"
فَاٰمِنُوا بِاللّٰهِ وَرَسُولِه۪ وَالنُّورِ الَّذ۪ٓي اَنْزَلْنَاۜ وَاللّٰهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَب۪يرٌ8
अतः ईमान लाओ, अल्लाह पर और उसके रसूल पर और उस प्रकाश पर जिसे हमने अवतरित किया है। तुम जो कुछ भी करते हो अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है
يَوْمَ يَجْمَعُكُمْ لِيَوْمِ الْجَمْعِ ذٰلِكَ يَوْمُ التَّغَابُنِۜ وَمَنْ يُؤْمِنْ بِاللّٰهِ وَيَعْمَلْ صَالِحًا يُكَفِّرْ عَنْهُ سَيِّـَٔاتِه۪ وَيُدْخِلْهُ جَنَّاتٍ تَجْر۪ي مِنْ تَحْتِهَا الْاَنْهَارُ خَالِد۪ينَ ف۪يهَٓا اَبَدًاۜ ذٰلِكَ الْفَوْزُ الْعَظ۪يمُ9
इकट्ठा होने के दिन वह तुम्हें इकट्ठा करेगा, वह परस्पर लाभ-हानि का दिन होगा। जो भी अल्लाह पर ईमान लाए और अच्छा कर्म करे उसकी बुराईयाँ अल्लाह उससे दूर कर देगा और उसे ऐसे बाग़ों में दाख़िल करेगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, उनमें वे सदैव रहेंगे। यही बड़ी सफलता है
وَالَّذ۪ينَ كَفَرُوا وَكَذَّبُوا بِاٰيَاتِنَٓا اُو۬لٰٓئِكَ اَصْحَابُ النَّارِ خَالِد۪ينَ ف۪يهَاۜ وَبِئْسَ الْمَص۪يرُ۟10
रहे वे लोग जिन्होंने इनकार किया और हमारी आयतों को झुठलाया, वही आगवाले है जिसमें वे सदैव रहेंगे। अन्ततः लौटकर पहुँचने की वह बहुत ही बुरी जगह है
مَٓا اَصَابَ مِنْ مُص۪يبَةٍ اِلَّا بِاِذْنِ اللّٰهِۜ وَمَنْ يُؤْمِنْ بِاللّٰهِ يَهْدِ قَلْبَهُۜ وَاللّٰهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَل۪يمٌ11
अल्लाह की अनुज्ञा के बिना कोई भी मुसीबत नहीं आती। जो अल्लाह पर ईमान ले आए अल्लाह उसके दिल को मार्ग दिखाता है, और अल्लाह हर चीज को भली-भाँति जानता है
وَاَط۪يعُوا اللّٰهَ وَاَط۪يعُوا الرَّسُولَۚ فَاِنْ تَوَلَّيْتُمْ فَاِنَّمَا عَلٰى رَسُولِنَا الْبَلَاغُ الْمُب۪ينُ12
अल्लाह की आज्ञा का पालन करो और रसूल की आज्ञा का पालन करो, किन्तु यदि तुम मुँह मोड़ते हो तो हमारे रसूल पर बस स्पष्ट रूप से (संदेश) पहुँचा देने की ज़िम्मेदारी है
اَللّٰهُ لَٓا اِلٰهَ اِلَّا هُوَۜ وَعَلَى اللّٰهِ فَلْيَتَوَكَّلِ الْمُؤْمِنُونَ13
अल्लाह वह है जिसके सिवा कोई पूज्य-प्रभु नहीं। अतः अल्लाह ही पर ईमानवालों को भरोसा करना चाहिए
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اِنَّ مِنْ اَزْوَاجِكُمْ وَاَوْلَادِكُمْ عَدُوًّا لَكُمْ فَاحْذَرُوهُمْۚ وَاِنْ تَعْفُوا وَتَصْفَحُوا وَتَغْفِرُوا فَاِنَّ اللّٰهَ غَفُورٌ رَح۪يمٌ14
ऐ ईमान लानेवालो, तुम्हारी पत्नियों और तुम्हारी सन्तान में से कुछ ऐसे भी है जो तुम्हारे शत्रु है। अतः उनसे होशियार रहो। और यदि तुम माफ़ कर दो और टाल जाओ और क्षमा कर दो निश्चय ही अल्लाह बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
اِنَّمَٓا اَمْوَالُكُمْ وَاَوْلَادُكُمْ فِتْنَةٌۜ وَاللّٰهُ عِنْدَهُٓ اَجْرٌ عَظ۪يمٌ15
तुम्हारे माल और तुम्हारी सन्तान तो केवल एक आज़माइश है, और अल्लाह ही है जिसके पास बड़ा प्रतिदान है
فَاتَّقُوا اللّٰهَ مَا اسْتَطَعْتُمْ وَاسْمَعُوا وَاَط۪يعُوا وَاَنْفِقُوا خَيْرًا لِاَنْفُسِكُمْۜ وَمَنْ يُوقَ شُحَّ نَفْسِه۪ فَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ16
अतः जहाँ तक तुम्हारे बस में हो अल्लाह का डर रखो और सुनो और आज्ञापालन करो और ख़र्च करो अपनी भलाई के लिए। और जो अपने मन के लोभ एवं कृपणता से सुरक्षित रहा तो ऐसे ही लोग सफल है
اِنْ تُقْرِضُوا اللّٰهَ قَرْضًا حَسَنًا يُضَاعِفْهُ لَكُمْ وَيَغْفِرْ لَكُمْۜ وَاللّٰهُ شَكُورٌ حَل۪يمٌۙ17
यदि तुम अल्लाह को अच्छा ऋण दो तो वह उसे तुम्हारे लिए कई गुना बढ़ा देगा और तुम्हें क्षमा कर देगा। अल्लाह बड़ा गुणग्राहक और सहनशील है,
عَالِمُ الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ الْعَز۪يزُ الْحَك۪يمُ18
परोक्ष और प्रत्यक्ष को जानता है, प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
65 · अत-तलाक
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
يَٓا اَيُّهَا النَّبِيُّ اِذَا طَلَّقْتُمُ النِّسَٓاءَ فَطَلِّقُوهُنَّ لِعِدَّتِهِنَّ وَاَحْصُوا الْعِدَّةَۚ وَاتَّقُوا اللّٰهَ رَبَّكُمْۚ لَا تُخْرِجُوهُنَّ مِنْ بُيُوتِهِنَّ وَلَا يَخْرُجْنَ اِلَّٓا اَنْ يَاْت۪ينَ بِفَاحِشَةٍ مُبَيِّنَةٍۜ وَتِلْكَ حُدُودُ اللّٰهِۜ وَمَنْ يَتَعَدَّ حُدُودَ اللّٰهِ فَقَدْ ظَلَمَ نَفْسَهُۜ لَا تَدْر۪ي لَعَلَّ اللّٰهَ يُحْدِثُ بَعْدَ ذٰلِكَ اَمْرًا1
ऐ नबी! जब तुम लोग स्त्रियों को तलाक़ दो तो उन्हें तलाक़ उनकी इद्दत के हिसाब से दो। और इद्दत की गणना करो और अल्लाह का डर रखो, जो तुम्हारा रब है। उन्हें उनके घरों से न निकालो और न वे स्वयं निकलें, सिवाय इसके कि वे कोई स्पष्ट। अशोभनीय कर्म कर बैठें। ये अल्लाह की नियत की हुई सीमाएँ है - और जो अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन करे तो उसने स्वयं अपने आप पर ज़ुल्म किया - तुम नहीं जानते, कदाचित इस (तलाक़) के पश्चात अल्लाह कोई सूरत पैदा कर दे
فَاِذَا بَلَغْنَ اَجَلَهُنَّ فَاَمْسِكُوهُنَّ بِمَعْرُوفٍ اَوْ فَارِقُوهُنَّ بِمَعْرُوفٍ وَاَشْهِدُوا ذَوَيْ عَدْلٍ مِنْكُمْ وَاَق۪يمُوا الشَّهَادَةَ لِلّٰهِۜ ذٰلِكُمْ يُوعَظُ بِه۪ مَنْ كَانَ يُؤْمِنُ بِاللّٰهِ وَالْيَوْمِ الْاٰخِرِۜ وَمَنْ يَتَّقِ اللّٰهَ يَجْعَلْ لَهُ مَخْرَجًاۙ2
फिर जब वे अपनी नियत इद्दत को पहुँचे तो या तो उन्हें भली रीति से रोक लो या भली रीति से अलग कर दो। और अपने में से दो न्यायप्रिय आदमियों को गवाह बना दो और अल्लाह के लिए गवाही को दुरुस्त रखो। इसकी नसीहत उस व्यक्ति को की जाती है जो अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान रखेगा उसके लिए वह (परेशानी से) निकलने का राह पैदा कर देगा
وَيَرْزُقْهُ مِنْ حَيْثُ لَا يَحْتَسِبُۜ وَمَنْ يَتَوَكَّلْ عَلَى اللّٰهِ فَهُوَ حَسْبُهُۜ اِنَّ اللّٰهَ بَالِغُ اَمْرِه۪ۜ قَدْ جَعَلَ اللّٰهُ لِكُلِّ شَيْءٍ قَدْرًا3
और उसे वहाँ से रोज़ी देगा जिसका उसे गुमान भी न होगा। जो अल्लाह पर भरोसा करे तो वह उसके लिए काफ़ी है। निश्चय ही अल्लाह अपना काम पूरा करके रहता है। अल्लाह ने हर चीज़ का एक अन्दाजा नियत कर रखा है
وَالّٰٓـ۪ٔي يَئِسْنَ مِنَ الْمَح۪يضِ مِنْ نِسَٓائِكُمْ اِنِ ارْتَبْتُمْ فَعِدَّتُهُنَّ ثَلٰثَةُ اَشْهُرٍۙ وَالّٰٓـ۪ٔي لَمْ يَحِضْنَۜ وَاُو۬لَاتُ الْاَحْمَالِ اَجَلُهُنَّ اَنْ يَضَعْنَ حَمْلَهُنَّۜ وَمَنْ يَتَّقِ اللّٰهَ يَجْعَلْ لَهُ مِنْ اَمْرِه۪ يُسْرًا4
और तुम्हारी स्त्रियों में से जो मासिक धर्म से निराश हो चुकी हों, यदि तुम्हें संदेह हो तो उनकी इद्दत तीन मास है और इसी प्रकार उनकी भी जो अभी रजस्वला नहीं हुई। और जो गर्भवती स्त्रियाँ हो उनकी इद्दत उनके शिशु-प्रसव तक है। जो कोई अल्लाह का डर रखेगा उसके मामले में वह आसानी पैदा कर देगा
ذٰلِكَ اَمْرُ اللّٰهِ اَنْزَلَهُٓ اِلَيْكُمْۜ وَمَنْ يَتَّقِ اللّٰهَ يُكَفِّرْ عَنْهُ سَيِّـَٔاتِه۪ وَيُعْظِمْ لَهُٓ اَجْرًا5
यह अल्लाह का आदेश है जो उसने तुम्हारी ओर उतारा है। और जो कोई अल्लाह का डर रखेगा उससे वह उसकी बुराईयाँ दूर कर देगा और उसके प्रतिदान को बड़ा कर देगा
اَسْكِنُوهُنَّ مِنْ حَيْثُ سَكَنْتُمْ مِنْ وُجْدِكُمْ وَلَا تُضَٓارُّوهُنَّ لِتُضَيِّقُوا عَلَيْهِنَّۜ وَاِنْ كُنَّ اُو۬لَاتِ حَمْلٍ فَاَنْفِقُوا عَلَيْهِنَّ حَتّٰى يَضَعْنَ حَمْلَهُنَّۚ فَاِنْ اَرْضَعْنَ لَكُمْ فَاٰتُوهُنَّ اُجُورَهُنَّۚ وَاْتَمِرُوا بَيْنَكُمْ بِمَعْرُوفٍۚ وَاِنْ تَعَاسَرْتُمْ فَسَتُرْضِعُ لَهُٓ اُخْرٰىۜ6
अपनी हैसियत के अनुसार यहाँ तुम स्वयं रहते हो उन्हें भी उसी जगह रखो। और उन्हें तंग करने के लिए उन्हें हानि न पहुँचाओ। और यदि वे गर्भवती हो तो उनपर ख़र्च करते रहो जब तक कि उनका शिशु-प्रसव न हो जाए। फिर यदि वे तुम्हारे लिए (शिशु को) दूध पिलाएँ तो तुम उन्हें उनका पारिश्रामिक दो और आपस में भली रीति से परस्पर बातचीत के द्वार कोई बात तय कर लो। और यदि तुम दोनों में कोई कठिनाई हो तो फिर कोई दूसरी स्त्री उसके लिए दूध पिला देगी
لِيُنْفِقْ ذُو سَعَةٍ مِنْ سَعَتِه۪ۜ وَمَنْ قُدِرَ عَلَيْهِ رِزْقُهُ فَلْيُنْفِقْ مِمَّٓا اٰتٰيهُ اللّٰهُۜ لَا يُكَلِّفُ اللّٰهُ نَفْسًا اِلَّا مَٓا اٰتٰيهَاۜ سَيَجْعَلُ اللّٰهُ بَعْدَ عُسْرٍ يُسْرًا۟7
चाहिए कि समाई (सामर्थ्य) वाला अपनी समाई के अनुसार ख़र्च करे और जिसे उसकी रोज़ी नपी-तुली मिली हो तो उसे चाहिए कि अल्लाह ने उसे जो कुछ भी दिया है उसी में से वह ख़र्च करे। जितना कुछ दिया है उससे बढ़कर अल्लाह किसी व्यक्ति पर ज़िम्मेदारी का बोझ नहीं डालता। जल्द ही अल्लाह कठिनाई के बाद आसानी पैदा कर देगा
وَكَاَيِّنْ مِنْ قَرْيَةٍ عَتَتْ عَنْ اَمْرِ رَبِّهَا وَرُسُلِه۪ فَحَاسَبْنَاهَا حِسَابًا شَد۪يدًا وَعَذَّبْنَاهَا عَذَابًا نُكْرًا8
कितनी ही बस्तियाँ हैं जिन्होंने रब और उसके रसूलों के आदेश के मुक़ाबले में सरकशी की, तो हमने उनकी सख़्त पकड़ की और उन्हें बुरी यातना दी
فَذَاقَتْ وَبَالَ اَمْرِهَا وَكَانَ عَاقِبَةُ اَمْرِهَا خُسْرًا9
अतः उन्होंने अपने किए के वबाल का मज़ा चख लिया और उनकी कार्य-नीति का परिणाम घाटा ही रहा
اَعَدَّ اللّٰهُ لَهُمْ عَذَابًا شَد۪يدًا فَاتَّقُوا اللّٰهَ يَٓا اُو۬لِي الْاَلْبَابِۚۛ اَلَّذ۪ينَ اٰمَنُواۚۛ قَدْ اَنْزَلَ اللّٰهُ اِلَيْكُمْ ذِكْرًاۙ10
अल्लाह ने उनके लिए कठोर यातना तैयार कर रखी है। अतः ऐ बुद्धि और समझवालो जो ईमान लाए हो! अल्लाह का डर रखो। अल्लाह ने तुम्हारी ओर एक याददिहानी उतार दी है
رَسُولًا يَتْلُوا عَلَيْكُمْ اٰيَاتِ اللّٰهِ مُبَيِّنَاتٍ لِيُخْرِجَ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ مِنَ الظُّلُمَاتِ اِلَى النُّورِۜ وَمَنْ يُؤْمِنْ بِاللّٰهِ وَيَعْمَلْ صَالِحًا يُدْخِلْهُ جَنَّاتٍ تَجْر۪ي مِنْ تَحْتِهَا الْاَنْهَارُ خَالِد۪ينَ ف۪يهَٓا اَبَدًاۜ قَدْ اَحْسَنَ اللّٰهُ لَهُ رِزْقًا11
(अर्थात) एक रसूल जो तुम्हें अल्लाह की स्पष्ट आयतें पढ़कर सुनाता है, ताकि वह उन लोगों को, जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए, अँधेरों से निकालकर प्रकाश की ओर ले आए। जो कोई अल्लाह पर ईमान लाए और अच्छा कर्म करे, उसे वह ऐसे बाग़़ों में दाख़िल करेगा जिनके नीचे नहरें बह रही होगी - ऐसे लोग उनमें सदैव रहेंगे - अल्लाह ने उनके लिए उत्तम रोज़ी रखी है
اَللّٰهُ الَّذ۪ي خَلَقَ سَبْعَ سَمٰوَاتٍ وَمِنَ الْاَرْضِ مِثْلَهُنَّۜ يَتَنَزَّلُ الْاَمْرُ بَيْنَهُنَّ لِتَعْلَمُٓوا اَنَّ اللّٰهَ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَد۪يرٌۙ وَاَنَّ اللّٰهَ قَدْ اَحَاطَ بِكُلِّ شَيْءٍ عِلْمًا12
अल्लाह ही है जिसने सात आकाश बनाए और उन्ही के सदृश धरती से भी। उनके बीच (उसका) आदेश उतरता रहता है ताकि तुम जान लो कि अल्लाह को हर चीज़ का सामर्थ्य प्राप्त है और यह कि अल्लाह हर चीज़ को अपनी ज्ञान-परिधि में लिए हुए है
66 · अत-तहरीम
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
يَٓا اَيُّهَا النَّبِيُّ لِمَ تُحَرِّمُ مَٓا اَحَلَّ اللّٰهُ لَكَۚ تَبْتَغ۪ي مَرْضَاتَ اَزْوَاجِكَۜ وَاللّٰهُ غَفُورٌ رَح۪يمٌ1
ऐ नबी! जिस चीज़ को अल्लाह ने तुम्हारे लिए वैध ठहराया है उसे तुम अपनी पत्नियों की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए क्यो अवैध करते हो? अल्लाह बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
قَدْ فَرَضَ اللّٰهُ لَكُمْ تَحِلَّةَ اَيْمَانِكُمْۚ وَاللّٰهُ مَوْلٰيكُمْۚ وَهُوَ الْعَل۪يمُ الْحَك۪يمُ2
अल्लाह ने तुम लोगों के लिए तुम्हारी अपनी क़समों की पाबंदी से निकलने का उपाय निश्चित कर दिया है। अल्लाह तुम्हारा संरक्षक है और वही सर्वज्ञ, अत्यन्त तत्वदर्शी है
وَاِذْ اَسَرَّ النَّبِيُّ اِلٰى بَعْضِ اَزْوَاجِه۪ حَد۪يثًاۚ فَلَمَّا نَبَّاَتْ بِه۪ وَاَظْهَرَهُ اللّٰهُ عَلَيْهِ عَرَّفَ بَعْضَهُ وَاَعْرَضَ عَنْ بَعْضٍۚ فَلَمَّا نَبَّاَهَا بِه۪ قَالَتْ مَنْ اَنْبَاَكَ هٰذَاۜ قَالَ نَبَّاَنِيَ الْعَل۪يمُ الْخَب۪يرُ3
जब नबी ने अपनी पत्ऩियों में से किसी से एक गोपनीय बात कही, फिर जब उसने उसकी ख़बर कर दी और अल्लाह ने उसे उसपर ज़ाहिर कर दिया, तो उसने उसे किसी हद तक बता दिया और किसी हद तक टाल गया। फिर जब उसने उसकी उसे ख़बर की तो वह बोली, "आपको इसकी ख़बर किसने दी?" उसने कहा, "मुझे उसने ख़बर दी जो सब कुछ जाननेवाला, ख़बर रखनेवाला है।"
اِنْ تَتُوبَٓا اِلَى اللّٰهِ فَقَدْ صَغَتْ قُلُوبُكُمَاۚ وَاِنْ تَظَاهَرَا عَلَيْهِ فَاِنَّ اللّٰهَ هُوَ مَوْلٰيهُ وَجِبْر۪يلُ وَصَالِحُ الْمُؤْمِن۪ينَۚ وَالْمَلٰٓئِكَةُ بَعْدَ ذٰلِكَ ظَه۪يرٌ4
यदि तुम दोनों अल्लाह की ओर रुजू हो तो तुम्हारे दिल तो झुक ही चुके हैं, किन्तु यदि तुम उसके विरुद्ध एक-दूसरे की सहायता करोगी तो अल्लाह उसकी संरक्षक है, और जिबरील और नेक ईमानवाले भी, और इसके बाद फ़रिश्ते भी उसके सहायक है
عَسٰى رَبُّهُٓ اِنْ طَلَّقَكُنَّ اَنْ يُبْدِلَهُٓ اَزْوَاجًا خَيْرًا مِنْكُنَّ مُسْلِمَاتٍ مُؤْمِنَاتٍ قَانِتَاتٍ تَٓائِبَاتٍ عَابِدَاتٍ سَٓائِحَاتٍ ثَيِّبَاتٍ وَاَبْكَارًا5
इसकी बहुत सम्भावना है कि यदि वह तुम्हें तलाक़ दे दे तो उसका रब तुम्हारे बदले में तुमसे अच्छी पत्ऩियाँ उसे प्रदान करे - मुस्लिम, ईमानवाली, आज्ञाकारिणी, तौबा करनेवाली, इबादत करनेवाली, (अल्लाह के मार्ग में) सफ़र करनेवाली, विवाहिता और कुँवारियाँ भी
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا قُٓوا اَنْفُسَكُمْ وَاَهْل۪يكُمْ نَارًا وَقُودُهَا النَّاسُ وَالْحِجَارَةُ عَلَيْهَا مَلٰٓئِكَةٌ غِلَاظٌ شِدَادٌ لَا يَعْصُونَ اللّٰهَ مَٓا اَمَرَهُمْ وَيَفْعَلُونَ مَا يُؤْمَرُونَ6
ऐ ईमान लानेवालो! अपने आपको और अपने घरवालों को उस आग से बचाओ जिसका ईधन मनुष्य और पत्थर होंगे, जिसपर कठोर स्वभाव के ऐसे बलशाली फ़रिश्ते नियुक्त होंगे जो अल्लाह की अवज्ञा उसमें नहीं करेंगे जो आदेश भी वह उन्हें देगा, और वे वही करेंगे जिसका उन्हें आदेश दिया जाएगा
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ كَفَرُوا لَا تَعْتَذِرُوا الْيَوْمَۜ اِنَّمَا تُجْزَوْنَ مَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ۟7
ऐ इनकार करनेवालो! आज उज़्र पेश न करो। तुम्हें बदले में वही तो दिया जा रहा है जो कुछ तुम करते रहे हो
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا تُوبُٓوا اِلَى اللّٰهِ تَوْبَةً نَصُوحًاۜ عَسٰى رَبُّكُمْ اَنْ يُكَفِّرَ عَنْكُمْ سَيِّـَٔاتِكُمْ وَيُدْخِلَكُمْ جَنَّاتٍ تَجْر۪ي مِنْ تَحْتِهَا الْاَنْهَارُۙ يَوْمَ لَا يُخْزِي اللّٰهُ النَّبِيَّ وَالَّذ۪ينَ اٰمَنُوا مَعَهُۚ نُورُهُمْ يَسْعٰى بَيْنَ اَيْد۪يهِمْ وَبِاَيْمَانِهِمْ يَقُولُونَ رَبَّنَٓا اَتْمِمْ لَنَا نُورَنَا وَاغْفِرْ لَنَاۚ اِنَّكَ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَد۪يرٌ8
ऐ ईमान लानेवाले! अल्लाह के आगे तौबा करो, विशुद्ध तौबा। बहुत सम्भव है कि तुम्हारा रब तुम्हारी बुराइयाँ तुमसे दूर कर दे और तुम्हें ऐसे बाग़ों में दाख़िल करे जिनके नीचे नहरे बह रही होंगी, जिस दिन अल्लाह नबी को और उनको जो ईमान लाकर उसके साथ हुए, रुसवा न करेगा। उनका प्रकाश उनके आगे-आगे दौड़ रहा होगा और उनके दाहिने हाथ मे होगा। वे कह रहे होंगे, "ऐ हमारे रब! हमारे लिए हमारे प्रकाश को पूर्ण कर दे और हमें क्षमा कर। निश्चय ही तू हर चीज़ की सामर्थ्य रखता है।"
يَٓا اَيُّهَا النَّبِيُّ جَاهِدِ الْكُفَّارَ وَالْمُنَافِق۪ينَ وَاغْلُظْ عَلَيْهِمْۜ وَمَاْوٰيهُمْ جَهَنَّمُۜ وَبِئْسَ الْمَص۪يرُ9
ऐ नबी! इनकार करनेवालों और कपटाचारियों से जिहाद करो और उनके साथ सख़्ती से पेश आओ। उनका ठिकाना जहन्नम है और वह अन्ततः पहुँचने की बहुत बुरी जगह है
ضَرَبَ اللّٰهُ مَثَلًا لِلَّذ۪ينَ كَفَرُوا امْرَاَتَ نُوحٍ وَامْرَاَتَ لُوطٍۜ كَانَتَا تَحْتَ عَبْدَيْنِ مِنْ عِبَادِنَا صَالِحَيْنِ فَخَانَتَاهُمَا فَلَمْ يُغْنِيَا عَنْهُمَا مِنَ اللّٰهِ شَيْـًٔا وَق۪يلَ ادْخُلَا النَّارَ مَعَ الدَّاخِل۪ينَ10
अल्लाह ने इनकार करनेवालों के लिए नूह की स्त्री और लूत की स्त्री की मिसाल पेश की है। वे हमारे बन्दों में से दो नेक बन्दों के अधीन थीं। किन्तु उन दोनों स्त्रियों ने उनसे विश्वासघात किया तो अल्लाह के मुक़ाबले में उनके कुछ काम न आ सके और कह दिया गया, "प्रवेश करनेवालों के साथ दोनों आग में प्रविष्ट हो जाओ।"
وَضَرَبَ اللّٰهُ مَثَلًا لِلَّذ۪ينَ اٰمَنُوا امْرَاَتَ فِرْعَوْنَۢ اِذْ قَالَتْ رَبِّ ابْنِ ل۪ي عِنْدَكَ بَيْتًا فِي الْجَنَّةِ وَنَجِّن۪ي مِنْ فِرْعَوْنَ وَعَمَلِه۪ وَنَجِّن۪ي مِنَ الْقَوْمِ الظَّالِم۪ينَۙ11
और ईमान लानेवालों के लिए अल्लाह ने फ़िरऔन की स्त्री की मिसाल पेश की है, जबकि उसने कहा, "ऐ मेरे रब! तू मेरे लिए अपने पास जन्नत में एक घर बना और मुझे फ़िरऔन और उसके कर्म से छुटकारा दे, और छुटकारा दे मुझे ज़ालिम लोगों से।"
وَمَرْيَمَ ابْنَتَ عِمْرٰنَ الَّت۪ٓي اَحْصَنَتْ فَرْجَهَا فَنَفَخْنَا ف۪يهِ مِنْ رُوحِنَا وَصَدَّقَتْ بِكَلِمَاتِ رَبِّهَا وَكُتُبِه۪ وَكَانَتْ مِنَ الْقَانِت۪ينَ12
और इमरान की बेटी मरयम की मिसाल पेश ही है जिसने अपने सतीत्व की रक्षा की थी, फिर हमने उस स्त्री के भीतर अपनी रूह फूँक दी और उसने अपने रब के बोलों और उसकी किताबों की पुष्टि की और वह भक्ति-प्रवृत्त आज्ञाकारियों में से थी