29. जुज़ - कुरान पढ़ें

29. जुज़
67 · अल-मुल्क
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
تَبَارَكَ الَّذ۪ي بِيَدِهِ الْمُلْكُۘ وَهُوَ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَد۪يرٌۙ1
बड़ा बरकतवाला है वह जिसके हाथ में सारी बादशाही है और वह हर चीज़ की सामर्थ्य रखता है। -
اَلَّذ۪ي خَلَقَ الْمَوْتَ وَالْحَيٰوةَ لِيَبْلُوَكُمْ اَيُّكُمْ اَحْسَنُ عَمَلًاۜ وَهُوَ الْعَز۪يزُ الْغَفُورُۙ2
जिसने पैदा किया मृत्यु और जीवन को, ताकि तुम्हारी परीक्षा करे कि तुममें कर्म की दृष्टि से कौन सबसे अच्छा है। वह प्रभुत्वशाली, बड़ा क्षमाशील है। -
اَلَّذ۪ي خَلَقَ سَبْعَ سَمٰوَاتٍ طِبَاقًاۜ مَا تَرٰى ف۪ي خَلْقِ الرَّحْمٰنِ مِنْ تَفَاوُتٍۜ فَارْجِعِ الْبَصَرَۙ هَلْ تَرٰى مِنْ فُطُورٍ3
जिसने ऊपर-तले सात आकाश बनाए। तुम रहमान की रचना में कोई असंगति और विषमता न देखोगे। फिर नज़र डालो, "क्या तुम्हें कोई बिगाड़ दिखाई देता है?"
ثُمَّ ارْجِعِ الْبَصَرَ كَرَّتَيْنِ يَنْقَلِبْ اِلَيْكَ الْبَصَرُ خَاسِئًا وَهُوَ حَس۪يرٌ4
फिर दोबारा नज़र डालो। निगाह रद्द होकर और थक-हारकर तुम्हारी ओर पलट आएगी
وَلَقَدْ زَيَّنَّا السَّمَٓاءَ الدُّنْيَا بِمَصَاب۪يحَ وَجَعَلْنَاهَا رُجُومًا لِلشَّيَاط۪ينِ وَاَعْتَدْنَا لَهُمْ عَذَابَ السَّع۪يرِ5
हमने निकटवर्ती आकाश को दीपों से सजाया और उन्हें शैतानों के मार भगाने का साधन बनाया और उनके लिए हमने भड़कती आग की यातना तैयार कर रखी है
وَلِلَّذ۪ينَ كَفَرُوا بِرَبِّهِمْ عَذَابُ جَهَنَّمَۜ وَبِئْسَ الْمَص۪يرُ6
जिन लोगों ने अपने रब के साथ कुफ़्र किया उनके लिए जहन्नम की यातना है और वह बहुत ही बुरा ठिकाना है
اِذَٓا اُلْقُوا ف۪يهَا سَمِعُوا لَهَا شَه۪يقًا وَهِيَ تَفُورُۙ7
जब वे उसमें डाले जाएँगे तो उसकी दहाड़ने की भयानक आवाज़ सुनेंगे और वह प्रकोप से बिफर रही होगी।
تَكَادُ تَمَيَّزُ مِنَ الْغَيْظِۜ كُلَّمَٓا اُلْقِيَ ف۪يهَا فَوْجٌ سَاَلَهُمْ خَزَنَتُهَٓا اَلَمْ يَاْتِكُمْ نَذ۪يرٌ8
ऐसा प्रतीत होगा कि प्रकोप के कारण अभी फट पड़ेगी। हर बार जब भी कोई समूह उसमें डाला जाएगा तो उसके कार्यकर्ता उनसे पूछेंगे, "क्या तुम्हारे पास कोई सावधान करनेवाला नहीं आया?"
قَالُوا بَلٰى قَدْ جَٓاءَنَا نَذ۪يرٌ فَكَذَّبْنَا وَقُلْنَا مَا نَزَّلَ اللّٰهُ مِنْ شَيْءٍۚ اِنْ اَنْتُمْ اِلَّا ف۪ي ضَلَالٍ كَب۪يرٍ9
वे कहेंगे, "क्यों नहीं, अवश्य हमारे पास आया था, किन्तु हमने झुठला दिया और कहा कि अल्लाह ने कुछ भी नहीं अवतरित किया। तुम तो बस एक बड़ी गुमराही में पड़े हुए हो।"
وَقَالُوا لَوْ كُنَّا نَسْمَعُ اَوْ نَعْقِلُ مَا كُنَّا ف۪ٓي اَصْحَابِ السَّع۪يرِ10
और वे कहेंगे, "यदि हम सुनते या बुद्धि से काम लेते तो हम दहकती आग में पड़नेवालों में सम्मिलित न होते।"
فَاعْتَرَفُوا بِذَنْبِهِمْۚ فَسُحْقًا لِاَصْحَابِ السَّع۪يرِ11
इस प्रकार वे अपने गुनाहों को स्वीकार करेंगे, तो धिक्कार हो दहकती आगवालों पर!
اِنَّ الَّذ۪ينَ يَخْشَوْنَ رَبَّهُمْ بِالْغَيْبِ لَهُمْ مَغْفِرَةٌ وَاَجْرٌ كَب۪يرٌ12
जो लोग परोक्ष में रहते हुए अपने रब से डरते है, उनके लिए क्षमा और बड़ा बदला है
وَاَسِرُّوا قَوْلَكُمْ اَوِ اجْهَرُوا بِه۪ۜ اِنَّهُ عَل۪يمٌ بِذَاتِ الصُّدُورِ13
तुम अपनी बात छिपाओ या उसे व्यक्त करो, वह तो सीनों में छिपी बातों तक को जानता है
اَلَا يَعْلَمُ مَنْ خَلَقَۜ وَهُوَ اللَّط۪يفُ الْخَب۪يرُ۟14
क्या वह नहीं जानेगा जिसने पैदा किया? वह सूक्ष्मदर्शी, ख़बर रखनेवाला है
هُوَ الَّذ۪ي جَعَلَ لَكُمُ الْاَرْضَ ذَلُولًا فَامْشُوا ف۪ي مَنَاكِبِهَا وَكُلُوا مِنْ رِزْقِه۪ۜ وَاِلَيْهِ النُّشُورُ15
वही तो है जिसने तुम्हारे लिए धरती को वशीभूत किया। अतः तुम उसके (धरती के) कन्धों पर चलो और उसकी रोज़ी में से खाओ, उसी की ओर दोबारा उठकर (जीवित होकर) जाना है
ءَاَمِنْتُمْ مَنْ فِي السَّمَٓاءِ اَنْ يَخْسِفَ بِكُمُ الْاَرْضَ فَاِذَا هِيَ تَمُورُۙ16
क्या तुम उससे निश्चिन्त हो जो आकाश में है कि तुम्हें धरती में धँसा दे, फिर क्या देखोगे कि वह डाँवाडोल हो रही है?
اَمْ اَمِنْتُمْ مَنْ فِي السَّمَٓاءِ اَنْ يُرْسِلَ عَلَيْكُمْ حَاصِبًاۜ فَسَتَعْلَمُونَ كَيْفَ نَذ۪يرِ17
या तुम उससे निश्चिन्त हो जो आकाश में है कि वह तुमपर पथराव करनेवाली वायु भेज दे? फिर तुम जान लोगे कि मेरी चेतावनी कैसी होती है
وَلَقَدْ كَذَّبَ الَّذ۪ينَ مِنْ قَبْلِهِمْ فَكَيْفَ كَانَ نَك۪يرِ18
उन लोगों ने भी झुठलाया जो उनसे पहले थे, फिर कैसा रहा मेरा इनकार!
اَوَلَمْ يَرَوْا اِلَى الطَّيْرِ فَوْقَهُمْ صَٓافَّاتٍ وَيَقْبِضْنَۜ مَا يُمْسِكُهُنَّ اِلَّا الرَّحْمٰنُۜ اِنَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ بَص۪يرٌ19
क्या उन्होंने अपने ऊपर पक्षियों को पंक्तबन्द्ध पंख फैलाए और उन्हें समेटते नहीं देखा? उन्हें रहमान के सिवा कोई और नहीं थामें रहता। निश्चय ही वह हर चीज़ को देखता है
اَمَّنْ هٰذَا الَّذ۪ي هُوَ جُنْدٌ لَكُمْ يَنْصُرُكُمْ مِنْ دُونِ الرَّحْمٰنِۜ اِنِ الْكَافِرُونَ اِلَّا ف۪ي غُرُورٍۚ20
या वह कौन है जो तुम्हारी सेना बनकर रहमान के मुक़ाबले में तुम्हारी सहायता करे। इनकार करनेवाले तो बस धोखे में पड़े हुए है
اَمَّنْ هٰذَا الَّذ۪ي يَرْزُقُكُمْ اِنْ اَمْسَكَ رِزْقَهُۚ بَلْ لَجُّوا ف۪ي عُتُوٍّ وَنُفُورٍ21
या वह कौन है जो तुम्हें रोज़ी दे, यदि वह अपनी रोज़ी रोक ले? नहीं, बल्कि वे तो सरकशी और नफ़रत ही पर अड़े हुए है
اَفَمَنْ يَمْش۪ي مُكِبًّا عَلٰى وَجْهِه۪ٓ اَهْدٰٓى اَمَّنْ يَمْش۪ي سَوِيًّا عَلٰى صِرَاطٍ مُسْتَق۪يمٍ22
तो क्या वह व्यक्ति जो अपने मुँह के बल औंधा चलता हो वह अधिक सीधे मार्ग पर ह या वह जो सीधा होकर सीधे मार्ग पर चल रहा है?
قُلْ هُوَ الَّذ۪ٓي اَنْشَاَكُمْ وَجَعَلَ لَكُمُ السَّمْعَ وَالْاَبْصَارَ وَالْاَفْـِٔدَةَۜ قَل۪يلًا مَا تَشْكُرُونَ23
कह दो, "वही है जिसने तुम्हें पैदा किया और तुम्हारे लिए कान और आँखे और दिल बनाए। तुम कृतज्ञता थोड़े ही दिखाते हो।"
قُلْ هُوَ الَّذ۪ي ذَرَاَكُمْ فِي الْاَرْضِ وَاِلَيْهِ تُحْشَرُونَ24
कह दो, "वही है जिसने तुम्हें धरती में फैलाया और उसी की ओर तुम एकत्र किए जा रहे हो।"
وَيَقُولُونَ مَتٰى هٰذَا الْوَعْدُ اِنْ كُنْتُمْ صَادِق۪ينَ25
वे कहते है, "यदि तुम सच्चे हो तो यह वादा कब पूरा होगा?"
قُلْ اِنَّمَا الْعِلْمُ عِنْدَ اللّٰهِۖ وَاِنَّمَٓا اَنَا۬ نَذ۪يرٌ مُب۪ينٌ26
कह दो, "इसका ज्ञान तो बस अल्लाह ही के पास है और मैं तो एक स्पष्ट॥ सचेत करनेवाला हूँ।"
فَلَمَّا رَاَوْهُ زُلْفَةً س۪ٓيـَٔتْ وُجُوهُ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا وَق۪يلَ هٰذَا الَّذ۪ي كُنْتُمْ بِه۪ تَدَّعُونَ27
फिर जब वे उसे निकट देखेंगे तो उन लोगों के चेहरे बिगड़ जाएँगे जिन्होंने इनकार की नीति अपनाई; और कहा जाएगा, "यही है वह चीज़ जिसकी तुम माँग कर रहे थे।"
قُلْ اَرَاَيْتُمْ اِنْ اَهْلَكَنِيَ اللّٰهُ وَمَنْ مَعِيَ اَوْ رَحِمَنَاۙ فَمَنْ يُج۪يرُ الْكَافِر۪ينَ مِنْ عَذَابٍ اَل۪يمٍ28
कहो, "क्या तुमने यह भी सोचा कि यदि अल्लाह मुझे और उन्हें भी, जो मेरे साथ है, विनष्ट ही कर दे या वह हम पर दया करे, आख़िर इनकार करनेवालों को दुखद यातना से कौन पनाह देगा?"
قُلْ هُوَ الرَّحْمٰنُ اٰمَنَّا بِه۪ وَعَلَيْهِ تَوَكَّلْنَاۚ فَسَتَعْلَمُونَ مَنْ هُوَ ف۪ي ضَلَالٍ مُب۪ينٍ29
कह दो, "वह रहमान है। उसी पर हम ईमान लाए है और उसी पर हमने भरोसा किया। तो शीघ्र ही तुम्हें मालूम हो जाएगा कि खुली गुमराही में कौन पड़ा हुआ है।"
قُلْ اَرَاَيْتُمْ اِنْ اَصْبَحَ مَٓاؤُ۬كُمْ غَوْرًا فَمَنْ يَاْت۪يكُمْ بِمَٓاءٍ مَع۪ينٍ30
कहो, "क्या तुमने यह भी सोचा कि यदि तुम्हारा पानी (धरती में) नीचे उतर जाए तो फिर कौन तुम्हें लाकर देगा निर्मल प्रवाहित जल?"
68 · अल-क़लम
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
نٓ وَالْقَلَمِ وَمَا يَسْطُرُونَۙ1
नून॰। गवाह है क़लम और वह चीज़ जो वे लिखते है,
مَٓا اَنْتَ بِنِعْمَةِ رَبِّكَ بِمَجْنُونٍۚ2
तुम अपने रब की अनुकम्पा से कोई दीवाने नहीं हो
وَاِنَّ لَكَ لَاَجْرًا غَيْرَ مَمْنُونٍۚ3
निश्चय ही तुम्हारे लिए ऐसा प्रतिदान है जिसका क्रम कभी टूटनेवाला नहीं
وَاِنَّكَ لَعَلٰى خُلُقٍ عَظ۪يمٍ4
निस्संदेह तुम एक महान नैतिकता के शिखर पर हो
فَسَتُبْصِرُ وَيُبْصِرُونَۙ5
अतः शीघ्र ही तुम भी देख लोगे और वे भी देख लेंगे
بِاَيِّكُمُ الْمَفْتُونُ6
कि तुममें से कौन विभ्रमित है
اِنَّ رَبَّكَ هُوَ اَعْلَمُ بِمَنْ ضَلَّ عَنْ سَب۪يلِه۪ۖ وَهُوَ اَعْلَمُ بِالْمُهْتَد۪ينَ7
निस्संदेह तुम्हारा रब उसे भली-भाँति जानता है जो उसके मार्ग से भटक गया है, और वही उन लोगों को भी जानता है जो सीधे मार्ग पर हैं
فَلَا تُطِعِ الْمُكَذِّب۪ينَ8
अतः तुम झुठलानेवालों को कहना न मानना
وَدُّوا لَوْ تُدْهِنُ فَيُدْهِنُونَ9
वे चाहते है कि तुम ढीले पड़ो, इस कारण वे चिकनी-चुपड़ी बातें करते है
وَلَا تُطِعْ كُلَّ حَلَّافٍ مَه۪ينٍۙ10
तुम किसी भी ऐसे व्यक्ति की बात न मानना जो बहुत क़समें खानेवाला, हीन है,
هَمَّازٍ مَشَّٓاءٍ بِنَم۪يمٍۙ11
कचोके लगाता, चुग़लियाँ खाता फिरता हैं,
مَنَّاعٍ لِلْخَيْرِ مُعْتَدٍ اَث۪يمٍۙ12
भलाई से रोकता है, सीमा का उल्लंघन करनेवाला, हक़ मारनेवाला है,
عُتُلٍّ بَعْدَ ذٰلِكَ زَن۪يمٍۙ13
क्रूर है फिर अधम भी।
اَنْ كَانَ ذَا مَالٍ وَبَن۪ينَۜ14
इस कारण कि वह धन और बेटोंवाला है
اِذَا تُتْلٰى عَلَيْهِ اٰيَاتُنَا قَالَ اَسَاط۪يرُ الْاَوَّل۪ينَ15
जब उसे हमारी आयतें सुनाई जाती है तो कहता है, "ये तो पहले लोगों की कहानियाँ हैं!"
سَنَسِمُهُ عَلَى الْخُرْطُومِ16
शीघ्र ही हम उसकी सूँड पर दाग़ लगाएँगे
اِنَّا بَلَوْنَاهُمْ كَمَا بَلَوْنَٓا اَصْحَابَ الْجَنَّةِۚ اِذْ اَقْسَمُوا لَيَصْرِمُنَّهَا مُصْبِح۪ينَۙ17
हमने उन्हें परीक्षा में डाला है जैसे बाग़वालों को परीक्षा में डाला था, जबकि उन्होंने क़सम खाई कि वे प्रातःकाल अवश्य उस (बाग़) के फल तोड़ लेंगे
وَلَا يَسْتَثْنُونَ18
और वे इसमें छूट की कोई गुंजाइश नहीं रख रहे थे
فَطَافَ عَلَيْهَا طَٓائِفٌ مِنْ رَبِّكَ وَهُمْ نَٓائِمُونَ19
अभी वे सो ही रहे थे कि तुम्हारे रब की ओर से गर्दिश का एक झोंका आया
فَاَصْبَحَتْ كَالصَّر۪يمِ20
और वह ऐसा हो गया जैसे कटी हुई फ़सल
فَتَنَادَوْا مُصْبِح۪ينَۙ21
फिर प्रातःकाल होते ही उन्होंने एक-दूसरे को आवाज़ दी
اَنِ اغْدُوا عَلٰى حَرْثِكُمْ اِنْ كُنْتُمْ صَارِم۪ينَ22
कि "यदि तुम्हें फल तोड़ना है तो अपनी खेती पर सवेरे ही पहुँचो।"
فَانْطَلَقُوا وَهُمْ يَتَخَافَتُونَۙ23
अतएव वे चुपके-चुपके बातें करते हुए चल पड़े
اَنْ لَا يَدْخُلَنَّهَا الْيَوْمَ عَلَيْكُمْ مِسْك۪ينٌ24
कि आज वहाँ कोई मुहताज तुम्हारे पास न पहुँचने पाए
وَغَدَوْا عَلٰى حَرْدٍ قَادِر۪ينَ25
और वे आज तेज़ी के साथ चले मानो (मुहताजों को) रोक देने की उन्हें सामर्थ्य प्राप्त है
فَلَمَّا رَاَوْهَا قَالُٓوا اِنَّا لَضَٓالُّونَۙ26
किन्तु जब उन्होंने उसको देखा, कहने लगे, "निश्चय ही हम भटक गए है।
بَلْ نَحْنُ مَحْرُومُونَ27
नहीं, बल्कि हम वंचित होकर रह गए।"
قَالَ اَوْسَطُهُمْ اَلَمْ اَقُلْ لَكُمْ لَوْلَا تُسَبِّحُونَ28
उनमें जो सबसे अच्छा था कहने लगा, "क्या मैंने तुमसे कहा नहीं था? तुम तसबीह क्यों नहीं करते?"
قَالُوا سُبْحَانَ رَبِّنَٓا اِنَّا كُنَّا ظَالِم۪ينَ29
वे पुकार उठे, "महान और उच्च है हमारा रब! निश्चय ही हम ज़ालिम थे।"
فَاَقْبَلَ بَعْضُهُمْ عَلٰى بَعْضٍ يَتَلَاوَمُونَ30
फिर वे परस्पर एक-दूसरे की ओर रुख़ करके लगे एक-दूसरे को मलामत करने।
قَالُوا يَا وَيْلَنَٓا اِنَّا كُنَّا طَاغ۪ينَ31
उन्होंने कहा, "अफ़सोस हम पर! निश्चय ही हम सरकश थे।
عَسٰى رَبُّنَٓا اَنْ يُبْدِلَنَا خَيْرًا مِنْهَٓا اِنَّٓا اِلٰى رَبِّنَا رَاغِبُونَ32
"आशा है कि हमारा रब बदले में हमें इससे अच्छा प्रदान करे। हम अपने रब की ओर उन्मुख है।"
كَذٰلِكَ الْعَذَابُۜ وَلَعَذَابُ الْاٰخِرَةِ اَكْبَرُۢ لَوْ كَانُوا يَعْلَمُونَ۟33
यातना ऐसी ही होती है, और आख़िरत की यातना तो निश्चय ही इससे भी बड़ी है, काश वे जानते!
اِنَّ لِلْمُتَّق۪ينَ عِنْدَ رَبِّهِمْ جَنَّاتِ النَّع۪يمِ34
निश्चय ही डर रखनेवालों के लिए उनके रब के यहाँ नेमत भरी जन्नतें है
اَفَنَجْعَلُ الْمُسْلِم۪ينَ كَالْمُجْرِم۪ينَۜ35
तो क्या हम मुस्लिमों (आज्ञाकारियों) को अपराधियों जैसा कर देंगे?
مَا لَكُمْ۠ كَيْفَ تَحْكُمُونَۚ36
तुम्हें क्या हो गया है, कैसा फ़ैसला करते हो?
اَمْ لَكُمْ كِتَابٌ ف۪يهِ تَدْرُسُونَۙ37
क्या तुम्हारे पास कोई किताब है जिसमें तुम पढ़ते हो
اِنَّ لَكُمْ ف۪يهِ لَمَا تَخَيَّرُونَۚ38
कि उसमें तुम्हारे लिए वह कुछ है जो तुम पसन्द करो?
اَمْ لَكُمْ اَيْمَانٌ عَلَيْنَا بَالِغَةٌ اِلٰى يَوْمِ الْقِيٰمَةِۙ اِنَّ لَكُمْ لَمَا تَحْكُمُونَۚ39
या तुमने हमसे क़समें ले रखी है जो क़ियामत के दिन तक बाक़ी रहनेवाली है कि तुम्हारे लिए वही कुछ है जो तुम फ़ैसला करो!
سَلْهُمْ اَيُّهُمْ بِذٰلِكَ زَع۪يمٌۚۛ40
उनसे पूछो, "उनमें से कौन इसकी ज़मानत लेता है!
اَمْ لَهُمْ شُرَكَٓاءُۚۛ فَلْيَاْتُوا بِشُرَكَٓائِهِمْ اِنْ كَانُوا صَادِق۪ينَ41
या उनके ठहराए हुए कुछ साझीदार है? फिर तो यह चाहिए कि वे अपने साझीदारों को ले आएँ, यदि वे सच्चे है
يَوْمَ يُكْشَفُ عَنْ سَاقٍ وَيُدْعَوْنَ اِلَى السُّجُودِ فَلَا يَسْتَط۪يعُونَۙ42
जिस दिन पिंडली खुल जाएगी और वे सजदे के लिए बुलाए जाएँगे, तो वे (सजदा) न कर सकेंगे
خَاشِعَةً اَبْصَارُهُمْ تَرْهَقُهُمْ ذِلَّةٌۜ وَقَدْ كَانُوا يُدْعَوْنَ اِلَى السُّجُودِ وَهُمْ سَالِمُونَ43
उनकी निगाहें झुकी हुई होंगी, ज़िल्लत (अपमान) उनपर छा रही होगी। उन्हें उस समय भी सजदा करने के लिए बुलाया जाता था जब वे भले-चंगे थे
فَذَرْن۪ي وَمَنْ يُكَذِّبُ بِهٰذَا الْحَد۪يثِۜ سَنَسْتَدْرِجُهُمْ مِنْ حَيْثُ لَا يَعْلَمُونَۙ44
अतः तुम मुझे छोड़ दो और उसको जो इस वाणी को झुठलाता है। हम ऐसों को क्रमशः (विनाश की ओर) ले जाएँगे, ऐसे तरीक़े से कि वे नहीं जानते
وَاُمْل۪ي لَهُمْۜ اِنَّ كَيْد۪ي مَت۪ينٌ45
मैं उन्हें ढील दे रहा हूँ। निश्चय ही मेरी चाल बड़ी मज़बूत है
اَمْ تَسْـَٔلُهُمْ اَجْرًا فَهُمْ مِنْ مَغْرَمٍ مُثْقَلُونَۚ46
(क्या वे यातना ही चाहते हैं) या तुम उनसे कोई बदला माँग रहे हो कि वे तावान के बोझ से दबे जाते हों?
اَمْ عِنْدَهُمُ الْغَيْبُ فَهُمْ يَكْتُبُونَ47
या उनके पास परोक्ष का ज्ञान है तो वे लिख रहे हैं?
فَاصْبِرْ لِحُكْمِ رَبِّكَ وَلَا تَكُنْ كَصَاحِبِ الْحُوتِۢ اِذْ نَادٰى وَهُوَ مَكْظُومٌۜ48
तो अपने रब के आदेश हेतु धैर्य से काम लो और मछलीवाले (यूनुस अलै॰) की तरह न हो जाना, जबकि उसने पुकारा था इस दशा में कि वह ग़म में घुट रहा था।
لَوْلَٓا اَنْ تَدَارَكَهُ نِعْمَةٌ مِنْ رَبِّه۪ لَنُبِذَ بِالْعَرَٓاءِ وَهُوَ مَذْمُومٌ49
यदि उसके रब की अनुकम्पा उसके साथ न हो जाती तो वह अवश्य ही चटियल मैदान में बुरे हाल में डाल दिया जाता।
فَاجْتَبٰيهُ رَبُّهُ فَجَعَلَهُ مِنَ الصَّالِح۪ينَ50
अन्ततः उसके रब ने उसे चुन लिया और उसे अच्छे लोगों में सम्मिलित कर दिया
وَاِنْ يَكَادُ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا لَيُزْلِقُونَكَ بِاَبْصَارِهِمْ لَمَّا سَمِعُوا الذِّكْرَ وَيَقُولُونَ اِنَّهُ لَمَجْنُونٌۢ51
जब वे लोग, जिन्होंने इनकार किया, ज़िक्र (क़ुरआन) सुनते है और कहते है, "वह तो दीवाना है!" तो ऐसा लगता है कि वे अपनी निगाहों के ज़ोर से तुम्हें फिसला देंगे
وَمَا هُوَ اِلَّا ذِكْرٌ لِلْعَالَم۪ينَ52
हालाँकि वह सारे संसार के लिए एक अनुस्मृति है
69 · अल-हाक़ा
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
اَلْحَٓاقَّةُۙ1
होकर रहनेवाली!
مَا الْحَٓاقَّةُۚ2
क्या है वह होकर रहनेवाली?
وَمَٓا اَدْرٰيكَ مَا الْحَٓاقَّةُۜ3
और तुम क्या जानो कि क्या है वह होकर रहनेवाली?
كَذَّبَتْ ثَمُودُ وَعَادٌ بِالْقَارِعَةِ4
समूद और आद ने उस खड़खड़ा देनेवाली (घटना) को झुठलाया,
فَاَمَّا ثَمُودُ فَاُهْلِكُوا بِالطَّاغِيَةِ5
फिर समूद तो एक हद से बढ़ जानेवाली आपदा से विनष्ट किए गए
وَاَمَّا عَادٌ فَاُهْلِكُوا بِر۪يحٍ صَرْصَرٍ عَاتِيَةٍۙ6
और रहे आद, तो वे एक अनियंत्रित प्रचंड वायु से विनष्ट कर दिए गए
سَخَّرَهَا عَلَيْهِمْ سَبْعَ لَيَالٍ وَثَمَانِيَةَ اَيَّامٍۙ حُسُومًا فَتَرَى الْقَوْمَ ف۪يهَا صَرْعٰىۙ كَاَنَّهُمْ اَعْجَازُ نَخْلٍ خَاوِيَةٍۚ7
अल्लाह ने उसको सात रात और आठ दिन तक उन्मूलन के उद्देश्य से उनपर लगाए रखा। तो लोगों को तुम देखते कि वे उसमें पछाड़े हुए ऐसे पड़े है मानो वे खजूर के जर्जर तने हों
فَهَلْ تَرٰى لَهُمْ مِنْ بَاقِيَةٍ8
अब क्या तुम्हें उनमें से कोई शेष दिखाई देता है?
وَجَٓاءَ فِرْعَوْنُ وَمَنْ قَبْلَهُ وَالْمُؤْتَفِكَاتُ بِالْخَاطِئَةِۚ9
और फ़िरऔन ने और उससे पहले के लोगों ने और तलपट हो जानेवाली बस्तियों ने यह ख़ता की
فَعَصَوْا رَسُولَ رَبِّهِمْ فَاَخَذَهُمْ اَخْذَةً رَابِيَةً10
उन्होंने अपने रब के रसूल की अवज्ञा की तो उसने उन्हें ऐसी पकड़ में ले लिया जो बड़ी कठोर थी
اِنَّا لَمَّا طَغَا الْمَٓاءُ حَمَلْنَاكُمْ فِي الْجَارِيَةِۙ11
जब पानी उमड़ आया तो हमने तुम्हें प्रवाहित नौका में सवार किया;
لِنَجْعَلَهَا لَكُمْ تَذْكِرَةً وَتَعِيَهَٓا اُذُنٌ وَاعِيَةٌ12
ताकि उसे तुम्हारे लिए हम शिक्षाप्रद यादगार बनाएँ और याद रखनेवाले कान उसे सुरक्षित रखें
فَاِذَا نُفِخَ فِي الصُّورِ نَفْخَةٌ وَاحِدَةٌۙ13
तो याद रखो जब सूर (नरसिंघा) में एक फूँक मारी जाएगी,
وَحُمِلَتِ الْاَرْضُ وَالْجِبَالُ فَدُكَّتَا دَكَّةً وَاحِدَةً14
और धरती और पहाड़ों को उठाकर एक ही बार में चूर्ण-विचूर्ण कर दिया जाएगा
فَيَوْمَئِذٍ وَقَعَتِ الْوَاقِعَةُۙ15
तो उस दिन घटित होनेवाली घटना घटित हो जाएगी,
وَانْشَقَّتِ السَّمَٓاءُ فَهِيَ يَوْمَئِذٍ وَاهِيَةٌۙ16
और आकाश फट जाएगा और उस दिन उसका बन्धन ढीला पड़ जाएगा,
وَالْمَلَكُ عَلٰٓى اَرْجَٓائِهَاۜ وَيَحْمِلُ عَرْشَ رَبِّكَ فَوْقَهُمْ يَوْمَئِذٍ ثَمَانِيَةٌۜ17
और फ़रिश्ते उसके किनारों पर होंगे और उस दिन तुम्हारे रब के सिंहासन को आठ अपने ऊपर उठाए हुए होंगे
يَوْمَئِذٍ تُعْرَضُونَ لَا تَخْفٰى مِنْكُمْ خَافِيَةٌ18
उस दिन तुम लोग पेश किए जाओगे, तुम्हारी कोई छिपी बात छिपी न रहेगी
فَاَمَّا مَنْ اُو۫تِيَ كِتَابَهُ بِيَم۪ينِه۪ فَيَقُولُ هَٓاؤُ۬مُ اقْرَؤُ۫ا كِتَابِيَهْۚ19
फिर जिस किसी को उसका कर्म-पत्र उसके दाहिने हाथ में दिया गया, तो वह कहेगा, "लो पढ़ो, मेरा कर्म-पत्र!
اِنّ۪ي ظَنَنْتُ اَنّ۪ي مُلَاقٍ حِسَابِيَهْۚ20
"मैं तो समझता ही था कि मुझे अपना हिसाब मिलनेवाला है।"
فَهُوَ ف۪ي ع۪يشَةٍ رَاضِيَةٍۙ21
अतः वह सुख और आनन्दमय जीवन में होगा;
ف۪ي جَنَّةٍ عَالِيَةٍۙ22
उच्च जन्नत में,
قُطُوفُهَا دَانِيَةٌ23
जिसके फलों के गुच्छे झुके होंगे
كُلُوا وَاشْرَبُوا هَن۪ٓيـًٔا بِمَٓا اَسْلَفْتُمْ فِي الْاَيَّامِ الْخَالِيَةِ24
मज़े से खाओ और पियो उन कर्मों के बदले में जो तुमने बीते दिनों में किए है
وَاَمَّا مَنْ اُو۫تِيَ كِتَابَهُ بِشِمَالِه۪ فَيَقُولُ يَا لَيْتَن۪ي لَمْ اُو۫تَ كِتَابِيَهْۚ25
और रहा वह क्यक्ति जिसका कर्म-पत्र उसके बाएँ हाथ में दिया गया, वह कहेगा, "काश, मेरा कर्म-पत्र मुझे न दिया जाता
وَلَمْ اَدْرِ مَا حِسَابِيَهْۚ26
और मैं न जानता कि मेरा हिसाब क्या है!
يَا لَيْتَهَا كَانَتِ الْقَاضِيَةَۚ27
"ऐ काश, वह (मृत्यु) समाप्त करनेवाली होती!
مَٓا اَغْنٰى عَنّ۪ي مَالِيَهْۚ28
"मेरा माल मेरे कुछ काम न आया,
هَلَكَ عَنّ۪ي سُلْطَانِيَهْۚ29
"मेरा ज़ोर (सत्ता) मुझसे जाता रहा!"
خُذُوهُ فَغُلُّوهُۙ30
"पकड़ो उसे और उसकी गरदन में तौक़ डाल दो,
ثُمَّ الْجَح۪يمَ صَلُّوهُۙ31
"फिर उसे भड़कती हुई आग में झोंक दो,
ثُمَّ ف۪ي سِلْسِلَةٍ ذَرْعُهَا سَبْعُونَ ذِرَاعًا فَاسْلُكُوهُۜ32
"फिर उसे एक ऐसी जंजीर में जकड़ दो जिसकी माप सत्तर हाथ है
اِنَّهُ كَانَ لَا يُؤْمِنُ بِاللّٰهِ الْعَظ۪يمِۙ33
"वह न तो महिमावान अल्लाह पर ईमान रखता था
وَلَا يَحُضُّ عَلٰى طَعَامِ الْمِسْك۪ينِۜ34
और न मुहताज को खाना खिलाने पर उभारता था
فَلَيْسَ لَهُ الْيَوْمَ هٰهُنَا حَم۪يمٌۙ35
"अतः आज उसका यहाँ कोई घनिष्ट मित्र नहीं,
وَلَا طَعَامٌ اِلَّا مِنْ غِسْل۪ينٍۙ36
और न ही धोवन के सिवा कोई भोजन है,
لَا يَاْكُلُهُٓ اِلَّا الْخَاطِؤُ۫نَ۟37
"उसे ख़ताकारों (अपराधियों) के अतिरिक्त कोई नहीं खाता।"
فَلَٓا اُقْسِمُ بِمَا تُبْصِرُونَۙ38
अतः कुछ नहीं! मैं क़सम खाता हूँ उन चीज़ों की जो तुम देखते
وَمَا لَا تُبْصِرُونَۙ39
हो और उन चीज़ों को भी जो तुम नहीं देखते,
اِنَّهُ لَقَوْلُ رَسُولٍ كَر۪يمٍۚ40
निश्चय ही वह एक प्रतिष्ठित रसूल की लाई हुई वाणी है
وَمَا هُوَ بِقَوْلِ شَاعِرٍۜ قَل۪يلًا مَا تُؤْمِنُونَۙ41
वह किसी कवि की वाणी नहीं। तुम ईमान थोड़े ही लाते हो
وَلَا بِقَوْلِ كَاهِنٍۜ قَل۪يلًا مَا تَذَكَّرُونَۜ42
और न वह किसी काहिन का वाणी है। तुम होश से थोड़े ही काम लेते हो
تَنْز۪يلٌ مِنْ رَبِّ الْعَالَم۪ينَ43
अवतरण है सारे संसार के रब की ओर से,
وَلَوْ تَقَوَّلَ عَلَيْنَا بَعْضَ الْاَقَاو۪يلِۙ44
यदि वह (नबी) हमपर थोपकर कुछ बातें घड़ता,
لَاَخَذْنَا مِنْهُ بِالْيَم۪ينِۙ45
तो अवश्य हम उसका दाहिना हाथ पकड़ लेते,
ثُمَّ لَقَطَعْنَا مِنْهُ الْوَت۪ينَۘ46
फिर उसकी गर्दन की रग काट देते,
فَمَا مِنْكُمْ مِنْ اَحَدٍ عَنْهُ حَاجِز۪ينَ47
और तुममें से कोई भी इससे रोकनेवाला न होता
وَاِنَّهُ لَتَذْكِرَةٌ لِلْمُتَّق۪ينَ48
और निश्चय ही वह एक अनुस्मृति है डर रखनेवालों के लिए
وَاِنَّا لَنَعْلَمُ اَنَّ مِنْكُمْ مُكَذِّب۪ينَ49
और निश्चय ही हम जानते है कि तुममें कितने ही ऐसे है जो झुठलाते है
وَاِنَّهُ لَحَسْرَةٌ عَلَى الْكَافِر۪ينَ50
निश्चय ही वह इनकार करनेवालों के लिए सर्वथा पछतावा है,
وَاِنَّهُ لَحَقُّ الْيَق۪ينِ51
और वह बिल्कुल विश्वसनीय सत्य है।
فَسَبِّحْ بِاسْمِ رَبِّكَ الْعَظ۪يمِ52
अतः तुम अपने महिमावान रब के नाम की तसबीह (गुणगान) करो
70 · अल-मआरिज
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
سَاَلَ سَٓائِلٌ بِعَذَابٍ وَاقِعٍۙ1
एक माँगनेवाले ने घटित होनेवाली यातना माँगी,
لِلْكَافِر۪ينَ لَيْسَ لَهُ دَافِعٌۙ2
जो इनकार करनेवालो के लिए होगी, उसे कोई टालनेवाला नहीं,
مِنَ اللّٰهِ ذِي الْمَعَارِجِۜ3
वह अल्लाह की ओर से होगी, जो चढ़ाव के सोपानों का स्वामी है
تَعْرُجُ الْمَلٰٓئِكَةُ وَالرُّوحُ اِلَيْهِ ف۪ي يَوْمٍ كَانَ مِقْدَارُهُ خَمْس۪ينَ اَلْفَ سَنَةٍۚ4
फ़रिश्ते और रूह (जिबरील) उसकी ओर चढ़ते है, उस दिन में जिसकी अवधि पचास हज़ार वर्ष है
فَاصْبِرْ صَبْرًا جَم۪يلًا5
अतः धैर्य से काम लो, उत्तम धैर्य
اِنَّهُمْ يَرَوْنَهُ بَع۪يدًاۙ6
वे उसे बहुत दूर देख रहे है,
وَنَرٰيهُ قَر۪يبًاۜ7
किन्तु हम उसे निकट देख रहे है
يَوْمَ تَكُونُ السَّمَٓاءُ كَالْمُهْلِۙ8
जिस दिन आकाश तेल की तलछट जैसा काला हो जाएगा,
وَتَكُونُ الْجِبَالُ كَالْعِهْنِۙ9
और पर्वत रंग-बिरंगे ऊन के सदृश हो जाएँगे
وَلَا يَسْـَٔلُ حَم۪يمٌ حَم۪يمًاۚ10
कोई मित्र किसी मित्र को न पूछेगा,
يُبَصَّرُونَهُمْۜ يَوَدُّ الْمُجْرِمُ لَوْ يَفْتَد۪ي مِنْ عَذَابِ يَوْمِئِذٍ بِبَن۪يهِۙ11
हालाँकि वे एक-दूसरे को दिखाए जाएँगे। अपराधी चाहेगा कि किसी प्रकार वह उस दिन की यातना से छूटने के लिए अपने बेटों,
وَصَاحِبَتِه۪ وَاَخ۪يهِۙ12
अपनी पत्नी , अपने भाई
وَفَص۪يلَتِهِ الَّت۪ي تُـْٔو۪يهِۙ13
और अपने उस परिवार को जो उसको आश्रय देता है,
وَمَنْ فِي الْاَرْضِ جَم۪يعًاۙ ثُمَّ يُنْج۪يهِۙ14
और उन सभी लोगों को जो धरती में रहते है, फ़िदया (मुक्ति-प्रतिदान) के रूप में दे डाले फिर वह उसको छुटकारा दिला दे
كَلَّاۜ اِنَّهَا لَظٰىۙ15
कदापि नहीं! वह लपट मारती हुई आग है,
نَزَّاعَةً لِلشَّوٰىۚ16
जो मांस और त्वचा को चाट जाएगी,
تَدْعُوا مَنْ اَدْبَرَ وَتَوَلّٰىۙ17
उस व्यक्ति को बुलाती है जिसने पीठ फेरी और मुँह मोड़ा,
وَجَمَعَ فَاَوْعٰى18
और (धन) एकत्र किया और सैंत कर रखा
اِنَّ الْاِنْسَانَ خُلِقَ هَلُوعًاۙ19
निस्संदेह मनुष्य अधीर पैदा हुआ है
اِذَا مَسَّهُ الشَّرُّ جَزُوعًاۙ20
जि उसे तकलीफ़ पहुँचती है तो घबरा उठता है,
وَاِذَا مَسَّهُ الْخَيْرُ مَنُوعًاۙ21
किन्तु जब उसे सम्पन्नता प्राप्त होती ही तो वह कृपणता दिखाता है
اِلَّا الْمُصَلّ۪ينَۙ22
किन्तु नमाज़ अदा करनेवालों की बात और है,
اَلَّذ۪ينَ هُمْ عَلٰى صَلَاتِهِمْ دَٓائِمُونَۖ23
जो अपनी नमाज़ पर सदैव जमें रहते है,
وَالَّذ۪ينَ ف۪ٓي اَمْوَالِهِمْ حَقٌّ مَعْلُومٌۙ24
और जिनके मालों में
لِلسَّٓائِلِ وَالْمَحْرُومِۖ25
माँगनेवालों और वंचित का एक ज्ञात और निश्चित हक़ होता है,
وَالَّذ۪ينَ يُصَدِّقُونَ بِيَوْمِ الدّ۪ينِۖ26
जो बदले के दिन को सत्य मानते है,
وَالَّذ۪ينَ هُمْ مِنْ عَذَابِ رَبِّهِمْ مُشْفِقُونَۚ27
जो अपने रब की यातना से डरते है -
اِنَّ عَذَابَ رَبِّهِمْ غَيْرُ مَاْمُونٍۚ28
उनके रब की यातना है ही ऐसी जिससे निश्चिन्त न रहा जाए -
وَالَّذ۪ينَ هُمْ لِفُرُوجِهِمْ حَافِظُونَۙ29
जो अपने गुप्तांगों की रक्षा करते है।
اِلَّا عَلٰٓى اَزْوَاجِهِمْ اَوْ مَا مَلَكَتْ اَيْمَانُهُمْ فَاِنَّهُمْ غَيْرُ مَلُوم۪ينَۚ30
अपनी पत्नि यों या जो उनकी मिल्क में हो उनके अतिरिक्त दूसरों से तो इस बात पर उनकी कोई भर्त्सना नही। -
فَمَنِ ابْتَغٰى وَرَٓاءَ ذٰلِكَ فَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْعَادُونَۚ31
किन्तु जिस किसी ने इसके अतिरिक्त कुछ और चाहा तो ऐसे ही लोग सीमा का उल्लंघन करनेवाले है।-
وَالَّذ۪ينَ هُمْ لِاَمَانَاتِهِمْ وَعَهْدِهِمْ رَاعُونَۖ32
जो अपने पास रखी गई अमानतों और अपनी प्रतिज्ञा का निर्वाह करते है,
وَالَّذ۪ينَ هُمْ بِشَهَادَاتِهِمْ قَٓائِمُونَۖ33
जो अपनी गवाहियों पर क़़ायम रहते है,
وَالَّذ۪ينَ هُمْ عَلٰى صَلَاتِهِمْ يُحَافِظُونَۜ34
और जो अपनी नमाज़ की रक्षा करते है
اُو۬لٰٓئِكَ ف۪ي جَنَّاتٍ مُكْرَمُونَۜ۟35
वही लोग जन्नतों में सम्मानपूर्वक रहेंगे
فَمَا لِ‌الَّذ۪ينَ كَفَرُوا قِبَلَكَ مُهْطِع۪ينَۙ36
फिर उन इनकार करनेवालो को क्या हुआ है कि वे तुम्हारी ओर दौड़े चले आ रहे है?
عَنِ الْيَم۪ينِۙ وَعَنِ الشِّمَالِ عِز۪ينَ37
दाएँ और बाएँ से गिरोह के गिरोह
اَيَطْمَعُ كُلُّ امْرِئٍ مِنْهُمْ اَنْ يُدْخَلَ جَنَّةَ نَع۪يمٍۙ38
क्या उनमें से प्रत्येक व्यक्ति इसकी लालसा रखता है कि वह अनुकम्पा से परिपूर्ण जन्नत में प्रविष्ट हो?
كَلَّاۜ اِنَّا خَلَقْنَاهُمْ مِمَّا يَعْلَمُونَ39
कदापि नहीं, हमने उन्हें उस चीज़ से पैदा किया है, जिसे वे भली-भाँति जानते है
فَلَٓا اُقْسِمُ بِرَبِّ الْمَشَارِقِ وَالْمَغَارِبِ اِنَّا لَقَادِرُونَۙ40
अतः कुछ नहीं, मैं क़सम खाता हूँ पूर्वों और पश्चिमों के रब की, हमे इसकी सामर्थ्य प्राप्त है
عَلٰٓى اَنْ نُبَدِّلَ خَيْرًا مِنْهُمْۙ وَمَا نَحْنُ بِمَسْبُوق۪ينَ41
कि उनकी उनसे अच्छे ले आएँ और हम पिछड़ जानेवाले नहीं है
فَذَرْهُمْ يَخُوضُوا وَيَلْعَبُوا حَتّٰى يُلَاقُوا يَوْمَهُمُ الَّذ۪ي يُوعَدُونَۙ42
अतः उन्हें छोड़ो कि वे व्यर्थ बातों में पड़े रहें और खेलते रहे, यहाँ तक कि वे अपने उस दिन से मिलें, जिसका उनसे वादा किया जा रहा है,
يَوْمَ يَخْرُجُونَ مِنَ الْاَجْدَاثِ سِرَاعًا كَاَنَّهُمْ اِلٰى نُصُبٍ يُوفِضُونَۙ43
जिस दिन वे क़ब्रों से तेज़ी के साथ निकलेंगे जैसे किसी निशान की ओर दौड़े जा रहे है,
خَاشِعَةً اَبْصَارُهُمْ تَرْهَقُهُمْ ذِلَّةٌۜ ذٰلِكَ الْيَوْمُ الَّذ۪ي كَانُوا يُوعَدُونَ44
उनकी निगाहें झुकी होंगी, ज़िल्लत उनपर छा रही होगी। यह है वह दिन जिससे वह डराए जाते रहे है
71 · नूह
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
اِنَّٓا اَرْسَلْنَا نُوحًا اِلٰى قَوْمِه۪ٓ اَنْ اَنْذِرْ قَوْمَكَ مِنْ قَبْلِ اَنْ يَاْتِيَهُمْ عَذَابٌ اَل۪يمٌ1
हमने नूह को उसकी कौ़म की ओर भेजा कि "अपनी क़ौम के लोगों को सावधान कर दो, इससे पहले कि उनपर कोई दुखद यातना आ जाए।"
قَالَ يَا قَوْمِ اِنّ۪ي لَكُمْ نَذ۪يرٌ مُب۪ينٌۙ2
उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मैं तुम्हारे लिए एक स्पष्ट सचेतकर्ता हूँ
اَنِ اعْبُدُوا اللّٰهَ وَاتَّقُوهُ وَاَط۪يعُونِۙ3
कि अल्लाह की बन्दगी करो और उसका डर रखो और मेरी आज्ञा मानो।-
يَغْفِرْ لَكُمْ مِنْ ذُنُوبِكُمْ وَيُؤَخِّرْكُمْ اِلٰٓى اَجَلٍ مُسَمًّىۜ اِنَّ اَجَلَ اللّٰهِ اِذَا جَٓاءَ لَا يُؤَخَّرُۢ لَوْ كُنْتُمْ تَعْلَمُونَ4
"वह तुम्हें क्षमा करके तुम्हारे गुनाहों से तुम्हें पाक कर देगा और एक निश्चित समय तक तुम्हे मुहल्लत देगा। निश्चय ही जब अल्लाह का निश्चित समय आ जाता है तो वह टलता नहीं, काश कि तुम जानते!"
قَالَ رَبِّ اِنّ۪ي دَعَوْتُ قَوْم۪ي لَيْلًا وَنَهَارًاۙ5
उसने कहा, "ऐ मेरे रब! मैंने अपनी क़ौम के लोगों को रात और दिन बुलाया
فَلَمْ يَزِدْهُمْ دُعَٓاء۪ٓي اِلَّا فِرَارًا6
"किन्तु मेरी पुकार ने उनके पलायन को ही बढ़ाया
وَاِنّ۪ي كُلَّمَا دَعَوْتُهُمْ لِتَغْفِرَ لَهُمْ جَعَلُٓوا اَصَابِعَهُمْ ف۪ٓي اٰذَانِهِمْ وَاسْتَغْشَوْا ثِيَابَهُمْ وَاَصَرُّوا وَاسْتَكْبَرُوا اسْتِكْبَارًاۚ7
"और जब भी मैंने उन्हें बुलाया, ताकि तू उन्हें क्षमा कर दे, तो उन्होंने अपने कानों में अपनी उँगलियाँ दे लीं और अपने कपड़ो से स्वयं को ढाँक लिया और अपनी हठ पर अड़ गए और बड़ा ही घमंड किया
ثُمَّ اِنّ۪ي دَعَوْتُهُمْ جِهَارًاۙ8
"फिर मैंने उन्हें खुल्लमखुल्ला बुलाया,
ثُمَّ اِنّ۪ٓي اَعْلَنْتُ لَهُمْ وَاَسْرَرْتُ لَهُمْ اِسْرَارًاۙ9
"फिर मैंने उनसे खुले तौर पर भी बातें की और उनसे चुपके-चुपके भी बातें की
فَقُلْتُ اسْتَغْفِرُوا رَبَّكُمْ اِنَّهُ كَانَ غَفَّارًاۙ10
"और मैंने कहा, अपने रब से क्षमा की प्रार्थना करो। निश्चय ही वह बड़ा क्षमाशील है,
يُرْسِلِ السَّمَٓاءَ عَلَيْكُمْ مِدْرَارًاۙ11
"वह बादल भेजेगा तुमपर ख़ूब बरसनेवाला,
وَيُمْدِدْكُمْ بِاَمْوَالٍ وَبَن۪ينَ وَيَجْعَلْ لَكُمْ جَنَّاتٍ وَيَجْعَلْ لَكُمْ اَنْهَارًاۜ12
"और वह माल और बेटों से तुम्हें बढ़ोतरी प्रदान करेगा, और तुम्हारे लिए बाग़ पैदा करेगा और तुम्हारे लिए नहरें प्रवाहित करेगा
مَا لَكُمْ لَا تَرْجُونَ لِلّٰهِ وَقَارًاۚ13
"तुम्हें क्या हो गया है कि तुम (अपने दिलों में) अल्लाह के लिए किसी गौरव की आशा नहीं रखते?
وَقَدْ خَلَقَكُمْ اَطْوَارًا14
"हालाँकि उसने तुम्हें विभिन्न अवस्थाओं से गुज़ारते हुए पैदा किया
اَلَمْ تَرَوْا كَيْفَ خَلَقَ اللّٰهُ سَبْعَ سَمٰوَاتٍ طِبَاقًاۙ15
"क्या तुमने देखा नहीं कि अल्लाह ने किस प्रकार ऊपर तले सात आकाश बनाए,
وَجَعَلَ الْقَمَرَ ف۪يهِنَّ نُورًا وَجَعَلَ الشَّمْسَ سِرَاجًا16
"और उनमें चन्द्रमा को प्रकाश और सूर्य का प्रदीप बनाया?
وَاللّٰهُ اَنْبَتَكُمْ مِنَ الْاَرْضِ نَبَاتًاۙ17
"और अल्लाह ने तुम्हें धरती से विशिष्ट प्रकार से विकसित किया,
ثُمَّ يُع۪يدُكُمْ ف۪يهَا وَيُخْرِجُكُمْ اِخْرَاجًا18
"फिर वह तुम्हें उसमें लौटाता है और तुम्हें बाहर निकालेगा भी
وَاللّٰهُ جَعَلَ لَكُمُ الْاَرْضَ بِسَاطًاۙ19
"और अल्लाह ने तुम्हारे लिए धरती को बिछौना बनाया,
لِتَسْلُكُوا مِنْهَا سُبُلًا فِجَاجًا۟20
"ताकि तुम उसके विस्तृत मार्गों पर चलो।"
قَالَ نُوحٌ رَبِّ اِنَّهُمْ عَصَوْن۪ي وَاتَّبَعُوا مَنْ لَمْ يَزِدْهُ مَالُهُ وَوَلَدُهُٓ اِلَّا خَسَارًاۚ21
नूह ने कहा, "ऐ मेरे रब! उन्होंने मेरी अवज्ञा की, और उसका अनुसरण किया जिसके धन और जिसकी सन्तान ने उसके घाटे ही मे अभिवृद्धि की
وَمَكَرُوا مَكْرًا كُبَّارًاۚ22
"और वे बहुत बड़ी चाल चले,
وَقَالُوا لَا تَذَرُنَّ اٰلِهَتَكُمْ وَلَا تَذَرُنَّ وَدًّا وَلَا سُوَاعًاۙ وَلَا يَغُوثَ وَيَعُوقَ وَنَسْرًاۚ23
"और उन्होंने कहा, अपने इष्ट-पूज्यों के कदापि न छोड़ो और न वह वद्द को छोड़ो और न सुवा को और न यग़ूस और न यऊक़ और नस्र को
وَقَدْ اَضَلُّوا كَث۪يرًاۚ وَلَا تَزِدِ الظَّالِم۪ينَ اِلَّا ضَلَالًا24
"और उन्होंने बहुत-से लोगों को पथभ्रष्ट॥ किया है (तो तू उन्हें मार्ग न दिया) अब, तू भी ज़ालिमों की पथभ्रष्टता ही में अभिवृद्धि कर।"
مِمَّا خَط۪ٓيـَٔاتِهِمْ اُغْرِقُوا فَاُدْخِلُوا نَارًا فَلَمْ يَجِدُوا لَهُمْ مِنْ دُونِ اللّٰهِ اَنْصَارًا25
वे अपनी बड़ी ख़ताओं के कारण पानी में डूबो दिए गए, फिर आग में दाख़िल कर दिए गए, फिर वे अपने और अल्लाह के बीच आड़ बननेवाले सहायक न पा सके
وَقَالَ نُوحٌ رَبِّ لَا تَذَرْ عَلَى الْاَرْضِ مِنَ الْكَافِر۪ينَ دَيَّارًا26
और नूह ने कहा, "ऐ मेरे रब! धरती पर इनकार करनेवालों में से किसी बसनेवाले को न छोड
اِنَّكَ اِنْ تَذَرْهُمْ يُضِلُّوا عِبَادَكَ وَلَا يَلِدُٓوا اِلَّا فَاجِرًا كَفَّارًا27
"यदि तू उन्हें छोड़ देगा तो वे तेरे बन्दों को पथभ्रष्ट कर देंगे और वे दुराचारियों और बड़े अधर्मियों को ही जन्म देंगे
رَبِّ اغْفِرْ ل۪ي وَلِوَالِدَيَّ وَلِمَنْ دَخَلَ بَيْتِيَ مُؤْمِنًا وَلِلْمُؤْمِن۪ينَ وَالْمُؤْمِنَاتِۜ وَلَا تَزِدِ الظَّالِم۪ينَ اِلَّا تَبَارًا28
"ऐ मेरे रब! मुझे क्षमा कर दे और मेरे माँ-बाप को भी और हर उस व्यक्ति को भी जो मेरे घर में ईमानवाला बन कर दाख़िल हुआ और (सामान्य) ईमानवाले पुरुषों और ईमानवाली स्त्रियों को भी (क्षमा कर दे), और ज़ालिमों के विनाश को ही बढ़ा।"
72 · अल-जिन
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
قُلْ اُو۫حِيَ اِلَيَّ اَنَّهُ اسْتَمَعَ نَفَرٌ مِنَ الْجِنِّ فَقَالُٓوا اِنَّا سَمِعْنَا قُرْاٰنًا عَجَبًاۙ1
कह दो, "मेरी ओर प्रकाशना की गई है कि जिन्नों के एक गिरोह ने सुना, फिर उन्होंने कहा कि हमने एक मनभाता क़ुरआन सुना,
يَهْد۪ٓي اِلَى الرُّشْدِ فَاٰمَنَّا بِه۪ۜ وَلَنْ نُشْرِكَ بِرَبِّنَٓا اَحَدًاۙ2
"जो भलाई और सूझ-बूझ का मार्ग दिखाता है, अतः हम उसपर ईमान ले आए, और अब हम कदापि किसी को अपने रब का साझी नहीं ठहराएँगे
وَاَنَّهُ تَعَالٰى جَدُّ رَبِّنَا مَا اتَّخَذَ صَاحِبَةً وَلَا وَلَدًاۙ3
"और यह कि हमारे रब का गौरब अत्यन्त उच्च है। उसने अपने लिए न तो कोई पत्नी बनाई और न सन्तान
وَاَنَّهُ كَانَ يَقُولُ سَف۪يهُنَا عَلَى اللّٰهِ شَطَطًاۙ4
"और यह कि हममें का मूर्ख व्यक्ति अल्लाह के विषय में सत्य से बिल्कुल हटी हुई बातें कहता रहा है
وَاَنَّا ظَنَنَّٓا اَنْ لَنْ تَقُولَ الْاِنْسُ وَالْجِنُّ عَلَى اللّٰهِ كَذِبًاۙ5
"और यह कि हमने समझ रखा था कि मनुष्य और जिन्न अल्लाह के विषय में कभी झूठ नहीं बोलते
وَاَنَّهُ كَانَ رِجَالٌ مِنَ الْاِنْسِ يَعُوذُونَ بِرِجَالٍ مِنَ الْجِنِّ فَزَادُوهُمْ رَهَقًاۙ6
"और यह कि मनुष्यों में से कितने ही पुरुष ऐसे थे, जो जिन्नों में से कितने ही पुरूषों की शरण माँगा करते थे। इसप्रकार उन्होंने उन्हें (जिन्नों को) और चढ़ा दिया
وَاَنَّهُمْ ظَنُّوا كَمَا ظَنَنْتُمْ اَنْ لَنْ يَبْعَثَ اللّٰهُ اَحَدًاۙ7
"और यह कि उन्होंने गुमान किया जैसे कि तुमने गुमान किया कि अल्लाह किसी (नबी) को कदापि न उठाएगा
وَاَنَّا لَمَسْنَا السَّمَٓاءَ فَوَجَدْنَاهَا مُلِئَتْ حَرَسًا شَد۪يدًا وَشُهُبًاۙ8
"और यह कि हमने आकाश को टटोला तो उसे सख़्त पहरेदारों और उल्काओं से भरा हुआ पाया
وَاَنَّا كُنَّا نَقْعُدُ مِنْهَا مَقَاعِدَ لِلسَّمْعِۜ فَمَنْ يَسْتَمِعِ الْاٰنَ يَجِدْ لَهُ شِهَابًا رَصَدًاۙ9
"और यह कि हम उसमें बैठने के स्थानों में सुनने के लिए बैठा करते थे, किन्तु अब कोई सुनना चाहे तो वह अपने लिए घात में लगा एक उल्का पाएगा
وَاَنَّا لَا نَدْر۪ٓي اَشَرٌّ اُر۪يدَ بِمَنْ فِي الْاَرْضِ اَمْ اَرَادَ بِهِمْ رَبُّهُمْ رَشَدًاۙ10
"और यह कि हम नहीं जानते कि उन लोगों के साथ जो धरती में है बुराई का इरादा किया गया है या उनके रब ने उनके लिए भलाई और मार्गदर्शन का इरादा किय है
وَاَنَّا مِنَّا الصَّالِحُونَ وَمِنَّا دُونَ ذٰلِكَۜ كُنَّا طَرَٓائِقَ قِدَدًاۙ11
"और यह कि हममें से कुछ लोग अच्छे है और कुछ लोग उससे निम्नतर है, हम विभिन्न मार्गों पर है
وَاَنَّا ظَنَنَّٓا اَنْ لَنْ نُعْجِزَ اللّٰهَ فِي الْاَرْضِ وَلَنْ نُعْجِزَهُ هَرَبًاۙ12
"और यह कि हमने समझ लिया कि हम न धरती में कही जाकर अल्लाह के क़ाबू से निकल सकते है, और न आकाश में कहीं भागकर उसके क़ाबू से निकल सकते है
وَاَنَّا لَمَّا سَمِعْنَا الْهُدٰٓى اٰمَنَّا بِه۪ۜ فَمَنْ يُؤْمِنْ بِرَبِّه۪ فَلَا يَخَافُ بَخْسًا وَلَا رَهَقًاۙ13
"और यह कि जब हमने मार्गदर्शन की बात सुनी तो उसपर ईमान ले आए। अब तो कोई अपने रब पर ईमान लाएगा, उसे न तो किसी हक़ के मारे जाने का भय होगा और न किसी ज़ुल्म-ज़्यादती का
وَاَنَّا مِنَّا الْمُسْلِمُونَ وَمِنَّا الْقَاسِطُونَۜ فَمَنْ اَسْلَمَ فَاُو۬لٰٓئِكَ تَحَرَّوْا رَشَدًا14
"और यह कि हममें से कुछ मुस्लिम (आज्ञाकारी) है और हममें से कुछ हक़ से हटे हुए है। तो जिन्होंने आज्ञापालन का मार्ग ग्रहण कर लिया उन्होंने भलाई और सूझ-बूझ की राह ढूँढ़ ली
وَاَمَّا الْقَاسِطُونَ فَكَانُوا لِجَهَنَّمَ حَطَبًاۙ15
"रहे वे लोग जो हक़ से हटे हुए है, तो वे जहन्नम का ईधन होकर रहे।"
وَاَنْ لَوِ اسْتَقَامُوا عَلَى الطَّر۪يقَةِ لَاَسْقَيْنَاهُمْ مَٓاءً غَدَقًاۙ16
और वह प्रकाशना की गई है कि यदि वे सीधे मार्ग पर धैर्यपूर्वक चलते तो हम उन्हें पर्याप्त जल से अभिषिक्त करते,
لِنَفْتِنَهُمْ ف۪يهِۚ وَمَنْ يُعْرِضْ عَنْ ذِكْرِ رَبِّه۪ يَسْلُكْهُ عَذَابًا صَعَدًاۙ17
ताकि हम उसमें उनकी परीक्षा करें। और जो कोई अपने रब की याद से कतराएगा, तो वह उसे कठोर यातना में डाल देगा
وَاَنَّ الْمَسَاجِدَ لِلّٰهِ فَلَا تَدْعُوا مَعَ اللّٰهِ اَحَدًاۙ18
और यह कि मस्जिदें अल्लाह के लिए है। अतः अल्लाह के साथ किसी और को न पुकारो
وَاَنَّهُ لَمَّا قَامَ عَبْدُ اللّٰهِ يَدْعُوهُ كَادُوا يَكُونُونَ عَلَيْهِ لِبَدًاۜ۟19
और यह कि "जब अल्लाह का बन्दा उसे पुकारता हुआ खड़ा हुआ तो वे ऐसे लगते है कि उसपर जत्थे बनकर टूट पड़ेगे।"
قُلْ اِنَّمَٓا اَدْعُوا رَبّ۪ي وَلَٓا اُشْرِكُ بِه۪ٓ اَحَدًا20
कह दो, "मैं तो बस अपने रब ही को पुकारता हूँ, और उसके साथ किसी को साझी नहीं ठहराता।"
قُلْ اِنّ۪ي لَٓا اَمْلِكُ لَكُمْ ضَرًّا وَلَا رَشَدًا21
कह दो, "मैं तो तुम्हारे लिए न किसी हानि का अधिकार रखता हूँ और न किसी भलाई का।"
قُلْ اِنّ۪ي لَنْ يُج۪يرَن۪ي مِنَ اللّٰهِ اَحَدٌ وَلَنْ اَجِدَ مِنْ دُونِه۪ مُلْتَحَدًاۙ22
कहो, "अल्लाह के मुक़ाबले में मुझे कोई पनाह नहीं दे सकता और न मैं उससे बचकर कतराने की कोई जगह पा सकता हूँ। -
اِلَّا بَلَاغًا مِنَ اللّٰهِ وَرِسَالَاتِه۪ۜ وَمَنْ يَعْصِ اللّٰهَ وَرَسُولَهُ فَاِنَّ لَهُ نَارَ جَهَنَّمَ خَالِد۪ينَ ف۪يهَٓا اَبَدًاۜ23
"सिवाय अल्लाह की ओर से पहुँचने और उसके संदेश देने के। और जो कोई अल्लाह और उसके रसूल की अवज्ञा करेगा तो उसके लिए जहन्नम की आग है, जिसमें ऐसे लोग सदैव रहेंगे।"
حَتّٰٓى اِذَا رَاَوْا مَا يُوعَدُونَ فَسَيَعْلَمُونَ مَنْ اَضْعَفُ نَاصِرًا وَاَقَلُّ عَدَدًا24
यहाँ तक कि जब वे उस चीज़ को देख लेंगे जिसका उनसे वादा किया जाता है तो वे जान लेंगे कि कौन अपने सहायक की दृष्टि से कमज़ोर और संख्या में न्यूतर है
قُلْ اِنْ اَدْر۪ٓي اَقَر۪يبٌ مَا تُوعَدُونَ اَمْ يَجْعَلُ لَهُ رَبّ۪ٓي اَمَدًا25
कह दो, "मैं नहीं जानता कि जिस चीज़ का तुमसे वादा किया जाता है वह निकट है या मेरा रब उसके लिए लम्बी अवधि ठहराता है
عَالِمُ الْغَيْبِ فَلَا يُظْهِرُ عَلٰى غَيْبِه۪ٓ اَحَدًاۙ26
"परोक्ष का जाननेवाला वही है और वह अपने परोक्ष को किसी पर प्रकट नहीं करता,
اِلَّا مَنِ ارْتَضٰى مِنْ رَسُولٍ فَاِنَّهُ يَسْلُكُ مِنْ بَيْنِ يَدَيْهِ وَمِنْ خَلْفِه۪ رَصَدًاۙ27
सिवाय उस व्यक्ति के जिसे उसने रसूल की हैसियत से पसन्द कर लिया हो तो उसके आगे से और उसके पीछे से निगरानी की पूर्ण व्यवस्था कर देता है,
لِيَعْلَمَ اَنْ قَدْ اَبْلَغُوا رِسَالَاتِ رَبِّهِمْ وَاَحَاطَ بِمَا لَدَيْهِمْ وَاَحْصٰى كُلَّ شَيْءٍ عَدَدًا28
ताकि वह यक़ीनी बना दे कि उन्होंने अपने रब के सन्देश पहुँचा दिए और जो कुछ उनके पास है उसे वह घेरे हुए है और हर चीज़ को उसने गिन रखा है।"
73 · अल-मुज़्ज़म्मिल
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
يَٓا اَيُّهَا الْمُزَّمِّلُۙ1
ऐ कपड़े में लिपटनेवाले!
قُمِ الَّيْلَ اِلَّا قَل۪يلًاۙ2
रात को उठकर (नमाज़ में) खड़े रहा करो - सिवाय थोड़ा हिस्सा -
نِصْفَهُٓ اَوِ انْقُصْ مِنْهُ قَل۪يلًاۙ3
आधी रात
اَوْ زِدْ عَلَيْهِ وَرَتِّلِ الْقُرْاٰنَ تَرْت۪يلًاۜ4
या उससे कुछ थोड़ा कम कर लो या उससे कुछ अधिक बढ़ा लो और क़ुरआन को भली-भाँति ठहर-ठहरकर पढ़ो। -
اِنَّا سَنُلْق۪ي عَلَيْكَ قَوْلًا ثَق۪يلًاۜ5
निश्चय ही हम तुमपर एक भारी बात डालनेवाले है
اِنَّ نَاشِئَةَ الَّيْلِ هِيَ اَشَدُّ وَطْـًٔا وَاَقْوَمُ ق۪يلًاۜ6
निस्संदेह रात का उठना अत्यन्त अनुकूलता रखता है और बात भी उसमें अत्यन्त सधी हुई होती है
اِنَّ لَكَ فِي النَّهَارِ سَبْحًا طَو۪يلًاۜ7
निश्चय ही तुम्हार लिए दिन में भी (तसबीह की) बड़ी गुंजाइश है। -
وَاذْكُرِ اسْمَ رَبِّكَ وَتَبَتَّلْ اِلَيْهِ تَبْت۪يلًاۜ8
और अपने रब के नाम का ज़िक्र किया करो और सबसे कटकर उसी के हो रहो।
رَبُّ الْمَشْرِقِ وَالْمَغْرِبِ لَٓا اِلٰهَ اِلَّا هُوَ فَاتَّخِذْهُ وَك۪يلًا9
वह पूर्व और पश्चिम का रब है, उसके सिवा कोई इष्ट-पूज्य नहीं, अतः तुम उसी को अपना कार्यसाधक बना लो
وَاصْبِرْ عَلٰى مَا يَقُولُونَ وَاهْجُرْهُمْ هَجْرًا جَم۪يلًا10
और जो कुछ वे कहते है उसपर धैर्य से काम लो और भली रीति से उनसे अलग हो जाओ
وَذَرْن۪ي وَالْمُكَذِّب۪ينَ اُو۬لِي النَّعْمَةِ وَمَهِّلْهُمْ قَل۪يلًا11
और तुम मुझे और झूठलानेवाले सुख-सम्पन्न लोगों को छोड़ दो और उन्हें थोड़ी मुहलत दो
اِنَّ لَدَيْنَٓا اَنْكَالًا وَجَح۪يمًاۙ12
निश्चय ही हमारे पास बेड़ियाँ है और भड़कती हुई आग
وَطَعَامًا ذَا غُصَّةٍ وَعَذَابًا اَل۪يمًا13
और गले में अटकनेवाला भोजन है और दुखद यातना,
يَوْمَ تَرْجُفُ الْاَرْضُ وَالْجِبَالُ وَكَانَتِ الْجِبَالُ كَث۪يبًا مَه۪يلًا14
जिस दिन धरती और पहाड़ काँप उठेंगे, और पहाड़ रेत के ऐसे ढेर होकर रह जाएगे जो बिखरे जा रहे होंगे
اِنَّٓا اَرْسَلْنَٓا اِلَيْكُمْ رَسُولًا شَاهِدًا عَلَيْكُمْ كَمَٓا اَرْسَلْنَٓا اِلٰى فِرْعَوْنَ رَسُولًاۜ15
निश्चय ही हुमने तुम्हारी ओर एक रसूल तुमपर गवाह बनाकर भेजा है, जिस प्रकार हमने फ़़िरऔन की ओर एक रसूल भेजा था
فَعَصٰى فِرْعَوْنُ الرَّسُولَ فَاَخَذْنَاهُ اَخْذًا وَب۪يلًا16
किन्तु फ़िरऔन ने रसूल की अवज्ञा कि, तो हमने उसे पकड़ लिया और यह पकड़ सख़्त वबाल थी
فَكَيْفَ تَتَّقُونَ اِنْ كَفَرْتُمْ يَوْمًا يَجْعَلُ الْوِلْدَانَ ش۪يبًاۗ17
यदि तुमने इनकार किया तो उस दिन से कैसे बचोगे जो बच्चों को बूढा कर देगा?
اَلسَّمَٓاءُ مُنْفَطِرٌ بِه۪ۜ كَانَ وَعْدُهُ مَفْعُولًا18
आकाश उसके कारण फटा पड़ रहा है, उसका वादा तो पूरा ही होना है
اِنَّ هٰذِه۪ تَذْكِرَةٌۚ فَمَنْ شَٓاءَ اتَّخَذَ اِلٰى رَبِّه۪ سَب۪يلًا۟19
निश्चय ही यह एक अनुस्मृति है। अब जो चाहे अपने रब की ओर मार्ग ग्रहण कर ले
اِنَّ رَبَّكَ يَعْلَمُ اَنَّكَ تَقُومُ اَدْنٰى مِنْ ثُلُثَيِ الَّيْلِ وَنِصْفَهُ وَثُلُثَهُ وَطَٓائِفَةٌ مِنَ الَّذ۪ينَ مَعَكَۜ وَاللّٰهُ يُقَدِّرُ الَّيْلَ وَالنَّهَارَۜ عَلِمَ اَنْ لَنْ تُحْصُوهُ فَتَابَ عَلَيْكُمْ فَاقْرَؤُ۫ا مَا تَيَسَّرَ مِنَ الْقُرْاٰنِۜ عَلِمَ اَنْ سَيَكُونُ مِنْكُمْ مَرْضٰىۙ وَاٰخَرُونَ يَضْرِبُونَ فِي الْاَرْضِ يَبْتَغُونَ مِنْ فَضْلِ اللّٰهِۙ وَاٰخَرُونَ يُقَاتِلُونَ ف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِۘ فَاقْرَؤُ۫ا مَا تَيَسَّرَ مِنْهُۙ وَاَق۪يمُوا الصَّلٰوةَ وَاٰتُوا الزَّكٰوةَ وَاَقْرِضُوا اللّٰهَ قَرْضًا حَسَنًاۜ وَمَا تُقَدِّمُوا لِاَنْفُسِكُمْ مِنْ خَيْرٍ تَجِدُوهُ عِنْدَ اللّٰهِ هُوَ خَيْرًا وَاَعْظَمَ اَجْرًاۜ وَاسْتَغْفِرُوا اللّٰهَۜ اِنَّ اللّٰهَ غَفُورٌ رَح۪يمٌ20
निस्संदेह तुम्हारा रब जानता है कि तुम लगभग दो तिहाई रात, आधी रात और एक तिहाई रात तक (नमाज़ में) खड़े रहते हो, और एक गिरोंह उन लोगों में से भी जो तुम्हारे साथ है, खड़ा होता है। और अल्लाह रात और दिन की घट-बढ़ नियत करता है। उसे मालूम है कि तुम सब उसका निर्वाह न कर सकोगे, अतः उसने तुमपर दया-दृष्टि की। अब जितना क़ुरआन आसानी से हो सके पढ़ लिया करो। उसे मालूम है कि तुममे से कुछ बीमार भी होंगे, और कुछ दूसरे लोग अल्लाह के उदार अनुग्रह (रोज़ी) को ढूँढ़ते हुए धरती में यात्रा करेंगे, कुछ दूसरे लोग अल्लाह के मार्ग में युद्ध करेंगे। अतः उसमें से जितना आसानी से हो सके पढ़ लिया करो, और नमाज़ क़ायम करो और ज़कात देते रहो, और अल्लाह को ऋण दो, अच्छा ऋण। तुम जो भलाई भी अपने लिए (आगे) भेजोगे उसे अल्लाह के यहाँ अत्युत्तम और प्रतिदान की दृष्टि से बहुत बढ़कर पाओगे। और अल्लाह से माफ़ी माँगते रहो। बेशक अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है
74 · अल-मुद्दस्सिर
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
يَٓا اَيُّهَا الْمُدَّثِّرُۙ1
ऐ ओढ़ने लपेटनेवाले!
قُمْ فَاَنْذِرْۙ2
उठो, और सावधान करने में लग जाओ
وَرَبَّكَ فَكَبِّرْۙ3
और अपने रब की बड़ाई ही करो
وَثِيَابَكَ فَطَهِّرْۙ4
अपने दामन को पाक रखो
وَالرُّجْزَ فَاهْجُرْۙ5
और गन्दगी से दूर ही रहो
وَلَا تَمْنُنْ تَسْتَكْثِرُۙ6
अपनी कोशिशों को अधिक समझकर उसके क्रम को भंग न करो
وَلِرَبِّكَ فَاصْبِرْۜ7
और अपने रब के लिए धैर्य ही से काम लो
فَاِذَا نُقِرَ فِي النَّاقُورِۙ8
जब सूर में फूँक मारी जाएगी
فَذٰلِكَ يَوْمَئِذٍ يَوْمٌ عَس۪يرٌۙ9
तो जिस दिन ऐसा होगा, वह दिन बड़ा ही कठोर होगा,
عَلَى الْكَافِر۪ينَ غَيْرُ يَس۪يرٍ10
इनकार करनेवालो पर आसान न होगा
ذَرْن۪ي وَمَنْ خَلَقْتُ وَح۪يدًاۙ11
छोड़ दो मुझे और उसको जिसे मैंने अकेला पैदा किया,
وَجَعَلْتُ لَهُ مَالًا مَمْدُودًاۙ12
और उसे माल दिया दूर तक फैला हुआ,
وَبَن۪ينَ شُهُودًاۙ13
और उसके पास उपस्थित रहनेवाले बेटे दिए,
وَمَهَّدْتُ لَهُ تَمْه۪يدًاۙ14
और मैंने उसके लिए अच्छी तरह जीवन-मार्ग समतल किया
ثُمَّ يَطْمَعُ اَنْ اَز۪يدَۙ15
फिर वह लोभ रखता है कि मैं उसके लिए और अधिक दूँगा
كَلَّاۜ اِنَّهُ كَانَ لِاٰيَاتِنَا عَن۪يدًاۜ16
कदापि नहीं, वह हमारी आयतों का दुश्मन है,
سَاُرْهِقُهُ صَعُودًاۜ17
शीघ्र ही मैं उसे घेरकर कठिन चढ़ाई चढ़वाऊँगा
اِنَّهُ فَكَّرَ وَقَدَّرَۙ18
उसने सोचा और अटकल से एक बात बनाई
فَقُتِلَ كَيْفَ قَدَّرَۙ19
तो विनष्ट हो, कैसी बात बनाई!
ثُمَّ قُتِلَ كَيْفَ قَدَّرَۙ20
फिर विनष्ट हो, कैसी बात बनाई!
ثُمَّ نَظَرَۙ21
फिर नज़र दौड़ाई,
ثُمَّ عَبَسَ وَبَسَرَۙ22
फिर त्योरी चढ़ाई और मुँह बनाया,
ثُمَّ اَدْبَرَ وَاسْتَكْبَرَۙ23
फिर पीठ फेरी और घमंड किया
فَقَالَ اِنْ هٰذَٓا اِلَّا سِحْرٌ يُؤْثَرُۙ24
अन्ततः बोला, "यह तो बस एक जादू है, जो पहले से चला आ रहा है
اِنْ هٰذَٓا اِلَّا قَوْلُ الْبَشَرِۜ25
"यह तो मात्र मनुष्य की वाणी है।"
سَاُصْل۪يهِ سَقَرَ26
मैं शीघ्र ही उसे 'सक़र' (जहन्नम की आग) में झोंक दूँगा
وَمَٓا اَدْرٰيكَ مَا سَقَرُۜ27
और तुम्हें क्या पता की सक़र क्या है?
لَا تُبْق۪ي وَلَا تَذَرُۚ28
वह न तरस खाएगी और न छोड़ेगी,
لَوَّاحَةٌ لِلْبَشَرِۚ29
खाल को झुलसा देनेवाली है,
عَلَيْهَا تِسْعَةَ عَشَرَۜ30
उसपर उन्नीस (कार्यकर्ता) नियुक्त है
وَمَا جَعَلْنَٓا اَصْحَابَ النَّارِ اِلَّا مَلٰٓئِكَةًۖ وَمَا جَعَلْنَا عِدَّتَهُمْ اِلَّا فِتْنَةً لِلَّذ۪ينَ كَفَرُواۙ لِيَسْتَيْقِنَ الَّذ۪ينَ اُو۫تُوا الْكِتَابَ وَيَزْدَادَ الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا ا۪يمَانًا وَلَا يَرْتَابَ الَّذ۪ينَ اُو۫تُوا الْكِتَابَ وَالْمُؤْمِنُونَۙ وَلِيَقُولَ الَّذ۪ينَ ف۪ي قُلُوبِهِمْ مَرَضٌ وَالْكَافِرُونَ مَاذَٓا اَرَادَ اللّٰهُ بِهٰذَا مَثَلًاۜ كَذٰلِكَ يُضِلُّ اللّٰهُ مَنْ يَشَٓاءُ وَيَهْد۪ي مَنْ يَشَٓاءُۜ وَمَا يَعْلَمُ جُنُودَ رَبِّكَ اِلَّا هُوَۜ وَمَا هِيَ اِلَّا ذِكْرٰى لِلْبَشَرِ۟31
और हमने उस आग पर नियुक्त रहनेवालों को फ़रिश्ते ही बनाया है, और हमने उनकी संख्या को इनकार करनेवालों के लिए मुसीबत और आज़माइश ही बनाकर रखा है। ताकि वे लोग जिन्हें किताब प्रदान की गई थी पूर्ण विश्वास प्राप्त करें, और वे लोग जो ईमान ले आए वे ईमान में और आगे बढ़ जाएँ। और जिन लोगों को किताब प्रदान की गई वे और ईमानवाले किसी संशय मे न पड़े, और ताकि जिनके दिलों मे रोग है वे और इनकार करनेवाले कहें, "इस वर्णन से अल्लाह का क्या अभिप्राय है?" इस प्रकार अल्लाह जिसे चाहता है पथभ्रष्ट कर देता है और जिसे चाहता हैं संमार्ग प्रदान करता है। और तुम्हारे रब की सेनाओं को स्वयं उसके सिवा कोई नहीं जानता, और यह तो मनुष्य के लिए मात्र एक शिक्षा-सामग्री है
كَلَّا وَالْقَمَرِۙ32
कुछ नहीं, साक्षी है चाँद
وَالَّيْلِ اِذْ اَدْبَرَۙ33
और साक्षी है रात जबकि वह पीठ फेर चुकी,
وَالصُّبْحِ اِذَٓا اَسْفَرَۙ34
और प्रातःकाल जबकि वह पूर्णरूपेण प्रकाशित हो जाए।
اِنَّهَا لَاِحْدَى الْكُبَرِۙ35
निश्चय ही वह भारी (भयंकर) चीज़ों में से एक है,
نَذ۪يرًا لِلْبَشَرِۙ36
मनुष्यों के लिए सावधानकर्ता के रूप में,
لِمَنْ شَٓاءَ مِنْكُمْ اَنْ يَتَقَدَّمَ اَوْ يَتَاَخَّرَۜ37
तुममें से उस व्यक्ति के लिए जो आगे बढ़ना या पीछे हटना चाहे
كُلُّ نَفْسٍ بِمَا كَسَبَتْ رَه۪ينَةٌۙ38
प्रत्येक व्यक्ति जो कुछ उसने कमाया उसके बदले रेहन (गिरवी) है,
اِلَّٓا اَصْحَابَ الْيَم۪ينِۜۛ39
सिवाय दाएँवालों के
ف۪ي جَنَّاتٍۜۛ يَتَسَٓاءَلُونَۙ40
वे बाग़ों में होंगे, पूछ-ताछ कर रहे होंगे
عَنِ الْمُجْرِم۪ينَۙ41
अपराधियों के विषय में
مَا سَلَكَكُمْ ف۪ي سَقَرَ42
"तुम्हे क्या चीज़ सकंर (जहन्नम) में ले आई?"
قَالُوا لَمْ نَكُ مِنَ الْمُصَلّ۪ينَۙ43
वे कहेंगे, "हम नमाज़ अदा करनेवालों में से न थे।
وَلَمْ نَكُ نُطْعِمُ الْمِسْك۪ينَۙ44
और न हम मुहताज को खाना खिलाते थे
وَكُنَّا نَخُوضُ مَعَ الْخَٓائِض۪ينَۙ45
"और व्यर्थ बात और कठ-हुज्जती में पड़े रहनेवालों के साथ हम भी उसी में लगे रहते थे।
وَكُنَّا نُكَذِّبُ بِيَوْمِ الدّ۪ينِۙ46
और हम बदला दिए जाने के दिन को झुठलाते थे,
حَتّٰٓى اَتٰينَا الْيَق۪ينُۜ47
"यहाँ तक कि विश्वसनीय चीज़ (प्रलय-दिवस) में हमें आ लिया।"
فَمَا تَنْفَعُهُمْ شَفَاعَةُ الشَّافِع۪ينَۜ48
अतः सिफ़ारिश करनेवालों को कोई सिफ़ारिश उनको कुछ लाभ न पहुँचा सकेगी
فَمَا لَهُمْ عَنِ التَّذْكِرَةِ مُعْرِض۪ينَۙ49
आख़िर उन्हें क्या हुआ है कि वे नसीहत से कतराते है,
كَاَنَّهُمْ حُمُرٌ مُسْتَنْفِرَةٌۙ50
मानो वे बिदके हुए जंगली गधे है
فَرَّتْ مِنْ قَسْوَرَةٍۜ51
जो शेर से (डरकर) भागे है?
بَلْ يُر۪يدُ كُلُّ امْرِئٍ مِنْهُمْ اَنْ يُؤْتٰى صُحُفًا مُنَشَّرَةًۙ52
नहीं, बल्कि उनमें से प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि उसे खुली किताबें दी जाएँ
كَلَّاۜ بَلْ لَا يَخَافُونَ الْاٰخِرَةَۜ53
कदापि नहीं, बल्कि ले आख़िरत से डरते नहीं
كَلَّٓا اِنَّهُ تَذْكِرَةٌۚ54
कुछ नहीं, वह तो एक अनुस्मति है
فَمَنْ شَٓاءَ ذَكَرَهُۜ55
अब जो कोई चाहे इससे नसीहत हासिल करे,
وَمَا يَذْكُرُونَ اِلَّٓا اَنْ يَشَٓاءَ اللّٰهُۜ هُوَ اَهْلُ التَّقْوٰى وَاَهْلُ الْمَغْفِرَةِ56
और वे नसीहत हासिल नहीं करेंगे। यह और बात है कि अल्लाह ही ऐसा चाहे। वही इस योग्य है कि उसका डर रखा जाए और इस योग्य भी कि क्षमा करे
75 · अल-क़ियामा
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
لَٓا اُقْسِمُ بِيَوْمِ الْقِيٰمَةِۙ1
नहीं, मैं क़सम खाता हूँ क़ियामत के दिन की,
وَلَٓا اُقْسِمُ بِالنَّفْسِ اللَّوَّامَةِ2
और नहीं! मैं कसम खाता हूँ मलामत करनेवाली आत्मा की
اَيَحْسَبُ الْاِنْسَانُ اَلَّنْ نَجْمَعَ عِظَامَهُۜ3
क्या मनुष्य यह समझता है कि हम कदापि उसकी हड्डियों को एकत्र न करेंगे?
بَلٰى قَادِر۪ينَ عَلٰٓى اَنْ نُسَوِّيَ بَنَانَهُ4
क्यों नहीं, हम उसकी पोरों को ठीक-ठाक करने की सामर्थ्य रखते है
بَلْ يُر۪يدُ الْاِنْسَانُ لِيَفْجُرَ اَمَامَهُۚ5
बल्कि मनुष्य चाहता है कि अपने आगे ढिठाई करता रहे
يَسْـَٔلُ اَيَّانَ يَوْمُ الْقِيٰمَةِۜ6
पूछता है, "आख़िर क़ियामत का दिन कब आएगा?"
فَاِذَا بَرِقَ الْبَصَرُۙ7
तो जब निगाह चौंधिया जाएगी,
وَخَسَفَ الْقَمَرُۙ8
और चन्द्रमा को ग्रहण लग जाएगा,
وَجُمِعَ الشَّمْسُ وَالْقَمَرُۙ9
और सूर्य और चन्द्रमा इकट्ठे कर दिए जाएँगे,
يَقُولُ الْاِنْسَانُ يَوْمَئِذٍ اَيْنَ الْمَفَرُّۚ10
उस दिन मनुष्य कहेगा, "कहाँ जाऊँ भागकर?"
كَلَّا لَا وَزَرَۜ11
कुछ नहीं, कोई शरण-स्थल नहीं!
اِلٰى رَبِّكَ يَوْمَئِذٍۨ الْمُسْتَقَرُّۜ12
उस दिन तुम्हारे रब ही ओर जाकर ठहरना है
يُنَبَّؤُا الْاِنْسَانُ يَوْمَئِذٍ بِمَا قَدَّمَ وَاَخَّرَۜ13
उस दिन मनुष्य को बता दिया जाएगा जो कुछ उसने आगे बढाया और पीछे टाला
بَلِ الْاِنْسَانُ عَلٰى نَفْسِه۪ بَص۪يرَةٌۙ14
नहीं, बल्कि मनुष्य स्वयं अपने हाल पर निगाह रखता है,
وَلَوْ اَلْقٰى مَعَاذ۪يرَهُۜ15
यद्यपि उसने अपने कितने ही बहाने पेश किए हो
لَا تُحَرِّكْ بِه۪ لِسَانَكَ لِتَعْجَلَ بِه۪ۜ16
तू उसे शीघ्र पाने के लिए उसके प्रति अपनी ज़बान को न चला
اِنَّ عَلَيْنَا جَمْعَهُ وَقُرْاٰنَهُۚ17
हमारे ज़िम्मे है उसे एकत्र करना और उसका पढ़ना,
فَاِذَا قَرَاْنَاهُ فَاتَّبِعْ قُرْاٰنَهُۚ18
अतः जब हम उसे पढ़े तो उसके पठन का अनुसरण कर,
ثُمَّ اِنَّ عَلَيْنَا بَيَانَهُۜ19
फिर हमारे ज़िम्मे है उसका स्पष्टीकरण करना
كَلَّا بَلْ تُحِبُّونَ الْعَاجِلَةَۙ20
कुछ नहीं, बल्कि तुम लोग शीघ्र मिलनेवाली चीज़ (दुनिया) से प्रेम रखते हो,
وَتَذَرُونَ الْاٰخِرَةَۜ21
और आख़िरत को छोड़ रहे हो
وُجُوهٌ يَوْمَئِذٍ نَاضِرَةٌۙ22
किनते ही चहरे उस दिन तरो ताज़ा और प्रफुल्लित होंगे,
اِلٰى رَبِّهَا نَاظِرَةٌۚ23
अपने रब की ओर देख रहे होंगे।
وَوُجُوهٌ يَوْمَئِذٍ بَاسِرَةٌۙ24
और कितने ही चेहरे उस दिन उदास और बिगड़े हुए होंगे,
تَظُنُّ اَنْ يُفْعَلَ بِهَا فَاقِرَةٌۜ25
समझ रहे होंगे कि उनके साथ कमर तोड़ देनेवाला मामला किया जाएगा
كَلَّٓا اِذَا بَلَغَتِ التَّرَاقِيَۙ26
कुछ नहीं, जब प्राण कंठ को आ लगेंगे,
وَق۪يلَ مَنْ۔ رَاقٍۙ27
और कहा जाएगा, "कौन है झाड़-फूँक करनेवाला?"
وَظَنَّ اَنَّهُ الْفِرَاقُۙ28
और वह समझ लेगा कि वह जुदाई (का समय) है
وَالْتَفَّتِ السَّاقُ بِالسَّاقِۙ29
और पिंडली से पिंडली लिपट जाएगी,
اِلٰى رَبِّكَ يَوْمَئِذٍۨ الْمَسَاقُۜ۟30
तुम्हारे रब की ओर उस दिन प्रस्थान होगा
فَلَا صَدَّقَ وَلَا صَلّٰىۙ31
किन्तु उसने न तो सत्य माना और न नमाज़ अदा की,
وَلٰكِنْ كَذَّبَ وَتَوَلّٰىۙ32
लेकिन झुठलाया और मुँह मोड़ा,
ثُمَّ ذَهَبَ اِلٰٓى اَهْلِه۪ يَتَمَطّٰىۜ33
फिर अकड़ता हुआ अपने लोगों की ओर चल दिया
اَوْلٰى لَكَ فَاَوْلٰىۙ34
अफ़सोस है तुझपर और अफ़सोस है!
ثُمَّ اَوْلٰى لَكَ فَاَوْلٰىۜ35
फिर अफ़सोस है तुझपर और अफ़सोस है!
اَيَحْسَبُ الْاِنْسَانُ اَنْ يُتْرَكَ سُدًىۜ36
क्या मनुष्य समझता है कि वह यूँ ही स्वतंत्र छोड़ दिया जाएगा?
اَلَمْ يَكُ نُطْفَةً مِنْ مَنِيٍّ يُمْنٰىۙ37
क्या वह केवल टपकाए हुए वीर्य की एक बूँद न था?
ثُمَّ كَانَ عَلَقَةً فَخَلَقَ فَسَوّٰىۙ38
फिर वह रक्त की एक फुटकी हुआ, फिर अल्लाह ने उसे रूप दिया और उसके अंग-प्रत्यंग ठीक-ठाक किए
فَجَعَلَ مِنْهُ الزَّوْجَيْنِ الذَّكَرَ وَالْاُنْثٰىۜ39
और उसकी दो जातियाँ बनाई - पुरुष और स्त्री
اَلَيْسَ ذٰلِكَ بِقَادِرٍ عَلٰٓى اَنْ يُحْيِيَ الْمَوْتٰى40
क्या उसे वह सामर्थ्य प्राप्त- नहीं कि वह मुर्दों को जीवित कर दे?
76 · अल-इंसान
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
هَلْ اَتٰى عَلَى الْاِنْسَانِ ح۪ينٌ مِنَ الدَّهْرِ لَمْ يَكُنْ شَيْـًٔا مَذْكُورًا1
क्या मनुष्य पर काल-खंड का ऐसा समय भी बीता है कि वह कोई ऐसी चीज़ न था जिसका उल्लेख किया जाता?
اِنَّا خَلَقْنَا الْاِنْسَانَ مِنْ نُطْفَةٍ اَمْشَاجٍۗ نَبْتَل۪يهِ فَجَعَلْنَاهُ سَم۪يعًا بَص۪يرًا2
हमने मनुष्य को एक मिश्रित वीर्य से पैदा किया, उसे उलटते-पलटते रहे, फिर हमने उसे सुनने और देखनेवाला बना दिया
اِنَّا هَدَيْنَاهُ السَّب۪يلَ اِمَّا شَاكِرًا وَاِمَّا كَفُورًا3
हमने उसे मार्ग दिखाया, अब चाहे वह कृतज्ञ बने या अकृतज्ञ
اِنَّٓا اَعْتَدْنَا لِلْكَافِر۪ينَ سَلَاسِلَا۬ وَاَغْلَالًا وَسَع۪يرًا4
हमने इनकार करनेवालों के लिए ज़जीरें और तौक़ और भड़कती हुई आग तैयार कर रखी है
اِنَّ الْاَبْرَارَ يَشْرَبُونَ مِنْ كَاْسٍ كَانَ مِزَاجُهَا كَافُورًاۚ5
निश्चय ही वफ़ादार लोग ऐसे जाम से पिएँगे जिसमें काफ़ूर का मिश्रण होगा,
عَيْنًا يَشْرَبُ بِهَا عِبَادُ اللّٰهِ يُفَجِّرُونَهَا تَفْج۪يرًا6
उस स्रोत का क्या कहना! जिस पर बैठकर अल्लाह के बन्दे पिएँगे, इस तरह कि उसे बहा-बहाकर (जहाँ चाहेंगे) ले जाएँगे
يُوفُونَ بِالنَّذْرِ وَيَخَافُونَ يَوْمًا كَانَ شَرُّهُ مُسْتَط۪يرًا7
वे नज़र (मन्नत) पूरी करते है और उस दिन से डरते है जिसकी आपदा व्यापक होगी,
وَيُطْعِمُونَ الطَّعَامَ عَلٰى حُبِّه۪ مِسْك۪ينًا وَيَت۪يمًا وَاَس۪يرًا8
और वे मुहताज, अनाथ और क़ैदी को खाना उसकी चाहत रखते हुए खिलाते है,
اِنَّمَا نُطْعِمُكُمْ لِوَجْهِ اللّٰهِ لَا نُر۪يدُ مِنْكُمْ جَزَٓاءً وَلَا شُكُورًا9
"हम तो केवल अल्लाह की प्रसन्नता के लिए तुम्हें खिलाते है, तुमसे न कोई बदला चाहते है और न कृतज्ञता ज्ञापन
اِنَّا نَخَافُ مِنْ رَبِّنَا يَوْمًا عَبُوسًا قَمْطَر۪يرًا10
"हमें तो अपने रब की ओर से एक ऐसे दिन का भय है जो त्योरी पर बल डाले हुए अत्यन्त क्रूर होगा।"
فَوَقٰيهُمُ اللّٰهُ شَرَّ ذٰلِكَ الْيَوْمِ وَلَقّٰيهُمْ نَضْرَةً وَسُرُورًاۚ11
अतः अल्लाह ने उस दिन की बुराई से बचा लिया और उन्हें ताज़गी और ख़ुशी प्रदान की,
وَجَزٰيهُمْ بِمَا صَبَرُوا جَنَّةً وَحَر۪يرًاۙ12
और जो उन्होंने धैर्य से काम लिया, उसके बदले में उन्हें जन्नत और रेशमी वस्त्र प्रदान किया
مُتَّكِـ۪ٔينَ ف۪يهَا عَلَى الْاَرَٓائِكِۚ لَا يَرَوْنَ ف۪يهَا شَمْسًا وَلَا زَمْهَر۪يرًاۚ13
उसमें वे तख़्तों पर टेक लगाए होंगे, वे उसमें न तो सख़्त धूप देखेंगे औ न सख़्त ठंड़
وَدَانِيَةً عَلَيْهِمْ ظِلَالُهَا وَذُلِّلَتْ قُطُوفُهَا تَذْل۪يلًا14
और उस (बाग़) के साए उनपर झुके होंगे और उसके फलों के गुच्छे बिलकुल उनके वश में होंगे
وَيُطَافُ عَلَيْهِمْ بِاٰنِيَةٍ مِنْ فِضَّةٍ وَاَكْوَابٍ كَانَتْ قَوَار۪يرَاۙ15
और उनके पास चाँदी के बरतन ग़र्दिश में होंगे और प्याले
قَوَار۪يرَ مِنْ فِضَّةٍ قَدَّرُوهَا تَقْد۪يرًا16
जो बिल्कुल शीशे हो रहे होंगे, शीशे भी चाँदी के जो ठीक अन्दाज़े करके रखे गए होंगे
وَيُسْقَوْنَ ف۪يهَا كَاْسًا كَانَ مِزَاجُهَا زَنْجَب۪يلًاۚ17
और वहाँ वे एक और जाम़ पिएँगे जिसमें सोंठ का मिश्रण होगा
عَيْنًا ف۪يهَا تُسَمّٰى سَلْسَب۪يلًا18
क्या कहना उस स्रोत का जो उसमें होगा, जिसका नाम सल-सबील है
وَيَطُوفُ عَلَيْهِمْ وِلْدَانٌ مُخَلَّدُونَۚ اِذَا رَاَيْتَهُمْ حَسِبْتَهُمْ لُؤْلُؤً۬ا مَنْثُورًا19
उनकी सेवा में ऐसे किशोर दौड़ते रहे होंगे जो सदैव किशोर ही रहेंगे। जब तुम उन्हें देखोगे तो समझोगे कि बिखरे हुए मोती है
وَاِذَا رَاَيْتَ ثَمَّ رَاَيْتَ نَع۪يمًا وَمُلْكًا كَب۪يرًا20
जब तुम वहाँ देखोगे तो तुम्हें बड़ी नेमत और विशाल राज्य दिखाई देगा
عَالِيَهُمْ ثِيَابُ سُنْدُسٍ خُضْرٌ وَاِسْتَبْرَقٌۘ وَحُلُّٓوا اَسَاوِرَ مِنْ فِضَّةٍۚ وَسَقٰيهُمْ رَبُّهُمْ شَرَابًا طَهُورًا21
उनके ऊपर हरे बारीक हरे बारीक रेशमी वस्त्र और गाढ़े रेशमी कपड़े होंगे, और उन्हें चाँदी के कंगन पहनाए जाएँगे और उनका रब उन्हें पवित्र पेय पिलाएगा
اِنَّ هٰذَا كَانَ لَكُمْ جَزَٓاءً وَكَانَ سَعْيُكُمْ مَشْكُورًا۟22
"यह है तुम्हारा बदला और तुम्हारा प्रयास क़द्र करने के योग्य है।"
اِنَّا نَحْنُ نَزَّلْنَا عَلَيْكَ الْقُرْاٰنَ تَنْز۪يلًاۚ23
निश्चय ही हमने अत्यन्त व्यवस्थित ढंग से तुमपर क़ुरआन अवतरित किया है;
فَاصْبِرْ لِحُكْمِ رَبِّكَ وَلَا تُطِعْ مِنْهُمْ اٰثِمًا اَوْ كَفُورًاۚ24
अतः अपने रब के हुक्म और फ़ैसले के लिए धैर्य से काम लो और उनमें से किसी पापी या कृतघ्न का आज्ञापालन न करना
وَاذْكُرِ اسْمَ رَبِّكَ بُكْرَةً وَاَص۪يلًاۚ25
और प्रातःकाल और संध्या समय अपने रब के नाम का स्मरण करो
وَمِنَ الَّيْلِ فَاسْجُدْ لَهُ وَسَبِّحْهُ لَيْلًا طَو۪يلًا26
और रात के कुछ हिस्से में भी उसे सजदा करो, लम्बी-लम्बी रात तक उसकी तसबीह करते रहो
اِنَّ هٰٓؤُ۬لَٓاءِ يُحِبُّونَ الْعَاجِلَةَ وَيَذَرُونَ وَرَٓاءَهُمْ يَوْمًا ثَق۪يلًا27
निस्संदेह ये लोग शीघ्र प्राप्त होनेवाली चीज़ (संसार) से प्रेम रखते है और एक भारी दिन को अपने परे छोड़ रह है
نَحْنُ خَلَقْنَاهُمْ وَشَدَدْنَٓا اَسْرَهُمْۚ وَاِذَا شِئْنَا بَدَّلْنَٓا اَمْثَالَهُمْ تَبْد۪يلًا28
हमने उन्हें पैदा किया और उनके जोड़-बन्द मज़बूत किेए और हम जब चाहे उन जैसों को पूर्णतः बदल दें
اِنَّ هٰذِه۪ تَذْكِرَةٌۚ فَمَنْ شَٓاءَ اتَّخَذَ اِلٰى رَبِّه۪ سَب۪يلًا29
निश्चय ही यह एक अनुस्मृति है, अब जो चाहे अपने रब की ओर मार्ग ग्रहण कर ले
وَمَا تَشَٓاؤُ۫نَ اِلَّٓا اَنْ يَشَٓاءَ اللّٰهُۜ اِنَّ اللّٰهَ كَانَ عَل۪يمًا حَك۪يمًاۗ30
और तुम नहीं चाह सकते सिवाय इसके कि अल्लाह चाहे। निस्संदेह अल्लाह सर्वज्ञ, तत्वदर्शी है
يُدْخِلُ مَنْ يَشَٓاءُ ف۪ي رَحْمَتِه۪ۜ وَالظَّالِم۪ينَ اَعَدَّ لَهُمْ عَذَابًا اَل۪يمًا31
वह जिसे चाहता है अपनी दयालुता में दाख़िल करता है। रहे ज़ालिम, तो उनके लिए उसने दुखद यातना तैयार कर रखी है
77 · अल-मुरसालात
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
وَالْمُرْسَلَاتِ عُرْفًاۙ1
साक्षी है वे (हवाएँ) जिनकी चोटी छोड़ दी जाती है
فَالْعَاصِفَاتِ عَصْفًاۙ2
फिर ख़ूब तेज़ हो जाती है,
وَالنَّاشِرَاتِ نَشْرًاۙ3
और (बादलों को) उठाकर फैलाती है,
فَالْفَارِقَاتِ فَرْقًاۙ4
फिर मामला करती है अलग-अलग,
فَالْمُلْقِيَاتِ ذِكْرًاۙ5
फिर पेश करती है याददिहानी
عُذْرًا اَوْ نُذْرًاۙ6
इल्ज़ाम उतारने या चेतावनी देने के लिए,
اِنَّمَا تُوعَدُونَ لَوَاقِعٌۜ7
निस्संदेह जिसका वादा तुमसे किया जा रहा है वह निश्चित ही घटित होकर रहेगा
فَاِذَا النُّجُومُ طُمِسَتْۙ8
अतः जब तारे विलुप्त (प्रकाशहीन) हो जाएँगे,
وَاِذَا السَّمَٓاءُ فُرِجَتْۙ9
और जब आकाश फट जाएगा
وَاِذَا الْجِبَالُ نُسِفَتْۙ10
और पहाड़ चूर्ण-विचूर्ण होकर बिखर जाएँगे;
وَاِذَا الرُّسُلُ اُقِّتَتْۜ11
और जब रसूलों का हाल यह होगा कि उन का समय नियत कर दिया गया होगा -
لِاَيِّ يَوْمٍ اُجِّلَتْۜ12
किस दिन के लिए वे टाले गए है?
لِيَوْمِ الْفَصْلِۚ13
फ़ैसले के दिन के लिए
وَمَٓا اَدْرٰيكَ مَا يَوْمُ الْفَصْلِۜ14
और तुम्हें क्या मालूम कि वह फ़ैसले का दिन क्या है? -
وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِلْمُكَذِّب۪ينَ15
तबाही है उस दिन झूठलाने-वालों की!
اَلَمْ نُهْلِكِ الْاَوَّل۪ينَۜ16
क्या ऐसा नहीं हुआ कि हमने पहलों को विनष्ट किया?
ثُمَّ نُتْبِعُهُمُ الْاٰخِر۪ينَ17
फिर उन्हीं के पीछे बादवालों को भी लगाते रहे?
كَذٰلِكَ نَفْعَلُ بِالْمُجْرِم۪ينَ18
अपराधियों के साथ हम ऐसा ही करते है
وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِلْمُكَذِّب۪ينَ19
तबाही है उस दिन झुठलानेवालो की!
اَلَمْ نَخْلُقْكُمْ مِنْ مَٓاءٍ مَه۪ينٍۙ20
क्या ऐस नहीं है कि हमने तुम्हे तुच्छ जल से पैदा किया,
فَجَعَلْنَاهُ ف۪ي قَرَارٍ مَك۪ينٍۙ21
फिर हमने उसे एक सुरक्षित टिकने की जगह रखा,
اِلٰى قَدَرٍ مَعْلُومٍۙ22
एक ज्ञात और निश्चित अवधि तक?
فَقَدَرْنَاۗ فَنِعْمَ الْقَادِرُونَ23
फिर हमने अन्दाजा ठहराया, तो हम क्या ही अच्छा अन्दाज़ा ठहरानेवाले है
وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِلْمُكَذِّب۪ينَ24
तबाही है उस दिन झूठलानेवालों की!
اَلَمْ نَجْعَلِ الْاَرْضَ كِفَاتًاۙ25
क्या ऐसा नहीं है कि हमने धरती को समेट रखनेवाली बनाया,
اَحْيَٓاءً وَاَمْوَاتًاۙ26
ज़िन्दों को भी और मुर्दों को भी,
وَجَعَلْنَا ف۪يهَا رَوَاسِيَ شَامِخَاتٍ وَاَسْقَيْنَاكُمْ مَٓاءً فُرَاتًاۜ27
और उसमें ऊँचे-ऊँचे पहाड़ जमाए और तुम्हें मीठा पानी पिलाया?
وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِلْمُكَذِّب۪ينَ28
तबाही है उस दिन झुठलानेवालों की!
اِنْطَلِقُٓوا اِلٰى مَا كُنْتُمْ بِه۪ تُكَذِّبُونَۚ29
चलो उस चीज़ की ओर जिसे तुम झुठलाते रहे हो!
اِنْطَلِقُٓوا اِلٰى ظِلٍّ ذ۪ي ثَلٰثِ شُعَبٍۙ30
चलो तीन शाखाओंवाली छाया की ओर,
لَا ظَل۪يلٍ وَلَا يُغْن۪ي مِنَ اللَّهَبِۜ31
जिसमें न छाँव है और न वह अग्नि-ज्वाला से बचा सकती है
اِنَّهَا تَرْم۪ي بِشَرَرٍ كَالْقَصْرِۚ32
निस्संदेह वे (ज्वालाएँ) महल जैसी (ऊँची) चिंगारियाँ फेंकती है
كَاَنَّهُ جِمَالَتٌ صُفْرٌۜ33
मानो वे पीले ऊँट हैं!
وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِلْمُكَذِّب۪ينَ34
तबाही है उस झुठलानेवालों की!
هٰذَا يَوْمُ لَا يَنْطِقُونَۙ35
यह वह दिन है कि वे कुछ बोल नहीं रहे है,
وَلَا يُؤْذَنُ لَهُمْ فَيَعْتَذِرُونَ36
तो कोई उज़ पेश करें, (बात यह है कि) उन्हें बोलने की अनुमति नहीं दी जा रही है
وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِلْمُكَذِّب۪ينَ37
तबाही है उस दिन झुठलानेवालों की
هٰذَا يَوْمُ الْفَصْلِۚ جَمَعْنَاكُمْ وَالْاَوَّل۪ينَ38
"यह फ़ैसले का दिन है, हमने तुम्हें भी और पहलों को भी इकट्ठा कर दिया
فَاِنْ كَانَ لَكُمْ كَيْدٌ فَك۪يدُونِ39
"अब यदि तुम्हारे पास कोई चाल है तो मेरे विरुद्ध चलो।"
وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِلْمُكَذِّب۪ينَ۟40
तबाही है उस दिन झुठलानेवालो की!
اِنَّ الْمُتَّق۪ينَ ف۪ي ظِلَالٍ وَعُيُونٍۙ41
निस्संदेह डर रखनेवाले छाँवों और स्रोतों में है,
وَفَوَاكِهَ مِمَّا يَشْتَهُونَۜ42
और उन फलों के बीच जो वे चाहे
كُلُوا وَاشْرَبُوا هَن۪ٓيـًٔا بِمَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ43
"खाओ-पियो मज़े से, उस कर्मों के बदले में जो तुम करते रहे हो।"
اِنَّا كَذٰلِكَ نَجْزِي الْمُحْسِن۪ينَ44
निश्चय ही उत्तमकारों को हम ऐसा ही बदला देते है
وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِلْمُكَذِّب۪ينَ45
तबाही है उस दिन झुठलानेवालों की!
كُلُوا وَتَمَتَّعُوا قَل۪يلًا اِنَّكُمْ مُجْرِمُونَ46
"खा लो और मज़े कर लो थोड़ा-सा, वास्तव में तुम अपराधी हो!"
وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِلْمُكَذِّب۪ينَ47
तबाही है उस दिन झुठलानेवालों की!
وَاِذَا ق۪يلَ لَهُمُ ارْكَعُوا لَا يَرْكَعُونَ48
जब उनसे कहा जाता है कि "झुको! तो नहीं झुकते।"
وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِلْمُكَذِّب۪ينَ49
तबाही है उस दिन झुठलानेवालों की!
فَبِاَيِّ حَد۪يثٍ بَعْدَهُ يُؤْمِنُونَ50
अब आख़िर इसके पश्चात किस वाणी पर वे ईमान लाएँगे?