7. जुज़ - कुरान पढ़ें

7. जुज़
5 · अल-माइदा
لَتَجِدَنَّ اَشَدَّ النَّاسِ عَدَاوَةً لِلَّذ۪ينَ اٰمَنُوا الْيَهُودَ وَالَّذ۪ينَ اَشْرَكُواۚ وَلَتَجِدَنَّ اَقْرَبَهُمْ مَوَدَّةً لِلَّذ۪ينَ اٰمَنُوا الَّذ۪ينَ قَالُٓوا اِنَّا نَصَارٰىۜ ذٰلِكَ بِاَنَّ مِنْهُمْ قِسّ۪يس۪ينَ وَرُهْبَانًا وَاَنَّهُمْ لَا يَسْتَكْبِرُونَ82
तुम ईमानवालों का शत्रु सब लोगों से बढ़कर यहूदियों और बहुदेववादियों को पाओगे। और ईमान लानेवालो के लिए मित्रता में सबसे निकट उन लोगों को पाओगे, जिन्होंने कहा कि 'हम नसारा हैं।' यह इस कारण है कि उनमें बहुत-से धर्मज्ञाता और संसार-त्यागी सन्त पाए जाते हैं। और इस कारण कि वे अहंकार नहीं करते
وَاِذَا سَمِعُوا مَٓا اُنْزِلَ اِلَى الرَّسُولِ تَرٰٓى اَعْيُنَهُمْ تَف۪يضُ مِنَ الدَّمْعِ مِمَّا عَرَفُوا مِنَ الْحَقِّۚ يَقُولُونَ رَبَّنَٓا اٰمَنَّا فَاكْتُبْنَا مَعَ الشَّاهِد۪ينَ83
जब वे उसे सुनते है जो रसूल पर अवतरित हुआ तो तुम देखते हो कि उनकी आँखे आँसुओ से छलकने लगती है। इसका कारण यह है कि उन्होंने सत्य को पहचान लिया। वे कहते हैं, "हमारे रब! हम ईमान ले आए। अतएव तू हमारा नाम गवाही देनेवालों में लिख ले
وَمَا لَنَا لَا نُؤْمِنُ بِاللّٰهِ وَمَا جَٓاءَنَا مِنَ الْحَقِّۙ وَنَطْمَعُ اَنْ يُدْخِلَنَا رَبُّنَا مَعَ الْقَوْمِ الصَّالِح۪ينَ84
"और हम अल्लाह पर और जो सत्य हमारे पास पहुँचा है उसपर ईमान क्यों न लाएँ, जबकि हमें आशा है कि हमारा रब हमें अच्छे लोगों के साथ (जन्नत में) प्रविष्ट, करेगा।"
فَاَثَابَهُمُ اللّٰهُ بِمَا قَالُوا جَنَّاتٍ تَجْر۪ي مِنْ تَحْتِهَا الْاَنْهَارُ خَالِد۪ينَ ف۪يهَاۜ وَذٰلِكَ جَزَٓاءُ الْمُحْسِن۪ينَ85
फिर अल्लाह ने उनके इस कथन के कारण उन्हें ऐसे बाग़ प्रदान किए, जिनके नीचे नहरें बहती है, जिनमें वे सदैव रहेंगे। और यही सत्कर्मी लोगो का बदला है
وَالَّذ۪ينَ كَفَرُوا وَكَذَّبُوا بِاٰيَاتِنَٓا اُو۬لٰٓئِكَ اَصْحَابُ الْجَح۪يمِ۟86
रहे वे लोग जिन्होंने इनकार किया और हमारी आयतों को झुठलाया, वे भड़कती आग (में पड़ने) वाले है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لَا تُحَرِّمُوا طَيِّبَاتِ مَٓا اَحَلَّ اللّٰهُ لَكُمْ وَلَا تَعْتَدُواۜ اِنَّ اللّٰهَ لَا يُحِبُّ الْمُعْتَد۪ينَ87
ऐ ईमान लानेवालो! जो अच्छी पाक चीज़े अल्लाह ने तुम्हारे लिए हलाल की है, उन्हें हराम न कर लो और हद से आगे न बढ़ो। निश्चय ही अल्लाह को वे लोग प्रिय नहीं है, जो हद से आगे बढ़ते है
وَكُلُوا مِمَّا رَزَقَكُمُ اللّٰهُ حَلَالًا طَيِّبًاۖ وَاتَّقُوا اللّٰهَ الَّذ۪ٓي اَنْتُمْ بِه۪ مُؤْمِنُونَ88
जो कुछ अल्लाह ने हलाल और पाक रोज़ी तुम्हें ही है, उसे खाओ और अल्लाह का डर रखो, जिसपर तुम ईमान लाए हो
لَا يُؤَاخِذُكُمُ اللّٰهُ بِاللَّغْوِ ف۪ٓي اَيْمَانِكُمْ وَلٰكِنْ يُؤَاخِذُكُمْ بِمَا عَقَّدْتُمُ الْاَيْمَانَۚ فَكَفَّارَتُهُٓ اِطْعَامُ عَشَرَةِ مَسَاك۪ينَ مِنْ اَوْسَطِ مَا تُطْعِمُونَ اَهْل۪يكُمْ اَوْ كِسْوَتُهُمْ اَوْ تَحْر۪يرُ رَقَبَةٍۜ فَمَنْ لَمْ يَجِدْ فَصِيَامُ ثَلٰثَةِ اَيَّامٍۜ ذٰلِكَ كَفَّارَةُ اَيْمَانِكُمْ اِذَا حَلَفْتُمْۜ وَاحْفَظُٓوا اَيْمَانَكُمْۜ كَذٰلِكَ يُبَيِّنُ اللّٰهُ لَكُمْ اٰيَاتِه۪ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ89
तुम्हारी उन क़समों पर अल्लाह तुम्हें नहीं पकड़ता जो यूँ ही असावधानी से ज़बान से निकल जाती है। परन्तु जो तुमने पक्की क़समें खाई हों, उनपर वह तुम्हें पकड़ेगा। तो इसका प्रायश्चित दस मुहताजों को औसत दर्जें का खाना खिला देना है, जो तुम अपने बाल-बच्चों को खिलाते हो या फिर उन्हें कपड़े पहनाना या एक ग़ुलाम आज़ाद करना होगा। और जिसे इसकी सामर्थ्य न हो, तो उसे तीन दिन के रोज़े रखने होंगे। यह तुम्हारी क़समों का प्रायश्चित है, जबकि तुम क़सम खा बैठो। तुम अपनी क़समों की हिफ़ाजत किया करो। इस प्रकार अल्लाह अपनी आयतें तुम्हारे सामने खोल-खोलकर बयान करता है, ताकि तुम कृतज्ञता दिखलाओ
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اِنَّمَا الْخَمْرُ وَالْمَيْسِرُ وَالْاَنْصَابُ وَالْاَزْلَامُ رِجْسٌ مِنْ عَمَلِ الشَّيْطَانِ فَاجْتَنِبُوهُ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ90
ऐ ईमान लानेवालो! ये शराब और जुआ और देवस्थान और पाँसे तो गन्दे शैतानी काम है। अतः तुम इनसे अलग रहो, ताकि तुम सफल हो
اِنَّمَا يُر۪يدُ الشَّيْطَانُ اَنْ يُوقِعَ بَيْنَكُمُ الْعَدَاوَةَ وَالْبَغْضَٓاءَ فِي الْخَمْرِ وَالْمَيْسِرِ وَيَصُدَّكُمْ عَنْ ذِكْرِ اللّٰهِ وَعَنِ الصَّلٰوةِۚ فَهَلْ اَنْتُمْ مُنْتَهُونَ91
शैतान तो बस यही चाहता है कि शराब और जुए के द्वारा तुम्हारे बीच शत्रुता और द्वेष पैदा कर दे और तुम्हें अल्लाह की याद से और नमाज़ से रोक दे, तो क्या तुम बाज़ न आओगे?
وَاَط۪يعُوا اللّٰهَ وَاَط۪يعُوا الرَّسُولَ وَاحْذَرُواۚ فَاِنْ تَوَلَّيْتُمْ فَاعْلَمُٓوا اَنَّمَا عَلٰى رَسُولِنَا الْبَلَاغُ الْمُب۪ينُ92
अल्लाह की आज्ञा का पालन करो और रसूल की आज्ञा का पालन करो और बचते रहो, किन्तु यदि तुमने मुँह मोड़ा तो जान लो कि हमारे रसूल पर केवल स्पष्ट रूप से (संदेश) पहुँचा देने की ज़िम्मेदारी है
لَيْسَ عَلَى الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ جُنَاحٌ ف۪يمَا طَعِمُٓوا اِذَا مَا اتَّقَوْا وَاٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ ثُمَّ اتَّقَوْا وَاٰمَنُوا ثُمَّ اتَّقَوْا وَاَحْسَنُواۜ وَاللّٰهُ يُحِبُّ الْمُحْسِن۪ينَ۟93
जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए, वे पहले जो कुछ खा-पी चुके उसके लिए उनपर कोई गुनाह नहीं; जबकि वे डर रखें और ईमान पर क़ायम रहें और अच्छे कर्म करें। फिर डर रखें और ईमान लाए, फिर डर रखे और अच्छे से अच्छा कर्म करें। अल्लाह सत्कर्मियों से प्रेम करता है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لَيَبْلُوَنَّكُمُ اللّٰهُ بِشَيْءٍ مِنَ الصَّيْدِ تَنَالُهُٓ اَيْد۪يكُمْ وَرِمَاحُكُمْ لِيَعْلَمَ اللّٰهُ مَنْ يَخَافُهُ بِالْغَيْبِۚ فَمَنِ اعْتَدٰى بَعْدَ ذٰلِكَ فَلَهُ عَذَابٌ اَل۪يمٌ94
ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह उस शिकार के द्वारा तुम्हारी अवश्य परीक्षा लेगा जिस तक तुम्हारे हाथ और नेज़े पहुँच सकें, ताकि अल्लाह यह जान ले कि उससे बिन देखे कौन डरता है। फिर इसके पश्चात जिसने ज़्यादती की, उसके लिए दुखद यातना है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لَا تَقْتُلُوا الصَّيْدَ وَاَنْتُمْ حُرُمٌۜ وَمَنْ قَتَلَهُ مِنْكُمْ مُتَعَمِّدًا فَجَزَٓاءٌ مِثْلُ مَا قَتَلَ مِنَ النَّعَمِ يَحْكُمُ بِه۪ ذَوَا عَدْلٍ مِنْكُمْ هَدْيًا بَالِغَ الْكَعْبَةِ اَوْ كَفَّارَةٌ طَعَامُ مَسَاك۪ينَ اَوْ عَدْلُ ذٰلِكَ صِيَامًا لِيَذُوقَ وَبَالَ اَمْرِه۪ۜ عَفَا اللّٰهُ عَمَّا سَلَفَۜ وَمَنْ عَادَ فَيَنْتَقِمُ اللّٰهُ مِنْهُۜ وَاللّٰهُ عَز۪يزٌ ذُو انْتِقَامٍ95
ऐ ईमान लानेवालो! इहराम की हालत में तुम शिकार न मारो। तुम में जो कोई जान-बूझकर उसे मारे, तो उसने जो जानवर मारा हो, चौपायों में से उसी जैसा एक जानवर - जिसका फ़ैसला तुम्हारे दो न्यायप्रिय व्यक्ति कर दें - काबा पहुँचाकर क़ुरबान किया जाए, या प्रायश्चित के रूप में मुहताजों को भोजन कराना होगा या उसके बराबर रोज़े रखने होंगे, ताकि वह अपने किए का मज़ा चख ले। जो पहले हो चुका उसे अल्लाह ने क्षमा कर दिया; परन्तु जिस किसी ने फिर ऐसा किया तो अल्लाह उससे बदला लेगा। अल्लाह प्रभुत्वशाली, बदला लेनेवाला है
اُحِلَّ لَكُمْ صَيْدُ الْبَحْرِ وَطَعَامُهُ مَتَاعًا لَكُمْ وَلِلسَّيَّارَةِۚ وَحُرِّمَ عَلَيْكُمْ صَيْدُ الْبَرِّ مَا دُمْتُمْ حُرُمًاۜ وَاتَّقُوا اللّٰهَ الَّذ۪ٓي اِلَيْهِ تُحْشَرُونَ96
तुम्हारे लिए जल की शिकार और उसका खाना हलाल है कि तुम उससे फ़ायदा उठाओ और मुसाफ़िर भी। किन्तु थलीय शिकार जब तक तुम इहराम में हो, तुमपर हराम है। और अल्लाह से डरते रहो, जिसकी ओर तुम इकट्ठा होगे
جَعَلَ اللّٰهُ الْكَعْبَةَ الْبَيْتَ الْحَرَامَ قِيَامًا لِلنَّاسِ وَالشَّهْرَ الْحَرَامَ وَالْهَدْيَ وَالْقَلَٓائِدَۜ ذٰلِكَ لِتَعْلَمُٓوا اَنَّ اللّٰهَ يَعْلَمُ مَا فِي السَّمٰوَاتِ وَمَا فِي الْاَرْضِ وَاَنَّ اللّٰهَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَل۪يمٌ97
अल्लाह ने आदरणीय घर काबा को लोगों के लिए क़ायम रहने का साधन बनाया और आदरणीय महीनों और क़ुरबानी के जानबरों और उन जानवरों को भी जिनके गले में पट्टे बँधे हो, यह इसलिए कि तुम जान लो कि अल्लाह जानता है जो कुछ आकाशों में है और जो कुछ धरती में है। और यह कि अल्लाह हर चीज़ से अवगत है
اِعْلَمُٓوا اَنَّ اللّٰهَ شَد۪يدُ الْعِقَابِ وَاَنَّ اللّٰهَ غَفُورٌ رَح۪يمٌۜ98
जान लो अल्लाह कठोर दड देनेवाला है और यह कि अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है
مَا عَلَى الرَّسُولِ اِلَّا الْبَلَاغُۜ وَاللّٰهُ يَعْلَمُ مَا تُبْدُونَ وَمَا تَكْتُمُونَ99
रसूल पर (सन्देश) पहुँचा देने के अतिरिक्त और कोई ज़िम्मेदारी नहीं। अल्लाह तो जानता है, जो कुछ तुम प्रकट करते हो और जो कुछ तुम छिपाते हो
قُلْ لَا يَسْتَوِي الْخَب۪يثُ وَالطَّيِّبُ وَلَوْ اَعْجَبَكَ كَثْرَةُ الْخَب۪يثِۚ فَاتَّقُوا اللّٰهَ يَٓا اُو۬لِي الْاَلْبَابِ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ۟100
कह दो, "बुरी चीज़ और अच्छी चीज़ समान नहीं होती, चाहे बुरी चीज़ों की बहुतायत तुम्हें प्रिय ही क्यों न लगे।" अतः ऐ बुद्धि और समझवालों! अल्लाह का डर रखो, ताकि तुम सफल हो सको
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لَا تَسْـَٔلُوا عَنْ اَشْيَٓاءَ اِنْ تُبْدَ لَكُمْ تَسُؤْكُمْۚ وَاِنْ تَسْـَٔلُوا عَنْهَا ح۪ينَ يُنَزَّلُ الْقُرْاٰنُ تُبْدَ لَكُمْۜ عَفَا اللّٰهُ عَنْهَاۜ وَاللّٰهُ غَفُورٌ حَل۪يمٌ101
ऐ ईमान लानेवालो! ऐसी चीज़ों के विषय में न पूछो कि वे यदि तुम पर स्पष्ट कर दी जाएँ, तो तुम्हें बूरी लगें। यदि तुम उन्हें ऐसे समय में पूछोगे, जबकि क़ुरआन अवतरित हो रहा है, तो वे तुमपर स्पष्ट कर दी जाएँगी। अल्लाह ने उसे क्षमा कर दिया। अल्लाह बहुत क्षमा करनेवाला, सहनशील है
قَدْ سَاَلَهَا قَوْمٌ مِنْ قَبْلِكُمْ ثُمَّ اَصْبَحُوا بِهَا كَافِر۪ينَ102
तुमसे पहले कुछ लोग इस तरह के प्रश्न कर चुके हैं, फिर वे उसके कारण इनकार करनेवाले हो गए
مَا جَعَلَ اللّٰهُ مِنْ بَح۪يرَةٍ وَلَا سَٓائِبَةٍ وَلَا وَص۪يلَةٍ وَلَا حَامٍۙ وَلٰكِنَّ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا يَفْتَرُونَ عَلَى اللّٰهِ الْكَذِبَۜ وَاَكْثَرُهُمْ لَا يَعْقِلُونَ103
अल्लाह ने न कोई 'बहीरा' ठहराया है और न 'सायबा' और न 'वसीला' और न 'हाम', परन्तु इनकार करनेवाले अल्लाह पर झूठ का आरोपण करते है और उनमें अधिकतर बुद्धि से काम नहीं लेते
وَاِذَا ق۪يلَ لَهُمْ تَعَالَوْا اِلٰى مَٓا اَنْزَلَ اللّٰهُ وَاِلَى الرَّسُولِ قَالُوا حَسْبُنَا مَا وَجَدْنَا عَلَيْهِ اٰبَٓاءَنَاۜ اَوَلَوْ كَانَ اٰبَٓاؤُ۬هُمْ لَا يَعْلَمُونَ شَيْـًٔا وَلَا يَهْتَدُونَ104
और जब उनसे कहा जाता है कि उस चीज़ की ओर आओ जो अल्लाह ने अवतरित की है और रसूल की ओर, तो वे कहते है, "हमारे लिए तो वही काफ़ी है, जिस पर हमने अपने बाप-दादा को पाया है।" क्या यद्यपि उनके बापृ-दादा कुछ भी न जानते रहे हों और न सीधे मार्ग पर रहे हो?
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا عَلَيْكُمْ اَنْفُسَكُمْۚ لَا يَضُرُّكُمْ مَنْ ضَلَّ اِذَا اهْتَدَيْتُمْۜ اِلَى اللّٰهِ مَرْجِعُكُمْ جَم۪يعًا فَيُنَبِّئُكُمْ بِمَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ105
ऐ ईमान लानेवालो! तुमपर अपनी चिन्ता अनिवार्य है, जब तुम रास्ते पर हो, तो जो कोई भटक जाए वह तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। अल्लाह की ओर तुम सबको लौटकर जाना है। फिर वह तुम्हें बता देगा, जो कुछ तुम करते रहे होगे
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا شَهَادَةُ بَيْنِكُمْ اِذَا حَضَرَ اَحَدَكُمُ الْمَوْتُ ح۪ينَ الْوَصِيَّةِ اثْنَانِ ذَوَا عَدْلٍ مِنْكُمْ اَوْ اٰخَرَانِ مِنْ غَيْرِكُمْ اِنْ اَنْتُمْ ضَرَبْتُمْ فِي الْاَرْضِ فَاَصَابَتْكُمْ مُص۪يبَةُ الْمَوْتِۜ تَحْبِسُونَهُمَا مِنْ بَعْدِ الصَّلٰوةِ فَيُقْسِمَانِ بِاللّٰهِ اِنِ ارْتَبْتُمْ لَا نَشْتَر۪ي بِه۪ ثَمَنًا وَلَوْ كَانَ ذَا قُرْبٰىۙ وَلَا نَكْتُمُ شَهَادَةَ اللّٰهِ اِنَّٓا اِذًا لَمِنَ الْاٰثِم۪ينَ106
ऐ ईमान लानेवालों! जब तुममें से किसी की मृत्यु का समय आ जाए तो वसीयत के समय तुममें से दो न्यायप्रिय व्यक्ति गवाह हों, या तुम्हारे ग़ैर लोगों में से दूसरे दो व्यक्ति गवाह बन जाएँ, यह उस समय कि यदि तुम कहीं सफ़र में गए हो और मृत्यु तुमपर आ पहुँचे। यदि तुम्हें कोई सन्देह हो तो नमाज़ के पश्चात उन दोनों को रोक लो, फिर वे दोनों अल्लाह की क़समें खाएँ कि "हम इसके बदले कोई मूल्य स्वीकार करनेवाले नहीं हैं चाहे कोई नातेदार ही क्यों न हो और न हम अल्लाह की गवाही छिपाते है। निस्सन्देह ऐसा किया तो हम गुनाहगार ठहरेंगे।"
فَاِنْ عُثِرَ عَلٰٓى اَنَّهُمَا اسْتَحَقَّٓا اِثْمًا فَاٰخَرَانِ يَقُومَانِ مَقَامَهُمَا مِنَ الَّذ۪ينَ اسْتَحَقَّ عَلَيْهِمُ الْاَوْلَيَانِ فَيُقْسِمَانِ بِاللّٰهِ لَشَهَادَتُنَٓا اَحَقُّ مِنْ شَهَادَتِهِمَا وَمَا اعْتَدَيْنَاۘ اِنَّٓا اِذًا لَمِنَ الظَّالِم۪ينَ107
फिर यदि पता चल जाए कि उन दोनों ने हक़ मारकर अपने को गुनाह में डाल लिया है, तो उनकी जगह दूसरे दो व्यक्ति उन लोगों में से खड़े हो जाएँ, जिनका हक़ पिछले दोनों ने मारना चाहा था, फिर वे दोनों अल्लाह की क़समें खाएँ कि "हम दोनों की गवाही उन दोनों की गवाही से अधिक सच्ची है और हमने कोई ज़्यादती नहीं की है। निस्सन्देह हमने ऐसा किया तो अत्याचारियों में से होंगे।"
ذٰلِكَ اَدْنٰٓى اَنْ يَاْتُوا بِالشَّهَادَةِ عَلٰى وَجْهِهَٓا اَوْ يَخَافُٓوا اَنْ تُرَدَّ اَيْمَانٌ بَعْدَ اَيْمَانِهِمْۜ وَاتَّقُوا اللّٰهَ وَاسْمَعُواۜ وَاللّٰهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْفَاسِق۪ينَ۟108
इसमें इसकी सम्भावना है कि वे ठीक-ठीक गवाही देंगे या डरेंगे कि उनकी क़समों के पश्चात क़समें ली जाएँगी। अल्लाह का डर रखो और सुनो। अल्लाह अवज्ञाकारी लोगों को मार्ग नहीं दिखाता
يَوْمَ يَجْمَعُ اللّٰهُ الرُّسُلَ فَيَقُولُ مَاذَٓا اُجِبْتُمْۜ قَالُوا لَا عِلْمَ لَنَاۜ اِنَّكَ اَنْتَ عَلَّامُ الْغُيُوبِ109
जिस दिन अल्लाह रसूलों को इकट्ठा करेगा, फिर कहेगा, "तुम्हें क्या जवाब मिला?" वे कहेंगे, "हमें कुछ नहीं मालूम। तू ही छिपी बातों को जानता है।"
اِذْ قَالَ اللّٰهُ يَا ع۪يسَى ابْنَ مَرْيَمَ اذْكُرْ نِعْمَت۪ي عَلَيْكَ وَعَلٰى وَالِدَتِكَۢ اِذْ اَيَّدْتُكَ بِرُوحِ الْقُدُسِ تُكَلِّمُ النَّاسَ فِي الْمَهْدِ وَكَهْلًاۚ وَاِذْ عَلَّمْتُكَ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ وَالتَّوْرٰيةَ وَالْاِنْج۪يلَۚ وَاِذْ تَخْلُقُ مِنَ الطّ۪ينِ كَهَيْـَٔةِ الطَّيْرِ بِاِذْن۪ي فَتَنْفُخُ ف۪يهَا فَتَكُونُ طَيْرًا بِاِذْن۪ي وَتُبْرِئُ الْاَكْمَهَ وَالْاَبْرَصَ بِاِذْن۪يۚ وَاِذْ تُخْرِجُ الْمَوْتٰى بِاِذْن۪يۚ وَاِذْ كَفَفْتُ بَن۪ٓي اِسْرَٓاء۪يلَ عَنْكَ اِذْ جِئْتَهُمْ بِالْبَيِّنَاتِ فَقَالَ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا مِنْهُمْ اِنْ هٰذَٓا اِلَّا سِحْرٌ مُب۪ينٌ110
जब अल्लाह कहेगा, "ऐ मरयम के बेटे ईसा! मेरे उस अनुग्रह को याद करो जो तुमपर और तुम्हारी माँ पर हुआ है। जब मैंने पवित्र आत्मा से तुम्हें शक्ति प्रदान की; तुम पालने में भी लोगों से बात करते थे और बड़ी अवस्था को पहुँचकर भी। और याद करो, जबकि मैंने तुम्हें किताब और हिकमत और तौरात और इनजील की शिक्षा दी थी। और याद करो जब तुम मेरे आदेश से मिट्टी से पक्षी का प्रारूपण करते थे; फिर उसमें फूँक मारते थे, तो वह मेरे आदेश से उड़नेवाली बन जाती थी। और तुम मेरे आदेश से मुर्दों को जीवित निकाल खड़ा करते थे। और याद करो जबकि मैंने तुमसे इसराइलियों को रोके रखा, जबकि तुम उनके पास खुली-खुली निशानियाँ लेकर पहुँचे थे, तो उनमें से जो इनकार करनेवाले थे, उन्होंने कहा, यह तो बस खुला जादू है।"
وَاِذْ اَوْحَيْتُ اِلَى الْحَوَارِيّ۪نَ اَنْ اٰمِنُوا ب۪ي وَبِرَسُول۪يۚ قَالُٓوا اٰمَنَّا وَاشْهَدْ بِاَنَّنَا مُسْلِمُونَ111
और याद करो, जब मैंने हबारियों (साथियों और शागिर्दों) के दिल में डाला कि "मुझपर और मेरे रसूल पर ईमान लाओ," तो उन्होंने कहा, "हम ईमान लाए और तुम गवाह रहो कि हम मुस्लिम है।"
اِذْ قَالَ الْحَوَارِيُّونَ يَا ع۪يسَى ابْنَ مَرْيَمَ هَلْ يَسْتَط۪يعُ رَبُّكَ اَنْ يُنَزِّلَ عَلَيْنَا مَٓائِدَةً مِنَ السَّمَٓاءِۜ قَالَ اتَّقُوا اللّٰهَ اِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِن۪ينَ112
और याद करो जब हवारियों ने कहा, "ऐ मरयम के बेटे ईसा! क्या तुम्हारा रब आकाश से खाने से भरा भाल उतार सकता है?" कहा, "अल्लाह से डरो, यदि तुम ईमानवाले हो।"
قَالُوا نُر۪يدُ اَنْ نَاْكُلَ مِنْهَا وَتَطْمَئِنَّ قُلُوبُنَا وَنَعْلَمَ اَنْ قَدْ صَدَقْتَنَا وَنَكُونَ عَلَيْهَا مِنَ الشَّاهِد۪ينَ113
वे बोले, "हम चाहते हैं कि उनमें से खाएँ और हमारे हृदय सन्तुष्ट हो और हमें मालूम हो जाए कि तूने हमने सच कहा और हम उसपर गवाह रहें।"
قَالَ ع۪يسَى ابْنُ مَرْيَمَ اللّٰهُمَّ رَبَّنَٓا اَنْزِلْ عَلَيْنَا مَٓائِدَةً مِنَ السَّمَٓاءِ تَكُونُ لَنَا ع۪يدًا لِاَوَّلِنَا وَاٰخِرِنَا وَاٰيَةً مِنْكَۚ وَارْزُقْنَا وَاَنْتَ خَيْرُ الرَّازِق۪ينَ114
मरयम के बेटे ईसा ने कहा, "ऐ अल्लाह, हमारे रब! हमपर आकाश से खाने से भरा खाल उतार, जो हमारे लिए और हमारे अंगलों और हमारे पिछलों के लिए ख़ुशी का कारण बने और तेरी ओर से एक निशानी हो, और हमें आहार प्रदान कर। तू सबसे अच्छा प्रदान करनेवाला है।"
قَالَ اللّٰهُ اِنّ۪ي مُنَزِّلُهَا عَلَيْكُمْۚ فَمَنْ يَكْفُرْ بَعْدُ مِنْكُمْ فَاِنّ۪ٓي اُعَذِّبُهُ عَذَابًا لَٓا اُعَذِّبُهُٓ اَحَدًا مِنَ الْعَالَم۪ينَ۟115
अल्लाह ने कहा, "मैं उसे तुमपर उतारूँगा, फिर उसके पश्चात तुममें से जो कोई इनकार करेगा तो मैं अवश्य उसे ऐसी यातना दूँगा जो सम्पूर्ण संसार में किसी को न दूँगा।"
وَاِذْ قَالَ اللّٰهُ يَا ع۪يسَى ابْنَ مَرْيَمَ ءَاَنْتَ قُلْتَ لِلنَّاسِ اتَّخِذُون۪ي وَاُمِّيَ اِلٰهَيْنِ مِنْ دُونِ اللّٰهِۜ قَالَ سُبْحَانَكَ مَا يَكُونُ ل۪ٓي اَنْ اَقُولَ مَا لَيْسَ ل۪ي بِحَقٍّۜ اِنْ كُنْتُ قُلْتُهُ فَقَدْ عَلِمْتَهُۜ تَعْلَمُ مَا ف۪ي نَفْس۪ي وَلَٓا اَعْلَمُ مَا ف۪ي نَفْسِكَۜ اِنَّكَ اَنْتَ عَلَّامُ الْغُيُوبِ116
और याद करो जब अल्लाह कहेगा, "ऐ मरयम के बेटे ईसा! क्या तुमने लोगों से कहा था कि अल्लाह के अतिरिक्त दो और पूज्य मुझ और मेरी माँ को बना लो?" वह कहेगा, "महिमावान है तू! मुझसे यह नहीं हो सकता कि मैं यह बात कहूँ, जिसका मुझे कोई हक़ नहीं है। यदि मैंने यह कहा होता तो तुझे मालूम होता। तू जानता है, जो कुछ मेरे मन में है। परन्तु मैं नहीं जानता जो कुछ तेरे मन में है। निश्चय ही, तू छिपी बातों का भली-भाँति जाननेवाला है
مَا قُلْتُ لَهُمْ اِلَّا مَٓا اَمَرْتَن۪ي بِه۪ٓ اَنِ اعْبُدُوا اللّٰهَ رَبّ۪ي وَرَبَّكُمْۚ وَكُنْتُ عَلَيْهِمْ شَه۪يدًا مَا دُمْتُ ف۪يهِمْۚ فَلَمَّا تَوَفَّيْتَن۪ي كُنْتَ اَنْتَ الرَّق۪يبَ عَلَيْهِمْۜ وَاَنْتَ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ شَه۪يدٌ117
"मैंने उनसे उसके सिवा और कुछ नहीं कहा, जिसका तूने मुझे आदेश दिया था, यह कि अल्लाह की बन्दगी करो, जो मेरा भी रब है और तुम्हारा भी रब है। और जब तक मैं उनमें रहा उनकी ख़बर रखता था, फिर जब तूने मुझे उठा लिया तो फिर तू ही उनका निरीक्षक था। और तू ही हर चीज़ का साक्षी है
اِنْ تُعَذِّبْهُمْ فَاِنَّهُمْ عِبَادُكَۚ وَاِنْ تَغْفِرْ لَهُمْ فَاِنَّكَ اَنْتَ الْعَز۪يزُ الْحَك۪يمُ118
"यदि तू उन्हें यातना दे तो वे तो तेरे ही बन्दे ही है और यदि तू उन्हें क्षमा कर दे, तो निस्सन्देह तू अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है।"
قَالَ اللّٰهُ هٰذَا يَوْمُ يَنْفَعُ الصَّادِق۪ينَ صِدْقُهُمْۜ لَهُمْ جَنَّاتٌ تَجْر۪ي مِنْ تَحْتِهَا الْاَنْهَارُ خَالِد۪ينَ ف۪يهَٓا اَبَدًاۜ رَضِيَ اللّٰهُ عَنْهُمْ وَرَضُوا عَنْهُۜ ذٰلِكَ الْفَوْزُ الْعَظ۪يمُ119
अल्लाह कहेगा, "यह वह दिन है कि सच्चों को उनकी सच्चाई लाभ पहुँचाएगी। उनके लिए ऐसे बाग़ है, जिनके नीचे नहेर बह रही होंगी, उनमें वे सदैव रहेंगे। अल्लाह उनसे राज़ी हुआ और वे उससे राज़ी हुए। यही सबसे बड़ी सफलता है।"
لِلّٰهِ مُلْكُ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِ وَمَا ف۪يهِنَّۜ وَهُوَ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَد۪يرٌ120
आकाशों और धरती और जो कुछ उनके बीच है, सबपर अल्लाह ही की बादशाही है और उसे हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है
6 · अल-अनाम
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
اَلْحَمْدُ لِلّٰهِ الَّذ۪ي خَلَقَ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضَ وَجَعَلَ الظُّلُمَاتِ وَالنُّورَۜ ثُمَّ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا بِرَبِّهِمْ يَعْدِلُونَ1
प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जिसने आकाशों और धरती को पैदा किया और अँधरों और उजाले का विधान किया; फिर भी इनकार करनेवाले लोग दूसरों को अपने रब के समकक्ष ठहराते है
هُوَ الَّذ۪ي خَلَقَكُمْ مِنْ ط۪ينٍ ثُمَّ قَضٰٓى اَجَلًاۜ وَاَجَلٌ مُسَمًّى عِنْدَهُ ثُمَّ اَنْتُمْ تَمْتَرُونَ2
वही है जिसने तुम्हें मिट्टी से पैदा किया, फिर (जीवन की) एक अवधि निश्चित कर दी और उसके यहाँ (क़ियामत की) एक अवधि और निश्चित है; फिर भी तुम संदेह करते हो!
وَهُوَ اللّٰهُ فِي السَّمٰوَاتِ وَفِي الْاَرْضِۜ يَعْلَمُ سِرَّكُمْ وَجَهْرَكُمْ وَيَعْلَمُ مَا تَكْسِبُونَ3
वही अल्लाह है, आकाशों में भी और धरती में भी। वह तुम्हारी छिपी और तुम्हारी खुली बातों को जानता है, और जो कुछ तुम कमाते हो, वह उससे भी अवगत है
وَمَا تَاْت۪يهِمْ مِنْ اٰيَةٍ مِنْ اٰيَاتِ رَبِّهِمْ اِلَّا كَانُوا عَنْهَا مُعْرِض۪ينَ4
हाल यह है कि उनके रब की निशानियों में से कोई निशानी भी उनके पास ऐसी नहीं आई, जिससे उन्होंने मुँह न मोड़ लिया हो
فَقَدْ كَذَّبُوا بِالْحَقِّ لَمَّا جَٓاءَهُمْۜ فَسَوْفَ يَاْت۪يهِمْ اَنْبٰٓؤُ۬ا مَا كَانُوا بِه۪ يَسْتَهْزِؤُ۫نَ5
उन्होंने सत्य को झुठला दिया, जबकि वह उनके पास आया। अतः जिस चीज़ को वे हँसी उड़ाते रहे हैं, जल्द ही उसके सम्बन्ध में उन्हें ख़बरे मिल जाएगी
اَلَمْ يَرَوْا كَمْ اَهْلَكْنَا مِنْ قَبْلِهِمْ مِنْ قَرْنٍ مَكَّنَّاهُمْ فِي الْاَرْضِ مَا لَمْ نُمَكِّنْ لَكُمْ وَاَرْسَلْنَا السَّمَٓاءَ عَلَيْهِمْ مِدْرَارًاۖ وَجَعَلْنَا الْاَنْهَارَ تَجْر۪ي مِنْ تَحْتِهِمْ فَاَهْلَكْنَاهُمْ بِذُنُوبِهِمْ وَاَنْشَاْنَا مِنْ بَعْدِهِمْ قَرْنًا اٰخَر۪ينَ6
क्या उन्होंने नहीं देखा कि उनसे पहले कितने ही गिरोहों को हम विनष्ट कर चुके है। उन्हें हमने धरती में ऐसा जमाव प्रदान किया था, जो तुम्हें नहीं प्रदान किया। और उनपर हमने आकाश को ख़ूब बरसता छोड़ दिया और उनके नीचे नहरें बहाई। फिर हमने आकाश को ख़ूब बरसता छोड़ दिया और उनके नीचे नहरें बहाई। फिर हमने उन्हें उनके गुनाहों के कारण विनष्ट़ कर दिया और उनके पश्चात दूसरे गिरोहों को उठाया
وَلَوْ نَزَّلْنَا عَلَيْكَ كِتَابًا ف۪ي قِرْطَاسٍ فَلَمَسُوهُ بِاَيْد۪يهِمْ لَقَالَ الَّذ۪ينَ كَفَرُٓوا اِنْ هٰذَٓا اِلَّا سِحْرٌ مُب۪ينٌ7
और यदि हम तुम्हारे ऊपर काग़ज़ में लिखी-लिखाई किताब भी उतार देते और उसे लोग अपने हाथों से छू भी लेते तब भी, जिन्होंने इनकार किया है, वे यही कहते, "यह तो बस एक खुला जादू हैं।"
وَقَالُوا لَوْلَٓا اُنْزِلَ عَلَيْهِ مَلَكٌۜ وَلَوْ اَنْزَلْنَا مَلَكًا لَقُضِيَ الْاَمْرُ ثُمَّ لَا يُنْظَرُونَ8
उनका तो कहना है, "इस (नबी) पर कोई फ़रिश्ता (खुले रूप में) क्यों नहीं उतारा गया?" हालाँकि यदि हम फ़रिश्ता उतारते तो फ़ैसला हो चुका होता। फिर उन्हें कोई मुहल्लत न मिलती
وَلَوْ جَعَلْنَاهُ مَلَكًا لَجَعَلْنَاهُ رَجُلًا وَلَلَبَسْنَا عَلَيْهِمْ مَا يَلْبِسُونَ9
यह बात भी है कि यदि हम उसे (नबी को) फ़रिश्ता बना देते तो उसे आदमी ही (के रूप का) बनाते। इस प्रकार उन्हें उसी सन्देह में डाल देते, जिस सन्देह में वे इस समय पड़े हुए है
وَلَقَدِ اسْتُهْزِئَ بِرُسُلٍ مِنْ قَبْلِكَ فَحَاقَ بِالَّذ۪ينَ سَخِرُوا مِنْهُمْ مَا كَانُوا بِه۪ يَسْتَهْزِؤُ۫نَ۟10
तुमसे पहले कितने ही रसूलों की हँसी उड़ाई जा चुकी है। अन्ततः जिन लोगों ने उनकी हँसी उड़ाई थी, उन्हें उसी न आ घेरा जिस बात पर वे हँसी उड़ाते थे
قُلْ س۪يرُوا فِي الْاَرْضِ ثُمَّ انْظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الْمُكَذِّب۪ينَ11
कहो, "धरती में चल-फिरकर देखो कि झुठलानेवालों का क्या परिणाम हुआ!"
قُلْ لِمَنْ مَا فِي السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ قُلْ لِلّٰهِۜ كَتَبَ عَلٰى نَفْسِهِ الرَّحْمَةَۜ لَيَجْمَعَنَّكُمْ اِلٰى يَوْمِ الْقِيٰمَةِ لَا رَيْبَ ف۪يهِۜ اَلَّذ۪ينَ خَسِرُٓوا اَنْفُسَهُمْ فَهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ12
कहो, "आकाशों और धरती में जो कुछ है किसका है?" कह दो, "अल्लाह ही का है।" उसने दयालुता को अपने ऊपर अनिवार्य कर दिया है। निश्चय ही वह तुम्हें क़ियामत के दिन इकट्ठा करेगा, इसमें कोई सन्देह नहीं है। जिन लोगों ने अपने-आपको घाटे में डाला है, वही है जो ईमान नहीं लाते
وَلَهُ مَا سَكَنَ فِي الَّيْلِ وَالنَّهَارِۜ وَهُوَ السَّم۪يعُ الْعَل۪يمُ13
हाँ, उसी का है जो भी रात में ठहरता है और दिन में (गतिशील होता है), और वह सब कुछ सुनता, जानता है
قُلْ اَغَيْرَ اللّٰهِ اَتَّخِذُ وَلِيًّا فَاطِرِ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِ وَهُوَ يُطْعِمُ وَلَا يُطْعَمُۜ قُلْ اِنّ۪ٓي اُمِرْتُ اَنْ اَكُونَ اَوَّلَ مَنْ اَسْلَمَ وَلَا تَكُونَنَّ مِنَ الْمُشْرِك۪ينَ14
कहो, "क्या मैं आकाशों और धरती को पैदा करनेवाले अल्लाह के सिवा किसी और को संरक्षक बना लूँ? उसका हाल यह है कि वह खिलाता है और स्वयं नहीं खाता।" कहो, "मुझे आदेश हुआ है कि सबसे पहले मैं उसके आगे झुक जाऊँ। और (यह कि) तुम बहुदेववादियों में कदापि सम्मिलित न होना।"
قُلْ اِنّ۪ٓي اَخَافُ اِنْ عَصَيْتُ رَبّ۪ي عَذَابَ يَوْمٍ عَظ۪يمٍ15
कहो, "यदि मैं अपने रब की अवज्ञा करूँ, तो उस स्थिति में मुझे एक बड़े (भयानक) दिन की यातना का डर है।"
مَنْ يُصْرَفْ عَنْهُ يَوْمَئِذٍ فَقَدْ رَحِمَهُۜ وَذٰلِكَ الْفَوْزُ الْمُب۪ينُ16
उस दिन वह जिसपर से टल गई, उसपर अल्लाह ने दया की, और यही स्पष्ट सफलता है
وَاِنْ يَمْسَسْكَ اللّٰهُ بِضُرٍّ فَلَا كَاشِفَ لَهُٓ اِلَّا هُوَۜ وَاِنْ يَمْسَسْكَ بِخَيْرٍ فَهُوَ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَد۪يرٌ17
और यदि अल्लाह तुम्हें कोई कष्ट पहुँचाए तो उसके अतिरिक्त उसे कोई दूर करनेवाला नहीं है और यदि वह तुम्हें कोई भलाई पहुँचाए तो उसे हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है
وَهُوَ الْقَاهِرُ فَوْقَ عِبَادِه۪ۜ وَهُوَ الْحَك۪يمُ الْخَب۪يرُ18
उसे अपने बन्दों पर पूर्ण अधिकार प्राप्त है। और वह तत्वदर्शी, ख़बर रखनेवाला है
قُلْ اَيُّ شَيْءٍ اَكْبَرُ شَهَادَةًۜ قُلِ اللّٰهُ شَه۪يدٌ بَيْن۪ي وَبَيْنَكُمْ وَاُو۫حِيَ اِلَيَّ هٰذَا الْقُرْاٰنُ لِاُنْذِرَكُمْ بِه۪ وَمَنْ بَلَغَۜ اَئِنَّكُمْ لَتَشْهَدُونَ اَنَّ مَعَ اللّٰهِ اٰلِهَةً اُخْرٰىۜ قُلْ لَٓا اَشْهَدُۚ قُلْ اِنَّمَا هُوَ اِلٰهٌ وَاحِدٌ وَاِنَّن۪ي بَر۪ٓيءٌ مِمَّا تُشْرِكُونَۢ19
कहो, "किस चीज़ की गवाही सबसे बड़ी है?" कहो, "मेरे और तुम्हारे बीच अल्लाह गवाह है। और यह क़ुरआन मेरी ओर वह्यी (प्रकाशना) किया गया है, ताकि मैं इसके द्वारा तुम्हें सचेत कर दूँ। और जिस किसी को यह अल्लाह के साथ दूसरे पूज्य भी है?" तुम कह दो, "मैं तो इसकी गवाही नहीं देता।" कह दो, "वह तो बस अकेला पूज्य है। और तुम जो उसका साझी ठहराते हो, उससे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं।"
اَلَّذ۪ينَ اٰتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ يَعْرِفُونَهُ كَمَا يَعْرِفُونَ اَبْنَٓاءَهُمْۢ اَلَّذ۪ينَ خَسِرُٓوا اَنْفُسَهُمْ فَهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ۟20
जिन लोगों को हमने किताब दी है, वे उसे इस प्रकार पहचानते है, जिस प्रकार अपने बेटों को पहचानते है। जिन लोगों ने अपने आपको घाटे में डाला है, वही ईमान नहीं लाते
وَمَنْ اَظْلَمُ مِمَّنِ افْتَرٰى عَلَى اللّٰهِ كَذِبًا اَوْ كَذَّبَ بِاٰيَاتِه۪ۜ اِنَّهُ لَا يُفْلِحُ الظَّالِمُونَ21
और उससे बढ़कर अत्याचारी कौन होगा, जो अल्लाह पर झूठ गढ़े या उसकी आयतों को झुठलाए। निस्सन्देह अत्याचारी कभी सफल नहीं हो सकते
وَيَوْمَ نَحْشُرُهُمْ جَم۪يعًا ثُمَّ نَقُولُ لِلَّذ۪ينَ اَشْرَكُٓوا اَيْنَ شُرَكَٓاؤُ۬كُمُ الَّذ۪ينَ كُنْتُمْ تَزْعُمُونَ22
और उस दिन को याद करो जब हम सबको इकट्ठा करेंगे; फिर बहुदेववादियों से पूछेंगे, "कहाँ है तुम्हारे ठहराए हुए साझीदार, जिनका तुम दावा किया करते थे?"
ثُمَّ لَمْ تَكُنْ فِتْنَتُهُمْ اِلَّٓا اَنْ قَالُوا وَاللّٰهِ رَبِّنَا مَا كُنَّا مُشْرِك۪ينَ23
फिर उनका कोई फ़िला (उपद्रव) शेष न रहेगा। सिवाय इसके कि वे कहेंगे, "अपने रब अल्लाह की सौगन्ध! हम बहुदेववादी न थे।"
اُنْظُرْ كَيْفَ كَذَبُوا عَلٰٓى اَنْفُسِهِمْ وَضَلَّ عَنْهُمْ مَا كَانُوا يَفْتَرُونَ24
देखो, कैसा वे अपने विषय में झूठ बोले। और वह गुम होकर रह गया जो वे घड़ा करते थे
وَمِنْهُمْ مَنْ يَسْتَمِعُ اِلَيْكَۚ وَجَعَلْنَا عَلٰى قُلُوبِهِمْ اَكِنَّةً اَنْ يَفْقَهُوهُ وَف۪ٓي اٰذَانِهِمْ وَقْرًاۜ وَاِنْ يَرَوْا كُلَّ اٰيَةٍ لَا يُؤْمِنُوا بِهَاۜ حَتّٰٓى اِذَا جَٓاؤُ۫كَ يُجَادِلُونَكَ يَقُولُ الَّذ۪ينَ كَفَرُٓوا اِنْ هٰذَٓا اِلَّٓا اَسَاط۪يرُ الْاَوَّل۪ينَ25
और उनमें कुछ लोग ऐसे है जो तुम्हारी ओर कान लगाते है, हालाँकि हमने तो उनके दिलों पर परदे डाल रखे है कि वे उसे समझ न सकें और उनके कानों में बोझ डाल दिया है। और वे चाहे प्रत्येक निशानी देख लें तब भी उसे मानेंगे नहीं; यहाँ तक कि जब वे तुम्हारे पास आकर तुमसे झगड़ते है, तो अविश्वास की नीति अपनानेवाले कहते है, "यह तो बस पहले को लोगों की गाथाएँ है।"
وَهُمْ يَنْهَوْنَ عَنْهُ وَيَنْـَٔوْنَ عَنْهُۚ وَاِنْ يُهْلِكُونَ اِلَّٓا اَنْفُسَهُمْ وَمَا يَشْعُرُونَ26
और वे उससे दूसरों को रोकते है और स्वयं भी उससे दूर रहते है। वे तो बस अपने आपको ही विनष्ट कर रहे है, किन्तु उन्हें इसका एहसास नहीं
وَلَوْ تَرٰٓى اِذْ وُقِفُوا عَلَى النَّارِ فَقَالُوا يَا لَيْتَنَا نُرَدُّ وَلَا نُكَذِّبَ بِاٰيَاتِ رَبِّنَا وَنَكُونَ مِنَ الْمُؤْمِن۪ينَ27
और यदि तुम उस समय देख सकते, जब वे आग के निकट खड़े किए जाएँगे और कहेंगे, "काश! क्या ही अच्छा होता कि हम फिर लौटा दिए जाएँ (कि माने) और अपने रब की आयतों को न झुठलाएँ और माननेवालों में हो जाएँ।"
بَلْ بَدَا لَهُمْ مَا كَانُوا يُخْفُونَ مِنْ قَبْلُۜ وَلَوْ رُدُّوا لَعَادُوا لِمَا نُهُوا عَنْهُ وَاِنَّهُمْ لَكَاذِبُونَ28
कुछ नहीं, बल्कि जो कुछ वे पहले छिपाया करते थे, वह उनके सामने आ गया। और यदि वे लौटा भी दिए जाएँ, तो फिर वही कुछ करने लगेंगे जिससे उन्हें रोका गया था। निश्चय ही वे झूठे है
وَقَالُٓوا اِنْ هِيَ اِلَّا حَيَاتُنَا الدُّنْيَا وَمَا نَحْنُ بِمَبْعُوث۪ينَ29
और वे कहते है, "जो कुछ है बस यही हमारा सांसारिक जीवन है; हम कोई फिर उठाए जानेवाले नहीं हैं।"
وَلَوْ تَرٰٓى اِذْ وُقِفُوا عَلٰى رَبِّهِمْۜ قَالَ اَلَيْسَ هٰذَا بِالْحَقِّۜ قَالُوا بَلٰى وَرَبِّنَاۜ قَالَ فَذُوقُوا الْعَذَابَ بِمَا كُنْتُمْ تَكْفُرُونَ۟30
और यदि तुम देख सकते जब वे अपने रब के सामने खड़े किेए जाएँगे! वह कहेगा, "क्या यह यर्थाथ नहीं है?" कहेंगे, "क्यों नही, हमारे रब की क़सम!" वह कहेगा, "अच्छा तो उस इनकार के बदले जो तुम करते रहें हो, यातना का मज़ा चखो।"
قَدْ خَسِرَ الَّذ۪ينَ كَذَّبُوا بِلِقَٓاءِ اللّٰهِۜ حَتّٰٓى اِذَا جَٓاءَتْهُمُ السَّاعَةُ بَغْتَةً قَالُوا يَا حَسْرَتَنَا عَلٰى مَا فَرَّطْنَا ف۪يهَاۙ وَهُمْ يَحْمِلُونَ اَوْزَارَهُمْ عَلٰى ظُهُورِهِمْۜ اَلَا سَٓاءَ مَا يَزِرُونَ31
वे लोग घाटे में पड़े, जिन्होंने अल्लाह से मिलने को झुठलाया, यहाँ तक कि जब अचानक उनपर वह घड़ी आ जाएगी तो वे कहेंगे, "हाय! अफ़सोस, उस कोताही पर जो इसके विषय में हमसे हुई।" और हाल यह होगा कि वे अपने बोझ अपनी पीठों पर उठाए होंगे। देखो, कितना बुरा बोझ है जो ये उठाए हुए है!
وَمَا الْحَيٰوةُ الدُّنْيَٓا اِلَّا لَعِبٌ وَلَهْوٌۜ وَلَلدَّارُ الْاٰخِرَةُ خَيْرٌ لِلَّذ۪ينَ يَتَّقُونَۜ اَفَلَا تَعْقِلُونَ32
सांसारिक जीवन तो एक खेल और तमाशे (ग़फलत) के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है जबकि आख़िरत का घर उन लोगों के लिए अच्छा है, जो डर रखते है। तो क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लेते?
قَدْ نَعْلَمُ اِنَّهُ لَيَحْزُنُكَ الَّذ۪ي يَقُولُونَ فَاِنَّهُمْ لَا يُكَذِّبُونَكَ وَلٰكِنَّ الظَّالِم۪ينَ بِاٰيَاتِ اللّٰهِ يَجْحَدُونَ33
हमें मालूम है, जो कुछ वे कहते है उससे तुम्हें दुख पहुँचता है। तो वे वास्तव में तुम्हें नहीं झुठलाते, बल्कि उन अत्याचारियो को तो अल्लाह की आयतों से इनकार है
وَلَقَدْ كُذِّبَتْ رُسُلٌ مِنْ قَبْلِكَ فَصَبَرُوا عَلٰى مَا كُذِّبُوا وَاُو۫ذُوا حَتّٰٓى اَتٰيهُمْ نَصْرُنَاۚ وَلَا مُبَدِّلَ لِكَلِمَاتِ اللّٰهِۚ وَلَقَدْ جَٓاءَكَ مِنْ نَبَا۬ئِ الْمُرْسَل۪ينَ34
तुमसे पहले भी बहुत-से रसूल झुठलाए जा चुके है, तो वे अपने झुठलाए जाने और कष्ट पहुँचाए जाने पर धैर्य से काम लेते रहे, यहाँ तक कि उन्हें हमारी सहायता पहुँच गई। कोई नहीं जो अल्लाह की बातों को बदल सके। तुम्हारे पास तो रसूलों की कुछ ख़बरें पहुँच ही चुकी है
وَاِنْ كَانَ كَبُرَ عَلَيْكَ اِعْرَاضُهُمْ فَاِنِ اسْتَطَعْتَ اَنْ تَبْتَغِيَ نَفَقًا فِي الْاَرْضِ اَوْ سُلَّمًا فِي السَّمَٓاءِ فَتَاْتِيَهُمْ بِاٰيَةٍۜ وَلَوْ شَٓاءَ اللّٰهُ لَجَمَعَهُمْ عَلَى الْهُدٰى فَلَا تَكُونَنَّ مِنَ الْجَاهِل۪ينَ35
और यदि उनकी विमुखता तुम्हारे लिए असहनीय है, तो यदि तुमसे हो सके कि धरती में कोई सुरंग या आकाश में कोई सीढ़ी ढूँढ़ निकालो और उनके पास कोई निशानी ले आओ, तो (ऐसा कर देखो), यदि अल्लाह चाहता तो उन सबको सीधे मार्ग पर इकट्ठा कर देता। अतः तुम उजड्ड और नादान न बनना
اِنَّمَا يَسْتَج۪يبُ الَّذ۪ينَ يَسْمَعُونَۜ وَالْمَوْتٰى يَبْعَثُهُمُ اللّٰهُ ثُمَّ اِلَيْهِ يُرْجَعُونَ36
मानते हो वही लोग है जो सुनते है, रहे मुर्दे, तो अल्लाह उन्हें (क़ियामत के दिन) उठा खड़ा करेगा; फिर वे उसी के ओर पलटेंगे
وَقَالُوا لَوْلَا نُزِّلَ عَلَيْهِ اٰيَةٌ مِنْ رَبِّه۪ۜ قُلْ اِنَّ اللّٰهَ قَادِرٌ عَلٰٓى اَنْ يُنَزِّلَ اٰيَةً وَلٰكِنَّ اَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ37
वे यह भी कहते है, "उस (नबी) पर उसके रब की ओर से कोई निशानी क्यों नहीं उतारी गई?" कह दो, "अल्लाह को तो इसकी सामर्थ्य प्राप्त है कि कोई निशानी उतार दे; परन्तु उनमें से अधिकतर लोग नहीं जानते।"
وَمَا مِنْ دَٓابَّةٍ فِي الْاَرْضِ وَلَا طَٓائِرٍ يَط۪يرُ بِجَنَاحَيْهِ اِلَّٓا اُمَمٌ اَمْثَالُكُمْۜ مَا فَرَّطْنَا فِي الْكِتَابِ مِنْ شَيْءٍ ثُمَّ اِلٰى رَبِّهِمْ يُحْشَرُونَ38
धरती में चलने-फिरनेवाला कोई भी प्राणी हो या अपने दो परो से उड़नवाला कोई पक्षी, ये सब तुम्हारी ही तरह के गिरोह है। हमने किताब में कोई भी चीज़ नहीं छोड़ी है। फिर वे अपने रब की ओर इकट्ठे किए जाएँगे
وَالَّذ۪ينَ كَذَّبُوا بِاٰيَاتِنَا صُمٌّ وَبُكْمٌ فِي الظُّلُمَاتِۜ مَنْ يَشَاِ اللّٰهُ يُضْلِلْهُۜ وَمَنْ يَشَاْ يَجْعَلْهُ عَلٰى صِرَاطٍ مُسْتَق۪يمٍ39
जिन लोगों ने हमारी आयतों को झुठलाया, वे बहरे और गूँगे है, अँधेरों में पड़े हुए हैं। अल्लाह जिसे चाहे भटकने दे और जिसे चाहे सीधे मार्ग पर लगा दे
قُلْ اَرَاَيْتَكُمْ اِنْ اَتٰيكُمْ عَذَابُ اللّٰهِ اَوْ اَتَتْكُمُ السَّاعَةُ اَغَيْرَ اللّٰهِ تَدْعُونَۚ اِنْ كُنْتُمْ صَادِق۪ينَ40
कहो, "क्या तुमने यह भी सोचा कि यदि तुमपर अल्लाह की यातना आ पड़े या वह घड़ी तुम्हारे सामने आ जाए, तो क्या अल्लाह के सिवा किसी और को पुकारोगे? बोलो, यदि तुम सच्चे हो?
بَلْ اِيَّاهُ تَدْعُونَ فَيَكْشِفُ مَا تَدْعُونَ اِلَيْهِ اِنْ شَٓاءَ وَتَنْسَوْنَ مَا تُشْرِكُونَ۟41
"बल्कि तुम उसी को पुकारते हो - फिर जिसके लिए तुम उसे पुकारते हो, वह चाहता है तो उसे दूर कर देता है - और उन्हें भूल जाते हो जिन्हें साझीदार ठहराते हो।"
وَلَقَدْ اَرْسَلْنَٓا اِلٰٓى اُمَمٍ مِنْ قَبْلِكَ فَاَخَذْنَاهُمْ بِالْبَاْسَٓاءِ وَالضَّرَّٓاءِ لَعَلَّهُمْ يَتَضَرَّعُونَ42
तुमसे पहले कितने ही समुदायों की ओर हमने रसूल भेजे कि उन्हें तंगियों और मुसीबतों में डाला, ताकि वे विनम्र हों
فَلَوْلَٓا اِذْ جَٓاءَهُمْ بَاْسُنَا تَضَرَّعُوا وَلٰكِنْ قَسَتْ قُلُوبُهُمْ وَزَيَّنَ لَهُمُ الشَّيْطَانُ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ43
जब हमारी ओर से उनपर सख्ती आई तो फिर क्यों न विनम्र हुए? परन्तु उनके हृदय तो कठोर हो गए थे और जो कुछ वे करते थे शैतान ने उसे उनके लिए मोहक बना दिया
فَلَمَّا نَسُوا مَا ذُكِّرُوا بِه۪ فَتَحْنَا عَلَيْهِمْ اَبْوَابَ كُلِّ شَيْءٍۜ حَتّٰٓى اِذَا فَرِحُوا بِمَٓا اُو۫تُٓوا اَخَذْنَاهُمْ بَغْتَةً فَاِذَا هُمْ مُبْلِسُونَ44
फिर जब उसे उन्होंने भुला दिया जो उन्हें याद दिलाई गई थी, तो हमने उनपर हर चीज़ के दरवाज़े खोल दिए; यहाँ तक कि जो कुछ उन्हें मिला था, जब वे उसमें मग्न हो गए तो अचानक हमने उन्हें पकड़ लिया, तो क्या देखते है कि वे बिल्कुल निराश होकर रह गए
فَقُطِعَ دَابِرُ الْقَوْمِ الَّذ۪ينَ ظَلَمُواۜ وَالْحَمْدُ لِلّٰهِ رَبِّ الْعَالَم۪ينَ45
इस प्रकार अत्याचारी लोगों की जड़ काटकर रख दी गई। प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है, जो सारे संसार का रब है
قُلْ اَرَاَيْتُمْ اِنْ اَخَذَ اللّٰهُ سَمْعَكُمْ وَاَبْصَارَكُمْ وَخَتَمَ عَلٰى قُلُوبِكُمْ مَنْ اِلٰهٌ غَيْرُ اللّٰهِ يَاْت۪يكُمْ بِهِۜ اُنْظُرْ كَيْفَ نُصَرِّفُ الْاٰيَاتِ ثُمَّ هُمْ يَصْدِفُونَ46
कहो, "क्या तुमने यह भी सोचा कि यदि अल्लाह तुम्हारे सुनने की और तुम्हारी देखने की शक्ति छीन ले और तुम्हारे दिलों पर ठप्पा लगा दे, तो अल्लाह के सिवा कौन पूज्य है जो तुम्हें ये चीज़े लाकर दे?" देखो, किस प्रकार हम तरह-तरह से अपनी निशानियाँ बयान करते है! फिर भी वे किनारा ही खींचते जाते है
قُلْ اَرَاَيْتَكُمْ اِنْ اَتٰيكُمْ عَذَابُ اللّٰهِ بَغْتَةً اَوْ جَهْرَةً هَلْ يُهْلَكُ اِلَّا الْقَوْمُ الظَّالِمُونَ47
कहो, "क्या तुमने यह भी सोचा कि यदि तुमपर अचानक या प्रत्यक्षतः अल्लाह की यातना आ जाए, तो क्या अत्याचारी लोगों के सिवा कोई और विनष्ट होगा?"
وَمَا نُرْسِلُ الْمُرْسَل۪ينَ اِلَّا مُبَشِّر۪ينَ وَمُنْذِر۪ينَۚ فَمَنْ اٰمَنَ وَاَصْلَحَ فَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ48
हम रसूलों को केवल शुभ-सूचना देनेवाले और सचेतकर्ता बनाकर भेजते रहे है। फिर जो ईमान लाए और सुधर जाए, तो ऐसे लोगों के लिए न कोई भय है और न वे कभी दुखी होंगे
وَالَّذ۪ينَ كَذَّبُوا بِاٰيَاتِنَا يَمَسُّهُمُ الْعَذَابُ بِمَا كَانُوا يَفْسُقُونَ49
रहे वे लोग, जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया, उन्हें यातना पहुँचकर रहेगी, क्योंकि वे अवज्ञा करते रहे है
قُلْ لَٓا اَقُولُ لَكُمْ عِنْد۪ي خَزَٓائِنُ اللّٰهِ وَلَٓا اَعْلَمُ الْغَيْبَ وَلَٓا اَقُولُ لَكُمْ اِنّ۪ي مَلَكٌۚ اِنْ اَتَّبِعُ اِلَّا مَا يُوحٰٓى اِلَيَّۜ قُلْ هَلْ يَسْتَوِي الْاَعْمٰى وَالْبَص۪يرُۜ اَفَلَا تَتَفَكَّرُونَ۟50
कह दो, "मैं तुमसे यह नहीं कहता कि मेरे पास अल्लाह के ख़ज़ाने है, और न मैं परोक्ष का ज्ञान रखता हूँ, और न मैं तुमसे कहता हूँ कि मैं कोई फ़रिश्ता हूँ। मैं तो बस उसी का अनुपालन करता हूँ जो मेरी ओर वह्यं की जाती है।" कहो, "क्या अंधा और आँखोंवाला दोनों बराबर हो जाएँगे? क्या तुम सोच-विचार से काम नहीं लेते?"
وَاَنْذِرْ بِهِ الَّذ۪ينَ يَخَافُونَ اَنْ يُحْشَرُٓوا اِلٰى رَبِّهِمْ لَيْسَ لَهُمْ مِنْ دُونِه۪ وَلِيٌّ وَلَا شَف۪يعٌ لَعَلَّهُمْ يَتَّقُونَ51
और तुम इसके द्वारा उन लोगों को सचेत कर दो, जिन्हें इस बात का भय है कि वे अपने रब के पास इस हाल में इकट्ठा किए जाएँगे कि उसके सिवा न तो उसका कोई समर्थक होगा और न कोई सिफ़ारिश करनेवाला, ताकि वे बचें
وَلَا تَطْرُدِ الَّذ۪ينَ يَدْعُونَ رَبَّهُمْ بِالْغَدٰوةِ وَالْعَشِيِّ يُر۪يدُونَ وَجْهَهُۜ مَا عَلَيْكَ مِنْ حِسَابِهِمْ مِنْ شَيْءٍ وَمَا مِنْ حِسَابِكَ عَلَيْهِمْ مِنْ شَيْءٍ فَتَطْرُدَهُمْ فَتَكُونَ مِنَ الظَّالِم۪ينَ52
और जो लोग अपने रब को उसकी ख़ुशी की चाह में प्रातः और सायंकाल पुकारते रहते है, ऐसे लोगों को दूर न करना। उनके हिसाब की तुमपर कुछ भी ज़िम्मेदारी नहीं है और न तुम्हारे हिसाब की उनपर कोई ज़िम्मेदारी है कि तुम उन्हें दूर करो और फिर हो जाओ अत्याचारियों में से
وَكَذٰلِكَ فَتَنَّا بَعْضَهُمْ بِبَعْضٍ لِيَقُولُٓوا اَهٰٓؤُ۬لَٓاءِ مَنَّ اللّٰهُ عَلَيْهِمْ مِنْ بَيْنِنَاۜ اَلَيْسَ اللّٰهُ بِاَعْلَمَ بِالشَّاكِر۪ينَ53
और इसी प्रकार हमने इनमें से एक को दूसरे के द्वारा आज़माइश में डाला, ताकि वे कहें, "क्या यही वे लोग है, जिनपर अल्लाह न हममें से चुनकर एहसान किया है ?" - क्या अल्लाह कृतज्ञ लोगों से भली-भाँति परिचित नहीं है?
وَاِذَا جَٓاءَكَ الَّذ۪ينَ يُؤْمِنُونَ بِاٰيَاتِنَا فَقُلْ سَلَامٌ عَلَيْكُمْ كَتَبَ رَبُّكُمْ عَلٰى نَفْسِهِ الرَّحْمَةَۙ اَنَّهُ مَنْ عَمِلَ مِنْكُمْ سُٓوءًا بِجَهَالَةٍ ثُمَّ تَابَ مِنْ بَعْدِه۪ وَاَصْلَحَ فَاَنَّهُ غَفُورٌ رَح۪يمٌ54
और जब तुम्हारे पास वे लोग आएँ, जो हमारी आयतों को मानते है, तो कहो, "सलाम हो तुमपर! तुम्हारे रब ने दयालुता को अपने ऊपर अनिवार्य कर लिया है कि तुममें से जो कोई नासमझी से कोई बुराई कर बैठे, फिर उसके बाद पलट आए और अपना सुधार कर तो यह है वह बड़ा क्षमाशील, दयावान है।"
وَكَذٰلِكَ نُفَصِّلُ الْاٰيَاتِ وَلِتَسْتَب۪ينَ سَب۪يلُ الْمُجْرِم۪ينَ۟55
इसी प्रकार हम अपनी आयतें खोल-खोलकर बयान करते है (ताकि तुम हर ज़रूरी बात जान लो) और इसलिए कि अपराधियों का मार्ग स्पष्ट हो जाए
قُلْ اِنّ۪ي نُه۪يتُ اَنْ اَعْبُدَ الَّذ۪ينَ تَدْعُونَ مِنْ دُونِ اللّٰهِۜ قُلْ لَٓا اَتَّبِعُ اَهْوَٓاءَكُمْۙ قَدْ ضَلَلْتُ اِذًا وَمَٓا اَنَا۬ مِنَ الْمُهْتَد۪ينَ56
कह दो, "तुम लोग अल्लाह से हटकर जिन्हें पुकारते हो, उनकी बन्दगी करने से मुझे रोका गया है।" कहो, "मैं तुम्हारी इच्छाओं का अनुपालन नहीं करता, क्योंकि तब तो मैं मार्ग से भटक गया और मार्ग पानेवालों में से न रहा।"
قُلْ اِنّ۪ي عَلٰى بَيِّنَةٍ مِنْ رَبّ۪ي وَكَذَّبْتُمْ بِه۪ۜ مَا عِنْد۪ي مَا تَسْتَعْجِلُونَ بِه۪ۜ اِنِ الْحُكْمُ اِلَّا لِلّٰهِۜ يَقُصُّ الْحَقَّ وَهُوَ خَيْرُ الْفَاصِل۪ينَ57
कह दो, "मैं अपने रब की ओर से एक स्पष्ट प्रमाण पर क़ायम हूँ और तुमने उसे झुठला दिया है। जिस चीज़ के लिए तुम जल्दी मचा रहे हो, वह कोई मेरे पास तो नहीं है। निर्णय का सारा अधिकार अल्लाह ही को है, वही सच्ची बात बयान करता है और वही सबसे अच्छा निर्णायक है।"
قُلْ لَوْ اَنَّ عِنْد۪ي مَا تَسْتَعْجِلُونَ بِه۪ لَقُضِيَ الْاَمْرُ بَيْن۪ي وَبَيْنَكُمْۜ وَاللّٰهُ اَعْلَمُ بِالظَّالِم۪ينَ58
कह दो, "जिस चीज़ की तुम्हें जल्दी पड़ी हुई है, यदि कहीं वह चीज़ मेरे पास होती तो मेरे और तुम्हारे बीच कभी का फ़ैसला हो चुका होता। और अल्लाह अत्याचारियों को भली-भाती जानता है।"
وَعِنْدَهُ مَفَاتِحُ الْغَيْبِ لَا يَعْلَمُهَٓا اِلَّا هُوَۜ وَيَعْلَمُ مَا فِي الْبَرِّ وَالْبَحْرِۜ وَمَا تَسْقُطُ مِنْ وَرَقَةٍ اِلَّا يَعْلَمُهَا وَلَا حَبَّةٍ ف۪ي ظُلُمَاتِ الْاَرْضِ وَلَا رَطْبٍ وَلَا يَابِسٍ اِلَّا ف۪ي كِتَابٍ مُب۪ينٍ59
उसी के पास परोक्ष की कुंजियाँ है, जिन्हें उसके सिवा कोई नहीं जानता। जल और थल में जो कुछ है, उसे वह जानता है। और जो पत्ता भी गिरता है, उसे वह निश्चय ही जानता है। और धरती के अँधेरों में कोई दाना हो और कोई भी आर्द्र (गीली) और शुष्क (सूखी) चीज़ हो, निश्चय ही एक स्पष्ट किताब में मौजूद है
وَهُوَ الَّذ۪ي يَتَوَفّٰيكُمْ بِالَّيْلِ وَيَعْلَمُ مَا جَرَحْتُمْ بِالنَّهَارِ ثُمَّ يَبْعَثُكُمْ ف۪يهِ لِيُقْضٰٓى اَجَلٌ مُسَمًّىۚ ثُمَّ اِلَيْهِ مَرْجِعُكُمْ ثُمَّ يُنَبِّئُكُمْ بِمَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ۟60
और वही है जो रात को तुम्हें मौत देता है और दिन में जो कुछ तुमने किया उसे जानता है। फिर वह इसलिए तुम्हें उठाता है, ताकि निश्चित अवधि पूरा हो जाए; फिर उसी की ओर तुम्हें लौटना है, फिर वह तुम्हें बता देगा जो कुछ तुम करते रहे हो
وَهُوَ الْقَاهِرُ فَوْقَ عِبَادِه۪ وَيُرْسِلُ عَلَيْكُمْ حَفَظَةًۜ حَتّٰٓى اِذَا جَٓاءَ اَحَدَكُمُ الْمَوْتُ تَوَفَّتْهُ رُسُلُنَا وَهُمْ لَا يُفَرِّطُونَ61
और वही अपने बन्दों पर पूरा-पूरा क़ाबू रखनेवाला है और वह तुमपर निगरानी करनेवाले को नियुक्त करके भेजता है, यहाँ तक कि जब तुममें से किसी की मृत्यु आ जाती है, जो हमारे भेजे हुए कार्यकर्त्ता उसे अपने क़ब्ज़े में कर लेते है और वे कोई कोताही नहीं करते
ثُمَّ رُدُّٓوا اِلَى اللّٰهِ مَوْلٰيهُمُ الْحَقِّۜ اَلَا لَهُ الْحُكْمُ وَهُوَ اَسْرَعُ الْحَاسِب۪ينَ62
फिर सब अल्लाह की ओर, जो उसका वास्तविक स्वामी है, लौट जाएँगे। जान लो, निर्णय का अधिकार उसी को है और वह बहुत जल्द हिसाब लेनेवाला है
قُلْ مَنْ يُنَجّ۪يكُمْ مِنْ ظُلُمَاتِ الْبَرِّ وَالْبَحْرِ تَدْعُونَهُ تَضَرُّعًا وَخُفْيَةًۚ لَئِنْ اَنْجٰينَا مِنْ هٰذِه۪ لَنَكُونَنَّ مِنَ الشَّاكِر۪ينَ63
कहो, "कौन है जो थल और जल के अँधेरो से तुम्हे छुटकारा देता है, जिसे तुम गिड़गिड़ाते हुए और चुपके-चुपके पुकारने लगते हो कि यदि हमें इससे बचा लिया तो हम अवश्य की कृतज्ञ हो जाएँगे?"
قُلِ اللّٰهُ يُنَجّ۪يكُمْ مِنْهَا وَمِنْ كُلِّ كَرْبٍ ثُمَّ اَنْتُمْ تُشْرِكُونَ64
कहो, "अल्लाह तुम्हें इनसे और हरके बेचैनी और पीड़ा से छुटकारा देता है, लेकिन फिर तुम उसका साझीदार ठहराने लगते हो।"
قُلْ هُوَ الْقَادِرُ عَلٰٓى اَنْ يَبْعَثَ عَلَيْكُمْ عَذَابًا مِنْ فَوْقِكُمْ اَوْ مِنْ تَحْتِ اَرْجُلِكُمْ اَوْ يَلْبِسَكُمْ شِيَعًا وَيُذ۪يقَ بَعْضَكُمْ بَاْسَ بَعْضٍۜ اُنْظُرْ كَيْفَ نُصَرِّفُ الْاٰيَاتِ لَعَلَّهُمْ يَفْقَهُونَ65
कहो, "वह इसकी सामर्थ्य रखता है कि तुमपर तुम्हारे ऊपर से या तुम्हारे पैरों के नीचे से कोई यातना भेज दे या तुम्हें टोलियों में बाँटकर परस्पर भिड़ा दे और एक को दूसरे की लड़ाई का मज़ा चखाए।" देखो, हम आयतों को कैसे, तरह-तरह से, बयान करते है, ताकि वे समझे
وَكَذَّبَ بِه۪ قَوْمُكَ وَهُوَ الْحَقُّۜ قُلْ لَسْتُ عَلَيْكُمْ بِوَك۪يلٍۜ66
तुम्हारी क़ौम ने तो उसे झुठला दिया, हालाँकि वह सत्य है। कह दो, मैं "तुमपर कोई संरक्षक नियुक्त नहीं हूँ
لِكُلِّ نَبَاٍ مُسْتَقَرٌّۘ وَسَوْفَ تَعْلَمُونَ67
"हर ख़बर का एक निश्चित समय है और शीघ्र ही तुम्हें ज्ञात हो जाएगा।"
وَاِذَا رَاَيْتَ الَّذ۪ينَ يَخُوضُونَ ف۪ٓي اٰيَاتِنَا فَاَعْرِضْ عَنْهُمْ حَتّٰى يَخُوضُوا ف۪ي حَد۪يثٍ غَيْرِه۪ۜ وَاِمَّا يُنْسِيَنَّكَ الشَّيْطَانُ فَلَا تَقْعُدْ بَعْدَ الذِّكْرٰى مَعَ الْقَوْمِ الظَّالِم۪ينَ68
और जब तुम उन लोगों को देखो, जो हमारी आयतों पर नुक्ताचीनी करने में लगे हुए है, तो उनसे मुँह फेर लो, ताकि वे किसी दूसरी बात में लग जाएँ। और यदि कभी शैतान तुम्हें भुलावे में डाल दे, तो याद आ जाने के बाद उन अत्याचारियों के पास न बैठो
وَمَا عَلَى الَّذ۪ينَ يَتَّقُونَ مِنْ حِسَابِهِمْ مِنْ شَيْءٍ وَلٰكِنْ ذِكْرٰى لَعَلَّهُمْ يَتَّقُونَ69
उनके हिसाब के प्रति तो उन लोगो पर कुछ भी ज़िम्मेदारी नहीं, जो डर रखते है। यदि है तो बस याद दिलाने की; ताकि वे डरें
وَذَرِ الَّذ۪ينَ اتَّخَذُوا د۪ينَهُمْ لَعِبًا وَلَهْوًا وَغَرَّتْهُمُ الْحَيٰوةُ الدُّنْيَا وَذَكِّرْ بِه۪ٓ اَنْ تُبْسَلَ نَفْسٌ بِمَا كَسَبَتْۗ لَيْسَ لَهَا مِنْ دُونِ اللّٰهِ وَلِيٌّ وَلَا شَف۪يعٌۚ وَاِنْ تَعْدِلْ كُلَّ عَدْلٍ لَا يُؤْخَذْ مِنْهَاۜ اُو۬لٰٓئِكَ الَّذ۪ينَ اُبْسِلُوا بِمَا كَسَبُواۚ لَهُمْ شَرَابٌ مِنْ حَم۪يمٍ وَعَذَابٌ اَل۪يمٌ بِمَا كَانُوا يَكْفُرُونَ۟70
छोड़ो उन लोगों को, जिन्होंने अपने धर्म को खेल और तमाशा बना लिया है और उन्हें सांसारिक जीवन ने धोखे में डाल रखा है। और इसके द्वारा उन्हें नसीहत करते रहो कि कहीं ऐसा न हो कि कोई अपनी कमाई के कारण तबाही में पड़ जाए। अल्लाह से हटकर कोई भी नहीं, जो उसका समर्थक और सिफ़ारिश करनेवाला हो सके और यदि वह छुटकारा पाने के लिए बदले के रूप में हर सम्भव चीज़ देने लगे, तो भी वह उससे न लिया जाए। ऐसे ही लोग है, जो अपनी कमाई के कारण तबाही में पड गए। उनके लिए पीने को खौलता हुआ पानी है और दुखद यातना भी; क्योंकि वे इनकार करते रहे थे
قُلْ اَنَدْعُوا مِنْ دُونِ اللّٰهِ مَا لَا يَنْفَعُنَا وَلَا يَضُرُّنَا وَنُرَدُّ عَلٰٓى اَعْقَابِنَا بَعْدَ اِذْ هَدٰينَا اللّٰهُ كَالَّذِي اسْتَهْوَتْهُ الشَّيَاط۪ينُ فِي الْاَرْضِ حَيْرَانَۖ لَهُٓ اَصْحَابٌ يَدْعُونَهُٓ اِلَى الْهُدَى ائْتِنَاۜ قُلْ اِنَّ هُدَى اللّٰهِ هُوَ الْهُدٰىۜ وَاُمِرْنَا لِنُسْلِمَ لِرَبِّ الْعَالَم۪ينَۙ71
कहो, "क्या हम अल्लाह को छोड़कर उसे पुकारने लग जाएँ जो न तो हमें लाभ पहुँचा सके और न हमें हानि पहुँचा सके और हम उलटे पाँव फिर जाएँ, जबकि अल्लाह ने हमें मार्ग पर लगा दिया है? - उस व्यक्ति की तरह जिसे शैतानों ने धरती पर भटका दिया हो और वह हैरान होकर रह गया हो। उसके कुछ साथी हो, जो उसे मार्ग की ओर बुला रहे हो कि हमारे पास चला आ!" कह दो, "मार्गदर्शन केवल अल्लाह का मार्गदर्शन है और हमें इसी बात का आदेश हुआ है कि हम सारे संसार के स्वामी को समर्पित हो जाएँ।"
وَاَنْ اَق۪يمُوا الصَّلٰوةَ وَاتَّقُوهُۜ وَهُوَ الَّذ۪ٓي اِلَيْهِ تُحْشَرُونَ72
और यह कि "नमाज़ क़ायम करो और उसका डर रखो। वही है, जिसके पास तुम इकट्ठे किए जाओगे,
وَهُوَ الَّذ۪ي خَلَقَ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضَ بِالْحَقِّۜ وَيَوْمَ يَقُولُ كُنْ فَيَكُونُۜ قَوْلُهُ الْحَقُّۜ وَلَهُ الْمُلْكُ يَوْمَ يُنْفَخُ فِي الصُّورِۜ عَالِمُ الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِۜ وَهُوَ الْحَك۪يمُ الْخَب۪يرُ73
"और वही है जिसने आकाशों और धरती को हक़ के साथ पैदा किया। और जिस समय वह किसी चीज़ को कहे, 'हो जा', तो वह उसी समय वह हो जाती है। उसकी बात सर्वथा सत्य है और जिस दिन 'सूर' (नरसिंघा) में फूँक मारी जाएगी, राज्य उसी का होगा। वह सभी छिपी और खुली चीज़ का जाननेवाला है, और वही तत्वदर्शी, ख़बर रखनेवाला है।"
وَاِذْ قَالَ اِبْرٰه۪يمُ لِاَب۪يهِ اٰزَرَ اَتَتَّخِذُ اَصْنَامًا اٰلِهَةًۚ اِنّ۪ٓي اَرٰيكَ وَقَوْمَكَ ف۪ي ضَلَالٍ مُب۪ينٍ74
और याद करो, जब इबराहीम ने अपने बाप आज़र से कहा था, "क्या तुम मूर्तियों को पूज्य बनाते हो? मैं तो तुम्हें और तुम्हारी क़ौम को खुली गुमराही में पड़ा देख रहा हूँ।"
وَكَذٰلِكَ نُر۪ٓي اِبْرٰه۪يمَ مَلَكُوتَ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِ وَلِيَكُونَ مِنَ الْمُوقِن۪ينَ75
और इस प्रकार हम इबराहीम को आकाशों और धरती का राज्य दिखाने लगे (ताकि उसके ज्ञान का विस्तार हो) और इसलिए कि उसे विश्वास हो
فَلَمَّا جَنَّ عَلَيْهِ الَّيْلُ رَاٰ كَوْكَبًاۚ قَالَ هٰذَا رَبّ۪يۚ فَلَمَّٓا اَفَلَ قَالَ لَٓا اُحِبُّ الْاٰفِل۪ينَ76
अतएवः जब रात उसपर छा गई, तो उसने एक तारा देखा। उसने कहा, "इसे मेरा रब ठहराते हो!" फिर जब वह छिप गया तो बोला, "छिप जानेवालों से मैं प्रेम नहीं करता।"
فَلَمَّا رَاَ الْقَمَرَ بَازِغًا قَالَ هٰذَا رَبّ۪يۚ فَلَمَّٓا اَفَلَ قَالَ لَئِنْ لَمْ يَهْدِن۪ي رَبّ۪ي لَاَكُونَنَّ مِنَ الْقَوْمِ الضَّٓالّ۪ينَ77
फिर जब उसने चाँद को चमकता हुआ देखा, तो कहा, "इसको मेरा रब ठहराते हो!" फिर जब वह छिप गया, तो कहा, "यदि मेरा रब मुझे मार्ग न दिखाता तो मैं भी पथभ्रष्ट! लोगों में सम्मिलित हो जाता।"
فَلَمَّا رَاَ الشَّمْسَ بَازِغَةً قَالَ هٰذَا رَبّ۪ي هٰذَٓا اَكْبَرُۚ فَلَمَّٓا اَفَلَتْ قَالَ يَا قَوْمِ اِنّ۪ي بَر۪ٓيءٌ مِمَّا تُشْرِكُونَ78
फिर जब उसने सूर्य को चमकता हुआ देखा, तो कहा, "इसे मेरा रब ठहराते हो! यह तो बहुत बड़ा है।" फिर जब वह भी छिप गया, तो कहा, "ऐ मेरी क़ौन के लोगो! मैं विरक्त हूँ उनसे जिनको तुम साझी ठहराते हो
اِنّ۪ي وَجَّهْتُ وَجْهِيَ لِلَّذ۪ي فَطَرَ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضَ حَن۪يفًا وَمَٓا اَنَا۬ مِنَ الْمُشْرِك۪ينَۚ79
"मैंने तो एकाग्र होकर अपना मुख उसकी ओर कर लिया है, जिसने आकाशों और धरती को पैदा किया। और मैं साझी ठहरानेवालों में से नहीं।"
وَحَٓاجَّهُ قَوْمُهُۜ قَالَ اَتُحَٓاجُّٓونّ۪ي فِي اللّٰهِ وَقَدْ هَدٰينِۜ وَلَٓا اَخَافُ مَا تُشْرِكُونَ بِه۪ٓ اِلَّٓا اَنْ يَشَٓاءَ رَبّ۪ي شَيْـًٔاۜ وَسِعَ رَبّ۪ي كُلَّ شَيْءٍ عِلْمًاۜ اَفَلَا تَتَذَكَّرُونَ80
उसकी क़ौम के लोग उससे झगड़ने लगे। उसने कहा, "क्या तुम मुझसे अल्लाह के विषय में झगड़ते हो? जबकि उसने मुझे मार्ग दिखा दिया है। मैं उनसे नहीं डरता, जिन्हें तुम उसका सहभागी ठहराते हो, बल्कि मेरा रब जो कुछ चाहता है वही पूरा होकर रहता है। प्रत्येक वस्तु मेरे रब की ज्ञान-परिधि के भीतर है। फिर क्या तुम चेतोगे नहीं?
وَكَيْفَ اَخَافُ مَٓا اَشْرَكْتُمْ وَلَا تَخَافُونَ اَنَّكُمْ اَشْرَكْتُمْ بِاللّٰهِ مَا لَمْ يُنَزِّلْ بِه۪ عَلَيْكُمْ سُلْطَانًاۜ فَاَيُّ الْفَر۪يقَيْنِ اَحَقُّ بِالْاَمْنِۚ اِنْ كُنْتُمْ تَعْلَمُونَۢ81
"और मैं तुम्हारे ठहराए हुए साझीदारो से कैसे डरूँ, जबकि तुम इस बात से नहीं डरते कि तुमने उसे अल्लाह का सहभागी उस चीज़ को ठहराया है, जिसका उसने तुमपर कोई प्रमाण अवतरित नहीं किया? अब दोनों फ़रीकों में से कौन अधिक निश्चिन्त रहने का अधिकारी है? बताओ यदि तुम जानते हो
اَلَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَلَمْ يَلْبِسُٓوا ا۪يمَانَهُمْ بِظُلْمٍ اُو۬لٰٓئِكَ لَهُمُ الْاَمْنُ وَهُمْ مُهْتَدُونَ۟82
"जो लोग ईमान लाए और अपने ईमान में किसी (शिर्क) ज़ुल्म की मिलावट नहीं की, वही लोग है जो भय मुक्त है और वही सीधे मार्ग पर हैं।"
وَتِلْكَ حُجَّتُنَٓا اٰتَيْنَاهَٓا اِبْرٰه۪يمَ عَلٰى قَوْمِه۪ۜ نَرْفَعُ دَرَجَاتٍ مَنْ نَشَٓاءُۜ اِنَّ رَبَّكَ حَك۪يمٌ عَل۪يمٌ83
यह है हमारा वह तर्क जो हमने इबराहीम को उसकी अपनी क़ौम के मुक़ाबले में प्रदान किया था। हम जिसे चाहते है दर्जों (श्रेणियों) में ऊँचा कर देते हैं। निस्संदेह तुम्हारा रब तत्वदर्शी, सर्वज्ञ है
وَوَهَبْنَا لَهُٓ اِسْحٰقَ وَيَعْقُوبَۜ كُلًّا هَدَيْنَاۚ وَنُوحًا هَدَيْنَا مِنْ قَبْلُ وَمِنْ ذُرِّيَّتِه۪ دَاوُ۫دَ وَسُلَيْمٰنَ وَاَيُّوبَ وَيُوسُفَ وَمُوسٰى وَهٰرُونَۜ وَكَذٰلِكَ نَجْزِي الْمُحْسِن۪ينَۙ84
और हमने उसे (इबराहीम को) इसहाक़ और याक़ूब दिए; हर एक को मार्ग दिखाया - और नूह को हमने इससे पहले मार्ग दिखाया था, और उसकी सन्तान में दाऊद, सुलैमान, अय्यूब, यूसुफ़, मूसा और हारून को भी - और इस प्रकार हम शुभ-सुन्दर कर्म करनेवालों को बदला देते है -
وَزَكَرِيَّا وَيَحْيٰى وَع۪يسٰى وَاِلْيَاسَۜ كُلٌّ مِنَ الصَّالِح۪ينَۙ85
और ज़करिया, यह्या , ईसा और इलयास को भी (मार्ग दिखलाया) । इनमें का हर एक योग्य और नेक था
وَاِسْمٰع۪يلَ وَالْيَسَعَ وَيُونُسَ وَلُوطًاۜ وَكُلًّا فَضَّلْنَا عَلَى الْعَالَم۪ينَۙ86
और इसमाईल, अलयसअ, यूनुस और लूत को भी। इनमें से हर एक को हमने संसार के मुक़ाबले में श्रेष्ठता प्रदान की
وَمِنْ اٰبَٓائِهِمْ وَذُرِّيَّاتِهِمْ وَاِخْوَانِهِمْۚ وَاجْتَبَيْنَاهُمْ وَهَدَيْنَاهُمْ اِلٰى صِرَاطٍ مُسْتَق۪يمٍ87
और उनके बाप-दादा और उनकी सन्तान और उनके भाई-बन्धुओं में भी कितने ही लोगों को (मार्ग दिखाया) । और हमने उन्हें चुन लिया और उन्हें सीधे मार्ग की ओर चलाया
ذٰلِكَ هُدَى اللّٰهِ يَهْد۪ي بِه۪ مَنْ يَشَٓاءُ مِنْ عِبَادِه۪ۜ وَلَوْ اَشْرَكُوا لَحَبِطَ عَنْهُمْ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ88
यह अल्लाह का मार्गदर्शन है, जिसके द्वारा वह अपने बन्दों में से जिसको चाहता है मार्ग दिखाता है, और यदि उन लोगों ने कहीं अल्लाह का साझी ठहराया होता, तो उनका सब किया-धरा अकारथ हो जाता
اُو۬لٰٓئِكَ الَّذ۪ينَ اٰتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ وَالْحُكْمَ وَالنُّبُوَّةَۚ فَاِنْ يَكْفُرْ بِهَا هٰٓؤُ۬لَٓاءِ فَقَدْ وَكَّلْنَا بِهَا قَوْمًا لَيْسُوا بِهَا بِكَافِر۪ينَ89
वे ऐसे लोग है जिन्हें हमने किताब और निर्णय-शक्ति और पैग़म्बरी प्रदान की थी (उसी प्रकार हमने मुहम्मद को भी किताब, निर्णय-शक्ति और पैग़म्बरी दी है) । फिर यदि ये लोग इसे मारने से इनकार करें, तो अब हमने इसको ऐसे लोगों को सौंपा है जो इसका इनकार नहीं करते
اُو۬لٰٓئِكَ الَّذ۪ينَ هَدَى اللّٰهُ فَبِهُدٰيهُمُ اقْتَدِهْۜ قُلْ لَٓا اَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ اَجْرًاۜ اِنْ هُوَ اِلَّا ذِكْرٰى لِلْعَالَم۪ينَ۟90
वे (पिछले पैग़म्बर) ऐसे लोग थे, जिन्हें अल्लाह ने मार्ग दिखाया था, तो तुम उन्हीं के मार्ग का अनुसरण करो। कह दो, "मैं तुमसे उसका कोई प्रतिदान नहीं माँगता। वह तो सम्पूर्ण संसार के लिए बस एक प्रबोध है।"
وَمَا قَدَرُوا اللّٰهَ حَقَّ قَدْرِه۪ٓ اِذْ قَالُوا مَٓا اَنْزَلَ اللّٰهُ عَلٰى بَشَرٍ مِنْ شَيْءٍۜ قُلْ مَنْ اَنْزَلَ الْكِتَابَ الَّذ۪ي جَٓاءَ بِه۪ مُوسٰى نُورًا وَهُدًى لِلنَّاسِ تَجْعَلُونَهُ قَرَاط۪يسَ تُبْدُونَهَا وَتُخْفُونَ كَث۪يرًاۚ وَعُلِّمْتُمْ مَا لَمْ تَعْلَمُٓوا اَنْتُمْ وَلَٓا اٰبَٓاؤُ۬كُمْۜ قُلِ اللّٰهُۙ ثُمَّ ذَرْهُمْ ف۪ي خَوْضِهِمْ يَلْعَبُونَ91
उन्होंने अल्लाह की क़द्र न जानी, जैसी उसकी क़द्र जाननी चाहिए थी, जबकि उन्होंने कहा, "अल्लाह ने किसी मनुष्य पर कुछ अवतरित ही नहीं किया है।" कहो, "फिर यह किताब किसने अवतरित की, जो मूसा लोगों के लिए प्रकाश और मार्गदर्शन के रूप में लाया था, जिसे तुम पन्ना-पन्ना करके रखते हो? उन्हें दिखाते भी हो, परन्तु बहुत-सा छिपा जाते हो। और तुम्हें वह ज्ञान दिया गया, जिसे न तुम जानते थे और न तुम्हारे बाप-दादा ही।" कह दो, "अल्लाह ही ने," फिर उन्हें छोड़ो कि वे अपनी नुक्ताचीनियों से खेलते रहें
وَهٰذَا كِتَابٌ اَنْزَلْنَاهُ مُبَارَكٌ مُصَدِّقُ الَّذ۪ي بَيْنَ يَدَيْهِ وَلِتُنْذِرَ اُمَّ الْقُرٰى وَمَنْ حَوْلَهَاۜ وَالَّذ۪ينَ يُؤْمِنُونَ بِالْاٰخِرَةِ يُؤْمِنُونَ بِه۪ وَهُمْ عَلٰى صَلَاتِهِمْ يُحَافِظُونَ92
यह किताब है जिसे हमने उतारा है; बरकतवाली है; अपने से पहले की पुष्टि में है (ताकि तुम शुभ-सूचना दो) और ताकि तुम केन्द्रीय बस्ती (मक्का) और उसके चतुर्दिक बसनेवाले लोगों को सचेत करो और जो लोग आख़िरत पर ईमान रखते है, वे इसपर भी ईमान लाते है। और वे अपनी नमाज़ की रक्षा करते है
وَمَنْ اَظْلَمُ مِمَّنِ افْتَرٰى عَلَى اللّٰهِ كَذِبًا اَوْ قَالَ اُو۫حِيَ اِلَيَّ وَلَمْ يُوحَ اِلَيْهِ شَيْءٌ وَمَنْ قَالَ سَاُنْزِلُ مِثْلَ مَٓا اَنْزَلَ اللّٰهُۜ وَلَوْ تَرٰٓى اِذِ الظَّالِمُونَ ف۪ي غَمَرَاتِ الْمَوْتِ وَالْمَلٰٓئِكَةُ بَاسِطُٓوا اَيْد۪يهِمْۚ اَخْرِجُٓوا اَنْفُسَكُمْۜ اَلْيَوْمَ تُجْزَوْنَ عَذَابَ الْهُونِ بِمَا كُنْتُمْ تَقُولُونَ عَلَى اللّٰهِ غَيْرَ الْحَقِّ وَكُنْتُمْ عَنْ اٰيَاتِه۪ تَسْتَكْبِرُونَ93
और उस व्यक्ति से बढ़कर अत्याचारी कौन होगा, जो अल्लाह पर मिथ्यारोपण करे या यह कहे कि "मेरी ओर प्रकाशना (वह्य,) की गई है," हालाँकि उसकी ओर भी प्रकाशना न की गई हो। और वह व्यक्ति से (बढ़कर अत्याचारी कौन होगा) जो यह कहे कि "मैं भी ऐसी चीज़ उतार दूँगा, जैसी अल्लाह ने उतारी है।" और यदि तुम देख सकते, तुम अत्याचारी मृत्यु-यातनाओं में होते है और फ़रिश्ते अपने हाथ बढ़ा रहे होते है कि "निकालो अपने प्राण! आज तुम्हें अपमानजनक यातना दी जाएगी, क्योंकि तुम अल्लाह के प्रति झूठ बका करते थे और उसकी आयतों के मुक़ाबले में अकड़ते थे।"
وَلَقَدْ جِئْتُمُونَا فُرَادٰى كَمَا خَلَقْنَاكُمْ اَوَّلَ مَرَّةٍ وَتَرَكْتُمْ مَا خَوَّلْنَاكُمْ وَرَٓاءَ ظُهُورِكُمْۚ وَمَا نَرٰى مَعَكُمْ شُفَعَٓاءَكُمُ الَّذ۪ينَ زَعَمْتُمْ اَنَّهُمْ ف۪يكُمْ شُرَكٰٓؤُ۬اۜ لَقَدْ تَقَطَّعَ بَيْنَكُمْ وَضَلَّ عَنْكُمْ مَا كُنْتُمْ تَزْعُمُونَ۟94
और निश्चय ही तुम उसी प्रकार एक-एक करके हमारे पास आ गए, जिस प्रकार हमने तुम्हें पहली बार पैदा किया था। और जो कुछ हमने तुम्हें दे रखा था, उसे अपने पीछे छोड़ आए और हम तुम्हारे साथ तुम्हारे उन सिफ़ारिशियों को भी नहीं देख रहे हैं, जिनके विषय में तुम दावे से कहते थे, "वे तुम्हारे मामले में शरीक है।" तुम्हारे पारस्परिक सम्बन्ध टूट चुके है और वे सब तुमसे गुम होकर रह गए, जो दावे तुम किया करते थे
اِنَّ اللّٰهَ فَالِقُ الْحَبِّ وَالنَّوٰىۜ يُخْرِجُ الْحَيَّ مِنَ الْمَيِّتِ وَمُخْرِجُ الْمَيِّتِ مِنَ الْحَيِّۜ ذٰلِكُمُ اللّٰهُ فَاَنّٰى تُؤْفَكُونَ95
निश्चय ही अल्लाह दाने और गुठली को फाड़ निकालता है, सजीव को निर्जीव से निकालता है और निर्जीव को सजीव से निकालनेवाला है। वही अल्लाह है - फिर तुम कहाँ औंधे हुए जाते हो? -
فَالِقُ الْاِصْبَاحِۚ وَجَعَلَ الَّيْلَ سَكَنًا وَالشَّمْسَ وَالْقَمَرَ حُسْبَانًاۜ ذٰلِكَ تَقْد۪يرُ الْعَز۪يزِ الْعَل۪يمِ96
पौ फाड़ता है, और उसी ने रात को आराम के लिए बनाया और सूर्य और चन्द्रमा को (समय के) हिसाब का साधन ठहराया। यह बड़े शक्तिमान, सर्वज्ञ का ठहराया हुआ परिणाम है
وَهُوَ الَّذ۪ي جَعَلَ لَكُمُ النُّجُومَ لِتَهْتَدُوا بِهَا ف۪ي ظُلُمَاتِ الْبَرِّ وَالْبَحْرِۜ قَدْ فَصَّلْنَا الْاٰيَاتِ لِقَوْمٍ يَعْلَمُونَ97
और वही है जिसने तुम्हारे लिए तारे बनाए, ताकि तुम उनके द्वारा स्थल और समुद्र के अंधकारों में मार्ग पा सको। जो लोग जानना चाहे उनके लिए हमने निशानियाँ खोल-खोलकर बयान कर दी है
وَهُوَ الَّذ۪ٓي اَنْشَاَكُمْ مِنْ نَفْسٍ وَاحِدَةٍ فَمُسْتَقَرٌّ وَمُسْتَوْدَعٌۜ قَدْ فَصَّلْنَا الْاٰيَاتِ لِقَوْمٍ يَفْقَهُونَ98
और वही तो है, जिसने तुम्हें अकेली जान पैदा किया। अतः एक अवधि तक ठहरना है और फिर सौंप देना है। उन लोगों के लिए, जो समझे हमने निशानियाँ खोल-खोलकर बयान कर दी है
وَهُوَ الَّذ۪ٓي اَنْزَلَ مِنَ السَّمَٓاءِ مَٓاءًۚ فَاَخْرَجْنَا بِه۪ نَبَاتَ كُلِّ شَيْءٍ فَاَخْرَجْنَا مِنْهُ خَضِرًا نُخْرِجُ مِنْهُ حَبًّا مُتَرَاكِبًاۚ وَمِنَ النَّخْلِ مِنْ طَلْعِهَا قِنْوَانٌ دَانِيَةٌ وَجَنَّاتٍ مِنْ اَعْنَابٍ وَالزَّيْتُونَ وَالرُّمَّانَ مُشْتَبِهًا وَغَيْرَ مُتَشَابِهٍۜ اُنْظُرُٓوا اِلٰى ثَمَرِه۪ٓ اِذَٓا اَثْمَرَ وَيَنْعِه۪ۜ اِنَّ ف۪ي ذٰلِكُمْ لَاٰيَاتٍ لِقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ99
और वही है जिसने आकाश से पानी बरसाया, फिर हमने उसके द्वारा हर प्रकार की वनस्पति उगाई; फिर उससे हमने हरी-भरी पत्तियाँ निकाली और तने विकसित किए, जिससे हम तले-ऊपर चढे हुए दान निकालते है - और खजूर के गाभे से झुके पड़ते गुच्छे भी - और अंगूर, ज़ैतून और अनार के बाग़ लगाए, जो एक-दूसरे से भिन्न भी होते है। उसके फल को देखा, जब वह फलता है और उसके पकने को भी देखो! निस्संदेह ईमान लानेवाले लोगों को लिए इनमें बड़ी निशानियाँ है
وَجَعَلُوا لِلّٰهِ شُرَكَٓاءَ الْجِنَّ وَخَلَقَهُمْ وَخَرَقُوا لَهُ بَن۪ينَ وَبَنَاتٍ بِغَيْرِ عِلْمٍۜ سُبْحَانَهُ وَتَعَالٰى عَمَّا يَصِفُونَ۟100
और लोगों ने जिन्नों को अल्लाह का साझी ठहरा रखा है; हालाँकि उन्हें उसी ने पैदा किया है। और बेजाने-बूझे उनके लिए बेटे और बेटियाँ घड़ ली है। यह उसकी महिमा के प्रतिकूल है! यह उन बातों से उच्च है, जो वे बयान करते है!
بَد۪يعُ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ اَنّٰى يَكُونُ لَهُ وَلَدٌ وَلَمْ تَكُنْ لَهُ صَاحِبَةٌۜ وَخَلَقَ كُلَّ شَيْءٍۚ وَهُوَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَل۪يمٌ101
वह आकाशों और धरती का सर्वप्रथम पैदा करनेवाला है। उसका कोई बेटा कैसे हो सकता है, जबकि उसकी पत्नी ही नहीं? और उसी ने हर चीज़ को पैदा किया है और उसे हर चीज़ का ज्ञान है
ذٰلِكُمُ اللّٰهُ رَبُّكُمْۚ لَٓا اِلٰهَ اِلَّا هُوَۚ خَالِقُ كُلِّ شَيْءٍ فَاعْبُدُوهُۚ وَهُوَ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ وَك۪يلٌ102
वही अल्लाह तुम्हारा रब; उसके सिवा कोई पूज्य नहीं; हर चीज़ का स्रष्टा है; अतः तुम उसी की बन्दगी करो। वही हर चीज़ का ज़िम्मेदार है
لَا تُدْرِكُهُ الْاَبْصَارُۘ وَهُوَ يُدْرِكُ الْاَبْصَارَۚ وَهُوَ اللَّط۪يفُ الْخَب۪يرُ103
निगाहें उसे नहीं पा सकतीं, बल्कि वही निगाहों को पा लेता है। वह अत्यन्त सूक्ष्म (एवं सूक्ष्मदर्शी) ख़बर रखनेवाला है
قَدْ جَٓاءَكُمْ بَصَٓائِرُ مِنْ رَبِّكُمْۚ فَمَنْ اَبْصَرَ فَلِنَفْسِه۪ۚ وَمَنْ عَمِيَ فَعَلَيْهَاۜ وَمَٓا اَنَا۬ عَلَيْكُمْ بِحَف۪يظٍ104
तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से आँख खोल देनेवाले प्रमाण आ चुके है; तो जिस किसी ने देखा, अपना ही भला किया और जो अंधा बना रहा, तो वह अपने ही को हानि पहुँचाएगा। और मैं तुमपर कोई नियुक्त रखवाला नहीं हूँ
وَكَذٰلِكَ نُصَرِّفُ الْاٰيَاتِ وَلِيَقُولُوا دَرَسْتَ وَلِنُبَيِّنَهُ لِقَوْمٍ يَعْلَمُونَ105
और इसी प्रकार हम अपनी आयतें विभिन्न ढंग से बयान करते है (कि वे सुने) और इसलिए कि वे कह लें, "(ऐ मुहम्मद!) तुमनेकहीं से पढ़-पढ़ा लिया है।" और इसलिए भी कि हम उनके लिए जो जानना चाहें, सत्य को स्पष्ट कर दें
اِتَّبِعْ مَٓا اُو۫حِيَ اِلَيْكَ مِنْ رَبِّكَۚ لَٓا اِلٰهَ اِلَّا هُوَۚ وَاَعْرِضْ عَنِ الْمُشْرِك۪ينَ106
तुम्हारे रब की ओर से तुम्हारी तरफ़ जो वह्यो की गई है, उसी का अनुसरण किए जाओ, उसके सिवा कोई पूज्य नहीं और बहुदेववादियों (की कुनीति) पर ध्यान न दो
وَلَوْ شَٓاءَ اللّٰهُ مَٓا اَشْرَكُواۜ وَمَا جَعَلْنَاكَ عَلَيْهِمْ حَف۪يظًاۚ وَمَٓا اَنْتَ عَلَيْهِمْ بِوَك۪يلٍ107
यदि अल्लाह चाहता तो वे (उसका) साझी न ठहराते। तुम्हें हमने उनपर कोई नियुक्त संरक्षक तो नहीं बनाया है और न तुम उनके कोई ज़िम्मेदार ही हो
وَلَا تَسُبُّوا الَّذ۪ينَ يَدْعُونَ مِنْ دُونِ اللّٰهِ فَيَسُبُّوا اللّٰهَ عَدْوًا بِغَيْرِ عِلْمٍۜ كَذٰلِكَ زَيَّنَّا لِكُلِّ اُمَّةٍ عَمَلَهُمْ ثُمَّ اِلٰى رَبِّهِمْ مَرْجِعُهُمْ فَيُنَبِّئُهُمْ بِمَا كَانُوا يَعْمَلُونَ108
अल्लाह के सिवा जिन्हें ये पुकारते है, तुम उनके प्रति अपशब्द का प्रयोग न करो। ऐसा न हो कि वे हद से आगे बढ़कर अज्ञान वश अल्लाह के प्रति अपशब्द का प्रयोग करने लगें। इसी प्रकार हमने हर गिरोह के लिए उसके कर्म को सुहावना बना दिया है। फिर उन्हें अपने रब की ही ओर लौटना है। उस समय वह उन्हें बता देगा. जो कुछ वे करते रहे होंगे
وَاَقْسَمُوا بِاللّٰهِ جَهْدَ اَيْمَانِهِمْ لَئِنْ جَٓاءَتْهُمْ اٰيَةٌ لَيُؤْمِنُنَّ بِهَاۜ قُلْ اِنَّمَا الْاٰيَاتُ عِنْدَ اللّٰهِ وَمَا يُشْعِرُكُمْۙ اَنَّهَٓا اِذَا جَٓاءَتْ لَا يُؤْمِنُونَ109
वे लोग तो अल्लाह की कड़ी-कड़ी क़समें खाते है कि यदि उनके पास कोई निशानी आ जाए, तो उसपर वे अवश्य ईमान लाएँगे। कह दो, "निशानियाँ तो अल्लाह ही के पास है।" और तुम्हें क्या पता कि जब वे आ जाएँगी तो भी वे ईमान नहीं लाएँगे
وَنُقَلِّبُ اَفْـِٔدَتَهُمْ وَاَبْصَارَهُمْ كَمَا لَمْ يُؤْمِنُوا بِه۪ٓ اَوَّلَ مَرَّةٍ وَنَذَرُهُمْ ف۪ي طُغْيَانِهِمْ يَعْمَهُونَ۟110
और हम उनके दिलों और निगाहों को फेर देंगे, जिस प्रकार वे पहली बार ईमान नहीं लाए थे। और हम उन्हें छोड़ देंगे कि वे अपनी सरकशी में भटकते रहें