9. जुज़ - कुरान पढ़ें
7 · अल-आराफ़8 · अल-अनफाल
قَالَ الْمَلَاُ الَّذ۪ينَ اسْتَكْبَرُوا مِنْ قَوْمِه۪ لَنُخْرِجَنَّكَ يَا شُعَيْبُ وَالَّذ۪ينَ اٰمَنُوا مَعَكَ مِنْ قَرْيَتِنَٓا اَوْ لَتَعُودُنَّ ف۪ي مِلَّتِنَاۜ قَالَ اَوَلَوْ كُنَّا كَارِه۪ينَ88
उनकी क़ौम के सरदारों ने, जो घमंड में पड़े थे, कहा, "ऐ शुऐब! हम तुझे और तेरे साथ उन लोगों को, जो ईमान लाए है, अपनी बस्ती से निकालकर रहेंगे। या फिर तुम हमारे पन्थ में लौट आओ।" उसने कहा, "क्या (तुम यही चाहोगे) यद्यपि यह हमें अप्रिय हो जब भी?
قَدِ افْتَرَيْنَا عَلَى اللّٰهِ كَذِبًا اِنْ عُدْنَا ف۪ي مِلَّتِكُمْ بَعْدَ اِذْ نَجّٰينَا اللّٰهُ مِنْهَاۜ وَمَا يَكُونُ لَنَٓا اَنْ نَعُودَ ف۪يهَٓا اِلَّٓا اَنْ يَشَٓاءَ اللّٰهُ رَبُّنَاۜ وَسِعَ رَبُّنَا كُلَّ شَيْءٍ عِلْمًاۜ عَلَى اللّٰهِ تَوَكَّلْنَاۜ رَبَّنَا افْتَحْ بَيْنَنَا وَبَيْنَ قَوْمِنَا بِالْحَقِّ وَاَنْتَ خَيْرُ الْفَاتِح۪ينَ89
"हम अल्लाह पर झूठ घड़नेवाले ठहरेंगे, यदि तुम्हारे पन्थ में लौट आएँ, इसके बाद कि अल्लाह ने हमें उससे छुटकारा दे दिया है। यह हमसे तो होने का नहीं कि हम उसमें पलट कर जाएँ, बल्कि हमारे रब अल्लाह की इच्छा ही क्रियान्वित है। ज्ञान की स्पष्ट से हमारा रब हर चीज़ को अपने घेरे में लिए हुए है। हमने अल्लाह ही पर भरोसा किया है। हमारे रब, हमारे और हमारी क़ौम के बीच निश्चित अटल फ़ैसला कर दे। और तू सबसे अच्छा फ़ैसला करनेवाला है।"
وَقَالَ الْمَلَاُ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا مِنْ قَوْمِه۪ لَئِنِ اتَّبَعْتُمْ شُعَيْبًا اِنَّكُمْ اِذًا لَخَاسِرُونَ90
और क़ौम के सरदार, जिन्होंने इनकार किया था, बोले, "यदि तुम शुऐब के अनुयायी बने तो तुम घाटे में पड़ जाओगे।"
فَاَخَذَتْهُمُ الرَّجْفَةُ فَاَصْبَحُوا ف۪ي دَارِهِمْ جَاثِم۪ينَۚۛ91
अन्ततः एक दहला देनेवाली आपदा ने उन्हें आ लिया। फिर वे अपने घर में औंधे पड़े रह गए,
اَلَّذ۪ينَ كَذَّبُوا شُعَيْبًا كَاَنْ لَمْ يَغْنَوْا ف۪يهَاۚۛ اَلَّذ۪ينَ كَذَّبُوا شُعَيْبًا كَانُوا هُمُ الْخَاسِر۪ينَ92
शुऐब को झुठलानेवाले, मानो कभी वहाँ बसे ही न थे। शुऐब को झुठलानेवाले ही घाटे में रहे
فَتَوَلّٰى عَنْهُمْ وَقَالَ يَا قَوْمِ لَقَدْ اَبْلَغْتُكُمْ رِسَالَاتِ رَبّ۪ي وَنَصَحْتُ لَكُمْۚ فَكَيْفَ اٰسٰى عَلٰى قَوْمٍ كَافِر۪ينَ۟93
तब वह उनके यहाँ से यह कहता हुआ फिरा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मैंने अपने रब के सन्देश तुम्हें पहुँचा दिए और मैंने तुम्हारा हित चाहा। अब मैं इनकार करनेवाले लोगो पर कैसे अफ़सोस करूँ!"
وَمَٓا اَرْسَلْنَا ف۪ي قَرْيَةٍ مِنْ نَبِيٍّ اِلَّٓا اَخَذْنَٓا اَهْلَهَا بِالْبَاْسَٓاءِ وَالضَّرَّٓاءِ لَعَلَّهُمْ يَضَّرَّعُونَ94
हमने जिस बस्ती में भी कभी कोई नबी भेजा, तो वहाँ के लोगों को तंगी और मुसीबत में डाला, ताकि वे (हमारे सामने) गिड़गि़ड़ाए
ثُمَّ بَدَّلْنَا مَكَانَ السَّيِّئَةِ الْحَسَنَةَ حَتّٰى عَفَوْا وَقَالُوا قَدْ مَسَّ اٰبَٓاءَنَا الضَّرَّٓاءُ وَالسَّرَّٓاءُ فَاَخَذْنَاهُمْ بَغْتَةً وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ95
फिर हमने बदहाली को ख़ुशहाली में बदल दिया, यहाँ तक कि वे ख़ूब फले-फूले और कहने लगे, "ये दुख और सुख तो हमारे बाप-दादा को भी पहुँचे हैं।" अनततः जब वे बेखबर थे, हमने अचानक उन्हें पकड़ लिया
وَلَوْ اَنَّ اَهْلَ الْقُرٰٓى اٰمَنُوا وَاتَّقَوْا لَفَتَحْنَا عَلَيْهِمْ بَرَكَاتٍ مِنَ السَّمَٓاءِ وَالْاَرْضِ وَلٰكِنْ كَذَّبُوا فَاَخَذْنَاهُمْ بِمَا كَانُوا يَكْسِبُونَ96
यदि बस्तियों के लोग ईमान लाते और डर रखते तो अवश्य ही हम उनपर आकाश और धरती की बरकतें खोल देते, परन्तु उन्होंने तो झुठलाया। तो जो कुछ कमाई वे करते थे, उसके बदले में हमने उन्हें पकड़ लिया
اَفَاَمِنَ اَهْلُ الْقُرٰٓى اَنْ يَاْتِيَهُمْ بَاْسُنَا بَيَاتًا وَهُمْ نَٓائِمُونَۜ97
फिर क्या बस्तियों के लोगों को इस और से निश्चिन्त रहने का अवसर मिल सका कि रात में उनपर हमारी यातना आ जाए, जबकि वे सोए हुए हो?
اَوَاَمِنَ اَهْلُ الْقُرٰٓى اَنْ يَاْتِيَهُمْ بَاْسُنَا ضُحًى وَهُمْ يَلْعَبُونَ98
और क्या बस्तियों के लोगो को इस ओर से निश्चिन्त रहने का अवसर मिल सका कि दिन चढ़े उनपर हमारी यातना आ जाए, जबकि वे खेल रहे हों?
اَفَاَمِنُوا مَكْرَ اللّٰهِۚ فَلَا يَاْمَنُ مَكْرَ اللّٰهِ اِلَّا الْقَوْمُ الْخَاسِرُونَ۟99
आख़िर क्या वे अल्लाह की चाल से निश्चिन्त हो गए थे? तो (समझ लो उन्हें टोटे में पड़ना ही था, क्योंकि) अल्लाह की चाल से तो वही लोग निश्चित होते है, जो टोटे में पड़नेवाले होते है
اَوَلَمْ يَهْدِ لِلَّذ۪ينَ يَرِثُونَ الْاَرْضَ مِنْ بَعْدِ اَهْلِهَٓا اَنْ لَوْ نَشَٓاءُ اَصَبْنَاهُمْ بِذُنُوبِهِمْۚ وَنَطْبَعُ عَلٰى قُلُوبِهِمْ فَهُمْ لَا يَسْمَعُونَ100
क्या जो धरती के, उसके पूर्ववासियों के पश्चात उत्तराधिकारी हुए है, उनपर यह तथ्य प्रकट न हुआ कि यदि हम चाहें तो उनके गुनाहों पर उन्हें आ पकड़े? हम तो उनके दिलों पर मुहर लगा रहे हैं, क्योंकि वे कुछ भी नहीं सुनते
تِلْكَ الْقُرٰى نَقُصُّ عَلَيْكَ مِنْ اَنْبَٓائِهَاۚ وَلَقَدْ جَٓاءَتْهُمْ رُسُلُهُمْ بِالْبَيِّنَاتِۚ فَمَا كَانُوا لِيُؤْمِنُوا بِمَا كَذَّبُوا مِنْ قَبْلُۜ كَذٰلِكَ يَطْبَعُ اللّٰهُ عَلٰى قُلُوبِ الْكَافِر۪ينَ101
ये है वे बस्तियाँ जिनके कुछ वृत्तान्त हम तुमको सुना रहे है। उनके पास उनके रसूल खुली-खुली निशानियाँ लेकर आए परन्तु वे ऐसे न हुए कि ईमान लाते। इसका कारण यह था कि वे पहले से झुठलाते रहे थे। इसी प्रकार अल्लाह इनकार करनेवालों के दिलों पर मुहर लगा देता है
وَمَا وَجَدْنَا لِاَكْثَرِهِمْ مِنْ عَهْدٍۚ وَاِنْ وَجَدْنَٓا اَكْثَرَهُمْ لَفَاسِق۪ينَ102
हमने उनके अधिकतर लोगो में प्रतिज्ञा का निर्वाह न पाया, बल्कि उनके बहुतों को हमने उल्लंघनकारी ही पाया
ثُمَّ بَعَثْنَا مِنْ بَعْدِهِمْ مُوسٰى بِاٰيَاتِنَٓا اِلٰى فِرْعَوْنَ وَمَلَا۬ئِه۪ فَظَلَمُوا بِهَاۚ فَانْظُرْ كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الْمُفْسِد۪ينَ103
फिर उनके पश्चात हमने मूसा को अपनी निशानियों के साथ फ़िरऔन और उसके सरदारों के पास भेजा, परन्तु उन्होंने इनकार और स्वयं पर अत्याचार किया। तो देखो, इन बिगाड़ पैदा करनेवालों का कैसा परिणाम हुआ!
وَقَالَ مُوسٰى يَا فِرْعَوْنُ اِنّ۪ي رَسُولٌ مِنْ رَبِّ الْعَالَم۪ينَۚ104
मूसा ने कहा, "ऐ फ़िरऔन! मैं सारे संसार के रब का रसूल हूँ
حَقِيقٌ عَلٰٓى اَنْ لَٓا اَقُولَ عَلَى اللّٰهِ اِلَّا الْحَقَّۜ قَدْ جِئْتُكُمْ بِبَيِّنَةٍ مِنْ رَبِّكُمْ فَاَرْسِلْ مَعِيَ بَن۪ٓي اِسْرَٓاء۪يلَۜ105
"मैं इसका अधिकारी हूँ कि अल्लाह से सम्बद्ध करके सत्य के अतिरिक्त कोई बात न कहूँ। मैं तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से स्पष्ट प्रमाण लेकर आ गया हूँ। अतः तुम इसराईल की सन्तान को मेरे साथ जाने दो।"
قَالَ اِنْ كُنْتَ جِئْتَ بِاٰيَةٍ فَاْتِ بِهَٓا اِنْ كُنْتَ مِنَ الصَّادِق۪ينَ106
बोला, "यदि तुम कोई निशानी लेकर आए हो तो उसे पेश करो, यदि तुम सच्चे हो।"
فَاَلْقٰى عَصَاهُ فَاِذَا هِيَ ثُعْبَانٌ مُب۪ينٌۚ107
तब उसने अपनी लाठी डाल दी। क्या देखते है कि वह प्रत्यक्ष अजगर है
وَنَزَعَ يَدَهُ فَاِذَا هِيَ بَيْضَٓاءُ لِلنَّاظِر۪ينَ۟108
और उसने अपना हाथ निकाला, तो क्या देखते है कि वह सब देखनेवालों के सामने चमक रहा है
قَالَ الْمَلَاُ مِنْ قَوْمِ فِرْعَوْنَ اِنَّ هٰذَا لَسَاحِرٌ عَل۪يمٌۙ109
फ़िरऔन की क़ौम के सरदार कहने लगे, "अरे, यह तो बडा कुशल जादूगर है!
يُر۪يدُ اَنْ يُخْرِجَكُمْ مِنْ اَرْضِكُمْۚ فَمَاذَا تَاْمُرُونَ110
"तुम्हें तुम्हारी धरती से निकाल देना चाहता है। तो अब क्या कहते हो?"
قَالُٓوا اَرْجِهْ وَاَخَاهُ وَاَرْسِلْ فِي الْمَدَٓائِنِ حَاشِر۪ينَۙ111
उन्होंने कहा, "इसे और इसके भाई को प्रतीक्षा में रखो और नगरों में हरकारे भेज दो,
يَاْتُوكَ بِكُلِّ سَاحِرٍ عَل۪يمٍ112
"कि वे हर कुशल जादूगर को तुम्हारे पास ले आएँ।"
وَجَٓاءَ السَّحَرَةُ فِرْعَوْنَ قَالُٓوا اِنَّ لَنَا لَاَجْرًا اِنْ كُنَّا نَحْنُ الْغَالِب۪ينَ113
अतएव जादूगर फ़िरऔन के पास आ गए। कहने लगे, "यदि हम विजयी हुए तो अवश्य ही हमें बड़ा बदला मिलेगा?"
قَالَ نَعَمْ وَاِنَّكُمْ لَمِنَ الْمُقَرَّب۪ينَ114
उसने कहा, "हाँ, और बेशक तुम (मेरे) क़रीबियों में से हो जाओगे।"
قَالُوا يَا مُوسٰٓى اِمَّٓا اَنْ تُلْقِيَ وَاِمَّٓا اَنْ نَكُونَ نَحْنُ الْمُلْق۪ينَ115
उन्होंने कहा, "ऐ मूसा! या तुम डालो या फिर हम डालते हैं?"
قَالَ اَلْقُواۚ فَلَمَّٓا اَلْقَوْا سَحَرُٓوا اَعْيُنَ النَّاسِ وَاسْتَرْهَبُوهُمْ وَجَٓاؤُ۫ بِسِحْرٍ عَظ۪يمٍ116
उसने कहा, "तुम ही डालो।" फिर उन्होंने डाला तो लोगो की आँखों पर जादू कर दिया और उन्हें भयभीत कर दिया। उन्होंने एक बहुत बड़े जादू का प्रदर्शन किया
وَاَوْحَيْنَٓا اِلٰى مُوسٰٓى اَنْ اَلْقِ عَصَاكَۚ فَاِذَا هِيَ تَلْقَفُ مَا يَاْفِكُونَۚ117
हमने मूसा की ओर प्रकाशना कि कि "अपनी लाठी डाल दे।" फिर क्या देखते है कि वह उनके रचें हुए स्वांग को निगलती जा रही है
فَوَقَعَ الْحَقُّ وَبَطَلَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَۚ118
इस प्रकार सत्य प्रकट हो गया और जो कुछ वे कर रहे थे, मिथ्या होकर रहा
فَغُلِبُوا هُنَالِكَ وَانْقَلَبُوا صَاغِر۪ينَۚ119
अतः वे पराभूत हो गए और अपमानित होकर रहे
وَاُلْقِيَ السَّحَرَةُ سَاجِد۪ينَۚ120
और जादूगर सहसा सजदे में गिर पड़े
قَالُٓوا اٰمَنَّا بِرَبِّ الْعَالَم۪ينَۙ121
बोले, "हम सारे संसार के रब पर ईमान ले आए;
رَبِّ مُوسٰى وَهٰرُونَ122
"मूसा और हारून के रब पर।"
قَالَ فِرْعَوْنُ اٰمَنْتُمْ بِه۪ قَبْلَ اَنْ اٰذَنَ لَكُمْۚ اِنَّ هٰذَا لَمَكْرٌ مَكَرْتُمُوهُ فِي الْمَد۪ينَةِ لِتُخْرِجُوا مِنْهَٓا اَهْلَهَاۚ فَسَوْفَ تَعْلَمُونَ123
फ़िरऔन बोला, "इससे पहले कि मैं तुम्हें अनुमति दूँ, तं उसपर ईमान ले आए! यह तो एक चाल है, जो तुम लोग नगर में चले हो, ताकि उसके निवासियों को उससे निकाल दो। अच्छा, तो अब तुम्हें जल्द की मालूम हुआ जाता है!
لَاُقَطِّعَنَّ اَيْدِيَكُمْ وَاَرْجُلَكُمْ مِنْ خِلَافٍ ثُمَّ لَاُصَلِّبَنَّكُمْ اَجْمَع۪ينَ124
"मैं तुम्हारे हाथ और तुम्हारे पाँव विपरीत दिशाओं से काट दूँगा; फिर तुम सबको सूली पर चढ़ाकर रहूँगा।"
قَالُٓوا اِنَّٓا اِلٰى رَبِّنَا مُنْقَلِبُونَۚ125
उन्होंने कहा, "हम तो अपने रब ही की और लौटेंगे
وَمَا تَنْقِمُ مِنَّٓا اِلَّٓا اَنْ اٰمَنَّا بِاٰيَاتِ رَبِّنَا لَمَّا جَٓاءَتْنَاۜ رَبَّنَٓا اَفْرِغْ عَلَيْنَا صَبْرًا وَتَوَفَّنَا مُسْلِم۪ينَ۟126
"और तू केबल इस क्रोध से हमें कष्ट पहुँचाने के लिए पीछे पड़ गया है कि हम अपने रब की निशानियों पर ईमान ले आए। हमारे रब! हमपर धैर्य उड़ेल दे और हमें इस दशा में उठा कि हम मुस्लिम (आज्ञाकारी) हो।"
وَقَالَ الْمَلَاُ مِنْ قَوْمِ فِرْعَوْنَ اَتَذَرُ مُوسٰى وَقَوْمَهُ لِيُفْسِدُوا فِي الْاَرْضِ وَيَذَرَكَ وَاٰلِهَتَكَۜ قَالَ سَنُقَتِّلُ اَبْنَٓاءَهُمْ وَنَسْتَحْي۪ نِسَٓاءَهُمْۚ وَاِنَّا فَوْقَهُمْ قَاهِرُونَ127
फ़िरऔन की क़ौम के सरदार कहने लगे, "क्या तुम मूसा और उसकी क़ौम को ऐसे ही छोड़ दोगे कि वे ज़मीन में बिगाड़ पैदा करें और वे तुम्हें और तुम्हारे उपास्यों को छोड़ बैठे?" उसने कहा, "हम उनके बेटों को बुरी तरह क़त्ल करेंगे और उनकी स्त्रियों को जीवित रखेंगे। निश्चय ही हमें उनपर पूर्ण अधिकार प्राप्त है।"
قَالَ مُوسٰى لِقَوْمِهِ اسْتَع۪ينُوا بِاللّٰهِ وَاصْبِرُواۚ اِنَّ الْاَرْضَ لِلّٰهِ۠ يُورِثُهَا مَنْ يَشَٓاءُ مِنْ عِبَادِه۪ۜ وَالْعَاقِبَةُ لِلْمُتَّق۪ينَ128
मूसा ने अपनी क़ौम से कहा, "अल्लाह से सम्बद्ध होकर सहायता प्राप्त करो और धैर्य से काम लो। धरती अल्लाह की है। वह अपने बन्दों में से जिसे चाहता है, उसका वारिस बना देता है। और अंतिम परिणाम तो डर रखनेवालों ही के लिए है।"
قَالُٓوا اُو۫ذ۪ينَا مِنْ قَبْلِ اَنْ تَاْتِيَنَا وَمِنْ بَعْدِ مَا جِئْتَنَاۜ قَالَ عَسٰى رَبُّكُمْ اَنْ يُهْلِكَ عَدُوَّكُمْ وَيَسْتَخْلِفَكُمْ فِي الْاَرْضِ فَيَنْظُرَ كَيْفَ تَعْمَلُونَ۟129
उन्होंने कहा, "तुम्हारे आने से पहले भी हम सताए गए और तुम्हारे आने के बाद भी।" उसने कहा, "निकट है कि तुम्हारा रब तुम्हारे शत्रुओं को विनष्ट कर दे और तुम्हें धरती में ख़लीफ़ा बनाए, फिर यह देखे कि तुम कैसे कर्म करते हो।"
وَلَقَدْ اَخَذْنَٓا اٰلَ فِرْعَوْنَ بِالسِّن۪ينَ وَنَقْصٍ مِنَ الثَّمَرَاتِ لَعَلَّهُمْ يَذَّكَّرُونَ130
और हमने फ़िरऔनियों को कई वर्ष तक अकाल और पैदावार की कमी में ग्रस्त रखा कि वे चेतें
فَاِذَا جَٓاءَتْهُمُ الْحَسَنَةُ قَالُوا لَنَا هٰذِه۪ۚ وَاِنْ تُصِبْهُمْ سَيِّئَةٌ يَطَّيَّرُوا بِمُوسٰى وَمَنْ مَعَهُۜ اَلَٓا اِنَّمَا طَٓائِرُهُمْ عِنْدَ اللّٰهِ وَلٰكِنَّ اَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ131
फिर जब उन्हें अच्छी हालत पेश आती है तो कहते है, "यह तो है ही हमारे लिए।" और उन्हें बुरी हालत पेश आए तो वे उसे मूसा और उसके साथियों की नहूसत (अशकुन) ठहराएँ। सुन लो, उसकी नहूसत तो अल्लाह ही के पास है, परन्तु उनमें से अधिकतर लोग जानते नहीं
وَقَالُوا مَهْمَا تَاْتِنَا بِه۪ مِنْ اٰيَةٍ لِتَسْحَرَنَا بِهَاۙ فَمَا نَحْنُ لَكَ بِمُؤْمِن۪ينَ132
वे बोले, "तू हमपर जादू करने के लिए चाहे कोई भी निशानी हमारे पास ले आए, हम तुझपर ईमान लानेवाले नहीं।"
فَاَرْسَلْنَا عَلَيْهِمُ الطُّوفَانَ وَالْجَرَادَ وَالْقُمَّلَ وَالضَّفَادِعَ وَالدَّمَ اٰيَاتٍ مُفَصَّلَاتٍ فَاسْتَكْبَرُوا وَكَانُوا قَوْمًا مُجْرِم۪ينَ133
अन्ततः हमने उनपर तूफ़ान और टिड्डियों और छोटे कीड़े और मेंढक और रक्त, कितनी ही निशानियाँ अलग-अलग भेजी, किन्तु वे घमंड ही करते रहे। वे थे ही अपराधी लोग
وَلَمَّا وَقَعَ عَلَيْهِمُ الرِّجْزُ قَالُوا يَا مُوسَى ادْعُ لَنَا رَبَّكَ بِمَا عَهِدَ عِنْدَكَۚ لَئِنْ كَشَفْتَ عَنَّا الرِّجْزَ لَنُؤْمِنَنَّ لَكَ وَلَنُرْسِلَنَّ مَعَكَ بَن۪ٓي اِسْرَٓاء۪يلَۚ134
जब कभी उनपर यातना आ पड़ती, कहते है, "ऐ मूसा, हमारे लिए अपने रब से प्रार्थना करो, उस प्रतिज्ञा के आधार पर जो उसने तुमसे कर रखी है। तुमने यदि हमपर से यह यातना हटा दी, तो हम अवश्य ही तुमपर ईमान ले आएँगे और इसराईल की सन्तान को तुम्हारे साथ जाने देंगे।"
فَلَمَّا كَشَفْنَا عَنْهُمُ الرِّجْزَ اِلٰٓى اَجَلٍ هُمْ بَالِغُوهُ اِذَا هُمْ يَنْكُثُونَ135
किन्तु जब हम उनपर से यातना को एक नियत समय के लिए जिस तक वे पहुँचनेवाले ही थे, हटा लेते तो क्या देखते कि वे वचन-भंग करने लग गए
فَانْتَقَمْنَا مِنْهُمْ فَاَغْرَقْنَاهُمْ فِي الْيَمِّ بِاَنَّهُمْ كَذَّبُوا بِاٰيَاتِنَا وَكَانُوا عَنْهَا غَافِل۪ينَ136
फिर हमने उनसे बदला लिया और उन्हें गहरे पानी में डूबो दिया, क्योंकि उन्होंने हमारी निशानियों को ग़लत समझा और उनसे ग़ाफिल हो गए
وَاَوْرَثْنَا الْقَوْمَ الَّذ۪ينَ كَانُوا يُسْتَضْعَفُونَ مَشَارِقَ الْاَرْضِ وَمَغَارِبَهَا الَّت۪ي بَارَكْنَا ف۪يهَاۜ وَتَمَّتْ كَلِمَتُ رَبِّكَ الْحُسْنٰى عَلٰى بَن۪ٓي اِسْرَٓاء۪يلَ بِمَا صَبَرُواۜ وَدَمَّرْنَا مَا كَانَ يَصْنَعُ فِرْعَوْنُ وَقَوْمُهُ وَمَا كَانُوا يَعْرِشُونَ137
और जो लोग कमज़ोर पाए जाते थे, उन्हें हमने उस भू-भाग के पूरब के हिस्सों और पश्चिम के हिस्सों का उत्तराधिकारी बना दिया, जिसे हमने बरकत दी थी। और तुम्हारे रब का अच्छा वादा इसराईल की सन्तान के हक़ में पूरा हुआ, क्योंकि उन्होंने धैर्य से काम लिया और फ़िरऔन और उसकी क़ौम का वह सब कुछ हमने विनष्ट कर दिया, जिसे वे बनाते और ऊँचा उठाते थे
وَجَاوَزْنَا بِبَن۪ٓي اِسْرَٓاء۪يلَ الْبَحْرَ فَاَتَوْا عَلٰى قَوْمٍ يَعْكُفُونَ عَلٰٓى اَصْنَامٍ لَهُمْۚ قَالُوا يَا مُوسَى اجْعَلْ لَنَٓا اِلٰهًا كَمَا لَهُمْ اٰلِهَةٌۜ قَالَ اِنَّكُمْ قَوْمٌ تَجْهَلُونَ138
और इसराईल की सन्तान को हमने सागर से पार करा दिया, फिर वे ऐसे लोगों को पास पहुँचे जो अपनी कुछ मूर्तियों से लगे बैठे थे। कहने लगे, "ऐ मूसा! हमारे लिए भी कोई ऐसा उपास्य ठहरा दे, जैसे इनके उपास्य है।" उसने कहा, "निश्चय ही तुम बड़े ही अज्ञानी लोग हो
اِنَّ هٰٓؤُ۬لَٓاءِ مُتَبَّرٌ مَا هُمْ ف۪يهِ وَبَاطِلٌ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ139
“निश्चय ही वह लोग लगे हुए है, बरबाद होकर रहेगा। और जो कुछ ये कर रहे है सर्वथा व्यर्थ है।"
قَالَ اَغَيْرَ اللّٰهِ اَبْغ۪يكُمْ اِلٰهًا وَهُوَ فَضَّلَكُمْ عَلَى الْعَالَم۪ينَ140
उसने कहा, "क्या मैं अल्लाह के सिवा तुम्हारे लिए कोई और उपास्य ढूढूँ, हालाँकि उसी ने सारे संसारवालों पर तुम्हें श्रेष्ठता प्रदान की?"
وَاِذْ اَنْجَيْنَاكُمْ مِنْ اٰلِ فِرْعَوْنَ يَسُومُونَكُمْ سُٓوءَ الْعَذَابِۚ يُقَتِّلُونَ اَبْنَٓاءَكُمْ وَيَسْتَحْيُونَ نِسَٓاءَكُمْۜ وَف۪ي ذٰلِكُمْ بَلَٓاءٌ مِنْ رَبِّكُمْ عَظ۪يمٌ۟141
और याद करो जब हमने तुम्हें फ़िरऔन के लोगों से छुटकारा दिया जो तुम्हें बुरी यातना में ग्रस्त रखते थे। तुम्हारे बेटों को मार डालते और तुम्हारी स्त्रियों को जीवित रहने देते थे। और वह (छुटकारा दिलाना) तुम्हारे रब की ओर से बड़ा अनुग्रह है
وَوٰعَدْنَا مُوسٰى ثَلٰث۪ينَ لَيْلَةً وَاَتْمَمْنَاهَا بِعَشْرٍ فَتَمَّ م۪يقَاتُ رَبِّه۪ٓ اَرْبَع۪ينَ لَيْلَةًۚ وَقَالَ مُوسٰى لِاَخ۪يهِ هٰرُونَ اخْلُفْن۪ي ف۪ي قَوْم۪ي وَاَصْلِحْ وَلَا تَتَّبِعْ سَب۪يلَ الْمُفْسِد۪ينَ142
और हमने मूसा से तीस रातों का वादा ठहराया, फिर हमने दस और बढ़ाकर उसे पूरा किया। इसी प्रकार उसके रब की ठहराई हुई अवधि चालीस रातों में पूरी हुई और मूसा ने अपने भाई हारून से कहा, "मेरे पीछे तुम मेरी क़ौम में मेरा प्रतिनिधित्व करना और सुधारना और बिगाड़ पैदा करनेवालों के मार्ग पर न चलना।"
وَلَمَّا جَٓاءَ مُوسٰى لِم۪يقَاتِنَا وَكَلَّمَهُ رَبُّهُۙ قَالَ رَبِّ اَرِن۪ٓي اَنْظُرْ اِلَيْكَۜ قَالَ لَنْ تَرٰين۪ي وَلٰكِنِ انْظُرْ اِلَى الْجَبَلِ فَاِنِ اسْتَقَرَّ مَكَانَهُ فَسَوْفَ تَرٰين۪يۚ فَلَمَّا تَجَلّٰى رَبُّهُ لِلْجَبَلِ جَعَلَهُ دَكًّا وَخَرَّ مُوسٰى صَعِقًاۚ فَلَمَّٓا اَفَاقَ قَالَ سُبْحَانَكَ تُبْتُ اِلَيْكَ وَاَنَا۬ اَوَّلُ الْمُؤْمِن۪ينَ143
अब मूसा हमारे निश्चित किए हुए समय पर पहुँचा और उसके रब ने उससे बातें की, तो वह करने लगा, "मेरे रब! मुझे देखने की शक्ति प्रदान कर कि मैं तुझे देखूँ।" कहा, "तू मुझे कदापि न देख सकेगा। हाँ, पहाड़ की ओर देख। यदि वह अपने स्थान पर स्थिर पर स्थिर रह जाए तो फिर तू मुझे देख लेगा।" अतएव जब उसका रब पहाड़ पर प्रकट हुआ तो उसे चकनाचूर कर दिया और मूसा मूर्छित होकर गिर पड़ा। फिर जब होश में आया तो कहा, "महिमा है तेरी! मैं तेरे समझ तौबा करता हूँ और सबसे पहला ईमान लानेवाला मैं हूँ।"
قَالَ يَا مُوسٰٓى اِنِّي اصْطَفَيْتُكَ عَلَى النَّاسِ بِرِسَالَات۪ي وَبِكَلَام۪يۘ فَخُذْ مَٓا اٰتَيْتُكَ وَكُنْ مِنَ الشَّاكِر۪ينَ144
उसने कहा, "ऐ मूसा! मैंने दूसरे लोगों के मुक़ाबले में तुझे चुनकर अपने संदेशों और अपनी वाणी से तुझे उपकृत किया। अतः जो कुछ मैं तुझे दूँ उसे ले और कृतज्ञता दिखा।"
وَكَتَبْنَا لَهُ فِي الْاَلْوَاحِ مِنْ كُلِّ شَيْءٍ مَوْعِظَةً وَتَفْص۪يلًا لِكُلِّ شَيْءٍۚ فَخُذْهَا بِقُوَّةٍ وَاْمُرْ قَوْمَكَ يَاْخُذُوا بِاَحْسَنِهَاۜ سَاُر۪يكُمْ دَارَ الْفَاسِق۪ينَ145
और हमने उसके लिए तख़्तियों पर उपदेश के रूप में हर चीज़ और हर चीज़ का विस्तृत वर्णन लिख दिया। अतः उनको मज़बूती से पकड़। उनमें उत्तम बातें है। अपनी क़ौम के लोगों को हुक्म दे कि वे उनको अपनाएँ। मैं शीघ्र ही तुम्हें अवज्ञाकारियों का घर दिखाऊँगा
سَاَصْرِفُ عَنْ اٰيَاتِيَ الَّذ۪ينَ يَتَكَبَّرُونَ فِي الْاَرْضِ بِغَيْرِ الْحَقِّۜ وَاِنْ يَرَوْا كُلَّ اٰيَةٍ لَا يُؤْمِنُوا بِهَاۚ وَاِنْ يَرَوْا سَب۪يلَ الرُّشْدِ لَا يَتَّخِذُوهُ سَب۪يلًاۚ وَاِنْ يَرَوْا سَب۪يلَ الْغَيِّ يَتَّخِذُوهُ سَب۪يلًاۜ ذٰلِكَ بِاَنَّهُمْ كَذَّبُوا بِاٰيَاتِنَا وَكَانُوا عَنْهَا غَافِل۪ينَ146
जो लोग धरती में नाहक़ बड़े बनते है, मैं अपनी निशानियों की ओर से उन्हें फेर दूँगा। यदि वे प्रत्येक निशानी देख ले तब भी वे उस पर ईमान नहीं लाएँगे। यदि वे सीधा मार्ग देख लें तो भी वे उसे अपना मार्ग नहीं बनाएँगे। लेकिन यदि वे पथभ्रष्ट का मार्ग देख लें तो उसे अपना मार्ग ठहरा लेंगे। यह इसलिए की उन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया और उनसे ग़ाफ़िल रहे
وَالَّذ۪ينَ كَذَّبُوا بِاٰيَاتِنَا وَلِقَٓاءِ الْاٰخِرَةِ حَبِطَتْ اَعْمَالُهُمْۜ هَلْ يُجْزَوْنَ اِلَّا مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ۟147
जिन लोगों ने हमारी आयतों को और आख़िरत के मिलन को झूठा जाना, उनका तो सारा किया-धरा उनकी जान को लागू हुआ। जो कुछ वे करते रहे क्या उसके सिवा वे किसी और चीज़ का बदला पाएँगे?
وَاتَّخَذَ قَوْمُ مُوسٰى مِنْ بَعْدِه۪ مِنْ حُلِيِّهِمْ عِجْلًا جَسَدًا لَهُ خُوَارٌۜ اَلَمْ يَرَوْا اَنَّهُ لَا يُكَلِّمُهُمْ وَلَا يَهْد۪يهِمْ سَب۪يلًاۢ اِتَّخَذُوهُ وَكَانُوا ظَالِم۪ينَ148
और मूसा के पीछे उसकी क़ौम ने अपने ज़ेवरों से अपने लिए एक बछड़ा बना दिया, जिसमें से बैल की-सी आवाज़ निकलती थी। क्या उन्होंने देखा नहीं कि वह न तो उनसे बातें करता है और न उन्हें कोई राह दिखाता है? उन्होंने उसे अपना उपास्य बना लिया, औऱ वे बड़े अत्याचारी थे
وَلَمَّا سُقِطَ ف۪ٓي اَيْد۪يهِمْ وَرَاَوْا اَنَّهُمْ قَدْ ضَلُّواۙ قَالُوا لَئِنْ لَمْ يَرْحَمْنَا رَبُّنَا وَيَغْفِرْ لَنَا لَنَكُونَنَّ مِنَ الْخَاسِر۪ينَ149
और जब (चेताबनी से) उन्हें पश्चाताप हुआ और उन्होंने देख लिया कि वास्तव में वे भटक गए हैं तो कहने लगे, "यदि हमारे रब ने हमपर दया न की और उसने हमें क्षमा न किया तो हम घाटे में पड़ जाएँगे!"
وَلَمَّا رَجَعَ مُوسٰٓى اِلٰى قَوْمِه۪ غَضْبَانَ اَسِفًاۙ قَالَ بِئْسَمَا خَلَفْتُمُون۪ي مِنْ بَعْد۪يۚ اَعَجِلْتُمْ اَمْرَ رَبِّكُمْۚ وَاَلْقَى الْاَلْوَاحَ وَاَخَذَ بِرَاْسِ اَخ۪يهِ يَجُرُّهُٓ اِلَيْهِۜ قَالَ ابْنَ اُمَّ اِنَّ الْقَوْمَ اسْتَضْعَفُون۪ي وَكَادُوا يَقْتُلُونَن۪يۘ فَلَا تُشْمِتْ بِيَ الْاَعْدَٓاءَ وَلَا تَجْعَلْن۪ي مَعَ الْقَوْمِ الظَّالِم۪ينَ150
और जब मूसा क्रोध और दुख से भरा हुआ अपनी क़ौम की ओर लौटा तो उसने कहा, "तुम लोगों ने मेरे पीछे मेरी जगह बुरा किया। क्या तुम अपने रब के हुक्म से पहले ही जल्दी कर बैठे?" फिर उसने तख़्तियाँ डाल दी और अपने भाई का सिर पकड़कर उसे अपनी ओर खींचने लगा। वह बोला, "ऐ मेरी माँ के बेटे! लोगों ने मुझे कमज़ोर समझ लिया और निकट था कि मुझे मार डालते। अतः शत्रुओं को मुझपर हुलसने का अवसर न दे और अत्याचारी लोगों में मुझे सम्मिलित न कर।"
قَالَ رَبِّ اغْفِرْ ل۪ي وَلِاَخ۪ي وَاَدْخِلْنَا ف۪ي رَحْمَتِكَۘ وَاَنْتَ اَرْحَمُ الرَّاحِم۪ينَ۟151
उसने कहा, "मेरे रब! मुझे और मेरे भाई को क्षमा कर दे और हमें अपनी दयालुता में दाख़िल कर ले। तू तो सबसे बढ़कर दयावान हैं।"
اِنَّ الَّذ۪ينَ اتَّخَذُوا الْعِجْلَ سَيَنَالُهُمْ غَضَبٌ مِنْ رَبِّهِمْ وَذِلَّةٌ فِي الْحَيٰوةِ الدُّنْيَاۜ وَكَذٰلِكَ نَجْزِي الْمُفْتَر۪ينَ152
जिन लोगों ने बछड़े को अपना उपास्य बनाया, वे अपने रब की ओर से प्रकोप और सांसारिक जीवन में अपमान से ग्रस्त होकर रहेंगे; और झूठ घड़नेवालों को हम ऐसा ही बदला देते है
وَالَّذ۪ينَ عَمِلُوا السَّيِّـَٔاتِ ثُمَّ تَابُوا مِنْ بَعْدِهَا وَاٰمَنُواۘ اِنَّ رَبَّكَ مِنْ بَعْدِهَا لَغَفُورٌ رَح۪يمٌ153
रहे वे लोग जिन्होंने बुरे कर्म किए फिर उसके पश्चात तौबा कर ली और ईमान ले आए, तो इसके बाद तो तुम्हारा रब बड़ा ही क्षमाशील, दयाशील है
وَلَمَّا سَكَتَ عَنْ مُوسَى الْغَضَبُ اَخَذَ الْاَلْوَاحَۚ وَف۪ي نُسْخَتِهَا هُدًى وَرَحْمَةٌ لِلَّذ۪ينَ هُمْ لِرَبِّهِمْ يَرْهَبُونَ154
और जब मूसा का क्रोध शान्त हुआ तो उसने तख़्तियों को उठा लिया। उनके लेख में उन लोगों के लिए मार्गदर्शन और दयालुता थी जो अपने रब से डरते है
وَاخْتَارَ مُوسٰى قَوْمَهُ سَبْع۪ينَ رَجُلًا لِم۪يقَاتِنَاۚ فَلَمَّٓا اَخَذَتْهُمُ الرَّجْفَةُ قَالَ رَبِّ لَوْ شِئْتَ اَهْلَكْتَهُمْ مِنْ قَبْلُ وَاِيَّايَۜ اَتُهْلِكُنَا بِمَا فَعَلَ السُّفَهَٓاءُ مِنَّاۚ اِنْ هِيَ اِلَّا فِتْنَتُكَۜ تُضِلُّ بِهَا مَنْ تَشَٓاءُ وَتَهْد۪ي مَنْ تَشَٓاءُۜ اَنْتَ وَلِيُّنَا فَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَا وَاَنْتَ خَيْرُ الْغَافِر۪ينَ155
मूसा ने अपनी क़ौम के सत्तर आदमियों को हमारे नियत किए हुए समय के लिए चुना। फिर जब उन लोगों को एक भूकम्प ने आ पकड़ा तो उसने कहा, "मेर रब! यदि तू चाहता तो पहले ही इनको और मुझको विनष्ट़ कर देता। जो कुछ हमारे नादानों ने किया है, क्या उसके कारण तू हमें विनष्ट करेगा? यह तो बस तेरी ओर से एक परीक्षा है। इसके द्वारा तू जिसको चाहे पथभ्रष्ट कर दे और जिसे चाहे मार्ग दिखा दे। तू ही हमारा संरक्षक है। अतः तू हमें क्षमा कर दे और हम पर दया कर, और तू ही सबसे बढ़कर क्षमा करनेवाला है
وَاكْتُبْ لَنَا ف۪ي هٰذِهِ الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الْاٰخِرَةِ اِنَّا هُدْنَٓا اِلَيْكَۜ قَالَ عَذَاب۪ٓي اُص۪يبُ بِه۪ مَنْ اَشَٓاءُۚ وَرَحْمَت۪ي وَسِعَتْ كُلَّ شَيْءٍۜ فَسَاَكْتُبُهَا لِلَّذ۪ينَ يَتَّقُونَ وَيُؤْتُونَ الزَّكٰوةَ وَالَّذ۪ينَ هُمْ بِاٰيَاتِنَا يُؤْمِنُونَۚ156
"और हमारे लिए इस संसार में भलाई लिख दे और आख़िरत में भी। हम तेरी ही ओर उन्मुख हुए।" उसने कहा, "अपनी यातना में मैं तो उसी को ग्रस्त करता हूँ, जिसे चाहता हूँ, किन्तु मेरी दयालुता से हर चीज़ आच्छादित है। उसे तो मैं उन लोगों के हक़ में लिखूँगा जो डर रखते और ज़कात देते है और जो हमारी आयतों पर ईमान लाते है
اَلَّذ۪ينَ يَتَّبِعُونَ الرَّسُولَ النَّبِيَّ الْاُمِّيَّ الَّذ۪ي يَجِدُونَهُ مَكْتُوبًا عِنْدَهُمْ فِي التَّوْرٰيةِ وَالْاِنْج۪يلِۘ يَاْمُرُهُمْ بِالْمَعْرُوفِ وَيَنْهٰيهُمْ عَنِ الْمُنْكَرِ وَيُحِلُّ لَهُمُ الطَّيِّبَاتِ وَيُحَرِّمُ عَلَيْهِمُ الْخَبَٓائِثَ وَيَضَعُ عَنْهُمْ اِصْرَهُمْ وَالْاَغْلَالَ الَّت۪ي كَانَتْ عَلَيْهِمْۜ فَالَّذ۪ينَ اٰمَنُوا بِه۪ وَعَزَّرُوهُ وَنَصَرُوهُ وَاتَّبَعُوا النُّورَ الَّذ۪ٓي اُنْزِلَ مَعَهُٓۙ اُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ۟157
"(तो आज इस दयालुता के अधिकारी वे लोग है) जो उस रसूल, उम्मी नबी का अनुसरण करते है, जिसे वे अपने यहाँ तौरात और इंजील में लिखा पाते है। और जो उन्हें भलाई का हुक्म देता और बुराई से रोकता है। उनके लिए अच्छी-स्वच्छ चीज़ों का हलाल और बुरी-अस्वच्छ चीज़ों का हराम ठहराता है और उनपर से उनके वह बोझ उतारता है, जो अब तक उनपर लदे हुए थे और उन बन्धनों को खोलता है, जिनमें वे जकड़े हुए थे। अतः जो लोग उसपर ईमान लाए, उसका सम्मान किया और उसकी सहायता की और उस प्रकाश के अनुगत हुए, जो उसके साथ अवतरित हुआ है, वही सफलता प्राप्त करनेवाले है।"
قُلْ يَٓا اَيُّهَا النَّاسُ اِنّ۪ي رَسُولُ اللّٰهِ اِلَيْكُمْ جَم۪يعًاۨ الَّذ۪ي لَهُ مُلْكُ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۚ لَٓا اِلٰهَ اِلَّا هُوَ يُحْي۪ وَيُم۪يتُۖ فَاٰمِنُوا بِاللّٰهِ وَرَسُولِهِ النَّبِيِّ الْاُمِّيِّ الَّذ۪ي يُؤْمِنُ بِاللّٰهِ وَكَلِمَاتِه۪ وَاتَّبِعُوهُ لَعَلَّكُمْ تَهْتَدُونَ158
कहो, "ऐ लोगो! मैं तुम सबकी ओर उस अल्लाह का रसूल हूँ, जो आकाशों और धरती के राज्य का स्वामी है उसके सिवा कोई पूज्य नहीं, वही जीवन प्रदान करता और वही मृत्यु देता है। अतः जीवन प्रदान करता और वही मृत्यु देता है। अतः अल्लाह और उसके रसूल, उस उम्मी नबी, पर ईमान लाओ जो स्वयं अल्लाह पर और उसके शब्दों (वाणी) पर ईमान रखता है और उनका अनुसरण करो, ताकि तुम मार्ग पा लो।"
وَمِنْ قَوْمِ مُوسٰٓى اُمَّةٌ يَهْدُونَ بِالْحَقِّ وَبِه۪ يَعْدِلُونَ159
मूसा की क़ौम में से एक गिरोह ऐसे लोगों का भी हुआ जो हक़ के अनुसार मार्ग दिखाते और उसी के अनुसार न्याय करते
وَقَطَّعْنَاهُمُ اثْنَتَيْ عَشْرَةَ اَسْبَاطًا اُمَمًاۜ وَاَوْحَيْنَٓا اِلٰى مُوسٰٓى اِذِ اسْتَسْقٰيهُ قَوْمُهُٓ اَنِ اضْرِبْ بِعَصَاكَ الْحَجَرَۚ فَانْبَجَسَتْ مِنْهُ اثْنَتَا عَشْرَةَ عَيْنًاۜ قَدْ عَلِمَ كُلُّ اُنَاسٍ مَشْرَبَهُمْۜ وَظَلَّلْنَا عَلَيْهِمُ الْغَمَامَ وَاَنْزَلْنَا عَلَيْهِمُ الْمَنَّ وَالسَّلْوٰىۜ كُلُوا مِنْ طَيِّبَاتِ مَا رَزَقْنَاكُمْۜ وَمَا ظَلَمُونَا وَلٰكِنْ كَانُٓوا اَنْفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ160
और हमने उन्हें बारह ख़ानदानों में विभक्त करके अलग-अलग समुदाय बना दिया। जब उसकी क़ौम के लोगों ने पानी माँगा तो हमने मूसा की ओर प्रकाशना की, "अपनी लाठी अमुक चट्टान पर मारो।" अतएव उससे बारह स्रोत फूट निकले और हर गिरोह ने अपना-अपना घाट मालूम कर लिया। और हमने उनपर बादल की छाया की और उन पर 'मन्न' और 'सलवा' उतारा, "हमनें तुम्हें जो अच्छी-स्वच्छ चीज़े प्रदान की है, उन्हें खाओ।" उन्होंने हम पर कोई ज़ुल्म नहीं किया, बल्कि वास्तव में वे स्वयं अपने ऊपर ही ज़ुल्म करते रहे
وَاِذْ ق۪يلَ لَهُمُ اسْكُنُوا هٰذِهِ الْقَرْيَةَ وَكُلُوا مِنْهَا حَيْثُ شِئْتُمْ وَقُولُوا حِطَّةٌ وَادْخُلُوا الْبَابَ سُجَّدًا نَغْفِرْ لَكُمْ خَط۪ٓيـَٔاتِكُمْۜ سَنَز۪يدُ الْمُحْسِن۪ينَ161
याद करो जब उनसे कहा गया, "इस बस्ती में रहो-बसो और इसमें जहाँ से चाहो खाओ और कहो - हित्ततुन। और द्वार में सजदा करते हुए प्रवेश करो। हम तुम्हारी ख़ताओं को क्षमा कर देंगे और हम सुकर्मी लोगों को अधिक भी देंगे।"
فَبَدَّلَ الَّذ۪ينَ ظَلَمُوا مِنْهُمْ قَوْلًا غَيْرَ الَّذ۪ي ق۪يلَ لَهُمْ فَاَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ رِجْزًا مِنَ السَّمَٓاءِ بِمَا كَانُوا يَظْلِمُونَ۟162
किन्तु उनमें से जो अत्याचारी थे उन्होंने, जो कुछ उनसे कहा गया था, उसको उससे भिन्न बात से बदल दिया। अतः जो अत्याचार वे कर रहे थे, उसके कारण हमने आकाश से उनपर यातना भेजी
وَسْـَٔلْهُمْ عَنِ الْقَرْيَةِ الَّت۪ي كَانَتْ حَاضِرَةَ الْبَحْرِۢ اِذْ يَعْدُونَ فِي السَّبْتِ اِذْ تَاْت۪يهِمْ ح۪يتَانُهُمْ يَوْمَ سَبْتِهِمْ شُرَّعًا وَيَوْمَ لَا يَسْبِتُونَۙ لَا تَاْت۪يهِمْۚ كَذٰلِكَ نَبْلُوهُمْ بِمَا كَانُوا يَفْسُقُونَ163
उनसे उस बस्ती के विषय में पूछो जो सागर-तट पर थी। जब वे सब्त के मामले में सीमा का उल्लंघन करते थे, जब उनके सब्त के दिन उनकी मछलियाँ खुले तौर पर पानी के ऊपर आ जाती थी और जो दिन उनके सब्त का न होता तो वे उनके पास न आती थी। इस प्रकार उनके अवज्ञाकारी होने के कारण हम उनको परीक्षा में डाल रहे थे
وَاِذْ قَالَتْ اُمَّةٌ مِنْهُمْ لِمَ تَعِظُونَ قَوْمًاۨۙ اللّٰهُ مُهْلِكُهُمْ اَوْ مُعَذِّبُهُمْ عَذَابًا شَد۪يدًاۜ قَالُوا مَعْذِرَةً اِلٰى رَبِّكُمْ وَلَعَلَّهُمْ يَتَّقُونَ164
और जब उनके एक गिरोह ने कहा, "तुम ऐसे लोगों को क्यों नसीहत किए जा रहे हो, जिन्हें अल्लाह विनष्ट करनेवाला है या जिन्हें वह कठोर यातना देनेवाला है?" उन्होंने कहा, "तुम्हारे रब के समक्ष अपने को निरपराध सिद्ध करने के लिए, और कदाचित वे (अवज्ञा से) बचें।"
فَلَمَّا نَسُوا مَا ذُكِّرُوا بِه۪ٓ اَنْجَيْنَا الَّذ۪ينَ يَنْهَوْنَ عَنِ السُّٓوءِ وَاَخَذْنَا الَّذ۪ينَ ظَلَمُوا بِعَذَابٍ بَـ۪ٔيسٍ بِمَا كَانُوا يَفْسُقُونَ165
फिर जब वे उसे भूल गए जो नसीहत उन्हें दी गई थी तो हमने उन लोगों को बचा लिया, जो बुराई से रोकते थे और अत्याचारियों को उनकी अवज्ञा के कारण कठोर यातना में पकड़ लिया
فَلَمَّا عَتَوْا عَنْ مَا نُهُوا عَنْهُ قُلْنَا لَهُمْ كُونُوا قِرَدَةً خَاسِـ۪ٔينَ166
फिर जब वे सरकशी के साथ वही कुछ करते रहे, जिससे उन्हें रोका गया था तो हमने उनसे कहा, "बन्दर हो जाओ, अपमानित और तिरस्कृत!"
وَاِذْ تَاَذَّنَ رَبُّكَ لَيَبْعَثَنَّ عَلَيْهِمْ اِلٰى يَوْمِ الْقِيٰمَةِ مَنْ يَسُومُهُمْ سُٓوءَ الْعَذَابِۜ اِنَّ رَبَّكَ لَسَر۪يعُ الْعِقَابِۚ وَاِنَّهُ لَغَفُورٌ رَح۪يمٌ167
और याद करो जब तुम्हारे रब ने ख़बर कर दी थी कि वह क़ियामत के दिन तक उनके विरुद्ध ऐसे लोगों को उठाता रहेगा, जो उन्हें बुरी यातना देंगे। निश्चय ही तुम्हारा रब जल्द सज़ा देता है और वह बड़ा क्षमाशील, दावान भी है
وَقَطَّعْنَاهُمْ فِي الْاَرْضِ اُمَمًاۚ مِنْهُمُ الصَّالِحُونَ وَمِنْهُمْ دُونَ ذٰلِكَۘ وَبَلَوْنَاهُمْ بِالْحَسَنَاتِ وَالسَّيِّـَٔاتِ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ168
और हमने उन्हें टुकड़े-टुकड़े करके धरती में अनेक गिरोहों में बिखेर दिया। कुछ उनमें से नेक है और कुछ उनमें इससे भिन्न हैं, और हमने उन्हें अच्छी और बुरी परिस्थितियों में डालकर उनकी परीक्षा ली, कदाचित वे पलट आएँ
فَخَلَفَ مِنْ بَعْدِهِمْ خَلْفٌ وَرِثُوا الْكِتَابَ يَاْخُذُونَ عَرَضَ هٰذَا الْاَدْنٰى وَيَقُولُونَ سَيُغْفَرُ لَنَاۚ وَاِنْ يَاْتِهِمْ عَرَضٌ مِثْلُهُ يَاْخُذُوهُۜ اَلَمْ يُؤْخَذْ عَلَيْهِمْ م۪يثَاقُ الْكِتَابِ اَنْ لَا يَقُولُوا عَلَى اللّٰهِ اِلَّا الْحَقَّ وَدَرَسُوا مَا ف۪يهِۜ وَالدَّارُ الْاٰخِرَةُ خَيْرٌ لِلَّذ۪ينَ يَتَّقُونَۜ اَفَلَا تَعْقِلُونَ169
फिर उनके पीछ ऐसे अयोग्य लोगों ने उनकी जगह ली, जो किताब के उत्ताराधिकारी होकर इसी तुच्छ संसार का सामान समेटते है और कहते है, "हमें अवश्य क्षमा कर दिया जाएगा।" और यदि इस जैसा और सामान भी उनके पास आ जाए तो वे उसे भी ले लेंगे। क्या उनसे किताब का यह वचन नहीं लिया गया था कि वे अल्लाह पर थोपकर हक़ के सिवा कोई और बात न कहें। और जो उसमें है उसे वे स्वयं पढ़ भी चुके है। और आख़िरत का घर तो उन लोगों के लिए उत्तम है, जो डर रखते है। तो क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लेते?
وَالَّذ۪ينَ يُمَسِّكُونَ بِالْكِتَابِ وَاَقَامُوا الصَّلٰوةَۜ اِنَّا لَا نُض۪يعُ اَجْرَ الْمُصْلِح۪ينَ170
और जो लोग किताब को मज़बूती से थामते है और जिन्होंने नमाज़ क़ायम कर रखी है, तो काम को ठीक रखनेवालों के प्रतिदान को हम कभी अकारथ नहीं करते
وَاِذْ نَتَقْنَا الْجَبَلَ فَوْقَهُمْ كَاَنَّهُ ظُلَّةٌ وَظَنُّٓوا اَنَّهُ وَاقِعٌ بِهِمْۚ خُذُوا مَٓا اٰتَيْنَاكُمْ بِقُوَّةٍ وَاذْكُرُوا مَا ف۪يهِ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ۟171
और याद करो जब हमने पर्वत को हिलाया, जो उनके ऊपर था। मानो वह कोई छत्र हो और वे समझे कि बस वह उनपर गिरा ही चाहता है, "थामो मज़बूती से, जो कुछ हमने दिया है। और जो कुछ उसमें है उसे याद रखो, ताकि तुम बच सको।"
وَاِذْ اَخَذَ رَبُّكَ مِنْ بَن۪ٓي اٰدَمَ مِنْ ظُهُورِهِمْ ذُرِّيَّتَهُمْ وَاَشْهَدَهُمْ عَلٰٓى اَنْفُسِهِمْۚ اَلَسْتُ بِرَبِّكُمْۜ قَالُوا بَلٰىۚۛ شَهِدْنَاۚۛ اَنْ تَقُولُوا يَوْمَ الْقِيٰمَةِ اِنَّا كُنَّا عَنْ هٰذَا غَافِل۪ينَۙ172
और याद करो जब तुम्हारे रब ने आदम की सन्तान से (अर्थात उनकी पीठों से) उनकी सन्तति निकाली और उन्हें स्वयं उनके ऊपर गवाह बनाया कि "क्या मैं तुम्हारा रब नहीं हूँ?" बोले, "क्यों नहीं, हम गवाह है।" ऐसा इसलिए किया कि तुम क़ियामत के दिन कहीं यह न कहने लगो कि "हमें तो इसकी ख़बर ही न थी।"
اَوْ تَقُولُٓوا اِنَّمَٓا اَشْرَكَ اٰبَٓاؤُ۬نَا مِنْ قَبْلُ وَكُنَّا ذُرِّيَّةً مِنْ بَعْدِهِمْۚ اَفَتُهْلِكُنَا بِمَا فَعَلَ الْمُبْطِلُونَ173
या कहो कि "(अल्लाह के साथ) साझी तो पहले हमारे बाप-दादा ने किया। हम तो उसके पश्चात उनकी सन्तति में हुए है। तो क्या तू हमें उसपर विनष्ट करेगा जो कुछ मिथ्याचारियों ने किया है?"
وَكَذٰلِكَ نُفَصِّلُ الْاٰيَاتِ وَلَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ174
इस प्रकार स्थिति के अनुकूल आयतें प्रस्तुत करते है। और शायद कि वे पलट आएँ
وَاتْلُ عَلَيْهِمْ نَبَاَ الَّذ۪ٓي اٰتَيْنَاهُ اٰيَاتِنَا فَانْسَلَخَ مِنْهَا فَاَتْبَعَهُ الشَّيْطَانُ فَكَانَ مِنَ الْغَاو۪ينَ175
और उन्हें उस व्यक्ति का हाल सुनाओ जिसे हमने अपनी आयतें प्रदान की किन्तु वह उनसे निकल भागा। फिर शैतान ने उसे अपने पीछे लगा लिया। अन्ततः वह पथभ्रष्ट और विनष्ट होकर रहा
وَلَوْ شِئْنَا لَرَفَعْنَاهُ بِهَا وَلٰكِنَّهُٓ اَخْلَدَ اِلَى الْاَرْضِ وَاتَّبَعَ هَوٰيهُۚ فَمَثَلُهُ كَمَثَلِ الْكَلْبِۚ اِنْ تَحْمِلْ عَلَيْهِ يَلْهَثْ اَوْ تَتْرُكْهُ يَلْهَثْۜ ذٰلِكَ مَثَلُ الْقَوْمِ الَّذ۪ينَ كَذَّبُوا بِاٰيَاتِنَاۚ فَاقْصُصِ الْقَصَصَ لَعَلَّهُمْ يَتَفَكَّرُونَ176
यदि हम चाहते तो इन आयतों के द्वारा उसे उच्चता प्रदान करते, किन्तु वह तो धरती के साथ लग गया और अपनी इच्छा के पीछे चला। अतः उसकी मिसाल कुत्ते जैसी है कि यदि तुम उसपर आक्षेप करो तब भी वह ज़बान लटकाए रहे या यदि तुम उसे छोड़ दो तब भी वह ज़बान लटकाए ही रहे। यही मिसाल उन लोगों की है, जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया, तो तुम वृत्तान्त सुनाते रहो, कदाचित वे सोच-विचार कर सकें
سَٓاءَ مَثَلًاۨ الْقَوْمُ الَّذ۪ينَ كَذَّبُوا بِاٰيَاتِنَا وَاَنْفُسَهُمْ كَانُوا يَظْلِمُونَ177
बुरे है मिसाल की दृष्टि से वे लोग, जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया और वे स्वयं अपने ही ऊपर अत्याचार करते रहे
مَنْ يَهْدِ اللّٰهُ فَهُوَ الْمُهْتَد۪يۚ وَمَنْ يُضْلِلْ فَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْخَاسِرُونَ178
जिसे अल्लाह मार्ग दिखाए वही सीधा मार्ग पानेवाला है और जिसे वह मार्ग से वंचित रखे, तो ऐसे ही लोग घाटे में पड़नेवाले हैं
وَلَقَدْ ذَرَاْنَا لِجَهَنَّمَ كَث۪يرًا مِنَ الْجِنِّ وَالْاِنْسِۘ لَهُمْ قُلُوبٌ لَا يَفْقَهُونَ بِهَاۘ وَلَهُمْ اَعْيُنٌ لَا يُبْصِرُونَ بِهَاۘ وَلَهُمْ اٰذَانٌ لَا يَسْمَعُونَ بِهَاۜ اُو۬لٰٓئِكَ كَالْاَنْعَامِ بَلْ هُمْ اَضَلُّۜ اُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْغَافِلُونَ179
निश्चय ही हमने बहुत-से जिन्नों और मनुष्यों को जहन्नम ही के लिए फैला रखा है। उनके पास दिल है जिनसे वे समझते नहीं, उनके पास आँखें है जिनसे वे देखते नहीं; उनके पास कान है जिनसे वे सुनते नहीं। वे पशुओं की तरह है, बल्कि वे उनसे भी अधिक पथभ्रष्ट है। वही लोग है जो ग़फ़लत में पड़े हुए है
وَلِلّٰهِ الْاَسْمَٓاءُ الْحُسْنٰى فَادْعُوهُ بِهَاۖ وَذَرُوا الَّذ۪ينَ يُلْحِدُونَ ف۪ٓي اَسْمَٓائِه۪ۜ سَيُجْزَوْنَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ180
अच्छे नाम अल्लाह ही के है। तो तुम उन्हीं के द्वारा उसे पुकारो और उन लोगों को छोड़ो जो उसके नामों के सम्बन्ध में कुटिलता ग्रहण करते है। जो कुछ वे करते है, उसका बदला वे पाकर रहेंगे
وَمِمَّنْ خَلَقْنَٓا اُمَّةٌ يَهْدُونَ بِالْحَقِّ وَبِه۪ يَعْدِلُونَ۟181
हमारे पैदा किए प्राणियों में कुछ लोग ऐसे भी है जो हक़ के अनुसार मार्ग दिखाते और उसी के अनुसार न्याय करते है
وَالَّذ۪ينَ كَذَّبُوا بِاٰيَاتِنَا سَنَسْتَدْرِجُهُمْ مِنْ حَيْثُ لَا يَعْلَمُونَۚ182
रहे वे लोग जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया, हम उन्हें क्रमशः तबाही की ओर ले जाएँगे, ऐसे तरीक़े से जिसे वे जानते नहीं
وَاُمْل۪ي لَهُمْۜ اِنَّ كَيْد۪ي مَت۪ينٌ183
मैं तो उन्हें ढील दिए जा रहा हूँ। निश्चय ही मेरी चाल अत्यन्त सुदृढ़ है
اَوَلَمْ يَتَفَكَّرُوا مَا بِصَاحِبِهِمْ مِنْ جِنَّةٍۜ اِنْ هُوَ اِلَّا نَذ۪يرٌ مُب۪ينٌ184
क्या उन लोगों ने विचार नहीं किया? उनके साथी को कोई उन्माद नहीं। वह तो बस एक साफ़-साफ़ सचेत करनेवाला है
اَوَلَمْ يَنْظُرُوا ف۪ي مَلَكُوتِ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِ وَمَا خَلَقَ اللّٰهُ مِنْ شَيْءٍۙ وَاَنْ عَسٰٓى اَنْ يَكُونَ قَدِ اقْتَرَبَ اَجَلُهُمْۚ فَبِاَيِّ حَد۪يثٍ بَعْدَهُ يُؤْمِنُونَ185
या क्या उन्होंने आकाशों और धरती के राज्य पर और जो चीज़ भी अल्लाह ने पैदा की है उसपर दृष्टि नहीं डाली, और इस बात पर कि कदाचित उनकी अवधि निकट आ लगी हो? फिर आख़िर इसके बाद अब कौन-सी बात हो सकती है, जिसपर वे ईमान लाएँगे?
مَنْ يُضْلِلِ اللّٰهُ فَلَا هَادِيَ لَهُۜ وَيَذَرُهُمْ ف۪ي طُغْيَانِهِمْ يَعْمَهُونَ186
जिसे अल्लाह मार्ग से वंचित रखे उसके लिए कोई मार्गदर्शक नहीं। वह तो तो उन्हें उनकी सरकशी ही में भटकता हुआ छोड़ रहा है
يَسْـَٔلُونَكَ عَنِ السَّاعَةِ اَيَّانَ مُرْسٰيهَاۜ قُلْ اِنَّمَا عِلْمُهَا عِنْدَ رَبّ۪يۚ لَا يُجَلّ۪يهَا لِوَقْتِهَٓا اِلَّا هُوَۜ ثَقُلَتْ فِي السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ لَا تَاْت۪يكُمْ اِلَّا بَغْتَةًۜ يَسْـَٔلُونَكَ كَاَنَّكَ حَفِيٌّ عَنْهَاۜ قُلْ اِنَّمَا عِلْمُهَا عِنْدَ اللّٰهِ وَلٰكِنَّ اَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ187
तुमसे उस घड़ी (क़ियामत) के विषय में पूछते है कि वह कब आएगी? कह दो, "उसका ज्ञान मेरे रब ही के पास है। अतः वही उसे उसके समय पर प्रकट करेगा। वह आकाशों और धरती में बोझिल हो गई है - बस अचानक ही वह तुमपर आ जाएगी।" वे तुमसे पूछते है मानो तुम उसके विषय में भली-भाँति जानते हो। कह दो, "उसका ज्ञान तो बस अल्लाह ही के पास है - किन्तु अधिकांश लोग नहीं जानते।"
قُلْ لَٓا اَمْلِكُ لِنَفْس۪ي نَفْعًا وَلَا ضَرًّا اِلَّا مَا شَٓاءَ اللّٰهُۜ وَلَوْ كُنْتُ اَعْلَمُ الْغَيْبَ لَاسْتَكْثَرْتُ مِنَ الْخَيْرِۚ وَمَا مَسَّنِيَ السُّٓوءُ اِنْ اَنَا۬ اِلَّا نَذ۪يرٌ وَبَش۪يرٌ لِقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ۟188
कहो, "मैं अपने लिए न तो लाभ का अधिकार रखता हूँ और न हानि का,बल्कि अल्लाह ही की इच्छा क्रियान्वित है। यदि मुझे परोक्ष (ग़ैब) का ज्ञान होता तो बहुत-सी भलाई समेट लेता और मुझे कभी कोई हानि न पहुँचती। मैं तो बस सचेत करनेवाला हूँ, उन लोगों के लिए जो ईमान लाएँ।"
هُوَ الَّذ۪ي خَلَقَكُمْ مِنْ نَفْسٍ وَاحِدَةٍ وَجَعَلَ مِنْهَا زَوْجَهَا لِيَسْكُنَ اِلَيْهَاۚ فَلَمَّا تَغَشّٰيهَا حَمَلَتْ حَمْلًا خَف۪يفًا فَمَرَّتْ بِه۪ۚ فَلَمَّٓا اَثْقَلَتْ دَعَوَا اللّٰهَ رَبَّهُمَا لَئِنْ اٰتَيْتَنَا صَالِحًا لَنَكُونَنَّ مِنَ الشَّاكِر۪ينَ189
वही है जिसने तुम्हें अकेली जान पैदा किया और उसी की जाति से उसका जोड़ा बनाया, ताकि उसकी ओर प्रवृत्त होकर शान्ति और चैन प्राप्त करे। फिर जब उसने उसको ढाँक लिया तो उसने एक हल्का-सा बोझ उठा लिया; फिर वह उसे लिए हुए चलती-फिरती रही, फिर जब वह बोझिल हो गई तो दोनों ने अल्लाह - अपने रब को पुकारा, "यदि तूने हमें भला-चंगा बच्चा दिया, तो निश्चय ही हम तेरे कृतज्ञ होंगे।"
فَلَمَّٓا اٰتٰيهُمَا صَالِحًا جَعَلَا لَهُ شُرَكَٓاءَ ف۪يمَٓا اٰتٰيهُمَاۚ فَتَعَالَى اللّٰهُ عَمَّا يُشْرِكُونَ190
किन्तु उसने जब उन्हें भला-चंगा (बच्चा) प्रदान किया तो जो उन्हें प्रदान किया उसमें वे दोनों उसका (अल्लाह का) साझी ठहराने लगे। किन्तु अल्लाह तो उच्च है उससे, जो साझी वे ठहराते है
اَيُشْرِكُونَ مَا لَا يَخْلُقُ شَيْـًٔا وَهُمْ يُخْلَقُونَۘ191
क्या वे उसको साझी ठहराते है जो कोई चीज़ भी पैदा नहीं करता, बल्कि ऐसे उनके ठहराए हुए साझीदार तो स्वयं पैदा किए जाते हैं
وَلَا يَسْتَط۪يعُونَ لَهُمْ نَصْرًا وَلَٓا اَنْفُسَهُمْ يَنْصُرُونَ192
और वे न तो उनकी सहायता करने की सामर्थ्य रखते है और न स्वयं अपनी ही सहायता कर सकते है?
وَاِنْ تَدْعُوهُمْ اِلَى الْهُدٰى لَا يَتَّبِعُوكُمْۜ سَوَٓاءٌ عَلَيْكُمْ اَدَعَوْتُمُوهُمْ اَمْ اَنْتُمْ صَامِتُونَ193
यदि तुम उन्हें सीधे मार्ग की ओर बुलाओ तो वे तुम्हारे पीछे न आएँगे। तुम्हारे लिए बराबर है - उन्हें पुकारो या तुम चुप रहो
اِنَّ الَّذ۪ينَ تَدْعُونَ مِنْ دُونِ اللّٰهِ عِبَادٌ اَمْثَالُكُمْ فَادْعُوهُمْ فَلْيَسْتَج۪يبُوا لَكُمْ اِنْ كُنْتُمْ صَادِق۪ينَ194
तुम अल्लाह को छोड़कर जिन्हें पुकारते हो वे तो तुम्हारे ही जैसे बन्दे है, अतः पुकार लो उनको, यदि तुम सच्चे हो, तो उन्हें चाहिए कि वे तुम्हें उत्तर दे!
اَلَهُمْ اَرْجُلٌ يَمْشُونَ بِهَاۘ اَمْ لَهُمْ اَيْدٍ يَبْطِشُونَ بِهَاۘ اَمْ لَهُمْ اَعْيُنٌ يُبْصِرُونَ بِهَاۘ اَمْ لَهُمْ اٰذَانٌ يَسْمَعُونَ بِهَاۜ قُلِ ادْعُوا شُرَكَٓاءَكُمْ ثُمَّ ك۪يدُونِ فَلَا تُنْظِرُونِ195
क्या उनके पाँव हैं जिनसे वे चलते हों या उनके हाथ हैं जिनसे वे पकड़ते हों या उनके पास आँखें हीं जिनसे वे देखते हों या उनके कान हैं जिनसे वे सुनते हों? कहों, "तुम अपने ठहराए हु सहभागियों को बुला लो, फिर मेरे विरुद्ध चालें न चलो, इस प्रकार कि मुझे मुहलत न दो
اِنَّ وَلِيِّيَ اللّٰهُ الَّذ۪ي نَزَّلَ الْكِتَابَۘ وَهُوَ يَتَوَلَّى الصَّالِح۪ينَ196
निश्चय ही मेरा संरक्षक मित्र अल्लाह है, जिसने यह किताब उतारी और वह अच्छे लोगों का संरक्षण करता है
وَالَّذ۪ينَ تَدْعُونَ مِنْ دُونِه۪ لَا يَسْتَط۪يعُونَ نَصْرَكُمْ وَلَٓا اَنْفُسَهُمْ يَنْصُرُونَ197
रहे वे जिन्हें तुम उसको छोड़कर पुकारते हो, वे तो तुम्हारी, सहायता करने की सामर्थ्य रखते है और न स्वयं अपनी ही सहायता कर सकते है
وَاِنْ تَدْعُوهُمْ اِلَى الْهُدٰى لَا يَسْمَعُواۜ وَتَرٰيهُمْ يَنْظُرُونَ اِلَيْكَ وَهُمْ لَا يُبْصِرُونَ198
और यदि तुम उन्हें सीधे मार्ग की ओर बुलाओ तो वे न सुनेंगे। वे तुम्हें ऐसे दीख पड़ते हैं जैसे वे तुम्हारी ओर ताक रहे हैं, हालाँकि वे कुछ भी नहीं देखते
خُذِ الْعَفْوَ وَاْمُرْ بِالْعُرْفِ وَاَعْرِضْ عَنِ الْجَاهِل۪ينَ199
क्षमा की नीति अपनाओ और भलाई का हुक्म देते रहो और अज्ञानियों से किनारा खींचो
وَاِمَّا يَنْزَغَنَّكَ مِنَ الشَّيْطَانِ نَزْغٌ فَاسْتَعِذْ بِاللّٰهِۜ اِنَّهُ سَم۪يعٌ عَل۪يمٌ200
और यदि शैतान तुम्हें उकसाए तो अल्लाह की शरण माँगो। निश्चय ही, वह सब कुछ सुनता जानता है
اِنَّ الَّذ۪ينَ اتَّقَوْا اِذَا مَسَّهُمْ طَٓائِفٌ مِنَ الشَّيْطَانِ تَذَكَّرُوا فَاِذَا هُمْ مُبْصِرُونَۚ201
जो डर रखते हैं, उन्हें जब शैतान की ओर से कोई ख़याल छू जाता है, तो वे चौंक उठते हैं। फिर वे साफ़ देखने लगते हैं
وَاِخْوَانُهُمْ يَمُدُّونَهُمْ فِي الْغَيِّ ثُمَّ لَا يُقْصِرُونَ202
और उन (शैतानों) के भाई उन्हें गुमराही में खींचे लिए जाते हैं, फिर वे कोई कमी नहीं करते
وَاِذَا لَمْ تَاْتِهِمْ بِاٰيَةٍ قَالُوا لَوْلَا اجْتَبَيْتَهَاۜ قُلْ اِنَّمَٓا اَتَّبِعُ مَا يُوحٰٓى اِلَيَّ مِنْ رَبّ۪يۚ هٰذَا بَصَٓائِرُ مِنْ رَبِّكُمْ وَهُدًى وَرَحْمَةٌ لِقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ203
और जब तुम उनके सामने कोई निशानी नहीं लाते तो वे कहते हैं, "तुम स्वयं कोई निशानी क्यों न छाँट लाए?" कह दो, "मैं तो केवल उसी का अनुसरण करता हूँ जो मेरे रब की ओर से प्रकाशना की जाती है। यह तुम्हारे रब की ओर से अन्तर्दृष्टियों का प्रकाश-पुंज है, और ईमान लानेवालों के लिए मार्गदर्शन और दयालुता है।"
وَاِذَا قُرِئَ الْقُرْاٰنُ فَاسْتَمِعُوا لَهُ وَاَنْصِتُوا لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ204
जब क़ुरआन पढ़ा जाए तो उसे ध्यानपूर्वक सुनो और चुप रहो, ताकि तुमपर दया की जाए
وَاذْكُرْ رَبَّكَ ف۪ي نَفْسِكَ تَضَرُّعًا وَخ۪يفَةً وَدُونَ الْجَهْرِ مِنَ الْقَوْلِ بِالْغُدُوِّ وَالْاٰصَالِ وَلَا تَكُنْ مِنَ الْغَافِل۪ينَ205
अपने रब को अपने मन में प्रातः और संध्या के समयों में विनम्रतापूर्वक, डरते हुए और हल्की आवाज़ के साथ याद किया करो। और उन लोगों में से न हो जाओ जो ग़फ़लत में पड़े हुए है
اِنَّ الَّذ۪ينَ عِنْدَ رَبِّكَ لَا يَسْتَكْبِرُونَ عَنْ عِبَادَتِه۪ وَيُسَبِّحُونَهُ وَلَهُ يَسْجُدُونَ206
निस्संदेह जो तुम्हारे रब के पास है, वे उसकी बन्दगी के मुक़ाबले में अहंकार की नीति नहीं अपनाते; वे तो उसकी तसबीह (महिमागान) करते है और उसी को सजदा करते है
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
يَسْـَٔلُونَكَ عَنِ الْاَنْفَالِۜ قُلِ الْاَنْفَالُ لِلّٰهِ وَالرَّسُولِۚ فَاتَّقُوا اللّٰهَ وَاَصْلِحُوا ذَاتَ بَيْنِكُمْۖ وَاَط۪يعُوا اللّٰهَ وَرَسُولَهُٓ اِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِن۪ينَ1
वे तुमसे ग़नीमतों के विषय में पूछते है। कहो, "ग़नीमतें अल्लाह और रसूल की है। अतः अल्लाह का डर रखों और आपस के सम्बन्धों को ठीक रखो। और, अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो, यदि तुम ईमानवाले हो
اِنَّمَا الْمُؤْمِنُونَ الَّذ۪ينَ اِذَا ذُكِرَ اللّٰهُ وَجِلَتْ قُلُوبُهُمْ وَاِذَا تُلِيَتْ عَلَيْهِمْ اٰيَاتُهُ زَادَتْهُمْ ا۪يمَانًا وَعَلٰى رَبِّهِمْ يَتَوَكَّلُونَۚ2
ईमानवाले तो वही लोग है जिनके दिल उस समय काँप उठे जबकि अल्लाह को याद किया जाए। और जब उनके सामने उसकी आयतें पढ़ी जाएँ तो वे उनके ईमान को और अधिक बढ़ा दें और वे अपने रब पर भरोसा रखते हों
اَلَّذ۪ينَ يُق۪يمُونَ الصَّلٰوةَ وَمِمَّا رَزَقْنَاهُمْ يُنْفِقُونَۜ3
ये वे लोग हैं जो नमाज़ क़ायम करते है और जो कुछ हमने दिया है उसमें से ख़र्च करते हैं
اُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْمُؤْمِنُونَ حَقًّاۜ لَهُمْ دَرَجَاتٌ عِنْدَ رَبِّهِمْ وَمَغْفِرَةٌ وَرِزْقٌ كَر۪يمٌۚ4
वही लोग वास्तव में ईमानवाले है। उनके लिेए रब के पास बड़े दर्जे है और क्षमा और सम्मानित उत्तम आजीविका भी
كَمَٓا اَخْرَجَكَ رَبُّكَ مِنْ بَيْتِكَ بِالْحَقِّۖ وَاِنَّ فَر۪يقًا مِنَ الْمُؤْمِن۪ينَ لَكَارِهُونَۙ5
(यह बिल्कुल वैसी ही परिस्थित है) जैसे तुम्हारे ने तुम्हें तुम्हारे घर से एक उद्देश्य के साथ निकाला, किन्तु ईमानवालों में से एक गिरोह को यह अप्रिय लगा था
يُجَادِلُونَكَ فِي الْحَقِّ بَعْدَ مَا تَبَيَّنَ كَاَنَّمَا يُسَاقُونَ اِلَى الْمَوْتِ وَهُمْ يَنْظُرُونَۜ6
वे सत्य के विषय में उसके स्पष्ट हो जाने के पश्चात तुमसे झगड़ रहे थे। मानो वे आँखों देखी मृत्यु की ओर हाँके जा रहे हों
وَاِذْ يَعِدُكُمُ اللّٰهُ اِحْدَى الطَّٓائِفَتَيْنِ اَنَّهَا لَكُمْ وَتَوَدُّونَ اَنَّ غَيْرَ ذَاتِ الشَّوْكَةِ تَكُونُ لَكُمْ وَيُر۪يدُ اللّٰهُ اَنْ يُحِقَّ الْحَقَّ بِكَلِمَاتِه۪ وَيَقْطَعَ دَابِرَ الْكَافِر۪ينَۙ7
और याद करो जब अल्लाह तुमसे वादा कर रहा था कि दो गिरोहों में से एक तुम्हारे हाथ आएगा और तुम चाहते थे कि तुम्हें वह हाथ आए, जो निःशस्त्र था, हालाँकि अल्लाह चाहता था कि अपने वचनों से सत्य को सत्य कर दिखाए और इनकार करनेवालों की जड़ काट दे
لِيُحِقَّ الْحَقَّ وَيُبْطِلَ الْبَاطِلَ وَلَوْ كَرِهَ الْمُجْرِمُونَۚ8
ताकि सत्य को सत्य कर दिखाए और असत्य को असत्य, चाहे अपराधियों को कितना ही अप्रिय लगे
اِذْ تَسْتَغ۪يثُونَ رَبَّكُمْ فَاسْتَجَابَ لَكُمْ اَنّ۪ي مُمِدُّكُمْ بِاَلْفٍ مِنَ الْمَلٰٓئِكَةِ مُرْدِف۪ينَ9
याद करो जब तुम अपने रब से फ़रियाद कर रहे थे, तो उसने तुम्हारी पुकार सुन ली। (उसने कहा,) "मैं एक हजार फ़रिश्तों से तुम्हारी मदद करूँगा जो तुम्हारे साथी होंगे।"
وَمَا جَعَلَهُ اللّٰهُ اِلَّا بُشْرٰى وَلِتَطْمَئِنَّ بِه۪ قُلُوبُكُمْۚ وَمَا النَّصْرُ اِلَّا مِنْ عِنْدِ اللّٰهِۜ اِنَّ اللّٰهَ عَز۪يزٌ حَك۪يمٌ۟10
अल्लाह ने यह केवल इसलिए किया कि यह एक शुभ-सूचना हो और ताकि इससे तुम्हारे हृदय संतुष्ट हो जाएँ। सहायता अल्लाह ही के यहाँ से होती है। निस्संदेह अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
اِذْ يُغَشّ۪يكُمُ النُّعَاسَ اَمَنَةً مِنْهُ وَيُنَزِّلُ عَلَيْكُمْ مِنَ السَّمَٓاءِ مَٓاءً لِيُطَهِّرَكُمْ بِه۪ وَيُذْهِبَ عَنْكُمْ رِجْزَ الشَّيْطَانِ وَلِيَرْبِطَ عَلٰى قُلُوبِكُمْ وَيُثَبِّتَ بِهِ الْاَقْدَامَۜ11
यह करो जबकि वह अपनी ओर से चैन प्रदान कर तुम्हें ऊँघ से ढँक रहा था और वह आकाश से तुमपर पानी बरसा रहा था, ताकि उसके द्वारा तुम्हें अच्छी तरह पाक करे और शैतान की गन्दगी तुमसे दूर करे और तुम्हारे दिलों को मज़बूत करे और उसके द्वारा तुम्हारे क़दमों को जमा दे
اِذْ يُوح۪ي رَبُّكَ اِلَى الْمَلٰٓئِكَةِ اَنّ۪ي مَعَكُمْ فَثَبِّتُوا الَّذ۪ينَ اٰمَنُواۜ سَاُلْق۪ي ف۪ي قُلُوبِ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا الرُّعْبَ فَاضْرِبُوا فَوْقَ الْاَعْنَاقِ وَاضْرِبُوا مِنْهُمْ كُلَّ بَنَانٍۜ12
याद करो जब तुम्हारा रब फ़रिश्तों की ओर प्रकाशना (वह्य्) कर रहा था कि "मैं तुम्हारे साथ हूँ। अतः तुम ईमानवालों को जमाए रखो। मैं इनकार करनेवालों के दिलों में रोब डाले देता हूँ। तो तुम उनकी गरदनें मारो और उनके पोर-पोर पर चोट लगाओ!"
ذٰلِكَ بِاَنَّهُمْ شَٓاقُّوا اللّٰهَ وَرَسُولَهُۚ وَمَنْ يُشَاقِقِ اللّٰهَ وَرَسُولَهُ فَاِنَّ اللّٰهَ شَد۪يدُ الْعِقَابِ13
यह इसलिए कि उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल का विरोध किया। और जो कोई अल्लाह और उसके रसूल का विरोध करे (उसे कठोर यातना मिलकर रहेगी) क्योंकि अल्लाह कड़ी यातना देनेवाला है
ذٰلِكُمْ فَذُوقُوهُ وَاَنَّ لِلْكَافِر۪ينَ عَذَابَ النَّارِ14
यह तो तुम चखो! और यह कि इनकार करनेवालों के लिए आग की यातना है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اِذَا لَق۪يتُمُ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا زَحْفًا فَلَا تُوَلُّوهُمُ الْاَدْبَارَۚ15
ऐ ईमान लानेवालो! जब एक सेना के रूप में तुम्हारा इनकार करनेवालों से मुक़ाबला हो तो पीठ न फेरो
وَمَنْ يُوَلِّهِمْ يَوْمَئِذٍ دُبُرَهُٓ اِلَّا مُتَحَرِّفًا لِقِتَالٍ اَوْ مُتَحَيِّزًا اِلٰى فِئَةٍ فَقَدْ بَٓاءَ بِغَضَبٍ مِنَ اللّٰهِ وَمَاْوٰيهُ جَهَنَّمُۜ وَبِئْسَ الْمَص۪يرُ16
जिस किसी ने भी उस दिन उनसे अपनी पीठ फेरी - यह और बात है कि युद्ध-चाल के रूप में या दूसरी टुकड़ी से मिलने के लिए ऐसा करे - तो वह अल्लाह के प्रकोप का भागी हुआ और उसका ठिकाना जहन्नम है, और क्या ही बुरा जगह है वह पहुँचने की!
فَلَمْ تَقْتُلُوهُمْ وَلٰكِنَّ اللّٰهَ قَتَلَهُمْۖ وَمَا رَمَيْتَ اِذْ رَمَيْتَ وَلٰكِنَّ اللّٰهَ رَمٰىۚ وَلِيُبْلِيَ الْمُؤْمِن۪ينَ مِنْهُ بَلَٓاءً حَسَنًاۜ اِنَّ اللّٰهَ سَم۪يعٌ عَل۪يمٌ17
तुमने उसे क़त्ल नहीं किया बल्कि अल्लाह ही ने उन्हें क़त्ल किया और जब तुमने (उनकी ओर मिट्टी और कंकड़) फेंक, तो तुमने नहीं फेंका बल्कि अल्लाह ने फेंका (कि अल्लाह अपनी गुण-गरिमा दिखाए) और ताकि अपनी ओर से ईमानवालों के गुण प्रकट करे। निस्संदेह अल्लाह सुनता, जानता है
ذٰلِكُمْ وَاَنَّ اللّٰهَ مُوهِنُ كَيْدِ الْكَافِر۪ينَ18
यह तो हुआ, और यह (जान लो) कि अल्लाह इनकार करनेवालों की चाल को कमज़ोर कर देनेवाला है
اِنْ تَسْتَفْتِحُوا فَقَدْ جَٓاءَكُمُ الْفَتْحُۚ وَاِنْ تَنْتَهُوا فَهُوَ خَيْرٌ لَكُمْۚ وَاِنْ تَعُودُوا نَعُدْۚ وَلَنْ تُغْنِيَ عَنْكُمْ فِئَتُكُمْ شَيْـًٔا وَلَوْ كَثُرَتْۙ وَاَنَّ اللّٰهَ مَعَ الْمُؤْمِن۪ينَ۟19
यदि तुम फ़ैसला चाहते हो तो फ़ैसला तुम्हारे सामने आ चुका और यदि बाज़ आ जाओ तो यह तुम्हारे ही लिए अच्छा है। लेकिन यदि तुमने पलटकर फिर वही हरकत की तो हम भी पलटेंगे और तुम्हारा जत्था, चाहे वह कितना ही अधिक हो, तुम्हारे कुछ काम न आ सकेगा। और यह कि अल्लाह मोमिनों के साथ होता है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اَط۪يعُوا اللّٰهَ وَرَسُولَهُ وَلَا تَوَلَّوْا عَنْهُ وَاَنْتُمْ تَسْمَعُونَۚ20
ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह और उसके रसूल का आज्ञापालन करो और उससे मुँह न फेरो जबकि तुम सुन रहे हो
وَلَا تَكُونُوا كَالَّذ۪ينَ قَالُوا سَمِعْنَا وَهُمْ لَا يَسْمَعُونَ21
और उन लोगों की तरह न हो जाना जिन्होंने कहा था, "हमने सुना" हालाँकि वे सुनते नहीं
اِنَّ شَرَّ الدَّوَٓابِّ عِنْدَ اللّٰهِ الصُّمُّ الْبُكْمُ الَّذ۪ينَ لَا يَعْقِلُونَ22
अल्लाह की स्पष्ट में तो निकृष्ट पशु वे बहरे-गूँगे लोग है, जो बुद्धि से काम नहीं लेते
وَلَوْ عَلِمَ اللّٰهُ ف۪يهِمْ خَيْرًا لَاَسْمَعَهُمْۜ وَلَوْ اَسْمَعَهُمْ لَتَوَلَّوْا وَهُمْ مُعْرِضُونَ23
यदि अल्लाह जानता कि उनमें कुछ भी भलाई है, तो वह उन्हें अवश्य सुनने का सौभाग्य प्रदान करता। और यदि वह उन्हें सुना देता तो भी वे कतराते हुए मुँह फेर लेते
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا اسْتَج۪يبُوا لِلّٰهِ وَلِلرَّسُولِ اِذَا دَعَاكُمْ لِمَا يُحْي۪يكُمْۚ وَاعْلَمُٓوا اَنَّ اللّٰهَ يَحُولُ بَيْنَ الْمَرْءِ وَقَلْبِه۪ وَاَنَّهُٓ اِلَيْهِ تُحْشَرُونَ24
ऐ ईमान लानेवाले! अल्लाह और रसूल की बात मानो, जब वह तुम्हें उस चीज़ की ओर बुलाए जो तुम्हें जीवन प्रदान करनेवाली है, और जान रखो कि अल्लाह आदमी और उसके दिल के बीच आड़े आ जाता है और यह कि वही है जिसकी ओर (पलटकर) तुम एकत्र होगे
وَاتَّقُوا فِتْنَةً لَا تُص۪يبَنَّ الَّذ۪ينَ ظَلَمُوا مِنْكُمْ خَٓاصَّةًۚ وَاعْلَمُٓوا اَنَّ اللّٰهَ شَد۪يدُ الْعِقَابِ25
बचो उस फ़ितने से जो अपनी लपेट में विशेष रूप से केवल अत्याचारियों को ही नहीं लेगा, जान लो अल्लाह कठोर दंड देनेवाला है
وَاذْكُرُٓوا اِذْ اَنْتُمْ قَل۪يلٌ مُسْتَضْعَفُونَ فِي الْاَرْضِ تَخَافُونَ اَنْ يَتَخَطَّفَكُمُ النَّاسُ فَاٰوٰيكُمْ وَاَيَّدَكُمْ بِنَصْرِه۪ وَرَزَقَكُمْ مِنَ الطَّيِّبَاتِ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ26
और याद करो जब तुम थोड़े थे, धरती में निर्बल थे, डरे-सहमे रहते कि लोग कहीं तु्म्हें उचक न ले जाएँ, फिर उसने तुम्हें ठिकाना दिया और अपनी सहायता से तुम्हें शक्ति प्रदान की और अच्छी-स्वच्छ चीज़ों की तुम्हें रोजी दी, ताकि तुम कृतज्ञता दिखलाओ
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لَا تَخُونُوا اللّٰهَ وَالرَّسُولَ وَتَخُونُٓوا اَمَانَاتِكُمْ وَاَنْتُمْ تَعْلَمُونَ27
ऐ ईमान लानेवालो! जानते-बुझते तुम अल्लाह और उसके रसूल के साथ विश्वासघात न करना और न अपनी अमानतों में ख़ियानत करना
وَاعْلَمُٓوا اَنَّمَٓا اَمْوَالُكُمْ وَاَوْلَادُكُمْ فِتْنَةٌۙ وَاَنَّ اللّٰهَ عِنْدَهُٓ اَجْرٌ عَظ۪يمٌ۟28
और जान रखो कि तुम्हारे माल और तुम्हारी संतान परीक्षा-सामग्री हैं और यह कि अल्लाह के पास बड़ा प्रतिदान है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اِنْ تَتَّقُوا اللّٰهَ يَجْعَلْ لَكُمْ فُرْقَانًا وَيُكَفِّرْ عَنْكُمْ سَيِّـَٔاتِكُمْ وَيَغْفِرْ لَكُمْۜ وَاللّٰهُ ذُو الْفَضْلِ الْعَظ۪يمِ29
ऐ ईमान लानेवालो! यदि तुम अल्लाह का डर रखोगे तो वह तुम्हें एक विशिष्टता प्रदान करेगा और तुमसे तुम्हारी बुराइयाँ दूर करेगा और तुम्हे क्षमा करेगा। अल्लाह बड़ा अनुग्राहक है
وَاِذْ يَمْكُرُ بِكَ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا لِيُثْبِتُوكَ اَوْ يَقْتُلُوكَ اَوْ يُخْرِجُوكَۜ وَيَمْكُرُونَ وَيَمْكُرُ اللّٰهُۜ وَاللّٰهُ خَيْرُ الْمَاكِر۪ينَ30
और याद करो जब इनकार करनेवाले तुम्हारे साथ चालें चल रहे थे कि तम्हें क़ैद रखें या तुम्हे क़त्ल कर दें या तुम्हे निकाल बाहर करे। वे अपनी चालें चल रहे थे और अल्लाह भी अपनी चाल चल रहा था। अल्लाह सबसे अच्छी चाल चलता है
وَاِذَا تُتْلٰى عَلَيْهِمْ اٰيَاتُنَا قَالُوا قَدْ سَمِعْنَا لَوْ نَشَٓاءُ لَقُلْنَا مِثْلَ هٰذَٓاۙ اِنْ هٰذَٓا اِلَّٓا اَسَاط۪يرُ الْاَوَّل۪ينَ31
जब उनके सामने हमारी आयतें पढ़ी जाती है, तो वे कहते है, "हम सुन चुके। यदि हम चाहें तो ऐसी बातें हम भी बना लें; ये तो बस पहले के लोगों की कहानियाँ हैं।"
وَاِذْ قَالُوا اللّٰهُمَّ اِنْ كَانَ هٰذَا هُوَ الْحَقَّ مِنْ عِنْدِكَ فَاَمْطِرْ عَلَيْنَا حِجَارَةً مِنَ السَّمَٓاءِ اَوِ ائْتِنَا بِعَذَابٍ اَل۪يمٍ32
और याद करो जब उन्होंने कहा, "ऐ अल्लाह! यदि यही तेरे यहाँ से सत्य हो तो हमपर आकाश से पत्थर बरसा दे, या हम पर कोई दुखद यातना ही ले आ
وَمَا كَانَ اللّٰهُ لِيُعَذِّبَهُمْ وَاَنْتَ ف۪يهِمْۜ وَمَا كَانَ اللّٰهُ مُعَذِّبَهُمْ وَهُمْ يَسْتَغْفِرُونَ33
और अल्लाह ऐसा नहीं कि तुम उनके बीच उपस्थित हो और वह उन्हें यातना देने लग जाए, और न अल्लाह ऐसा है कि वे क्षमा-याचना कर रहे हो और वह उन्हें यातना से ग्रस्त कर दे
وَمَا لَهُمْ اَلَّا يُعَذِّبَهُمُ اللّٰهُ وَهُمْ يَصُدُّونَ عَنِ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ وَمَا كَانُٓوا اَوْلِيَٓاءَهُۜ اِنْ اَوْلِيَٓاؤُ۬هُٓ اِلَّا الْمُتَّقُونَ وَلٰكِنَّ اَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ34
किन्तु अब क्या है उनके पास कि अल्लाह उन्हें यातना न दे, जबकि वे 'मस्जिदे हराम' (काबा) से रोकते है, हालाँकि वे उसके कोई व्यवस्थापक नहीं? उसके व्यवस्थापक तो केवल डर रखनेवाले ही है, परन्तु उनके अधिकतर लोग जानते नहीं
وَمَا كَانَ صَلَاتُهُمْ عِنْدَ الْبَيْتِ اِلَّا مُكَٓاءً وَتَصْدِيَةًۜ فَذُوقُوا الْعَذَابَ بِمَا كُنْتُمْ تَكْفُرُونَ35
उनकी नमाज़़ इस घर (काबा) के पास सीटियाँ बजाने और तालियाँ पीटने के अलावा कुछ भी नहीं होती। तो अब यातना का मज़ा चखो, उस इनकार के बदले में जो तुम करते रहे हो
اِنَّ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا يُنْفِقُونَ اَمْوَالَهُمْ لِيَصُدُّوا عَنْ سَب۪يلِ اللّٰهِۜ فَسَيُنْفِقُونَهَا ثُمَّ تَكُونُ عَلَيْهِمْ حَسْرَةً ثُمَّ يُغْلَبُونَۜ وَالَّذ۪ينَ كَفَرُٓوا اِلٰى جَهَنَّمَ يُحْشَرُونَۙ36
निश्चय ही इनकार करनेवाले अपने माल अल्लाह के मार्ग से रोकने के लिए ख़र्च करते रहेंगे, फिर यही उनके लिए पश्चाताप बनेगा। फिर वे पराभूत होंगे और इनकार करनेवाले जहन्नम की ओर समेट लाए जाएँगे
لِيَم۪يزَ اللّٰهُ الْخَب۪يثَ مِنَ الطَّيِّبِ وَيَجْعَلَ الْخَب۪يثَ بَعْضَهُ عَلٰى بَعْضٍ فَيَرْكُمَهُ جَم۪يعًا فَيَجْعَلَهُ ف۪ي جَهَنَّمَۜ اُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْخَاسِرُونَ۟37
ताकि अल्लाह नापाक को पाक से छाँटकर अलग करे और नापाकों को आपस में एक-दूसरे पर रखकर ढेर बनाए, फिर उसे जहन्नम में डाल दे। यही लोग घाटे में पड़नेवाले है
قُلْ لِلَّذ۪ينَ كَفَرُٓوا اِنْ يَنْتَهُوا يُغْفَرْ لَهُمْ مَا قَدْ سَلَفَۚ وَاِنْ يَعُودُوا فَقَدْ مَضَتْ سُنَّتُ الْاَوَّل۪ينَ38
उन इनकार करनेवालो से कह दो कि वे यदि बाज़ आ जाएँ तो जो कुछ हो चुका, उसे क्षमा कर दिया जाएगा, किन्तु यदि वे फिर भी वहीं करेंगे तो पूर्ववर्ती लोगों के सिलसिले में जो रीति अपनाई गई वह सामने से गुज़र चुकी है
وَقَاتِلُوهُمْ حَتّٰى لَا تَكُونَ فِتْنَةٌ وَيَكُونَ الدّ۪ينُ كُلُّهُ لِلّٰهِۚ فَاِنِ انْتَهَوْا فَاِنَّ اللّٰهَ بِمَا يَعْمَلُونَ بَص۪يرٌ39
उनसे युद्ध करो, यहाँ तक कि फ़ितना बाक़ी न रहे और दीन (धर्म) पूरा का पूरा अल्लाह ही के लिए हो जाए। फिर यदि वे बाज़ आ जाएँ तो अल्लाह उनके कर्म को देख रहा है
وَاِنْ تَوَلَّوْا فَاعْلَمُٓوا اَنَّ اللّٰهَ مَوْلٰيكُمْۜ نِعْمَ الْمَوْلٰى وَنِعْمَ النَّص۪يرُ40
किन्तु यदि वे मुँह मोड़े तो जान रखो कि अल्लाह संरक्षक है। क्या ही अच्छा संरक्षक है वह, और क्या ही अच्छा सहायक!