11. पृष्ठ - कुरान पढ़ें

11. पृष्ठ
2 · अल-बक़रा
قَالُوا ادْعُ لَنَا رَبَّكَ يُبَيِّنْ لَنَا مَا هِيَۙ اِنَّ الْبَقَرَ تَشَابَهَ عَلَيْنَاۜ وَاِنَّٓا اِنْ شَٓاءَ اللّٰهُ لَمُهْتَدُونَ70
बोले, "हमारे लिए अपने रब से निवेदन करो कि वह हमें बता दे कि वह कौन-सी है, गायों का निर्धारण हमारे लिए संदिग्ध हो रहा है। यदि अल्लाह ने चाहा तो हम अवश्य। पता लगा लेंगे।"
قَالَ اِنَّهُ يَقُولُ اِنَّهَا بَقَرَةٌ لَا ذَلُولٌ تُث۪يرُ الْاَرْضَ وَلَا تَسْقِي الْحَرْثَۚ مُسَلَّمَةٌ لَا شِيَةَ ف۪يهَاۜ قَالُوا الْـٰٔنَ جِئْتَ بِالْحَقِّۜ فَذَبَحُوهَا وَمَا كَادُوا يَفْعَلُونَ۟71
उसने कहा, " वह कहता हैं कि वह ऐसा गाय है जो सधाई हुई नहीं है कि भूमि जोतती हो, और न वह खेत को पानी देती है, ठीक-ठाक है, उसमें किसी दूसरे रंग की मिलावट नहीं है।" बोले, "अब तुमने ठीक बात बताई है।" फिर उन्होंने उसे ज़ब्ह किया, जबकि वे करना नहीं चाहते थे
وَاِذْ قَتَلْتُمْ نَفْسًا فَادّٰرَءْتُمْ ف۪يهَاۜ وَاللّٰهُ مُخْرِجٌ مَا كُنْتُمْ تَكْتُمُونَۚ72
और याद करो जब तुमने एक व्यक्ति की हत्या कर दी, फिर उस सिलसिले में तुमने टाल-मटोल से काम लिया - जबकि जिसको तुम छिपा रहे थे, अल्लाह उसे खोल देनेवाला था
فَقُلْنَا اضْرِبُوهُ بِبَعْضِهَاۜ كَذٰلِكَ يُحْيِ اللّٰهُ الْمَوْتٰى وَيُر۪يكُمْ اٰيَاتِه۪ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ73
तो हमने कहा, "उसे उसके एक हिस्से से मारो।" इस प्रकार अल्लाह मुर्दों को जीवित करता है और तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखाता है, ताकि तुम समझो
ثُمَّ قَسَتْ قُلُوبُكُمْ مِنْ بَعْدِ ذٰلِكَ فَهِيَ كَالْحِجَارَةِ اَوْ اَشَدُّ قَسْوَةًۜ وَاِنَّ مِنَ الْحِجَارَةِ لَمَا يَتَفَجَّرُ مِنْهُ الْاَنْهَارُۜ وَاِنَّ مِنْهَا لَمَا يَشَّقَّقُ فَيَخْرُجُ مِنْهُ الْمَٓاءُۜ وَاِنَّ مِنْهَا لَمَا يَهْبِطُ مِنْ خَشْيَةِ اللّٰهِۜ وَمَا اللّٰهُ بِغَافِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ74
फिर इसके पश्चात भी तुम्हारे दिल कठोर हो गए, तो वे पत्थरों की तरह हो गए बल्कि उनसे भी अधिक कठोर; क्योंकि कुछ पत्थर ऐसे भी होते है जिनसे नहरें फूट निकलती है, और कुछ ऐसे भी होते है कि फट जाते है तो उनमें से पानी निकलने लगता है, और उनमें से कुछ ऐसे भी होते है जो अल्लाह के भय से गिर जाते है। और अल्लाह, जो कुछ तुम कर रहे हो, उससे बेखबर नहीं है
اَفَتَطْمَعُونَ اَنْ يُؤْمِنُوا لَكُمْ وَقَدْ كَانَ فَر۪يقٌ مِنْهُمْ يَسْمَعُونَ كَلَامَ اللّٰهِ ثُمَّ يُحَرِّفُونَهُ مِنْ بَعْدِ مَا عَقَلُوهُ وَهُمْ يَعْلَمُونَ75
तो क्या तुम इस लालच में हो कि वे तुम्हारी बात मान लेंगे, जबकि उनमें से कुछ लोग अल्लाह का कलाम सुनते रहे हैं, फिर उसे भली-भाँति समझ लेने के पश्चात जान-बूझकर उसमें परिवर्तन करते रहे?
وَاِذَا لَقُوا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا قَالُٓوا اٰمَنَّاۚ وَاِذَا خَلَا بَعْضُهُمْ اِلٰى بَعْضٍ قَالُٓوا اَتُحَدِّثُونَهُمْ بِمَا فَتَحَ اللّٰهُ عَلَيْكُمْ لِيُحَٓاجُّوكُمْ بِه۪ عِنْدَ رَبِّكُمْۜ اَفَلَا تَعْقِلُونَ76
और जब वे ईमान लानेवाले से मिलते है तो कहते हैं, "हम भी ईमान रखते हैं", और जब आपस में एक-दूसरे से एकान्त में मिलते है तो कहते है, "क्या तुम उन्हें वे बातें, जो अल्लाह ने तुम पर खोली, बता देते हो कि वे उनके द्वारा तुम्हारे रब के यहाँ हुज्जत में तुम्हारा मुक़ाबिला करें? तो क्या तुम समझते नहीं!"