115. पृष्ठ - कुरान पढ़ें

115. पृष्ठ
5 · अल-माइदा
سَمَّاعُونَ لِلْكَذِبِ اَكَّالُونَ لِلسُّحْتِۜ فَاِنْ جَٓاؤُ۫كَ فَاحْكُمْ بَيْنَهُمْ اَوْ اَعْرِضْ عَنْهُمْۚ وَاِنْ تُعْرِضْ عَنْهُمْ فَلَنْ يَضُرُّوكَ شَيْـًٔاۜ وَاِنْ حَكَمْتَ فَاحْكُمْ بَيْنَهُمْ بِالْقِسْطِۜ اِنَّ اللّٰهَ يُحِبُّ الْمُقْسِط۪ينَ42
वे झूठ के लिए कान लगाते रहनेवाले और बड़े हराम खानेवाले है। अतः यदि वे तुम्हारे पास आएँ, तो या तुम उनके बीच फ़ैसला कर दो या उन्हें टाल जाओ। यदि तुम उन्हें टाल गए तो वे तुम्हारा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते। परन्तु यदि फ़ैसला करो तो उनके बीच इनसाफ़ के साथ फ़ैसला करो। निश्चय ही अल्लाह इनसाफ़ करनेवालों से प्रेम करता है
وَكَيْفَ يُحَكِّمُونَكَ وَعِنْدَهُمُ التَّوْرٰيةُ ف۪يهَا حُكْمُ اللّٰهِ ثُمَّ يَتَوَلَّوْنَ مِنْ بَعْدِ ذٰلِكَۜ وَمَٓا اُو۬لٰٓئِكَ بِالْمُؤْمِن۪ينَ۟43
वे तुमसे फ़ैसला कराएँगे भी कैसे, जबकि उनके पास तौरात है, जिसमें अल्लाह का हुक्म मौजूद है! फिर इसके पश्चात भी वे मुँह मोड़ते है। वे तो ईमान नहीं रखते
اِنَّٓا اَنْزَلْنَا التَّوْرٰيةَ ف۪يهَا هُدًى وَنُورٌۚ يَحْكُمُ بِهَا النَّبِيُّونَ الَّذ۪ينَ اَسْلَمُوا لِلَّذ۪ينَ هَادُوا وَالرَّبَّانِيُّونَ وَالْاَحْبَارُ بِمَا اسْتُحْفِظُوا مِنْ كِتَابِ اللّٰهِ وَكَانُوا عَلَيْهِ شُهَدَٓاءَۚ فَلَا تَخْشَوُا النَّاسَ وَاخْشَوْنِ وَلَا تَشْتَرُوا بِاٰيَات۪ي ثَمَنًا قَل۪يلًاۜ وَمَنْ لَمْ يَحْكُمْ بِمَٓا اَنْزَلَ اللّٰهُ فَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْكَافِرُونَ44
निस्संदेह हमने तौरात उतारी, जिसमें मार्गदर्शन और प्रकाश था। नबी जो आज्ञाकारी थे, उसको यहूदियों के लिए अनिवार्य ठहराते थे कि वे उसका पालन करें और इसी प्रकार अल्लाहवाले और शास्त्रवेत्ता भी। क्योंकि उन्हें अल्लाह की किताब की सुरक्षा का आदेश दिया गया था और वे उसके संरक्षक थे। तो तुम लोगों से न डरो, बल्कि मुझ ही से डरो और मेरी आयतों के बदले थोड़ा मूल्य प्राप्त न करना। जो लोग उस विधान के अनुसार फ़ैसला न करें, जिसे अल्लाह ने उतारा है, तो ऐसे ही लोग विधर्मी है
وَكَتَبْنَا عَلَيْهِمْ ف۪يهَٓا اَنَّ النَّفْسَ بِالنَّفْسِۙ وَالْعَيْنَ بِالْعَيْنِ وَالْاَنْفَ بِالْاَنْفِ وَالْاُذُنَ بِالْاُذُنِ وَالسِّنَّ بِالسِّنِّۙ وَالْجُرُوحَ قِصَاصٌۜ فَمَنْ تَصَدَّقَ بِه۪ فَهُوَ كَفَّارَةٌ لَهُۜ وَمَنْ لَمْ يَحْكُمْ بِمَٓا اَنْزَلَ اللّٰهُ فَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ45
और हमने उस (तौरात) में उनके लिए लिख दिया था कि जान जान के बराबर है, आँख आँख के बराहर है, नाक नाक के बराबर है, कान कान के बराबर, दाँत दाँत के बराबर और सब आघातों के लिए इसी तरह बराबर का बदला है। तो जो कोई उसे क्षमा कर दे तो यह उसके लिए प्रायश्चित होगा और जो लोग उस विधान के अनुसार फ़ैसला न करें, जिसे अल्लाह ने उतारा है जो ऐसे लोग अत्याचारी है