125. पृष्ठ - कुरान पढ़ें

125. पृष्ठ
5 · अल-माइदा
وَاِذَا ق۪يلَ لَهُمْ تَعَالَوْا اِلٰى مَٓا اَنْزَلَ اللّٰهُ وَاِلَى الرَّسُولِ قَالُوا حَسْبُنَا مَا وَجَدْنَا عَلَيْهِ اٰبَٓاءَنَاۜ اَوَلَوْ كَانَ اٰبَٓاؤُ۬هُمْ لَا يَعْلَمُونَ شَيْـًٔا وَلَا يَهْتَدُونَ104
और जब उनसे कहा जाता है कि उस चीज़ की ओर आओ जो अल्लाह ने अवतरित की है और रसूल की ओर, तो वे कहते है, "हमारे लिए तो वही काफ़ी है, जिस पर हमने अपने बाप-दादा को पाया है।" क्या यद्यपि उनके बापृ-दादा कुछ भी न जानते रहे हों और न सीधे मार्ग पर रहे हो?
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا عَلَيْكُمْ اَنْفُسَكُمْۚ لَا يَضُرُّكُمْ مَنْ ضَلَّ اِذَا اهْتَدَيْتُمْۜ اِلَى اللّٰهِ مَرْجِعُكُمْ جَم۪يعًا فَيُنَبِّئُكُمْ بِمَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ105
ऐ ईमान लानेवालो! तुमपर अपनी चिन्ता अनिवार्य है, जब तुम रास्ते पर हो, तो जो कोई भटक जाए वह तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। अल्लाह की ओर तुम सबको लौटकर जाना है। फिर वह तुम्हें बता देगा, जो कुछ तुम करते रहे होगे
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا شَهَادَةُ بَيْنِكُمْ اِذَا حَضَرَ اَحَدَكُمُ الْمَوْتُ ح۪ينَ الْوَصِيَّةِ اثْنَانِ ذَوَا عَدْلٍ مِنْكُمْ اَوْ اٰخَرَانِ مِنْ غَيْرِكُمْ اِنْ اَنْتُمْ ضَرَبْتُمْ فِي الْاَرْضِ فَاَصَابَتْكُمْ مُص۪يبَةُ الْمَوْتِۜ تَحْبِسُونَهُمَا مِنْ بَعْدِ الصَّلٰوةِ فَيُقْسِمَانِ بِاللّٰهِ اِنِ ارْتَبْتُمْ لَا نَشْتَر۪ي بِه۪ ثَمَنًا وَلَوْ كَانَ ذَا قُرْبٰىۙ وَلَا نَكْتُمُ شَهَادَةَ اللّٰهِ اِنَّٓا اِذًا لَمِنَ الْاٰثِم۪ينَ106
ऐ ईमान लानेवालों! जब तुममें से किसी की मृत्यु का समय आ जाए तो वसीयत के समय तुममें से दो न्यायप्रिय व्यक्ति गवाह हों, या तुम्हारे ग़ैर लोगों में से दूसरे दो व्यक्ति गवाह बन जाएँ, यह उस समय कि यदि तुम कहीं सफ़र में गए हो और मृत्यु तुमपर आ पहुँचे। यदि तुम्हें कोई सन्देह हो तो नमाज़ के पश्चात उन दोनों को रोक लो, फिर वे दोनों अल्लाह की क़समें खाएँ कि "हम इसके बदले कोई मूल्य स्वीकार करनेवाले नहीं हैं चाहे कोई नातेदार ही क्यों न हो और न हम अल्लाह की गवाही छिपाते है। निस्सन्देह ऐसा किया तो हम गुनाहगार ठहरेंगे।"
فَاِنْ عُثِرَ عَلٰٓى اَنَّهُمَا اسْتَحَقَّٓا اِثْمًا فَاٰخَرَانِ يَقُومَانِ مَقَامَهُمَا مِنَ الَّذ۪ينَ اسْتَحَقَّ عَلَيْهِمُ الْاَوْلَيَانِ فَيُقْسِمَانِ بِاللّٰهِ لَشَهَادَتُنَٓا اَحَقُّ مِنْ شَهَادَتِهِمَا وَمَا اعْتَدَيْنَاۘ اِنَّٓا اِذًا لَمِنَ الظَّالِم۪ينَ107
फिर यदि पता चल जाए कि उन दोनों ने हक़ मारकर अपने को गुनाह में डाल लिया है, तो उनकी जगह दूसरे दो व्यक्ति उन लोगों में से खड़े हो जाएँ, जिनका हक़ पिछले दोनों ने मारना चाहा था, फिर वे दोनों अल्लाह की क़समें खाएँ कि "हम दोनों की गवाही उन दोनों की गवाही से अधिक सच्ची है और हमने कोई ज़्यादती नहीं की है। निस्सन्देह हमने ऐसा किया तो अत्याचारियों में से होंगे।"
ذٰلِكَ اَدْنٰٓى اَنْ يَاْتُوا بِالشَّهَادَةِ عَلٰى وَجْهِهَٓا اَوْ يَخَافُٓوا اَنْ تُرَدَّ اَيْمَانٌ بَعْدَ اَيْمَانِهِمْۜ وَاتَّقُوا اللّٰهَ وَاسْمَعُواۜ وَاللّٰهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْفَاسِق۪ينَ۟108
इसमें इसकी सम्भावना है कि वे ठीक-ठीक गवाही देंगे या डरेंगे कि उनकी क़समों के पश्चात क़समें ली जाएँगी। अल्लाह का डर रखो और सुनो। अल्लाह अवज्ञाकारी लोगों को मार्ग नहीं दिखाता