130. पृष्ठ - कुरान पढ़ें

130. पृष्ठ
6 · अल-अनाम
قُلْ اَيُّ شَيْءٍ اَكْبَرُ شَهَادَةًۜ قُلِ اللّٰهُ شَه۪يدٌ بَيْن۪ي وَبَيْنَكُمْ وَاُو۫حِيَ اِلَيَّ هٰذَا الْقُرْاٰنُ لِاُنْذِرَكُمْ بِه۪ وَمَنْ بَلَغَۜ اَئِنَّكُمْ لَتَشْهَدُونَ اَنَّ مَعَ اللّٰهِ اٰلِهَةً اُخْرٰىۜ قُلْ لَٓا اَشْهَدُۚ قُلْ اِنَّمَا هُوَ اِلٰهٌ وَاحِدٌ وَاِنَّن۪ي بَر۪ٓيءٌ مِمَّا تُشْرِكُونَۢ19
कहो, "किस चीज़ की गवाही सबसे बड़ी है?" कहो, "मेरे और तुम्हारे बीच अल्लाह गवाह है। और यह क़ुरआन मेरी ओर वह्यी (प्रकाशना) किया गया है, ताकि मैं इसके द्वारा तुम्हें सचेत कर दूँ। और जिस किसी को यह अल्लाह के साथ दूसरे पूज्य भी है?" तुम कह दो, "मैं तो इसकी गवाही नहीं देता।" कह दो, "वह तो बस अकेला पूज्य है। और तुम जो उसका साझी ठहराते हो, उससे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं।"
اَلَّذ۪ينَ اٰتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ يَعْرِفُونَهُ كَمَا يَعْرِفُونَ اَبْنَٓاءَهُمْۢ اَلَّذ۪ينَ خَسِرُٓوا اَنْفُسَهُمْ فَهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ۟20
जिन लोगों को हमने किताब दी है, वे उसे इस प्रकार पहचानते है, जिस प्रकार अपने बेटों को पहचानते है। जिन लोगों ने अपने आपको घाटे में डाला है, वही ईमान नहीं लाते
وَمَنْ اَظْلَمُ مِمَّنِ افْتَرٰى عَلَى اللّٰهِ كَذِبًا اَوْ كَذَّبَ بِاٰيَاتِه۪ۜ اِنَّهُ لَا يُفْلِحُ الظَّالِمُونَ21
और उससे बढ़कर अत्याचारी कौन होगा, जो अल्लाह पर झूठ गढ़े या उसकी आयतों को झुठलाए। निस्सन्देह अत्याचारी कभी सफल नहीं हो सकते
وَيَوْمَ نَحْشُرُهُمْ جَم۪يعًا ثُمَّ نَقُولُ لِلَّذ۪ينَ اَشْرَكُٓوا اَيْنَ شُرَكَٓاؤُ۬كُمُ الَّذ۪ينَ كُنْتُمْ تَزْعُمُونَ22
और उस दिन को याद करो जब हम सबको इकट्ठा करेंगे; फिर बहुदेववादियों से पूछेंगे, "कहाँ है तुम्हारे ठहराए हुए साझीदार, जिनका तुम दावा किया करते थे?"
ثُمَّ لَمْ تَكُنْ فِتْنَتُهُمْ اِلَّٓا اَنْ قَالُوا وَاللّٰهِ رَبِّنَا مَا كُنَّا مُشْرِك۪ينَ23
फिर उनका कोई फ़िला (उपद्रव) शेष न रहेगा। सिवाय इसके कि वे कहेंगे, "अपने रब अल्लाह की सौगन्ध! हम बहुदेववादी न थे।"
اُنْظُرْ كَيْفَ كَذَبُوا عَلٰٓى اَنْفُسِهِمْ وَضَلَّ عَنْهُمْ مَا كَانُوا يَفْتَرُونَ24
देखो, कैसा वे अपने विषय में झूठ बोले। और वह गुम होकर रह गया जो वे घड़ा करते थे
وَمِنْهُمْ مَنْ يَسْتَمِعُ اِلَيْكَۚ وَجَعَلْنَا عَلٰى قُلُوبِهِمْ اَكِنَّةً اَنْ يَفْقَهُوهُ وَف۪ٓي اٰذَانِهِمْ وَقْرًاۜ وَاِنْ يَرَوْا كُلَّ اٰيَةٍ لَا يُؤْمِنُوا بِهَاۜ حَتّٰٓى اِذَا جَٓاؤُ۫كَ يُجَادِلُونَكَ يَقُولُ الَّذ۪ينَ كَفَرُٓوا اِنْ هٰذَٓا اِلَّٓا اَسَاط۪يرُ الْاَوَّل۪ينَ25
और उनमें कुछ लोग ऐसे है जो तुम्हारी ओर कान लगाते है, हालाँकि हमने तो उनके दिलों पर परदे डाल रखे है कि वे उसे समझ न सकें और उनके कानों में बोझ डाल दिया है। और वे चाहे प्रत्येक निशानी देख लें तब भी उसे मानेंगे नहीं; यहाँ तक कि जब वे तुम्हारे पास आकर तुमसे झगड़ते है, तो अविश्वास की नीति अपनानेवाले कहते है, "यह तो बस पहले को लोगों की गाथाएँ है।"
وَهُمْ يَنْهَوْنَ عَنْهُ وَيَنْـَٔوْنَ عَنْهُۚ وَاِنْ يُهْلِكُونَ اِلَّٓا اَنْفُسَهُمْ وَمَا يَشْعُرُونَ26
और वे उससे दूसरों को रोकते है और स्वयं भी उससे दूर रहते है। वे तो बस अपने आपको ही विनष्ट कर रहे है, किन्तु उन्हें इसका एहसास नहीं
وَلَوْ تَرٰٓى اِذْ وُقِفُوا عَلَى النَّارِ فَقَالُوا يَا لَيْتَنَا نُرَدُّ وَلَا نُكَذِّبَ بِاٰيَاتِ رَبِّنَا وَنَكُونَ مِنَ الْمُؤْمِن۪ينَ27
और यदि तुम उस समय देख सकते, जब वे आग के निकट खड़े किए जाएँगे और कहेंगे, "काश! क्या ही अच्छा होता कि हम फिर लौटा दिए जाएँ (कि माने) और अपने रब की आयतों को न झुठलाएँ और माननेवालों में हो जाएँ।"