131. पृष्ठ - कुरान पढ़ें

131. पृष्ठ
6 · अल-अनाम
بَلْ بَدَا لَهُمْ مَا كَانُوا يُخْفُونَ مِنْ قَبْلُۜ وَلَوْ رُدُّوا لَعَادُوا لِمَا نُهُوا عَنْهُ وَاِنَّهُمْ لَكَاذِبُونَ28
कुछ नहीं, बल्कि जो कुछ वे पहले छिपाया करते थे, वह उनके सामने आ गया। और यदि वे लौटा भी दिए जाएँ, तो फिर वही कुछ करने लगेंगे जिससे उन्हें रोका गया था। निश्चय ही वे झूठे है
وَقَالُٓوا اِنْ هِيَ اِلَّا حَيَاتُنَا الدُّنْيَا وَمَا نَحْنُ بِمَبْعُوث۪ينَ29
और वे कहते है, "जो कुछ है बस यही हमारा सांसारिक जीवन है; हम कोई फिर उठाए जानेवाले नहीं हैं।"
وَلَوْ تَرٰٓى اِذْ وُقِفُوا عَلٰى رَبِّهِمْۜ قَالَ اَلَيْسَ هٰذَا بِالْحَقِّۜ قَالُوا بَلٰى وَرَبِّنَاۜ قَالَ فَذُوقُوا الْعَذَابَ بِمَا كُنْتُمْ تَكْفُرُونَ۟30
और यदि तुम देख सकते जब वे अपने रब के सामने खड़े किेए जाएँगे! वह कहेगा, "क्या यह यर्थाथ नहीं है?" कहेंगे, "क्यों नही, हमारे रब की क़सम!" वह कहेगा, "अच्छा तो उस इनकार के बदले जो तुम करते रहें हो, यातना का मज़ा चखो।"
قَدْ خَسِرَ الَّذ۪ينَ كَذَّبُوا بِلِقَٓاءِ اللّٰهِۜ حَتّٰٓى اِذَا جَٓاءَتْهُمُ السَّاعَةُ بَغْتَةً قَالُوا يَا حَسْرَتَنَا عَلٰى مَا فَرَّطْنَا ف۪يهَاۙ وَهُمْ يَحْمِلُونَ اَوْزَارَهُمْ عَلٰى ظُهُورِهِمْۜ اَلَا سَٓاءَ مَا يَزِرُونَ31
वे लोग घाटे में पड़े, जिन्होंने अल्लाह से मिलने को झुठलाया, यहाँ तक कि जब अचानक उनपर वह घड़ी आ जाएगी तो वे कहेंगे, "हाय! अफ़सोस, उस कोताही पर जो इसके विषय में हमसे हुई।" और हाल यह होगा कि वे अपने बोझ अपनी पीठों पर उठाए होंगे। देखो, कितना बुरा बोझ है जो ये उठाए हुए है!
وَمَا الْحَيٰوةُ الدُّنْيَٓا اِلَّا لَعِبٌ وَلَهْوٌۜ وَلَلدَّارُ الْاٰخِرَةُ خَيْرٌ لِلَّذ۪ينَ يَتَّقُونَۜ اَفَلَا تَعْقِلُونَ32
सांसारिक जीवन तो एक खेल और तमाशे (ग़फलत) के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है जबकि आख़िरत का घर उन लोगों के लिए अच्छा है, जो डर रखते है। तो क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लेते?
قَدْ نَعْلَمُ اِنَّهُ لَيَحْزُنُكَ الَّذ۪ي يَقُولُونَ فَاِنَّهُمْ لَا يُكَذِّبُونَكَ وَلٰكِنَّ الظَّالِم۪ينَ بِاٰيَاتِ اللّٰهِ يَجْحَدُونَ33
हमें मालूम है, जो कुछ वे कहते है उससे तुम्हें दुख पहुँचता है। तो वे वास्तव में तुम्हें नहीं झुठलाते, बल्कि उन अत्याचारियो को तो अल्लाह की आयतों से इनकार है
وَلَقَدْ كُذِّبَتْ رُسُلٌ مِنْ قَبْلِكَ فَصَبَرُوا عَلٰى مَا كُذِّبُوا وَاُو۫ذُوا حَتّٰٓى اَتٰيهُمْ نَصْرُنَاۚ وَلَا مُبَدِّلَ لِكَلِمَاتِ اللّٰهِۚ وَلَقَدْ جَٓاءَكَ مِنْ نَبَا۬ئِ الْمُرْسَل۪ينَ34
तुमसे पहले भी बहुत-से रसूल झुठलाए जा चुके है, तो वे अपने झुठलाए जाने और कष्ट पहुँचाए जाने पर धैर्य से काम लेते रहे, यहाँ तक कि उन्हें हमारी सहायता पहुँच गई। कोई नहीं जो अल्लाह की बातों को बदल सके। तुम्हारे पास तो रसूलों की कुछ ख़बरें पहुँच ही चुकी है
وَاِنْ كَانَ كَبُرَ عَلَيْكَ اِعْرَاضُهُمْ فَاِنِ اسْتَطَعْتَ اَنْ تَبْتَغِيَ نَفَقًا فِي الْاَرْضِ اَوْ سُلَّمًا فِي السَّمَٓاءِ فَتَاْتِيَهُمْ بِاٰيَةٍۜ وَلَوْ شَٓاءَ اللّٰهُ لَجَمَعَهُمْ عَلَى الْهُدٰى فَلَا تَكُونَنَّ مِنَ الْجَاهِل۪ينَ35
और यदि उनकी विमुखता तुम्हारे लिए असहनीय है, तो यदि तुमसे हो सके कि धरती में कोई सुरंग या आकाश में कोई सीढ़ी ढूँढ़ निकालो और उनके पास कोई निशानी ले आओ, तो (ऐसा कर देखो), यदि अल्लाह चाहता तो उन सबको सीधे मार्ग पर इकट्ठा कर देता। अतः तुम उजड्ड और नादान न बनना