143. पृष्ठ - कुरान पढ़ें

143. पृष्ठ
6 · अल-अनाम
وَمَا لَكُمْ اَلَّا تَاْكُلُوا مِمَّا ذُكِرَ اسْمُ اللّٰهِ عَلَيْهِ وَقَدْ فَصَّلَ لَكُمْ مَا حَرَّمَ عَلَيْكُمْ اِلَّا مَا اضْطُرِرْتُمْ اِلَيْهِۜ وَاِنَّ كَث۪يرًا لَيُضِلُّونَ بِاَهْوَٓائِهِمْ بِغَيْرِ عِلْمٍۜ اِنَّ رَبَّكَ هُوَ اَعْلَمُ بِالْمُعْتَد۪ينَ119
और क्या आपत्ति है कि तुम उसे न खाओ, जिसपर अल्लाह का नाम लिया गया हो, बल्कि जो कुछ चीज़े उसने तुम्हारे लिए हराम कर दी है, उनको उसने विस्तारपूर्वक तुम्हे बता दिया है। यह और बात है कि उसके लिए कभी तुम्हें विवश होना पड़े। परन्तु अधिकतर लोग तो ज्ञान के बिना केवल अपनी इच्छाओं (ग़लत विचारों) के द्वारा पथभ्रष्टो करते रहते है। निस्सन्देह तुम्हारा रब मर्यादाहीन लोगों को भली-भाँति जानता है
وَذَرُوا ظَاهِرَ الْاِثْمِ وَبَاطِنَهُۜ اِنَّ الَّذ۪ينَ يَكْسِبُونَ الْاِثْمَ سَيُجْزَوْنَ بِمَا كَانُوا يَقْتَرِفُونَ120
छोड़ो खुले गुनाह को भी और छिपे को भी। निश्चय ही गुनाह कमानेवालों को उसका बदला दिया जाएगा, जिस कमाई में वे लगे रहे होंगे
وَلَا تَاْكُلُوا مِمَّا لَمْ يُذْكَرِ اسْمُ اللّٰهِ عَلَيْهِ وَاِنَّهُ لَفِسْقٌۜ وَاِنَّ الشَّيَاط۪ينَ لَيُوحُونَ اِلٰٓى اَوْلِيَٓائِهِمْ لِيُجَادِلُوكُمْۚ وَاِنْ اَطَعْتُمُوهُمْ اِنَّكُمْ لَمُشْرِكُونَ۟121
और उसे न खाओं जिसपर अल्लाह का नाम न लिया गया हो। निश्चय ही वह तो आज्ञा का उल्लंघन है। शैतान तो अपने मित्रों के दिलों में डालते है कि वे तुमसे झगड़े। यदि तुमने उनकी बात मान ली तो निश्चय ही तुम बहुदेववादी होगे
اَوَمَنْ كَانَ مَيْتًا فَاَحْيَيْنَاهُ وَجَعَلْنَا لَهُ نُورًا يَمْش۪ي بِه۪ فِي النَّاسِ كَمَنْ مَثَلُهُ فِي الظُّلُمَاتِ لَيْسَ بِخَارِجٍ مِنْهَاۜ كَذٰلِكَ زُيِّنَ لِلْكَافِر۪ينَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ122
क्या वह व्यक्ति जो पहले मुर्दा था, फिर उसे हमने जीवित किया और उसके लिए एक प्रकाश उपलब्ध किया जिसको लिए हुए वह लोगों के बीच चलता-फिरता है, उस व्यक्ति को तरह हो सकता है जो अँधेरों में पड़ा हुआ हो, उससे कदापि निकलनेवाला न हो? ऐसे ही इनकार करनेवालों के कर्म उनके लिए सुहाबने बनाए गए है
وَكَذٰلِكَ جَعَلْنَا ف۪ي كُلِّ قَرْيَةٍ اَكَابِرَ مُجْرِم۪يهَا لِيَمْكُرُوا ف۪يهَاۜ وَمَا يَمْكُرُونَ اِلَّا بِاَنْفُسِهِمْ وَمَا يَشْعُرُونَ123
और इसी प्रकार हमने प्रत्येक बस्ती में उसके बड़े-बड़े अपराधियों को लगा दिया है कि ले वहाँ चालें चले। वे अपने ही विरुद्ध चालें चलते है, किन्तु उन्हें इसका एहसास नहीं
وَاِذَا جَٓاءَتْهُمْ اٰيَةٌ قَالُوا لَنْ نُؤْمِنَ حَتّٰى نُؤْتٰى مِثْلَ مَٓا اُو۫تِيَ رُسُلُ اللّٰهِۜ اَللّٰهُ اَعْلَمُ حَيْثُ يَجْعَلُ رِسَالَتَهُۜ سَيُص۪يبُ الَّذ۪ينَ اَجْرَمُوا صَغَارٌ عِنْدَ اللّٰهِ وَعَذَابٌ شَد۪يدٌ بِمَا كَانُوا يَمْكُرُونَ124
और जब उनके पास कोई आयत (निशानी) आता है, तो वे कहते है, "हम कदापि नहीं मानेंगे, जब तक कि वैसी ही चीज़ हमें न दी जाए जो अल्लाह के रसूलों को दी गई हैं।" अल्लाह भली-भाँति उस (के औचित्य) को जानता है, जिसमें वह अपनी पैग़म्बरी रखता है। अपराधियों को शीघ्र ही अल्लाह के यहाँ बड़े अपमान और कठोर यातना का सामना करना पड़ेगा, उस चाल के कारण जो वे चलते रहे है