144. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
6 · अल-अनाम
فَمَنْ يُرِدِ اللّٰهُ اَنْ يَهْدِيَهُ يَشْرَحْ صَدْرَهُ لِلْاِسْلَامِۚ وَمَنْ يُرِدْ اَنْ يُضِلَّهُ يَجْعَلْ صَدْرَهُ ضَيِّقًا حَرَجًا كَاَنَّمَا يَصَّعَّدُ فِي السَّمَٓاءِۜ كَذٰلِكَ يَجْعَلُ اللّٰهُ الرِّجْسَ عَلَى الَّذ۪ينَ لَا يُؤْمِنُونَ125
अतः (वास्तविकता यह है कि) जिसे अल्लाह सीधे मार्ग पर लाना चाहता है, उसका सीना इस्लाम के लिए खोल देता है। और जिसे गुमराही में पड़ा रहने देता चाहता है, उसके सीने को तंग और भिंचा हुआ कर देता है; मानो वह आकाश में चढ़ रहा है। इस तरह अल्लाह उन लोगों पर गन्दगी डाल देता है, जो ईमान नहीं लाते
وَهٰذَا صِرَاطُ رَبِّكَ مُسْتَق۪يمًاۜ قَدْ فَصَّلْنَا الْاٰيَاتِ لِقَوْمٍ يَذَّكَّرُونَ126
और यह तुम्हारे रब का रास्ता है, बिल्कुल सीधा। हमने निशानियाँ, ध्यान देनेवालों के लिए खोल-खोलकर बयान कर दी है
لَهُمْ دَارُ السَّلَامِ عِنْدَ رَبِّهِمْ وَهُوَ وَلِيُّهُمْ بِمَا كَانُوا يَعْمَلُونَ127
उनके लिए उनके रब के यहाँ सलामती का घर है और वह उनका संरक्षक मित्र है, उन कामों के कारण जो वे करते रहे है
وَيَوْمَ يَحْشُرُهُمْ جَم۪يعًاۚ يَا مَعْشَرَ الْجِنِّ قَدِ اسْتَكْثَرْتُمْ مِنَ الْاِنْسِۚ وَقَالَ اَوْلِيَٓاؤُ۬هُمْ مِنَ الْاِنْسِ رَبَّنَا اسْتَمْتَعَ بَعْضُنَا بِبَعْضٍ وَبَلَغْنَٓا اَجَلَنَا الَّذ۪ٓي اَجَّلْتَ لَنَاۜ قَالَ النَّارُ مَثْوٰيكُمْ خَالِد۪ينَ ف۪يهَٓا اِلَّا مَا شَٓاءَ اللّٰهُۜ اِنَّ رَبَّكَ حَك۪يمٌ عَل۪يمٌ128
और उस दिन को याद करो, जब वह उन सबको घेरकर इकट्ठा करेगा, (कहेगा), "ऐ जिन्नों के गिरोह! तुमने तो मनुष्यों पर ख़ूब हाथ साफ किया।" और मनुष्यों में से जो उनके साथी रहे होंगे, कहेंग, "ऐ हमारे रब! हमने आपस में एक-दूसरे से लाभ उठाया और अपने उस नियत समय को पहुँच गए, जो तूने हमारे लिए ठहराया था।" वह कहेगा, "आग (नरक) तुम्हारा ठिकाना है, उसमें तुम्हें सदैव रहना है।" अल्लाह का चाहा ही क्रियान्वित है। निश्चय ही तुम्हारा रब तत्वदर्शी, सर्वज्ञ है
وَكَذٰلِكَ نُوَلّ۪ي بَعْضَ الظَّالِم۪ينَ بَعْضًا بِمَا كَانُوا يَكْسِبُونَ۟129
इसी प्रकार हम अत्याचारियों को एक-दूसरे के लिए (नरक का) साथी बना देंगे, उस कमाई के कारण जो वे करते रहे थे
يَا مَعْشَرَ الْجِنِّ وَالْاِنْسِ اَلَمْ يَاْتِكُمْ رُسُلٌ مِنْكُمْ يَقُصُّونَ عَلَيْكُمْ اٰيَات۪ي وَيُنْذِرُونَكُمْ لِقَٓاءَ يَوْمِكُمْ هٰذَاۜ قَالُوا شَهِدْنَا عَلٰٓى اَنْفُسِنَا وَغَرَّتْهُمُ الْحَيٰوةُ الدُّنْيَا وَشَهِدُوا عَلٰٓى اَنْفُسِهِمْ اَنَّهُمْ كَانُوا كَافِر۪ينَ130
"ऐ जिन्नों और मनुष्यों के गिरोह! क्या तुम्हारे पास तुम्हीं में से रसूल नहीं आए थे, जो तुम्हें मेरी आयतें सुनाते और इस दिन के पेश आने से तुम्हें डराते थे?" वे कहेंगे, "क्यों नहीं! (रसूल तो आए थे) हम स्वयं अपने विरुद्ध गवाह है।" उन्हें तो सांसारिक जीवन ने धोखे में रखा। मगर अब वे स्वयं अपने विरुद्ध गवाही देने लगे कि वे इनकार करनेवाले थे
ذٰلِكَ اَنْ لَمْ يَكُنْ رَبُّكَ مُهْلِكَ الْقُرٰى بِظُلْمٍ وَاَهْلُهَا غَافِلُونَ131
यह जान लो कि तुम्हारा रब ज़ुल्म करके बस्तियों को विनष्ट करनेवाला न था, जबकि उनके निवासी बेसुध रहे हों