152. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
7 · अल-आराफ़
قَالَ مَا مَنَعَكَ اَلَّا تَسْجُدَ اِذْ اَمَرْتُكَۜ قَالَ اَنَا۬ خَيْرٌ مِنْهُۚ خَلَقْتَن۪ي مِنْ نَارٍ وَخَلَقْتَهُ مِنْ ط۪ينٍ12
कहा, "तुझे किसने सजका करने से रोका, जबकि मैंने तुझे आदेश दिया था?" बोला, "मैं उससे अच्छा हूँ। तूने मुझे अग्नि से बनाया और उसे मिट्टी से बनाया।"
قَالَ فَاهْبِطْ مِنْهَا فَمَا يَكُونُ لَكَ اَنْ تَتَكَبَّرَ ف۪يهَا فَاخْرُجْ اِنَّكَ مِنَ الصَّاغِر۪ينَ13
कहा, "उतर जा यहाँ से! तुझे कोई हक़ नहीं है कि यहाँ घमंड करे, तो अब निकल जा; निश्चय ही तू अपमानित है।"
قَالَ اَنْظِرْن۪ٓي اِلٰى يَوْمِ يُبْعَثُونَ14
बोला, "मुझे एक दिन तक मुहल्लत दे, जबकि लोग उठाए जाएँगे।"
قَالَ اِنَّكَ مِنَ الْمُنْظَر۪ينَ15
कहा, "निस्संदेह तुझे मुहल्लत है।"
قَالَ فَبِمَٓا اَغْوَيْتَن۪ي لَاَقْعُدَنَّ لَهُمْ صِرَاطَكَ الْمُسْتَق۪يمَۙ16
बोला, "अच्छा, इस कारण कि तूने मुझे गुमराही में डाला है, मैं भी तेरे सीधे मार्ग पर उनके लिए घात में अवश्य बैठूँगा
ثُمَّ لَاٰتِيَنَّهُمْ مِنْ بَيْنِ اَيْد۪يهِمْ وَمِنْ خَلْفِهِمْ وَعَنْ اَيْمَانِهِمْ وَعَنْ شَمَٓائِلِهِمْۜ وَلَا تَجِدُ اَكْثَرَهُمْ شَاكِر۪ينَ17
"फिर उनके आगे और उनके पीछे और उनके दाएँ और उनके बाएँ से उनके पास आऊँगा। और तू उनमें अधिकतर को कृतज्ञ न पाएगा।"
قَالَ اخْرُجْ مِنْهَا مَذْؤُ۫مًا مَدْحُورًاۜ لَمَنْ تَبِعَكَ مِنْهُمْ لَاَمْلَـَٔنَّ جَهَنَّمَ مِنْكُمْ اَجْمَع۪ينَ18
कहा, "निकल जा यहाँ से! निन्दित ठुकराया हुआ। उनमें से जिस किसी ने भी तेरा अनुसरण किया, मैं अवश्य तुम सबसे जहन्नम को भर दूँगा।"
وَيَٓا اٰدَمُ اسْكُنْ اَنْتَ وَزَوْجُكَ الْجَنَّةَ فَكُلَا مِنْ حَيْثُ شِئْتُمَا وَلَا تَقْرَبَا هٰذِهِ الشَّجَرَةَ فَتَكُونَا مِنَ الظَّالِم۪ينَ19
और "ऐ आदम! तुम और तुम्हारी पत्नी दोनों जन्नत में रहो-बसो, फिर जहाँ से चाहो खाओ, लेकिन इस वृक्ष के निकट न जाना, अन्यथा अत्याचारियों में से हो जाओगे।"
فَوَسْوَسَ لَهُمَا الشَّيْطَانُ لِيُبْدِيَ لَهُمَا مَا وُ۫رِيَ عَنْهُمَا مِنْ سَوْاٰتِهِمَا وَقَالَ مَا نَهٰيكُمَا رَبُّكُمَا عَنْ هٰذِهِ الشَّجَرَةِ اِلَّٓا اَنْ تَكُونَا مَلَكَيْنِ اَوْ تَكُونَا مِنَ الْخَالِد۪ينَ20
फिर शैतान ने दोनों को बहकाया, ताकि उनकी शर्मगाहों को, जो उन दोनों से छिपी थीं, उन दोनों के सामने खोल दे। और उसने (इबलीस ने) कहा, "तुम्हारे रब ने तुम दोनों को जो इस वृक्ष से रोका है, तो केवल इसलिए कि ऐसा न हो कि तुम कहीं फ़रिश्ते हो जाओ या कही ऐसा न हो कि तुम्हें अमरता प्राप्त हो जाए।"
وَقَاسَمَهُمَٓا اِنّ۪ي لَكُمَا لَمِنَ النَّاصِح۪ينَۙ21
और उसने उन दोनों के आगे क़समें खाई कि "निश्चय ही मैं तुम दोनों का हितैषी हूँ।"
فَدَلّٰيهُمَا بِغُرُورٍۚ فَلَمَّا ذَاقَا الشَّجَرَةَ بَدَتْ لَهُمَا سَوْاٰتُهُمَا وَطَفِقَا يَخْصِفَانِ عَلَيْهِمَا مِنْ وَرَقِ الْجَنَّةِۜ وَنَادٰيهُمَا رَبُّهُمَٓا اَلَمْ اَنْهَكُمَا عَنْ تِلْكُمَا الشَّجَرَةِ وَاَقُلْ لَكُمَٓا اِنَّ الشَّيْطَانَ لَكُمَا عَدُوٌّ مُب۪ينٌ22
इस प्रकार धोखा देकर उसने उन दोनों को झुका लिया। अन्ततः जब उन्होंने उस वृक्ष का स्वाद लिया, तो उनकी शर्मगाहे एक-दूसरे के सामने खुल गए और वे अपने ऊपर बाग़ के पत्ते जोड़-जोड़कर रखने लगे। तब उनके रब ने उन्हें पुकारा, "क्या मैंने तुम दोनों को इस वृक्ष से रोका नहीं था और तुमसे कहा नहीं था कि शैतान तुम्हारा खुला शत्रु है?"