16. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
2 · अल-बक़रा
وَاتَّبَعُوا مَا تَتْلُوا الشَّيَاط۪ينُ عَلٰى مُلْكِ سُلَيْمٰنَۚ وَمَا كَفَرَ سُلَيْمٰنُ وَلٰكِنَّ الشَّيَاط۪ينَ كَفَرُوا يُعَلِّمُونَ النَّاسَ السِّحْرَۗ وَمَٓا اُنْزِلَ عَلَى الْمَلَكَيْنِ بِبَابِلَ هَارُوتَ وَمَارُوتَۜ وَمَا يُعَلِّمَانِ مِنْ اَحَدٍ حَتّٰى يَقُولَٓا اِنَّمَا نَحْنُ فِتْنَةٌ فَلَا تَكْفُرْۜ فَيَتَعَلَّمُونَ مِنْهُمَا مَا يُفَرِّقُونَ بِه۪ بَيْنَ الْمَرْءِ وَزَوْجِه۪ۜ وَمَا هُمْ بِضَٓارّ۪ينَ بِه۪ مِنْ اَحَدٍ اِلَّا بِاِذْنِ اللّٰهِۜ وَيَتَعَلَّمُونَ مَا يَضُرُّهُمْ وَلَا يَنْفَعُهُمْۜ وَلَقَدْ عَلِمُوا لَمَنِ اشْتَرٰيهُ مَا لَهُ فِي الْاٰخِرَةِ مِنْ خَلَاقٍ۠ وَلَبِئْسَ مَا شَرَوْا بِه۪ٓ اَنْفُسَهُمْۜ لَوْ كَانُوا يَعْلَمُونَ102
और जो वे उस चीज़ के पीछे पड़ गए जिसे शैतान सुलैमान की बादशाही पर थोपकर पढ़ते थे - हालाँकि सुलैमान ने कोई कुफ़्र नहीं किया था, बल्कि कुफ़्र तो शैतानों ने किया था; वे लोगों को जादू सिखाते थे - और उस चीज़ में पड़ गए जो बाबिल में दोनों फ़रिश्तों हारूत और मारूत पर उतारी गई थी। और वे किसी को भी सिखाते न थे जब तक कि कह न देते, "हम तो बस एक परीक्षा है; तो तुम कुफ़्र में न पड़ना।" तो लोग उन दोनों से वह कुछ सीखते है, जिसके द्वारा पति और पत्नी में अलगाव पैदा कर दे - यद्यपि वे उससे किसी को भी हानि नहीं पहुँचा सकते थे। हाँ, यह और बात है कि अल्लाह के हुक्म से किसी को हानि पहुँचनेवाली ही हो - और वह कुछ सीखते है जो उन्हें हानि ही पहुँचाए और उन्हें कोई लाभ न पहुँचाए। और उन्हें भली-भाँति मालूम है कि जो उसका ग्राहक बना, उसका आखिरत में कोई हिस्सा नहीं। कितनी बुरी चीज़ के बदले उन्होंने प्राणों का सौदा किया, यदि वे जानते (तो ठीक मार्ग अपनाते)
وَلَوْ اَنَّهُمْ اٰمَنُوا وَاتَّقَوْا لَمَثُوبَةٌ مِنْ عِنْدِ اللّٰهِ خَيْرٌۜ لَوْ كَانُوا يَعْلَمُونَ۟103
और यदि वे ईमान लाते और डर रखते, तो अल्लाह के यहाँ से मिलनेवाला बदला कहीं अच्छा था, यदि वे जानते (तो इसे समझ सकते)
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لَا تَقُولُوا رَاعِنَا وَقُولُوا انْظُرْنَا وَاسْمَعُواۜ وَلِلْكَافِر۪ينَ عَذَابٌ اَل۪يمٌ104
ऐ ईमान लानेवालो! 'राइना' न कहा करो, बल्कि 'उनज़ुरना' कहा और सुना करो। और इनकार करनेवालों के लिए दुखद यातना है
مَا يَوَدُّ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا مِنْ اَهْلِ الْكِتَابِ وَلَا الْمُشْرِك۪ينَ اَنْ يُنَزَّلَ عَلَيْكُمْ مِنْ خَيْرٍ مِنْ رَبِّكُمْۜ وَاللّٰهُ يَخْتَصُّ بِرَحْمَتِه۪ مَنْ يَشَٓاءُۜ وَاللّٰهُ ذُو الْفَضْلِ الْعَظ۪يمِ105
इनकार करनेवाले नहीं चाहते, न किताबवाले और न मुशरिक (बहुदेववादी) कि तुम्हारे रब की ओर से तुमपर कोई भलाई उतरे, हालाँकि अल्लाह जिसे चाहे अपनी दयालुता के लिए ख़ास कर ले; अल्लाह बड़ा अनुग्रह करनेवाला है