162. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
7 · अल-आराफ़
قَالَ الْمَلَاُ الَّذ۪ينَ اسْتَكْبَرُوا مِنْ قَوْمِه۪ لَنُخْرِجَنَّكَ يَا شُعَيْبُ وَالَّذ۪ينَ اٰمَنُوا مَعَكَ مِنْ قَرْيَتِنَٓا اَوْ لَتَعُودُنَّ ف۪ي مِلَّتِنَاۜ قَالَ اَوَلَوْ كُنَّا كَارِه۪ينَ88
उनकी क़ौम के सरदारों ने, जो घमंड में पड़े थे, कहा, "ऐ शुऐब! हम तुझे और तेरे साथ उन लोगों को, जो ईमान लाए है, अपनी बस्ती से निकालकर रहेंगे। या फिर तुम हमारे पन्थ में लौट आओ।" उसने कहा, "क्या (तुम यही चाहोगे) यद्यपि यह हमें अप्रिय हो जब भी?
قَدِ افْتَرَيْنَا عَلَى اللّٰهِ كَذِبًا اِنْ عُدْنَا ف۪ي مِلَّتِكُمْ بَعْدَ اِذْ نَجّٰينَا اللّٰهُ مِنْهَاۜ وَمَا يَكُونُ لَنَٓا اَنْ نَعُودَ ف۪يهَٓا اِلَّٓا اَنْ يَشَٓاءَ اللّٰهُ رَبُّنَاۜ وَسِعَ رَبُّنَا كُلَّ شَيْءٍ عِلْمًاۜ عَلَى اللّٰهِ تَوَكَّلْنَاۜ رَبَّنَا افْتَحْ بَيْنَنَا وَبَيْنَ قَوْمِنَا بِالْحَقِّ وَاَنْتَ خَيْرُ الْفَاتِح۪ينَ89
"हम अल्लाह पर झूठ घड़नेवाले ठहरेंगे, यदि तुम्हारे पन्थ में लौट आएँ, इसके बाद कि अल्लाह ने हमें उससे छुटकारा दे दिया है। यह हमसे तो होने का नहीं कि हम उसमें पलट कर जाएँ, बल्कि हमारे रब अल्लाह की इच्छा ही क्रियान्वित है। ज्ञान की स्पष्ट से हमारा रब हर चीज़ को अपने घेरे में लिए हुए है। हमने अल्लाह ही पर भरोसा किया है। हमारे रब, हमारे और हमारी क़ौम के बीच निश्चित अटल फ़ैसला कर दे। और तू सबसे अच्छा फ़ैसला करनेवाला है।"
وَقَالَ الْمَلَاُ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا مِنْ قَوْمِه۪ لَئِنِ اتَّبَعْتُمْ شُعَيْبًا اِنَّكُمْ اِذًا لَخَاسِرُونَ90
और क़ौम के सरदार, जिन्होंने इनकार किया था, बोले, "यदि तुम शुऐब के अनुयायी बने तो तुम घाटे में पड़ जाओगे।"
فَاَخَذَتْهُمُ الرَّجْفَةُ فَاَصْبَحُوا ف۪ي دَارِهِمْ جَاثِم۪ينَۚۛ91
अन्ततः एक दहला देनेवाली आपदा ने उन्हें आ लिया। फिर वे अपने घर में औंधे पड़े रह गए,
اَلَّذ۪ينَ كَذَّبُوا شُعَيْبًا كَاَنْ لَمْ يَغْنَوْا ف۪يهَاۚۛ اَلَّذ۪ينَ كَذَّبُوا شُعَيْبًا كَانُوا هُمُ الْخَاسِر۪ينَ92
शुऐब को झुठलानेवाले, मानो कभी वहाँ बसे ही न थे। शुऐब को झुठलानेवाले ही घाटे में रहे
فَتَوَلّٰى عَنْهُمْ وَقَالَ يَا قَوْمِ لَقَدْ اَبْلَغْتُكُمْ رِسَالَاتِ رَبّ۪ي وَنَصَحْتُ لَكُمْۚ فَكَيْفَ اٰسٰى عَلٰى قَوْمٍ كَافِر۪ينَ۟93
तब वह उनके यहाँ से यह कहता हुआ फिरा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मैंने अपने रब के सन्देश तुम्हें पहुँचा दिए और मैंने तुम्हारा हित चाहा। अब मैं इनकार करनेवाले लोगो पर कैसे अफ़सोस करूँ!"
وَمَٓا اَرْسَلْنَا ف۪ي قَرْيَةٍ مِنْ نَبِيٍّ اِلَّٓا اَخَذْنَٓا اَهْلَهَا بِالْبَاْسَٓاءِ وَالضَّرَّٓاءِ لَعَلَّهُمْ يَضَّرَّعُونَ94
हमने जिस बस्ती में भी कभी कोई नबी भेजा, तो वहाँ के लोगों को तंगी और मुसीबत में डाला, ताकि वे (हमारे सामने) गिड़गि़ड़ाए
ثُمَّ بَدَّلْنَا مَكَانَ السَّيِّئَةِ الْحَسَنَةَ حَتّٰى عَفَوْا وَقَالُوا قَدْ مَسَّ اٰبَٓاءَنَا الضَّرَّٓاءُ وَالسَّرَّٓاءُ فَاَخَذْنَاهُمْ بَغْتَةً وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ95
फिर हमने बदहाली को ख़ुशहाली में बदल दिया, यहाँ तक कि वे ख़ूब फले-फूले और कहने लगे, "ये दुख और सुख तो हमारे बाप-दादा को भी पहुँचे हैं।" अनततः जब वे बेखबर थे, हमने अचानक उन्हें पकड़ लिया