169. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
7 · अल-आराफ़
وَلَمَّا رَجَعَ مُوسٰٓى اِلٰى قَوْمِه۪ غَضْبَانَ اَسِفًاۙ قَالَ بِئْسَمَا خَلَفْتُمُون۪ي مِنْ بَعْد۪يۚ اَعَجِلْتُمْ اَمْرَ رَبِّكُمْۚ وَاَلْقَى الْاَلْوَاحَ وَاَخَذَ بِرَاْسِ اَخ۪يهِ يَجُرُّهُٓ اِلَيْهِۜ قَالَ ابْنَ اُمَّ اِنَّ الْقَوْمَ اسْتَضْعَفُون۪ي وَكَادُوا يَقْتُلُونَن۪يۘ فَلَا تُشْمِتْ بِيَ الْاَعْدَٓاءَ وَلَا تَجْعَلْن۪ي مَعَ الْقَوْمِ الظَّالِم۪ينَ150
और जब मूसा क्रोध और दुख से भरा हुआ अपनी क़ौम की ओर लौटा तो उसने कहा, "तुम लोगों ने मेरे पीछे मेरी जगह बुरा किया। क्या तुम अपने रब के हुक्म से पहले ही जल्दी कर बैठे?" फिर उसने तख़्तियाँ डाल दी और अपने भाई का सिर पकड़कर उसे अपनी ओर खींचने लगा। वह बोला, "ऐ मेरी माँ के बेटे! लोगों ने मुझे कमज़ोर समझ लिया और निकट था कि मुझे मार डालते। अतः शत्रुओं को मुझपर हुलसने का अवसर न दे और अत्याचारी लोगों में मुझे सम्मिलित न कर।"
قَالَ رَبِّ اغْفِرْ ل۪ي وَلِاَخ۪ي وَاَدْخِلْنَا ف۪ي رَحْمَتِكَۘ وَاَنْتَ اَرْحَمُ الرَّاحِم۪ينَ۟151
उसने कहा, "मेरे रब! मुझे और मेरे भाई को क्षमा कर दे और हमें अपनी दयालुता में दाख़िल कर ले। तू तो सबसे बढ़कर दयावान हैं।"
اِنَّ الَّذ۪ينَ اتَّخَذُوا الْعِجْلَ سَيَنَالُهُمْ غَضَبٌ مِنْ رَبِّهِمْ وَذِلَّةٌ فِي الْحَيٰوةِ الدُّنْيَاۜ وَكَذٰلِكَ نَجْزِي الْمُفْتَر۪ينَ152
जिन लोगों ने बछड़े को अपना उपास्य बनाया, वे अपने रब की ओर से प्रकोप और सांसारिक जीवन में अपमान से ग्रस्त होकर रहेंगे; और झूठ घड़नेवालों को हम ऐसा ही बदला देते है
وَالَّذ۪ينَ عَمِلُوا السَّيِّـَٔاتِ ثُمَّ تَابُوا مِنْ بَعْدِهَا وَاٰمَنُواۘ اِنَّ رَبَّكَ مِنْ بَعْدِهَا لَغَفُورٌ رَح۪يمٌ153
रहे वे लोग जिन्होंने बुरे कर्म किए फिर उसके पश्चात तौबा कर ली और ईमान ले आए, तो इसके बाद तो तुम्हारा रब बड़ा ही क्षमाशील, दयाशील है
وَلَمَّا سَكَتَ عَنْ مُوسَى الْغَضَبُ اَخَذَ الْاَلْوَاحَۚ وَف۪ي نُسْخَتِهَا هُدًى وَرَحْمَةٌ لِلَّذ۪ينَ هُمْ لِرَبِّهِمْ يَرْهَبُونَ154
और जब मूसा का क्रोध शान्त हुआ तो उसने तख़्तियों को उठा लिया। उनके लेख में उन लोगों के लिए मार्गदर्शन और दयालुता थी जो अपने रब से डरते है
وَاخْتَارَ مُوسٰى قَوْمَهُ سَبْع۪ينَ رَجُلًا لِم۪يقَاتِنَاۚ فَلَمَّٓا اَخَذَتْهُمُ الرَّجْفَةُ قَالَ رَبِّ لَوْ شِئْتَ اَهْلَكْتَهُمْ مِنْ قَبْلُ وَاِيَّايَۜ اَتُهْلِكُنَا بِمَا فَعَلَ السُّفَهَٓاءُ مِنَّاۚ اِنْ هِيَ اِلَّا فِتْنَتُكَۜ تُضِلُّ بِهَا مَنْ تَشَٓاءُ وَتَهْد۪ي مَنْ تَشَٓاءُۜ اَنْتَ وَلِيُّنَا فَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَا وَاَنْتَ خَيْرُ الْغَافِر۪ينَ155
मूसा ने अपनी क़ौम के सत्तर आदमियों को हमारे नियत किए हुए समय के लिए चुना। फिर जब उन लोगों को एक भूकम्प ने आ पकड़ा तो उसने कहा, "मेर रब! यदि तू चाहता तो पहले ही इनको और मुझको विनष्ट़ कर देता। जो कुछ हमारे नादानों ने किया है, क्या उसके कारण तू हमें विनष्ट करेगा? यह तो बस तेरी ओर से एक परीक्षा है। इसके द्वारा तू जिसको चाहे पथभ्रष्ट कर दे और जिसे चाहे मार्ग दिखा दे। तू ही हमारा संरक्षक है। अतः तू हमें क्षमा कर दे और हम पर दया कर, और तू ही सबसे बढ़कर क्षमा करनेवाला है