17. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
2 · अल-बक़रा
مَا نَنْسَخْ مِنْ اٰيَةٍ اَوْ نُنْسِهَا نَاْتِ بِخَيْرٍ مِنْهَٓا اَوْ مِثْلِهَاۜ اَلَمْ تَعْلَمْ اَنَّ اللّٰهَ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَد۪يرٌ106
हम जिस आयत (और निशान) को भी मिटा दें या उसे भुला देते है, तो उससे बेहतर लाते है या उस जैसा दूसरा ही। क्या तुम नहीं जानते हो कि अल्लाह को हर चीज़ का सामर्थ्य प्राप्त है?
اَلَمْ تَعْلَمْ اَنَّ اللّٰهَ لَهُ مُلْكُ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ وَمَا لَكُمْ مِنْ دُونِ اللّٰهِ مِنْ وَلِيٍّ وَلَا نَص۪يرٍ107
क्या तुम नहीं जानते कि आकाशों और धरती का राज्य अल्लाह ही का है और अल्लाह से हटकर न तुम्हारा कोई मित्र है और न सहायक?
اَمْ تُر۪يدُونَ اَنْ تَسْـَٔلُوا رَسُولَكُمْ كَمَا سُئِلَ مُوسٰى مِنْ قَبْلُۜ وَمَنْ يَتَبَدَّلِ الْكُفْرَ بِالْا۪يمَانِ فَقَدْ ضَلَّ سَوَٓاءَ السَّب۪يلِ108
(ऐ ईमानवालों! तुम अपने रसूल के आदर का ध्यान रखो) या तुम चाहते हो कि अपने रसूल से उसी प्रकार से प्रश्न और बात करो, जिस प्रकार इससे पहले मूसा से बात की गई है? हालाँकि जिस व्यक्ति न ईमान के बदले इनकार की नीति अपनाई, तो वह सीधे रास्ते से भटक गया
وَدَّ كَث۪يرٌ مِنْ اَهْلِ الْكِتَابِ لَوْ يَرُدُّونَكُمْ مِنْ بَعْدِ ا۪يمَانِكُمْ كُفَّارًاۚ حَسَدًا مِنْ عِنْدِ اَنْفُسِهِمْ مِنْ بَعْدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُمُ الْحَقُّۚ فَاعْفُوا وَاصْفَحُوا حَتّٰى يَاْتِيَ اللّٰهُ بِاَمْرِه۪ۜ اِنَّ اللّٰهَ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَد۪يرٌ109
बहुत-से किताबवाले अपने भीतर की ईर्ष्या से चाहते है कि किसी प्रकार वे तुम्हारे ईमान लाने के बाद फेरकर तुम्हे इनकार कर देनेवाला बना दें, यद्यपि सत्य उनपर प्रकट हो चुका है, तो तुम दरगुज़र (क्षमा) से काम लो और जाने दो यहाँ तक कि अल्लाह अपना फ़ैसला लागू न कर दे। निस्संदेह अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है
وَاَق۪يمُوا الصَّلٰوةَ وَاٰتُوا الزَّكٰوةَۜ وَمَا تُقَدِّمُوا لِاَنْفُسِكُمْ مِنْ خَيْرٍ تَجِدُوهُ عِنْدَ اللّٰهِۜ اِنَّ اللّٰهَ بِمَا تَعْمَلُونَ بَص۪يرٌ110
और नमाज़ कायम करो और ज़कात दो और तुम स्वयं अपने लिए जो भलाई भी पेश करोगे, उसे अल्लाह के यहाँ मौजूद पाओगे। निस्संदेह जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसे देख रहा है
وَقَالُوا لَنْ يَدْخُلَ الْجَنَّةَ اِلَّا مَنْ كَانَ هُودًا اَوْ نَصَارٰىۜ تِلْكَ اَمَانِيُّهُمْۜ قُلْ هَاتُوا بُرْهَانَكُمْ اِنْ كُنْتُمْ صَادِق۪ينَ111
और उनका कहना है, "कोई व्यक्ति जन्नत में प्रवेश नहीं करता सिवाय उससे जो यहूदी है या ईसाई है।" ये उनकी अपनी निराधार कामनाएँ है। कहो, "यदि तुम सच्चे हो तो अपने प्रमाण पेश करो।"
بَلٰى مَنْ اَسْلَمَ وَجْهَهُ لِلّٰهِ وَهُوَ مُحْسِنٌ فَلَهُٓ اَجْرُهُ عِنْدَ رَبِّه۪ۖ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ۟112
क्यों नहीं, जिसने भी अपने-आपको अल्लाह के प्रति समर्पित कर दिया और उसका कर्म भी अच्छे से अच्छा हो तो उसका प्रतिदान उसके रब के पास है और ऐसे लोगो के लिए न तो कोई भय होगा और न वे शोकाकुल होंगे