176. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
7 · अल-आराफ़
اِنَّ وَلِيِّيَ اللّٰهُ الَّذ۪ي نَزَّلَ الْكِتَابَۘ وَهُوَ يَتَوَلَّى الصَّالِح۪ينَ196
निश्चय ही मेरा संरक्षक मित्र अल्लाह है, जिसने यह किताब उतारी और वह अच्छे लोगों का संरक्षण करता है
وَالَّذ۪ينَ تَدْعُونَ مِنْ دُونِه۪ لَا يَسْتَط۪يعُونَ نَصْرَكُمْ وَلَٓا اَنْفُسَهُمْ يَنْصُرُونَ197
रहे वे जिन्हें तुम उसको छोड़कर पुकारते हो, वे तो तुम्हारी, सहायता करने की सामर्थ्य रखते है और न स्वयं अपनी ही सहायता कर सकते है
وَاِنْ تَدْعُوهُمْ اِلَى الْهُدٰى لَا يَسْمَعُواۜ وَتَرٰيهُمْ يَنْظُرُونَ اِلَيْكَ وَهُمْ لَا يُبْصِرُونَ198
और यदि तुम उन्हें सीधे मार्ग की ओर बुलाओ तो वे न सुनेंगे। वे तुम्हें ऐसे दीख पड़ते हैं जैसे वे तुम्हारी ओर ताक रहे हैं, हालाँकि वे कुछ भी नहीं देखते
خُذِ الْعَفْوَ وَاْمُرْ بِالْعُرْفِ وَاَعْرِضْ عَنِ الْجَاهِل۪ينَ199
क्षमा की नीति अपनाओ और भलाई का हुक्म देते रहो और अज्ञानियों से किनारा खींचो
وَاِمَّا يَنْزَغَنَّكَ مِنَ الشَّيْطَانِ نَزْغٌ فَاسْتَعِذْ بِاللّٰهِۜ اِنَّهُ سَم۪يعٌ عَل۪يمٌ200
और यदि शैतान तुम्हें उकसाए तो अल्लाह की शरण माँगो। निश्चय ही, वह सब कुछ सुनता जानता है
اِنَّ الَّذ۪ينَ اتَّقَوْا اِذَا مَسَّهُمْ طَٓائِفٌ مِنَ الشَّيْطَانِ تَذَكَّرُوا فَاِذَا هُمْ مُبْصِرُونَۚ201
जो डर रखते हैं, उन्हें जब शैतान की ओर से कोई ख़याल छू जाता है, तो वे चौंक उठते हैं। फिर वे साफ़ देखने लगते हैं
وَاِخْوَانُهُمْ يَمُدُّونَهُمْ فِي الْغَيِّ ثُمَّ لَا يُقْصِرُونَ202
और उन (शैतानों) के भाई उन्हें गुमराही में खींचे लिए जाते हैं, फिर वे कोई कमी नहीं करते
وَاِذَا لَمْ تَاْتِهِمْ بِاٰيَةٍ قَالُوا لَوْلَا اجْتَبَيْتَهَاۜ قُلْ اِنَّمَٓا اَتَّبِعُ مَا يُوحٰٓى اِلَيَّ مِنْ رَبّ۪يۚ هٰذَا بَصَٓائِرُ مِنْ رَبِّكُمْ وَهُدًى وَرَحْمَةٌ لِقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ203
और जब तुम उनके सामने कोई निशानी नहीं लाते तो वे कहते हैं, "तुम स्वयं कोई निशानी क्यों न छाँट लाए?" कह दो, "मैं तो केवल उसी का अनुसरण करता हूँ जो मेरे रब की ओर से प्रकाशना की जाती है। यह तुम्हारे रब की ओर से अन्तर्दृष्टियों का प्रकाश-पुंज है, और ईमान लानेवालों के लिए मार्गदर्शन और दयालुता है।"
وَاِذَا قُرِئَ الْقُرْاٰنُ فَاسْتَمِعُوا لَهُ وَاَنْصِتُوا لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ204
जब क़ुरआन पढ़ा जाए तो उसे ध्यानपूर्वक सुनो और चुप रहो, ताकि तुमपर दया की जाए
وَاذْكُرْ رَبَّكَ ف۪ي نَفْسِكَ تَضَرُّعًا وَخ۪يفَةً وَدُونَ الْجَهْرِ مِنَ الْقَوْلِ بِالْغُدُوِّ وَالْاٰصَالِ وَلَا تَكُنْ مِنَ الْغَافِل۪ينَ205
अपने रब को अपने मन में प्रातः और संध्या के समयों में विनम्रतापूर्वक, डरते हुए और हल्की आवाज़ के साथ याद किया करो। और उन लोगों में से न हो जाओ जो ग़फ़लत में पड़े हुए है
اِنَّ الَّذ۪ينَ عِنْدَ رَبِّكَ لَا يَسْتَكْبِرُونَ عَنْ عِبَادَتِه۪ وَيُسَبِّحُونَهُ وَلَهُ يَسْجُدُونَ206
निस्संदेह जो तुम्हारे रब के पास है, वे उसकी बन्दगी के मुक़ाबले में अहंकार की नीति नहीं अपनाते; वे तो उसकी तसबीह (महिमागान) करते है और उसी को सजदा करते है