180. पृष्ठ - कुरान पढ़ें

180. पृष्ठ
8 · अल-अनफाल
وَاذْكُرُٓوا اِذْ اَنْتُمْ قَل۪يلٌ مُسْتَضْعَفُونَ فِي الْاَرْضِ تَخَافُونَ اَنْ يَتَخَطَّفَكُمُ النَّاسُ فَاٰوٰيكُمْ وَاَيَّدَكُمْ بِنَصْرِه۪ وَرَزَقَكُمْ مِنَ الطَّيِّبَاتِ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ26
और याद करो जब तुम थोड़े थे, धरती में निर्बल थे, डरे-सहमे रहते कि लोग कहीं तु्म्हें उचक न ले जाएँ, फिर उसने तुम्हें ठिकाना दिया और अपनी सहायता से तुम्हें शक्ति प्रदान की और अच्छी-स्वच्छ चीज़ों की तुम्हें रोजी दी, ताकि तुम कृतज्ञता दिखलाओ
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا لَا تَخُونُوا اللّٰهَ وَالرَّسُولَ وَتَخُونُٓوا اَمَانَاتِكُمْ وَاَنْتُمْ تَعْلَمُونَ27
ऐ ईमान लानेवालो! जानते-बुझते तुम अल्लाह और उसके रसूल के साथ विश्वासघात न करना और न अपनी अमानतों में ख़ियानत करना
وَاعْلَمُٓوا اَنَّمَٓا اَمْوَالُكُمْ وَاَوْلَادُكُمْ فِتْنَةٌۙ وَاَنَّ اللّٰهَ عِنْدَهُٓ اَجْرٌ عَظ۪يمٌ۟28
और जान रखो कि तुम्हारे माल और तुम्हारी संतान परीक्षा-सामग्री हैं और यह कि अल्लाह के पास बड़ा प्रतिदान है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اِنْ تَتَّقُوا اللّٰهَ يَجْعَلْ لَكُمْ فُرْقَانًا وَيُكَفِّرْ عَنْكُمْ سَيِّـَٔاتِكُمْ وَيَغْفِرْ لَكُمْۜ وَاللّٰهُ ذُو الْفَضْلِ الْعَظ۪يمِ29
ऐ ईमान लानेवालो! यदि तुम अल्लाह का डर रखोगे तो वह तुम्हें एक विशिष्टता प्रदान करेगा और तुमसे तुम्हारी बुराइयाँ दूर करेगा और तुम्हे क्षमा करेगा। अल्लाह बड़ा अनुग्राहक है
وَاِذْ يَمْكُرُ بِكَ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا لِيُثْبِتُوكَ اَوْ يَقْتُلُوكَ اَوْ يُخْرِجُوكَۜ وَيَمْكُرُونَ وَيَمْكُرُ اللّٰهُۜ وَاللّٰهُ خَيْرُ الْمَاكِر۪ينَ30
और याद करो जब इनकार करनेवाले तुम्हारे साथ चालें चल रहे थे कि तम्हें क़ैद रखें या तुम्हे क़त्ल कर दें या तुम्हे निकाल बाहर करे। वे अपनी चालें चल रहे थे और अल्लाह भी अपनी चाल चल रहा था। अल्लाह सबसे अच्छी चाल चलता है
وَاِذَا تُتْلٰى عَلَيْهِمْ اٰيَاتُنَا قَالُوا قَدْ سَمِعْنَا لَوْ نَشَٓاءُ لَقُلْنَا مِثْلَ هٰذَٓاۙ اِنْ هٰذَٓا اِلَّٓا اَسَاط۪يرُ الْاَوَّل۪ينَ31
जब उनके सामने हमारी आयतें पढ़ी जाती है, तो वे कहते है, "हम सुन चुके। यदि हम चाहें तो ऐसी बातें हम भी बना लें; ये तो बस पहले के लोगों की कहानियाँ हैं।"
وَاِذْ قَالُوا اللّٰهُمَّ اِنْ كَانَ هٰذَا هُوَ الْحَقَّ مِنْ عِنْدِكَ فَاَمْطِرْ عَلَيْنَا حِجَارَةً مِنَ السَّمَٓاءِ اَوِ ائْتِنَا بِعَذَابٍ اَل۪يمٍ32
और याद करो जब उन्होंने कहा, "ऐ अल्लाह! यदि यही तेरे यहाँ से सत्य हो तो हमपर आकाश से पत्थर बरसा दे, या हम पर कोई दुखद यातना ही ले आ
وَمَا كَانَ اللّٰهُ لِيُعَذِّبَهُمْ وَاَنْتَ ف۪يهِمْۜ وَمَا كَانَ اللّٰهُ مُعَذِّبَهُمْ وَهُمْ يَسْتَغْفِرُونَ33
और अल्लाह ऐसा नहीं कि तुम उनके बीच उपस्थित हो और वह उन्हें यातना देने लग जाए, और न अल्लाह ऐसा है कि वे क्षमा-याचना कर रहे हो और वह उन्हें यातना से ग्रस्त कर दे