184. पृष्ठ - कुरान पढ़ें

184. पृष्ठ
8 · अल-अनफाल
ذٰلِكَ بِاَنَّ اللّٰهَ لَمْ يَكُ مُغَيِّرًا نِعْمَةً اَنْعَمَهَا عَلٰى قَوْمٍ حَتّٰى يُغَيِّرُوا مَا بِاَنْفُسِهِمْۙ وَاَنَّ اللّٰهَ سَم۪يعٌ عَل۪يمٌۙ53
यह इसलिए हुआ कि अल्लाह उस उदार अनुग्रह (नेमत) को, जो उसने किसी क़ौम पर किया हो, बदलनेवाला नहीं हैं, जब तक कि लोग उस चीज़ को न बदल डालें, जिसका सम्बन्ध स्वयं उनसे है। और यह कि अल्लाह सब कुछ सुनता, जानता है
كَدَاْبِ اٰلِ فِرْعَوْنَۙ وَالَّذ۪ينَ مِنْ قَبْلِهِمْۜ كَذَّبُوا بِاٰيَاتِ رَبِّهِمْۚ فَاَهْلَكْنَاهُمْ بِذُنُوبِهِمْ وَاَغْرَقْنَٓا اٰلَ فِرْعَوْنَۚ وَكُلٌّ كَانُوا ظَالِم۪ينَ54
जैसे फ़िरऔनियों और उनसे पहले के लोगों का हाल हुआ। उन्होंने अपने रब की आयतों को झुठलाया तो हमने उन्हें उनके गुनाहों के बदले में विनष्ट कर दिया और फ़िरऔनियों को डूबो दिया। ये सभी अत्याचारी थे
اِنَّ شَرَّ الدَّوَٓابِّ عِنْدَ اللّٰهِ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا فَهُمْ لَا يُؤْمِنُونَۚ55
निश्चय ही, सबसे बुरे प्राणी अल्लाह की स्पष्ट में वे लोग है, जिन्होंने इनकार किया। फिर वे ईमान नहीं लाते
اَلَّذ۪ينَ عَاهَدْتَ مِنْهُمْ ثُمَّ يَنْقُضُونَ عَهْدَهُمْ ف۪ي كُلِّ مَرَّةٍ وَهُمْ لَا يَتَّقُونَ56
जिनसे तुमने वचन लिया वे फिर हर बार अपने वचन को भंग कर देते है और वे डर नहीं रखते
فَاِمَّا تَثْقَفَنَّهُمْ فِي الْحَرْبِ فَشَرِّدْ بِهِمْ مَنْ خَلْفَهُمْ لَعَلَّهُمْ يَذَّكَّرُونَ57
अतः यदि युद्ध में तुम उनपर क़ाबू पाओ, तो उनके साथ इस तरह पेश आओ कि उनके पीछेवाले भी भाग खड़े हों, ताकि वे शिक्षा ग्रहण करें
وَاِمَّا تَخَافَنَّ مِنْ قَوْمٍ خِيَانَةً فَانْبِذْ اِلَيْهِمْ عَلٰى سَوَٓاءٍۜ اِنَّ اللّٰهَ لَا يُحِبُّ الْخَٓائِن۪ينَ۟58
और यदि तुम्हें किसी क़ौम से विश्वासघात की आशंका हो, तो तुम भी उसी प्रकार ऐसे लोगों के साथ हुई संधि को खुल्लम-खुल्ला उनके आगे फेंक दो। निश्चय ही अल्लाह को विश्वासघात करनेवाले प्रिय नहीं
وَلَا يَحْسَبَنَّ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا سَبَقُواۜ اِنَّهُمْ لَا يُعْجِزُونَ59
इनकार करनेवाले यह न समझे कि वे आगे निकल गए। वे क़ाबू से बाहर नहीं जा सकते
وَاَعِدُّوا لَهُمْ مَا اسْتَطَعْتُمْ مِنْ قُوَّةٍ وَمِنْ رِبَاطِ الْخَيْلِ تُرْهِبُونَ بِه۪ عَدُوَّ اللّٰهِ وَعَدُوَّكُمْ وَاٰخَر۪ينَ مِنْ دُونِهِمْۚ لَا تَعْلَمُونَهُمْۚ اَللّٰهُ يَعْلَمُهُمْۜ وَمَا تُنْفِقُوا مِنْ شَيْءٍ ف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِ يُوَفَّ اِلَيْكُمْ وَاَنْتُمْ لَا تُظْلَمُونَ60
और जो भी तुमसे हो सके, उनके लिए बल और बँधे घोड़े तैयार रखो, ताकि इसके द्वारा अल्लाह के शत्रुओं और अपने शत्रुओं और इनके अतिरिक्त उन दूसरे लोगों को भी भयभीत कर दो जिन्हें तुम नहीं जानते। अल्लाह उनको जानता है और अल्लाह के मार्ग में तुम जो कुछ भी ख़र्च करोगे, वह तुम्हें पूरा-पूरा चुका दिया जाएगा और तुम्हारे साथ कदापि अन्याय न होगा
وَاِنْ جَنَحُوا لِلسَّلْمِ فَاجْنَحْ لَهَا وَتَوَكَّلْ عَلَى اللّٰهِۜ اِنَّهُ هُوَ السَّم۪يعُ الْعَل۪يمُ61
और यदि वे संधि और सलामती की ओर झुकें तो तुम भी इसके लिए झुक जाओ और अल्लाह पर भरोसा रखो। निस्संदेह, वह सब कुछ सुनता, जानता है