186. पृष्ठ - कुरान पढ़ें

186. पृष्ठ
8 · अल-अनफाल
يَٓا اَيُّهَا النَّبِيُّ قُلْ لِمَنْ ف۪ٓي اَيْد۪يكُمْ مِنَ الْاَسْرٰٓىۙ اِنْ يَعْلَمِ اللّٰهُ ف۪ي قُلُوبِكُمْ خَيْرًا يُؤْتِكُمْ خَيْرًا مِمَّٓا اُخِذَ مِنْكُمْ وَيَغْفِرْ لَكُمْۜ وَاللّٰهُ غَفُورٌ رَح۪يمٌ70
ऐ नबी! जो क़ैदी तुम्हारे क़ब्जें में है, उनसे कह दो, "यदि अल्लाह ने यह जान लिया कि तुम्हारे दिलों में कुछ भलाई है तो वह तुम्हें उससे कहीं उत्तम प्रदान करेगा, जो तुम से छिन गया है और तुम्हें क्षमा कर देगा। और अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है।"
وَاِنْ يُر۪يدُوا خِيَانَتَكَ فَقَدْ خَانُوا اللّٰهَ مِنْ قَبْلُ فَاَمْكَنَ مِنْهُمْۜ وَاللّٰهُ عَل۪يمٌ حَك۪يمٌ71
किन्तुम यदि वे तुम्हारे साथ विश्वासघात करना चाहेंगे, तो इससे पहले वे अल्लाह के साथ विश्वासघात कर चुके है। तो उसने तुम्हें उनपर अधिकार दे दिया। अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, बड़ा तत्वदर्शी है
اِنَّ الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَهَاجَرُوا وَجَاهَدُوا بِاَمْوَالِهِمْ وَاَنْفُسِهِمْ ف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِ وَالَّذ۪ينَ اٰوَوْا وَنَصَرُٓوا اُو۬لٰٓئِكَ بَعْضُهُمْ اَوْلِيَٓاءُ بَعْضٍۜ وَالَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَلَمْ يُهَاجِرُوا مَا لَكُمْ مِنْ وَلَايَتِهِمْ مِنْ شَيْءٍ حَتّٰى يُهَاجِرُواۚ وَاِنِ اسْتَنْصَرُوكُمْ فِي الدّ۪ينِ فَعَلَيْكُمُ النَّصْرُ اِلَّا عَلٰى قَوْمٍ بَيْنَكُمْ وَبَيْنَهُمْ م۪يثَاقٌۜ وَاللّٰهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَص۪يرٌ72
जो लोग ईमान लाए और उन्होंने हिजरत की और अल्लाह के मार्ग में अपने मालों और अपनी जानों के साथ जिहाद किया और जिन लोगों ने उन्हें शरण दी और सहायता की, वही लोग परस्पर एक-दूसरे के संरक्षक मित्र है। रहे वे लोग जो ईमान लाए, किन्तु उन्होंने हिजरत नहीं की, उनसे तुम्हारा संरक्षण और मित्रता का कोई सम्बन्ध नहीं है, जब तक कि वे हिजरत न करें, किन्तु यदि वे धर्म के मामले में तुमसे सहायता माँगे तो तुमपर अनिवार्य है कि सहायता करो, सिवाय इसके कि सहायता किसी ऐसी क़ौम के मुक़ाबले में हो जिससे तुम्हारी कोई संधि हो। तुम जो कुछ करते हो अल्लाह उसे देखता है
وَالَّذ۪ينَ كَفَرُوا بَعْضُهُمْ اَوْلِيَٓاءُ بَعْضٍۜ اِلَّا تَفْعَلُوهُ تَكُنْ فِتْنَةٌ فِي الْاَرْضِ وَفَسَادٌ كَب۪يرٌۜ73
जो इनकार करनेवाले लोग है, वे आपस में एक-दूसरे के मित्र और सहायक है। यदि तुम ऐसा नहीं करोगे तो धरती में फ़ितना और बड़ा फ़साद फैलेगा
وَالَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَهَاجَرُوا وَجَاهَدُوا ف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِ وَالَّذ۪ينَ اٰوَوْا وَنَصَرُٓوا اُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْمُؤْمِنُونَ حَقًّاۜ لَهُمْ مَغْفِرَةٌ وَرِزْقٌ كَر۪يمٌ74
और जो लोग ईमान लाए और उन्होंने हिजरत की और अल्लाह के मार्ग में जिहाद किया और जिन लोगों ने उन्हें शरण दी और सहायता की वही सच्चे मोमिन हैं। उनके क्षमा और सम्मानित - उत्तम आजीविका है
وَالَّذ۪ينَ اٰمَنُوا مِنْ بَعْدُ وَهَاجَرُوا وَجَاهَدُوا مَعَكُمْ فَاُو۬لٰٓئِكَ مِنْكُمْۜ وَاُو۬لُوا الْاَرْحَامِ بَعْضُهُمْ اَوْلٰى بِبَعْضٍ ف۪ي كِتَابِ اللّٰهِۜ اِنَّ اللّٰهَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَل۪يمٌ75
और जो लोग बाद में ईमान लाए और उन्होंने हिजरत की और तुम्हारे साथ मिलकर जिहाद किया तो ऐसे लोग भी तुम में ही से हैं। किन्तु अल्लाह की किताब मे ख़ून के रिश्तेदार एक-दूसरे के ज़्यादा हक़दार है। निश्चय ही अल्लाह को हर चीज़ का ज्ञान है