19. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
2 · अल-बक़रा
وَلَنْ تَرْضٰى عَنْكَ الْيَهُودُ وَلَا النَّصَارٰى حَتّٰى تَتَّبِعَ مِلَّتَهُمْۜ قُلْ اِنَّ هُدَى اللّٰهِ هُوَ الْهُدٰىۜ وَلَئِنِ اتَّبَعْتَ اَهْوَٓاءَهُمْ بَعْدَ الَّذ۪ي جَٓاءَكَ مِنَ الْعِلْمِۙ مَا لَكَ مِنَ اللّٰهِ مِنْ وَلِيٍّ وَلَا نَص۪يرٍ120
न यहूदी तुमसे कभी राज़ी होनेवाले है और न ईसाई जब तक कि तुम अनके पंथ पर न चलने लग जाओ। कह दो, "अल्लाह का मार्गदर्शन ही वास्तविक मार्गदर्शन है।" और यदि उस ज्ञान के पश्चात जो तुम्हारे पास आ चुका है, तुमने उनकी इच्छाओं का अनुसरण किया, तो अल्लाह से बचानेवाला न तो तुम्हारा कोई मित्र होगा और न सहायक
اَلَّذ۪ينَ اٰتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ يَتْلُونَهُ حَقَّ تِلَاوَتِه۪ۜ اُو۬لٰٓئِكَ يُؤْمِنُونَ بِه۪ۜ وَمَنْ يَكْفُرْ بِه۪ فَاُو۬لٰٓئِكَ هُمُ الْخَاسِرُونَ۟121
जिन लोगों को हमने किताब दी है उनमें वे लोग जो उसे उस तरह पढ़ते है जैसा कि उसके पढ़ने का हक़ है, वही उसपर ईमान ला रहे है, और जो उसका इनकार करेंगे, वही घाटे में रहनेवाले है
يَا بَن۪ٓي اِسْرَٓاء۪يلَ اذْكُرُوا نِعْمَتِيَ الَّت۪ٓي اَنْعَمْتُ عَلَيْكُمْ وَاَنّ۪ي فَضَّلْتُكُمْ عَلَى الْعَالَم۪ينَ122
ऐ इसराईल की सन्तान! मेरी उस कृपा को याद करो जो मैंने तुमपर की थी और यह कि मैंने तुम्हें संसारवालों पर श्रेष्ठता प्रदान की
وَاتَّقُوا يَوْمًا لَا تَجْز۪ي نَفْسٌ عَنْ نَفْسٍ شَيْـًٔا وَلَا يُقْبَلُ مِنْهَا عَدْلٌ وَلَا تَنْفَعُهَا شَفَاعَةٌ وَلَا هُمْ يُنْصَرُونَ123
और उस दिन से डरो, जब कोई न किसी के काम आएगा, न किसी की ओर से अर्थदंड स्वीकार किया जाएगा, और न कोई सिफ़ारिश ही उसे लाभ पहुँचा सकेगी, और न उनको कोई सहायता ही पहुँच सकेगी
وَاِذِ ابْتَلٰٓى اِبْرٰه۪يمَ رَبُّهُ بِكَلِمَاتٍ فَاَتَمَّهُنَّۜ قَالَ اِنّ۪ي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ اِمَامًاۜ قَالَ وَمِنْ ذُرِّيَّت۪يۜ قَالَ لَا يَنَالُ عَهْدِي الظَّالِم۪ينَ124
और याद करो जब इबराहीम की उसके रब से कुछ बातों में परीक्षा ली तो उसने उसको पूरा कर दिखाया। उसने कहा, "मैं तुझे सारे इनसानों का पेशवा बनानेवाला हूँ।" उसने निवेदन किया, " और मेरी सन्तान में भी।" उसने कहा, "ज़ालिम मेरे इस वादे के अन्तर्गत नहीं आ सकते।"
وَاِذْ جَعَلْنَا الْبَيْتَ مَثَابَةً لِلنَّاسِ وَاَمْنًاۜ وَاتَّخِذُوا مِنْ مَقَامِ اِبْرٰه۪يمَ مُصَلًّىۜ وَعَهِدْنَٓا اِلٰٓى اِبْرٰه۪يمَ وَاِسْمٰع۪يلَ اَنْ طَهِّرَا بَيْتِيَ لِلطَّٓائِف۪ينَ وَالْعَاكِف۪ينَ وَالرُّكَّعِ السُّجُودِ125
और याद करो जब हमने इस घर (काबा) को लोगों को लिए केन्द्र और शान्तिस्थल बनाया - और, "इबराहीम के स्थल में से किसी जगह को नमाज़ की जगह बना लो!" - और इबराहीम और इसमाईल को ज़िम्मेदार बनाया। "तुम मेरे इस घर को तवाफ़ करनेवालों और एतिकाफ़ करनेवालों के लिए और रुकू और सजदा करनेवालों के लिए पाक-साफ़ रखो।"
وَاِذْ قَالَ اِبْرٰه۪يمُ رَبِّ اجْعَلْ هٰذَا بَلَدًا اٰمِنًا وَارْزُقْ اَهْلَهُ مِنَ الثَّمَرَاتِ مَنْ اٰمَنَ مِنْهُمْ بِاللّٰهِ وَالْيَوْمِ الْاٰخِرِۜ قَالَ وَمَنْ كَفَرَ فَاُمَتِّعُهُ قَل۪يلًا ثُمَّ اَضْطَرُّهُٓ اِلٰى عَذَابِ النَّارِۜ وَبِئْسَ الْمَص۪يرُ126
और याद करो जब इबराहीम ने कहा, "ऐ मेरे रब! इसे शान्तिमय भू-भाग बना दे और इसके उन निवासियों को फलों की रोज़ी दे जो उनमें से अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान लाएँ।" कहा, "और जो इनकार करेगा थोड़ा फ़ायदा तो उसे भी दूँगा, फिर उसे घसीटकर आग की यातना की ओर पहुँचा दूँगा और वह बहुत-ही बुरा ठिकाना है!"