195. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
9 · अत-तौबा
لَقَدِ ابْتَغَوُا الْفِتْنَةَ مِنْ قَبْلُ وَقَلَّبُوا لَكَ الْاُمُورَ حَتّٰى جَٓاءَ الْحَقُّ وَظَهَرَ اَمْرُ اللّٰهِ وَهُمْ كَارِهُونَ48
उन्होंने तो इससे पहले भी उपद्रव मचाना चाहा था और वे तुम्हारे विरुद्ध घटनाओं और मामलों के उलटने-पलटने में लगे रहे, यहाँ तक कि हक़ आ गया और अल्लाह को आदेश प्रकट होकर रहा, यद्यपि उन्हें अप्रिय ही लगता रहा
وَمِنْهُمْ مَنْ يَقُولُ ائْذَنْ ل۪ي وَلَا تَفْتِنّ۪يۜ اَلَا فِي الْفِتْنَةِ سَقَطُواۜ وَاِنَّ جَهَنَّمَ لَمُح۪يطَةٌ بِالْكَافِر۪ينَ49
उनमें कोई है, जो कहता है, "मुझे इजाज़त दे दीजिए, मुझे फ़ितने में न डालिए।" जान लो कि वे फ़ितने में तो पड़ ही चुके है और निश्चय ही जहन्नम भी इनकार करनेवालों को घेर रही है
اِنْ تُصِبْكَ حَسَنَةٌ تَسُؤْهُمْۚ وَاِنْ تُصِبْكَ مُص۪يبَةٌ يَقُولُوا قَدْ اَخَذْنَٓا اَمْرَنَا مِنْ قَبْلُ وَيَتَوَلَّوْا وَهُمْ فَرِحُونَ50
यदि तुम्हें कोई अच्छी हालत पेश आती है, तो उन्हें बुरा लगता है औऱ यदि तुम पर कोई मुसीबत आ जाती है, तो वे कहते है, "हमने तो अपना काम पहले ही सँभाल लिया था।" और वे ख़ुश होते हुए पलटते है
قُلْ لَنْ يُص۪يبَنَٓا اِلَّا مَا كَتَبَ اللّٰهُ لَنَاۚ هُوَ مَوْلٰينَاۚ وَعَلَى اللّٰهِ فَلْيَتَوَكَّلِ الْمُؤْمِنُونَ51
कह दो, "हमें कुछ भी पेश नहीं आ सकता सिवाय उसके जो अल्लाह ने लिख दिया है। वही हमारा स्वामी है। और ईमानवालों को अल्लाह ही पर भरोसा करना चाहिए।"
قُلْ هَلْ تَرَبَّصُونَ بِنَٓا اِلَّٓا اِحْدَى الْحُسْنَيَيْنِۜ وَنَحْنُ نَتَرَبَّصُ بِكُمْ اَنْ يُص۪يبَكُمُ اللّٰهُ بِعَذَابٍ مِنْ عِنْدِه۪ٓ اَوْ بِاَيْد۪ينَاۘ فَتَرَبَّصُٓوا اِنَّا مَعَكُمْ مُتَرَبِّصُونَ52
कहो, "तुम हमारे लिए दो भलाईयों में से किसी एक भलाई के सिवा किसकी प्रतीक्षा कर सकते है? जबकि हमें तुम्हारे हक़ में इसी की प्रतिक्षा है कि अल्लाह अपनी ओर से तुम्हें कोई यातना देता है या हमारे हाथों दिलाता है। अच्छा तो तुम भी प्रतीक्षा करो, हम भी तुम्हारे साथ प्रतीक्षा कर रहे है।"
قُلْ اَنْفِقُوا طَوْعًا اَوْ كَرْهًا لَنْ يُتَقَبَّلَ مِنْكُمْۜ اِنَّكُمْ كُنْتُمْ قَوْمًا فَاسِق۪ينَ53
कह दो, "तुम चाहे स्वेच्छापूर्वक ख़र्च करो या अनिच्छापूर्वक, तुमसे कुछ भी स्वीकार न किया जाएगा। निस्संदेह तुम अवज्ञाकारी लोग हो।"
وَمَا مَنَعَهُمْ اَنْ تُقْبَلَ مِنْهُمْ نَفَقَاتُهُمْ اِلَّٓا اَنَّهُمْ كَفَرُوا بِاللّٰهِ وَبِرَسُولِه۪ وَلَا يَاْتُونَ الصَّلٰوةَ اِلَّا وَهُمْ كُسَالٰى وَلَا يُنْفِقُونَ اِلَّا وَهُمْ كَارِهُونَ54
उनके ख़र्च के स्वीकृत होने में इसके अतिरिक्त और कोई चीज़ बाधक नहीं कि उन्होंने अल्लाह औऱ उसके रसूल के साथ कुफ़्र किया। नमाज़ को आते है तो बस हारे जी आते है और ख़र्च करते है, तो अनिच्छापूर्वक ही