196. पृष्ठ - कुरान पढ़ें

196. पृष्ठ
9 · अत-तौबा
فَلَا تُعْجِبْكَ اَمْوَالُهُمْ وَلَٓا اَوْلَادُهُمْۜ اِنَّمَا يُر۪يدُ اللّٰهُ لِيُعَذِّبَهُمْ بِهَا فِي الْحَيٰوةِ الدُّنْيَا وَتَزْهَقَ اَنْفُسُهُمْ وَهُمْ كَافِرُونَ55
अतः उनके माल तुम्हें मोहित न करें और न उनकी सन्तान ही। अल्लाह तो बस यह चाहता है कि उनके द्वारा उन्हें सांसारिक जीवन में यातना दे और उनके प्राण इस दशा में निकलें कि वे इनकार करनेवाले ही रहे
وَيَحْلِفُونَ بِاللّٰهِ اِنَّهُمْ لَمِنْكُمْۜ وَمَا هُمْ مِنْكُمْ وَلٰكِنَّهُمْ قَوْمٌ يَفْرَقُونَ56
वे अल्लाह की क़समें खाते है कि वे तुम्हीं में से है, हालाँकि वे तुममें से नहीं है, बल्कि वे ऐसे लोग है जो त्रस्त रहते है
لَوْ يَجِدُونَ مَلْجَـًٔا اَوْ مَغَارَاتٍ اَوْ مُدَّخَلًا لَوَلَّوْا اِلَيْهِ وَهُمْ يَجْمَحُونَ57
यदि वे कोई शरण पा लें या कोई गुफा या घुस बैठने की जगह, तो अवश्य ही वे बगटुट उसकी ओर उल्टे भाग जाएँ
وَمِنْهُمْ مَنْ يَلْمِزُكَ فِي الصَّدَقَاتِۚ فَاِنْ اُعْطُوا مِنْهَا رَضُوا وَاِنْ لَمْ يُعْطَوْا مِنْهَٓا اِذَا هُمْ يَسْخَطُونَ58
और उनमें से कुछ लोग सदक़ो के विषय में तुम पर चोटे करते है। किन्तु यदि उन्हें उसमें से दे दिया जाए तो प्रसन्न हो जाएँ और यदि उन्हें उसमें से न दिया गया तो क्या देखोगे कि वे क्रोधित होने लगते है
وَلَوْ اَنَّهُمْ رَضُوا مَٓا اٰتٰيهُمُ اللّٰهُ وَرَسُولُهُ وَقَالُوا حَسْبُنَا اللّٰهُ سَيُؤْت۪ينَا اللّٰهُ مِنْ فَضْلِه۪ وَرَسُولُهُٓۙ اِنَّٓا اِلَى اللّٰهِ رَاغِبُونَ۟59
यदि अल्लाह और उसके रसूल ने जो कुछ उन्हें दिया था, उसपर वे राज़ी रहते औऱ कहते कि "हमारे लिए अल्लाह काफ़ी है। अल्लाह हमें जल्द ही अपने अनुग्रह से देगा और उसका रसूल भी। हम तो अल्लाह ही की ओऱ उन्मुख है।" (तो यह उनके लिए अच्छा होता)
اِنَّمَا الصَّدَقَاتُ لِلْفُقَرَٓاءِ وَالْمَسَاك۪ينِ وَالْعَامِل۪ينَ عَلَيْهَا وَالْمُؤَلَّفَةِ قُلُوبُهُمْ وَفِي الرِّقَابِ وَالْغَارِم۪ينَ وَف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِ وَابْنِ السَّب۪يلِۜ فَر۪يضَةً مِنَ اللّٰهِۜ وَاللّٰهُ عَل۪يمٌ حَك۪يمٌ60
सदक़े तो बस ग़रीबों, मुहताजों और उन लोगों के लिए है, जो काम पर नियुक्त हों और उनके लिए जिनके दिलों को आकृष्ट करना औऱ परचाना अभीष्ट हो और गर्दनों को छुड़ाने और क़र्ज़दारों और तावान भरनेवालों की सहायता करने में, अल्लाह के मार्ग में, मुसाफ़िरों की सहायता करने में लगाने के लिए है। यह अल्लाह की ओर से ठहराया हुआ हुक्म है। अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, अत्यन्त तत्वदर्शी है
وَمِنْهُمُ الَّذ۪ينَ يُؤْذُونَ النَّبِيَّ وَيَقُولُونَ هُوَ اُذُنٌۜ قُلْ اُذُنُ خَيْرٍ لَكُمْ يُؤْمِنُ بِاللّٰهِ وَيُؤْمِنُ لِلْمُؤْمِن۪ينَ وَرَحْمَةٌ لِلَّذ۪ينَ اٰمَنُوا مِنْكُمْۜ وَالَّذ۪ينَ يُؤْذُونَ رَسُولَ اللّٰهِ لَهُمْ عَذَابٌ اَل۪يمٌ61
और उनमें कुछ लोग ऐसे हैं, जो नबी को दुख देते है और कहते है, "वह तो निरा कान है!" कह दो, "वह सर्वथा कान तुम्हारी भलाई के लिए है। वह अल्लाह पर ईमान रखता है और ईमानवालों पर भी विश्वास करता है। और उन लोगों के लिए सर्वथा दयालुता है जो तुममें से ईमान लाए है। रहे वे लोग जो अल्लाह के रसूल को दुख देते है, उनके लिए दुखद यातना है।"