205. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
9 · अत-तौबा
اَلتَّٓائِبُونَ الْعَابِدُونَ الْحَامِدُونَ السَّٓائِحُونَ الرَّاكِعُونَ السَّاجِدُونَ الْاٰمِرُونَ بِالْمَعْرُوفِ وَالنَّاهُونَ عَنِ الْمُنْكَرِ وَالْحَافِظُونَ لِحُدُودِ اللّٰهِۜ وَبَشِّرِ الْمُؤْمِن۪ينَ112
वे ऐसे हैं, जो तौबा करते हैं, बन्दगी करते है, स्तुति करते हैं, (अल्लाह के मार्ग में) भ्रमण करते हैं, (अल्लाह के आगे) झुकते है, सजदा करते है, भलाई का हुक्म देते है और बुराई से रोकते हैं और अल्लाह की निर्धारित सीमाओं की रक्षा करते हैं -और इन ईमानवालों को शुभ-सूचना दे दो
مَا كَانَ لِلنَّبِيِّ وَالَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اَنْ يَسْتَغْفِرُوا لِلْمُشْرِك۪ينَ وَلَوْ كَانُٓوا اُو۬ل۪ي قُرْبٰى مِنْ بَعْدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُمْ اَنَّهُمْ اَصْحَابُ الْجَح۪يمِ113
नबी और ईमान लानेवालों के लिए उचित नहीं कि वे बहुदेववादियों के लिए क्षमा की प्रार्थना करें, यद्यपि वे उसके नातेदार ही क्यों न हो, जबकि उनपर यह बात खुल चुकी है कि वे भड़कती आगवाले हैं
وَمَا كَانَ اسْتِغْفَارُ اِبْرٰه۪يمَ لِاَب۪يهِ اِلَّا عَنْ مَوْعِدَةٍ وَعَدَهَٓا اِيَّاهُۚ فَلَمَّا تَبَيَّنَ لَهُٓ اَنَّهُ عَدُوٌّ لِلّٰهِ تَبَرَّاَ مِنْهُۜ اِنَّ اِبْرٰه۪يمَ لَاَوَّاهٌ حَل۪يمٌ114
इबराहीम ने अपने बाप के लिए जो क्षमा की प्रार्थना की थी, वह तो केवल एक वादे के कारण की थी, जो वादा वह उससे कर चुका था। फिर जब उसपर यह बात खुल गई कि वह अल्लाह का शत्रु है तो वह उससे विरक्त हो गया। वास्तव में, इबराहीम बड़ा ही कोमल हृदय, अत्यन्त सहनशील था
وَمَا كَانَ اللّٰهُ لِيُضِلَّ قَوْمًا بَعْدَ اِذْ هَدٰيهُمْ حَتّٰى يُبَيِّنَ لَهُمْ مَا يَتَّقُونَۜ اِنَّ اللّٰهَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَل۪يمٌ115
अल्लाह ऐसा नहीं कि लोगों को पथभ्रष्ट ठहराए, जबकि वह उनको राह पर ला चुका हो, जब तक कि उन्हें साफ़-साफ़ वे बातें बता न दे, जिनसे उन्हें बचना है। निस्संदेह अल्लाह हर चीज़ को भली-भाँति जानता है
اِنَّ اللّٰهَ لَهُ مُلْكُ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ يُحْي۪ وَيُم۪يتُۜ وَمَا لَكُمْ مِنْ دُونِ اللّٰهِ مِنْ وَلِيٍّ وَلَا نَص۪يرٍ116
आकाशों और धरती का राज्य अल्लाह ही का है, वही जिलाता है और मारता है। अल्लाह से हटकर न तुम्हारा कोई मित्र है और न सहायक
لَقَدْ تَابَ اللّٰهُ عَلَى النَّبِيِّ وَالْمُهَاجِر۪ينَ وَالْاَنْصَارِ الَّذ۪ينَ اتَّبَعُوهُ ف۪ي سَاعَةِ الْعُسْرَةِ مِنْ بَعْدِ مَا كَادَ يَز۪يغُ قُلُوبُ فَر۪يقٍ مِنْهُمْ ثُمَّ تَابَ عَلَيْهِمْۜ اِنَّهُ بِهِمْ رَؤُ۫فٌ رَح۪يمٌۙ117
अल्लाह नबी पर मेहरबान हो गया और मुहाजिरों और अनसार पर भी, जिन्होंने तंगी की घड़ी में उसका साथ दिया, इसके पश्चात कि उनमें से एक गिरोह के दिल कुटिलता की ओर झुक गए थे। फिर उसने उनपर दया-दृष्टि दर्शाई। निस्संदेह, वह उनके लिए अत्यन्त करुणामय, दयावान है