206. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
9 · अत-तौबा
وَعَلَى الثَّلٰثَةِ الَّذ۪ينَ خُلِّفُواۜ حَتّٰٓى اِذَا ضَاقَتْ عَلَيْهِمُ الْاَرْضُ بِمَا رَحُبَتْ وَضَاقَتْ عَلَيْهِمْ اَنْفُسُهُمْ وَظَنُّٓوا اَنْ لَا مَلْجَاَ مِنَ اللّٰهِ اِلَّٓا اِلَيْهِۜ ثُمَّ تَابَ عَلَيْهِمْ لِيَتُوبُواۜ اِنَّ اللّٰهَ هُوَ التَّوَّابُ الرَّح۪يمُ۟118
और उन तीनों पर भी जो पीछे छोड़ दिए गए थे, यहाँ तक कि जब धरती विशाल होते हुए भी उनपर तंग हो गई और उनके प्राण उनपर दुभर हो गए और उन्होंने समझा कि अल्लाह से बचने के लिए कोई शरण नहीं मिल सकती है तो उसी के यहाँ। फिर उसने उनपर कृपा-दृष्टि की ताकि वे पलट आएँ। निस्संदेह अल्लाह ही तौबा क़बूल करनेवाला, अत्यन्त दयावान है
يَٓا اَيُّهَا الَّذ۪ينَ اٰمَنُوا اتَّقُوا اللّٰهَ وَكُونُوا مَعَ الصَّادِق۪ينَ119
ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह का डर रखों और सच्चे लोगों के साथ हो जाओ
مَا كَانَ لِاَهْلِ الْمَد۪ينَةِ وَمَنْ حَوْلَهُمْ مِنَ الْاَعْرَابِ اَنْ يَتَخَلَّفُوا عَنْ رَسُولِ اللّٰهِ وَلَا يَرْغَبُوا بِاَنْفُسِهِمْ عَنْ نَفْسِه۪ۜ ذٰلِكَ بِاَنَّهُمْ لَا يُص۪يبُهُمْ ظَمَاٌ وَلَا نَصَبٌ وَلَا مَخْمَصَةٌ ف۪ي سَب۪يلِ اللّٰهِ وَلَا يَطَؤُ۫نَ مَوْطِئًا يَغ۪يظُ الْكُفَّارَ وَلَا يَنَالُونَ مِنْ عَدُوٍّ نَيْلًا اِلَّا كُتِبَ لَهُمْ بِه۪ عَمَلٌ صَالِحٌۜ اِنَّ اللّٰهَ لَا يُض۪يعُ اَجْرَ الْمُحْسِن۪ينَۙ120
मदीनावालों और उसके आसपास के बद्दूहओं को ऐसा नहीं चाहिए था कि अल्लाह के रसूल को छोड़कर पीछे रह जाएँ और न यह कि उसकी जान के मुक़ाबले में उन्हें अपनी जान अधिक प्रिय हो, क्योंकि वह अल्लाह के मार्ग में प्यास या थकान या भूख की कोई भी तकलीफ़ उठाएँ या किसी ऐसी जगह क़दम रखें, जिससे काफ़िरों का क्रोध भड़के या जो चरका भी वे शत्रु को लगाएँ, उसपर उनके हक में अनिवार्यतः एक सुकर्म लिख लिया जाता है। निस्संदेह अल्लाह उत्तमकार का कर्मफल अकारथ नहीं जाने देता
وَلَا يُنْفِقُونَ نَفَقَةً صَغ۪يرَةً وَلَا كَب۪يرَةً وَلَا يَقْطَعُونَ وَادِيًا اِلَّا كُتِبَ لَهُمْ لِيَجْزِيَهُمُ اللّٰهُ اَحْسَنَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ121
और वे थो़ड़ा या ज़्यादा जो कुछ भी ख़र्च करें या (अल्लाह के मार्ग में) कोई घाटी पार करें, उनके हक़ में अनिवार्यतः लिख लिया जाता है, ताकि अल्लाह उन्हें उनके अच्छे कर्मों का बदला प्रदान करे
وَمَا كَانَ الْمُؤْمِنُونَ لِيَنْفِرُوا كَٓافَّةًۜ فَلَوْلَا نَفَرَ مِنْ كُلِّ فِرْقَةٍ مِنْهُمْ طَٓائِفَةٌ لِيَتَفَقَّهُوا فِي الدّ۪ينِ وَلِيُنْذِرُوا قَوْمَهُمْ اِذَا رَجَعُٓوا اِلَيْهِمْ لَعَلَّهُمْ يَحْذَرُونَ۟122
यह तो नहीं कि ईमानवाले सब के सब निकल खड़े हों, फिर ऐसा क्यों नहीं हुआ कि उनके हर गिरोह में से कुछ लोग निकलते, ताकि वे धर्म में समझ प्राप्ति करते और ताकि वे अपने लोगों को सचेत करते, जब वे उनकी ओर लौटते, ताकि वे (बुरे कर्मों से) बचते?