22. पृष्ठ - कुरान पढ़ें

22. पृष्ठ
2 · अल-बक़रा
سَيَقُولُ السُّفَهَٓاءُ مِنَ النَّاسِ مَا وَلّٰيهُمْ عَنْ قِبْلَتِهِمُ الَّت۪ي كَانُوا عَلَيْهَاۜ قُلْ لِلّٰهِ الْمَشْرِقُ وَالْمَغْرِبُۜ يَهْد۪ي مَنْ يَشَٓاءُ اِلٰى صِرَاطٍ مُسْتَق۪يمٍ142
मूर्ख लोग अब कहेंगे, "उन्हें उनके उस क़िबले (उपासना-दिशा) से, जिस पर वे थे किस ची़ज़ ने फेर दिया?" कहो, "पूरब और पश्चिम अल्लाह ही के है, वह जिसे चाहता है सीधा मार्ग दिखाता है।"
وَكَذٰلِكَ جَعَلْنَاكُمْ اُمَّةً وَسَطًا لِتَكُونُوا شُهَدَٓاءَ عَلَى النَّاسِ وَيَكُونَ الرَّسُولُ عَلَيْكُمْ شَه۪يدًاۜ وَمَا جَعَلْنَا الْقِبْلَةَ الَّت۪ي كُنْتَ عَلَيْهَٓا اِلَّا لِنَعْلَمَ مَنْ يَتَّبِعُ الرَّسُولَ مِمَّنْ يَنْقَلِبُ عَلٰى عَقِبَيْهِۜ وَاِنْ كَانَتْ لَكَب۪يرَةً اِلَّا عَلَى الَّذ۪ينَ هَدَى اللّٰهُۜ وَمَا كَانَ اللّٰهُ لِيُض۪يعَ ا۪يمَانَكُمْۜ اِنَّ اللّٰهَ بِالنَّاسِ لَرَؤُ۫فٌ رَح۪يمٌ143
और इसी प्रकार हमने तुम्हें बीच का एक उत्तम समुदाय बनाया है, ताकि तुम सारे मनुष्यों पर गवाह हो, और रसूल तुमपर गवाह हो। और जिस (क़िबले) पर तुम रहे हो उसे तो हमने केवल इसलिए क़िबला बनाया था कि जो लोग पीठ-पीछे फिर जानेवाले है, उनसे हम उनको अलग जान लें जो रसूल का अनुसरण करते है। और यह बात बहुत भारी (अप्रिय) है, किन्तु उन लोगों के लिए नहीं जिन्हें अल्लाह ने मार्ग दिखाया है। और अल्लाह ऐसा नहीं कि वह तुम्हारे ईमान को अकारथ कर दे, अल्लाह तो इनसानों के लिए अत्यन्त करूणामय, दयावान है
قَدْ نَرٰى تَقَلُّبَ وَجْهِكَ فِي السَّمَٓاءِۚ فَلَنُوَلِّيَنَّكَ قِبْلَةً تَرْضٰيهَاۖ فَوَلِّ وَجْهَكَ شَطْرَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِۜ وَحَيْثُ مَا كُنْتُمْ فَوَلُّوا وُجُوهَكُمْ شَطْرَهُۜ وَاِنَّ الَّذ۪ينَ اُو۫تُوا الْكِتَابَ لَيَعْلَمُونَ اَنَّهُ الْحَقُّ مِنْ رَبِّهِمْۜ وَمَا اللّٰهُ بِغَافِلٍ عَمَّا يَعْمَلُونَ144
हम आकाश में तुम्हारे मुँह की गर्दिश देख रहे है, तो हम अवश्य ही तुम्हें उसी क़िबले का अधिकारी बना देंगे जिसे तुम पसन्द करते हो। अतः मस्जिदे हराम (काबा) की ओर अपना रूख़ करो। और जहाँ कहीं भी हो अपने मुँह उसी की ओर करो - निश्चय ही जिन लोगों को किताब मिली थी, वे भली-भाँति जानते है कि वही उनके रब की ओर से हक़ है, इसके बावजूद जो कुछ वे कर रहे है अल्लाह उससे बेखबर नहीं है
وَلَئِنْ اَتَيْتَ الَّذ۪ينَ اُو۫تُوا الْكِتَابَ بِكُلِّ اٰيَةٍ مَا تَبِعُوا قِبْلَتَكَۚ وَمَٓا اَنْتَ بِتَابِعٍ قِبْلَتَهُمْۚ وَمَا بَعْضُهُمْ بِتَابِعٍ قِبْلَةَ بَعْضٍۜ وَلَئِنِ اتَّبَعْتَ اَهْوَٓاءَهُمْ مِنْ بَعْدِ مَا جَٓاءَكَ مِنَ الْعِلْمِۙ اِنَّكَ اِذًا لَمِنَ الظَّالِم۪ينَۢ145
यदि तुम उन लोगों के पास, जिन्हें किताब दी गई थी, कोई भी निशानी ले आओ, फिर भी वे तुम्हारे क़िबले का अनुसरण नहीं करेंगे और तुम भी उसके क़िबले का अनुसरण करने वाले नहीं हो। और वे स्वयं परस्पर एक-दूसरे के क़िबले का अनुसरण करनेवाले नहीं हैं। और यदि तुमने उस ज्ञान के पश्चात, जो तुम्हारे पास आ चुका है, उनकी इच्छाओं का अनुसरण किया, तो निश्चय ही तुम्हारी गणना ज़ालिमों में होगी