229. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
11 · हूद
قَالَ يَا قَوْمِ اَرَاَيْتُمْ اِنْ كُنْتُ عَلٰى بَيِّنَةٍ مِنْ رَبّ۪ي وَاٰتٰين۪ي مِنْهُ رَحْمَةً فَمَنْ يَنْصُرُن۪ي مِنَ اللّٰهِ اِنْ عَصَيْتُهُ فَمَا تَز۪يدُونَن۪ي غَيْرَ تَخْس۪يرٍ63
उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगों! क्या तुमने सोचा? यदि मैं अपने रब के एक स्पष्ट प्रमाण पर हूँ और उसने मुझे अपनी ओर से दयालुता प्रदान की है, तो यदि मैं उसकी अवज्ञा करूँ तो अल्लाह के मुक़ाबले में कौन मेरी सहायता करेगा? तुम तो और अधिक घाटे में डाल देने के अतिरिक्त मेरे हक़ में और कोई अभिवृद्धि नहीं करोगे
وَيَا قَوْمِ هٰذِه۪ نَاقَةُ اللّٰهِ لَكُمْ اٰيَةً فَذَرُوهَا تَاْكُلْ ف۪ٓي اَرْضِ اللّٰهِ وَلَا تَمَسُّوهَا بِسُٓوءٍ فَيَاْخُذَكُمْ عَذَابٌ قَر۪يبٌ64
ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यह अल्लाह की ऊँटनी तुम्हारे लिए एक निशानी है। इसे छोड़ दो कि अल्लाह की धरती में खाए और इसे तकलीफ़ देने के लिए हाथ न लगाना अन्यथा समीपस्थ यातना तुम्हें आ लेगी।"
فَعَقَرُوهَا فَقَالَ تَمَتَّعُوا ف۪ي دَارِكُمْ ثَلٰثَةَ اَيَّامٍۜ ذٰلِكَ وَعْدٌ غَيْرُ مَكْذُوبٍ65
किन्तु उन्होंने उसकी कूंचे काट डाली। इसपर उसने कहा, "अपने घरों में तीन दिन और मज़े ले लो। यह ऐसा वादा है, जो झूठा सिद्ध न होगा।"
فَلَمَّا جَٓاءَ اَمْرُنَا نَجَّيْنَا صَالِحًا وَالَّذ۪ينَ اٰمَنُوا مَعَهُ بِرَحْمَةٍ مِنَّا وَمِنْ خِزْيِ يَوْمِئِذٍۜ اِنَّ رَبَّكَ هُوَ الْقَوِيُّ الْعَز۪يزُ66
फिर जब हमारा आदेश आ पहुँचा, तो हमने अपनी दयालुता से सालेह को और उसके साथ के ईमान लानेवालों को बचा लिया, और उस दिन के अपमान से उन्हें सुरक्षित रखा। वास्तव में, तुम्हारा रब बड़ा शक्तिवान, प्रभुत्वशाली है
وَاَخَذَ الَّذ۪ينَ ظَلَمُوا الصَّيْحَةُ فَاَصْبَحُوا ف۪ي دِيَارِهِمْ جَاثِم۪ينَۙ67
और अत्याचार करनेवालों को एक भयंकर चिंघार ने आ लिया और वे अपने घरों में औंधे पड़े रह गए,
كَاَنْ لَمْ يَغْنَوْا ف۪يهَاۜ اَلَٓا اِنَّ ثَمُودَا۬ كَفَرُوا رَبَّهُمْۜ اَلَا بُعْدًا لِثَمُودَ۟68
मानो वे वहाँ कभी बसे ही न थे। "सुनो! समूद ने अपने रब के साथ कुफ़्र किया। सुन लो! फिटकार हो समूद पर!"
وَلَقَدْ جَٓاءَتْ رُسُلُنَٓا اِبْرٰه۪يمَ بِالْبُشْرٰى قَالُوا سَلَامًاۜ قَالَ سَلَامٌۚ فَمَا لَبِثَ اَنْ جَٓاءَ بِعِجْلٍ حَن۪يذٍ69
और हमारे भेजे हुए (फ़रिश्ते) इबराहीम के पास शुभ सूचना लेकर पहुँचे। उन्होंने कहा, "सलाम हो!" उसने भी कहा, "सलाम हो।" फिर उसने कुछ विलम्भ न किया, एक भुना हुआ बछड़ा ले आया
فَلَمَّا رَآٰ اَيْدِيَهُمْ لَا تَصِلُ اِلَيْهِ نَكِرَهُمْ وَاَوْجَسَ مِنْهُمْ خ۪يفَةًۜ قَالُوا لَا تَخَفْ اِنَّٓا اُرْسِلْنَٓا اِلٰى قَوْمِ لُوطٍۜ70
किन्तु जब देखा कि उनके हाथ उसकी ओर नहीं बढ़ रहे है तो उसने उन्हें अजनबी समझा और दिल में उनसे डरा। वे बोले, "डरो नहीं, हम तो लूत की क़ौम की ओर से भेजे गए है।"
وَامْرَاَتُهُ قَٓائِمَةٌ فَضَحِكَتْ فَبَشَّرْنَاهَا بِاِسْحٰقَۙ وَمِنْ وَرَٓاءِ اِسْحٰقَ يَعْقُوبَ71
उसकी स्त्री भी खड़ी थी। वह इसपर हँस पड़ी। फिर हमने उसको इसहाक़ और इसहाक़ के बाद याक़ूब की शुभ सूचना दी