230. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
11 · हूद
قَالَتْ يَا وَيْلَتٰٓى ءَاَلِدُ وَاَنَا۬ عَجُوزٌ وَهٰذَا بَعْل۪ي شَيْخًاۜ اِنَّ هٰذَا لَشَيْءٌ عَج۪يبٌ72
वह बोली, "हाय मेरा हतभाग्य! क्या मैं बच्चे को जन्म दूँगी, जबकि मैं वृद्धा और ये मेरे पति है बूढें? यह तो बड़ी ही अद्भुपत बात है!"
قَالُٓوا اَتَعْجَب۪ينَ مِنْ اَمْرِ اللّٰهِ رَحْمَةُ اللّٰهِ وَبَرَكَاتُهُ عَلَيْكُمْ اَهْلَ الْبَيْتِۜ اِنَّهُ حَم۪يدٌ مَج۪يدٌ73
वे बोले, "क्या अल्लाह के आदेश पर तुम आश्चर्य करती हो? घरवालो! तुम लोगों पर तो अल्लाह की दयालुता और उसकी बरकतें है। वह निश्चय ही प्रशंसनीय, गौरववाला है।"
فَلَمَّا ذَهَبَ عَنْ اِبْرٰه۪يمَ الرَّوْعُ وَجَٓاءَتْهُ الْبُشْرٰى يُجَادِلُنَا ف۪ي قَوْمِ لُوطٍۜ74
फिर जब इबराहीम की घबराहट दूर हो गई और उसे शुभ सूचना भी मिली तो वह लूत की क़ौम के विषय में हम से झगड़ने लगा
اِنَّ اِبْرٰه۪يمَ لَحَل۪يمٌ اَوَّاهٌ مُن۪يبٌ75
निस्संदेह इबराहीम बड़ा ही सहनशील, कोमल हृदय, हमारी ओर रुजू (प्रवृत्त) होनेवाला था
يَٓا اِبْرٰه۪يمُ اَعْرِضْ عَنْ هٰذَاۚ اِنَّهُ قَدْ جَٓاءَ اَمْرُ رَبِّكَۚ وَاِنَّهُمْ اٰت۪يهِمْ عَذَابٌ غَيْرُ مَرْدُودٍ76
"ऐ ईबराहीम! इसे छोड़ दो। तुम्हारे रब का आदेश आ चुका है और निश्चय ही उनपर न टलनेवाली यातना आनेवाली है।"
وَلَمَّا جَٓاءَتْ رُسُلُنَا لُوطًا س۪ٓيءَ بِهِمْ وَضَاقَ بِهِمْ ذَرْعًا وَقَالَ هٰذَا يَوْمٌ عَص۪يبٌ77
और जब हमारे दूत लूत के पास पहुँचे तो वह उनके कारण अप्रसन्न हुआ और उनके मामले में दिल तंग पाया। कहने लगा, "यह तो बड़ा ही कठिन दिन है।"
وَجَٓاءَهُ قَوْمُهُ يُهْرَعُونَ اِلَيْهِ وَمِنْ قَبْلُ كَانُوا يَعْمَلُونَ السَّيِّـَٔاتِۜ قَالَ يَا قَوْمِ هٰٓؤُ۬لَٓاءِ بَنَات۪ي هُنَّ اَطْهَرُ لَكُمْ فَاتَّقُوا اللّٰهَ وَلَا تُخْزُونِ ف۪ي ضَيْف۪يۜ اَلَيْسَ مِنْكُمْ رَجُلٌ رَش۪يدٌ78
उसकी क़ौम के लोग दौड़ते हुए उसके पास आ पहुँचे। वे पहले से ही दुष्कर्म किया करते थे। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! ये मेरी (क़ौम की) बेटियाँ (विधिवत विवाह के लिए) मौजूड है। ये तुम्हारे लिए अधिक पवित्र है। अतः अल्लाह का डर रखो और मेरे अतिथियों के विषय में मुझे अपमानित न करो। क्या तुममें एक भी अच्छी समझ का आदमी नहीं?"
قَالُوا لَقَدْ عَلِمْتَ مَا لَنَا ف۪ي بَنَاتِكَ مِنْ حَقٍّۚ وَاِنَّكَ لَتَعْلَمُ مَا نُر۪يدُ79
उन्होंने कहा, "तुझे तो मालूम है कि तेरी बेटियों से हमें कोई मतलब नहीं। और हम जो चाहते है, उसे तू भली-भाँति जानता है।"
قَالَ لَوْ اَنَّ ل۪ي بِكُمْ قُوَّةً اَوْ اٰو۪ٓي اِلٰى رُكْنٍ شَد۪يدٍ80
उसने कहा, "क्या ही अच्छा होता मुझमें तुमसे मुक़ाबले की शक्ति होती या मैं किसी सुदृढ़ आश्रय की शरण ही ले सकता।"
قَالُوا يَا لُوطُ اِنَّا رُسُلُ رَبِّكَ لَنْ يَصِلُٓوا اِلَيْكَ فَاَسْرِ بِاَهْلِكَ بِقِطْعٍ مِنَ الَّيْلِ وَلَا يَلْتَفِتْ مِنْكُمْ اَحَدٌ اِلَّا امْرَاَتَكَۜ اِنَّهُ مُص۪يبُهَا مَٓا اَصَابَهُمْۜ اِنَّ مَوْعِدَهُمُ الصُّبْحُۜ اَلَيْسَ الصُّبْحُ بِقَر۪يبٍ81
उन्होंने कहा, "ऐ लूत! हम तुम्हारे रब के भेजे हुए है। वे तुम तक कदापि नहीं पहुँच सकते। अतः तुम रात के किसी हिस्सेमें अपने घरवालों को लेकर निकल जाओ और तुममें से कोई पीछे पलटकर न देखे। हाँ, तुम्हारी स्त्री का मामला और है। उनपर भी वही कुछ बीतनेवाला है, जो उनपर बीतेगा। निर्धारित समय उनके लिए प्रातःकाल का है। तो क्या प्रातःकाल निकट नहीं?"