239. पृष्ठ - कुरान पढ़ें

239. पृष्ठ
12 · यूसुफ़
فَلَمَّا سَمِعَتْ بِمَكْرِهِنَّ اَرْسَلَتْ اِلَيْهِنَّ وَاَعْتَدَتْ لَهُنَّ مُتَّكَـًٔا وَاٰتَتْ كُلَّ وَاحِدَةٍ مِنْهُنَّ سِكّ۪ينًا وَقَالَتِ اخْرُجْ عَلَيْهِنَّۚ فَلَمَّا رَاَيْنَهُٓ اَكْبَرْنَهُ وَقَطَّعْنَ اَيْدِيَهُنَّ وَقُلْنَ حَاشَ لِلّٰهِ مَا هٰذَا بَشَرًاۜ اِنْ هٰذَٓا اِلَّا مَلَكٌ كَر۪يمٌ31
उसने जब उनकी मक्करी की बातें सुनी तो उन्हें बुला भेजा और उनमें से हरेक के लिए आसन सुसज्जित किया और उनमें से हरेक को एक छुरी दी। उसने (यूसुफ़ से) कहा, "इनके सामने आ जाओ।" फिर जब स्त्रियों ने देखा तो वे उसकी बड़ाई से दंग रह गई। उन्होंने अपने हाथ घायल कर लिए और कहने लगी, "अल्लाह की पनाह! यह कोई मनुष्य नहीं। यह तो कोई प्रतिष्ठित फ़रिश्ता है।‍"
قَالَتْ فَذٰلِكُنَّ الَّذ۪ي لُمْتُنَّن۪ي ف۪يهِۜ وَلَقَدْ رَاوَدْتُهُ عَنْ نَفْسِه۪ فَاسْتَعْصَمَۜ وَلَئِنْ لَمْ يَفْعَلْ مَٓا اٰمُرُهُ لَيُسْجَنَنَّ وَلَيَكُونًا مِنَ الصَّاغِر۪ينَ32
वह बोली, "यह वही है जिसके विषय में तुम मुझे मलामत कर रही थीं। हाँ, मैंने इसे रिझाना चाहा था, किन्तु यह बचा रहा। और यदि इसने न किया जो मैं इससे कहती तो यह अवश्य क़ैद किया जाएगा और अपमानित होगा।"
قَالَ رَبِّ السِّجْنُ اَحَبُّ اِلَيَّ مِمَّا يَدْعُونَن۪ٓي اِلَيْهِۚ وَاِلَّا تَصْرِفْ عَنّ۪ي كَيْدَهُنَّ اَصْبُ اِلَيْهِنَّ وَاَكُنْ مِنَ الْجَاهِل۪ينَ33
उसने कहा, "ऐ मेरे रब! जिसकी ओर ये सब मुझे बुला रही हैं, उससे अधिक तो मुझे क़ैद ही पसन्द है यदि तूने उनके दाँव-घात को मुझसे न टाला तो मैं उनकी और झुक जाऊँगा और निरे आवेग के वशीभूत हो जाऊँगा।"
فَاسْتَجَابَ لَهُ رَبُّهُ فَصَرَفَ عَنْهُ كَيْدَهُنَّۜ اِنَّهُ هُوَ السَّم۪يعُ الْعَل۪يمُ34
अतः उसने रब ने उसकी सुन ली और उसकी ओर से उन स्त्रियों के दाँव-घात को टाल दिया। निस्संदेह वह सब कुछ सुनता, जानता है
ثُمَّ بَدَا لَهُمْ مِنْ بَعْدِ مَا رَاَوُا الْاٰيَاتِ لَيَسْجُنُنَّهُ حَتّٰى ح۪ينٍ۟35
फिर उन्हें, इसके पश्चात कि वे निशानियाँ देख चुके थे, यह सूझा कि उसे एक अवधि के लिए क़ैद कर दें
وَدَخَلَ مَعَهُ السِّجْنَ فَتَيَانِۜ قَالَ اَحَدُهُمَٓا اِنّ۪ٓي اَرٰين۪ٓي اَعْصِرُ خَمْرًاۚ وَقَالَ الْاٰخَرُ اِنّ۪ٓي اَرٰين۪ٓي اَحْمِلُ فَوْقَ رَاْس۪ي خُبْزًا تَاْكُلُ الطَّيْرُ مِنْهُۜ نَبِّئْنَا بِتَاْو۪يلِه۪ۚ اِنَّا نَرٰيكَ مِنَ الْمُحْسِن۪ينَ36
कारागार में दो नव युवकों ने भी उसके साथ प्रवेश किया। उनमें से एक ने कहा, "मैंने स्वप्न देखा है कि मैं शराब निचोड़ रहा हूँ।" दूसरे ने कहा, "मैंने देखा कि मैं अपने सिर पर रोटियाँ उठाए हुए हूँ, जिनको पक्षी खा रहे है। हमें इसका अर्थ बता दीजिए। हमें तो आप बहुत ही नेक नज़र आते है।"
قَالَ لَا يَاْت۪يكُمَا طَعَامٌ تُرْزَقَانِه۪ٓ اِلَّا نَبَّاْتُكُمَا بِتَاْو۪يلِه۪ قَبْلَ اَنْ يَاْتِيَكُمَاۜ ذٰلِكُمَا مِمَّا عَلَّمَن۪ي رَبّ۪يۜ اِنّ۪ي تَرَكْتُ مِلَّةَ قَوْمٍ لَا يُؤْمِنُونَ بِاللّٰهِ وَهُمْ بِالْاٰخِرَةِ هُمْ كَافِرُونَۙ37
उसने कहा, "जो भोजन तुम्हें मिला करता है वह तुम्हारे पास नहीं आ पाएगा, उसके तुम्हारे पास आने से पहले ही मैं तुम्हें इसका अर्थ बता दूँगा। यह उन बातों में से है, जो मेरे रब ने मुझे सिखाई है। मैं तो उन लोगों का तरीक़ा छोड़कर, जो अल्लाह को नहीं मानते और जो आख़िरत (परलोक) का इनकार करते हैं,