241. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
12 · यूसुफ़
قَالُٓوا اَضْغَاثُ اَحْلَامٍۚ وَمَا نَحْنُ بِتَاْو۪يلِ الْاَحْلَامِ بِعَالِم۪ينَ44
उन्होंने कहा, "ये तो सम्भ्रमित स्वप्न है। हम ऐसे स्वप्न का अर्थ नहीं जानते।"
وَقَالَ الَّذ۪ي نَجَا مِنْهُمَا وَادَّكَرَ بَعْدَ اُمَّةٍ اَنَا۬ اُنَبِّئُكُمْ بِتَاْو۪يلِه۪ فَاَرْسِلُونِ45
इतने में दोनों में सो जो रिहा हो गया था और एक अर्से के बाद उसे याद आया तो वह बोला, "मैं इसका अर्थ तुम्हें बताता हूँ। ज़रा मुझे (यूसुफ़ के पास) भेज दीजिए।"
يُوسُفُ اَيُّهَا الصِّدّ۪يقُ اَفْتِنَا ف۪ي سَبْعِ بَقَرَاتٍ سِمَانٍ يَاْكُلُهُنَّ سَبْعٌ عِجَافٌ وَسَبْعِ سُنْبُلَاتٍ خُضْرٍ وَاُخَرَ يَابِسَاتٍۙ لَعَلّ۪ٓي اَرْجِعُ اِلَى النَّاسِ لَعَلَّهُمْ يَعْلَمُونَ46
"यूसुफ़, ऐ सत्यवान! हमें इसका अर्थ बता कि सात मोटी गायें है, जिन्हें सात दुबली गायें खा रही है और सात हरी बालें है और दूसरी (सात) सूखी, ताकि मैं लोगों के पास लौटकर जाऊँ कि वे जान लें।"
قَالَ تَزْرَعُونَ سَبْعَ سِن۪ينَ دَاَبًاۚ فَمَا حَصَدْتُمْ فَذَرُوهُ ف۪ي سُنْبُلِه۪ٓ اِلَّا قَل۪يلًا مِمَّا تَاْكُلُونَ47
उसने कहा, "सात वर्ष तक तुम व्यवहारतः खेती करते रहोगे। फिर तुम जो फ़सल काटो तो थोड़े हिस्से के सिवा जो तुम्हारे खाने के काम आए शेष को उसकी बाली में रहने देना
ثُمَّ يَاْت۪ي مِنْ بَعْدِ ذٰلِكَ سَبْعٌ شِدَادٌ يَاْكُلْنَ مَا قَدَّمْتُمْ لَهُنَّ اِلَّا قَل۪يلًا مِمَّا تُحْصِنُونَ48
फिर उसके पश्चात सात कठिन वर्ष आएँगे जो वे सब खा जाएँगे जो तुमने उनके लिए पहले से इकट्ठा कर रखा होगा, सिवाय उस थोड़े-से हिस्से के जो तुम सुरक्षित कर लोगे
ثُمَّ يَاْت۪ي مِنْ بَعْدِ ذٰلِكَ عَامٌ ف۪يهِ يُغَاثُ النَّاسُ وَف۪يهِ يَعْصِرُونَ۟49
फिर उसके पश्चात एक वर्ष ऐसा आएगा, जिसमें वर्षा द्वारा लोगों की फ़रियाद सुन ली जाएगी और उसमें वे रस निचोड़ेगे।"
وَقَالَ الْمَلِكُ ائْتُون۪ي بِه۪ۚ فَلَمَّا جَٓاءَهُ الرَّسُولُ قَالَ ارْجِعْ اِلٰى رَبِّكَ فَسْـَٔلْهُ مَا بَالُ النِّسْوَةِ الّٰت۪ي قَطَّعْنَ اَيْدِيَهُنَّۜ اِنَّ رَبّ۪ي بِكَيْدِهِنَّ عَل۪يمٌ50
सम्राट ने कहा, "उसे मेरे पास ले आओ।" किन्तु जब दूत उसके पास पहुँचा तो उसने कहा, "अपने स्वामी के पास वापस जाओ और उससे पूछो कि उन स्त्रियों का क्या मामला है, जिन्होंने अपने हाथ घायल कर लिए थे। निस्संदेह मेरा रब उनकी मक्कारी को भली-भाँति जानता है।"
قَالَ مَا خَطْبُكُنَّ اِذْ رَاوَدْتُنَّ يُوسُفَ عَنْ نَفْسِه۪ۜ قُلْنَ حَاشَ لِلّٰهِ مَا عَلِمْنَا عَلَيْهِ مِنْ سُٓوءٍۜ قَالَتِ امْرَاَتُ الْعَز۪يزِ الْـٰٔنَ حَصْحَصَ الْحَقُّۘ اَنَا۬ رَاوَدْتُهُ عَنْ نَفْسِه۪ وَاِنَّهُ لَمِنَ الصَّادِق۪ينَ51
उसने कहा, "तुम स्त्रियों का क्या हाल था, जब तुमने यूसुफ़ को रिझाने की चेष्टा की थी?" उन्होंने कहा, "पाक है अल्लाह! हम उसमें कोई बुराई नहीं जानते है।" अज़ीज़ की स्त्री बोल उठी, "अब तो सत्य प्रकट हो गया है। मैंने ही उसे रिझाना चाहा था। वह तो बिलकुल सच्चा है।"
ذٰلِكَ لِيَعْلَمَ اَنّ۪ي لَمْ اَخُنْهُ بِالْغَيْبِ وَاَنَّ اللّٰهَ لَا يَهْد۪ي كَيْدَ الْخَٓائِن۪ينَ52
"यह इसलिए कि वह जान ले कि मैंने गुप्त॥ रूप से उसके साथ विश्वासघात नहीं किया और यह कि अल्लाह विश्वासघातियों का चाल को चलने नहीं देता