243. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
12 · यूसुफ़
قَالَ هَلْ اٰمَنُكُمْ عَلَيْهِ اِلَّا كَمَٓا اَمِنْتُكُمْ عَلٰٓى اَخ۪يهِ مِنْ قَبْلُۜ فَاللّٰهُ خَيْرٌ حَافِظًاۖ وَهُوَ اَرْحَمُ الرَّاحِم۪ينَ64
उसने कहा, "क्या मैं उसके मामले में तुमपर वैसा ही भरोसा करूँ जैसा इससे पहले उसके भाई के मामले में तुमपर भरोसा कर चुका हूँ? हाँ, अल्लाह ही सबसे अच्छ रक्षक है और वह सबसे बढ़कर दयावान है।"
وَلَمَّا فَتَحُوا مَتَاعَهُمْ وَجَدُوا بِضَاعَتَهُمْ رُدَّتْ اِلَيْهِمْۜ قَالُوا يَٓا اَبَانَا مَا نَبْغ۪يۜ هٰذِه۪ بِضَاعَتُنَا رُدَّتْ اِلَيْنَاۚ وَنَم۪يرُ اَهْلَنَا وَنَحْفَظُ اَخَانَا وَنَزْدَادُ كَيْلَ بَع۪يرٍۜ ذٰلِكَ كَيْلٌ يَس۪يرٌ65
जब उन्होंने अपना सामान खोला, तो उन्होंने अपने माल अपनी ओर वापस किया हुआ पाया। वे बोले, "ऐ मेरे बाप, हमें और क्या चाहिए! यह हमारा माल भी तो हमें लौटा दिया गया है। अब हम अपने घरवालों के लिए खाद्य-सामग्री लाएँगे और अपने भाई की रक्षा भी करेंगे। और एक ऊँट के बोझभर और अधिक लेंगे। इतना माप (ग़ल्ला) मिल जाना तो बिलकुल आसान है।"
قَالَ لَنْ اُرْسِلَهُ مَعَكُمْ حَتّٰى تُؤْتُونِ مَوْثِقًا مِنَ اللّٰهِ لَتَاْتُنَّن۪ي بِه۪ٓ اِلَّٓا اَنْ يُحَاطَ بِكُمْۚ فَلَمَّٓا اٰتَوْهُ مَوْثِقَهُمْ قَالَ اللّٰهُ عَلٰى مَا نَقُولُ وَك۪يلٌ66
उसने कहा, "मैं उसे तुम्हारे साथ कदापि नहीं भेज सकता। जब तक कि तुम अल्लाह को गवाह बनाकर मुझे पक्का वचन न दो कि तुम उसे मेरे पास अवश्य लाओगे, यह और बात है कि तुम घिर जाओ।" फिर जब उन्होंने उसे अपना वचन दे दिया तो उसने कहा, "हम जो कुछ कर रहे है वह अल्लाह के हवाले है।"
وَقَالَ يَا بَنِيَّ لَا تَدْخُلُوا مِنْ بَابٍ وَاحِدٍ وَادْخُلُوا مِنْ اَبْوَابٍ مُتَفَرِّقَةٍۜ وَمَٓا اُغْن۪ي عَنْكُمْ مِنَ اللّٰهِ مِنْ شَيْءٍۜ اِنِ الْحُكْمُ اِلَّا لِلّٰهِۜ عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُۚ وَعَلَيْهِ فَلْيَتَوَكَّلِ الْمُتَوَكِّلُونَ67
उसने यह भी कहा, "ऐ मेरे बेटो! एक द्वार से प्रवेश न करना, बल्कि विभिन्न द्वारों से प्रवेश करना यद्यपि मैं अल्लाह के मुक़ाबले में तुम्हारे काम नहीं आ सकता आदेश तो बस अल्लाह ही का चलता है। उसी पर मैंने भरोसा किया और भरोसा करनेवालों को उसी पर भरोसा करना चाहिए।"
وَلَمَّا دَخَلُوا مِنْ حَيْثُ اَمَرَهُمْ اَبُوهُمْۜ مَا كَانَ يُغْن۪ي عَنْهُمْ مِنَ اللّٰهِ مِنْ شَيْءٍ اِلَّا حَاجَةً ف۪ي نَفْسِ يَعْقُوبَ قَضٰيهَاۜ وَاِنَّهُ لَذُو عِلْمٍ لِمَا عَلَّمْنَاهُ وَلٰكِنَّ اَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ۟68
और जब उन्होंने प्रवेश किया जिस तरह से उनके बाप ने उन्हें आदेश दिया था - अल्लाह की ओर से होनेवाली किसी चीज़ को वह उनसे हटा नहीं सकता था। बस याक़ूब के जी की एक इच्छा थी, जो उसने पूरी कर ली। और निस्संदेह वह ज्ञानवान था, क्योंकि हमने उसे ज्ञान प्रदान किया था; किन्तु अधिकतर लोग जानते नहीं -
وَلَمَّا دَخَلُوا عَلٰى يُوسُفَ اٰوٰٓى اِلَيْهِ اَخَاهُ قَالَ اِنّ۪ٓي اَنَا۬ اَخُوكَ فَلَا تَبْتَئِسْ بِمَا كَانُوا يَعْمَلُونَ69
और जब उन्होंने यूसुफ़ के यहाँ प्रवेश किया तो उसने अपने भाई को अपने पास जगह दी और कहा, "मैं तेरा भाई हूँ। जो कुछ ये करते रहे हैं, अब तू उसपर दुखी न हो।"