247. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
12 · यूसुफ़
فَلَمَّٓا اَنْ جَٓاءَ الْبَش۪يرُ اَلْقٰيهُ عَلٰى وَجْهِه۪ فَارْتَدَّ بَص۪يرًاۚ قَالَ اَلَمْ اَقُلْ لَكُمْ اِنّ۪ٓي اَعْلَمُ مِنَ اللّٰهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ96
फिर जब शुभ सूचना देनेवाला आया तो उसने उस (कुर्ते) को उसके मुँह पर डाल दिया और तत्क्षण उसकी नेत्र-ज्योति लौट आई। उसने कहा, "क्या मैंने तुमसे कहा नहीं था कि अल्लाह की ओर से जो मैं जानता हूँ, तुम नहीं जानते।"
قَالُوا يَٓا اَبَانَا اسْتَغْفِرْ لَنَا ذُنُوبَنَٓا اِنَّا كُنَّا خَاطِـ۪ٔينَ97
वे बोले, "ऐ मेरे बाप! आप हमारे गुनाहों की क्षमा के लिए प्रार्थना करें। वास्तव में चूक हमसे ही हुई।"
قَالَ سَوْفَ اَسْتَغْفِرُ لَكُمْ رَبّ۪يۜ اِنَّهُ هُوَ الْغَفُورُ الرَّح۪يمُ98
उसने कहा, "मैं अपने रब से तुम्हारे लिए प्रार्थना करूँगा। वह बहुत क्षमाशील, दयावान है।"
فَلَمَّا دَخَلُوا عَلٰى يُوسُفَ اٰوٰٓى اِلَيْهِ اَبَوَيْهِ وَقَالَ ادْخُلُوا مِصْرَ اِنْ شَٓاءَ اللّٰهُ اٰمِن۪ينَۜ99
फिर जब वे यूसुफ़ के पास पहुँचे तो उसने अपने माँ-बाप को ख़ास अपने पास जगह दी औऱ कहा, "तुम सब नगर में प्रवेश करो। अल्लाह ने चाहा तो यह प्रवेश निश्चिन्तता के साथ होगा।"
وَرَفَعَ اَبَوَيْهِ عَلَى الْعَرْشِ وَخَرُّوا لَهُ سُجَّدًاۚ وَقَالَ يَٓا اَبَتِ هٰذَا تَاْو۪يلُ رُءْيَايَ مِنْ قَبْلُۘ قَدْ جَعَلَهَا رَبّ۪ي حَقًّاۜ وَقَدْ اَحْسَنَ ب۪ٓي اِذْ اَخْرَجَن۪ي مِنَ السِّجْنِ وَجَٓاءَ بِكُمْ مِنَ الْبَدْوِ مِنْ بَعْدِ اَنْ نَزَغَ الشَّيْطَانُ بَيْن۪ي وَبَيْنَ اِخْوَت۪يۜ اِنَّ رَبّ۪ي لَط۪يفٌ لِمَا يَشَٓاءُۜ اِنَّهُ هُوَ الْعَل۪يمُ الْحَك۪يمُ100
उसने अपने माँ-बाप को ऊँची जगह सिंहासन पर बिठाया और सब उसके आगे सजदे मे गिर पड़े। इस अवसर पर उसने कहा, "ऐ मेरे बाप! यह मेरे विगत स्वप्न का साकार रूप है। इसे मेरे रब ने सच बना दिया। और उसने मुझपर उपकार किया जब मुझे क़ैदख़ाने से निकाला और आप भाइयों के बीच फ़साद डलवा दिया था। निस्संदेह मेरा रब जो चाहता है उसके लिए सूक्ष्म उपाय करता है। वास्तव में वही सर्वज्ञ, अत्यन्त तत्वदर्शी है
رَبِّ قَدْ اٰتَيْتَن۪ي مِنَ الْمُلْكِ وَعَلَّمْتَن۪ي مِنْ تَاْو۪يلِ الْاَحَاد۪يثِۚ فَاطِرَ السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِ اَنْتَ وَلِيّ۪ فِي الدُّنْيَا وَالْاٰخِرَةِۚ تَوَفَّن۪ي مُسْلِمًا وَاَلْحِقْن۪ي بِالصَّالِح۪ينَ101
मेरे रब! तुने मुझे राज्य प्रदान किया और मुझे घटनाओं और बातों के निष्कर्ष तक पहुँचना सिखाया। आकाश और धरती के पैदा करनेवाले! दुनिया और आख़िरत में तू ही मेरा संरक्षक मित्र है। तू मुझे इस दशा से उठा कि मैं मुस्लिम (आज्ञाकारी) हूँ और मुझे अच्छे लोगों के साथ मिला।"
ذٰلِكَ مِنْ اَنْبَٓاءِ الْغَيْبِ نُوح۪يهِ اِلَيْكَۚ وَمَا كُنْتَ لَدَيْهِمْ اِذْ اَجْمَعُٓوا اَمْرَهُمْ وَهُمْ يَمْكُرُونَ102
ये परोक्ष की ख़बरे हैं जिनकी हम तुम्हारी ओर प्रकाशना कर रहे है। तुम तो उनके पास नहीं थे, जब उन्होंने अपने मामले को पक्का करके षड्यंत्र किया था
وَمَٓا اَكْثَرُ النَّاسِ وَلَوْ حَرَصْتَ بِمُؤْمِن۪ينَ103
किन्तु चाहे तुम कितना ही चाहो, अधिकतर लोग तो मानेंगे नहीं