248. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
12 · यूसुफ़
وَمَا تَسْـَٔلُهُمْ عَلَيْهِ مِنْ اَجْرٍۜ اِنْ هُوَ اِلَّا ذِكْرٌ لِلْعَالَم۪ينَ۟104
तुम उनसे इसका कोई बदला भी नहीं माँगते। यह तो सारे संसार के लिए बस एक अनुस्मरण है
وَكَاَيِّنْ مِنْ اٰيَةٍ فِي السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِ يَمُرُّونَ عَلَيْهَا وَهُمْ عَنْهَا مُعْرِضُونَ105
आकाशों और धरती में कितनी ही निशानियाँ हैं, जिनपर से वे इस तरह गुज़र जाते है कि उनकी ओर वे ध्यान ही नहीं देते
وَمَا يُؤْمِنُ اَكْثَرُهُمْ بِاللّٰهِ اِلَّا وَهُمْ مُشْرِكُونَ106
इनमें अधिकतर लोग अल्लाह को मानते भी है तो इस तरह कि वे साझी भी ठहराते है
اَفَاَمِنُٓوا اَنْ تَاْتِيَهُمْ غَاشِيَةٌ مِنْ عَذَابِ اللّٰهِ اَوْ تَاْتِيَهُمُ السَّاعَةُ بَغْتَةً وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ107
क्या वे इस बात से निश्चिन्त है कि अल्लाह की कोई यातना उन्हें ढँक ले या सहसा वह घड़ी ही उनपर आ जाए, जबकि वे बिलकुल बेख़बर हों?
قُلْ هٰذِه۪ سَب۪يل۪ٓي اَدْعُٓوا اِلَى اللّٰهِ عَلٰى بَص۪يرَةٍ اَنَا۬ وَمَنِ اتَّبَعَن۪يۜ وَسُبْحَانَ اللّٰهِ وَمَٓا اَنَا۬ مِنَ الْمُشْرِك۪ينَ108
कह दो, "यही मेरा मार्ग है। मैं अल्लाह की ओर बुलाता हूँ। मैं स्वयं भी पूर्ण प्रकाश में हूँ और मेरे अनुयायी भी - महिमावान है अल्लाह! ृृ- और मैं कदापि बहुदेववादी नहीं।"
وَمَٓا اَرْسَلْنَا مِنْ قَبْلِكَ اِلَّا رِجَالًا نُوح۪ٓي اِلَيْهِمْ مِنْ اَهْلِ الْقُرٰىۜ اَفَلَمْ يَس۪يرُوا فِي الْاَرْضِ فَيَنْظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الَّذ۪ينَ مِنْ قَبْلِهِمْۜ وَلَدَارُ الْاٰخِرَةِ خَيْرٌ لِلَّذ۪ينَ اتَّقَوْاۜ اَفَلَا تَعْقِلُونَ109
तुमसे पहले भी हमने जिनको रसूल बनाकर भेजा, वे सब बस्तियों के रहनेवाले पुरुष ही थे। हम उनकी ओर प्रकाशना करते रहे - फिर क्या वे धरती में चले-फिरे नहीं कि देखते कि उनका कैसा परिणाम हुआ, जो उनसे पहले गुज़रे है? निश्चय ही आख़िरत का घर ही डर रखनेवालों के लिए सर्वोत्तम है। तो क्या तुम समझते नहीं? -
حَتّٰٓى اِذَا اسْتَيْـَٔسَ الرُّسُلُ وَظَنُّٓوا اَنَّهُمْ قَدْ كُذِبُوا جَٓاءَهُمْ نَصْرُنَاۙ فَنُجِّيَ مَنْ نَشَٓاءُۜ وَلَا يُرَدُّ بَاْسُنَا عَنِ الْقَوْمِ الْمُجْرِم۪ينَ110
यहाँ तक कि जब वे रसूल निराश होने लगे और वे समझने लगे कि उनसे झूठ कहा गया था कि सहसा उन्हें हमारी सहायता पहुँच गई। फिर हमने जिसे चाहा बचा लिया। किन्तु अपराधी लोगों पर से तो हमारी यातना टलती ही नहीं
لَقَدْ كَانَ ف۪ي قَصَصِهِمْ عِبْرَةٌ لِاُو۬لِي الْاَلْبَابِۜ مَا كَانَ حَد۪يثًا يُفْتَرٰى وَلٰكِنْ تَصْد۪يقَ الَّذ۪ي بَيْنَ يَدَيْهِ وَتَفْص۪يلَ كُلِّ شَيْءٍ وَهُدًى وَرَحْمَةً لِقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ111
निश्चय ही उनकी कथाओं में बुद्धि और समझ रखनेवालों के लिए एक शिक्षाप्रद सामग्री है। यह कोई घड़ी हुई बात नहीं है, बल्कि यह अपने से पूर्व की पुष्टि में है, और हर चीज़ का विस्तार और ईमान लानेवाले लोगों के लिए मार्ग-दर्शन और दयालुता है