249. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
13 · अर-रअद
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
الٓمٓرٰ۠ تِلْكَ اٰيَاتُ الْكِتَابِۜ وَالَّذ۪ٓي اُنْزِلَ اِلَيْكَ مِنْ رَبِّكَ الْحَقُّ وَلٰكِنَّ اَكْثَرَ النَّاسِ لَا يُؤْمِنُونَ1
अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰ रा॰। ये किताब की आयतें है औऱ जो कुछ तुम्हारे रब की ओर से तुम्हारी ओर अवतरित हुआ है, वह सत्य है, किन्तु अधिकतर लोग मान नहीं रहे है
اَللّٰهُ الَّذ۪ي رَفَعَ السَّمٰوَاتِ بِغَيْرِ عَمَدٍ تَرَوْنَهَا ثُمَّ اسْتَوٰى عَلَى الْعَرْشِ وَسَخَّرَ الشَّمْسَ وَالْقَمَرَۜ كُلٌّ يَجْر۪ي لِاَجَلٍ مُسَمًّىۜ يُدَبِّرُ الْاَمْرَ يُفَصِّلُ الْاٰيَاتِ لَعَلَّكُمْ بِلِقَٓاءِ رَبِّكُمْ تُوقِنُونَ2
अल्लाह वह है जिसने आकाशों को बिना सहारे के ऊँचा बनाया जैसा कि तुम उन्हें देखते हो। फिर वह सिंहासन पर आसीन हुआ। उसने सूर्य और चन्द्रमा को काम पर लगाया। हरेक एक नियत समय तक के लिए चला जा रहा है। वह सारे काम का विधान कर रहा है; वह निशानियाँ खोल-खोलकर बयान करता है, ताकि तुम्हें अपने रब से मिलने का विश्वास हो
وَهُوَ الَّذ۪ي مَدَّ الْاَرْضَ وَجَعَلَ ف۪يهَا رَوَاسِيَ وَاَنْهَارًاۜ وَمِنْ كُلِّ الثَّمَرَاتِ جَعَلَ ف۪يهَا زَوْجَيْنِ اثْنَيْنِ يُغْشِي الَّيْلَ النَّهَارَۜ اِنَّ ف۪ي ذٰلِكَ لَاٰيَاتٍ لِقَوْمٍ يَتَفَكَّرُونَ3
और वही है जिसने धरती को फैलाया और उसमें जमे हुए पर्वत और नदियाँ बनाई और हरेक पैदावार की दो-दो क़िस्में बनाई। वही रात से दिन को छिपा देता है। निश्चय ही इसमें उन लोगों के लिए निशानियाँ है जो सोच-विचार से काम लेते है
وَفِي الْاَرْضِ قِطَعٌ مُتَجَاوِرَاتٌ وَجَنَّاتٌ مِنْ اَعْنَابٍ وَزَرْعٌ وَنَخ۪يلٌ صِنْوَانٌ وَغَيْرُ صِنْوَانٍ يُسْقٰى بِمَٓاءٍ وَاحِدٍ۠ وَنُفَضِّلُ بَعْضَهَا عَلٰى بَعْضٍ فِي الْاُكُلِۜ اِنَّ ف۪ي ذٰلِكَ لَاٰيَاتٍ لِقَوْمٍ يَعْقِلُونَ4
और धरती में पास-पास भूभाग पाए जाते है जो परस्पर मिले हुए है, और अंगूरों के बाग़ है और खेतियाँ है औऱ खजूर के पेड़ है, इकहरे भी और दोहरे भी। सबको एक ही पानी से सिंचित करता है, फिर भी हम पैदावार और स्वाद में किसी को किसी के मुक़ाबले में बढ़ा देते है। निश्चय ही इसमें उन लोगों के लिए निशानियाँ हैं, जो बुद्धि से काम लेते है
وَاِنْ تَعْجَبْ فَعَجَبٌ قَوْلُهُمْ ءَاِذَا كُنَّا تُرَابًا ءَاِنَّا لَف۪ي خَلْقٍ جَد۪يدٍۜ اُو۬لٰٓئِكَ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا بِرَبِّهِمْۚ وَاُو۬لٰٓئِكَ الْاَغْلَالُ ف۪ٓي اَعْنَاقِهِمْۚ وَاُو۬لٰٓئِكَ اَصْحَابُ النَّارِۚ هُمْ ف۪يهَا خَالِدُونَ5
अब यदि तुम्हें आश्चर्य ही करना है तो आश्चर्य की बात तो उनका यह कहना है कि ,"क्या जब हम मिट्टी हो जाएँगे तो क्या हम नए सिरे से पैदा भी होंगे?" वही हैं जिन्होंने अपने रब के साथ इनकार की नीति अपनाई और वही है, जिनकी गर्दनों मे तौक़ पड़े हुए है और वही आग (में पड़ने) वाले है जिसमें उन्हें सदैव रहना है