253. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
13 · अर-रअद
اَلَّذ۪ينَ اٰمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ طُوبٰى لَهُمْ وَحُسْنُ مَاٰبٍ29
जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए उनके लिए सुख-सौभाग्य है और लौटने का अच्छा ठिकाना है
كَذٰلِكَ اَرْسَلْنَاكَ ف۪ٓي اُمَّةٍ قَدْ خَلَتْ مِنْ قَبْلِهَٓا اُمَمٌ لِتَتْلُوَ۬ا عَلَيْهِمُ الَّذ۪ٓي اَوْحَيْنَٓا اِلَيْكَ وَهُمْ يَكْفُرُونَ بِالرَّحْمٰنِۜ قُلْ هُوَ رَبّ۪ي لَٓا اِلٰهَ اِلَّا هُوَۚ عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ وَاِلَيْهِ مَتَابِ30
अतएव हमने तुम्हें एक ऐसे समुदाय में भेजा है जिससे पहले कितने ही समुदाय गुज़र चुके है, ताकि हमने तुम्हारी ओर जो प्रकाशना की है, उसे उनको सुना दो, यद्यपि वे रहमान के साथ इनकार की नीति अपनाए हुए है। कह दो, "वही मेरा रब है। उसके सिवा कोई पूज्य-प्रभु नहीं। उसी पर मेरा भरोसा है और उसी की ओर मुझे पलटकर जाना है।"
وَلَوْ اَنَّ قُرْاٰنًا سُيِّرَتْ بِهِ الْجِبَالُ اَوْ قُطِّعَتْ بِهِ الْاَرْضُ اَوْ كُلِّمَ بِهِ الْمَوْتٰىۜ بَلْ لِلّٰهِ الْاَمْرُ جَم۪يعًاۜ اَفَلَمْ يَا۬يْـَٔسِ الَّذ۪ينَ اٰمَنُٓوا اَنْ لَوْ يَشَٓاءُ اللّٰهُ لَهَدَى النَّاسَ جَم۪يعًاۜ وَلَا يَزَالُ الَّذ۪ينَ كَفَرُوا تُص۪يبُهُمْ بِمَا صَنَعُوا قَارِعَةٌ اَوْ تَحُلُّ قَر۪يبًا مِنْ دَارِهِمْ حَتّٰى يَاْتِيَ وَعْدُ اللّٰهِۜ اِنَّ اللّٰهَ لَا يُخْلِفُ الْم۪يعَادَ۟31
और यदि कोई ऐसा क़ुरआन होता जिसके द्वारा पहाड़ चलने लगते या उससे धरती खंड-खंड हो जाती या उसके द्वारा मुर्दे बोलने लगते (तब भी वे लोग ईमान न लाते) । नहीं, बल्कि बात यह है कि सारे काम अल्लाह ही के अधिकार में है। फिर क्या जो लोग ईमान लाए है वे यह जानकर निराश नहीं हुए कि यदि अल्लाह चाहता तो सारे ही मनुष्यों को सीधे मार्ग पर लगा देता? और इनकार करनेवालों पर तो उनकी करतूतों के बदले में कोई न कोई आपदा निरंतर आती ही रहेगी, या उनके घर के निकट ही कहीं उतरती रहेगी, यहाँ तक कि अल्लाह का वादा आ पूरा होगा। निस्संदेह अल्लाह अपने वादे के विरुद्ध नहीं जाता।"
وَلَقَدِ اسْتُهْزِئَ بِرُسُلٍ مِنْ قَبْلِكَ فَاَمْلَيْتُ لِلَّذ۪ينَ كَفَرُوا ثُمَّ اَخَذْتُهُمْ۠ فَكَيْفَ كَانَ عِقَابِ32
तुमसे पहले भी कितने ही रसूलों का उपहास किया जा चुका है, किन्तु मैंने इनकार करनेवालों को मुहलत दी। फिर अंततः मैंने उन्हें पकड़ लिया, फिर कैसी रही मेरी सज़ा?
اَفَمَنْ هُوَ قَٓائِمٌ عَلٰى كُلِّ نَفْسٍ بِمَا كَسَبَتْۚ وَجَعَلُوا لِلّٰهِ شُرَكَٓاءَۜ قُلْ سَمُّوهُمْۜ اَمْ تُنَبِّؤُ۫نَهُ بِمَا لَا يَعْلَمُ فِي الْاَرْضِ اَمْ بِظَاهِرٍ مِنَ الْقَوْلِۜ بَلْ زُيِّنَ لِلَّذ۪ينَ كَفَرُوا مَكْرُهُمْ وَصُدُّوا عَنِ السَّب۪يلِۜ وَمَنْ يُضْلِلِ اللّٰهُ فَمَا لَهُ مِنْ هَادٍ33
भला वह (अल्लाह) जो प्रत्येक व्यक्ति के सिर पर, उसकी कमाई पर निगाह रखते हुए खड़ा है (उसके समान कोई दूसरा हो सकता है)? फिर भी लोगों ने अल्लाह के सहभागी-ठहरा रखे है। कहो, "तनिक उनके नाम तो लो! (क्या तुम्हारे पास उनके पक्ष में कोई प्रमाण है?) या ऐसा है कि तुम उसे ऐसी बात की ख़बर दे रहे हो, जिसके अस्तित्व की उसे धरती भर में ख़बर नहीं? या यूँ ही यह एक ऊपरी बात ही बात है?" नहीं, बल्कि इनकार करनेवालों को उनकी मक्कारी ही सुहावनी लगती है और वे मार्ग से रुक गए है। जिसे अल्लाह ही गुमराही में छोड़ दे, उसे कोई मार्ग पर लानेवाला नहीं
لَهُمْ عَذَابٌ فِي الْحَيٰوةِ الدُّنْيَا وَلَعَذَابُ الْاٰخِرَةِ اَشَقُّۚ وَمَا لَهُمْ مِنَ اللّٰهِ مِنْ وَاقٍ34
उनके लिए सांसारिक जीवन में भी यातना, तो वह अत्यन्त कठोर है। औऱ कोई भी तो नहीं जो उन्हें अल्लाह से बचानेवाला हो