260. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
14 · इब्राहीम
وَاٰتٰيكُمْ مِنْ كُلِّ مَا سَاَلْتُمُوهُۜ وَاِنْ تَعُدُّوا نِعْمَتَ اللّٰهِ لَا تُحْصُوهَاۜ اِنَّ الْاِنْسَانَ لَظَلُومٌ كَفَّارٌ۟34
और हर उस चीज़ में से तुम्हें दिया जो तुमने उससे माँगा यदि तुम अल्लाह की नेमतों की गणना नहीं कर सकते। वास्तव में मनुष्य ही बड़ा ही अन्यायी, कृतघ्न है
وَاِذْ قَالَ اِبْرٰه۪يمُ رَبِّ اجْعَلْ هٰذَا الْبَلَدَ اٰمِنًا وَاجْنُبْن۪ي وَبَنِيَّ اَنْ نَعْبُدَ الْاَصْنَامَۜ35
याद करो जब इबराहीम ने कहा था, "मेरे रब! इस भूभाग (मक्का) को शान्तिमय बना दे और मुझे और मेरी सन्तान को इससे बचा कि हम मूर्तियों को पूजने लग जाए
رَبِّ اِنَّهُنَّ اَضْلَلْنَ كَث۪يرًا مِنَ النَّاسِۚ فَمَنْ تَبِعَن۪ي فَاِنَّهُ مِنّ۪يۚ وَمَنْ عَصَان۪ي فَاِنَّكَ غَفُورٌ رَح۪يمٌ36
मेरे रब! इन्होंने (इन मूर्तियों नॆ) बहुत से लोगों को पथभ्रष्ट किया है। अतः जिस किसी ने मॆरा अनुसरण किया वह मेरा है और जिस ने मेरी अवज्ञा की तो निश्चय ही तू बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
رَبَّنَٓا اِنّ۪ٓي اَسْكَنْتُ مِنْ ذُرِّيَّت۪ي بِوَادٍ غَيْرِ ذ۪ي زَرْعٍ عِنْدَ بَيْتِكَ الْمُحَرَّمِۙ رَبَّنَا لِيُق۪يمُوا الصَّلٰوةَ فَاجْعَلْ اَفْـِٔدَةً مِنَ النَّاسِ تَهْو۪ٓي اِلَيْهِمْ وَارْزُقْهُمْ مِنَ الثَّمَرَاتِ لَعَلَّهُمْ يَشْكُرُونَ37
मेरे रब! मैंने एक ऐसी घाटी में जहाँ कृषि-योग्य भूमि नहीं अपनी सन्तान के एक हिस्से को तेरे प्रतिष्ठित घर (काबा) के निकट बसा दिया है। हमारे रब! ताकि वे नमाज़ क़ायम करें। अतः तू लोगों के दिलों को उनकी ओर झुका दे और उन्हें फलों और पैदावार की आजीविका प्रदान कर, ताकि वे कृतज्ञ बने
رَبَّنَٓا اِنَّكَ تَعْلَمُ مَا نُخْف۪ي وَمَا نُعْلِنُۜ وَمَا يَخْفٰى عَلَى اللّٰهِ مِنْ شَيْءٍ فِي الْاَرْضِ وَلَا فِي السَّمَٓاءِ38
हमारे रब! तू जानता ही है जो कुछ हम छिपाते है और जो कुछ प्रकट करते है। अल्लाह से तो कोई चीज़ न धरती में छिपी है और न आकाश में
اَلْحَمْدُ لِلّٰهِ الَّذ۪ي وَهَبَ ل۪ي عَلَى الْكِبَرِ اِسْمٰع۪يلَ وَاِسْحٰقَۜ اِنَّ رَبّ۪ي لَسَم۪يعُ الدُّعَٓاءِ39
सारी प्रशंसा है उस अल्लाह की जिसने बुढ़ापे के होते हुए भी मुझे इसमाईल और इसहाक़ दिए। निस्संदेह मेरा रब प्रार्थना अवश्य सुनता है
رَبِّ اجْعَلْن۪ي مُق۪يمَ الصَّلٰوةِ وَمِنْ ذُرِّيَّت۪يۗ رَبَّنَا وَتَقَبَّلْ دُعَٓاءِ40
मेरे रब! मुझे और मेरी सन्तान को नमाज़ क़ायम करनेवाला बना। हमारे रब! और हमारी प्रार्थना स्वीकार कर
رَبَّنَا اغْفِرْ ل۪ي وَلِوَالِدَيَّ وَلِلْمُؤْمِن۪ينَ يَوْمَ يَقُومُ الْحِسَابُ۟41
हमारे रब! मुझे और मेरे माँ-बाप को और मोमिनों को उस दिन क्षमाकर देना, जिस दिन हिसाब का मामला पेश आएगा।"
وَلَا تَحْسَبَنَّ اللّٰهَ غَافِلًا عَمَّا يَعْمَلُ الظَّالِمُونَۜ اِنَّمَا يُؤَخِّرُهُمْ لِيَوْمٍ تَشْخَصُ ف۪يهِ الْاَبْصَارُۙ42
अब ये अत्याचारी जो कुछ कर रहे है, उससे अल्लाह को असावधान न समझो। वह तो इन्हें बस उस दिन तक के लिए टाल रहा है जबकि आँखे फटी की फटी रह जाएँगी,