270. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
16 · अन-नहल
ثُمَّ يَوْمَ الْقِيٰمَةِ يُخْز۪يهِمْ وَيَقُولُ اَيْنَ شُرَكَٓاءِيَ الَّذ۪ينَ كُنْتُمْ تُشَٓاقُّونَ ف۪يهِمْۜ قَالَ الَّذ۪ينَ اُو۫تُوا الْعِلْمَ اِنَّ الْخِزْيَ الْيَوْمَ وَالسُّٓوءَ عَلَى الْكَافِر۪ينَۙ27
फिर क़ियामत के दिन अल्लाह उन्हें अपमानित करेगा और कहेगा, "कहाँ है मेरे वे साझीदार, जिनके लिए तुम लड़ते-झगड़ते थे?" जिन्हें ज्ञान प्राप्त था वे कहेंगे, "निश्चय ही आज रुसवाई और ख़राबी है इनकार करनेवालों के लिए।"
اَلَّذ۪ينَ تَتَوَفّٰيهُمُ الْمَلٰٓئِكَةُ ظَالِم۪ٓي اَنْفُسِهِمْۖ فَاَلْقَوُا السَّلَمَ مَا كُنَّا نَعْمَلُ مِنْ سُٓوءٍۜ بَلٰٓى اِنَّ اللّٰهَ عَل۪يمٌ بِمَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ28
जिनकी रूहों को फ़रिश्ते इस दशा में ग्रस्त करते है कि वे अपने आप पर अत्याचार कर रहे होते है, तब आज्ञाकारी एवं वशीभूत होकर आ झुकते है कि "हम तो कोई बुराई नहीं करते थे।" "नहीं, बल्कि अल्लाह भली-भाँति जानता है जो कुछ तुम करते रहे हो
فَادْخُلُٓوا اَبْوَابَ جَهَنَّمَ خَالِد۪ينَ ف۪يهَاۜ فَلَبِئْسَ مَثْوَى الْمُتَكَبِّر۪ينَ29
तो अब जहन्नम के द्वारों में, उसमें सदैव रहने के लिए प्रवेश करो। अतः निश्चय ही बहुत ही बुरा ठिकाना है यह अहंकारियों का।"
وَق۪يلَ لِلَّذ۪ينَ اتَّقَوْا مَاذَٓا اَنْزَلَ رَبُّكُمْۜ قَالُوا خَيْرًاۜ لِلَّذ۪ينَ اَحْسَنُوا ف۪ي هٰذِهِ الدُّنْيَا حَسَنَةٌۜ وَلَدَارُ الْاٰخِرَةِ خَيْرٌۜ وَلَنِعْمَ دَارُ الْمُتَّق۪ينَۙ30
दूसरी ओर जो डर रखनेवाले है उनसे कहा जाता है, "तुम्हारे रब ने क्या अवतरित किया?" वे कहते है, "जो सबसे उत्तम है।" जिन लोगों ने भलाई की उनकी इस दुनिया में भी अच्छी हालत है और आख़िरत का घर तो अच्छा है ही। और क्या ही अच्छा घर है डर रखनेवालों का!
جَنَّاتُ عَدْنٍ يَدْخُلُونَهَا تَجْر۪ي مِنْ تَحْتِهَا الْاَنْهَارُ لَهُمْ ف۪يهَا مَا يَشَٓاؤُ۫نَۜ كَذٰلِكَ يَجْزِي اللّٰهُ الْمُتَّق۪ينَۙ31
सदैव रहने के बाग़ जिनमें वे प्रवेश करेंगे, उनके नीचे नहरें बह रहीं होंगी, उनके लिए वहाँ वह सब कुछ संचित होगा, जो वे चाहे। अल्लाह डर रखनेवालों को ऐसा ही प्रतिदान प्रदान करता है
اَلَّذ۪ينَ تَتَوَفّٰيهُمُ الْمَلٰٓئِكَةُ طَيِّب۪ينَۙ يَقُولُونَ سَلَامٌ عَلَيْكُمُۙ ادْخُلُوا الْجَنَّةَ بِمَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ32
जिनकी रूहों को फ़रिश्ते इस दशा में ग्रस्त करते है कि वे पाक और नेक होते है, वे कहते है, "तुम पर सलाम हो! प्रवेश करो जन्नत में उसके बदले में जो कुछ तुम करते रहे हो।"
هَلْ يَنْظُرُونَ اِلَّٓا اَنْ تَاْتِيَهُمُ الْمَلٰٓئِكَةُ اَوْ يَاْتِيَ اَمْرُ رَبِّكَۜ كَذٰلِكَ فَعَلَ الَّذ۪ينَ مِنْ قَبْلِهِمْۜ وَمَا ظَلَمَهُمُ اللّٰهُ وَلٰكِنْ كَانُٓوا اَنْفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ33
क्या अब वे इसी की प्रतीक्षा कर रहे है कि फ़रिश्ते उनके पास आ पहुँचे या तेरे रब का आदेश ही आ जाए? ऐसा ही उन लोगो ने भी किया, जो इनसे पहले थे। अल्लाह ने उनपर अत्याचार नहीं किया, किन्तु वे स्वयं अपने ऊपर अत्याचार करते रहे
فَاَصَابَهُمْ سَيِّـَٔاتُ مَا عَمِلُوا وَحَاقَ بِهِمْ مَا كَانُوا بِه۪ يَسْتَهْزِؤُ۫نَ۟34
अन्ततः उनकी करतूतों की बुराइयाँ उनपर आ पड़ी, और जिसका उपहास वे कहते थे, उसी ने उन्हें आ घेरा