283. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
17 · अल-इसरा
عَسٰى رَبُّكُمْ اَنْ يَرْحَمَكُمْۚ وَاِنْ عُدْتُمْ عُدْنَاۢ وَجَعَلْنَا جَهَنَّمَ لِلْكَافِر۪ينَ حَص۪يرًا8
हो सकता है तुम्हारा रब तुमपर दया करे, किन्तु यदि तुम फिर उसी पूर्व नीति की ओर पलटे तो हम भी पलटेंगे, और हमने जहन्नम को इनकार करनेवालों के लिए कारागार बना रखा है
اِنَّ هٰذَا الْقُرْاٰنَ يَهْد۪ي لِلَّت۪ي هِيَ اَقْوَمُ وَيُبَشِّرُ الْمُؤْمِن۪ينَ الَّذ۪ينَ يَعْمَلُونَ الصَّالِحَاتِ اَنَّ لَهُمْ اَجْرًا كَب۪يرًاۙ9
वास्तव में यह क़ुरआन वह मार्ग दिखाता है जो सबसे सीधा है और उन मोमिमों को, जो अच्छे कर्म करते है, शूभ सूचना देता है कि उनके लिए बड़ा बदला है
وَاَنَّ الَّذ۪ينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِالْاٰخِرَةِ اَعْتَدْنَا لَهُمْ عَذَابًا اَل۪يمًا۟10
और यह कि जो आख़िरत को नहीं मानते उनके लिए हमने दुखद यातना तैयार कर रखी है
وَيَدْعُ الْاِنْسَانُ بِالشَّرِّ دُعَٓاءَهُ بِالْخَيْرِۜ وَكَانَ الْاِنْسَانُ عَجُولًا11
मनुष्य उस प्रकार बुराई माँगता है जिस प्रकार उसकी प्रार्थना भलाई के लिए होनी चाहिए। मनुष्य है ही बड़ा उतावला!
وَجَعَلْنَا الَّيْلَ وَالنَّهَارَ اٰيَتَيْنِ فَمَحَوْنَٓا اٰيَةَ الَّيْلِ وَجَعَلْنَٓا اٰيَةَ النَّهَارِ مُبْصِرَةً لِتَبْتَغُوا فَضْلًا مِنْ رَبِّكُمْ وَلِتَعْلَمُوا عَدَدَ السِّن۪ينَ وَالْحِسَابَۜ وَكُلَّ شَيْءٍ فَصَّلْنَاهُ تَفْص۪يلًا12
हमने रात और दिन को दो निशानियाँ बनाई है। फिर रात की निशानी को हमने मिटी हुई (प्रकाशहीन) बनाया और दिन की निशानी को हमने प्रकाशमान बनाया, ताकि तुम अपने रब का अनुग्रह (रोज़ी) ढूँढो और ताकि तुम वर्षो की गणना और हिसाब मालूम कर सको, और हर चीज़ को हमने अलग-अलग स्पष्ट कर रखा है
وَكُلَّ اِنْسَانٍ اَلْزَمْنَاهُ طَٓائِرَهُ ف۪ي عُنُقِه۪ۜ وَنُخْرِجُ لَهُ يَوْمَ الْقِيٰمَةِ كِتَابًا يَلْقٰيهُ مَنْشُورًا13
हमने प्रत्येक मनुष्य का शकुन-अपशकुन उसकी अपनी गरदन से बाँध दिया है और क़ियामत के दिन हम उसके लिए एक किताब निकालेंगे, जिसको वह खुला हुआ पाएगा
اِقْرَاْ كِتَابَكَۜ كَفٰى بِنَفْسِكَ الْيَوْمَ عَلَيْكَ حَس۪يبًاۜ14
"पढ़ ले अपनी किताब (कर्मपत्र)! आज तू स्वयं ही अपना हिसाब लेने के लिए काफ़ी है।"
مَنِ اهْتَدٰى فَاِنَّمَا يَهْتَد۪ي لِنَفْسِه۪ۚ وَمَنْ ضَلَّ فَاِنَّمَا يَضِلُّ عَلَيْهَاۜ وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ اُخْرٰىۜ وَمَا كُنَّا مُعَذِّب۪ينَ حَتّٰى نَبْعَثَ رَسُولًا15
जो कोई सीधा मार्ग अपनाए तो उसने अपने ही लिए सीधा मार्ग अपनाया और जो पथभ्रष्टो हुआ, तो वह अपने ही बुरे के लिए भटका। और कोई भी बोझ उठानेवाला किसी दूसरे का बोझ नहीं उठाएगा। और हम लोगों को यातना नहीं देते जब तक कोई रसूल न भेज दें
وَاِذَٓا اَرَدْنَٓا اَنْ نُهْلِكَ قَرْيَةً اَمَرْنَا مُتْرَف۪يهَا فَفَسَقُوا ف۪يهَا فَحَقَّ عَلَيْهَا الْقَوْلُ فَدَمَّرْنَاهَا تَدْم۪يرًا16
और जब हम किसी बस्ती को विनष्ट करने का इरादा कर लेते है तो उसके सुखभोगी लोगों को आदेश देते है तो (आदेश मानने के बजाए) वे वहाँ अवज्ञा करने लग जाते है, तब उनपर बात पूरी हो जाती है, फिर हम उन्हें बिलकुल उखाड़ फेकते है
وَكَمْ اَهْلَكْنَا مِنَ الْقُرُونِ مِنْ بَعْدِ نُوحٍۜ وَكَفٰى بِرَبِّكَ بِذُنُوبِ عِبَادِه۪ خَب۪يرًا بَص۪يرًا17
हमने नूह के पश्चात कितनी ही नस्लों को विनष्ट कर दिया। तुम्हारा रब अपने बन्दों के गुनाहों की ख़बर रखने, देखने के लिए काफ़ी है