285. पृष्ठ - कुरान पढ़ें

285. पृष्ठ
17 · अल-इसरा
وَاِمَّا تُعْرِضَنَّ عَنْهُمُ ابْتِغَٓاءَ رَحْمَةٍ مِنْ رَبِّكَ تَرْجُوهَا فَقُلْ لَهُمْ قَوْلًا مَيْسُورًا28
किन्तु यदि तुम्हें अपने रब की दयालुता की खोज में, जिसकी तुम आशा रखते हो, उनसे कतराना भी पड़े, तो इस दशा में तुम उनसें नर्म बात करो
وَلَا تَجْعَلْ يَدَكَ مَغْلُولَةً اِلٰى عُنُقِكَ وَلَا تَبْسُطْهَا كُلَّ الْبَسْطِ فَتَقْعُدَ مَلُومًا مَحْسُورًا29
और अपना हाथ न तो अपनी गरदन से बाँधे रखो और न उसे बिलकुल खुला छोड़ दो कि निन्दित और असहाय होकर बैठ जाओ
اِنَّ رَبَّكَ يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَنْ يَشَٓاءُ وَيَقْدِرُۜ اِنَّهُ كَانَ بِعِبَادِه۪ خَب۪يرًا بَص۪يرًا۟30
तुम्हारा रब जिसको चाहता है प्रचुर और फैली हुई रोज़ी प्रदान करता है और इसी प्रकार नपी-तुली भी। निस्संदेह वह अपने बन्दों की ख़बर और उनपर नज़र रखता है
وَلَا تَقْتُلُٓوا اَوْلَادَكُمْ خَشْيَةَ اِمْلَاقٍۜ نَحْنُ نَرْزُقُهُمْ وَاِيَّاكُمْۜ اِنَّ قَتْلَهُمْ كَانَ خِطْـًٔا كَب۪يرًا31
और निर्धनता के भय से अपनी सन्तान की हत्या न करो, हम उन्हें भी रोज़ी देंगे और तुम्हें भी। वास्तव में उनकी हत्या बहुत ही बड़ा अपराध है
وَلَا تَقْرَبُوا الزِّنٰٓى اِنَّهُ كَانَ فَاحِشَةًۜ وَسَٓاءَ سَب۪يلًا32
और व्यभिचार के निकट न जाओ। वह एक अश्लील कर्म और बुरा मार्ग है
وَلَا تَقْتُلُوا النَّفْسَ الَّت۪ي حَرَّمَ اللّٰهُ اِلَّا بِالْحَقِّۜ وَمَنْ قُتِلَ مَظْلُومًا فَقَدْ جَعَلْنَا لِوَلِيِّه۪ سُلْطَانًا فَلَا يُسْرِفْ فِي الْقَتْلِۜ اِنَّهُ كَانَ مَنْصُورًا33
किसी जीव की हत्या न करो, जिसे (मारना) अल्लाह ने हराम ठहराया है। यह और बात है कि हक़ (न्याय) का तक़ाज़ा यही हो। और जिसकी अन्यायपूर्वक हत्या की गई हो, उसके उत्तराधिकारी को हमने अधिकार दिया है (कि वह हत्यारे से बदला ले सकता है), किन्तु वह हत्या के विषय में सीमा का उल्लंघन न करे। निश्चय ही उसकी सहायता की जाएगी
وَلَا تَقْرَبُوا مَالَ الْيَت۪يمِ اِلَّا بِالَّت۪ي هِيَ اَحْسَنُ حَتّٰى يَبْلُغَ اَشُدَّهُۖ وَاَوْفُوا بِالْعَهْدِۚ اِنَّ الْعَهْدَ كَانَ مَسْؤُ۫لًا34
और अनाथ के माल को हाथ में लगाओ सिवाय उत्तम रीति के, यहाँ तक कि वह अपनी युवा अवस्था को पहुँच जाए, और प्रतिज्ञा पूरी करो। प्रतिज्ञा के विषय में अवश्य पूछा जाएगा
وَاَوْفُوا الْكَيْلَ اِذَا كِلْتُمْ وَزِنُوا بِالْقِسْطَاسِ الْمُسْتَق۪يمِۜ ذٰلِكَ خَيْرٌ وَاَحْسَنُ تَاْو۪يلًا35
और जब नापकर दो तो, नाप पूरी रखो। और ठीक तराज़ू से तौलो, यही उत्तम और परिणाम की दृष्टि से भी अधिक अच्छा है
وَلَا تَقْفُ مَا لَيْسَ لَكَ بِه۪ عِلْمٌۜ اِنَّ السَّمْعَ وَالْبَصَرَ وَالْفُؤَادَ كُلُّ اُو۬لٰٓئِكَ كَانَ عَنْهُ مَسْؤُ۫لًا36
और जिस चीज़ का तुम्हें ज्ञान न हो उसके पीछे न लगो। निस्संदेह कान और आँख और दिल इनमें से प्रत्येक के विषय में पूछा जाएगा
وَلَا تَمْشِ فِي الْاَرْضِ مَرَحًاۚ اِنَّكَ لَنْ تَخْرِقَ الْاَرْضَ وَلَنْ تَبْلُغَ الْجِبَالَ طُولًا37
और धरती में अकड़कर न चलो, न तो तुम धरती को फाड़ सकते हो और न लम्बे होकर पहाड़ो को पहुँच सकते हो
كُلُّ ذٰلِكَ كَانَ سَيِّئُهُ عِنْدَ رَبِّكَ مَكْرُوهًا38
इनमें से प्रत्येक की बुराई तुम्हारे रब की स्पष्ट में अप्रिय ही है