287. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
17 · अल-इसरा
قُلْ كُونُوا حِجَارَةً اَوْ حَد۪يدًاۙ50
कह दो, "तुम पत्थर या लोहो हो जाओ,
اَوْ خَلْقًا مِمَّا يَكْبُرُ ف۪ي صُدُورِكُمْۚ فَسَيَقُولُونَ مَنْ يُع۪يدُنَاۜ قُلِ الَّذ۪ي فَطَرَكُمْ اَوَّلَ مَرَّةٍۚ فَسَيُنْغِضُونَ اِلَيْكَ رُؤُ۫سَهُمْ وَيَقُولُونَ مَتٰى هُوَۜ قُلْ عَسٰٓى اَنْ يَكُونَ قَر۪يبًا51
या कोई और चीज़ जो तुम्हारे जी में अत्यन्त विकट हो।" तब वे कहेंगे, "कौन हमें पलटाकर लाएगा?" कह दो, "वहीं जिसने तुम्हें पहली बार पैदा किया।" तब वे तुम्हारे आगे अपने सिरों को हिला-हिलाकर कहेंगे, "अच्छा तो वह कह होगा?" कह दो, "कदाचित कि वह निकट ही हो।"
يَوْمَ يَدْعُوكُمْ فَتَسْتَج۪يبُونَ بِحَمْدِه۪ وَتَظُنُّونَ اِنْ لَبِثْتُمْ اِلَّا قَل۪يلًا۟52
जिस दिन वह तुम्हें पुकारेगा, तो तुम उसकी प्रशंसा करते हुए उसकी आज्ञा को स्वीकार करोगे और समझोगे कि तुम बस थोड़ी ही देर ठहरे रहे हो
وَقُلْ لِعِبَاد۪ي يَقُولُوا الَّت۪ي هِيَ اَحْسَنُۜ اِنَّ الشَّيْطَانَ يَنْزَغُ بَيْنَهُمْۜ اِنَّ الشَّيْطَانَ كَانَ لِلْاِنْسَانِ عَدُوًّا مُب۪ينًا53
मेरे बन्दों से कह दो कि "बात वहीं कहें जो उत्तम हो। शैतान तो उनके बीच उकसाकर फ़साद डालता रहता है। निस्संदेह शैतान मनुष्य का प्रत्यक्ष शत्रु है।"
رَبُّكُمْ اَعْلَمُ بِكُمْۜ اِنْ يَشَاْ يَرْحَمْكُمْ اَوْ اِنْ يَشَاْ يُعَذِّبْكُمْۜ وَمَٓا اَرْسَلْنَاكَ عَلَيْهِمْ وَك۪يلًا54
तुम्हारा रब तुमसे भली-भाँति परिचित है। वह चाहे तो तुमपर दया करे या चाहे तो तुम्हें यातना दे। हमने तुम्हें उनकी ज़िम्मेदारी लेनेवाला कोई क्यक्ति बनाकर नहीं भेजा है (कि उन्हें अनिवार्यतः संमार्ग पर ला ही दो)
وَرَبُّكَ اَعْلَمُ بِمَنْ فِي السَّمٰوَاتِ وَالْاَرْضِۜ وَلَقَدْ فَضَّلْنَا بَعْضَ النَّبِيّ۪نَ عَلٰى بَعْضٍ وَاٰتَيْنَا دَاوُ۫دَ زَبُورًا55
तुम्हारा रब उससे भी भली-भाँति परिचित है जो कोई आकाशों और धरती में है, और हमने कुछ नबियों को कुछ की अपेक्षा श्रेष्ठता दी और हमने ही दाऊद को ज़बूर प्रदान की थी
قُلِ ادْعُوا الَّذ۪ينَ زَعَمْتُمْ مِنْ دُونِه۪ فَلَا يَمْلِكُونَ كَشْفَ الضُّرِّ عَنْكُمْ وَلَا تَحْو۪يلًا56
कह दो, "तुम उससे इतर जिनको भी पूज्य-प्रभु समझते हो उन्हें पुकार कर देखो। वे न तुमसे कोई कष्ट दूर करने का अधिकार रखते है और न उसे बदलने का।"
اُو۬لٰٓئِكَ الَّذ۪ينَ يَدْعُونَ يَبْتَغُونَ اِلٰى رَبِّهِمُ الْوَس۪يلَةَ اَيُّهُمْ اَقْرَبُ وَيَرْجُونَ رَحْمَتَهُ وَيَخَافُونَ عَذَابَهُۜ اِنَّ عَذَابَ رَبِّكَ كَانَ مَحْذُورًا57
जिनको ये लोग पुकारते है वे तो स्वयं अपने रब का सामीप्य ढूँढते है कि कौन उनमें से सबसे अधिक निकटता प्राप्त कर ले। और वे उसकी दयालुता की आशा रखते है और उसकी यातना से डरते रहते है। तुम्हारे रब की यातना तो है ही डरने की चीज़!
وَاِنْ مِنْ قَرْيَةٍ اِلَّا نَحْنُ مُهْلِكُوهَا قَبْلَ يَوْمِ الْقِيٰمَةِ اَوْ مُعَذِّبُوهَا عَذَابًا شَد۪يدًاۜ كَانَ ذٰلِكَ فِي الْكِتَابِ مَسْطُورًا58
कोई भी (अवज्ञाकारी) बस्ती ऐसी नहीं जिसे हम क़ियामत के दिन से पहले विनष्टअ न कर दें या उसे कठोर यातना न दे। यह बात किताब में लिखी जा चुकी है