290. पृष्ठ - कुरान पढ़ें
17 · अल-इसरा
وَاِنْ كَادُوا لَيَسْتَفِزُّونَكَ مِنَ الْاَرْضِ لِيُخْرِجُوكَ مِنْهَا وَاِذًا لَا يَلْبَثُونَ خِلَافَكَ اِلَّا قَل۪يلًا76
और निश्चय ही उन्होंने चाल चली कि इस भूभाग से तुम्हारे क़दम उखाड़ दें, ताकि तुम्हें यहाँ से निकालकर ही रहे। और ऐसा हुआ तो तुम्हारे पीछे ये भी रह थोड़े ही पाएँगे
سُنَّةَ مَنْ قَدْ اَرْسَلْنَا قَبْلَكَ مِنْ رُسُلِنَا وَلَا تَجِدُ لِسُنَّتِنَا تَحْو۪يلًا۟77
यही कार्य-प्रणाली हमारे उन रसूलों के विषय में भी रही है, जिन्हें हमने तुमसे पहले भेजा था और तुम हमारी कार्य-प्रणाली में कोई अन्तर न पाओगे
اَقِمِ الصَّلٰوةَ لِدُلُوكِ الشَّمْسِ اِلٰى غَسَقِ الَّيْلِ وَقُرْاٰنَ الْفَجْرِۜ اِنَّ قُرْاٰنَ الْفَجْرِ كَانَ مَشْهُودًا78
नमाज़ क़ायम करो सूर्य के ढलने से लेकर रात के छा जाने तक और फ़ज्र (प्रभात) के क़ुरआन (अर्थात फ़ज्र की नमाज़ः के पाबन्द रहो। निश्चय ही फ़ज्र का क़ुरआन पढ़ना हुज़ूरी की चीज़ है
وَمِنَ الَّيْلِ فَتَهَجَّدْ بِه۪ نَافِلَةً لَكَۗ عَسٰٓى اَنْ يَبْعَثَكَ رَبُّكَ مَقَامًا مَحْمُودًا79
और रात के कुछ हिस्से में उस (क़ुरआन) के द्वारा जागरण किया करो, यह तुम्हारे लिए तद्अधिक (नफ़्ल) है। आशा है कि तुम्हारा रब तुम्हें उठाए ऐसा उठाना जो प्रशंसित हो
وَقُلْ رَبِّ اَدْخِلْن۪ي مُدْخَلَ صِدْقٍ وَاَخْرِجْن۪ي مُخْرَجَ صِدْقٍ وَاجْعَلْ ل۪ي مِنْ لَدُنْكَ سُلْطَانًا نَص۪يرًا80
और कहो, "मेरे रब! तू मुझे ख़ूबी के साथ दाख़िल कर और ख़ूबी के साथ निकाल, और अपनी ओर से मुझे सहायक शक्ति प्रदान कर।"
وَقُلْ جَٓاءَ الْحَقُّ وَزَهَقَ الْبَاطِلُۜ اِنَّ الْبَاطِلَ كَانَ زَهُوقًا81
कह दो, "सत्य आ गया और असत्य मिट गया; असत्य तो मिट जानेवाला ही होता है।"
وَنُنَزِّلُ مِنَ الْقُرْاٰنِ مَا هُوَ شِفَٓاءٌ وَرَحْمَةٌ لِلْمُؤْمِن۪ينَۙ وَلَا يَز۪يدُ الظَّالِم۪ينَ اِلَّا خَسَارًا82
हम क़ुरआन में से जो उतारते है वह मोमिनों के लिए शिफ़ा (आरोग्य) और दयालुता है, किन्तु ज़ालिमों के लिए तो वह बस घाटे ही में अभिवृद्धि करता है
وَاِذَٓا اَنْعَمْنَا عَلَى الْاِنْسَانِ اَعْرَضَ وَنَاٰ بِجَانِبِه۪ۚ وَاِذَا مَسَّهُ الشَّرُّ كَانَ يَؤُ۫سًا83
मानव पर जब हम सुखद कृपा करते है तो वह मुँह फेरता और अपना पहलू बचाता है। किन्तु जब उसे तकलीफ़ पहुँचती है, तो वह निराश होने लगता है
قُلْ كُلٌّ يَعْمَلُ عَلٰى شَاكِلَتِه۪ۜ فَرَبُّكُمْ اَعْلَمُ بِمَنْ هُوَ اَهْدٰى سَب۪يلًا۟84
कह दो, "हर एक अपने ढब पर काम कर रहा है, तो अब तुम्हारा रब ही भली-भाँति जानता है कि कौन अधिक सीधे मार्ग पर है।"
وَيَسْـَٔلُونَكَ عَنِ الرُّوحِۜ قُلِ الرُّوحُ مِنْ اَمْرِ رَبّ۪ي وَمَٓا اُو۫ت۪يتُمْ مِنَ الْعِلْمِ اِلَّا قَل۪يلًا85
वे तुमसे रूह के विषय में पूछते है। कह दो, "रूह का संबंध तो मेरे रब के आदेश से है, किन्तु ज्ञान तुम्हें मिला थोड़ा ही है।"
وَلَئِنْ شِئْنَا لَنَذْهَبَنَّ بِالَّذ۪ٓي اَوْحَيْنَٓا اِلَيْكَ ثُمَّ لَا تَجِدُ لَكَ بِه۪ عَلَيْنَا وَك۪يلًاۙ86
यदि हम चाहें तो वह सब छीन लें जो हमने तुम्हारी ओर प्रकाशना की है, फिर इसके लिए हमारे मुक़ाबले में अपना कोई समर्थक न पाओगे